Unit 3 Cost of Capital and Financing Decisions Mcom Notes

Unit 3 Cost of Capital and Financing Decisions Mcom Notes

Unit 3 Cost of Capital and Financing Decisions Mcom Notes

 

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Cost Capital Financing Decisions

पूँजी की लागत (Cost of Capital)

सामान्यतः किसी उपक्रम के लिए आवश्यक पूँजी की रकम को विभिन्न स्रोतों से पूरा किया जाता है। किसी विशेष स्रोत से पूँजी को प्राप्त करने व उपयोग करने के प्रतिफलस्वरूप जो मूल्य चुकाया जाता है, उसे ही पूँजी की लागत कहते हैं। तकनीकी भाषा में, किसी उपक्रम को पूँजी प्राप्ति के किसी साधन से मिलने वाली शुद्ध धनराशि तथा उसके ऊपर इस सम्बन्ध में पड़ने वाले दायित्व के पारस्परिक अनुपात को पूँजी की लागत कहा जाता है। विभिन्न विद्वानों ने पूँजी की लागत को इस प्रकार परिभाषित किया है- सोलोमन इजरा के अनुसार, “पूँजी की लागत अर्जनों की न्यूनतम अपेक्षित दर अथवा पूँजीगत व्ययों के लिए कटौती दर है।”

एम० जे० गोर्डन के शब्दों में, “पूँजी की लागत का तात्पर्य उस प्रत्याय दर से है जो कि एक कम्पनी को अपना मूल्य यथावत् रखने हेतु विनियोग पर अर्जित करनी चाहिए।” मिल्टन एच० स्पेन्सर के अनुसार, “पूँजी की लागत वह न्यूनतम प्रत्याय दर होती है।

जिसे एक फर्म किसी विनियोग करने के लिए एक शर्त के रूप में माँग करती है। ” हन्ट, विलियम तथा डोनाल्डसन के अनुसार, “पूँजी की लागत को उस दर के रूप में प्रयोग किया जा सकता है जो देय-धन देय होने पर लागत व्यय की पूर्ति करने हेतु शुद्ध प्राप्तियों पर अर्जित की जानी चाहिए।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर निष्कर्ष के रूप में यह कह सकते हैं कि पूँजी की लागत वह न्यूनतम प्रत्याय दर है जो एक संस्था को अपने विनियोग पर अवश्य अर्जित करनी चाहिए जिससे संस्था उस विनियोग के लिए प्राप्त किए गए कोषों की लागतों का भुगतान कर सके।

Cost Capital Financing Decisions

पूँजी की लागत का निर्धारण अथवा माप (Determination or Measurement of Cost of Capital)

एक फर्म विनियोग हेतु अपनी वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति भिन्न-भिन्न पूँजी स्रोतों से कर सकती है। प्रत्येक स्रोत की लागत भी एक-दूसरे से भिन्न होती है। अतः विभिन्न स्रोतों से प्राप्त पूँजी की लागत की गणना भी अलग-अलग की जाती है। सामान्यतः पूंजी प्राप्त करने निम्न साधन हो सकते हैं –

(1) ऋण पूंजी (Debt Capital)

(ii) पूर्वाधिकारी अंश पूंजी (Preference Share Capital)

(ii) समता अंश पूँजी (Equity Share Capital)

(iv) प्रतिधारित लाभ (Retained Earning)

1, ऋण पूँजी की लागत (Cost of Debt Capital) – सामान्यतः ऋण पूंजी की प्राप्ति संस्था के द्वारा ऋणपत्र निर्गमित करके की जाती है इन पर देय ब्याज की दर को ही इनकी लागत माना जाता है किन्तु यह सही नहीं है क्योकि ऋणपत्र के निर्गमन पर अनेक प्रकार के व्यय करने पड़ते हैं जैसे-बट्टा, अभिगोपन कमीशन आदि।

ऋण पूँजी के प्रकार एवं निर्गमन की शर्तों का भी ऋण पूंजी की लागत पर प्रभाव पड़ता है। ऋण पूंजी को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है—

(A) स्थायी या अशोध्य ऋण

(B) शोध्य ऋण

(A) स्थायी या अशोध्य ऋण (Perpetual or Irredeemable Debt) – स्थायी या अशोध्य ऋण से तात्पर्य उन ऋणपत्रों से है, जिनके भुगतान की कोई निश्चित अवधि नहीं होती सामान्यतया ये ऋण संस्था के समापन के समय ही देय होते हैं। इस प्रकार की पूँजी की लागत की गणना के लिए इस पर देय ब्याज की राशि का सम्बन्ध इसके निर्गमन से प्राप्त शुद्ध आगम से स्थापित किया जाता है। सूत्र के रूप में—

Perpetual or Irredeemable Debt

यहाँ,  I = Annual Interest Payable

Value NP = Net proceeds.

(B) शोध्य ऋण (Redeemable Debt) – व्यावहारिक रूप में अशोध्य ऋण नहीं पाए जाते अधिकतर ऋण एक निश्चित अवधि के अन्तर्गत शोध्य होते हैं। ऐसे ऋणों की लागत की गणना में इनके शोधन की अवधि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। शोध्य ऋण की लागत को गणना करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

Redeemable Debt

जहाँ, Kd = Cost of debt Capital

I = Annual Interest Payable

MV = Maturity value

NP = Net proceeds

N = number of years to maturity

 

चूँकि आयकर अधिनियम के अन्तर्गत ऋण पूँजी पर ब्याज कम्पनी का स्वीकार्य व्यय है। यह निगम कर की गणना करने से पूर्व लाभों में से घटा दिया जाता है; फलस्वरूप संस्था को ब्याज के रूप में चुकाई गयी राशि पर कर की दर के अनुपात में बचत होती है। उपर्युक्त सूत्र द्वारा ऋण-पूंजी की लागत कर से पूर्व की गणना होती है। इसे कर चुकाने के पश्चात् की लागत में बदलने के लिए निम्न सूत्र प्रयोग किया जाता है—

 

Redeemable Debt

 

2, पूर्वाधिकारी अंश पूँजी की लागत (Cost of Preference Share Capital) – पूर्वाधिकारी अंश स्थिर आय वाली प्रतिभूतियाँ होते हैं। ऋणपत्रों की तरह इन पर दिए जाने वाले लाभांश की दर इनके निर्गमन पर ही निश्चित कर दी जाती है। चूंकि लाभांश का भुगतान आयकर का भुगतान करने के उपरान्त किया जाता है। अतः ऋणपूँजी के विपरीत पूर्वाधिकारी अंश पूँजी की लागत कर के पश्चात् पूँजी की लागत होती है। पूर्वाधिकारी अंश पूँजी की लागत इस प्रकार ज्ञात की जाती है—

(A) अशोध्य पूर्वाधिकारी अंश पूँजी की लागत (Cost of Irredeemable Preference Share Capital) – अशोध्य पूर्वाधिकारी अंश का भुगतान कम्पनी के समापन के समय किया जाता है। ऐसे अंशों की पूँजी की लागत ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है

 

Cost of Irredeemable Preference Share Capital

 

(B) शोध्य पूर्वाधिकारी अंश पूँजी की लागत (Cost of Redeemable Preference Share Capital) – ऐसे पूर्वाधिकारी अंश जिनका भुगतान एक निश्चित समय के पश्चात् कर दिया जाता है, शोध्य पूर्वाधिकारी अंश होते हैं। इनकी लागत ज्ञात करने के लिए अग्रलिखित सूत्र का प्रयोग करते हैं—-

 

Cost of Redeemable Preference Share Capital

 

Cost of Redeemable Preference Share Capital

3, समता अंश पूँजी की लागत (Cost of Equity Share Capital) – ऋणपत्र एवं पूर्वाधिकारी अंश पूंजी के विपरीत समता अंश पूँजी पर दिया जाने वाला लाभांश पूर्व निर्धारित नहीं होता है और लाभांश का भुगतान किया जाना भी अनिवार्य नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि समता अंश पूँजी लागत रहित होती है। वास्तव में इस प्रकार की पूंजी की लागत समता अंशधारियों की उन अपेक्षाओं के बराबर होती हैं जिनकी पूर्ति की आशा वे संस्था के प्रबन्ध से करते हैं। समता अंश पूँजी की लागत ज्ञात करने की निम्नलिखित विधियों प्रयोग की जाती हैं–

(A) लाभांश प्रतिफल विधि (Dividend Yield Method) समता अंश पूंजी की लागत निकालने वाली इस विधि को लाभांश/मूल्य अनुपात विधि भी कहते हैं। यह विधि सम अंशधारी के द्वारा आशंसित प्रति अंश लाभांश पर आधारित है। इनकी लागत ज्ञात करने के लिए प्राप्त लाभांश को अंश के बाजार मूल्य से पूँजीकृत किया जाता है। सूत्र के रूप में

Dividend Yield Method

(B) उपार्जन प्रतिफल विधि (Earning Yield Method) – इसे अर्जन/मूल्य अनुपात विधि भी कहते हैं। इस विधि की यह मान्यता है कि संस्था में विनियोजित पूँजी अंशों के बाजार मूल्य के बराबर हैं। इसलिए इसमें प्रति अंश अर्जनों का अंश के बाजार मूल्य से सम्बन्ध स्थापित करके समता पूँजी का बाजार मूल्य ज्ञात किया जाता है। सूत्र के रूप में

 

Earning Yield Method

यहाँ, EPS = Earning per share.

MP = Market price per share

(C) लाभांश प्रतिफल तथा लाभांश वृद्धि विधि (Dividend Yield Plus Growth in Dividend Method) – इस विधि को लाभांश मूल्य + लाभांश में वृद्धि विधि भी कहते हैं। इस विधि के अन्तर्गत उपर्युक्त (A) विधि द्वारा आकलित पूँजी की लागत में प्रतिवर्ष लाभांश की वृद्धि दर को जोड़ दिया जाता है। यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक समता अंशधारी केवल वर्तमान लाभांश दर से ही सन्तुष्ट नहीं होता वरन् उसमें प्रतिवर्ष वृद्धि भी चाहता है। इस विधि से समता अंश पूँजी की लागत इस सूत्र से ज्ञात की जाती है –

 

Dividend Yield Plus Growth in Dividend Method

उपर्युक्त सभी समता अंश पूंजी की लागत निकालने की विधियों से कर के पश्चात् की लागत ज्ञात होती है। कर से पूर्व की लागत ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र प्रयोग करते हैं

Dividend Yield Plus Growth in Dividend Method

4, प्रतिधारित लाभ की लागत (Cost of Retained Earnings) – एक कम्पनी द्वारा अर्जित लाभों में से लाभांश वितरण के उपरान्त जो भाग शेष बच जाता है उसे प्रतिधारित लाभ कहते हैं। इस प्रकार के लाभों की कोई स्पष्ट लागत नहीं होती क्योंकि इस साधन से प्राप्त पूँजी के लिए कोई लागत नहीं चुकानी पड़ती है। लेकिन इसे लागत रहित साधन मानना त्रुटिपूर्ण होगा। वास्तव में, इस साधन की लागत इसकी अवसर लागत होती है। यह कह सकते हैं कि प्रतिधृत लाभों की लागत अंशधारियों द्वारा इनसे मिलने वाले लाभांश पर त्यागी गयी अनुमानित आय होती है। प्रतिधारित लाभों की लागत की गणना में निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है

 

Cost of Retained Earnings

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पूँजी की भारित औसत लागत (Weighted Average Cost of Capital)

पूँजी प्राप्ति के विभिन्न साधनों की लागतें एक समान न होकर अलग-अलग होती हैं। कुछ साधनों की लागत कम होती है और कुछ की अधिक। यह भी सत्य है कि वित्तीय प्रबन्धक केवल कम लागत वाले साधनों के आधार पर ही पूँजी की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं। उन्हें सस्ते और महँगे सभी साधनों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। अतः यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि संस्था के पूँजी ढाँचे में निहित विभिन्न साधनों (समता अंश पूंजी, पूर्वाधिकार अंश पूंजी ऋण पूंजी एवं प्रतिधारित लाभ) से प्राप्त सम्पूर्ण पूंजी की लागत किस प्रकार निकाली जाए। इसके लिए भारित औसत लागत ज्ञात की जाती है।

पूँजी की भारित औसत लागत की गणना (Calculation of Weighted Average Cost of Capital)- पूँजी की भारित औसत लागत ज्ञात करने के लिए निम्न क्रियाएँ की जाती हैं –

(1) प्रत्येक वित्तीय साधन से प्राप्त पूंजी की विशिष्ट लागते ज्ञात करना।

(2) प्रत्येक प्रकार के कोष के लिए भार प्रदान करना।

(3) प्रत्येक साधन की पूँजी की व्यक्तिगत लागत को उससे सम्बन्धित भार से गुणा करना।

(4) अन्त में पूंजी के सभी साधनों की उपर्युक्त 3 के अन्तर्गत आगणित भारित लागतों का योग करके पूँजी की भारित औसत लागत ज्ञात की जाती है।

भार प्रदान करना (Assignment of Weights) इसकी निम्न पद्धतियों हैं –

1, ऐतिहासिक भार विधि (Historical Weights Approach) – इसके अन्तर्गत पूंजी के विभिन्न साधनों के विद्यमान पूँजी संरचना में भाग (Proportion) को ही भार के लिए प्रयोग किया जाता है। यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि फर्म को वर्तमान पूँजी संरचना ही अनुकूलतम है। अतः वह अतिरिक्त कोषों की उगाही विभिन्न साधनों के विद्यमान पूँजी संरचना में उनके भाग के अनुपात में ही करेगी।

ऐतिहासिक भार विभिन्न प्रतिभूतियों के अंकित या पुस्तक मूल्य (Face or Book Value) के आधार पर दिए जा सकते हैं अथवा उनके बाजार मूल्य (Market Value) के आधार पर।

पुस्तक मूल्य भार (Book Value Weights) – यह एक सरल विधि है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक साधन का कुल पूँजी संरचना में भाग प्रतिभूतियों के पुस्तक मूल्य के आधार पर ज्ञात किया जाता है।

बाजार मूल्य भार (Market Value Weights) – इसके अन्तर्गत प्रत्येक प्रकार की प्रतिभूति के बाजार मूल्य के आधार पर उसमें विनियोजित पूँजी कोषों का बाजार मूल्य ज्ञात किया जाता है तथा समस्त प्रतिभूतियों के बाजार मूल्य के योग से प्रत्येक प्रकार की प्रतिभूति के भाग को भार के रूप में प्रयोग किया जाता है। सैद्धान्तिक आधार पर यह विधि अधिक सुदृढ़ तथा प्रभावोत्पादक है क्योंकि प्रतिभूतियों का बाजार मूल्य ही उनके विक्रय से प्राप्त होने वाली वास्तविक राशि के निकटतम होता है किन्तु एक फर्म के समता वित्तीयन के साधनों (अर्थात्) पूर्वाधिकारी अंश, समता अंश और प्रतिधृत अर्जनों) के बाजार मूल्यों की सही गणना कठिन है। विशेषतया फर्म के प्रतिधृत अर्जनों का बाजार मूल्य नियत करना तो अत्यन्त कठिन है। चूंकि पूर्वाधिकारी और समता अंशों का बाजार मूल्य उनके पुस्तकीय मूल्य से सामान्यतया अधिक रहता है, अतः बाजार मूल्य भारों के आधार पर ज्ञात की गई भारित औसत लागत ऐतिहासिक मूल्य भारों की तुलना अधिक होती है।

2, लक्षित भार विधि (Target Weights Approach) – यदि फर्म ने स्वामी की सम्पदा के अधिकतमीकरण के उद्देश्य के सर्वाधिक अनुरूप कोई पूँजी संरचना निर्धारित की है और वह अपनी वित्तीयन नीतियाँ इस अनुकूलतम पूँजी संरचना की प्राप्ति के लिए निर्देशित कर रही है तो लक्षित पूँजी संरचना भारों का प्रयोग उपयुक्त रहेगा। इन भारों की गणना विभिन्न प्रतिभूतियों के ऐतिहासिक पुस्तक मूल्य (न कि बाजार मूल्य) के आधार पर की जाती है। यदि फर्म की विद्यमान पूँजी संरचना अनुकूलतम पूँजी संरचना से काफी भिन्न नहीं है तो ऐतिहासिक भार विधि और लक्षित भार विधि दोनों से पूँजी की भारित औसत लागत में कोई महत्त्वपूर्ण अन्तर नहीं आएगा।

3, सीमान्त भार विधि (Marginal Weights Approach) – इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रतिभूतियों की विशिष्ट लागतों को नए उगाहे जाने वाले कुल कोषों में उनके अपने-अपने भाग से भारांकित किया जाता है। इस विधि में यह माना जाता है। नई परियोजना का वित्तीयन पूर्णतया नई पूँजी कोष उगाह करके ही किया जाएगा।

IIIsutration : दक्ष एजुकेशन लिमिटेड की पूंजी सरंचना निम्नलिखित है –
Following is the capital structure of Daksh Education Ltd.

Marginal Weights Approach

 

Marginal Weights Approach

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उत्तोलन (Leverage)

‘उत्तोलन’ (Leverage) शब्द की उत्पत्ति उत्तोलन दण्ड (Lever) से हुई है। उत्तोलन दण्ड से आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें कम बल लगाकर अधिक-से-अधिक वजन उठाया। जा सकता है या अधिक से अधिक कार्य किया जा सकता है। वित्तीय प्रबन्ध के अन्तर्गत उत्तोलन से आशय वित्तीय उत्तोलन से है जिसके अन्तर्गत वित्तीय मामलों से सम्बन्धित अध्ययन किया जाता है। वास्तव में वित्तीय उत्तोलन से आशय उस अवस्था से है जिसमें कम-से-कम स्वामिगत पूँजी से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

वित्तीय उत्तोलन का अभिप्राय ऐसी स्थिति से है जिसमें किसी निगम या कम्पनी के द्वारा। स्थायी दायित्व वाली पूँजी (पूर्वाधिकारी अंश पूंजी, ऋणपत्रों एवं ऋणों) में कमी या वृद्धि करने से समता अंश पूंजी की लाभप्रदता पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में वित्तीय उत्तोलन, समता पर व्यापार (Trading on Equity) का समानार्थी ही है। आधुनिक शब्दावली में पूँजी संरचना को ही वित्तीय उत्तोलन के नाम से सम्बोधित किया जाता है। वित्तीय उत्तोलन में समता अंशधारियों की लाभदायकता पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण किया जाता है और इस विश्लेषण के आधार पर पूँजी संरचना के स्वरूप के सम्बन्ध में निर्णय लिए जाते हैं।

प्रमुख विद्वानों ने वित्तीय उत्तोलन को निम्न प्रकार परिभाषित किया है –

(1) जे०ई० वाल्टर (J.E. Walter) – के शब्दों में, “उत्तोलन को समता पर प्रतिशत प्रत्याय का कुल पूँजीकरण की प्रतिशत प्रत्याय के साथ अनुपात रूप में परिभाषित किया जा सकता है। ”

(2) सोलोमन इज़रा (olomon Izra) – के अनुसार, “समता अंशधारियों को मिलने वाली प्रत्याय दर के कुल पूँजीकरण की प्रत्याय दर के साथ अनुपात को उत्तोलन कहते हैं।”

(3) डॉ० आर०एम० श्रीवास्तव (Dr. R.M. Srivastava) – के अनुसार, “वित्तीय उत्तोलन का आशय एक स्थिर व्यय प्राप्त किए गए कोषों का विनियोजन करने से है, इसलिए वित्तीय उत्तोलन को दीर्घकालीन ऋण के साथ कुल विनियोजित कोषों के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

(4) वेस्टन हॉल्ट (Weston Holt) –  के शब्दों में, “वित्तीय उत्तोलन को या तो कुल ऋणों का शुद्ध आवर्त (Net Worth) के साथ अनुपात के रूप में अथवा कुल ऋणों का कुल सम्पत्तियों के साथ अनुपात के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषणात्मक विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है “वित्तीय उत्तोलन की सहायता से किसी निगम या कम्पनी द्वारा स्थायी दायित्व वाली पूंजी में कमी या वृद्धि का समता अंशधारियों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव की माप की जाती है।” अतः स्पष्ट है — “वित्तीय उत्तोलन का प्रयोग समता अंश पूँजी की लाभदायकता पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। वित्तीय उत्तोलन अनुकूलता या प्रतिकूलता की उस सीमा को व्यक्त करता है जिसके कारण स्थायी दायित्व वाली पूँजी (पूर्वाधिकारी अंश पूँजी ऋणपत्र एवं ऋण) में की गई वृद्धि या कमी से समता अंशधारियों के लिए उपलब्ध लाभ में वृद्धि या कमी होती है।” यदि वित्तीय उत्तोलन अनुकूल (Favourable) है तो इससे समता अंशधारियों को लाभ पहुँचता है और यदि वित्तीय उत्तोलन प्रतिकूल (Unfavourable) है तो इससे समता अंशधारियों को हानि पहुँचती है। वास्तव में, वित्तीय उत्तोलन का सिद्धान्त समता पर व्यापार के सिद्धान्त की ही आधुनिक व्याख्या का परिचायक है।

उत्तोलन के प्रकार (Kinds of Leverage)

उत्तोलन तीन प्रकार का होता है-

1,वित्तीय उत्तोलन (Financial Leverage),

2, परिचालन उत्तोलन (Operating Leverage) एवं

III. मिश्रित उत्तोलन (Combined or Mixed or Composite Leverage)

इनके सम्बन्ध में विवेचन इस प्रकार है –

 

I, वित्तीय उत्तोलन (Financial Leverage)

वित्तीय उत्तोलन किसी निगम या कम्पनी की पूँजी संरचना में स्थिर दायित्व वाली प्रतिभूतियों (पूर्वाधिकार अंश पूंजी ऋणपत्र एवं ऋण आदि) के उपयोग के कारण उसके लाभों पर पड़ने वाले प्रभाव का स्पष्टीकरण करता है। वित्तीय उत्तोलन की गणना निम्नलिखित सूत्र के द्वारा की जाती है—

 

Financial Leverage

 

वित्तीय उत्तोलन की मात्रा (Quantity of Financial Leverage) –  वित्तीय उत्तोलन की मात्रा को ब्याज एवं कर से पूर्व आय (EBIT) या परिचालन लाभ (OP) में होने वाले परिवर्तन के परिणामस्वरूप कर योग्य आय (EBT) या कर से पूर्व लाभ (PBT) में होने वाले परिवर्तन प्रतिशत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसे सूत्र द्वारा निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं

 

Quantity of Financial Leverage

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II, परिचालन उत्तोलन (Operating Leverage)

किसी निगम या कम्पनी के विक्रय के विभिन्न स्तरों पर आय ज्ञात करने के लिए परिचालन उत्तोलन की गणना की जाती है। परिचालन अनुपात विक्रय में हुए परिवर्तन से परिचालन लाभ (OP Operating Profits) पर पड़ने वाले प्रभाव की माप करता है। किसी निगम या कम्पनी में परिचालन उत्तोलन उस समय उत्पन्न होता है, जबकि विक्रय के स्तर में होने वाले परिवर्तन उस निगम या कम्पनी के परिचालन लाभों में भी परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। प्रमुख विद्वानों ने परिचालन उत्तोलन को निम्न प्रकार परिभाषित किया है –

(1) जॉन जे० हैम्पटन (John J. Hempton) के शब्दों में, “परिचालन उत्तोलन तब विद्यमान होता है जब आगम (Revenue) में परिवर्तन के फलस्वरूप ब्याज एवं कर से पूर्व आय (EBIT) में व्यापक परिवर्तन होता है।”

(2) सोलोमन इजरा (Solomon Izra) के अनुसार, “विक्रय के परिचालन के लाभ में विषम रूप में परिवर्तन की प्रवृत्ति परिचालन उत्तोलन कहलाती है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषणात्मक विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है “परिचालन उत्तोलन की सहायता से किसी निगम या कम्पनी के विक्रय स्तर में परिवर्तन के फलस्वरूप उस निगम या कम्पनी के परिचालन लाभ (OP) या ब्याज एवं कर से पूर्व आय (EBIT) में होने वाले परिवर्तन की माप की जाती है।” किसी निगम या कम्पनी में परिचालन उत्तोलन उस समय उत्पन्न होता है, जबकि उसके विक्रय स्तर में वृद्धि या कमी होने पर उसके परिचालन लाभों में वृद्धि या कमी होती है। इस प्रवृत्ति को ही परिचालन उत्तोलनकहते हैं। परिचालन उत्तोलन की गणना निम्नलिखित सूत्र के द्वारा की जाती है –

Operating Leverage

 

यदि किसी निगम या कम्पनी का उच्च परिचालन उत्तोलन है तो विक्रय स्तर में थोड़े से परिवर्तन का उसके परिचालन लाभ पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ेगा। परिचालन उत्तोलन (OL) और परिचालन उत्तोलन की मात्रा (DOL) दोनों का परिणाम समान आता है। परिचालन उत्तोलन की मात्रा वाले सूत्र का प्रयोग तब करते हैं, जबकि विक्रय में प्रतिशत परिवर्तन या परिचालन लाभ में प्रतिशत परिवर्तन में से कोई एक प्रतिशत और परिचालन उत्तोलन ज्ञात है और दूसरा प्रतिशत परिवर्तन ज्ञात करना है। इसके अतिरिक्त, विक्रय की दो मात्राओं पर परिचालन लाभ (OP or EBIT) में होने वाले परिवर्तनों के सम्बन्ध में परिचालन उत्तोलन क मात्रा ज्ञात करने के लिए भी इस सूत्र का प्रयोग किया जाता है।

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III, मिश्रित उत्तोलन (Combined or Mixed or Composite Leverage)

वित्तीय उत्तोलन एवं परिचालन उत्तोलन को मिश्रित किया जा सकता है। मिश्रित उत्तोलन के प्रयोग से कर एवं ब्याज से पूर्व आय (EBIT) या परिचालन लाभ (OP) तथा विक्रय मात्रा में परिवर्तन का संयुक्त प्रभाव कर योग्य आय (EBT) या करयोग्य लाभ (PBT) पर किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, मिश्रित उत्तोलन की गणना के द्वारा वित्तीय उत्तोलन एवं परिचालन के संयुक्त प्रभाव को स्पष्ट किया जा सकता है। मिश्रित उत्तोलन की गणना निम्नलिखित सूत्र के द्वारा की जाती है –

Combined or Mixed or Composite Leverage

 

मिश्रित उत्तोलन (CL) और मिश्रित उत्तोलन की मात्रा (DCL) दोनों का परिणाम समान आता है। मिश्रित उत्तोलन की मात्रा (DCL) वाले सूत्र का प्रयोग तब करते हैं, जबकि विक्रय में प्रतिशत परिवर्तन के फलस्वरूप कर योग्य आय (EBT) या कर-योग्य लाभ (PBT) में परिवर्तन का प्रतिशत ज्ञात करना हो। इसके अतिरिक्त, यदि विक्रय की दो मात्राओं पर कर-योग्य आय (EBT) या कर योग्य लाभ (PBT) में प्रयोग होने वाले परिवर्तन की मात्रा ज्ञात करनी हो तो भी इस सूत्र का प्रयोग किया जाता है।

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पूँजी संरचना का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Capital Structure)

पूँजी संरचना वित्तीय आयोजन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इसे पूँजी संरचना, पूंजी का स्वरूप अथवा पूँजी कलेवर भी कहा जाता है। पूँजी संरचना के अन्तर्गत पूँजीकरण द्वारा निर्धारित पूँजी की मात्रा में विभिन्न प्रतिभूतियों के पारस्परिक अनुपात को निर्धारित किया जाता है अर्थात् यह पूंजी के दीर्घकालीन स्रोत, उसके स्वरूप एवं सम्मिश्रणों से सम्बन्धित है। पूँजी संरचना के सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) वैसेल के शब्दों में, “पूँजी संरचना शब्द का प्रयोग किसी व्यावसायिक उपक्रम में प्रयुक्त कोषों के दीर्घकालीन स्रोतों से होता है।”

(2) वेस्टन एवं ब्रीघम के शब्दों में, “पूँजी संरचना किसी फर्म का स्थायी वित्त प्रबन्धन होता है जो दीर्घकालीन ऋण, पूर्वाधिकारी अंशों तथा शुद्ध मूल्य से प्रदर्शित होता है।”

(3) आई०एम० पाण्डेय के शब्दों में, “पूँजी संरचना का आशय दीर्घकालीन वित्तीय साधनों, जैसे ऋणपत्रों, दीर्घकालीन ऋण, पूर्वाधिकारी अंश पूँजी, समता अंश पूँजी, आरक्षित अधिशेषों आदि के सम्मिश्रण से है।”

पूँजीकरण एवं पूँजी संरचना में अन्तर ((Distinction between Capitalization and Capital Structure) – पूँजीकरण तथा पूँजी संरचना की आवश्यकता संस्था की स्थापना, विकास, अन्य संस्था के साथ एकीकरण एवं संविलयन तथा पुनः पूँजीकरण या पुनर्गठन के समय अनुभव की जाती है। इस समय वित्तीय प्रबन्धक के सामने दो महत्त्वपूर्ण प्रश्न आते हैं— प्रथम, कितनी मात्रा में प्रतिभूतियों का निर्गमन किया जाए और द्वितीय, किस प्रकार की प्रतिभूतियों का निर्गमन किया जाए। कितनी मात्रा में प्रतिभूतियों का निर्गमन किया जाए का सम्बन्ध पूँजीकरण से है, जबकि किस प्रकार की प्रतिभूतियों का निर्गमन किया जाए- का सम्बन्ध पूँजी संरचना से होता है। पूँजी संरचना की आवश्यकता पूँजीकरण निर्धारण के बाद होती है। अतः पूँजीकरण और पूँजी संरचना में पर्याप्त अन्तर है। पूँजीकरण का आशय व्यवसाय में विनियोजित कुल पूँजी की मात्रा के निर्धारण से है, जबकि पूँजी संरचना का आशय कम्पनी द्वारा निर्गमित विभिन्न प्रतिभूतियों की प्रकृति और उनके पारस्परिक अनुपात के निर्धारण से है। गस्टैनबर्ग के शब्दों में, “पूँजीकरण में एक निगम की स्वामित्व पूँजी तथा दीर्घकालीन ऋणग्रस्तता वाली ऋण पूँजी को सम्मिलित करते हैं जबकि पूँजी संरचना में विभिन्न प्रकार की प्रतिभूतियाँ सम्मिलित की जाती हैं जो पूँजीकरण का निर्माण करती हैं।”

 

पूँजी संरचना एवं वित्तीय संरचना में अन्तर (Distinction between Capital Structure and Financial Structure) – पूँजी संरचना एवं वित्तीय संरचना में भी अन्तर है। वेस्टन एवं बीघम के अनुसार, “पूँजी संरचना फर्म का स्थायी अर्थप्रबन्धन है जिसका प्रतिनिधित्व दीर्घकालीन ऋणों, पूर्वाधिकारी अंशों तथा शुद्ध मूल्य से होता है और वित्तीय संरचना यह व्यक्त करती है कि संस्था ने अपनी सम्पत्तियों की व्यवस्था किस प्रकार से की है। यह आर्थिक चिट्ठा के समस्त दाहिने भाग का योग होता है।” वित्तीय संरचना के अन्तर्गत व्यवसाय के समस्त दीर्घकालीन एवं अल्पकालीन दायित्वों को सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार पूँजी संरचना का आशय दीर्घकालीन वित्त प्रबन्ध से होता है जबकि वित्तीय संरचना व्यवसाय की सम्पत्तियों के वित्त प्रबन्धन के लिए उपलब्ध कुल वित्त को प्रदर्शित करता है। इसे सूत्र रूप में निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –

पूँजी संरचना = साधारण अंश पूँजी + सामान्य कोष + पूर्वाधिकारी अंश पूँजी + दीर्घकालीन

वित्तीय संरचना = (पूँजी संरचना + चालू दायित्व) या कुल सम्पत्तियाँ

 

पूँजी संरचना के सिद्धान्त (Theories of Capital Structure)

पूँजी संरचना, पूँजी की लागत और कम्पनी के मूल्यांकन के बीच सम्बन्ध को नियन्त्रित करने वाले विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। ये सिद्धान्त मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं –

(i) शुद्ध आय विचारधारा (Net Income Approach)

(ii) शुद्ध संचालन आय विचारधारा (Net Operating Income Approach)

(iii) मोदीग्लियानी व मिलर विचारधारा (Modigliani and Miller Approach)

(iv) परम्परागत विचारधारा (Traditional Approach)

 

(i) शुद्ध आय विचारधारा (Net Income Approach)

पूँजी संरचना की इस विचारधारा/सिद्धान्त का प्रतिपादन डूरण्ड द्वारा किया गया था। इस सिद्धान्त के अनुसार पूँजी की लागत और फर्म के मूल्य में सम्बन्ध होता है अर्थात् फर्म का मूल्य फर्म के पूँजी ढाँचा पर आश्रित होता है। इस विचारधारा के अनुसार फर्म पूँजी संरचना में ऋण पूँजी में वृद्धि करके फर्म के मूल्य में वृद्धि कर सकती है। इसके विपरीत ऋण पूँजी में कमी करके फर्म के मूल्य में कमी कर सकती है। इस विचारधारा के अनुसार फर्म की अनुकूलतम पूँजी संरचना (ऋण पूँजी व समता अंश पूँजी) वह होगी जहाँ पर फर्म की पूँजी लागत न्यूनतम हो एवं फर्म का कुल मूल्य अधिकतम हो। यह विचारधारा निम्न मान्यताओं पर आधारित है—

(a) कोई निगम कर नहीं है।

(b) ऋण पूँजी की लागत समता अंश पूँजी की लागत से कम होती है।

(c) पूँजी ढाँचा में ऋण के अनुपात में वृद्धि अंशधारियों की जोखिम धारणा में कोई परिवर्तन नहीं लाता है।

Cost Capital Financing Decisions

(ii) शुद्ध संचालन आय विचारधारा (Net Operating Income Approach)

यह विचारधारा भी डूरण्ड ने ही प्रतिपादित की लेकिन यह शुद्ध आय विचारधारा से पूरी तरह विपरीत है। इस विचारधारा के अनुसार किसी फर्म की पूँजी संरचना में परिवर्तन का फर्म के कुल मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात् फर्म का मूल्य पूँजी संरचना से स्वतन्त्र होता है। फर्म का मूल्य, शुद्ध परिचालन आय को समग्र या भारित औसत पूँजी की लागत के द्वारा पूँजीकरण करके ज्ञात किया जाता है। इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार कोई भी पूँजी संरचना अनुकूलतम नहीं होती है।

यह विचारधारा निम्न मान्यताओं पर आधारित होती है –

(a) कोई निगम कर नहीं है।

(b) ऋण पूँजी की लागत समान रहती है।

(c) पूँजी की कुल लागत, ऋण और समता मिश्रण के प्रत्येक स्तर पर एक समान रहती है।

(d) पूँजी संरचना में ऋण पूँजी के अनुपात में वृद्धि से अंशधारियों की जोखिम धारणा में परिवर्तन होता है।

(e) विनियोक्ता फर्म की कुल आय का पूँजीकरण करके फर्म का मूल्य ज्ञात करता है।

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(iii) मोदीग्लियानी मिलर विचारधारा (Modigliani and Miller Approach)

इस विचारधारा को हम एम०एम० विचारधारा के नाम से भी पुकारते हैं। निगम करों की अनुपस्थिति में ये सिद्धान्त शुद्ध संचालन आय सिद्धान्त के समान हैं। शुद्ध संचालन आय विचारधारा फर्म के मूल्य पर पूँजी संरचना की अप्रासंगिकता के पक्ष में कोई संचालनात्मक औचित्य नहीं प्रस्तुत करता है परन्तु एम०एम० विचारधारा ने अपने तर्क के पीछे व्यवहारात्मक औचित्य प्रस्तुत किया है और अपने तर्क को सही सिद्ध करने के लिए आर्बिट्रेज रीति का प्रयोग किया है। आर्बिट्रेज का अर्थ लाभ कमाने की दृष्टि से समान वस्तु का एक ही समय में दो अलग-अलग बाजारों में खरीदना व बेचना है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि सन्तुलन प्राप्त न हो जाए। एम०एम० विचारधारा निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है—

(a) कोई निगम कर नहीं है।

(b) पूँजी बाजार पूर्ण है।

(c) लाभांश भुगतान अनुपात 100% है।

(d) लेन-देन की कोई लागत नहीं है।

(e) सभी विनियोक्ता फर्म के संचालन लाभ के सम्बन्ध में एक ही समान प्रत्यता रखते है।

(f) सभी फर्म एकरूप जोखिम वर्ग में विभाजित की जा सकती है।

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(iv) परम्परागत विचारधारा (Traditional Approach)

परम्परागत विचारधारा शुद्ध आय और शुद्ध संचालन आप के मध्य की विचारधारा है। यह आंशिक रूप से दोनों विचारधाराओं की विशेषताओं को निम्न प्रकार सम्मिलित करती है–

(a) परम्परागत विचारधारा एवं शुद्ध आय विचारधारा यहाँ तक तो एक समान है कि फर्म की पूँजी संरचना, पूंजी की लागत एवं फर्म के मूल्यांकन को प्रभावित करती है, परन्तु शुद्ध आय विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं करती कि लीवरेज की प्रत्येक मात्रा के साथ फर्म के मूल्य में अनिवार्य रूप से वृद्धि होगी।

(b) यह शुद्ध परिचालन आय विचारधारा की यह बात मानती है कि लीवरेज की एक निश्चित मात्रा के पश्चात् पूँजी की समग्र लागत (Overall Cost of Capital) में वृद्धि के परिणामस्वरूप फर्म के कुल मूल्य में कमी आती है, परन्तु यह NOI विचारधारा से इस अर्थ में भिन्न है कि लीवरेज की सभी मात्राओं के लिए पूँजी की समग्र लागत एक समान नहीं रहेगी। परम्परागत विचारधारा का मुख्य आधार यह है कि कोई फर्म ऋण व समता के न्यायपूर्ण मिश्रण द्वारा अपने कुल मूल्य में वृद्धि कर सकती है एवं पूंजी की कुल लागत को घटा सकती है।

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Cost of Capital and Financing Decisions Numerical Question.

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Cost Capital Financing Decisions

Unit 3 Cost of Capital and Financing Decisions Mcom Notes

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