Unit 5 Dividend Decisions Notes

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लाभांश की परिभाषाएँ (Definitions of Dividend)

विभाजन योग्य लाभ (Divisible Profits) का वह भाग जो कम्पनी के प्रत्येक सदस्य को उसके द्वारा धारित अंशों के अनुपात में प्राप्त होता है, ‘लाभांश’ कहलाता है। विभाजन योग्य लाभ से आशय कम्पनी के उन लाभों से है, जो वैधानिक तौर पर अंशधारियों में लाभांश के रूप में बाँटे जा सकते हैं। इस आशय के लिए शुद्ध लाभ का अभिप्राय उस लाभ से होता है जो कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 123 की व्यवस्थाओं के अनुसार है तथा इसमें से ह्रास घटा दिया गया है। कम्पनी द्वारा लाभांश की घोषणा तब तक नहीं की जा सकती है जब तक कि कम्पनी के पास पर्याप्त लाभ न हो, संचालक मण्डल सिफारिश न करें एवं वार्षिक साधारण सभा में अंशधारियों द्वारा अनुमोदन न हो। लाभांश की विभिन्न परिभाषाएँ इस प्रकार है

एस०एम० शाह के अनुसार, “लाभांश एक व्यावसायिक कम्पनी के लाभ हैं जो उसके सदस्यों में अंशों के अनुपात में बाँटे जाते हैं।”

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, “लाभांश कम्पनी के लाभों का वह भाग है जो अंशधारियों में बाँटने के लिए नियत कर दिया गया है।”

इन्स्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट्स ऑफ इण्डिया के अनुसार, “उपलब्ध लाभों एवं रिजर्व में से अंशधारियों को किया गया वितरण ही लाभांश है।”

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि लाभांश का आशय कम्पनी की अर्जनों के उस भाग से है जो कम्पनी के अंशधारियों में बाँटा जाता है।

लाभांश के प्रकार लाभांश विभिन्न रूप में वितरित किया जा सकता है। साधारणतया यह नकद के रूप में ही वितरित किया जाता है, किन्तु यह बोनस अंशों के रूप में भी वितरित किया जा सकता है। लाभांश नकद या बोनस अंशों के अतिरिक्त अन्य रूपों में वितरित किया जा सकता है। यहाँ लाभांश के प्रमुख रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

नकद लाभांश

लाभांश का यह सबसे प्रचलित एवं लोकप्रिय रूप है। साधारणतया अंशधारी इस रूप में लाभांश लेना सबसे अधिक पसनद करते हैं, क्योंकि लाभांश प्राप्ति का यह एक सुविधाजनक तरीका है। जिन कम्पनियों की तरल स्थिति ठीक होती है वे कम्पनियाँ लाभांश नकद में ही वितरित करना पसन्द करती हैं।

स्कन्ध लाभांश

स्कन्ध लाभांश को ‘बोनस अंशों के रूप में लाभांश के नाम से जाना जाता है तथा ऐसा संचित कोषों या लाभों का पूँजीकरण करके किया जाता है। जिन कम्पनियों की तरल स्थिति ठीक नहीं होती, वे साधारणतया अपने लाभों का पूँजीकरण करके स्कन्ध लाभांश वितरित करती है। इसके अन्तर्गत कम्पनी नकद लाभांश नहीं देती है। ऐसे अंशों को बोनस अंश के नाम से जाना जाता है। ऐसा करने से लाभ का समुचित उपयोग व्यवसाय में ही हो जाता है तथा लाभांश का वितरण भी सम्भव हो जाता है।

बन्ध पत्रों के रूप में लाभांश

कम्पनी नकद लाभांश न देकर बन्ध-पत्रों या ऋण-पत्रों के रूप में भी लाभांश वितरित करती है। बन्ध-पत्र या ऋण-पत्र दीर्घकालीन हो सकते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि कम्पनी लाभांश का वितरण तत्काल न करके भविष्य की किसी तिथि को करना चाहती है। इस प्रकार का लाभांश तभी वितरित किया जाता है जब कम्पनी ब्याज सम्बन्धी बढ़े हुए दायित्वों का सम्पूर्ण भार उठाने में अपने आपको असमर्थ पाए। कभी-कभी लाभांश के लिए प्रतिज्ञा पत्र भी दिए जाते हैं जिन पर ब्याज भी दिया जा सकता है। इसे स्क्रिप लाभांश (Scrip Dividend) कहा जाता है। स्क्रिप्ट लाभांश की अवधि अल्पकालीन होती है।

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भुगतान के अनुसार लाभांश के प्रकार

भुगतान के अनुसार लाभांश को तीन वर्गों में बाँटा जाता है –

1, अन्तरिम लाभांश ( Interim Dividend)- साधारणतया लाभांश की घोषणा कम्पनी के वित्तीय वर्ष के अन्त में की जाती है। ऐसी स्थिति में इसे ‘नियमित लाभांश’ (Regular Dividend) कहा जाता है, किन्तु कभी जब कम्पनी यह महसूस करे कि व्यवसाय में लाभ पर्याप्त मात्रा में अर्जित कर लिए गए हैं, तो ऐसी स्थिति में वर्ष की समाप्ति के पूर्व ही वह कुछ लाभांश घोषित कर देती है तब इसे अन्तरिम लाभांश के नाम से जाना जाता है। कम्पनी इस अन्तरिम लाभांश बाद अन्तिम लाभांश (Final dividend) भी घोषित करती है।

2, अतिरिक्त अथवा विशिष्ट लाभांश (Extra or Special Dividend) – एक सुदृढ़ लाभांश नीति के लिए यह आवश्यक है कि लाभांश की दर में अत्यधिक परिवर्तन न किया जाए। नियमित लाभांश दर वह दर होती है जिसके अनुसार पिछले कई वर्षों से लाभांश का भुगतान किया जा रहा है। यह कोई निश्चित या स्थायी दर नहीं होती है तथा इसमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन लाभों की मात्रानुसार किया जा सकता है। अतिरिक्त लाभांश का प्रश्न तभी उठता है जब संस्था किसी वर्ष अप्रत्याशित या अत्यधिक मात्रा में लाभांश अर्जित करती है। ऐसी स्थिति में कम्पनी नियमित लाभांश के अलावा कुछ अतिरिक्त या विशिष्ट लाभ भी दे देती है। अतिरिक्त लाभांश देने का उद्देश्य अंशधारियों को यह जानकारी देना होता है कि अतिरिक्त लाभांश की राशि अस्थायी है।

3, नियमित लाभांश (Regular Dividend) – एक कम्पनी द्वारा वित्त वर्ष की समाप्ति के बाद संचालक मण्डल द्वारा प्रस्तावित तथा साधारण वार्षिक सभा द्वारा पारित लाभांश भुगतान को नियमित लाभांश के नाम से पुकारा जाता है। भारतीय कम्पनी अधिनियम 2013 के अनुसार नकद के अतिरिक्त किसी प्रकार से लाभांश का भुगतान नहीं किया जा सकता है, लेकिन लाभों का पूँजीकरण करके बोनस अंशों के रूप में लाभांश का वितरण इसका अपवाद है। इसी प्रकार अंशधारियों द्वारा लिए गए अंशों पर अदत्त राशि को चुकता करके भी लाभांश का भुगतान किया जा सकता है।

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लाभांश भुगतान के वैधानिक प्रावधान (Statutory Provision for Payment of Dividend)

कम्पनी अधिनियम 2013 और कम्पनी (लाभांश की घोषणा) नियम 2014 के प्रावधानों के अनुसार ही लाभांश की घोषणा व भुगतान किया जा सकता है। कम्पनी अधिनियम की धारा 123 में लाभांश की घोषणा व भुगतान से सम्बन्धित निम्नलिखित प्रावधान दिए गए हैं—

  1. लाभांश की घोषणा (Declaration of Dividend) – धारा 123 (1) के अनुसार लाभांश की घोषणा कम्पनी के उन लाभों में से की जा सकती है जो लाभ उस वर्ष की अनुसूची II के अनुसार ह्रास घटने के बाद आते हैं अथवा पिछले वित्तीय वर्षों के लाभ में से ह्रास घटाने के बाद जो लाभ बचते हैं उनमें से की जा सकती है।
  2. संचयों में हस्तान्तरण (Transfer to Reserves) -कम्पनी अधिनियम की धारा 123(1)(b) के अनुसार एक कम्पनी किसी वित्तीय वर्ष में लाभांश की घोषणा करने से पूर्व, एक ऐसे अनुपात में जो संचयों में हस्तान्तरित करना उचित हो, संचयों में हस्तान्तरित करेगी।
  3. संचित लाभ में से लाभांश (Dividend out of Accumulated Profit) – धारा 123(1)(b) के प्रावधान (ii) के अनुसार, किसी वित्तीय वर्ष में लाभ न होने या अपर्याप्त लाभ होने की स्थिति में कम्पनी अपने पूर्व वित्तीय वर्षों के मुक्त संचित लाभों में से लाभांश की घोषणा कर सकती है। मुक्त संचित लाभों के अतिरिक्त किसी संचय में से लाभांश की घोषणा नहीं की जा सकती है।
  4. लाभांश का भुगतान (Payment of Dividend) – धारा 123(5) के अनुसार लाभांश का भुगतान केवल पंजीकृत अंशधारी या उसके आदेश पर उसके बैंक को केवल नकद किया जा सकता है।
  5. अदत्त लाभांश खाता (Unpaid Dividend Account) – धारा 124 (1) के अनुसार लाभांश का भुगतान घोषणा होने के 30 दिन के अन्दर हो जाना चाहिए। यदि कोई लाभांश अदत्त शेष बचता है तो 30 दिन समाप्ति के सात दिन के अन्दर एक विशेष खाते “Unpaid Dividend of Company Ltd.” में जमा करना आवश्यक है। ये खाता किसी अनुसूचित बैंक में खोला जाएगा।
  6. निवेशक शिक्षा और संरक्षण कोष में हस्तान्तरण (Transfer to Investor Education and Protection Fund) – धारा 124 (5) के अनुसार अदत्त लाभांश खाते में डाली गई अदत्त लाभांश की राशि यदि हस्तान्तरण की तिथि से 7 वर्ष तक अदत्त रहती है, तो ऐसी धनराशि ब्याज सहित निवेशक शिक्षा और संरक्षण कोष में हस्तान्तरित कर दी जाएगी। धारा 124 (7) के अनुसार यदि कम्पनी उपर्युक्त नियम का पालन करने में असफल रहती है तो कम्पनी पर कम-से-कम पाँच लाख से पच्चीस लाख और कम्पनी के जो अधिकारी उत्तरदायी हैं उन पर कम-से-कम एक लाख से पाँच लाख तक का अर्थदण्ड लगाया जा सकता है।

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लाभांश का वाल्टर सूत्र या प्रतिमेय (Walter Formula or Model of Dividend)

लाभांश नीति के निर्धारण के लिए प्रोफेसर जेम्स ई० वाल्टर ने एक बीजगणितीय सूत्रः का प्रतिपादन किया, जिसे वाल्टर सूत्र के नाम से जाना जाता है। इस सूत्र की सहायता से कम्पनी के प्रबन्धक लाभांश नीति का निर्धारण इस प्रकार कर सकते हैं, जिससे कि कम्पनी के अंशधारियों द्वारा किए गए पूँजी विनियोग के मूल्य में पर्याप्त मात्रा में अभिवृद्धि हो सके।

वाल्टर (Walter) के अनुसार, “लाभांश नीति का चयन उद्यम के मूल्य प्रभावित करता है।”

इस प्रकार लाभांश नीति सदैव अंशों के बाजार मूल्य अर्थात् अंशधारकों द्वारा किए गए पूँजी विनियोग के मूल्य को प्रभावित करती हैं। लाभांश नीति और उद्यम का मूल्य एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। लाभांश नीति के निर्धारण को संस्था की आन्तरिक प्रत्याय दर (Internal Rate of Return) तथा पूँजी की लागत (Cost of Capital) का सम्बन्ध प्रभावित करता है। प्रो० वाल्टर ने कम्पनियों को तीन वर्गों में विभाजित किया है, जिनकी लाभांश नीति के सम्बन्ध में उन्होंने अग्रलिखित दिशा-निर्देश दिए हैं-

  1. विकासशील कम्पनियाँ (Growth Companies) – ऐसी कम्पनियाँ जिनकी आन्तरिक प्रत्याय दर पूँजी की लागत से अधिक हो, विकासशील कम्पनियाँ कहलाती है। इनके पास लाभार्जन के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होते हैं। अतः इन्हें अपनी सम्पूर्ण आय को पुनर्विनियोजित करना चाहिए। इसका कारण प्रतिधारित आय पर प्रत्याय दर का अंशधारियों द्वारा प्रत्याशित दर से अधिक होना है। विकासशील संस्थाओं का लाभांश भुगतान अनुपात शुन्य होगा। इस प्रकार अंशों का मूल्य अधिकतम होगा तथा प्रतिधारित आय में कमी करने पर अंशों के मूल्य में गिरावट आएगी।
  2. सामान्य कम्पनियाँ (Normal Companies) – ऐसी कम्पनियाँ जिनकी आन्तरिक प्रत्याय दर पूँजी की लागत के ठीक बराबर हो, सामान्य कम्पनियाँ कहलाती हैं। यह एक काल्पनिक अवस्था है क्योंकि बाजार में आन्तरिक प्रत्याय की दर और पूँजी की लागत अलग-अलग होती हैं। ऐसी कम्पनियों की लाभांश नीति अंशों के बाजार मूल्य को प्रभावित करती है। कम्पनी चाहे आय को प्रतिधारित करे अथवा लाभांश का वितरण करे, इसका कोई भी प्रभाव अंशों के मूल्य पर नहीं पड़ेगा।
  3. अविकसित कम्पनियाँ (Declining Companies) – अविकसित कम्पनी से आशय उन कम्पनियों से हैं जिनकी आन्तरिक प्रत्याय दर पूँजी की लागत से कम होती हैं। अविकसित कम्पनियों के लिए अपनी आय का समस्त भाग अंशधारियों को लाभांश के रूप में ही वितरित करना उत्तम होगा। क्योंकि इस प्रकार लाभांश भुगतान अनुपात शत-प्रतिशत ठीक रहता है, तभी अंशधारियों के द्वारा प्राप्त लाभांश कहीं और विनियोजित करने से बेहतर प्रतिफल की प्राप्ति होगी। ऐसी कम्पनियों को आय को प्रतिधारित नहीं करना चाहिए क्योंकि वे अपनी पूँजी लागत के बराबर भी आय अर्जित नहीं कर पाती हैं।

वाल्टर के सूत्र के आधार पर लाभांश और अंश के मूल्य के बीच सम्बन्ध निम्न प्रकार है –

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Here, Ve = Theoretical market price of the company’s equity shares.

Ra = Return on internal retention, i.e. the rate of company earns on retained profits.

Rc = Market capitalization rate, i.e. the rate expected by the investors by way of return from the particular category of shares.

E = Earning per share.

D = Dividend per share.

प्रो० वाल्टर के अनुसार, यदि R, 1 से अधिक है तो निम्न लाभांश प्रति अंश मूल्य में वृद्धि लाएगा और यदि Rp, 1 से कम है तो ऊँचा लाभांश प्रति अंश मूल्य में वृद्धि लाएगा।

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(i) गॉर्डन मॉडल (Gordon’s Model)

गॉर्डन मॉडल काफी हद तक वाल्टर मॉडल जैसा ही है क्योंकि यह मॉडल भी इस मान्यता पर आधारित है कि किसी कम्पनी के लाभांश तथा प्रतिधारित आय एवं कम्पनी के अशो में गहरा सम्बन्ध होता है तथा दोनों एक-दूसरे को प्रभावशाली ढंग से प्रभावित करते हैं। उनकी मान्यता है कि भविष्य में मिलने वाले सम्भावित लाभांश (Expected Dividend) भी कम्पनी के अंशों के बाजार मूल्य के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। गॉर्डन के इस लाभांश पूँजीकरण के मॉडल में यह मान लिया गया है कि अंशों का बाजार मूल्य उन अंशों पर भविष्य में प्राप्त होने वाले लाभांशों के वर्तमान मूल्य के बराबर होता है।

गॉर्डन का सूत्र (Gordon’s Formula) गॉर्डन का सूत्र निम्नलिखित है –

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Here, Ve= अंशों का मूल्य (Value of equity shares)

E= प्रति अंश आय (Earning per share)

b= प्रतिधारित आय से आन्तरिक प्रत्याय दर (Internal rate of return from retained earnings)

br= विनियोग दर पर प्रत्याय में वृद्धि दर (Growth rate in internal profitability)

CR= पूँजी की लागत (Cost of capital)

गॉर्डन मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है—

(1) फर्म में केवल समता अंश ही हैं।

(ii) बाह्य वित्तीयन उपलब्ध नहीं है। केवल प्रतिधारित अर्जनों में से ही विस्तार योजनाओं का वित्तीयन किया जाएगा।

(iii) फर्म की आन्तरिक प्रत्याय दर (r) स्थिर है।

(iv) फर्म के लिए पूँजी की लागत स्थिर रहती है और यह विकास दर से अधिक होती है अर्थात् CR> br or g.

(v) एक बार निश्चित कर लिया गया प्रतिधारण अनुपात (retention ratio), भविष्य में वही रहेगा

(vi) फर्म और इसका अर्जन-प्रवाह शाश्वत है। अतः विकास दर, g=br सदा-सदा के लिए स्थिर है।

(vii) किसी निगम कर का अस्तित्व नहीं है।

गॉर्डन के मॉडल के अन्तर्गत एक कम्पनी की लाभांश नीति लाभदायक विनियोग अवसरों की उपलब्धि पर तथा पूंजी की लागत एवं आन्तरिक प्रत्याय दर के सम्बन्धों पर निर्भर करती है। इसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है –

  1. विकासशील फर्मों की दशा में जहाँ r > CR, जैसे-जैसे लाभांश भुगतान अनुपात में कमी आती है, वैसे-वैसे प्रति अंश बाजार मूल्य बढ़ता जाता है। ऐसी फर्मों की अपनी आयों का अधिकतम भाग फर्म में ही रोक लेना चाहिए।
  2. विकास अवमुखी फर्मों की दशा में जहाँ r < CR, लाभांश भुगतान अनुपात के बढ़ने पर प्रति अंश बाजार मूल्य बढ़ता है। अतः ऐसी फर्मों के अंशधारी तब लाभान्वित होते है जब फर्म अपनी आय का वितरण करती है। ऐसी फर्मों के लिए अनुकूलतम लाभांश भुगतान अनुपात 100% होगा।
  3. सम-फर्मों की दशा में, जहाँ r = CR, लाभांश नीति का अंश के बाजार मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है इसलिए ऐसी फर्मों के लिए कोई अनुकूलतम भुगतान-अनुपात नहीं होता है।

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(ii) मोदीग्लियानी एवं मिलर का लाभांश का असम्बद्धता सिद्धान्त (Modigliani-Miller Irrelevance Theory of Dividend)

मोदीग्लियानी तथा मिलर के लाभांश वितरण के सिद्धान्त की मान्यता है कि एक कम्पनी की लाभांश नीति अप्रासंगिक है और यह अंशधारियों के धन को (विनियोग मूल्य को) प्रभावित नहीं करती है। उदाहरणार्थ – यदि कम्पनी ने लाभांश की घोषित दर नीची रखी हैं तो इससे प्रतिधारित अर्जने तथा कम्पनी का शुद्ध मूल्य (Net worth) बढ़ जाएगा और यदि कम्पनी ऊँची लाभांश दर घोषित करेगी तो कम्पनी की प्रतिधारित अर्जने तथा शुद्ध मूल्य घट जाएगा। उनके अनुसार कम्पनी का मूल्य लाभांश नीति से अप्रभावित रहता है, अतः अंशधारियों की सम्पदा के लिए लाभांश अप्रासंगिक होते हैं।

मोदींग्लियानी तथा मिलर का तर्क निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

(1) कम्पनी के सम्बन्ध में सूचनाएँ सभी को निःशुल्क उपलब्ध होती हैं।

(2) कम्पनी की विनियोग नीति, कम्पनी की लाभांश नीति से स्वतन्त्र होती है।

(3) कम्पनी के लिए कोई चल लागत (Floating Cost) उत्पन्न नहीं होती है।

(4) संगठन के पास एक स्थायी विनियोग नीति है।

(5) व्यक्तिगत तथा निगम कर अनुपस्थित होते हैं।

(6) प्रतिभूतियाँ असीमित रूप से विभाजनीय हैं।

(7) व्यक्तिगत तथा निगम कर अनुपस्थित होते हैं।

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सिद्धान्त की व्याख्या (Explanation of the Theory) – मोदीग्लियानी एवं मिलर का विश्वास था कि लाभांश देने वाली फर्म बाहरी क्षेत्र से ही वित्त प्राप्त करेगी। जब लाभांश का भुगतान किया जाता है तो अंशों का अन्तिम मूल्य (Terminal Value) गिरता है जबकि अंशधारियों के कुल धन में कोई परिवर्तन नहीं होता है क्योंकि लाभांश और अंशों का अन्तिम मूल्य पुनः अंशधारियों के कुल धन के बराबर हो जाता है। किसी अवधि के प्रारम्भ में अंशों के बाजार मूल्य को अन्त में भुगतान किए गए लाभांश का वर्तमान मूल्य तथा अंशों के अन्तिम बाजार मूल्य के योग के समान परिभाषित किया जा सकता है। मोदीग्लियानी एवं मिलर स्वीकार करते है कि यदि कोष अंशों के अलावा ऋणों से भी प्राप्त किया जाए तो भी लाभांश की असम्बद्धता प्रभावित नहीं होती।

इनके अनुसार अनिश्चितता की दशा में भी लाभांश नीति महत्त्वहीन है, परन्तु यह निष्कर्ष इनके मनमाने तर्क पर आधारित है। दो समान व्यावसायिक जोखिम, समान भावी आय की सम्भावनाएँ तथा समान विनियोग नीति वाली फर्मों का बाजार मूल्य भी अवश्य समान होगा यदि बाजार में प्रत्येक विनियोक्ता विवेकपूर्ण व्यवहार करता है। ऐसी स्थिति में वर्तमान और भावी लाभांश नीति में अन्तर दो फर्मों के बजार मूल्य को प्रभावित नहीं कर सकता क्योंकि भावी लाभांश का वर्तमान मूल्य और अन्तिम मूल्य समान है।

अंशों के मूल्यांकन के M.M. मॉडल को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –

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P1 = P (1+ CR) – Di

Where Po = Market price at the beginning or at the 0 period.

P1 = Market price at the end of period 1.

CR = Capitalization rate of the firm.

D1 = Dividend per share at the end of period 1.

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(ii) पूँजी परिसम्पत्ति मूल्य मॉडल (Capital Assets Pricing Model)

वित्त में, पूँजीगत परिसम्पत्ति कीमत निर्धारण मॉडल (Capital asset pricing model सी०ए०पी०एम०) का उपयोग किसी पूँजीगत परिसम्पत्ति के लिए सैद्धान्तिक रूप से उपयुक्त वांछित प्रतिलाभ दर ज्ञात करने के लिए किया जाता है, जब इस परिसम्पत्ति को एक पहले से ही सुविशाखीकृत संविभाग (अच्छी तरह से डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो) में जोड़ा जाना हो तथा जबकि उस परिसम्पत्ति का अशाखनीय जोखिम (non-diversifiable risk) ज्ञात हो इस मॉडल में परिसम्पत्ति के अशाखनीय जोखिम व्यवस्थात्मक जोखिम या बाजार जोखिम) जिसे वित्त क्षेत्र में प्रायः ‘बीटा’ (β) के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, को गणना में लिया जाता है तथा बाजार के प्रत्याशित प्रतिलाभ व सैद्धान्तिक जोखिम मुक्त परिसम्पत्ति के प्रत्याशित प्रतिलाभ व सैद्धान्तिक जोखिममुक्त परिसम्पत्ति के प्रत्याशित प्रतिलाभ को भी।

सी०ए०पी०एम० का सुझाव है कि किसी निवेशक की शेयर पूँजी की लागत का निर्धारण ‘बीटा’ (β) से होता है। इस मॉडल का विस्तृत रूप द्वि-बीटा मॉडल है, जो कि ऊर्ध्वगामी बीटा को अधिगामी बीटा से भिन्न करता है। सी०ए०पी०एम० की अवधारणा, हैरी मार्कोविट्ज द्वारा विशाखीकरण/विविधीकरण तथा आधुनिक संविभाग थ्योरी पर पहले किए गए कार्य का विस्तार करते • जैक ट्रेयनॉर (1961 1962), विलियम शार्पे (1964) जॉन लिन्टनर (1965) और जॉन मोसिन (1966) द्वारा स्वतन्त्र रूप से प्रस्तुत की गई। 1990 में शार्पे, मार्कोविट्ज व मर्टन मिलर को संयुक्त रूप से वित्तीय अर्थशास्त्र में योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिशर ब्लैक (1972) ने सी०ए०पी०एम० का एक और संस्करण, ब्लैक सी०ए०पी०एम० या शून्य बीटा सी०ए०पी०एम०, विकसित किया जिसमें जोखिम मुक्त परिसम्पत्ति की मान्यता को खारिज किया गया था। Empirical Testing में यह संस्करण अधिक दृढ़ था तथा सी०ए०पी०एम० की वैश्विक स्वीकृति में इसका प्रभावी योगदान रहा।

मूल्य निर्धारण व पोर्टफोलियो चयन के कई आधुनिक तरीकों (जैसे अन्तरपणन कीमत सिद्धान्त व भर्टन पोर्टफोलियो समस्या, क्रमश:) के आगमन तथा अन्तरपणन आनुभविक खामियों के बावजूद अपनी साधारणता व विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में उपयोगिता के कारण सी०ए०पी०एम० अभी भी अधिक प्रचलित है।

सी०ए०पी०एम० किसी अकेली परिसम्पत्ति अथवा परिसम्पत्तियों के समूह (पोर्टफोलियो) की कीमत निर्धारण करने के लिए एक मॉडल है। अकेली प्रतिभूति के लिए, हम प्रतिभूति बाजार रेखा (Security Market Line, SML) तथा प्रत्याशित प्रतिलाभ व सिस्टेमैटिक जोखिम के साथ उसके सम्बन्ध (बीटा) का प्रयोग यह जानने के लिए करते हैं कि बाजार के द्वारा किसी एक प्रतिभूति की कीमत उसकी जोखिम श्रेणी की तुलना में कितनी निर्धारित होगी। प्रतिभूति बाजार रेखा से किसी एक सम्पत्ति की पूरे बाजार की तुलना में प्रतिफल जोखिम अनुपात की गणना भी की जा सकती है। अतः जैसे-जैसे किसी सम्पत्ति का प्रत्याशित प्रतिलाभ उसके बीटा कोएफिसिएन्ट द्वारा घटता चला जाएगा, इस अकेली सम्पत्ति का प्रतिफल जोखिम अनुपात, सम्पूर्ण बाजार के प्रतिफल जोखिम अनुपात, सम्पूर्ण बाजार के प्रतिफल जोखिम अनुपात के बराबर होता चला जाएगा। इस प्रकार –

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बाजार का प्रतिफल जोखिम अनुपात ही प्रभावी तौर पर बाजार जोखिम अधिमूल्य/ प्रीमियम है और उपर्युक्त समीकरण का पुनः नियोजन करने पर तथा E (R ) का मान निकालने पर, हमें पूँजीगत परिसम्पत्ति कीमत निर्धारण मॉडल (सी०ए०पी०एम०) प्राप्त हो जाता है।

E (Ri) = Rf + β [E (Rm) – Rf]

जहाँ,

  • E (R) है— पूँजी परिसम्पत्ति पर प्रत्याशित प्रतिफल
  • Rf है – जोखिम मुक्त ब्याज दर (जैसे कि सरकारी प्रतिभूतियों पर मिलने वाला ब्याज)
  • βi (बीटा) है – ‘परिसम्पत्ति के प्रत्याशित अतिरिक्त प्रतिफल’ की ‘बाजार के प्रत्याशित अतिरिक्त प्रतिफल’ के प्रति संवेदनशीलता,

या

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  • E (Rm) है – बाजार का प्रत्याशित प्रतिफल ।
  • E (Rm) Rf है– बाजार अधिमूल्य तथा जोखिम मुक्त प्रतिफल दर का अन्तर) प्रीमियम ( बाजार की प्रत्याशित प्रतिफल दर तथा जोखिम मुक्त प्रतिफल दर का अन्तर)|

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Capital Budgeting Decisions Numerical Question.

Note:- Click here to View.

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