Unit 2 Capital Budgeting Decisions Mcom Notes

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Unit 2 Capital Budgeting Decisions Mcom Notes

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method; capital rationing and risk analysis in capital budgeting. Capital Budgeting Decisions Notes

 

पूँजी बजटन का अर्थ (Meaning of Capital Budgeting)

पूँजी बजटन प्रबन्धकीय निर्णयन की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व जटिल समस्या है। इसका सम्बन्ध एक क्रमबद्ध विनियोग कार्यक्रम बनाने व लागू करने से होता है। पूँजीगत बजटन में ऐसे व्ययों का नियोजन शामिल है जिनका प्रतिफल संस्था को एक से अधिक वर्षों तक प्राप्त होता है। ऐसे व्यय जिनका लाभ अनेक वर्षों तक प्राप्त होता है, उन्हें पूँजीगत व्यय कहा जाता है। पूँजीगत बजटन के अन्तर्गत प्रस्तावित पूँजी व्ययों व उनके अर्थ-प्रबन्धन पर विचार किया जाता है और उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम लाभप्रद प्रयोग देने वाली परियोजना का चुनाव किया जाता है। सरल शब्दों में, पूँजी बजटन का अभिप्राय उपलब्ध वित्तीय साधनों के सन्दर्भ में सम्भावित विनियोग प्रस्तावों में से फर्म के लिए सर्वाधिक लाभप्रद विनियोग प्रस्ताव का चयन करना है। पूँजीगत बजटन की विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई मुख्य परिभाषाएँ इस प्रकार हैं

चाल्र्ल्स टी० हार्नग्रेन के अनुसार, “पूँजी बजटिंग प्रस्तावित पूँजीगत व्ययों को बनाने व उनके अर्थ प्रबन्धन करने का एक दीर्घकालीन नियोजन है।” आर०एम० लिन्च के अनुसार, “फर्म की दीर्घकालीन लाभदायकता (विनियोग पर प्रत्याय) को अधिकतम बनाने के उद्देश्य के लिए उपलब्ध पूँजी के विकास का नियोजन पूँजी बजटिंग में निहित है।”

केलर तथा फरेरा के अनुसार, “पूँजी व्यय बजट किसी बजट अवधि में स्थायी सम्पत्तियों के प्रयोग एवं व्ययों के लिए बनायी गयी योजनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।” निष्कर्ष के रूप में, यह कह सकते हैं पूँजीगत बजटन दीर्घकालीन पूँजो विनियोग का नियोजन हैं, इसलिए इसे दीर्घकालीन विनियोग निर्णयन भी कहते हैं। पूँजीगत बजटन द्वारा प्रस्तावित पूंजीगत व्ययों एवं उनके अर्थ प्रबन्धन पर विचार करके उपलब्ध प्रस्तावों में से सर्वोत्तम लाभप्रद विनियोग का चयन तथा उसे क्रियान्वित करने की रूपरेखा तैयार की जाती है।

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पूँजीगत बजटन के उद्देश्य (Objectives of Capital Budgeting)

पूँजीगत बजटन के प्रमुख उद्देश्य निम्न प्रकार हैं –

1, प्रस्तावित पूँजीगत व्ययों का मूल्यांकन (Evaluation of Proposed Capital Expenditure) – पूँजीगत बजटन के द्वारा प्रस्तावित विभिन्न पूँजीगत व्ययों का मूल्यांकन किया जा सकता है और यह निर्णय लिया जा सकता है कि व्यय लाभप्रद रहेगा या नहीं।

2, प्राथमिकताओं का निर्धारण (Determination of Priorities) – प्राथमिकता स्थापित करने से अभिप्राय विभिन्न परियोजनाओं को उनकी लाभप्रदता के क्रम में विन्यासित (arrange) करने से है। पूँजीगत बजटन के द्वारा विभिन्न पूँजी परियोजनाओं का तुलनात्मक मूल्यांकन करके उनके बीच प्राथमिकताओं का निर्धारण किया जा सकता है जिससे सर्वाधिक लाभप्रद योजना के चयन में सुविधा हो जाती है।

3, पूँजीगत व्ययों में समन्वय (Coordinating Capital Expenditure) – पूँजीगत बजटन का एक उद्देश्य विभिन्न पूँजी व्ययों में समन्वय स्थापित करना भी है। इसकी सहायता से विभिन्न विभागों द्वारा किए जाने वाले पूँजी व्ययों में समन्वय एवं सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है।

4, पूँजीगत व्ययों पर नियन्त्रण (Control over Capital Expenditures) – अन्य व्यावसायिक बजटों की भाँति पूँजीगत बजटन का भी एक प्रमुख उद्देश्य संस्था के विभिन्न विभागों द्वारा किए जाने वाले पूँजीगत व्ययों को नियन्त्रित करना है। पूँजीगत बजटन के द्वारा वास्तविक व्ययों की पूर्व निर्धारित व्ययों से तुलना करके इन पर प्रभावकारी नियन्त्रण स्थापित किया जा सकता है।

5, पूँजीगत व्ययों के लिए वित्त की व्यवस्था (Arrangement of Finance for Capital Expenditure) – पूँजीगत बजटन के द्वारा विभिन्न सम्पत्तियों पर भविष्य में किए जाने वाले व्ययों की पूर्व जानकारी मिल जाती है जिससे संस्था के प्रबन्धक उचित समय पर वांछित राशि के लिए उचित व्यवस्था कर लेते हैं।

6, पूर्व में लिए गए निर्णयों का विश्लेषण (Analysis of Past Decisions) – पूँजी बजटन से पूर्व में किए गए निर्णयों का विश्लेषण किया जा सकता है तथा यह जाना जा सकता है कि वे निर्णय किस सीमा तक सही थे।

7, स्थायी सम्पत्तियों का मूल्यांकन (Evaluation of Pixed Assets) – पूंजी बजटन के द्वारा बजटन अवधि के अन्त में बनाए जाने वाले चिट्ठे के लिए स्थायी सम्पत्तियों के मूल्यांकन समंक उपलब्ध हो जाते हैं जिससे प्रक्षेपित चिट्ठा (Projected Balance Sheet) आसानी से बनाया जा सकता है।

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पूँजी खर्च निर्णयन को प्रभावित करने वाले कारक (The Factors affecting Capital Expenditure Decisions)

पूँजी खर्च निर्णयन के अन्तर्गत पूँजीगत व्ययों में विनियोग सम्बन्धी निर्णय को लिया जाता है। व्यवसाय की आवश्यकता व आकार के अनुसार नई मशीनों, तकनीकों के चयन सम्बन्धी निर्णयन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक इस प्रकार हैं –

1, कुल रोकड़ विनियोजित पूँजी व्यय (Total Cash Invested Capital Expenditure) – कुल रोकड़ विनियोजित पूँजी व्यय से आशय किसी भी परियोजना में लगने वाली कुल विनियोजन राशि से है जो मुद्रा में निर्धारित की जाती है। यह कुल रोकड़ बहिवाह (total cash outflows) के बराबर होती है। यदि किसी पूँजी खर्च निर्णय के अन्तर्गत कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है तो वह भी विनियोजित पूँजी में ही सम्मिलित हो जाती हैं। यदि पुरानी सम्पत्ति को विक्रय करके नई सम्पत्ति को क्रय किया जाता है तो पुरानी सम्पत्ति से प्राप्त विक्रय राशि को नई विनियोग राशि में से घटाकर शुद्ध विनियोग राशि ज्ञात की जाती है।

2, शुद्ध रोकड़ अन्तर्वाह (Net Cash Inflow) – शुद्ध रोकड़ अन्तर्वाह (Net cash inflow) से आशय परिचालन लाभों में से ऋण पूँजी पर ब्याज व करों की राशि को घटाने तथा ह्रास की राशि को जोड़ने से प्राप्त धनराशि से है। शुद्ध रोकड़ अन्तर्वाहों की राशि की गणना इस प्रकार होती है—

Calculation of Net Cash-in-Flow

Particulars
Sales …………
Less: Operation Expenses including depreciations …………
Earnings before Interest and Tax (EBIT) …………
Less: Interest on Loans/Distributions …………
Earnings before Tax (EBT) …………
Less: Income Tax @,,,,,,,,,, …………
Earnings after Tax (EAT) …………
Add: Depreciations …………
Net CSH-IN-Flow …………

 

3, परियोजना का जीवन (Project life) – प्रत्येक सम्पत्ति अथवा परियोजना का एक जीवनकाल होता है जिस पर उस परियोजना की आय निर्भर करती है। सम्पत्ति का जीवन उसकी प्रकृति, उसके प्रयोग, रखरखाव, तकनीकी परिवर्तन, ग्राहकों की पसंद आदि पर निर्भर करता है। परियोजना का जीवनकाल भी विनियोग करने का महत्वपूर्ण कारक होता है।

4, उपलब्ध संसाधन (Available Resources) – किसी भी पूँजी खर्च निर्णयन में व्यावसायिक संस्था के पास उपलब्ध वित्तीय स्रोतों अथवा साधनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भी ऐसी परियोजना का चयन नहीं करना चाहिए जिसके लिए व्यावसायिक संस्था पर कोष उपलब्ध नहीं हो अथवा प्रत्याय दर उधार ब्याज दर से कम हो ।

5, वांछित प्रत्याय दर (Desirable Rate of Return) – कोई भी व्यावसायिक संस्था पूँजी विनियोग दर, ऋणी पूँजी प्रत्याय दर से अधिक प्रत्याय दर प्राप्त होती है वही परियोजना स्वीकार की जाती है। यदि वास्तविक प्रत्याय दर कम होती है तो परियोजना को अस्वीकृत कर दिया जाता है।

6, गैर आर्थिक कारक (Non Economic Factors) – पूंजी खर्च निर्णय करते समय गैर आर्थिक कारकों पर भी ध्यान देना बहुत आवश्यक होता है, जैसे- चयनित परियोजनाओं पर कर्मचारियों के स्वस्थ मनोबल पर कोई प्रतिकूल असर तो नहीं पड़ेगा। सरकारी नीति इसके प्रतिकूल तो नहीं है। समाज में इस परियोजना से हानि का भय तो नहीं है। श्रम संघों द्वारा कोई विरोध तो नहीं होगा आदि।

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पूँजीगत बजटन की विभिन्न विधियाँ (Different Methods of Capital Budgeting)

पुनर्भुगतान अवधि विधि (Pay-back Period Method)

पूँजी व्यय का मूल्यांकन करने के लिए प्रयुक्त की जाने वाली विधियों में यह सबसे सरल तथा सबसे अधिक प्रचलित विधि है। इस विधि को Pay-out अथवा Pay-off विधि भी कहते हैं। किसी परियोजना में विनियोजित राशि जितनी अवधि में वापस प्राप्त हो जाती है उस अवधि को पुनर्भुगतान अवधि (Pay-back Period) कहते हैं। विनियोजित पूँजी से प्रतिवर्ष जो आय अर्जित की जाती है अथवा जो बचत प्राप्त की जाती है उसे ‘रोकड़ अर्जन’, ‘रोकड़ बचत’ अथवा ‘शुद्ध रोकड़ अन्तर्वाह’ कहा जाता है।

शुद्ध रोकड़ अन्तर्वाह के आधार पर पूँजी सम्पत्ति में किए गए विनियोग के पुनर्भुगतान की अवधि ज्ञात की जाती है। यदि सभी वर्षों में शुद्ध रोकड़ अन्तर्वाह की राशि समान रहती है तो विनियोजित राशि में इस रोकड़ अन्तर्वाह की वार्षिक का भाग देकर परियोजना के पुनर्भुगतान की अवधि ज्ञात कर ली जाती है। एक ही परियोजना की स्थिति में यदि यह अवधि प्रबन्ध की स्वीकार्य अवधि के बराबर अथवा उससे कम होती है तो उस परियोजना को स्वीकार कर लिया जाता है अन्यथा अस्वीकार कर दिया जाता है। एक से अधिक वैकल्पिक परियोजनाओं में से किसी एक ही परियोजना को इस विधि के अनुसार चुनना हो तो उस परियोजना को चुना जाता है जिसकी पुनर्भुगतान अवधि सबसे कम हो।

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समय समायोजित प्रत्याय दर विधि (Time-adjusted Rate of Return Method)

पुनर्भुगतान अवधि विधि तथा लेखांकन विधि या विनियोग पर प्रत्याय विधि में ‘समय-कारक’ (Time Factor) पर विचार नहीं किया जाता है। अतः वे विधियों दोषपूर्ण है। “आज वित्तीय प्रबन्धक के भावी वचनवद्धता (Future Commitments) तथा परियोजनाओं से सम्बन्धित निर्णयों में सम-समायोजित दर अत्यधिक महत्त्वपूर्ण औजार बन गई है।” समय-समायोजित प्रत्याय दर विधि इस धारणा पर आधारित है कि आज के एक वर्ष के बाद या किसी अन्य अवधि के बाद प्राप्त होने वाला एक रुपया वर्तमान में प्राप्त होने वाले एक रुपये से कम मूल्यवान् होता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि भविष्य में प्राप्त होने वाले एक रुपये का मूल्य वर्तमान काल के एक रुपये से कम ही होगा। यह कमी कुछ अमौद्रिक कारणों को छोड़कर सामान्यतया ब्याज दर पर निर्भर करती है। अतः किसी विनियोग अथवा परियोजना से भविष्य में प्राप्त होने वाली आयों का समय-समायोजन किया जाना चाहिए, अर्थात् भावी आयों का वर्तमान मूल्य निकालना चाहिए। विनियोग अथवा परियोजना की लागत तथा उसकी भावी आयों के वर्तमान मूल्य की तुलना करके निर्णय लेना चाहिए।

समय समायोजित प्रत्याय दर पर आधारित विधियाँ

समय समायोजित प्रत्याय दर अथवा वर्तमान मूल्य सिद्धान्त पर तीन विधियाँ आधारित है। ये विधियाँ निम्नलिखित हैं –

I, शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि (Net Present Value Method),

II, लाभदायकता निर्देशांक अथवा लाभ-लागत अनुपात विधि (Profitability Index or Benefit-Cost Ratio Method) तथा

III, प्रत्याय की आन्तरिक दर विधि (Internal Rate or Return Method) ।

1, शुद्ध वर्तमान मूल्य पद्धति (Net Present Value Method)

समय समायोजित प्रत्याय दर पर आधारित पूँजी व्ययों के विश्लेषण के प्रयोग की जाने वाली विधियों में शुद्ध वर्तमान मूल्य पद्धति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसे Excess Present Value Method अथवा Net Gain Method भी कहते हैं। इस पद्धति का प्रयोग उस समय सरलतापूर्वक किया जाता है जब प्रबन्ध द्वारा विनियोग पर न्यूनतम स्वीकार्य प्रत्याय दर निर्धारित कर दी जाती है। इस विधि में विनियोग पर प्राप्त रोकड़ अन्तवाहों का प्रबन्ध द्वारा निर्धारित अपेक्षित प्रत्याय दर (Required Earning Rate) से बट्टा करके वर्तमान मूल्य ज्ञात किया जाता है। इस वर्तमान मूल्य की विनियोग लागत से तुलना की जाती है। यदि इस तुलना में विनियोग से प्राप्त अन्तर्वाहों के वर्तमान मूल्य विनियोग की लागत के बराबर अथवा उससे अधिक होता है तो विनियोग प्रस्ताव अथवा परियोजना को स्वीकार कर लिया जाता है अन्यथा अस्वीकार कर दिया जाता है। सूत्र रूप में इसे निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है

II, लाभदायकता निर्देशांक अथवा लाभ-लागत अनुपात विधि (Profitability Index or Benefit-Cost Ratio Method)

शुद्ध वर्तमान मूल्य पद्धति का एक सबसे बड़ा दोष यह है कि इस विधि द्वारा उन परियोजनाओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है जिनकी प्रारम्भिक लागतों में बहुत अधिक अन्तर हो। इसके लिए लाभदायकता निर्देशांक अथवा लाभ लागत अनुपात विधि का प्रयोग किया जाता है। यह विधि शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि के समान है। इसका मापन निम्न गणितीय सूत्र द्वारा किया जा सकता है –

Profitability Index or Benefit-Cost Ratio Method

III, प्रत्याय की आन्तरिक दर विधि (Internal Rate of Return Method)

समय समायोजित प्रत्याय दर विधि पर आधारित तृतीय विधि प्रत्याय की आन्तरिक दर विधि है। वर्तमान मूल्य विधि अथवा शुद्ध वर्तमान मूल्य विधि में अपेक्षित प्रत्याय दर का पहले से ज्ञान होता है अतः भावी अर्जित राशियों का वर्तमान मूल्य सरलतापूर्वक निकाला जा सकता है। अब यदि हम यह मान लें कि हमें अपेक्षित प्रत्याय दर ज्ञात नहीं है तो ऐसी स्थिति में भविष्य में प्राप्त होने वाली राशियों के वर्तमान मूल्य को प्रारम्भिक विनियोग के बराबर करना होगा। इसके लिए जिस दर का प्रयोग किया जाता है उसे रोकड़ प्रवाहों के अपलेखन की बट्टा दर (Discounting Cash Flow Rate), प्रत्याय की आन्तरिक दर (Internal Rate of Return), पूँजी की सीमान्त उत्पादकता (Marginal Efficiency of Capital), विनियोक्ता विधि (Investor’s Method), परियोजना प्रत्याय दर (Project Return Rate) आदि अनेक नामों से जाना जाता है। प्रत्याय की आन्तरिक दर वह दर होती है जिससे किसी परियोजना के वार्षिक रोकड़ अन्तर्वाहों का वर्तमान मूल्य उस परियोजना के वर्तमान विनियोग मूल्य अथवा परियोजना की वर्तमान लागत के बराबर हो जाता है।

प्रत्याय की आन्तरिक दर की गणना (Computation of IRR) प्रत्याय की आन्तरिक दर ज्ञात करने हेतु निम्नलिखित दो परिस्थितियाँ हो सकती है—

(अ) प्रति वर्ष रोकड़ अन्तर्वाह की राशि समान होने पर।

(ब) प्रति वर्ष रोकड़ अन्तर्वाह की राशि असमान होने पर।

Computation of IRR

Where, r = Lower rate of return

R2 = higher rate of return

V1 = P.V Factor at lower rate of return

V2 = P.V. Factor at higher rate of return

V = P.V. Factor of which r is to be interpolated

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पूँजीगत बजटन में जोखिम एवं अनिश्चितता (Risk and Uncertainty in Capital Budgeting)

पूँजीगत बजटन में किसी परियोजना में विनियोग करते समय अर्जित होने वाली भावी अन्तप्रवाहों एवं विनियोजन लागत को आधार बनाकर निर्णय लिया जाता है। विभिन्न परियोजनाओं में सन्निहित जोखिम को ध्यान नहीं रखा जाता। एक विनियोग प्रस्ताव में जोखिम से तात्पर्य भविष्य में अनुमानित एवं वास्तविक प्रत्याय में उत्पन्न परिवर्तनशीलता से है। किसी परियोजना द्वारा अर्जित आय में जितनी अस्थिरता होगी, उसमें उतनी ही अधिक जोखिम होगी। पूँजी बजटन में अनेक प्रकार की जोखिमें हो सकती हैं। जिनमें व्यावसायिक जोखिम (Business Risk), विनियोग जोखिम (Investment Risk), पोर्टफोलियो जोखिम (Portfolio Risk) तथा वित्तीय जोखिम (Financial Risk) मुख्य हैं। चूँकि जोखिम एवं अनिश्चितता विनियोग प्रस्तावों की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है, इसलिए पूँजी खर्च प्रस्तावों के मूल्यांकन व विश्लेषण में जोखिम कारक को शामिल करना आवश्यक / अपरिहार्य हो जाता है। यद्यपि ऐसा करना एक कठिन कार्य है, फिर भी पूँजी बजटन में जोखिम तथा अनिश्चितता के तत्त्व को शामिल करने की प्रमुख विधियों निम्नलिखित हैं–

1, जोखिम समायोजित बट्टा दर विधि (Risk Adjusted Discounted Rate Method) – पूँजी खर्च निर्णय में जोखिम को समायोजित करने हेतु यह विधि सबसे सरल एवं सर्वाधिक प्रयोग की जाती है। यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि विनियोक्ता जोखिमपूर्ण परियोजनाओं पर ऊँची प्रत्याय दर की उपेक्षा करता है; इसलिए इस विधि में परियोजना की बहा दर को जोखिम के अनुसार समायोजित कर दिया जाता है अर्थात् जोखिमपूर्ण परियोजनाओं के लिए विनियोक्ताओं द्वारा अपेक्षित सामान्य प्रत्याय दर के अतिरिक्त प्रत्याय के लिए जोखिम प्रीमियम दर (Risk Premium Rate) निर्धारित कर ली जाती है। इस प्रकार जोखिम समायोजित बट्टा दर से अभिप्राय जोखिम रहित दर (Risk Free Rate) एवं जोखिम प्रब्याजि दर के योग से है। जोखिम रहित दर वह दर है जिस पर भावी रोकड़ अन्तप्रवाह की कटौती इस मान्यता पर करते हैं कि कोई भी जोखिम नहीं है। जोखिम प्रीमियम दर वह दर होती है जो किसी विशेष परियोजना में निहित जोखिम के कारण जोखिम रहित दर से ऊपर/अधिक अतिरिक्त प्रत्याय के रूप में प्राप्त होने की उम्मीद (अपेक्षा) की जाती है। जोखिम प्रीमियम दर जोखिम की मात्रा के अनुसार अलग-अलग परियोजनाओं के लिए अलग-अलग हो सकती है। जिन परियोजनाओं में जोखिम अधिक होती है उनके लिए प्रब्याजि ऊँची दर से जोड़ी जाती है तथा जिनमें जोखिम कम होती है उनमें नीची दर से जोड़ी जाती है।

जोखिम समायोजित बट्टा दर को शुद्ध वर्तमान मूल्य की दशा में भावी रोकड़ आगमन को जोखिम समायोजित बट्टा दर पर कटौती करके वर्तमान मूल्य और शुद्ध वर्तमान मूल्य जात करते हैं। यदि शुद्ध वर्तमान मूल्य धनात्मक होता है, तो परियोजना को स्वीकृत करने हेतु संस्तुति की जाती है। इसके विपरीत शुद्ध वर्तमान मूल्य ऋणात्मक होने पर परियोजना को अस्वीकार कर दिया जाता है। आन्तरिक प्रत्याय की दर (I,R,R,) की दशा में, आन्तरिक प्रत्याय दर की तुलना जोखिम समायोजित बट्टा दर से करनी चाहिए। यदि आन्तरिक प्रत्याय दर (I,R,R,), जोखिम समायोजित दर (R,A,D,R,) से अधिक है, तो परियोजना को स्वीकार करना चाहिए अन्यथा अस्वीकृत कर देना चाहिए। इस विधि का मुख्य दोष यह है कि इस विधि में जोखिम प्रीमियम दर को निर्धारित करना एक समस्या है।

2, निश्चितता तुल्यमान गुणांक (Certainty Equivalent Coefficient) – इस विधि के अन्तर्गत जोखिम का समायोजन करने हेतु प्रत्येक वर्ष के रोकड़ अन्तर्वाहों की निश्चितता तुल्यमान गुणांक (Certainty Equivalent Coefficient or C,E,C,) से गुणा की जाती है। निश्चितता तुल्यमान गुणांक, जोखिम रहित रोकड़ अन्तर्वाहों तथा जोखिमपूर्ण रोकड़ अन्तर्वाहों के अनुपात को प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए, किसी फर्म के प्रबन्ध तन्त्र का अनुमान है कि किसी परियोजना का रोकड़ अन्तर्वाह 60,000 रुपये होगा परन्तु प्रबन्ध तन्त्र का साथ-साथ यह भी अनुमान है कि इस परियोजना से कम-से-कम 48,000 रुपये अवश्य प्राप्त होंगे तो निश्चितता तुल्यमान गुणांक 48,000/ 60,000 = 0,8 होगा। इस प्रकार C,E,C, ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

Certainty Equivalent Coefficient

यह ध्यान रखें कि निश्चितता तुल्यमान गुणांक (C,E,C,) का मान सदैव 1 से कम ही होगा, क्योंकि जोखिम रहित रोकड़ प्रवाह, जोखिमपूर्ण रोकड़ प्रवाह से अधिक नहीं हो सकता है। इस विधि में रोकड़ अन्तर्वाहों को पहले निश्चितता तुल्यमान गुणांक से गुणा करके जोखिम रहित रोकड़ अन्तर्वाहों की रकम ज्ञात की जाती है, उसके बाद जोखिम रहित दर से उनका बट्टा किया जाता है।

3, सूक्ष्मग्राह्यता विश्लेषण (Sensitivity Analysis) – इस विधि में किसी परियोजना के भावी प्रत्याय के एक से अधिक अनुमान लगाए जाते हैं जबकि पूर्व विधियों में एक ही अनुमान लगाया जाता है। इस विधि में लगाए जाने वाले अनुमान तीन प्रकार के होते हैं निराशावादी, बहुत सम्भव तथा आशावादी। इस विधि के अन्तर्गत इस बात का विश्लेषण किया जाता है कि इन तीन विभिन्न स्थितियों में रोकड़ अन्तर्वाह कितना संवेदनशील है। आशावादी एवं निराशावादी रोकड़ अन्तर्वाह में जितना अधिक अन्तर होगा, परियोजना उतनी ही अधिक जोखिमपूर्ण मानी जाएगी किस परियोजना को स्वीकार किया जाएगा, यह पूर्णतः विनियोक्ता अथवा निर्णय लेने वाले व्यक्ति की जोखिम के प्रति अभिवृत्ति पर निर्भर करता है। इस विधि से विश्लेषण करने पर केवल इतना पता चलता है कि परियोजना से सम्बद्ध जोखिम की मात्रा कितनी है। सामान्यतया अधिक जोखिम के साथ अधिक लाभदायकता जुड़ी होती है। प्रबन्ध परियोजना में निहित जोखिम एवं लाभदायकता के आधार पर निर्णय ले सकता है।

4, प्रायिकता आबंटन (Probability Assignment) – सूक्ष्मग्राह्यता विश्लेषण का प्रमुख दोष यह है कि इसमें प्रत्येक अनुमान के घटित होने के अवसरों पर ध्यान नहीं दिया गया है। इस विधि में रोकड़ अन्तर्वाहों के घटित होने की प्रायिकता निर्धारित कर दी जाती है। इस प्रकार निर्धारित प्रायिकता के आधार पर रोकड़ अन्तर्वाहों को समायोजित करके सम्भावित रोकड़ प्रवाह ज्ञात कर लिए जाते हैं। ज्ञात किए गए सम्भावित रोकड़ प्रवाहों को प्रत्याशित मौद्रिक मूल्य (Expected Monetary Values) कहते हैं तथा उन्हें दी गई कटौती दर से कटौती करके उनका वर्तमान मूल्य ज्ञात कर लेते हैं। अन्त में कुल वर्तमान मूल्य में से परियोजना के बहिर्वाहों का वर्तमान मूल्य घटाकर शुद्ध वर्तमान मूल्य ज्ञात कर लेते हैं एवं शुद्ध वर्तमान मूल्य के आधार पर आवश्यक निर्णय कर लिया जाता है।

5, प्रमाप विचलन (Standard Deviation) – इस विधि के अन्तर्गत रोकड़ प्रवाहों की परिवर्तनशीलता प्रमाप विचलन की माप द्वारा निर्धारित की जाती है। अतः जब हमें किसी परियोजना में जोखिम की कम अथवा अधिक मात्रा का माप करना हो तो प्रमाप विचलन की गणना करना श्रेष्ठ रहता है। इस विधि के अन्तर्गत विभिन्न परियोजनाओं के सम्भावित रोकड़ अन्तर्वाहों की सम्बन्धित माध्य से परिवर्तनशीलता की तुलना की जाती है। अधिक प्रमाप विचलन वाली परियोजना, कम प्रमाप विचलन वाली परियोजना से अधिक जोखिमपूर्ण मानी जाती है। प्रमाप विचलन की गणना निम्न प्रकार की जाती है—

(i) प्रत्येक रोकड़ आगमन एवं प्रत्याशित रोकड़ प्रवाह (माध्य रोकड़ प्रवाह) का विचलन ज्ञात करके उनका वर्ग कर लेते हैं जिसे d संकेताक्षर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

(ii) प्रत्येक विचलन के वर्ग को सम्बन्धित प्रायिकता का भार देते हुए उनका गुणा कर लेते हैं और फिर योग कर लेते हैं। इसे Σfd2 कहेंगे।

(iii) अन्त में, निम्नलिखित सूत्र के द्वारा प्रमाप विचलन ज्ञात कर लिया जाता है —

Standard Deviation

यहाँ पर n का मान सदैव 1 (एक) लेते हैं क्योंकि प्रायिकता का योग सदैव 1 (एक) होता है।

 

6, विचरण गुणांक (Coefficient of Variation) – प्रमाप विचलन निरपेक्ष माप होने के कारण असमान रोकड़ प्रवाहों अथवा असमान माध्य मूल्य वाली परियोजनाओं की जोखिम की तुलना करने में सहायक सिद्ध नहीं होता है, अतः सापेक्ष माप के लिए विचरण गुणांक ज्ञात किया जाता है। विचरण गुणांक जितना ऊँचा होगा, परियोजना उतनी ही अधिक जोखिमपूर्ण होगी। इसको ज्ञात करने के लिए अग्रलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है—

Coefficient of Variation

7, निर्णय वृक्ष विश्लेषण (Decision Tree Analysis) – पूंजीगत बजटन में आनुक्रमिक निर्णयों वाले जोखिमपूर्ण विनियोग प्रस्तावों के मूल्यांकन की यह एक उपयोगी विश्लेषणात्मक तकनीक है। निर्णय वृक्ष एक प्रकार का रेखाचित्रीय प्रदर्शन है जिसमें वर्तमान निर्णय एवं भावी निर्णय के बीच सम्बन्धों एवं उनके परिणामों को दर्शाया जाता है। विनियोग निर्णय की समस्याओं का स्वरूप एक वृक्ष व उसकी शाखाओं के रूप में होता है, इसीलिए इस रीति को निर्णय वृक्ष कहते हैं।

टी० एस० ओस्टर यंग के अनुसार, “निर्णय वृक्ष, वृक्ष के रूप में एक चित्रमय प्रदर्शन है जो सभी सम्भावित परिणामों के विस्तार, सम्भाविता एवं अन्तर्सम्बन्धों को प्रदर्शित करता है।”

निर्णय वृक्ष के प्रयोग द्वारा प्रबन्ध अधिक सरलता व स्पष्टता के साथ विभिन्न कार्यक्रमों पर विचार कर सकता है।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Capital Budgeting Decisions Numerical Question.

Note:- Click here to View.

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