Unit 4 Working Capital Decisions Mcom Notes

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Unit 4 Working Capital Decisions Mcom Notes

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कार्यशील पूँजी से आशय (Meaning of Working Capital)

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए दो प्रकार की पूँजी को आवश्यकता पड़ती है स्थिर पूँजी और कार्यशील पूँजी व्यवसाय के संचालन हेतु स्थिर सम्पत्तियों में लगाई गई पूँजी स्थिर पूँजी कहलाती है और जो पूँजी नैत्यिक या नियमित व्यावसायिक क्रियाओं के संचालन के लिए उपलब्ध व प्रयोग की जाती है, वह कार्यशील पूंजी कहलाती है। इसे अल्पकालीन पूँजी, चक्रशील पूँजी, तरल पूँजी आदि नामों से पुकारा जाता है। यद्यपि यह एक बहुप्रचलित शब्द है, किन्तु इसके अर्थ के सम्बन्ध में विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। अर्थशास्त्रियों, व्यवसायियों, लेखपालों तथा प्रबन्धकों में इसके अर्थ के बारे में एक राय नहीं है। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों की विचारधारा को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है–विस्तृत और संकुचित।

विस्तृत अर्थों में, चालू सम्पत्तियों के योग को कार्यशील पूँजी कहते हैं। बोनविले, जे०एस० मिल, मीड, मैलट और फील्ड आदि विद्वानों ने इसे इसी अर्थ में प्रयोग किया है। मीड, मैलट और फील्ड के शब्दों में, “कार्यशील पूँजी से आशय चल सम्पत्तियों के योग से हैं।”

जे०एस० मिल के शब्दों में, “चल सम्पत्तियों का योग ही कार्यशील पूंजी है।”

बोनविले एवं डेवी के शब्दों में, “कोषों की कोई भी प्राप्ति, जो चालू सम्पत्तियों को बढ़ाता है, कार्यशील पूँजी की वृद्धि है, क्योंकि वे दोनों एक ही हैं।” कार्यशील पूंजी का विस्तृत अर्थ ही कार्यशील पूँजी की सकल अवधारणा कहलाती है; इसलिए इस अर्थ में प्रयुक्त कार्यशील पूँजी को सकल कार्यशील पूँजी के नाम से भी जानते हैं।

वस्तुतः यह कार्यशील पूँजी के विचार का मात्रात्मक दृष्टिकोण (Quantitative Approach) है। इस दृष्टिकोण के सम्बन्ध में अग्रलिखित तर्क दिए जाते हैं –

(1) चालू सम्पत्तियों की व्यवस्था चाहे दीर्घकालीन पूंजी सोतों से हो अथवा चालू दायित्वों से, वे सभी व्यवसाय के कार्य में प्रयुक्त होती हैं। अतः उन सभी को ही कार्यशील पूँजी मानना चाहिए।

(2) चूँकि स्थिर सम्पत्तियों को स्थिर पूँजी का प्रतीक माना जाता है, अतः चालू सम्पत्तियों को चालू या कार्यशील पूंजी का प्रतीक मानना चाहिए।

(3) प्रबन्धक मुख्यतः कुल चालू सम्पत्तियों के आधार पर ही अपनी योजनाएँ बनाते हैं। क्योंकि वे किसी भी कार्य की योजना बनाते समय यह देखते हैं कि व्यवसाय के सामान्य कार्य चालन के लिए उनके पास कितनी निधि है।

(4) वित्तीय प्रबन्ध के दृष्टिकोण से यही मत उपयुक्त है क्योंकि उच्च अनुपात (चालू सम्पत्तियों का चालू दायित्वों पर आधिक्य) को यहाँ त्रुटिपूर्ण वित्तीय आयोजन (अर्थात् अति) पूँजीकरण) का प्रतीक माना जाता है। वास्तव में, एक सफल वित्तीय विशेषज्ञ उपक्रम की साख क्षमता बनाने में अधिक रुचि नहीं रखता, वह तो उपक्रम के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए चालू सम्पत्तियों की समायोज्य राशि (Adjustable amount) बनाए रखने में रुचि रखता है। अतः इसके लिए तो कार्यशील पूँजी का विस्तृत दृष्टिकोण ही महत्त्वपूर्ण है।

 

शुद्ध कार्यशील पूँजी अवधारणा (Net Working Capital Concept)

संकुचित अर्थों में, चालू सम्पत्तियों का चालू दायित्वों पर आधिक्य कार्यशील पूँजी कहलाता है। गस्टैनबर्ग, लिंकन, सेलियर्स, स्टीवेन्स आदि विद्वानों ने इसे इसी अर्थ में प्रयोग किया है।

गस्टैनबर्ग के शब्दों में, “इसे (कार्यशील पूँजी) सामान्यतया चालू देनदारियों के ऊपर चल सम्पत्तियों के आधिक्य के रूप में परिभाषित किया जाता है।”

हॉगलैण्ड के शब्दों में, “कार्यशील पूँजी का अर्थ व्यावसायिक लेखा पुस्तकों में चालू दायित्वों एवं चालू सम्पत्तियों के अन्तर से माना जाता है।”

कार्यशील पूँजी के संकुचित अर्थ को ही शुद्ध कार्यशील पूँजी के नाम से जाना जाता है। यह कार्यशील पूँजी के विचार का गुणात्मक दृष्टिकोण (Qualitative Approach) है। इस दृष्टिकोण के सम्बन्ध में निम्न तर्क दिए जाते हैं—

(1) यह सिद्धान्त काफी समय से प्रयोग में लाया जा रहा है, अतः इसे ही प्रयोग करना चाहिए।

(2) लेखापाल कुल सम्पत्तियों के कुल दायित्वों पर आधिक्य को पूँजी कहते हैं, अत: इसी आधार पर चालू सम्पत्तियों के चालू दायित्वों पर आधिक्य को कार्यशील पूंजी मानना चाहिए, इसीलिए लेखा-विधि में इस दृष्टिकोण को ही मान्यता दी गई है।

(3) चिट्ठे के दायित्व पक्ष की दृष्टि से यह दीर्घकालीन पूँजीदाताओं द्वारा व्यवसाय की चालू सम्पत्तियों के अर्थप्रबन्ध के लिए किए गए अभिदान या अंशदान को बतलाता है।

(4) एकाकी व्यापार और साझेदारी में यही मत अधिक उपयुक्त है क्योंकि इसमें स्वामित्व और प्रबन्ध दोनों ही एक ही व्यक्ति में निहित होते हैं।

(5) अल्पकालीन ऋणदाताओं तथा विनियोजकों के दृष्टिकोण से भी यही मत अधिक उपयुक्त है क्योंकि चालू सम्पत्तियों का चालू दायित्वों पर आधिक्य ही उनकी सुरक्षा सीमा निर्धारित करता है।

(6) व्यवसाय में भावी अनिश्चितताओं तथा आकस्मिकताओं का सामना करने के लिए इसी आधिक्य पर ही विश्वास किया जा सकता है क्योंकि यह आधिक्य संस्था की वित्तीय सुदृढ़ता का प्रतीक होता है।

उपर्युक्त मतभेद के कारण व्यवहार में चालू सम्पत्तियों के योग के लिए ‘सकल कार्यशील पूँजी’ (Gross Working Capital) का प्रयोग किया जाता है तथा चालू सम्पत्तियों के चालू दायित्वों पर आधिक्य के लिए ‘शुद्ध कार्यशील पूँजी’ (Net Working Capital) अथवा केवल ‘कार्यशील पूंजी’ का प्रयोग किया जाता है।

 

कार्यशील पूँजी की ‘परिचालन चक्र’ अवधारणा (Concept of ‘Operating Cycle’ of Working Capital)

वर्तमान में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता का अनुमान लगाने हेतु परिचालन चक्र विधि का प्रयोग किया जाने लगा है। परिचालन चक्र से आशय उस समयावधि से होता है जो कि एक व्यावसायिक उपक्रम को उत्पादन प्रक्रिया पूरी करके अपने रोकड़ को वापस रोकड़ में बदलने में लगता है। एक व्यवसाय का परिचालन चक्र रोकड़- कच्चा माल निर्मित माल देनदार व प्राप्य विपत्र – रोकड़ होता है। एक संचालन चक्र की अवधि संचालन की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि में आपूर्तिदाता द्वारा स्वीकृत अवधि का समायोजन करके ज्ञात की जाती, है। संचालन चक्र रीति से किसी संस्था की भावी कार्यशील पूँजी का पूर्वानुमान लगाने के लिए एक अवधि के संचालन व्ययों में उसी अवधि के संचालन चक्रों की संख्या से भाग दिया जाता है। इस रीति के प्रयोग हेतु अग्रलिखित गणना आवश्यक होती है –

(क) संचालन व्यय – किसी अवधि के कुल संचालन व्यय में उस अवधि में (गैर-नकद खर्ची को छोड़कर) किए गए सामग्री क्रय, निर्माणी व्यय प्रशासनिक व्यव व वितरण व्यय आदि को शामिल करते हैं। यह जरूरी है कि इन आयो की रकम का अनुमान लगाते समय उत्पाद मिश्रण में परिवर्तन, नवीन उत्पाद का प्रारम्भ, पुराने उत्पाद का परित्याग मूल्य-स्तर में परिवर्तन आदि से उत्पन्न परिवर्तनों का समायोजन कर लिया जाए।

(ख) संचालन चक्र की अवधि – संचालन चक्र की अवधि से तात्पर्य संचालन की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि के योग में से आपूर्तिदाताओं (लेनदारों) द्वारा प्रदत्त अवधि के घटाने के बाद बची हुई अवधि से होता है। संचालन की विभिन्न अवस्थाओं की गणना विधि इस प्रकार है –

(i) सामग्री संग्रहण अवधि (दिनों में) – उत्पादन हेतु निर्गमन से पूर्व जितने दिन सामग्री को स्टोर में रखना पड़ता है, उसे ही सामग्री संग्रहण अवधि कहते हैं। इसकी गणना के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

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(ii) रूपान्तरण अवधि (दिनों में) जितनी अवधि में कच्चा माल निर्मित माल में परिवर्तित होता है, उसे रूपान्तरण अवधि (Conversion Period) कहते हैं। इसका गणना सूत्र निम्न प्रकार है –

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कुल कारखाना लागत के लिए प्रयुक्त सामग्री, श्रम, कारखाना उपरिव्यय के योग में अर्द्ध-निर्मित माल के प्रारम्भिक स्टॉक को जोड़ दिया जाता है और अन्तिम स्टॉक को घटा दिया जाता है।

कभी-कभी रूपान्तरण अवधि को उत्पादन चक्र अवधि (Production Cycle Period) भी कहते हैं। यदि उत्पादन चक्र की अवधि की सूचना स्पष्ट रूप से दी गयी हो, तो इसकी गणना सूत्रानुसार नहीं की जाएगी।

(iii) तैयार माल की संग्रहण अवधि (दिनों में) – माल के तैयार होने व बिक्री से पूर्व जितनी अवधि तक माल स्टोर में रहता है, उसे तैयार माल की संग्रहण अवधि कहते हैं। इसका गणना सूत्र इस प्रकार है –

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(iv) औसत वसूली अवधि (दिनों में) – देनदारों से नकद रुपया प्राप्त होने में जितनी अवधि लगती है, उसे औसत वसूली अवधि कहते हैं। सामान्यतः साख नीति के रूप में इस अवधि की सूचना दी गयी होती है। गणना के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया जा सकता है

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(v) औसत भुगतान अवधि (दिनों में) – आपूर्तिदाताओं (लेनदारों) द्वारा भी कुछ अवधि उधार की प्रदान की जाती है। लेनदारों के नकद भुगतान करने में जितनी अवधि लगती है, उसे औसत भुगतान अवधि कहते हैं। प्रायः इसकी सूचना भी दी गयी होती है, परन्तु गणना हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग करते हैं—

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उपर्युक्त (1) व (iv) तक के योग की अवधि में से (v) को घटा देने पर संचालन की कुल अवधि ज्ञात हो जाती है।

(ग) वर्ष के संचालन चक्रों की कुल संख्या – जब वर्ष के 365 दिन को उपर्युक्त (ख) में वर्णित ढंग से संचालन चक्र की अवधि से विभाजित कर देते हैं, तो संचालन चक्र की कुल संख्या ज्ञात हो जाती है।

(घ) कार्यशील पूंजी की राशि-वर्ष के कुल संचालन व्यय और संचालन चक्र की कुल संख्या ज्ञात करने के बाद कार्यशील पूँजी की रकम की गणना निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात की जाती है

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(ङ) आकस्मिकताओं के लिए प्रावधान – उपर्युक्त ढंग से निकाली गयी कार्यशील पूँजी की रकम में एक निश्चित प्रतिशत आकस्मिकताओं के लिए जोड़ दिया जाता है।

 

कार्यशील पूँजी का विश्लेषण से आशय (Meaning of Analysis of Working Capital)

कार्यशील पूंजी किसी भी व्यवसाय के पूँजी ढाँचे की प्रमुख मद होती है। इसकी पर्याप्तता तथा इसके कुशल प्रयोग के कारण ही व्यावसायिक संस्था सफलता प्राप्त करती है। कार्यशील पूँजी की आवश्यकता मानव शरीर में रक्त की आवश्यकता के समान होती है। व्यावसायिक संस्था का वित्त लेखाधिकारी समय-समय पर व्यवसाय की जरूरत के अनुरूप कार्यशील पूँजी का मापन अथवा विश्लेषण करता है। यह विश्लेषण विभिन्न अनुपातों तथा तकनीकों की मदद से करता है जिनमें रोकड़ बजट, कोष प्रवाह विवरण, रोकड़ प्रवाह विवरण अनुपात विश्लेषण तकनीक आदि प्रमुख हैं। कार्यशील पूँजी की आवश्यकता एवं उसकी मात्रा में हमेशा सन्तुलन रहना चाहिए।

डा० ए०के० गर्ग के अनुसार, “कार्यशील पूँजी का विश्लेषण संस्था में पूंजी की कमी व अधिकता को मापने की एक विधि है।”

कार्यशील पूँजी विश्लेषण के अनुपात / विधियाँ कार्यशील पूंजी विश्लेषण करने के लिए विभिन्न विधियाँ प्रयोग में लाई जा सकती है

(1) अनुपात विश्लेषण

(2) रोक प्रवाह विश्लेषण

(3) कोष प्रवाह विश्लेषण

(4) कार्यशील पूंजी तालिका तैयार करना

(5) कार्यशील पूंजी बजट तैयार करना।

कार्यशील पूँजी विश्लेषण अनुपातों की भूमिका (Role of Working Capital Ratios Analysis)

कार्यशील पूंजी अनुपात की पूँजी विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो इस प्रकार है –

1, पूर्वानुमान लगाने में सहायक (Helpful in Fore casting) – वित्तीय लेखाधिकारी गत वर्षों के आँकड़ों का अध्ययन करके उनका अनुपात निकालकर निर्वाचन करके भावी घटनाओं का पूर्वानुमान लगा सकता है। वह भविष्य को लेकर संस्था की रणनीति तैयार कर सकता है।

2, नियन्त्रण में सहायक (Helpful in Controlling) – अनुपातों का विश्लेषण करके उत्पादन के निष्पादन व लागतों पर नियन्त्रण किया जा सकता है। संस्था लागतों में अनावश्यक खर्ची को ज्ञात करके उन पर रोक लगा सकती है। साथ ही कार्यक्षमता में भी वृद्धि कराकर कार्य निष्पादन को भी नियन्त्रित कर सकती है।

3, वित्तीय क्षमता के मूल्यांकन में सहायक (Helping in Financial Capacity Appraisal) – अनुपातों के विश्लेषण द्वारा संस्था अपनी वित्तीय ताकत का अन्दाजा आसानी से लगा सकती है। वह व्यवसाय की तरलता, शोधन क्षमता, लाभप्रदता पूँजी-दन्तीकरण आदि तकनीकों का प्रयोग करके वित्तीय क्षमताओं का मूल्यांकन कर सकती है जिससे भविष्य में और अधिक सुदृढ़ योजना बनाकर कम्पनी के निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सके। कोई भी निवेशक कम्पनी या संस्था में अपना पैसा उसकी वित्तीय स्थिति को देखकर ही लगाता है।

4, कार्यकुशलता के मूल्यांकन के सहायक (Helping in Working Efficieny Appraisal) – अनुपातों के प्रयोग से व्यावसायिक कार्यकुशलता की माप भी आसानी से की जा सकती है। कम्पनी अपने ही गत वर्षों के अनुपातों से अथवा दूसरी संस्थाओं के अनुपातों से तुलनात्मक अध्ययन करके अपनी कार्यक्षमता व कुशलता का मूल्यांकन कर सकती है।

5, संवहन में सहायक – अनुपातों के प्रयोगों से कम्पनी अपने आन्तरिक और बाह्य पक्षों को उनसे सम्बन्धित सूचनाओं के संवहन में सहायक होती है। वह दो अवधि के मध्य अनुपात का विश्लेषण करके होने वाले परिवर्तन को जान सकती है। जिससे भविष्य की रणनीति बनाने में सहायता मिल जाती है।

कार्यशील पूँजी विश्लेषण अनुपातों की सीमाएँ (Limitations of Working Capital Analysis Ratios)

अनुपात का विश्लेषण बहुत ही अमूल्य युक्ति है। उनका सही प्रयोग संस्था की सफलता दिला सकता है और गलत प्रयोग त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष निकालकर संस्था को हानि पहुंचा सकता है। इनको प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित है

 

1, अंकगणितीय प्रभाव (Arithmetical Effect) कार्यशील पूंजी विश्लेषण अनुपातों के अंकगणितीय प्रभाव से सजग रहना चाहिए क्योंकि गलत आँकड़े अथवा इत आँकड़े अनुपातों में परिवर्तन ला सकते हैं। कम्पनी कई बार गलत अंकगणितीय आँकड़ों का प्रयोग करके अपनी इच्छानुसार चिट्ठा तैयार कराकर गलत अनुपातों की गणना कर सकती है।

2, मूल्यस्तर में परिवर्तन प्रभाव (Effect of Change in Price Level) – इन अनुपातों के आधार पर तुलना करते समय सामान्य मूल्य स्तर में परिवर्तनों के लिए कोई समायोजन नहीं किया जाता है। मूल्य स्तर में होने वाले परिवर्तन के कारण अनुपाती के आधार पर किये गये निर्णय गलत होने की सम्भावना बनी रहती है। दो समय अवधि में तुलना करते समय उनके मूल्यों में होने वाले परिवर्तन को ध्यान रखना भी आवश्यक है।

3, अलग-अलग लेखा पद्धति (Different Accounting Methods) – कई बार व्यावसायिक संस्थाएँ लेखांकन को अलग-अलग विधियों का प्रयोग करती है जिसके कारण प्राप्त परिणामों में भी परिवर्तन हो जाते हैं। उनके आधार पर अनुपातों के विश्लेषण भी तुलनात्मक रूप से सही नहीं होते हैं।

4, उचित प्रमापों का अभाव (Lack of Proper Standard) – कार्यशील पूंजी अनुपातों का निर्वाचन करते समय उचित प्रमापों का भी ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है। प्रायः ऐसा कोई भी प्रमाणित अनुपात नहीं है जिसे तुलनात्मक अध्ययन में प्रयोग किया जा सके। कई बार प्रमापों में एकरूपता का अभाव होने के कारण प्राप्त परिणामों में भी एकरूपता नहीं रहती है और निष्कर्ष गलत होने की सम्भावना बनी रहती है।

5, गुणात्मक विश्लेषण का अभाव (Lack of Qualitative Analysis)  –अनुपात विश्लेषण एक परिमाणात्मक विश्लेषण (Quantitative Analysis) का यन्त्र है। इसीलिए इसमें गुणात्मक समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। उदाहरणार्थ किसी भी ग्राहक को उधार देने का निर्णय उसकी वित्तीय स्थिति पर निर्भर करता है चाहे उसकी प्रबन्धकीय योग्यता अथवा चरित्र उसकी वित्तीय स्थिति से अधिक महत्त्वपूर्ण हो ।

कार्यशील पूँजी के सोत (Sources of Working Capital)

Sources of Working Capital

 

कार्यशील पूँजी को निर्धारित करने वाले तत्त्व (Elements for Determination of Working Capital)

व्यावसायिक क्रियाओं के किसी विशेष स्तर पर अर्थ प्रबन्धन के लिए आवश्यक कार्यशील पूंजी की मात्रा का निर्धारण वित्तीय प्रबन्ध के लिए एक कठिन एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है। आवश्यक कार्यशील पूंजी के निर्धारण सम्बन्धी समस्या का समाधान तभी हो सकता है, जब हम यह पता लगा लें कि कार्यशील पूंजी की मात्रा किन-किन कारणों से प्रभावित होती है। विशेषज्ञों की यह मान्यता है कि संस्था की चालू सम्पत्तियों की आवश्यकता हो। कार्यशील पूंजी की आवश्यकता मानी जानी चाहिए। अन्य शब्दों में कार्यशील पूंजी की मात्रा इच्छित चालू सम्पत्तियों को मात्रा के बराबर होगी, परन्तु संस्था के अन्तर्गत प्रयुक्त स्थायी सम्पत्तियों की प्रकृति व सम्भाग पर्याप्त सीमा तक चालू सम्पत्तियों की मात्रा को प्रभावित करता है। अतः कार्यशील पूँजी की मात्रा स्थायी सम्पत्तियों से भी प्रभावित होती है। किसी भी व्यावसायिक संस्था के लिए आवश्यक कार्यशील पूंजी की मात्रा निम्न कारकों से प्रभावित होती है और यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि कार्यशील पूँजी का अनुमान लगाते समय इन कारकों को ध्यान में रखा जाए

1, व्यवसाय की प्रकृति (Nature of Business) – कार्यशील पूंजी की मात्रा को प्रभावित करने वाला यह एक महत्त्वपूर्ण कारक है। व्यवसाय की प्रकृति के अनुसार कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भिन्न-भिन्न मात्रा में होती है। कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं, जहाँ पर कार्यशील पूंजी की आवश्यकता उतनी अधिक नहीं होती है, जितनी कि स्थायी पूँजी को तुलना में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है; जैसे- बैंकिंग उद्योग या व्यापार करने वाली संस्था में।

2, निर्माण अवधि की लम्बाई व उत्पादन बिक्री का अन्तराल (Manufacturing संस्था की कार्यशील पूंजी Cycle and Time-lag between Production and Sale) – की आवश्यक मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्वों में दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्व यह है कि निर्माण अवधि कितनी है और निर्माण होने और बिक्री होने के बीच का अवधि अन्तराल कितना है? यदि संस्था की निर्माण अवधि काफी अधिक है, तो कच्चा माल खरीदने के लिए श्रम व अन्य खर्ची के भुगतान के लिए संस्था बाध्य हो जाएगी और उसे अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी जब तक कि माल तैयार होकर बिक्री के लिए उपलब्ध न हो जाए। ऐसी स्थिति में पूँजी का एक यथेष्ट भाग निर्माण कार्य में बंधित हो जाएगा। इस अवधि में बिक्री न होने से सभी प्रकार के भुगतानों के लिए अलग से कार्यशील पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। यही नहीं, लम्बी अवधि की दशा में कीमत परिवर्तन की भी सम्भावना होती है और यह भय बना रहता है कि अनुमानित लाभ कम या नगण्य न हो जाए। ऐसी स्थिति में कार्यशील पूंजी की मात्रा अधिक रूप में आवश्यक होती है ताकि कठिनाइयों को झेला जा सके। यही नहीं, निर्माण व विक्रय के बीच की अवधि का अन्तराल जितना अधिक होगा उतनी ही अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी। निर्माण व विक्री का अन्तराल अधिक होने के कारण संस्था में फण्ड का बहाव सहज तुरन्त नियमित व समय से नहीं हो पाता है और इसलिए निर्माण व स्कन्ध संग्रहण सम्बन्धी खर्ची को पूरा करने के लिए अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता पड़ती है।

3, विक्रय की कुल मात्रा व कार्यशील पूंजी का आवर्त (Sale volume and Turnover of Working Capital) – संस्था की बिक्री की कुल मात्रा जितनी अधिक होगी, कार्यशील पूंजी की मात्रा की आवश्यकता उतनी ही कम होगी, क्योंकि अधिक विक्रय मात्रा को रकम से संस्था अपने दिन-प्रतिदिन के भुगतानों का आयोजन कर सकती है, परन्तु विक्रय की गति का भी कार्यशील पूँजी पर प्रभाव पड़ता है। यदि बिक्री सहज व नियमित है, तो कार्यशील पूँजी की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होगी। अनियमित बिक्री की दशा में कार्यशील पूँजी की मात्रा अधिक होगी बिक्री मात्रा बढ़ाने की नीति, विशेष बिक्री अभियान पर होने वाला खर्च, कीमत में परिवर्तन व साख नीति आदि का भी कार्यशील पूंजी पर प्रभाव पड़ता है। कार्यशील पूंजी की आवर्त की गति भी कार्यशील पूंजी को प्रभावित करती है। यह आवर्त बतलाता है कि चालू सम्पत्तियों में विनियोजित पूँजी का कितनी बार व्यापार में प्रयोग किया गया है। यह आवर्त जितना अधिक होता है, पूंजी की उसी मात्रा से व्यवसाय की अधिक मात्रा का व्यापार किया जा सकता है।

4, क्रय व विक्रय की शर्तें (साख-नीति) (Terms of Purchases and Sales or Credit Policy) – यदि संस्था माल का नकद क्रय करती है, परन्तु माल को उधार बेचती है, तो उसे कम-से-कम इतनी पूँजी की आवश्यकता पड़ेगी कि जो कुछ बेचा गया है। और जिसका रुपया नहीं मिला है, उसे नकद रूप में खरीदा जा सके। दूसरी तरफ, यदि संस्था माल का क्रय उधार करती है और नकद रूप में बेचती है, तो वह विक्रय हेतु स्कन्ध बिना पूँजी के ही प्राप्त या जमा कर सकेगी और समय-समय पर नकद विक्री से प्राप्त धन में से उधार क्रय (लेनदारों) का भुगतान कर सकेगी, परन्तु व्यवहार में ये दोनों स्थितियाँ असीम होती हैं और पायी नहीं जाती है। वस्तुतः माल का क्रय-विक्रय अंशत: नकद और अंशतः उधार दोनों रूपों में होता है। इसके विपरीत, उधार क्रय की अवधि जितनी अधिक होगी, कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भी उतनी ही कम होगी।

5, चालू सम्पत्तियों की तरलता (Liquidity of Current Assets) – संस्था के पास जितनी अधिक तरल सम्पत्तियाँ होंगी उसे उतनी ही कम पूंजी की आवश्यकता होगी। तरल सम्पत्तियों में केवल उन्हीं सम्पत्तियों को शामिल करते हैं, जिन्हें तुरन्त नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है; इसलिए यह कहा जाता है कि चालू सम्पत्तियों का मूल्य चालू दायित्वों से अधिक होना चाहिए। तरल सम्पत्तियों की आवश्यकता अनुमान लगाते समय विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों के मिश्रण का विधिवत् विश्लेषण करना आवश्यक होता है। तरलता का अनुमान लगाने के लिए मुख्य रूप से निम्न सम्पत्तियों का विश्लेषण महत्त्वपूर्ण होता है—

(अ) रोकड़ स्थिति (Cash Position) – यह तो सर्वविदित है कि व्यावसायिक संस्था द्वारा सम्भावित प्रत्येक क्रिया से रोकड़ स्थिति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित होती है इसलिए व्यवसाय के प्रबन्ध के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह संस्था के लिए इच्छित रोकड़ का अनुमान इसके लिए रोकड़ बजट का निर्माण किया जाना चाहिए। यह तथ्य ध्यान में रखना होगा कि रोकड़ अपने आप में एक अप्रभावशाली एवं अनुत्पादक सम्पत्ति है और आवश्यकता से अधिक रोकड़ की विद्यमानता संस्था की लाभदायकता को कमजोर कर सकती है। यदि संस्था में रोकड़ का बहाव नियमित और सहज है तो कम मात्रा में रोकड़ की जरूरत पड़ती है। रोकड़स्थिति का विश्लेषण करते समय आन्तरिक कारक जैसे कर भुगतान, लाभांश नीति, छूट नीति लागत कमी प्रोग्राम कीमत परिवर्तन आदि का भी सतर्कतापूर्वक अवलोकन व व्यवस्था की जानी चाहिए।

(ब) देनदारों की स्थिति (Debtors Position) – तरल सम्पत्तियों की श्रेणी में देनदारों एवं प्राप्य बिलों का दूसरा स्थान है। अतः इनका भी विधिवत् विश्लेषण करके पता लगाना चाहिए कि कुल उधार बिक्री का कितना भाग बकाया रह जाता है, देनदारों से औसतन कितनी अवधि के बाद रुपया वसूल हो पाता है, कितनी मात्रा में देनदार अशोध्य ऋण के रूप में हो जाते हैं आदि। इन सभी का प्रभाव देनदारों की स्थिति पर पड़ता है जो अन्तिम अवस्था में कार्यशील पूँजी को भी प्रभावित करता है।

(स) स्कन्ध स्थिति (Inventory Position) – प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को व्यापार संचालन हेतु कच्चे माल का या तैयार माल का स्कन्ध रखना पड़ता है। स्कन्ध में तरलता का अभाव रहता है। अतः इसमें लगायी गयी पूँजी कुछ समय के लिए बंधित हो जाती है। स्कन्ध की स्थिति कई कारकों से प्रभावित होती है। संक्षेप में, स्कन्ध स्तर की अधिकतम एवं न्यूनतम सीमाएँ, बिक्री का आवर्त निर्माण अवधि व बिक्री एवं निर्माण अवधि का अन्तराल आदि कारक स्कन्ध स्थिति को प्रभावित करते हैं।

6, व्यवसाय में मौसमी परिवर्तन (Seasonal Variations in the Business) – कुछ संस्थाएँ ऐसी होती हैं जिनका व्यापार संचालन मौसमी प्रकृति का होता है। अर्थात् एक मौसम से दूसरे मौसम में व्यवसाय की प्रकृति या मात्रा में परिवर्तनों से ये संस्थाएँ प्रभावित होती रहती हैं। ऐसी संस्थाओं के यहाँ मौसम में व्यापार संचालन हेतु कच्चा माल अधिक मात्रा में क्रय करना पड़ता है और साथ ही सभी मौसम की माँग को पूरा करने के लिए तैयार माल का स्कन्ध पर्याप्त मात्रा में रखना पड़ता है। दोनों दशाओं में स्पष्टतः अधिक पूँजी चालू सम्पत्तियों में लगानी पड़ती है और इस प्रकार इन संस्थाओं के यहाँ उस मौसम विशेष में कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

उक्त पंक्तियों में उन कारकों का वर्णन किया गया है जो कार्यशील पूंजी को प्रभावित करते हैं और इसलिए कार्यशील पूंजी का अनुमान लगाते समय इन्हें ध्यान में रखना आवश्यक होता है; परन्तु इन कारकों से भी अधिक महत्वपूर्ण चीज प्रबन्ध की योग्यता व क्षमता है, जो कार्यशील पूंजी को पर्याप्त सीमा तक प्रभावित करती है। उपर्युक्त कारकों के प्रति प्रबन्ध का दृष्टिकोण कारकों की प्रकृति की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। जोखिम उठाने को क्षमता, पूँजी संरचना का लचीलापन, लाभांश नीति, पूँजी का उचित स्रोत व क्रय-विक्रय सम्बन्धी साख नीति, आदि ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दक्ष प्रबन्ध अपनी कुशलता का परिचय देकर कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को अनुकूलतम एवं लाभदायी बनाए रख सकता है।

 

(a) वित्तीय सम-विच्छेद बिन्दु (Financial Break-Even-Point)

वित्तीय सम-विच्छेद बिन्दु ब्याज और करों से पहले कमाई का स्तर है जिसके परिणामस्वरूप शून्य शुद्ध आय या प्रति शेयर शून्य आय होगी। यह कम्पनी के ब्याज व्यय और पसंदीदा अंशधारकों और सम्बन्धित करों के लिए भुगतान किए गए लाभांश के बराबर है।

ब्याज व्यय और पसंदीदा लाभांश अनिवार्य भुगतान हैं इसलिए वे वित्तीय समविच्छेद विश्लेषण की गणना में सम्मिलित किए जाते हैं जबकि सामान्य लाभांश, वैकल्पिक होने के कारण बाहर रखा जाता है। परिचालन सम-विच्छेद बिन्दु विश्लेषण से ज्ञात होता है कि विक्रय के स्तर या विक्रीत इकाइयों को शून्य परिचालन आय में परिणाम की आवश्यकता होती है, अर्थात् ब्याज एवं करो से पूर्व की कमाई, वित्तीय समविच्छेद कम्पनी के आय विवरण के नीचे की रेखा से सम्बंधित होती है।

(b) समता अंश पूँजी निर्गमन समता का अंशधारियों की आय पर प्रभाव (Affect of issue of Equity Capital on Income of Equity Shareholders)

यदि कम्पनी समता अंश द्वारा अपनी अतिरिक्त वित्त की व्यवस्था करती है तो समता अंशधारियों पर इसका देखना भी बहुत आवश्यक है। यदि कम्पनी नये अंशों का निर्गमन विद्यमान अंशधारियों को अधिकार अंशों (Right Share) के माध्यम से करती है तो विद्यमान अंशधारियों की आय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, उनकी आय पूर्ववत ही बनी रहेगी। लेकिन यदि कम्पनी निर्गमन नये अंशधारियों को करती है तो विद्यमान अंशधारियों की आय में कमी होगी। क्योंकि कम्पनी की नई आय नये तथा पुराने दोनों अंशधारियों को समान रूप से वितरित की जाएगी।

(c) प्रक्षेपी चिट्ठा (Project Balance-Sheet)

एक अनुमानित बैलेंस सीट, जिसे प्रोफॉर्म बैलेंस शीट भी कहते हैं, एक निर्दिष्ट भविष्य के समय के लिए एक व्यवसाय की सम्पत्ति देनदारियों और समता पर विशिष्ट खाता शेष को सूचीबद्ध करता है।

प्रक्षेपी चिट्ठा भविष्य के अनुमान का सरलीकरण है और भविष्य में बेहतर परिणामों के लिए आपके व्यवसाय को आपकी सम्पत्ति का प्रबन्धन करने में मदद कर सकता है, यह आश्वासन दे सकता है कि भविष्य में आपके बिलों का भुगतान करने निवेशकों को रिटर्न प्राप्त करने और स्टॉक में अपने आविष्कारों को रखने की बात नहीं है। अगले 3-5 वर्षों के लिए अनुमानित चिट्ठा पर प्रमुख रूप से परिसम्पत्तियों और देनदारियों का हिसाब होना चाहिए। जैसे परिसम्पत्तियों में भवन, भूमि, मशीनरी और व्यावसायिक वाहन शामिल होंगे तो देनदारियों में ऋणों, ऋणपत्रों, लेनदारियों के हिसाब शामिल होंगे।

(d) स्टॉक लाभांश (Stock Dividend)

स्टॉक लाभांश, कम्पनियों द्वारा अंशधारियों को धन वितरित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला एक तरीका, मदद के बजाय अंश या स्टॉक के रूप में किया गया लाभांश भुगतान होता है। स्टॉक लाभांश मुख्य रूप से नकद लाभांश के स्थान पर दिया जाता है। जब कम्पनी के सामने नकदी अथवा तरलता की समस्या होती है, निदेशक मंडल यह निर्णय लेता है कि कब अंश या स्टॉक लाभांश घोषित किया जाए और किस रूप में लाभांश का भुगतान किया जाएगा।

(e) वर्तमान मूल्य विधि (Present Value Method)

वर्तमान मूल्य विधि के अन्तर्गत विनियोग पर किए गए व्ययों तथा उससे रोकड़ अन्तर्वार (Cash-In-Flows) के समय घटक को विशेष महत्त्व दिया गया है। इस विधि को बढ़त कटो रोकड़ प्रवाह पद्धति (Discounted Cash Flow Method) भी कहते हैं क्योंकि इसमें विनियोग से प्राप्त रोकड़ अन्तवाहों की एक निश्चित दर से कटौती भी की जाती हैं। वर्तमान मूल्य विधि आमतौर पर पूँजी निवेश करते समय अन्य तरीकों की तुलना में बेहतर निर्णय प्रदान करती है। यह पूँजी बजट परियोजनाओं की अधिक लोकप्रिय मूल्यांकन विधि कहलाती है।

वर्तमान मूल्यविधि भविष्य में प्राप्त होने वाले एक रुपये का मूल्य वर्तमान काल में एक रुपये से कम ही होगा। यह कमी कुछ अमौद्रिक कारणों को छोड़कर सामान्यतया ब्याज की दर पर निर्भर करती है, इसी अवधारणा पर आधारित है। इसमें विनियोग की लागत तथा कुल रोकड़ अन्तवाहों के बीच तुलना की जाती है।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Working Capital Decisions Numerical Question.

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Cost Capital Financing Decisions

Unit 4 Working Capital Decisions Mcom Notes
Unit 4 Working Capital Decisions Mcom Notes

 

 

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