Unit 1 Introduction Financial Management Mcom Notes

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Unit 1 Introduction Financial Management Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year introduction: Meaning, Nature, Scope and objectives of financial management, finance functions; time value of money: risk and return. [Introduction Financial Management Notes]

 

वित्तीय प्रबन्ध का अर्थ (Meaning of Financial Management)

‘वित्तीय प्रबन्ध’ शब्द दो शब्दों वित्तीय प्रबन्ध से मिलकर बना है। ‘वित्तीय’ शब्द का अर्थ हैं, व्यवसाय की मौद्रिक आवश्यकताओं को पूर्वानुमान लगाकर उसके आधार पर मौद्रिक साधनों की व्यवस्था करना। ‘प्रबन्ध’ शब्द का आशय किसी व्यावसायिक संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु भौतिक एवं मानवीय संसाधनों का नियोजन, संगठन, नियन्त्रण एवं समन्वयन करने से है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वित्तीय प्रबन्ध, प्रबन्ध की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत संस्था के वित्तीय कार्य का नियोजन, संगठन, निर्देशन एवं नियन्त्रण किया जाता है जिससे कि वित्तीय कार्यों का कुशल एवं प्रभावी संचालन किया जा सके। इस प्रकार वित्तीय प्रबन्ध, व्यावसायिक प्रबन्ध का एक कार्यात्मक क्षेत्र है तथा यह सम्पूर्ण प्रबन्ध का हो एक भाग होता है।

वित्तीय प्रबन्ध को प्रमुख विद्वानों ने निम्न प्रकार परिभाषित किया है-

(1) सोलोमन इजरा (Soloman Izra) के अनुसार, “वित्तीय प्रबन्ध से अभिप्राय एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक स्रोत अर्थात् पूँजी कोष के कुशलतम उपयोग से होता है।”

(2) हावर्ड एवं अप्टन (Howard and Upton) के अनुसार, “वित्तीय प्रबन्ध से तात्पर्य नियोजन एवं नियन्त्रण को वित्त कार्य पर लागू करना है।”

(3) वेस्टन तथा ब्रीघम (Weston and Brigham) के अनुसार, “वित्तीय प्रबन्ध निर्णय लेने का वह क्षेत्र है, जो व्यक्तिगत उद्देश्यों तथा उपक्रम के लक्ष्यों में एकरूपता स्थापित करता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन से स्पष्ट है-” वित्तीय प्रबन्ध व्यावसायिक प्रवन्ध का वह क्षेत्र है, जिसके अन्तर्गत व्यवसाय की वित्तीय क्रियाओं एवं वित्त कार्य का कुशल संचालन किया जाता है। इसके लिए नियोजन, आवंटन एवं नियन्त्रण के कार्य किए जाते हैं।”

 

वित्त उद्योग का जीवन रक्त है (Finance is the Life Blood of the Industry)

वित्त आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था का जीवन रक्त है यह समस्त क्रियाओं का आधार है। इसके अभाव में न तो उपक्रम को आरम्भ किया जा सकता है और न ही उसे सफलतापूर्वक संचालित किया जा सकता है। आवश्यकतानुसार पर्याप्त वित्त की व्यवस्था व्यावसायिक सफलता का मूल मन्त्र है। किसी भी व्यापार एवं उद्योग को चाहे यह बड़े पैमाने पर हो या छोटे पैमाने पर प्रारम्भ करने एवं उसके भावी विस्तार के लिए पर्याप्त वित्त की आवश्यकता होती है। वर्तमान समय में देश को औद्योगिक उन्नति वित्त प्रबन्ध पर ही निर्भर है। वित्त प्रबन्ध को उचित व्यवस्था के अभाव में अनेक औद्योगिक विकास की योजनाएँ मात्र कागजी योजनाएँ बनकर रह जाती हैं। जिस प्रकार एक इंजन को चलाने के लिए कोयले अथवा बिजली की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यापार एवं उद्योग को स्थापित करने तथा चलाने के लिए वित्त प्रबन्ध की आवश्यकता होती है। इसबैण्ड एवं डोकरे के अनुसार, “वित्तीय प्रबन्ध आज केवल वित्तीय साधन संगृहीत करने की एक विशेषज्ञ क्रिया मात्र नहीं है, अपितु सम्पूर्ण प्रबन्धकीय विज्ञान का एक अभिन्न अंग बन गया है- वित्तीय प्रबन्ध संसाधन एकत्रित करने के साथ-साथ उत्पादन, विपणन और उपक्रम में प्रत्येक निर्णयात्मक क्रिया से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होता है।”

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वित्तीय प्रबन्धक के कार्य (Functions of Financial Manager)

आधुनिक वित्तीय प्रबन्धक के कार्य निम्नलिखित हैं–

(A) वित्तीय विश्लेषण एवं प्रगति जाँच – वित्त प्रबन्धक का एक महत्त्वपूर्ण कार्य वित्तीय विश्लेषण करके निष्पत्ति बतलाना होता है। इस कार्य को सफलतापूर्वक करने के लिए वित्त प्रबन्धक निम्नलिखित कार्य करता है –

(i) वित्तीय पूर्वानुमान एवं नियोजन संस्था का वित्तीय विश्लेषण करके निष्पत्ति का मूल्यांकन करने के बाद वित्तीय पूर्वानुमान करके वित्तीय नियोजन करना होता है। वित्तीय पूर्वानुमान में विभिन्न चलों का पूर्वानुमान किया जाता है तथा उनको ध्यान में रखकर वित्तीय नियोजन किया जाता है।

(ii) वित्तीय विश्लेषण तथा निष्पत्ति मूल्यांकन – एक वित्त प्रबन्धक को किसी समय विशेष पर संस्था की वित्तीय स्थिति का विश्लेषण करके एक अवधि विशेष की निष्पत्ति का मूल्यांकन करना होता है। संस्था की वित्तीय स्थिति का विश्लेषण करके फर्म के पर्यावरण को जानना आवश्यक होता है। कभी संस्था का वित्तीय पर्यावरण अनुकूल तथा कभी प्रतिकूल होता है।

(iii) वित्तीय नियन्त्रण – वित्तीय नियोजन के बाद वित्त प्रबन्धक को वित्तीय नियन्त्रण करना होता है। वित्तीय नियन्त्रण हेतु विभिन्न प्रकार के बजटों एवं प्रमापों का निर्धारण किया जाता है। संस्था की वास्तविक निष्पत्ति का प्रमापित अथवा बजटेड निष्पत्ति के सन्दर्भ में मूल्यांकन किया जाता है। यदि प्रमापित निष्पत्ति एवं वास्तविक निष्पत्ति में सहन सीमा से अधिक विचलन होता है तो सुधारात्मक कार्यवाही की जाती है।

(B) वित्त व्यवस्था – वित्त व्यवस्था करना फर्म के वित्त प्रबन्धक का महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। इसके लिए वित्त प्रबन्धक को अनेक क्रियाएँ करनी होती हैं—

(i) वित्त प्रबन्धक को फर्म द्वारा अर्जित लाभ को अंशधारियों में लाभांश के रूप में बाँटने एवं संस्था में प्रतिधारित अर्जनों के रूप में रोकने के सम्बन्ध में भी निर्णय करना होता है।

(ii) वित्त प्रबन्धक को सम्भावित उपलब्ध वित्त साधनों का अध्ययन करके विभिन्न साधनों का आदर्श संयोग चुनना होता है, जिससे पूँजी की लागत न्यूनतम रहे।

(iii) आदर्श संयोग के चुनने के बाद विभिन्न साधनों से वित्त प्राप्त करने के लिए कार्य करना होता है। विभिन्न साधनों से वित्त प्राप्त करने की शर्ते, समय आदि का नियन्त्रण भी वित्त प्रबन्धक को करना होता है।

(C) विनियोजन – फर्म द्वारा विभिन्न साधनों से जो वित्त एकत्र किया जाता है, उसे विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों एवं परियोजनाओं में विनियोजित करना होता है। विनियोजन कार्य में प्रमुख रूप से निम्न क्रियाएँ शामिल होती है

(i) चालू सम्पत्तियों का प्रभावी प्रबन्ध करना आवश्यक होता है। वित्त प्रबन्धक को निर्धारित करना होता है कि रोकड़, विक्रयशील प्रतिभूतियाँ देनदार तथा सामग्री में कितना विनियोग हो? यदि इनका स्तर कम है तो उसे कैसे बढ़ाया जाए तथा किसी चालू सम्पत्ति में आवश्यकता से अधिक विनियोजन है तो उसको किस तरह से कम किया जाए?

(ii) पूँजी बजटन विनियोजन का एक मुख्य क्षेत्र है। विभिन्न परियोजनाओं को स्वीकार करने के मापदण्डों का चुनाव करना, अनिश्चितता के तत्त्व को जानना तथा उसे कम करना वित्त प्रबन्धक की योग्यता पर निर्भर करता है।

(iii) संविलयन, पुनर्निर्माण तथा समापन जैसी कार्यवाहियों की आवश्यकता हो तो उनकी शर्तों एवं प्रक्रिया के निर्धारण में वित्त प्रबन्धक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

वित्तीय कार्य का अन्य व्यावसायिक कार्यों से सम्बन्ध (Relation of Finance Functions to other Business Functions)

किसी भी व्यवसाय को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिस साधन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है वो होता है— वित्त वित्त ही वह शक्तिशाली साधन है जिसके द्वारा सभी व्यावसायिक क्रियाओं को सरलता से पूरा किया जा सकता है अतः वित्त का व्यावसायिक क्रियाओं के साथ अच्छा सम्बन्ध होना परम आवश्यक है। गुथमैन एवं ड्रगाल के शब्दों में, “वित्त समस्या क्रय, उत्पादन एवं विपणन समस्याओं से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होती है।”

डा० अजय गर्ग के अनुसार, “किसी भी व्यवसाय के लिए वित्त जीवनरक्त के समान है अर्थात् मनुष्य बिना रक्त जीवित नहीं रह सकता, वैसे ही बिना वित्त के व्यवसाया” वित्त का अन्य व्यावसायिक कार्यों से सम्बन्ध निम्नलिखित प्रकार है –

  1. वित्त और लेखाकर्म में सम्बन्ध (Relation of Finance to Accountancy) — वित्त और लेखाकर्म दोनों एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं। लेखाकर्म केवल नकद लेन-देनों का ही लेखा करता है बिना वित्तीय लेन-देनों का लेखा पुस्तकों में नहीं किया जाता है। वित्त विभाग को समस्त वित्तीय लेन-देनों का रिकार्ड लेखांकन विभाग द्वारा ही उपलब्ध कराया जाता है साथ ही वित्तीय विश्लेषण एवं निर्वाचन तथा विभिन्न तकनीकों के प्रयोग का आधार भी लेखांकन के आँकड़े ही होते हैं।
  2. वित्त और विपणन में सम्बन्ध (Relation of Finance to marketing) – वित्त और विपणन में भी घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। सम्पूर्ण विपणन योजनाएँ वित्त पर ही निर्भर करती हैं। आधुनिक समय में विपणन की नई-नई रणनीति एवं अनुसन्धान के लिए वित्त की आवश्यकता होती है जैसे- बाजार अनुसन्धान, परिवहन, वितरण प्रणाली, विज्ञापन एवं विक्रय संवर्धन नीति, माल की खरीद, ग्राहकों तक माल को पहुंचाने की व्यवस्था आदि इन सभी कार्यों के लिए वित्त की समुचित व्यवस्था करना भी विपणन प्रक्रिया का ही अंग है।
  3. वित्त और उत्पादन में सम्बन्ध (Relation of finance to Production) – किसी भी व्यावसायिक उत्पादन प्रक्रिया के लिए सामग्री, मजदूर, प्रत्यक्ष व्यय तथा अन्य साधनों की अत्यन्त आवश्यकता होती है जिसके बिना उत्पादन कार्य सम्भव नहीं होता। वर्तमान समय में तो आधुनिक औजारों व तकनीकों का प्रयोग काफी बढ़ गया है इसके लिए भी दीर्घकालीन पूँजीगत व्ययों की आवश्यकता होती है और इन सभी को प्राप्त करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। अतः उत्पादन और वित्त भी परस्पर एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
  4. वित्त और प्रबन्ध में सम्बन्ध Relation of Finance to Management) – वित्त और प्रबन्ध के बीच भी बहुत घनिष्ठता होती है। प्रबन्ध की सभी नीतियों के निर्धारण का प्रमुख आधार वित्त ही होता है। जैसे-सेविवर्गीय प्रबन्ध द्वारा कर्मचारियों की भर्ती प्रशिक्षण, मजदूरी भुगतान या श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्धारण अथवा सभी कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना आदि। इन सभी क्रियाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त वित्त की जरूरत होती है।

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वित्तीय प्रबन्ध के उद्देश्य (Objectives of Financial Management)

वित्तीय प्रबन्ध के उद्देश्य पर दो दृष्टिकोणों से विचार किया जाता है— प्रथम समष्टि अथवा व्यापक स्तर से द्वितीय व्यष्टि अथवा सूक्ष्म स्तर से समष्टि स्तर के दृष्टिकोण के अनुसार वित्तीय प्रबन्ध का उद्देश्य उपलब्ध साधनों के गहन, श्रेष्ठतम एवं कुशलतम प्रयोग द्वारा उपयोगी व उत्तम वस्तु या सेवा का सृजन करके उसे उचित मूल्य पर समाज को उपलब्ध कराना है, ताकि पूर्ण समाज उससे लाभान्वित हो सके। इसके विपरीत, सूक्ष्म अथवा व्यष्टि स्तर के दृष्टिकोण से एक फर्म या संस्था के व्यक्तिगत दृष्टिकोण के अनुसार वित्तीय प्रबन्ध के उद्देश्य का निर्धारण किया जाता है। एकल संस्था के दृष्टिकोण से वित्तीय प्रबन्ध के उद्देश्य के सम्बन्ध में दो विरोधी विचारधाराएँ दिखाई देती है

(अ) लाभ अधिकतमीकरण उद्देश्य (Profit Maximization Goal)

(ब) सम्पत्ति अधिकतमीकरण उद्देश्य (Wealth Maximization Goal)

(अ) लाभ अधिकतमीकरण उद्देश्य – वित्तीय प्रबन्ध का उद्देश्य संस्था के लाभ को अधिकतम करना है। संस्था द्वारा अर्जित लाभ उसकी उत्पादन, विक्रय एवं प्रबन्धकीय कार्यकुशलता का मापदण्ड माना जाता है। सभी व्यावसायिक उपक्रमों में लाभ अर्जित करने हेतु विनियोग किया जाता है और यह आशा की जाती है कि उपक्रम में विनियोजित पूँजी पर अधिकतम लाभ प्राप्त हो। अतः यह कह सकते हैं कि जब वित्तीय प्रबन्धक विनियोग, अर्थप्रबन्धन या अन्य सम्बन्धित निर्णयों पर विचार कर रहा हो, तो उसे उस विकल्प का ही चुनाव करना चाहिए, जिसको अपनाने से लाभ अधिकतम हो सके एवं जिनसे लाभ में कमी आती हो, उन्हें त्याग देना चाहिए। लाभ को अधिकतम करने के लिए सीमित साधनों से उत्पादन अधिकतम करना पड़ता है या एक निश्चित उत्पादन की मात्रा के लिए लागत न्यूनतम करनी पड़ती है। दूसरे शब्दों में, संस्था सीमित साधनों के प्रयोग में कुशलता व दक्षता का परिचय देती है। लाभ को अधिकतम बनाने के पीछे बहुत ही सरल तर्क है। संस्था की आर्थिक क्षमता व कुशलता को मापने के लिए लाभ को एक अच्छा मापदण्ड माना गया है। अत: लाभ के आधार पर किसी व्यावसायिक उपक्रम की कार्य निष्पत्ति का मूल्यांकन किया जा सकता है। व्यवसाय में प्राय: सभी निर्णय लाभोपार्जन के उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही किए जाते हैं। प्रबन्ध का कोई निर्णय सफल हुआ या नहीं, इसका मापना लाभ के आधार पर किया जा सकता है। वास्तव में लाभ ही सभी निर्णयों का मूल आधार है। अधिक लाभ होने पर ही एक उपक्रम विभिन्न सामाजिक कार्यों जैसे शिक्षा, चिकित्सा, श्रम कल्याण आदि पर व्यय करके समाज का अधिकतम कल्याण कर सकता है।

उपर्युक्त तकों के आधार पर व्यवसाय का अधिकतम लाभोपार्जन का उद्देश्य न्यायोचित होते हुए भी उसकी अनेक आलोचनाएँ की गई है। आधुनिक समय में अधिकतर विद्वानों का यह मानना है कि लाभ अधिकतम करने का उद्देश्य पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में ही प्राप्त किया जा सकता है। वित्तीय प्रबन्ध का लाभ अधिकतम करने का उद्देश्य वर्तमान व्यावसायिक परिस्थितियों में अनुचित एवं अनुपयुक्त हो गया है। मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार भी अधिकतम लाभ के विचार को शोषण का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि अब वित्तीय प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य लाभ अधिकतम करने के स्थान पर सम्पत्ति अधिकतमीकरण माना जाता है।

(ब) सम्पत्ति अधिकतमीकरण उद्देश्य – लाभ अधिकतमीकरण की कमियों और कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए कुछ विद्वानों का मत है कि वित्तीय प्रबन्ध का उद्देश्य सम्पत्ति को अधिकतम करना होना चाहिए। प्रोफेसर इजरा सोलोमन के अनुसार, किसी व्यवसाय के वित्तीय प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य उसकी सम्पदा को अधिकतम करना होना चाहिए। उनके अनुसार, यह एक ऐसा केन्द्र बिन्दु है, जिस पर व्यवसाय के अन्य सभी उद्देश्य निर्भर करते हैं। प्रो० इरविन फ्रेंड ने भी इसी मत का समर्थन करते हुए व्यवसाय का उद्देश्य विशुद्ध सम्पत्तियों के मूल्य में वृद्धि करना बताया है। विशुद्ध सम्पत्तियों में वृद्धि होने से विनियोग मूल्य बढ़ जाएँगे तथा इससे अंशों के बाजार मूल्य में वृद्धि होगी। अतः यह कह सकते हैं कि वित्तीय प्रबन्धक का उद्देश्य मूल्य या सम्पत्ति को अधिकतम करना होना चाहिए।

वान हार्न ने लिखा है कि सम अंशों का बाजार मूल्य भावी लाभों के वर्तमान मूल्य में से विनियोगों को प्रारम्भिक लागत निकालकर जो शुद्ध वर्तमान मूल्य बचता है, उसी से प्रभावित होता है। इस प्रकार मूल्य अधिकीकरण उद्देश्य के अनुसार व्यवसाय का संचालन इस प्रकार करना चाहिए कि अंशधारियों को अधिकतम शुद्ध वर्तमान मूल्य प्राप्त हो सके। शुद्ध वर्तमान मूल्य की गणना के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग कर सकते हैं –

NPV GPV of Future Cashflow – I

जहाँ NPV शुद्ध वर्तमान मूल्य

GPV= निश्चित दर पर डिस्काउण्टेड भावी रोकड़ बहाव

I = विनियोग की प्रारम्भिक लागत

यदि व्यवसाय संचालन के फलस्वरूप शुद्ध वर्तमान मूल्य शून्य से अधिक है, तो यह माना जाएगा कि स्वामियों की सम्पत्ति के वर्तमान मूल्य में वृद्धि हुई है। शून्य शुद्ध वर्तमान मूल्य इस बात का सूचक है कि सम्पत्ति के वर्तमान मूल्य में न तो वृद्धि हुई है और न ही कमी। यदि शुद्ध वर्तमान मूल्य ऋणात्मक है तो इसका अर्थ होगा कि सम्पत्ति के वर्तमान मूल्य में कमी आयी है।

संक्षेप में, सम्पत्ति के मूल्य को अधिकतम करने का सिद्धान्त विभिन्न वर्षों में प्राप्त होने वाली सम्भावित आय को एक निश्चित बट्टा दर पर कटौती करके समय मूल्य को भी मान्यता प्रदान करता है तथा जोखिम एवं अनिश्चितता की सीमा का भी विश्लेषण करता है जिसके अनुसार विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव सरलतापूर्वक किया जा सकता है। अतः कम्पनियों एवं निगमों के मूल उद्देश्य के रूप में सम्पत्ति अधिकतम करने के सिद्धान्त को स्वीकार किया जाता है।

Capital Budgeting Decisions Notes

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