Unit 5 Leadership Mcom Notes

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Unit 5 Leadership Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that Mcom 1st year Leadership: Concept, Leadership styles, Theories: Trait theory, Behaviour theory, Fielder’s contingency theory; Harsey and Blanchard’s situational theory; Managerial grid; Likert’s four systems of leadership. [ Leadership Mcom Notes Hindi ]

 

नेतृत्व का आशय (Meaning of Leadership)

 

नेतृत्व शक्ति के द्वारा एक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों का विशिष्ट विषय अथवा क्षेत्र में मार्गदर्शन करता है और उसके अनुसार अन्य लोग कार्य हेतु प्रेरित होते हैं। वास्तव में, एक अच्छा नेतृत्व अपने अनुयायियों को कार्य निष्पादन में आवश्यक प्रोत्साहन देता है एवं उन्हें कुशलता व सुरक्षा प्रदान करता है।

 

नेतृत्व की परिभाषाएँ (Definitions of Leadership)

 

चेस्टर बर्नार्ड के शब्दों में, “नेतृत्व व्यक्तियों के व्यवहार का वह गुण है, जिसके द्वारा वे लोगों या उनकी क्रियाओं को संगठित प्रयत्न का रूप देने के लिए पथ-प्रदर्शन करते हैं।’ कूण्ट्ज तथा ओ डोनेल के अनुसार, “किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सन्देशवाहन के माध्यम द्वारा व्यक्तियों को प्रभावित कर सकने की योग्यता नेतृत्व कहलाती है।”

 

अल्फोर्ड एवं बीटी के शब्दों में, “नेतृत्व वह गुण है, जिसके द्वारा स्वेच्छापूर्वक तथा बिना किसी दबाव के एक समूह से कोई वांछित कार्य करवाया जाता है। अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि औद्योगिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए सम्प्रेषण के माध्यम से लोगों को प्रभावित कर सकने का गुण ही नेतृत्व कहलाता है।

 

नेतृत्व की शैलियाँ (Styles of Leadership)

 

नेतृत्व की विभिन्न शैलियाँ दृष्टिगत होती हैं। उद्योग क्षेत्र में भी अनेक प्रकार की शैलियाँ दिखाई पड़ती हैं। प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित हैं—

I, पर्यवेक्षणीय नेतृत्व शैली (Supervisory Style of Leadership)

 

नेतृत्व की पर्यवेक्षणीय शैली निम्नलिखित दो प्रकार की होती है –

 

1, उत्पादन प्रधान नेतृत्व शैली (Production-oriented Style of Leadership) – इस शैली में प्रबन्धक उत्पादन वृद्धि की ओर अपना अधिक ध्यान लगाता है। प्रबन्धक यह मानकर चलता है कि उत्पादन की नवीनतम तकनीकों एवं विधियों को अपनाकर तथा कर्मचारियों को निरन्तर काम पर लगाकर संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

 

2, कर्मचारी प्रधान नेतृत्व शैली (Employees-oriented Style of Leadership) – इस शैली में प्रबन्धक अपने अधीनस्थ कर्मियों को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। वह उनकी इच्छाओं, आकांक्षाओं, रुचियों, आवश्यकताओं, सुविधाओं एवं भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए कार्य की दशाओं और वातावरण में निरन्तर सुधार के लिए प्रयत्नशील रहता है। इन क्रियाओं के द्वारा कर्मियों में नई ऊर्जा का संचार होता है और वे अधिक उत्साह से कार्य में संलग्न हो जाते हैं।

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II, नेतृत्व की शक्ति शैलियाँ (Power Styles of Leadership)

 

शक्ति के आधार पर नेतृत्व की निम्नलिखित शैलियाँ प्रचलित हैं—

 

1, परामर्शात्मक नेतृत्व शैली (Consultative Style of Leadership) – नेतृत्व को इस शैली में सन्देशवाहन ऊर्ध्वगामी तथा अधोगामी दोनों ही प्रकार का होता है। संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति का उत्तरदायित्व सामान्य होता है, किन्तु उपक्रम की व्यापक नीतियों का निर्धारण उच्च स्तर पर किया जाता है। इस शैली के अन्तर्गत नेतृत्व अपने कर्मचारियों पर काफी विश्वास करता है। एक प्रकार से नेतृत्व के द्वारा अधीनस्थों को ऊर्जा प्राप्त होती है तथा नई प्रेरणाएँ प्राप्त होती रहती हैं।

 

2, निरंकुश नेतृत्व शैली (Authoritarian Style of Leadership) – इस शैली में प्रबन्धक या संचालक समस्त शक्ति को अपने में ही केन्द्रित रखते हैं तथा प्रतिनिधायन में विश्वास नहीं करते हैं। वे स्वयं ही निर्णय करते हैं, नीतियों का निर्धारण करते हैं तथा स्वयं ही कार्य सम्बन्धी आदेशों और निर्देशों का प्रसारण अधीनस्थों में करते हैं।

 

3, निर्वाध या स्वतन्त्रतावादी नेतृत्व शैली (Laissez-faire or Free Rein Style of Leadership) – नेतृत्व की इस शैली में प्रबन्धक प्रशासनिक नीतियों के निर्धारण में अपने अधीनस्थों को स्वतन्त्रतापूर्वक सुझाव देने का अवसर प्रदान करते हैं तथा उनके सुझावों को समन्वित ढंग से लागू करते हैं। इसमें अनुयायी स्वयं अपने-अपने कार्य की सीमाएँ निश्चित करके उनकी प्राप्ति हेतु नीतियों के निर्धारण में सहयोग देते हैं।

 

4, जनतन्त्रीय नेतृत्व शैली (Democratic Style of Leadership) – कभी-कभी प्रबन्धक अपने अनुयायियों से प्राप्त सुझावों और विचारों में आवश्यक और उपयोगी परिवर्तन एवं संशोधन करके ही नीतियों एवं कार्य-पद्धतियों का निर्धारण कर लेता है। इस शैली में प्रबन्धक या संचालक की भूमिका समन्वयकारी होती है। नेतृत्व की यह शैली अधिकारों के भारार्पण तथा विकेन्द्रीकरण पर आधारित है।

 

5, सहभागी नेतृत्व शैली (Participative Style of Leadership) – इस शैली में संगठन के कर्मियों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाती है। इसमें सुझाव आमन्त्रित किए जाते हैं। तथा निर्णय के समय कर्मियों की भागीदारी भी रहती है। इस शैली में विभिन्न वित्तीय एवं अवित्तीय अभिप्रेरणाओं तथा पुरस्कारों की घोषणा करके अधीनस्थों को अभिप्रेरित करने का प्रयास किया जाता है। नेतृत्व की इस शैली में भारार्पण ऊर्ध्वगामी अधोगामी तथा समतल तीनों प्रकार का होता है।

 

6, हितकारी निरंकुश नेतृत्व शैली (Benevolent Authoritarian Style of Leadership) – इस शैली के अनुसार प्रबन्धक का व्यवहार कुछ विनम्र होता है और वह अपने अनुयायियों पर विश्वास करता है। कर्मचारियों से उनके सुझाव प्राप्त किए जाते हैं, लेकिन नेतृत्व द्वारा ही सर्वोच्च तथा अन्तिम निर्णय लिया जाता है।

 

7, शोषक निरंकुश नेतृत्व शैली (Exploitative Authoritarian Style of Leadership) – प्रबन्धकीय नेतृत्व की इस प्रकार की शैली में अधीनस्थ कर्मचारी न तो अपने उच्चाधिकारी से काम के सम्बन्ध में खुलकर वार्त्ता कर सकते है और न ही उनसे किन्हीं सुझावों की अपेक्षा की जा सकती है।

 

III, अभिप्रेरणात्मक नेतृत्व शैलियाँ (Motivational Styles of Leadership)

 

नेतृत्व अभिप्रेरणात्मक शैलियाँ दो प्रकार की होती हैं, जिनका वर्णन निम्नवत् हैं—

 

1, धनात्मक अभिप्रेरण शैली (Positive Motivation Style) – नेतृत्व की इस शैली में प्रेरणा, पुरस्कार एवं सहभागी निर्णयन के माध्यम से संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रयास किए जाते हैं। अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि जब नेता अपने सहायकों को अधिक कार्य करने पर वित्तीय और अवित्तीय प्रेरणाएँ प्रदान करने की घोषणा करता है तो ऐसे धनात्मक या सकारात्मक लाभ प्राप्त होने के कारण वे अधिकाधिक परिश्रम और लगन से कार्य करने लगते हैं।

 

2, ऋणात्मक अभिप्रेरण शैली (Negative Motivation Style) – नेतृत्व की इस शैली को अधिक कारगर नहीं माना गया है। इस शैली में नेतृत्व द्वारा कर्मियों को अल्पावधि के लिए ही प्रेरित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, इस शैली द्वारा श्रमिक सन्तुष्टि तथा औद्योगिक शान्ति के वातावरण की स्थापना भी असम्भव है। इस दृष्टि से ऋणात्मक अभिप्रेरण की इस शैली को यथासम्भव व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए।

 

विभिन्न प्रकार की इन शैलियों के साथ ही कुछ अन्य शैलियाँ भी हैं; जैसे— व्यक्तिगत नेतृत्व शैली, अव्यक्तिगत नेतृत्व शैली, क्रियात्मक तथा पैतृक नेतृत्व शैली आदि, लेकिन व्यावहारिक रूप से ये सभी शैलियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं, इनमें किसी प्रकार का स्थायी भेद नहीं है।

 

एक सफल नेता के गुण अथवा नेतृत्व के गुण (Qualities of Successful Leader or Qualities of Leadership)

 

सफल नेतृत्व किसी भी उपक्रम की आधारशिला है। नेतृत्व की किस्म पर ही व्यवसाय की सफलता या असफलता निर्भर करती है। अत: एक नेता में कुछ गुणों का होना आवश्यक है। विभिन्न विद्वानों ने एक सफल नेता के लिए निम्नलिखित आवश्यक गुण बताए हैं

 

ओर्डवे टीड (Ordway Tend) के अनुसार एक अच्छे नेता में निम्नलिखित दस गुण होने चाहिए–(1) शारीरिक एवं स्नायुशक्ति, (2) उद्देश्य एवं दिशा की चेतनता, (3) उत्साह, (4) मैत्रीभाव एवं स्नेह, (5) तकनीकी क्षमता, (6) बौद्धिक चातुर्य, (7) चरित्र निष्ठा, (8) शिक्षण क्षमता (9) निर्णयन क्षमता तथा (10) विश्वसनीयता |

 

जॉर्ज आर टैरी (George R, Terry) ने नेता के केवल आठ प्रमुख गुण बताए हैं- (1) शक्ति, (2) भावनात्मक स्थिरता (3) अभिप्रेरणा, (4) व्यक्तिगत सामाजिक योग्यता, (5) सम्प्रेषण योग्यता, (6) शिक्षण योग्यता, (7) मानवीय सम्बन्धों का ज्ञान, (8) तकनीकी दक्षता |

 

हेनरी फेयोल के अनुसार एक सफल नेता में ये गुण होने चाहिए

 

(1) स्वास्थ्य एवं शारीरिक क्षमता, (2) योग्यता एवं मानसिक सन्तुलन, (3) नैतिक गुण, (4) ज्ञान एवं (5) प्रबन्धकीय योग्यता।

 

निष्कर्षत: एक सफल नेता में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

 

1, साहस (Courage) – एल०एफ० उर्विक के अनुसार एक सफल नेता में साहस का गुण होना चाहिए। उनके अनुसार एक नेता जिन कार्य एवं क्रियाओं को सही मानता है, उन्हें करने का नैतिक साहस होना चाहिए, निर्णय लेने एवं उन्हें लागू कराने की दृढ़ता होनी चाहिए। नेता ही सत्यता के पथ से विचलित नहीं होता है, अपने चापलूस अनुयायियों के चंगुल में भी नहीं फँसता है।

 

2, आत्मविश्वास (Self-confidence) – एक सफल नेता के लिए आत्मविश्वास का गुण होना चाहिए। यह आत्मविश्वास अन्य तथ्यों के अलावा आत्मज्ञान पर आधारित होना चाहिए। एक नेता में आत्मविश्वास है तो वह दूसरों का विश्वास जीतने में सफल हो जाता है। इस सन्दर्भ में उर्विक के अनुसार, “अनुयायियों का पूर्ण विश्वास प्राप्त करने के लिए नेता में आत्मविश्वास होना चाहिए।

 

3, योग्यता एवं तकनीकी ज्ञान (Intelligence and Technical Competence) – एक नेता में अपने अनुयायियों से अधिक योग्यता एवं तकनीकी सामर्थ्य होनी चाहिए। योग्य नेता संगठन में उत्पन्न समस्याओं को समझकर उपयुक्त हल निकाल सकता है और अनुयायियों को अच्छा मार्गदर्शन भी दे सकता है। इसके अतिरिक्त नेता में पर्याप्त तकनीकी सामर्थ्य, आर्थिक, वैधानिक एवं वित्तीय आदि क्षेत्र का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए।

 

4, सम्प्रेषण की योग्यता (Ability of Communication) – नेता का मुख्य कार्य अपने अनुयायियों एवं दूसरे व्यक्तियों को सूचनाओं, आदेशों एवं विचारों आदि का सम्प्रेषण करना होता है। अतः उसमें अनुयायियों को मुख्यतया निर्देश देने और सामान्य जनता को आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करने की योग्यता होनी चाहिए। नेता द्वारा अनुयायियों को निर्देश देना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु इनका पालन कराना भी आवश्यक है।

 

5, स्फूर्ति एवं सहिष्णुता (Vitality and Endurance) – एक नेता में स्फूर्ति एवं सहिष्णुता होना भी आवश्यक है। यहाँ स्फूर्ति का अर्थ चैतन्यता या सजगता से है और सहिष्णुता से आशय संकटकालीन परिस्थितियों में धैर्य से कार्य करने से है, इसलिए एक नेता को सदैव भावी परिस्थितियों से सजग रहना चाहिए तथा विपत्तियों एवं कठिनाइयों से अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए।

 

6, मानसिक क्षमता (Mental Capacity) – एक नेता में विकसित मानसिक क्षमता का होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त नेता का मस्तिष्क इतना लोचशील एवं सक्षम भी होना चाहिए कि वह परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार अपने विचारों में परिवर्तन कर सके इसलिए मानसिक दृष्टि से विकसित खुले विचार रखने वाला नेता ही द्वेषरहित परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल सभी स्वीकार योग्य निर्णय ले सकता है।

 

7, प्रेरित करने की योग्यता (Ability to Inspire) – एक नेता में अपने अनुयायियों को कार्य करने के लिए प्रेरित करने की योग्यता भी होनी चाहिए। योग्य एवं अनुभवी नेता निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अनुयायियों की रुचियों, विचारों, भावनाओं एवं आवश्यकताओं आदि का अध्ययन करके और अनुयायियों को आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करके कार्य हेतु प्रेरित कर सकता है। इस प्रकार एक नेता अनुयायियों पर प्रभाव रखकर उनको प्रेरित करने में सफल होता है।

 

8, मानवीय पहलू के साथ व्यवहार करने की योग्यता (Ability to Deal with Human Aspects) – एक नेता में अन्य गुणों के साथ-साथ मानवीय पहलू से अच्छा व्यवहार करने की योग्यता भी होनी चाहिए। उसे अनुयायियों की रुचियों, भावनाओं, उद्देश्यों, क्षमताओं एवं कमियों आदि का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ताकि वह अपने अनुयायियों के साथ अच्छे सम्बन्धों की स्थापना कर सके।

 

9, उत्तरदायित्व की भावना (Sense of Responsibility) – एक अच्छे नेता में उत्तरदायित्वों को निभाने की भावना भी होनी चाहिए, अन्यथा वह अधिकारों का दुरुपयोग करेगा। इसके अतिरिक्त अनुयायियों को दिए गए आवश्यक निर्देशों के प्रति भी सदैव उत्तरदायी होना चाहिए।

 

10, स्वस्थ निर्णय लेने की क्षमता (Capacity of Sound Decision making) – एक नेता में सुदृढ़ निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए, जिसे केवल आत्मविश्वास एवं आत्मनियन्त्रण से प्राप्त किया जा सकता है। एक नेता को किसी समस्या के विभिन्न समाधानों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन करना होता है। यह चयन (निर्णय) उसे वर्तमान एवं भावी दोनों परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करना होता है।

 

 

नेतृत्व की विभिन्न विचारधाराएँ  Different Theories of Leadership

 

 

जिनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं—

 

(A) नेतृत्व की गुणमूलक विचारधाराएँ,

(B) नेतृत्व की आचरणिक विचारधारा,

(C) प्रबन्धकीय ग्रिड तथा नेतृत्व शैलियाँ,

(D) लिकर्ट की प्रबन्ध नेतृत्व की प्रणालियाँ,

(E) फिडलर की नेतृत्व सम्भाव्यता विचारधारा,

(F) हसें तथा ब्लैंचर्ड की पारिस्थितिक नेतृत्व विचारधारा।

 

(A) नेतृत्व की गुणमूलक विचारधाराएँ (Trait Theories of Leadership)

 

नेता के व्यक्तिगत गुणों पर आधारित विचारधाराओं को ही नेतृत्व की गुणमूलक विचारधाराएँ कहा जाता है।

 

1, महान् व्यक्तित्व (Great Personality) – इस विचारधारा के अनुसार, नेतृत्व क्षमता अर्जित नहीं की जाती, अपितु यह जन्म से ही व्यक्ति में विद्यमान होती है। जन्म से ही नेतृत्व क्षमता के धनी व्यक्तियों में सुभाषचन्द्र बोस, स्वामी दयानन्द सरदार पटेल जैसे महापुरुष अग्रणी रहे हैं।

 

2, गुण विकास (Trait Development) – इस विचारधारा की मान्यता यह है कि नेतृत्व गुण विशिष्ट प्रकृति के होते हैं, जिन्हें शिक्षा व प्रशिक्षण द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। विभिन्न शोध निष्कर्षों के अनुरूप नेतृत्व में निम्नलिखित विशिष्टताओं का होना आवश्यक है—

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(i) गुण (Merit) – इनमें आत्मविश्वासी, उत्तरदायी, तनाव की विषम स्थिति में भी धैर्यवान्, परिस्थिति के अनुरूप स्वीकार्य, वातावरण के प्रति जागरूक, विद्वान्, बुद्धिमान, परिपक्व, सामाजिक, कूटनीतिज्ञ आदि प्रमुख हैं। (ii) कौशल (Skills)- इनमें चातुर्य, सृजनात्मकता, वक्तृत्व-शक्ति, समूह ज्ञान, प्रभावशीलता, सामाजिकता, कूटनीतिज्ञता आदि प्रमुख हैं। (iii) क्षमता (Capacity)- प्रबन्ध विशेषज्ञ डब्ल्यू०जी० बेनिस ने अपने अध्ययन मेंनेतृत्व में निम्नलिखित क्षमताओं का होना पाया है (अ) अनुयायियों का ध्यान आकर्षित करने की क्षमता रखने वाला। (ब) दिए गए वचन पर खरा उतरने वाला। (स) समय के अनुसार समझ का विकास करने की सामर्थ्य होना। (द) अपनी परिस्थितियों तथा साथियों की कमियों एवं परेशानियों को समझने की सामर्थ्य का होना।

 

3, ‘एक्स’ तथा ‘वाई’ विचारधारा (Theory of ‘X’ and ‘Y’) – डगलस मैकग्रेगर ने नेतृत्व के गुणों को नकारात्मक व सकारात्मक दो प्रधान तत्त्वों पर आधारित किया है, जिन्हें उसने क्रमश: ‘एक्स’ तथा ‘वाई’ तत्व की संज्ञा दी है। इस विचारधारा का ‘एक्स’ (X) तत्त्व, अनुयायियों के नकारात्मक पहलू द्वारा नेतृत्व की व्याख्या करता है, जिसमें नेता अपने अनुयायियों को भय दिखाकर, डरा-धमकाकर नेतृत्व प्राप्त करता है। कार्य से बचने वाले व्यक्ति, सुरक्षा के प्रति अति जागरूक व्यक्ति, यान्त्रिक रूप से कार्य करने वाले व्यक्ति डर, भय या सुरक्षा कारणों से किसी सशक्त व्यक्ति को नेता स्वीकार कर लेते हैं। इस विचारधारा का ‘वाई’ (Y) तत्त्व अनुयायियों के सकारात्मक पहलू द्वारा नेतृत्व की व्याख्या करता है, जिसमें नेता अपने अनुयायियों के सम्बन्ध में सकारात्मक अभिवृत्ति रखते हैं तथा उनकी अच्छाइयों को परखकर, उभारकर अपने नेतृत्व को कायम रखते हैं।

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(B) नेतृत्व की आचरणिक विचारधारा (Behavioural Theory of Leadership)

 

इस विचारधारा के अनुसार, व्यक्ति का अपना व्यवहार ही उसे नेतृत्व के गुणों की प्राप्ति कराता है, अत: हम कह सकते हैं कि नेतृत्व का गुण जन्मजात नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आता है, वह उसके व्यवहार से प्रभावित होता है तथा स्वतः ही उसे नेता मान लेता है। आयोवा, रोनाल्ड लिपिट, आर० के० व्हाइट, आर०आर० ब्लैक, जे०एस० माउटन आदि शोधकर्ताओं ने आचरणिक विचारधारा पर अध्ययन कर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले हैं—

 

(1) नेता पैदा नहीं होते वरन् बनाए जाते हैं।

(2) बहुआयामी नेतृत्व का धनी व्यक्ति ही नेता होता है।

(3) नेता की छोटी भूल नेतृत्व को नकार देती है।

(4) नेतृत्व की प्रभावशीलता समयानुसार बदलती रहती है।

(5) नेतृत्व व्यवहार, शिक्षा व प्रशिक्षण से विकसित किया जा सकता है।

(6) व्यवहारगत परिणाम ही उसे नेतृत्व शक्ति प्रदान करते हैं।

(7) सबको साथ लेकर चलने की मनोवृत्ति नेतृत्व को विकसित करती है।

(8) व्यक्ति की मनोवृत्ति ही उसमें नेतृत्व विकसित करती है।

(9) विशिष्ट व्यवहार के द्वारा ही नेता अपनी अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है।

(10) व्यक्ति के क्रियाकलापों का लोगों पर प्रभाव पड़ता है। ये प्रभावित क्रियाकलाप हो। उसे नेतृत्व शक्ति प्रदान करते हैं।

(11) समयानुकूल अवसर ही निर्णय क्षमता को प्रभावी बनाते हैं।

(12) अनुयायियों की आवश्यकता की सन्तुष्टि पर नेता को ध्यान देना पड़ता है।

(13) सक्रियता नेतृत्व को प्रभावशाली बनाती है, जबकि निष्क्रियता नेतृत्व को कम करती है।

 

उपर्युक्त समस्त बिन्दुओं से स्पष्ट होता है कि व्यक्ति की व्यावहारिक निपुणता ही उसे नेतृत्व क्षमता से भूषित करती है। व्यक्ति में यह क्षमता जितनी अधिक विकसित होती जाएगी, उतनी ही उसकी नेतृत्व शक्ति सुदृढ़ता को प्राप्त करती जाएगी।

 

(C) प्रबन्धकीय ग्रिड तथा नेतृत्व शैलियाँ (Managerial Grid and Leadership Styles)

 

प्रबन्धकीय ग्रिड विचारधारा का विकास 1960 ई० में किया गया था। नेतृत्व शैलियों विकास निम्नलिखित दो तत्त्वों के आधार पर किया गया –

 

(1) कार्य अथवा उत्पादन सम्बद्ध

(2) व्यक्ति अथवा सम्बन्ध सम्बद्ध

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उपर्युक्त तत्त्वों के संयोजन के आधार पर निम्नलिखित नेतृत्व शैलियाँ होती हैं-

 

1, दलीय प्रबन्ध (Team Management) – यह नेतृत्व की शीर्ष स्थिति है, जिसमें कार्य व कारक दोनों पर पूरा ध्यान देकर निष्पादन के परिणाम व गुणवत्ता में वृद्धि होती है तथा कर्मचारियों का भी मनोबल ऊँचा रहता है। इस प्रणाली द्वारा कर्मचारियों में विश्वास उत्पन्न होता है तथा नेतृत्व के प्रति पूर्ण निष्ठा प्रकट की जाती है।

 

2, संगठन व्यक्ति प्रबन्ध (Organization Man Management) – इस शैली के अन्तर्गत कार्य निष्पादन व कार्य निष्पादक के मध्य सन्तुलित रहकर प्रबन्ध कार्य किया जाता है अर्थात् कार्य श्रेष्ठ हो और कर्मचारी सन्तुष्ट रहे। नेतृत्व प्रदान करने के लिए दोनों तत्त्वों में सामंजस्य की अवस्था स्थापित होती है तथा कुशल नेतृत्व का विकास होता है।

 

3, देशी संघ प्रबन्ध (Country Club Management) – जब नेतृत्व का अपने कर्मचारियों या अनुयायियों से मित्रवत् व्यवहार हो, पारस्परिक सम्बन्धों पर विशिष्ट ध्यान दिया जाता हो तथा सभी कर्मचारी मिलजुलकर समस्त कार्य को करते हों, लेकिन कार्य की गुणवत्ता व कार्य के उचित निष्पादन पर कम ध्यान केन्द्रित किया जाता हो तो इस शैली को देशी-संघ के रूप में जाना जाता है।

 

4, सत्ता प्रबन्ध (Authoritative Management) – इस शैली के अन्तर्गत नेतृत्व सत्ता अपने आदेशों के अनुपालन पर विशेष ध्यान केन्द्रित करती है परिणामस्वरूप उत्पादन भी कार्यकुशलता के साथ किया जाता है। कार्यकुशलता को प्राप्त करने हेतु पारस्परिक सम्बन्धों अथवा मानवीय मूल्यों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है।

 

5, निम्नस्तरीय प्रबन्ध (Poor Management) – जब संगठन के नेतृत्व द्वारा व्यक्ति और उत्पादन दोनों पर ही कम ध्यान दिया जाए अर्थात् वह उत्पादन वृद्धि तथा पारस्परिक सम्बन्धों के विकास पर न्यूनतम ध्यान दे, तब उसे निम्नस्तरीय प्रबन्ध कहा जाता है। ऐसे नेतृत्व में कार्य उत्पादकता न्यून स्तर पर होती है। इन समस्त शैलियों में दलीय प्रबन्ध शैली को विशिष्ट महत्त्व प्रदान किया गया है। इसका कारण यह है कि यह शैली कर्मचारियों तथा उत्पादन दोनों के लिए ही लाभदायक है तथा इसके परिणाम अन्य शैली के सापेक्ष अधिक अच्छे रहते हैं। इसमें प्रबन्धन तथा कार्मिक वर्ग के मध्य सर्वाधिक मधुरता दिखाई देती है।

 

(D) लिकर्ट की प्रबन्ध नेतृत्व की प्रणालियाँ (Likert’s Systems of Management Leadership)

 

लिकर्ट ने अपने अध्ययन व शोध द्वारा नेतृत्व क्षमता की विभिन्न प्रणालियों के सम्बन्ध में विस्तृत रूप से बताया है। उनके अनुसार प्रबन्ध नेतृत्व की विभिन्न प्रणालियों द्वारा कार्य निष्पादन के परिणाम अलग-अलग प्राप्त होते हैं। नेतृत्व प्रणाली की चार कोटियों का विवरण निम्नलिखित रूप में है

 

1, शोषणात्मक निरंकुश नेतृत्व (Exploitative Autocratic Leadership) – इस प्रणाली के मुख्य लक्षण निम्न प्रकार है –

 

(i) ऊपरी नेतृत्व की निरंकुशता पूरी तरह से हावी रहती है।

(ii) उत्पादन लक्ष्यों का निर्धारण भी ऊपरी नेतृत्व के द्वारा ही किया जाता है।

(iii) भय, डर, असुरक्षा, चेतावनी आदि से कर्मचारियों पर नेतृत्व स्थापित किया जाता है। (iv) इसमें नियन्त्रण की सम्पूर्ण प्रक्रिया का केन्द्रीकरण कर दिया जाता है।

(v) अधीनस्थों से विचार-विमर्श तथा उनके सुझाव आदि को ध्यान में नहीं रखा जाता है।

(vi) कर्मचारियों के शोषण की पूर्ण आशंका बनी रहती है तथा उनकी आवश्यकता का न्यूनतम हिस्सा ही पूर्ण हो पाता है।

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2, उदार निरंकुश नेतृत्व (Benevolent Autocratic Leadership) – इस प्रणाली में नेतृत्व निरंकुश होता है, परन्तु शोषणकारी नहीं होता। इसमें कर्मचारियों के प्रति कुछ सीमा तक उदार रवैया अपनाया जाता है जिसके कुछ विशिष्ट लक्षण निम्नलिखित हैं –

 

(i) कार्य स्वतन्त्रता सीमित स्तर पर होती है, परन्तु कर्मियों की शारीरिक व सामाजिक आवश्यकताओं को सन्तुष्ट किया जाता है।

(ii) दण्ड, भय व पुरस्कार का मिलाजुला रूप अभिप्रेरणा का कार्य करता है।

(iii) अधिकांशतः नियन्त्रण प्रक्रिया केन्द्रीकृत होती है, परन्तु कभी-कभी अधीनस्थों से सुझाव भी प्राप्त कर लिए जाते हैं।

(iv) इसमें समस्त निर्णय ऊपर से ही नहीं थोपे जाते हैं, अपितु निचले स्तर पर भी निर्णय लिए जाते हैं।

(v) निर्णयन व लक्ष्य निर्धारण उच्च स्तर पर ही होते हैं, यदि नेतृत्व चाहे तब वह नीचे के कर्मचारियों के विचार स्वयं जान लेता है।

 

3, सलाहकारी या सहभागी नेतृत्व (Consultative or Participative Leadership) – सलाह अथवा सहभागिता से नेतृत्व तथा प्रबन्ध किया जाता है। इस नेतृत्व प्रणाली में सहकर्मियों के सुझावों को ध्यान में रखा जाता है। इस प्रणाली के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं—

 

(i) कर्मचारियों की शारीरिक व सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर उन्हें अभिप्रेरित किया जाता है।

(ii) पद व प्रतिष्ठा द्वारा कार्य निष्पादन स्तर में सुधार के प्रयास किए जाते हैं।

(iii) निर्णय उच्च स्तर के होने पर भी सहकर्मियों के सुझावों को ध्यान में रखा जाता है।

(iv) प्रायः प्रबन्ध नेतृत्व निर्णय लेते समय अधीनस्थों से विचार-विमर्श करते हैं।

(v) इसमें विश्वास की भावना का संचार होता है तथा दोनों पक्ष एक-दूसरे का पूर्ण सहयोग लेते रहते हैं। इसमें स्तरीकरण की अवस्था कम होती है।

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4, प्रजातान्त्रिक नेतृत्व (Democratic Leadership) – वर्तमान समय में इस नेतृत्व व्यवस्था का विस्तार अधिकाधिक होता जा रहा है। इस नेतृत्व व्यवस्था के प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं

 

(i) औपचारिक प्रकार के संगठनों की संख्या असीमित होती है।

(ii) नेतृत्व अपने सहकर्मियों पर विश्वास करता है।

(iii) सहकर्मियों से विचार-विमर्श के उपरान्त ही निर्णय लिए जाते हैं।

(iv) कार्य निष्पादन का परिणाम व स्तर मध्यमवर्गीय होता है।

(v) मौद्रिक, सुरक्षात्मक तथा प्रतिष्ठात्मक विधियों से कर्मचारियों को अभिप्रेरित किया जाता है।

(vi) इसमें कर्मचारियों की पूरी सन्तुष्टि बनी रहती है तथा उनकी सहभागिता को पूरा महत्त्व प्रदान किया जाता है।

(vii) सम्प्रेषण तथा अन्तर्व्यवहार चतुर्दिक होता है।

 

लिकर्ट के अनुसार, नेतृत्व शैली एक आकस्मिक तत्त्व है तथा कार्य निष्पादन की श्रेष्ठता उसका परिणामी तत्त्व है, परन्तु इसमें केवल कारण व परिणाम का प्रत्यक्ष या सीधा सम्बन्ध नहीं होता वरन् इसमें बीच के तत्त्व; यथा— किया जाता है। कर्मियों की निष्ठा, मनोवृत्ति व आत्मबल को भी शामिल

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(E) फिडलर की नेतृत्व सम्भाव्यता विचारधारा (Fiedler’s Contingency Theory of Leadership)

 

फिल्डर के शब्दों में, “नेतृत्व को परिस्थिति के अनुरूप अपनी शैली में परिवर्तन करना होता है अथवा भिन्न-भिन्न शैलियों को परिस्थितियों के अनुसार प्रयोग करना पड़ता है। ”

 

फिडलर ने अपने नेतृत्व सम्भाव्यता मॉडल में तीन तत्त्वों नेता, परिस्थिति व अनुयायी–के मिलान को नेतृत्व का आधार बनाया है। इन तीनों तत्त्वों में सामंजस्य की स्थापना के लिए नेतृत्व को कुछ विशिष्टताओं को अपनाना पड़ता है, जिनका विवरण निम्न प्रकार है

 

1, नेतृत्व शैली का स्वयं आकलन (Understanding about Leadership) – फिडलर के दृष्टिकोण के अनुसार नेतृत्व को स्वयं अपनी शैली का विश्लेषण व आकलन करना होगा। इसके लिए फिडलर ने ‘न्यून अधिमानित सहश्रमिक’ को माप का पैमाना माना है, अर्थात् नेतृत्व अपने सबसे कम योग्यता वाले श्रमिक को कितना अधिमान देता है।

 

2, परिस्थितियों का आकलन (Understanding about Situation) – परिस्थितियों की अनुकूलता का अध्ययन कर उसके अनुगामी नेतृत्व की विचारणा करनी होगी। यह कार्य निम्नलिखित रूप में हो सकता है –

 

(i) अनुयायियों की दृष्टि में नेतृत्व की सत्ता स्थिति क्या है।

(ii) नेतृत्व को अनुयायियों द्वारा किस सीमा तक स्वीकार किया जाता है।

(iii) अनुयायी कार्य लक्ष्यों को किस सीमा तक स्वीकार कर सकते हैं।

 

8, नेतृत्व परिस्थिति का मिलान (Understanding about Leadership Style) – नेतृत्व व परिस्थिति का मिलान जितना उच्च श्रेणी का होगा उसी अनुपात में प्रभावशीलता में अभिवृद्धि होती जाएगी।

 

फिडलर ने इस मिलान के निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले हैं –

 

(i) निम्न LPC (Least Preferred Co-worker) रखने वाले प्रबन्धक प्रतिकूल स्थितियों में भी सफल हो सकते हैं क्योंकि उनका कार्योन्मुखी व्यवहार श्रेष्ठ कार्य निष्पादन कराने में सफल हो जाता है।

(ii) यदि LPC मध्यम स्तर का है तब निर्देशात्मक कार्यशैली परिस्थिति के अनुकूल पायी जाती है, परन्तु इससे कर्मचारियों में संघर्ष व तनाव बढ़ जाता है।

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(F) हर्से तथा ब्लैंचर्ड की पारिस्थितिक नेतृत्व विचारधारा (Harsey and Blanchared’s Leadership Theory)

 

परिस्थितियों के अनुरूप नेतृत्व के दिशा-निर्देशों में भी परिवर्तन परिलक्षित होता जाता इस विचारधारा में यही नियम कार्य करता है। हर्से तथा ब्लेंचर्ड की पारिस्थितिक नेतृत्व विचारधारा के पारस्परिक सम्बन्धों को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है है।

 

1, सम्बन्ध व्यवहार (Relationship Behaviour) – कर्मियों के सामाजिक कार्य तथा मौद्रिक व प्रतिष्ठामूलक हितों को सम्बन्ध व्यवहार में शामिल किया जाता है। इसके द्वारा कर्मियों को प्राप्त होने वाली सन्तुष्टि को आँका जाता है।

 

2, कार्य-सम्बद्ध परिपक्वता (Task-related Maturity) – कर्मियों की कार्य सम्बद्ध परिपक्वता किस मात्रा की है अर्थात् कर्मी अपने कार्य, दायित्व, निष्पादन स्तर आदि पर किस सीमा तक ध्यान देते हैं, इस तथ्य का आकलन करना।

 

3, कार्य व्यवहार (Task Behaviour) – इसके अन्तर्गत कार्य निर्देशन, लक्ष्य निर्धारण तथा कार्य निष्पादन जैसे तत्त्वों को सम्मिलित किया जाता है। इसमें कार्य व्यवहार ठीक मात्रा का ज्ञान होना नेतृत्व के लिए आवश्यक होता है।

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(i) निर्देशात्मक व्यवहार (Instructional Behaviour)- यह निर्देशात्मक व्यवहार शैली है जिसमें कर्मी कार्य को सीखते हैं, समझते हैं व तदनुसार कार्य निष्पादन करते हैं। इस स्तर पर कर्मियों में उत्तरदायित्व को स्वीकारने की इच्छा नगण्य होती है।

 

(ii) समर्थनात्मक व्यवहार (Supportive Behaviour) – अनुभव की कमी के कारण नेतृत्व कर्मियों को सहयोग व समर्थन प्रदान करता है। कर्मियों में कार्य की पूर्ण योग्यता न होने पर भी नेतृत्व उनको सहयोग प्रदान करता है। इस प्रकार धीरे-धीरे कार्य निष्पादन उच्चता का स्पर्श करने लगता है।

 

(iii) सहभागिता व्यवहार (Participative Behaviour) – सहभागिता व्यवहार में नेतृत्व द्वारा कर्मियों को विशिष्ट साधन तथा अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। कर्मियों में पर्याप्त अनुभव होने के कारण सहयोग तथा समर्थन से ही उनको अभिप्रेरित कर कार्य निष्पादन किया जाता है। इस शैली में सम्बन्धों का स्तर ऊँचा होता है, परन्तु उत्पादन व्यवहार निम्न रहता है।

 

(iv) प्रत्यायोजक व्यवहार (Delegative Behaviour) – इस व्यवस्था शैली में कर्मियों का परिपक्वता स्तर उच्च श्रेणी का होता है, जिसमें कर्मी स्वयं उत्तरदायित्व स्वीकार करने की इच्छा तथा योग्यता रखते हैं। ऐसी अवस्था में कर्मियों में आन्तरिक सोच की परिपक्वता विद्यमान रहती है। वे स्वयं अपनी बुद्धि से कार्य निष्पादन की योग्यता रखते हैं तथा उसे पूरित करते हैं।

Unit 5 Leadership Mcom Notes
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