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Unit 1 Managerial Functions Mcom Notes

Unit 1 Managerial Functions Mcom Notes

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Unit 1 Managerial Functions Mcom Notes

 

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नियोजन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Planning)

 

नियोजन निर्णय लेने की विधि है, जिसके अन्तर्गत ‘क्या करना है’, ‘कैसे एवं कहाँ करना है’, ‘कब करना है’, ‘कितनी मात्रा में करना है’, ‘कौन करेगा’, कितने संसाधनों की आवश्यकता है, आदि के विषय में पहले ही निश्चित कर लिया जाता है ताकि पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को अधिक निश्चितता एवं मितव्ययिता से प्राप्त किया जा सके। नियोजन के अन्तर्गत किसी समस्या के समाधान के लिए विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चयन किया जाता है, जिससे भविष्य को अधिक निश्चित किया जा सके।

Managerial Functions Mcom Notes

कुण्ट्ज और ओ डोनेल (Koontz and O’donnell) के अनुसार, “नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, कार्य करने के मार्गों का सचेतन निर्धारण है, निर्णयों को उद्देश्यों, तथ्यों और विचारित अनुमानों पर आधारित करना है।”

एम०ई० हर्ले (M,E, Hurley) के अनुसार, “क्या करना चाहिए, इसका पूर्व निर्धारण करना ही नियोजन है। इसमें विकल्पों में से उद्देश्यों, नीतियों, विधियों तथा कार्यक्रमों का चयन किया जाना निहित होता है।”

जॉर्ज आर० टैरी के शब्दों में, “नियोजन भविष्य के गर्भ में देखने की विधि अथवा तकनीक है। यह भावी आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाता है, जिससे कि निर्धारित लक्ष्यों की दृष्टि से किए जाने वाले वर्तमान प्रयासों को उनके अनुरूप बनाया जा सके।”

 

प्रत्येक व्यवसाय में, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, नियोजन प्रबन्ध की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है क्योंकि किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए उसका पूर्वानुमान लगाना तथा उसे पूरा करने के लिए नीतियाँ बनाना आवश्यक है। एल०एफ० उर्विक के अनुसार, “अच्छा नियोजन सुनिश्चित एवं स्पष्ट उद्देश्यों पर आधारित होना चाहिए, सरल, लोचदार व सन्तुलित होना चाहिए और इसमें उपयुक्त वर्गीकरण व विश्लेषण होना चाहिए।’

Managerial Functions Mcom Notes

 

नियोजन प्रक्रिया के आवश्यक कदम (Essential Steps of Planning Process)

 

नियोजन प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं—

 

1, उद्देश्यों का निर्धारण (Determination of Objectives)– प्रत्येक उपक्रम में नियोजन करने के लिए सर्वप्रथम उसके सामान्य उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है। उपक्रम के सामान्य उद्देश्यों के आधार पर संस्था के विभागीय लक्ष्य स्थापित किए जाते हैं। इन लक्ष्यों के आधार पर ही संस्था में नियोजन कार्य सम्पन्न किया जाता है। संस्था के प्रत्येक अधिकारी को इन लक्ष्यों से अवगत कराया जाता है, जिससे कि प्रबन्धकों का प्रत्येक कार्य लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में किया जाए।

2, नियोजन के आधारों का निर्धारण (Determination of Planning Premises) – उपक्रम के उद्देश्यों का निर्धारण करने के बाद उपक्रम में नियोजन क्रिया के लिए आधारों का निर्धारण किया जाता है कि किन आधारों पर नियोजन किया जाएगा। नियोजन का आधार ‘पूर्वानुमान’ है। पूर्वानुमान से आशय भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बाजार, वित्त, उत्पादन आदि के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना है। पूर्वानुमान के आधार पर ही नियोजन की सफलता निर्भर करती है।

3, वैकल्पिक तरीकों का विश्लेषण एवं परीक्षण (Analysis and Testing of Alternative Procedures) – नियोजन कार्य में अगला महत्त्वपूर्ण कार्य वैकल्पिक तरीकों का निर्धारण एवं उनका विश्लेषण करना है। वैकल्पिक तरीकों का निर्धारण करते समय उनकी लागत तथा आय आदि को ध्यान में रखा जाता है। प्रत्येक योजना के लिए अनेक वैकल्पिक तरीके होते हैं, अत: उन वैकल्पिक तरीकों का परीक्षण किया जाता है। उदाहरणार्थ- कोई व्यापारी अपना माल मेरठ से बाहर भेजना चाहता है, तब उसके सामने अनेक विकल्प होंगे जैसे वह अपना माल रेल, ट्रक अथवा वायुयान द्वारा भेज सकता है। इस प्रकार उस व्यापारी के समक्ष तीन विकल्प हैं।

4, वैकल्पिक तरीकों का मूल्यांकन (Evaluation of Alternative Procedures) – नियोजन कार्यों में विभिन्न वैकल्पिक तरीकों का निर्धारण एवं परीक्षण करने के बाद उन विभिन्न वैकल्पिक तरीकों का मूल्यांकन किया जाता और यह मूल्यांकन तुलनात्मक विधि के आधार पर लागत व लाभ को ध्यान में रखते हुए किया जाता है कि कौन-सा विकल्प संस्था के लिए सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध होगा। उदाहरणार्थ- उपर्युक्त उदाहरण में व्यापारी समस्त विकल्पों का मूल्यांकन करेगा कि माल रेल, ट्रक अथवा वायुयान द्वारा भेजने में कौन-सा विकल्प सर्वाधिक उपयुक्त होगा, जिससे कम-से-कम लागत आए और माल सुविधानुसार भेजा जा सके।

5, सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करना (To Select Best Alternative) – उपक्रम के समक्ष उपलब्ध विभिन्न वैकल्पिक तरीकों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद उनमें से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन कर लिया जाता है और उसी के आधार पर संस्था में योजना बनाई जाती है तथा निर्णय लिए जाते हैं। कभी-कभी संस्था में अनेक विकल्पों के सहयोग से भी नियोजन कार्य सम्पन्न किया जाता है।

6, उपयोजनाओं को बनाना (To Prepare Subplans) – प्रत्येक व्यावसायिक उपक्रम में नियोजन कार्य सम्पन्न हो जाने पर उसमें मुख्य योजनाओं की पूर्ति के लिए उपयोजनाएँ भी बनाई जाती हैं, जो उपक्रम के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहायक होती हैं। ये उपयोजनाएँ विभागीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बनाई जाती हैं तथा ये उपयोजनाएँ मूल योजना की सहायक होती हैं।

7, क्रियाओं के समय एवं क्रम का निर्धारण (Determination of Time and Sequence of Activities) – उपक्रम में नियोजन के लिए मूल योजना एवं उपयोजनाओं का निर्माण होने के बाद उस क्रिया को लागू करने में लगने वाले समय का निर्धारण किया जाता है। समय निर्धारित करने के बाद क्रियाओं के लिए क्रम भी निर्धारित किया जाता है और उसी समय एवं क्रम के अनुसार उन क्रियाओं को किया जाता है।

 

नियोजन का स्वभाव या प्रकृति (Nature of Planning)

 

नियोजन एक निर्धारणात्मक एवं चयनात्मक प्रक्रिया है, जो पूर्वानुमानों पर आधारित होती है। नियोजन हमेशा आने वाले समय अर्थात् भविष्य के लिए किया जाता है तथा प्रबन्ध के प्रत्येक स्तर पर अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों की सीमा के अन्तर्गत किया जाता है। नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, जो प्रत्येक व्यवसाय में, चाहे वह वृहद् हो या लघु, निरन्तर रूप से चलती रहती है। नियोजन की प्रकृति के अन्तर्गत निम्नलिखित को सम्मिलित किया जा सकता है

 

(1) नियोजन पूर्वानुमानों (Forecasting) पर आधारित होता है।

(2) नियोजन प्रबन्धकीय कुशलता का आधार है।

(3) नियोजन एक सार्वभौमिक (Universal) क्रिया है।

(4) नियोजन संगठन का एक अभिन्न अंग है।

(5) प्रबन्ध के कार्यों में नियोजन प्रथम कार्य है।

(6) नियोजन एक बौद्धिक एवं निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।

(7) नियोजन सदैव आने वाले समय अर्थात् भविष्य के लिए किया जाता है।

 

हेरॉल्ड कूण्ट्ज एवं‘ डोनेल ने नियोजन की प्रकृति के निम्नलिखित पाँच तत्त्व बतलाए हैं

 

(i) लक्ष्यों की पूर्ति में योगदान, (ii) नियोजन की सर्वव्यापकता, (iii) आयोजन की सर्वोपरिता, (iv) योजनाओं की कुशलता, एवं (v) निरन्तर प्रक्रिया।

 

नियोजन के उद्देश्य (Objectives of Planning)

 

नियोजन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

 

1, कार्यों में निश्चितता (Certainty in Work) – नियोजन के माध्यम से उपक्रम की भावी गतिविधियों में निश्चितता लाने का प्रयास किया जाता है, जिससे कि संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

2, पूर्वानुमान लगाना (Predicting Forecasting) – नियोजन का उद्देश्य भविष्य के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना है, इसीलिए पूर्वानुमान को नियोजन का सार माना जाता है।

3, प्रबन्ध में मितव्ययिता (Economy in Management) – उपक्रम की भावी गतिविधियों की योजना के बन जाने से प्रबन्ध का ध्यान उसे कार्यान्वित करने की ओर केन्द्रित हो जाता है।

4, साम्य एवं समन्वय की स्थापना (Establishment of Co-ordination and Equality) – नियोजन के द्वारा उपक्रम की विभिन्न गतिविधियों में साम्य एवं समन्वय स्थापित किया जाता है।

5, लक्ष्यों एवं उपलक्ष्यों की जानकारी (Proper knowledge of Main and Sub objectives) – नियोजन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य उपक्रम एवं व्यवसाय में संलग्न कर्मचारियों एवं अन्य व्यक्तियों को उपक्रम अथवा व्यवसाय के लक्ष्यों एवं उपलक्ष्यों के बारे में जानकारी देना है।

6, विशिष्ट दिशा प्रदान करना (To Give Appropriate Direction) – नियोजन द्वारा किसी कार्य की भावी रूपरेखा बनाकर उसे ऐसी दिशा प्रदान करने का प्रयत्न किया जाता है, जो कि इसके अभाव में लगभग असम्भव प्रतीत होती है।

7, अन्य उद्देश्य (Other Objectives) – उपरिवर्णित उद्देश्यों के अतिरिक्त नियोजन के कुछ अन्य उद्देश्य भी हैं; जैसे-स्वच्छ प्रतिस्पर्धा को बनाए रखना, उपक्रम की जोखिमों एवं सम्भावनाओं का परीक्षण करना आदि।

 

नियोजन के तत्त्व (Elements of Planning)

 

नियोजन प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्त्वों को ध्यान में रखा जाता है

 

1, उद्देश्य (Objectives) – मानव अपने जीवन की सभी क्रियाएँ निश्चित उद्देश्यों या लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करता है। इसी प्रकार प्रत्येक उपक्रम में उसके कुछ निश्चित उद्देश्य होते हैं, जिनकी पूर्ति के लिए उसका निर्माण किया जाता है तथा प्रत्येक क्रिया उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए की जाती है। उदाहरणार्थ- प्रत्येक व्यवसायी का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है, अतः वह इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रयत्न करता है। यदि किसी उपक्रम का कोई उद्देश्य ही न हो, तब नियोजन कार्य सम्पन्न करना सम्भव नहीं होगा क्योंकि जब हमें यही नहीं पता कि हमें क्या प्राप्त करना है तो हम उसके लिए क्या नियोजन करेंगे, अतः नियोजन के लिए उद्देश्यों का निर्धारण करना नितान्त आवश्यक है।

2, पूर्वानुमान (Forecasting) – उपक्रम का उद्देश्य निर्धारित हो जाने के पश्चात् उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न तत्त्वों के सम्बन्ध में पूर्वानुमान करना होता है; जैसे—किसी वस्तु का कितना उत्पादन करना होगा, उसके लिए कितने वित्त की आवश्यकता होगी, किस योग्यता के कर्मचारी की आवश्यकता होगी आदि।

3, नीतियाँ (Policies) – नियोजन क्रिया के लिए नीतियों का होना भी नितान्त आवश्यक है। नीतियों के आधार पर ही नियोजन कार्य सम्पन्न किया जाता है। नीतियाँ व्यवसाय में सामान्य सहमतियाँ ही होती हैं, जो व्यवसाय में उनके कार्यों का मार्गदर्शन किया करती हैं। नीतियों का निर्माण उच्च प्रबन्धकीय स्तर पर किया जाता है। कुछ नीतियाँ सरकारी नियमों के अनुरूप बनाई जाती हैं तथा कुछ नीतियाँ कर्मचारियों की प्रार्थना पर बनाई जाती हैं। नीतियाँ माल के क्रय, उत्पादन, विक्रय, वित्त आदि के सम्बन्ध में भी हो सकती हैं।

4, कार्यविधियाँ (Procedures ) – नियोजन कार्य में कार्यविधियाँ एक मुख्य अंग होती हैं। कार्यविधियाँ नीतियों द्वारा निर्धारित मार्ग को पार करने की विधि होती हैं। प्रत्येक उपक्रम में उसके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निश्चित नीतियाँ बनाई जाती हैं और उन्हें पूरा करने के लिए निश्चित कार्यविधियों की स्थापना की जाती है। संक्षेप में, हम यह कह सकते हैं कि नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए उपक्रम में निश्चित कार्यविधियाँ बनाई जाती हैं। इन कार्यविधियों के माध्यम से क्रियाओं को करने का ढंग एवं उनका क्रम निश्चित किया जाता है। ये कार्यविधियाँ उपक्रम के उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई जाती हैं। कार्यविधियाँ लोचपूर्ण होनी चाहिए, जिससे उनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सके।

5, नियम (Rules ) – नियोजन प्रक्रिया में योजना का निर्माण करते समय निश्चित नियम बनाए जाते हैं। इन नियमों के आधार पर योजनाओं को क्रियान्वित किया जाता है। कूण्ट्ज एवं ओ ‘डोनेल के अनुसार, “नियम वे योजनाएँ हैं जो कि आवश्यक क्रिया को मार्ग बताती हैं तथा इनका चयन अन्य योजनाओं की तरह विकल्पों में से होता है।” नियम नीतियों से भिन्न होते हैं, क्योंकि नीतियाँ सोच-समझकर उपक्रम के लाभ के लिए बनाई जाती हैं जबकि नियम योजनाओं का ही सरल रूप होते हैं। इसी तरह नियम कार्यविधियों से भी भिन्न हैं क्योंकि नियम क्रियाओं का क्रम निर्धारित नहीं करते हैं, जबकि कार्यविधियाँ क्रियाओं का क्रम निर्धारित करने के लिए ही बनाई जाती हैं।

6, बजट (Budget) – आधुनिक व्यावसायिक युग में प्रत्येक कार्य अनुमानों के आधार पर किया जाता है। बजट भी एक योजना है, जिसमें अनुमानित परिणामों का विवरण अंकों मे रहता है। ये बजट अनेक प्रकार के होते हैं; जैसे- रोकड़ बजट, क्रय बजट, विक्रय बजट, आय-व्यय बजट आदि। बजट के माध्यम से ही उपक्रम की क्रियाओं पर नियन्त्रण रखा जा सकता है, अत: बजट नियन्त्रण का एक भाग है। बजट सदैव भविष्य के लिए ही बनाया जाता है, भूतकाल के लिए नहीं, अतः बजट नियोजन का एक आवश्यक भाग है।

7, कार्यक्रम (Programme) – नियोजन कार्य को सम्पन्न करने के लिए कार्यक्रम बनाया जाता है। कार्यक्रम किसी कार्य को करने की संक्षिप्त योजना होती है जिसे निश्चित क्रम में उद्देश्यों के अनुरूप नीतियों एवं कार्यविधियों के अनुसार तैयार किया जाता है। ये कार्यक्रम अल्पकालीन, दीर्घकालीन, विस्तृत, सीमित, सामान्य अथवा विशिष्ट हो सकते हैं।

8, मोर्चाबन्दी (Strategies) – व्यावसायिक युग में प्रत्येक उपक्रम के लिए आन्तरिक एवं बाह्य मोर्चाबन्दी करनी पड़ती है। मोर्चाबन्दी एक व्यावसायिक योजना है, जो व्यवसाय में प्रतिद्वन्द्वियों की योजनाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। प्रक्रिया में उपर्युक्त विभिन्न तत्त्वों को ध्यान में रखकर योजनाओं का इस प्रकार नियोजन निर्माण किया जाता है।

 

प्रबन्ध में नियोजन का महत्त्व (Importance of Planning in Management)

 

आधुनिक युग प्रबन्ध का युग है। वर्तमान समय में प्रत्येक उपक्रम, चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा, चाहे उसकी क्रियाओं का क्षेत्र स्थानीय हो, प्रादेशिक हो अथवा अन्तर्राष्ट्रीय, चाहे वह निजी क्षेत्र में हो, सार्वजनिक क्षेत्र में हो अथवा मिश्रित क्षेत्र में हो, सभी के लिए नियोजन की आवश्यकता पड़ती है। कोई भी व्यवसायी बिना कुशल एवं प्रभावी नियोजन के अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि नियोजन के द्वारा ही व्यवसायी अपने उपक्रम के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक क्रियाओं को निश्चित करता है, उनका क्रम निर्धारित करता है और फिर उनको क्रियान्वित करता है। नियोजन के आधार पर ही निर्धारित प्रमापों की वास्तविक निष्पादन से तुलना करके यह पता लगाया जा सकता है कि उपक्रम ने किस सीमा तक सफलता प्राप्त की है, अतः व्यावसायिक युग में प्रबन्धकीय क्रियाओं में नियोजन का सर्वोपरि महत्त्व है। नियोजन का महत्त्व निम्नलिखित कारणों से और भी अधिक बढ़ गया है—

 

1, भावी अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए (To Offset Future Uncertainties) – भावी अनिश्चितताओं के कारण व्यवसाय में नियोजन आवश्यक होता है। प्रबन्धक भूतकालीन घटनाओं के आधार पर वर्तमान परिस्थितियों का अध्ययन एवं विश्लेषण करके भविष्य के लिए पूर्वानुमान लगाते हैं तथा तदनुसार योजनाएँ तैयार करते हैं। वास्तव में नियोजित क्रियाओं के माध्यम से ही भावी अनिश्चितताओं को कम किया जा सकता है और उपक्रम के पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

2, उद्देश्यों का स्पष्टीकरण (Clarification of Objectives)- नियोजन के अन्तर्गत उपक्रम के उद्देश्यों को स्पष्ट किया जाता है और इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए योजनाएँ बनाई जाती है। प्रबन्धक वर्ग कोई भी निर्णय लेते समय उपक्रम के उद्देश्यों को ध्यान में रखता है।

3, प्रबन्धकीय कार्यों में समन्वय (Coordination in Managerial Functions) – नियोजन के माध्यम से उपक्रम के विभिन्न विभागों में प्रबन्धकीय कार्यों में आसानी से समन्वय स्थापित किया जा सकता है, जिससे उपक्रम के विभिन्न विभागों में आपस में टकराव की स्थिति उत्पन्न नहीं होती और उपक्रम के सभी विभाग एक-दूसरे से कदम से कदम मिलाकर एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं।

4, संगठनात्मक कार्यकुशलता में वृद्धि करने के लिए (To Increase the Organizational Efficiency) – नियोजन वांछित परिणामों की प्राप्ति में लगने वाली अनावश्यक देरी और लालफीताशाही को समाप्त करके को प्रभावी बनाता है। नियोजन क्रियाओं की अनावश्यक बारम्बारता को रोकता है, जिससे समय, श्रम एवं धन की बचत होती है और इसके परिणामस्वरूप संगठनात्मक कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

5, उपक्रम के संचालन में मितव्ययिता (Economy in the Operation of the Enterprise) – नियोजन उपक्रम के उद्देश्यों को कम-से-कम लागत पर और न्यूनतम प्रयत्नों के द्वारा प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है क्योंकि नियोजन का प्रमुख उद्देश्य किसी भी कार्य को सर्वश्रेष्ठ ढंग से पूरा करने के लिए कार्यक्रम तैयार करना होता है। उत्पादन, विपणन, वित्त एवं सेविवर्गीय क्रियाओं को पूर्व-नियोजित ढंग से करने पर अनेक प्रकार की मितव्ययिताएँ प्राप्त होती हैं।

6, नियन्त्रण कार्य में सहायक (Helpful in Controlling Function) — नियोजन के द्वारा भावी निष्पादन के लिए प्रमाप निर्धारित किए जाते हैं और फिर वास्तविक निष्पादन की प्रमापों से तुलना करके विचरणों (Variances) का पता लगाया जाता है तथा फिर यह देखा जाता है कि ये विचरण अनुकूल हैं या प्रतिकूल । यदि ये विचरण प्रतिकूल होते हैं तो सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं, जिससे कि भविष्य में प्रतिकूल परिणाम प्राप्त न हों। इस प्रकार नियोजन नियन्त्रण कार्य के लिए आधार प्रस्तुत करता है।

7, प्रबन्धकीय कार्यकुशलता में वृद्धि करने के लिए (To Increase the Managerial Efficiency) – नियोजन की सहायता से प्रबन्धक उपक्रम के प्रत्येक कार्य को सही दिशा प्रदान कर सकते हैं, कर्मचारियों को सही निर्देश देकर उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं और उपक्रम के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में, नियोजन एक ऐसी महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिस पर उपक्रम और उसके प्रबन्धकों की सफलता निर्भर करती है।

8, नियोजन का राष्ट्रीय महत्त्व (National Importance of Planning) – नियोजन का महत्त्व न केवल व्यावसायिक उपक्रमों के लिए है वरन् प्रगतिशील राष्ट्रों के लिए भी नियोजन अति आवश्यक है। नियोजन के माध्यम से देश का सन्तुलित औद्योगिक एवं आर्थिक विकास किया जा सकता है, उत्पादन एवं उपभोग में सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है और बेरोजगारी की समस्या का समाधान किया जा सकता है। भारत इसका ज्वलन्त उदाहरण हैं, जिसने पंचवर्षीय योजनाओं के आधार पर प्रत्येक क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास किया है।

 

संगठन के सिद्धान्त (Principles of Organization)

 

चिरप्रतिष्ठित प्रबन्धशास्त्री हेनरी फेयोल ने प्रबन्ध एवं संगठन सम्बन्धी 14 सिद्धान्त प्रतिपादित किए थे, लेकिन इसके अतिरिक्त भी प्रबन्ध विशेषज्ञों ने संगठन सम्बन्धी कुछ नए सिद्धान्त भी प्रतिपादित किए हैं जो निम्न प्रकार हैं

 

1, अपवाद का सिद्धान्त (Principle of Exception) – यह सिद्धान्त यह बताता है। कि दिन-प्रतिदिन पुनरावृत्ति वाले निर्णयों को प्रथम श्रेणी प्रबन्ध द्वारा लिया जाना चाहिए। इसमें वरिष्ठ अधिकारियों को जिन्होंने अधीनस्थ अधिकारियों को अधिकार हस्तान्तरित कर दिए है, हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वरिष्ठ प्रबन्धकों को उन्हीं मामलों में निर्णय लेना चाहिए जिनके अधिकार प्रथम श्रेणी प्रबन्धकों को नहीं सौंपे गए हैं।

2, दक्षता का सिद्धान्त (Principle of Efficiency) – संगठन ऐसा हो जो उपक्रम को न्यूनतम लागत पर उद्देश्यों को प्राप्त करने के योग्य बनाए। जिसमें संसाधनों का दुरुपयोग न हो तथा मानवीय संसाधनों तथा उनके ज्ञान का पूर्ण सदुपयोग हो सके।

3, सहभागिता का सिद्धान्त (Principle of Participation) – यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि प्रबन्धकों को चाहे वह वरिष्ठ हों या अधीनस्थ आमने-सामने बैठकर संगठन सम्बन्धी समस्याओं पर विचार-विमर्श करना चाहिए। 4, लोच का सिद्धान्त (Principle of Flexibility) संगठन स्थिर प्रकृति का नहीं, होना चाहिए बल्कि लोचपूर्ण होना चाहिए ताकि उसे समाप्त किए बिना उसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सके और वह वातावरण व प्रौद्योगिकी में परिवर्तनों को वहन कर सके।

5, उद्देश्य की एकता का सिद्धान्त (Principle of Unity Objective) – सम्पूर्ण उपक्रम तथा उसके विभाग के लिए उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। ये उद्देश्य समान होने चाहिए ताकि उन्हें प्राप्त करने पर ही पूरे संगठन का ध्यान केन्द्रित हो सके।

6, निश्चितता का सिद्धान्त (Principle of Definiteness) – इस सिद्धान्त के अनुसार कर्मचारियों की प्रत्येक क्रिया न्यूनतम क्षय तथा अधिकतम दक्षता के साथ उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने पर केन्द्रित होनी चाहिए।

7, सरलता का सिद्धान्त (Principle of Simplicity) – उपक्रम की संगठन संरचना जटिल नहीं होनी चाहिए बल्कि वह इतनी सरल होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति उसे भली प्रकार समझ सके।

8, निरन्तरता का सिद्धान्त (Principle of Continuity) – संगठन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। प्रत्येक संगठन में इस दृष्टि से ही प्रावधान किया जाना चाहिए।

9, नेतृत्व सिद्धान्त (Principle of Leadership) – संगठन संरचना इस सिद्धान्त पर आधारित होनी चाहिए कि वह ऐसा वातावरण प्रदान कर सके कि प्रबन्धक अपने अधीनस्थों को कार्य के लिए अभिप्रेरित कर सके तथा सही नेतृत्व प्रदान कर सके।

10, वैयक्तिक योग्यता का सिद्धान्त (Principle of Personal Ability) – कर्मचारी ही संगठन बनाते हैं, अतः संगठन संरचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें कर्मचारी तथा प्रबन्ध विकास पर बल दिया जा सके, उनके प्रशिक्षण आदि की समुचित व्यवस्था हो सके तथा मानवीय संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग किया जा सके।

 

अधिकारों के भारार्पण का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Delegation of Authorities)

 

वर्तमान जटिल औद्योगिक युग में किसी एक व्यक्ति के लिए उपक्रम की सम्पूर्ण व्यवस्था पर नियन्त्रण रखना सम्भव नहीं है इसलिए व्यक्ति अपना कार्य अन्य व्यक्तियों को सौंप देते हैं। इस प्रकार से अपने कार्यभार को दूसरे व्यक्तियों को सौंपना ही ‘भारार्पण’ कहलाता है। प्रत्येक उस व्यक्ति को, जिसे कुछ कार्य सौंपे जाएँ, आवश्यक है कि कुछ अधिकार भी प्रदान किए जाएँ। अधिकारों के बिना कोई भी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पूर्णतया पालन करने में असमर्थ रहेगा। अधिकारों के इस प्रकार के हस्तान्तरण को ही ‘अधिकारों का भारार्पण’, ‘अधिकारों का अन्तरण’, ‘अधिकारों का समर्पण’, ‘अधिकारों का प्रत्यायोजन’ या ‘अधिकारों की प्रत्यायुक्ति’ कहते हैं।

 

प्रमुख विद्वानों ने अधिकारों के भारार्पण को अग्रलिखित प्रकार से परिभाषित किया है—

 

प्रो० थियो हैमन के शब्दों में, “अधिकार के भारार्पण से आशय केवल अधीनस्थों को निर्दिष्ट सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करने का अधिकार प्रदान किए जाने से है।”

ई०एफ० एल० बीच के अनुसार, “संक्षेप में भारार्पण से आशय प्रबन्ध प्रक्रिया के चार तत्त्वों में से प्रत्येक का एक अंश दूसरों को हस्तान्तरित करने से है।” फ्रैंकलिन जी० पूरे के शब्दों में, “भारार्पण से आशय दूसरे लोगों को कार्य सौंपने तथा उन्हें करने हेतु अधिकार प्रदान करने से है।”

मैक्फारलैण्ड (McFarland) के अनुसार, “भारार्पण संगठन प्रक्रिया का वह भाग है, जिसके द्वारा एक अधिकारी, प्रशासक अथवा प्रबन्धक अन्य व्यक्तियों को कम्पनी के कार्यों को पूरा करने में भाग लेने को सम्भव बनाता है। ”

लुइस ए० एलन (Louis A, Allen) के शब्दों में, “भारार्पण प्रबन्ध की शक्ति है, यह एक प्रक्रिया है जिसे अपनाकर प्रबन्धक अपने कार्यों का विभाजन करता है, जिससे कि सम्पूर्ण कार्य के उस भाग का निष्पादन करे जिसे वह स्वयं ही संगठन में अपनी विशिष्ट स्थिति के कारण प्रभावशाली ढंग से कर सकता है और इस प्रकार वह शेष कार्य को पूरा करने में अन्य लोगों की सहायता प्राप्त कर सकता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर हम कह सकते हैं कि—“भारार्पण से आशय एक अधिकारी द्वारा अपने सहायकों अथवा अधीनस्थों को निर्दिष्ट सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करने के लिए अधिकार प्रदान करने से है। ”

 

भारार्पण के तत्त्व या प्रकृति (Elements or Nature of Delegation)

 

भारार्पण के प्रमुख तत्त्व या प्रकृति को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है—

 

1, कार्यभार सौंपा जाना (Assignment of Duty) – भारार्पण का मुख्य तत्व कार्यभार का सौंपा जाना है क्योंकि इसके अन्तर्गत प्रबन्धक अपने कार्यों को अपने अधीनस्थो को सौंपता है। किसी भी व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह व्यवस्था की सम्पूर्ण क्रियाओं को स्वयं सम्पन्न कर ले इसलिए वह अपने कार्यों को अन्य व्यक्तियों को सौंप देता है। इससे उपक्रम अपने निश्चित उद्देश्यों को आसानी से पूरा करने में समर्थ होता है क्योंकि प्रबन्धक अपने कार्यों को अपने अधीनस्थों को सौंप देते हैं और अपना अमूल्य समय व्यवसाय के विकास में लगाते हैं। इस प्रकार ‘कार्यभार सौंपा जाना’ भारार्पण का मुख्य तत्त्व कहलाता है।

2, अधिकार प्रदान करना (Grant of Authority) – प्रत्येक व्यक्ति, जिसे कुछ कार्य सम्पन्न करने का दायित्व सौंपा जाता है, को कुछ विशिष्ट अधिकार भी प्रदान किए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति को केवल कार्यभार ही सौंपा जाए और उसे कोई अधिकार प्रदान न किया जाए तो उस व्यक्ति के लिए अपने दायित्वों का निर्वाह करना असम्भव होगा, अतः यह आवश्यक है कि जिसे कोई उत्तरदायित्व सौंपा जाए उसे अधिकार भी प्रदान किए जाएँ।

उत्तरदायित्व अधिकारों के अभाव में व्यर्थ है और अधिकार, उत्तरदायित्व के बिना व्यर्थ है। इसलिए भारार्पण के लिए आवश्यक है कि अधिकारों का भारार्पण भी किया जाए।

3, दायित्व निर्धारित करना (Determination of Accountability) – जब उच्च अधिकारी द्वारा अपने कार्यों को अपने अधीनस्थों को प्रदान किया जाता है तो उन्हें कुछ अधिकार भी प्रदान किए जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में उच्च अधिकारी का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वह अपने अधीनस्थों के कार्यों को देखे कि वे कार्य-उद्देश्यों के अनुकूल एवं नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं या नहीं। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उच्च अधिकारी उनसे जवाब तलब कर सकता है और उनका दायित्व निर्धारित कर सकता है, अतः भारार्पण में अधीनस्थों का दायित्व भी निर्धारित किया जाता है।

 

इस प्रकार भारार्पण करते समय उपर्युक्त तत्त्वों को ध्यान में रखना अनिवार्य है और इन्हीं तत्त्वों के आधार पर भारार्पण की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है।

 

उत्तरदायित्वों का भारार्पण सम्भव है या नहीं (Whether Delegation of Responsibilities is Possible or Not)

 

यदि गहनतापूर्वक सोचा जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी अधिकारी अपने उत्तरदायित्वों का भारार्पण नहीं कर सकता। हाँ, यदि कोई भी अधिकारी चाहे तो वह अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में अधीनस्थों का सहयोग ले सकता है और अधीनस्थों को कुछ अधिकारों का भारार्पण कर सकता है। इस सम्बन्ध में स्मरणीय तथ्य यह है कि उत्तरदायित्व तो उसी अधिकारी का रहेगा, जिसको उपक्रम का कार्यभार सौंपा गया है। यदि उपक्रम को कोई हानि होती है तो उच्च अधिकारियों के प्रति उसी अधिकारी की जवाबदेही मानी जाएगी, जिसको उच्च अधिकारियों ने कार्य सौंपा था, न कि उसके अधीनस्थों को उस कार्य के प्रति जिम्मेदार ठहराया जाएगा। इस प्रकार से स्पष्ट है- “केवल अधिकारों का भारार्पण हो सकता है, उत्तरदायित्वों का नहीं।”

 

भारार्पण के प्रकार अथवा रूप (Types or Forms of Delegation)

 

यद्यपि विभिन्न विद्वानों ने भारार्पण का भिन्न-भिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया है तथापि अध्ययन में सुविधा के दृष्टिकोण से भारार्पण के प्रकार अथवा रूपों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

 

1, सामान्य अथवा निश्चित भारार्पण (General or Specific Delegation) – सामान्य भारार्पण के अन्तर्गत उपक्रम की समस्त क्रियाओं का कार्यभार किसी एक व्यक्ति को सौंप दिया जाता है जैसे किसी उपक्रम के मुख्य प्रबन्धक को सौंपा गया कार्यभार सामान्य भारार्पण’ कहलाता है। निश्चित भारार्पण के अन्तर्गत एक व्यक्ति को निश्चित क्रियाओं के सम्बन्ध में ही कार्यभार सौंपा जाता है जैसे उत्पादन प्रबन्धक, सेविवर्गीय प्रबन्धक, वित्त प्रबन्धक, विपणन प्रबन्धक आदि को सौंपा गया कार्यभार ‘निश्चित भारार्पण’ कहलाता है।

2, लिखित अथवा मौखिक भारार्पण (Written or Oral Delegation) – जब कार्यभार का भारार्पण लिखित रूप में सौपा जाए तो उसे ‘लिखित भारार्पण’ कहते हैं। इसके विपरीत जब कार्यभार मौखिक रूप से सौंपा जाए तो उसे ‘मौखिक भारार्पण’ कहते हैं। मौखिक भारार्पण की तुलना में लिखित भारार्पण अधिक श्रेष्ठ होता है।

3, औपचारिक अथवा अनौपचारिक भारार्पण (Formal or Informal Delegation ) – जब भारार्पण संगठन की अधिकार रेखा द्वारा निर्धारित सीमाओं के आधार पर होता है तो उसे ‘औपचारिक भारार्पण’ कहते हैं। इसके विपरीत, ‘अनौपचारिक भारार्पण’ के अन्तर्गत अधीनस्थ कर्मचारी उच्च अधिकारियों की आज्ञा पर नहीं अपितु स्वतः प्रेरणा से कार्य करते हैं। सार्वजनिक उपक्रमों में अनौपचारिक तरीकों से ही भारार्पण होता है, जबकि निजी उपक्रमों में औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों विधियों से भारार्पण होता है। अनौपचारिक भारार्पण का मुख्य उद्देश्य लालफीताशाही (Redtapism) को समाप्त करना होता है।

4, अधोगामी, ऊर्ध्वगामी अथवा पाश्विक भारार्पण (Downward, Upward or Collateral Delegation) – अधोगामी भारार्पण के अन्तर्गत भारार्पण प्राय: उच्च अधिकारी से नीचे के (अधीनस्थ) अधिकारी को होता है। जब कभी अधीनस्थ भारार्पण को स्वीकार नहीं करते तो अधिकारी अपने शीर्षाधिकारी को भारार्पण कर सकता है, इसे ही ‘ऊर्ध्वगामी भारार्पण’ कहते हैं। जब भारार्पण समस्तरीय अधिकारी को किया जाए तो उसे ‘पाश्विक भारार्पण’ कहते हैं।

5, प्रशासनिक क्रियात्मक अथवा तकनीकी भारार्पण (Administrative, Functional or Technical Delegation) – जो भारार्पण प्रशासकीय कार्यों के लिए किए जाते हैं, उन्हें प्रशासकीय भारार्पण’ (Administrative Delegation) कहते हैं। जो भारार्पण क्रियाओं के आधार पर किए जाते हैं, उन्हें ‘क्रियात्मक भारार्पण’ (Functional Delegation) कहते हैं तथा जो भारार्पण तकनीकी कार्यों के लिए किए जाते हैं, उन्हें ‘तकनीकी भारार्पण’ (Technical Delegation) कहते हैं।

 

भारार्पण के सिद्धान्त (Principles of Delegation)

 

1, प्रत्याशित परिणामों के द्वारा कर्त्तव्यों को सौंपने का सिद्धान्त (Principle of Assignment of Duties in Terms of Expected Results)– उच्च अधिकारी अपने कर्तव्यों अथवा कार्यों का भारार्पण अपने अधीनस्थों को करता है, परन्तु ऐसा करते समय उच्च अधिकारी को चाहिए कि वह अधीनस्थों को उन परिणामों अथवा उद्देश्यों को स्पष्ट कर दे, जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। ऐसा करने से अधीनस्थ केवल उन्हीं कार्यों को करेंगे, जो पूर्व निर्धारित परिणाम अथवा उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हों और व्यर्थ की क्रियाओं का परित्याग करेंगे। इसके विपरीत, यदि कर्मचारियों को केवल कर्त्तव्य सौंपे जाएँ और उनसे प्रत्याशित परिणामों अथवा उद्देश्यों को स्पष्ट न किया जाए तो अधीनस्थ अपने कर्तव्यों को पूरा करने में असमर्थ रहेंगे।

2, अधिकार एवं दायित्व का सिद्धान्त (Principle of Authority and Responsibility)– इस सिद्धान्त के अनुसार अधीनस्थों को भारार्पण करते समय उनके अधिकारों एवं दायित्वों को ध्यान में रखा जाता है। प्रत्येक अधीनस्थ, जिसे दायित्व सौंपे जाते हैं, को कुछ अधिकारों का भी भारार्पण किया जाना चाहिए क्योंकि अधिकारों के बिना दायित्व पूर्ण करना सम्भव नहीं है, इसलिए अधिकारों एवं दायित्वों में सामंजस्य होना चाहिए।

3, पूर्ण उत्तरदायित्व का सिद्धान्त (Principle of Absolute Responsi bility) – कोई भी अधिकारी केवल अपने अधिकारों का भारार्पण कर सकता है, उत्तरदायित्वों का नहीं। वह अधिकारी, जो अपने कार्यों को अधीनस्थों को सौंपता है, सौंपे गए कार्यों के लिए पूर्णतया स्वयं उत्तरदायी होता है, उसके अधीनस्थ नहीं, इसलिए उस अधिकारी को चाहिए कि वह जिन अधीनस्थों को कार्य सौंपता है, उनका निरीक्षण करे कि वे कार्य उचित एवं नियमित रूप से कर रहे हैं अथवा नहीं।

4, आदेश की एकता का सिद्धान्त (Principle of Unity of Command) – भारार्पण की प्रक्रिया सम्पन्न करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि अधीनस्थों को आदेश केवल उच्च स्तर से ही प्राप्त हों तथा एक ही अधिकारी आदेश दे। ऐसा करने से आदेश की एकता बनी रहेगी और कर्मचारी भी अपना कार्य अधिक कुशलता से करने में सफल होंगे। यदि अधीनस्थ कर्मचारियों को अधिक व्यक्तियों से आदेश प्राप्त होंगे तो उनके लिए पूर्व निर्धारित परिणामों अथवा उद्देश्यों की पूर्ति करना सम्भव नहीं होगा।

 

उपर्युक्त सिद्धान्तों का पालन करके ही किसी उपक्रम में भारार्पण की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।

 

प्रभावी भारार्पण की आवश्यक बातें (Essential Points of Effective Delegation)

 

एक प्रभावशाली भारार्पण में निम्नलिखित बिन्दुओं का होना अति आवश्यक है—

 

1, दायित्वों एवं अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या एवं सीमा (Clear Definition and Limitation of Duties and Rights) – भारार्पण को प्रभावशाली बनाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक अधिकारी के दायित्वों व अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या की जानी चाहिए तथा इन्हीं के आधार पर उनकी सीमा का निर्धारण भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है।

2, सौंपे गए कार्यों तथा अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या (Clear Definition of Delegated Works and Authorities) – भारार्पण के प्रभावी होने के लिए यह आवश्यक है कि जिस व्यक्ति को भारार्पण किया जाए उसे इसका स्पष्ट ज्ञान करा देना चाहिए कि उसे कौन-कौन से कार्य सौंपे गए हैं तथा कौन-कौन से अधिकारों का भारार्पण किया गया है।

3, अधीनस्थ कर्मचारियों की क्रियाओं पर उचित नियन्त्रण (Proper Control Over the Activities of Subordinates) – भारार्पण को प्रभावशाली बनाने के लिए यह आवश्यक है कि जिस अधीनस्थ कर्मचारी को भारार्पण किया गया है, उसकी क्रियाओं पर आवश्यक नियन्त्रण रखा जाए।

4, सद्भावना का वातावरण (Cordial Atmosphere) – प्रभावी भारापंण के लिए आवश्यक है कि उपक्रम में आपस में सद्भावना का वातावरण हो, न तनावपूर्ण वातावरण सद्भावना के वातावरण में अधीनस्थ अपने अधिकारियों के आदेश का पालन भली प्रकार करते हैं तथा उनके अधिकारी भी उनको पूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं।

5, प्रभावी सम्प्रेषण (Effective Communication) – प्रभावी भारार्पण के लिए यह आवश्यक है कि अधिकारियों और अधीनस्थों में स्पष्ट सम्प्रेषण प्रणाली होनी चाहिए। इससे एक-दूसरे को अपनी बात समझाने में सहायता मिलती है।

6, दैनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं (No Interference in Routines) – भारार्पण को प्रभावी बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि अधिकारियों को अपने अधीनस्थों के दैनिककार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए अर्थात् उन्हें अपने कार्यों को करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए।

 

उपर्युक्त बिन्दुओं को यदि ध्यान में रखा जाए तो उपक्रम में भारार्पण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

 

भारार्पण में बाधाएँ अथवा कठिनाइयाँ (Hindrances or Difficulties in Delegation)

किसी भी उपक्रम के सफल संचालन के लिए भारार्पण अनिवार्य है, परन्तु व्यवहार में अधिकारों का भारार्पण करते समय अधिकारी वर्ग को निम्नलिखित बाधाओं अथवा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है

 

1, विश्वास का अभाव (Lack of Confidence) – अधिकारी अपने अधिकारों का भारार्पण अपने अधीनस्थों को इसलिए नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें अधीनस्थों पर कम विश्वास होता है। उनकी धारणा होती है कि जितनी अच्छी तरह से वे स्वयं कार्य करते हैं, उतनी अच्छी तरह से अन्य कोई व्यक्ति कार्य नहीं सकत

2, शासन करने एवं नियन्त्रण की इच्छा (Desire to Administer and Control) – अधिकारी अपने अधिकारों का भारार्पण इसलिए नहीं करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें शासन करने एवं नियन्त्रण करने की इच्छा रहती है। अधिकारी वर्ग की यह मान्यता होती है। कि यदि वे अपने अधिकारों का भारार्पण अपने अधीनस्थों को कर देंगे तो उनके नियन्त्रण एवं प्रशासन का प्रभाव कम हो जाएगा।

3, भारार्पण की कला से अनभिज्ञता (Unfamiliarity with the Art of Delegation) – अधिकारों का भारार्पण करना एक कला है। भारार्पण की कला को प्राप्त करने के लिए सैद्धान्तिक ज्ञान एवं व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता होती है, जिसके लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है, अतः अधिकारों के भारार्पण की कला से अनभिज्ञ अधिकारी अपने अधीनस्थों को कार्यभार सौंपने में एक प्रकार का भय अनुभव करते हैं।

4, अधीनस्थों की अयोग्यता (Incapability of Subordinates) – अधिकारी अपने अधिकारों का भारार्पण, अपने अधीनस्थों को उनकी अयोग्यता के कारण भी नहीं करते हैं, क्योंकि यदि अधीनस्थ अयोग्य हैं और उन्हें अधिकारों का भारार्पण कर दिया जाए तो वे अधिकारों का दुरुपयोग ही करेंगे।

5, अन्य बाधाएँ (Other Hindrances) – उपर्युक्त के अतिरिक्त भारार्पण की अन्य बाधाएँ इस प्रकार हैं- (i) अधिकारियों को अधीनस्थों से भय, (ii) अधिकारियों में निर्देश देने की असमर्थता, (iii) उपक्रम में प्रभावी नियन्त्रण व्यवस्था का अभाव, (iv) अधीनस्थों में प्रेरणाओं का अभाव, एवं (v) अधिकारियों एवं अधीनस्थों में मनमुटाव आदि।

इस प्रकार हम देखते हैं कि उपर्युक्त बाधाओं के फलस्वरूप अधिकारी अपने अधिकारों का भारार्पण करने में हिचकिचाहट अनुभव करते हैं, परन्तु उपर्युक्त सभी बाधाएँ प्रबन्धकों की इच्छा-मात्र हैं। वास्तव में, अधिकारों का भारार्पण प्रत्येक उपक्रम में अनिवार्य कार्य है अन्यथा अधिकारी अपने अधीनस्थों से कोई भी कार्य ठीक प्रकार से नहीं करा सकेंगे।

 

 “सत्ता का भारार्पण हो सकता है किन्तु उत्तरदायित्व को भारार्पित नहीं किया जा सकता है।” क्या आप समहत हैं? क्यों? “Authority can be delegated but responsibility can not be delegated,” Do you agree? Why?

 

 ‘अधिकार’ या ‘सत्ता’ प्रबन्ध की कुंजी मानी जाती है। अधिकार से आशय किसी व्यक्ति को प्राप्त उस वैधानिक शक्ति से होता है जिसके आधार पर वह अपने से नीचे के व्यक्तियों को आदेश दे सकता है। प्रबन्धकीय अधिकार एक व्यक्ति को अपने उच्चाधिकारी से प्राप्त होता है जिसके आधार पर वह अपने अधीनस्थों से उपक्रम के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कार्य करा सकता है। ये अधिकार विविध प्रकार के होते हैं; जैसे-उपक्रम का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार, उपक्रम की सम्पत्तियों के प्रयोग हस्तान्तरण या प्राप्त करने का अधिकार, प्रलेखों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार, कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार, अधीनस्थों को आदेश देने का अधिकार, दोषी अधीनस्थों को दण्ड देने का अधिकार, उत्पादों के मूल्य निर्धारण का अधिकार आदि। समस्त अधिकार सर्वोच्च प्रशासन (जैसे-कम्पनी की दशा में संचालक मण्डल) के पास केन्द्रित होते हैं और आवश्यकतानुसार शीर्ष प्रशासन अधिकारों का विकेन्द्रीकरण या प्रतिनिधायन करता है। यही भाव अधिकार की अग्रलिखित परिभाषाओं से भी स्पष्ट होता है

कुण्ट्ज एवं ओ ‘डोनेल के अनुसार, “अधिकार से तात्पर्य ऐसी वैधानिक स्वत्वाधिकार सम्बन्धी शक्ति से होता है जिसमें उपक्रम या विभागीय लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कार्य कराने या न कराने के लिए आदेश देने की शक्ति होती है।”

जी०आर० टेरी के अनुसार, “अधिकार से आशय उस स्वत्व या शक्ति से होता है जिसके अधीन प्रबन्धक आदेश देता है और अपनी इच्छानुसार उस आदेश का पालन कराता है।” हेनरी फेयोल के अनुसार, “अधिकार आदेश देने के स्वत्व तथा उसे पालन कराने की शक्ति को कहते हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अधिकार एक वैधानिक शक्ति है जिससे अधिकार प्राप्त करने वाला व्यक्ति अधीनस्थों से कार्य कराने में सफल होता है। भी व्यक्ति बिना अधिकार के अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं कर सकता।

 

अधिकार एवं शक्ति का पारस्परिक सम्बन्ध (Mutual Relationship Between Authority and Power)

 

अधिकार और शक्ति को पर्यायवाची समझा जाता है, परन्तु दोनों में थोड़ा-सा अन्तर है। अधिकार संगठन में पद ग्रहण करने के कारण प्रबन्धक को औपचारिक व विधिवत् रूप में प्राप्त होता है। शक्ति एक व्यापक शब्द है जिसमें अधिकार भी सम्मिलित होता है। शक्ति का अर्थ है दूसरों के व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता बोल्फे के अनुसार, “शक्ति का आशय एक व्यक्ति की उस अन्तर्निहित क्षमता से है जिससे कि वह किसी अन्य व्यक्ति को अपनी शक्ति के द्वारा एक निर्धारित व्यवहार क्षेत्र या समय में, किसी मार्ग ओर ले जा सकता है या उसमें परिवर्तन करा सकता है।” वास्तव में अधिकार शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत होता है, लेकिन संगठन में व्यक्ति अन्य स्रोतों; जैसे—व्यक्तिगत गुण, लम्बे अनुभव, सामाजिक प्रतिष्ठा, परम्परा, तकनीकी कौशल आदि से भी शक्ति प्राप्त करते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि शक्ति संगठन द्वारा औपचारिक व विधिवत् रूप में प्राप्त ही हो, लेकिन शक्ति के प्रयोग से व्यक्ति संगठन में प्रबन्धकीय निर्णयों को प्रभावित अवश्य करते हैं। संगठन चार्ट अधिकार सम्बन्धों को प्रदर्शित करते हैं, शक्ति केन्द्रों को नहीं। एक उच्चाधिकारी के अधिकार तुलनात्मक रूप से निम्नाधिकारी से अधिक हुआ करते हैं, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि शक्ति भी अधिक हो शक्ति का वास्तविक केन्द्र संगठन के किसी भी स्तर, वर्ग अथवा व्यक्ति में निहित हो सकता है। प्रायः हम देखते हैं कि निम्न स्तर का अनौपचारिक नेता निर्णयों को प्रभावित कर ले जाता है। उसमें अधिकार भले ही कम हो, लेकिन शक्ति अधिक होती है। संगठनात्मक व्यवहार और निर्णयन प्रक्रिया को ठीक से समझने के लिए अधिकार और शक्ति दोनों केन्द्रों को भली-भाँति जानना जरूरी है।

 

उत्तरदायित्व का आशय (Meaning of Responsibility)

 

उच्चाधिकारी के आदेशानुसार अपने कार्य को पूरा करने के कर्त्तव्य को उत्तरदायित्व कहते हैं। यह एक ऐसा नैतिक व वैधानिक बन्धन होता है जिससे अधीनस्थ कार्य को पूरा करने के लिए बाध्य होते हैं। थियो हैमन के शब्दों में, “उत्तरदायित्व एक अधीनस्थ पर अपने अधिकारी द्वारा इच्छित तरीके से कार्य को सम्पन्न करने का बन्धन है।” लुइस ए० एलन के शब्दों में, उत्तरदायित्व मानसिक एवं शारीरिक क्रियाएँ हैं, जिन्हें किसी कार्य के करने तथा कर्तव्य का पालन करने के लिए किया जाना चाहिए।” न्यूमैन और समर के अनुसार, “उत्तरदायित्व से हमारा आशय अपने निर्धारित कर्त्तव्यों को पूरा करने की एक अधीनस्थ द्वारा अनुभव की जाने वाली नैतिक अनिवार्यता से है।”

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अधिकार एवं उत्तरदायित्व में अन्तर (Difference Between Authority and Responsibility)

 

वास्तव में, अधिकार एवं उत्तरदायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उत्तरदायित्व के सफल निष्पादन हेतु समुचित अधिकारों का होना नितान्त आवश्यक है। अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों ही व्यक्तिनिष्ठ तत्त्व हैं। केवल व्यक्ति के ही अधिकार और उत्तरदायित्व हो सकते हैं, किसी निर्जीव उपकरण के नहीं। अधिकार और उत्तरदायित्व में निम्नलिखित अन्तर होते हैं –

 

(1) अधिकार सदैव उच्च अधिकारी से सम्बन्धित होता है, जबकि उत्तरदायित्व अधीनस्थ व्यक्तियों से।

(2) अधिकारों का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है, जबकि उत्तरदायित्व का नीचे से ऊपर की ओर।

(3) अधिकार अन्य लोगों से काम कराने की शक्ति है, जबकि उत्तरदायित्व किसी कार्य को करने का बन्धन होता है। नहीं।

(4) अधिकारों का प्रतिनिधायन या विकेन्द्रीकरण किया जा सकता है, उत्तरदायित्व का

 

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स्थायी योजनाएँ व्यवसायिक संगठन के प्रभावी प्रबन्ध

 

स्थायी योजनाएँ बार-बार उपयोग की जाने वाली योजनाएँ हैं। उदाहरणों में नीतियाँ, प्रक्रियाएँ और नियम शामिल हैं। स्थायी योजनाओं का लाभ यह है कि वे एक संगठन के भीतर एकता और निष्पक्षता को बढ़ावा देते हैं और कथित संगठनात्मक मूल्यों का समर्थन करने में मदद करते हैं। प्रबंधकों को पहले से ही विभिन्न संगठनात्मक नीतियों द्वारा संबोधित अद्वितीय निर्णय लेने की जरूरत नहीं है। स्थायी योजनाएँ भी समय बचाती हैं क्योंकि प्रबंधक अग्रिम में जानते हैं कि सामान्य परिस्थितियों को कैसे संबोधित किया जाए। अंत में, स्थायी योजनाएँ काम के प्रतिनिधिमंडल में सहायता करती हैं, क्योंकि कर्मचारी पहले से ही संगठन द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रियाओं और नियमों से परिचित हैं।

 

(i) स्थायी योजनाएँ उद्यम में समन्वय प्राप्त करने में मदद करती हैं। ये योजनाएँ प्रयासों में एकरूपता और एकता लाती हैं।

(ii) वरिष्ठ अधिकारी अधीनस्थों को अपने कार्य सौंपने में सक्षम है क्योंकि आवश्यक निर्णय लेने के लिए प्रक्रिया, नियम, विनियम आदि निर्धारित किए गए हैं।

(iii) ये योजनाएँ अस्पष्ट, जटिल या बहुआयामी होने पर भी लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करती है। जब भी निर्णय लेने में कुछ कठिनाई आती है, तो नीतियाँ, विधियाँ, नियम, प्रक्रियाएं संदर्भ के तैयार फ्रेम प्रदान करती हैं।

(iv) बहुत सोच-विचार, विचार-विमर्श और तर्कों के बाद स्थायी योजनाएँ बनती हैं। जब भी निर्णय लेने की आवश्यकता होती है, ये योजनाएँ त्वरित निर्णय लेने में मदद करती हैं। ये योजनाएँ बड़ी श्रम बचत उपकरण है क्योंकि वे आवर्ती स्थितियों से निपटने के लिए संदर्भ के फ्रेम प्रदान करती है।

नीतियाँ (Policies) जैसे कि ऊपर कहा गया है, स्थायी उपयोग योजनाओं के सबसे आम उदाहरण नीतियाँ हैं। संगठन के सुचारू संचालन के लिए नीतियाँ व्यापक दिशा-निर्देश प्रदान करती हैं। वे काम पर रखने और गोलीबारी, प्रदर्शन मूल्यांकन, पदोन्नति और अनुशासन जैसी चीजों को कवर करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी कंपनी की कार्यस्थल में रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करने की नीति हो सकती है या ऐसी नीति जो विनिर्माण क्षेत्रों में व्यक्तिगत सेल फोन के उपयोग को प्रतिबंधित करती है।

प्रक्रियाओं (Procedures ) – प्रक्रियाओं को लागू उस दोहरे संचालन में पालन किए जाने वाले कदम हैं। प्रक्रियाओं को कंपनी की नीतियों को प्रतिबिंबत करना चाहिए और संगठन के दीर्घकालिक लक्ष्यों का समर्थन करना चाहिए। प्रक्रियाएँ उन चरणों को भी विस्तृत कर सकती हैं जिनका पालन कर्मचारियों को निष्पक्ष और निष्पक्ष तरीकों से अनुशासित करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कर्मचारियों को लगता है कि अन्य कर्मचारियों ने अनुचित तरीके से उनसे बातचीत की है, तो उन्हें प्रबंधन के ध्यान में लाने के लिए प्रक्रिया का पालन करना चाहिए या संगठन आपात स्थिति के मामलों में अपनी समस्या को रखना चाहिए।

विनियम (Regulations) – विनियम यह दर्शाता है कि किसी संगठन में क्या स्वीकार्य है और क्या प्रतिबंधित है। दूसरे शब्दों में, एक विनियम एक तरह का नियम है जो सामान्य स्थितियों को संबोधित करता है। कई अस्पतालों और प्रयोगशालाओं में, उदाहरण के लिए, फिसलन वाले तलवों के साथ खुले पैर के जूते या जूते पहनने के खिलाफ सुरक्षा नियम हैं। राज्य और संघीय सरकारें अक्सर सार्वजनिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाले उद्योगों के लिए नियम जारी करती हैं।

रणनीतियाँ (strategies) – रणनीति शब्द का उपयोग सैन्य कार्रवाई योजनाओं की सामग्री में लंबे समय से किया गया है। इसका उपयोग उन भव्य योजनाओं को बताने के लिए किया गया था जिनके बारे में यह माना जाता है कि इसका प्रतिकुल प्रभाव पड़ सकता है। प्रबंधक अब व्यवसाय संचालन के व्यापक क्षेत्रों में रणनीतियों का उपयोग करते हैं। एक रणनीति एक व्यापक और एकीकृत योजना है जो यह सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन की गई है कि व्यावसायिक उद्देश्यों को पूरा किया जाए। उद्यम के दीर्घकालिक उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है और अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए अपेक्षित संसाधन आवंटित और तैनात किए जाते हैं। रणनीतियों का उद्देश्य उस तरह से उद्यम की एक तस्वीर निर्धारित करना है जो परिकल्पित है। रणनीतियाँ उद्देश्यों को उस तरह के उद्यम की एक तस्वीर निर्धारित करना है जो परिकल्पित है। रणनीतियाँ उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाने का प्रयास नहीं करती हैं, लेकिन वे सोच और कार्य को निर्देशित करने के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत करती हैं।

उद्देश्य (Purpose) – प्रत्येक संगठन का आर्थिक सामाजिक या धार्मिक उद्देश्य या मिशन होना चाहिए। किसी भी व्यावसायिक उद्यम या फर्म का मुख्य उद्देश्य निर्माणी वस्तुएँ तथा सेवाओं का उत्पादन और वितरण होता है। मुख्यतः माना जाता है कि किसी भी संस्था का उद्देश्य लाभ कमाना होता है परन्तु वर्तमान में लाभ कमाने के साथ-साथ संस्था अपने उत्पाद अथवा सेवा की प्रसिद्धि भी चाहती है। अतः वह न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पाद या सेवाओं को अपने ग्राहकों को देना चाहती है।

लक्ष्य (Target) – लक्ष्य, वे छोर हैं जिनकी ओर किसी उद्यम की गतिविधियाँ लक्षित होती हैं। वे न केवल नियोजन के अंतिम बिंदु का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि वह अंत जिसकी और अन्य सभी प्रबंधकीय कार्य लक्षित होते हैं। जैसा कि पहले बताया गया है, उद्यम के लक्ष्य फर्म की मूल योजना का गठन करते हैं, और उप-योजनाओं से संबंधित विभागीय उद्देश्य इसके लिए बंधे हैं। इस प्रकार उद्देश्य एक संगठन और उसके विभिन्न विभागों और उप-इकाइयों के प्रयासों का मार्गदर्शन करने के लिए स्थापित किए जाते हैं। उद्देश्यों की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार है

 

1, उद्देश्य एक उद्यम की बुनियादी योजनाओं का गठन करते हैं।

2, उद्देश्य बहुवचन हैं क्योंकि प्रत्येक संगठन एक उद्देश्य के बजाय कई प्राप्त करना चाहता है।

3, उद्देश्य एक पदानुक्रम बनाते हैं, अर्थात्, उन्हें इस तरह से व्यवस्थित किया जा सकता है कि प्रत्येक उप-इकाई के लक्ष्य उस बड़ी इकाई के लक्ष्यों में योगदान करते हैं जिनमें से यह एक हिस्सा है।

4, उद्देश्य एक नेटवर्क बनाते हैं, अर्थात, लक्ष्य परस्पर जुड़े होते हैं और परस्पर सहायक होते हैं।

5, उद्देश्य व्यापक और सामान्य हो सकते हैं, या विशेष रूप से उल्लेख किए जा सकते हैं।

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विकेन्द्रीकरण (Decentralization)

 

विकेन्द्रीकरण की परिभाषाएँ (Definitions of Decentralization)

 

सामान्य अर्थ में विकेन्द्रीकरण से तात्पर्य निर्णयन अधिकारों का संगठन में प्रबन्ध के निम्नतम स्तर तक फैलाव से है। विभिन्न प्रबन्धशास्त्रियों ने विकेन्द्रीकरण की निम्न परिभाषाएँ दी हैं

लुईस ए० एलन के अनुसार, “उन अधिकारों के अतिरिक्त जिनका प्रयोग केवल केन्द्रीय बिन्दु पर ही किया जाता है, समस्त अधिकारों का निम्नतम स्तर तक प्रत्यायोजन करने का क्रमबद्ध प्रयास ही विकेन्द्रीकरण कहा जाता है।”

हेनरी फेयोल के अनुसार, “प्रत्येक कार्य जो अधीनस्थों की भूमिका के महत्त्व में वृद्धि करता है, विकेन्द्रीकरण कहलाता है।”

गैरी डैसलर के अनुसार, “विकेन्द्रीकरण से आशय अधीनस्थों विभिन्न मामलों में निर्णयन अधिकार के ऐसे प्रत्यायोजन से है जिसमें कुछ निश्चित अत्यावश्यक मामलों में नियन्त्रण बनाए रखा जाता है।”

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विकेन्द्रीकरण की विशेषताएँ या लक्षण (Characteristics of Decentralization)

 

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर विकेन्द्रीकरण के निम्न लक्षण कहे जा सकते हैं –

(1) यह प्रबन्ध के निम्नतम स्तर तक अधिकारों के प्रत्यायोजन का व्यवस्थित प्रयास है।

(2) यह अधीनस्थों की भूमिका को महत्त्व प्रदान करता है।

(3) यह अधीनस्थों को स्वायत्तता तथा परिणाम प्रदर्शित करने का अवसर देता है।

(4) विकेन्द्रीकरण में भी अत्यावश्यक मामलों में केन्द्रीकृत निर्णयन बनाए रखना सम्भव होता है।

(5) यह भारार्पण या प्रत्यायोजन का प्रथम चरण है।

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भारार्पण तथा विकेन्द्रीकरण में अन्तर (Difference between Delegation and Decentralization)

 

यद्यपि भारार्पण तथा विकेन्द्रीकरण एक जैसे प्रतीत होते हैं, परन्तु निम्न रूपों में इन दोनों में अन्तर है

(1) विकेन्द्रीकरण भारार्पण से अधिक व्यापक है। भारार्पण से आशय एक व्यक्ति से उसके निकटतम अधीनस्थ के अधिकारों के हस्तान्तरण से है, परन्तु विकेन्द्रीकरण से आशय सम्पूर्ण संगठन में अधिकारों के फैलाव (diffusion) से है।

(2) भारार्पण अधिकार हस्तान्तरण की एक प्रक्रिया है, परन्तु विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत प्रबन्ध के निम्नतम स्तर तक अधिकार हस्तान्तरण के लिए भारार्पण की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति की जाती है।

(3) भारार्पण में नियन्त्रण वरिष्ठ प्रबन्धकों के हाथ में रहता है, परन्तु विकेन्द्रीकरण में कुछेक अत्यावश्यक मामलों को छोड़कर अन्य अधिकांश मामलों में अधिकार अधीनस्थों या विभागीय प्रबन्धकों को अन्तरित (delegate) कर दिए जाते हैं।

(4) भारार्पण प्रबन्ध की एक आवश्यक दशा है, क्योंकि बिना भारार्पण अधीनस्थ से कार्य सम्पन्न कराना सम्भव नहीं है, परन्तु विकेन्द्रीकरण ऐच्छिक है और यह सर्वोच्च प्रबन्ध की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह अधिकारों को सम्पूर्ण संगठन में अन्तरित करे या न करे। मात्र भारार्पण से भी कार्य संचालन सम्भव है।

(5) भारार्पण प्रबन्ध की एक तकनीक है, जबकि विकेन्द्रीकरण प्रबन्ध का दर्शन है।

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विकेन्द्रीकरण की मात्रा का मापन (Measurement of the Degree of Decentralization)

 

एक कम्पनी या संगठन में विकेन्द्रीकरण के स्तर को मापने के लिए निम्न दिशा-निर्देश बनाए गए हैं—

(1) संगठन में निम्नतम स्तर पर जितने अधिक संख्या में निर्णय लिए जाते हैं उतना ही अधिक वह विकेन्द्रीकृत माना जाता है।

(2) किसी समस्या का हल उसके जितने अधिक निकट के अधिकारी के हाथ में होता है वह संगठन उतना ही अधिक विकेन्द्रीकृत माना जाता है। उदाहरण के लिए, यदि बी०पी०एल० अपने आगरा क्षेत्र के विपणन अधिकारी को दोषपूर्ण टी०वी० सेट बदलने का अधिकार प्रदान कर दे तो यह अधिक विकेन्द्रीकृत होगी अपेक्षाकृत उस स्थिति के जब इसके बदलने के लिए अनुमति विपणन प्रबन्धक, दिल्ली से लेनी होती।

(3) निम्न स्तर पर लिए जाने वाले निर्णय जितने अधिक महत्त्वपूर्ण होंगे, उतना ही अधिक विकेन्द्रीकरण माना जाएगा। एक संगठन जिसमें प्रभागीय प्रबन्धक (division manager) को 10 लाख रुपये तक की मशीन क्रय करने का अधिकार है, उस संगठन से अधिक विकेन्द्रीकृत माना जाएगा जिसमें प्रभागीय प्रबन्धक को मात्र 1 लाख रुपये तक की मशीन क्रय करने का अधिकार है यदि संगठन समान आकार वाले हैं।

(4) जहाँ अधीनस्थ को अपने अधिकारी से निर्णयों के सम्बन्ध में न्यूनतम परामर्श करना पड़े, वहाँ विकेन्द्रीकरण सर्वाधिक माना जाता है। इसके विपरीत, जहाँ अधिकांश निर्णयों में अधिकारी की स्वीकृति लेनी पड़े वहाँ विकेन्द्रीकरण अल्प स्तर का माना जाता है।

(5) जहाँ प्रबन्धकों पर नियन्त्रण जितने चुनींदा एवं विशिष्ट प्रकृति के होंगे, वहाँ संगठन उतना ही अधिक विकेन्द्रीकृत माना जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि हिन्दुस्तान लीवर लि० खाद्य पदार्थ प्रभाग के प्रबन्धक को वर्ष में मात्र चार बार विनियोग पर प्रतिफल सम्बन्धी रिपोर्ट प्रस्तुत करने हेतु प्रबन्ध संचालक से मिलना होता है, अन्य सभी मामलों में वह स्वतन्त्र है तो यह विकेन्द्रीकृत संगठन कहा जाएगा।

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विकेन्द्रीकरण के सिद्धान्त (Principles of Decentralization)

 

विकेन्द्रीकरण के निम्नलिखित प्रमुख सिद्धान्त हैं—

 

1, उत्पादों की विविधता का सिद्धान्त (Theory of Diversity of Products) – एक फर्म के जितने अधिक उत्पाद होंगे उतना ही अधिक विकेन्द्रीकरण सम्भव है, क्योंकि इनमें उत्पादों के आधार पर प्रभागों ( divisions) की आसानी से रचना की जा सकती है और निर्णयन कार्य विकेन्द्रित किया जा सकता है।

2, संगठन के आकार का सिद्धान्त (Theory of Organization Size) – सामान्यतया एक संगठन का आकार जितना बड़ा होगा उतना ही अधिक तीव्रता से परिवर्तन होंगे, उतना ही अधिक विकेन्द्रीकरण सम्भव होगा। यही कारण है कि लघु इकाइयों की तुलना में वृहत् इकाइयों में निर्णय विकेन्द्रीकृत होते हैं।

3, वातावरण में परिवर्तन का सिद्धान्त (Theory of Change in Environment) – एक फर्म को प्रभावित करने वाले वातावरण में जितनी अधिक तीव्रता से परिवर्तन होंगे उतना ही अधिक विकेन्द्रीकरण सम्भव होगा। उदाहरण के लिए, सिलेसिलाए वस्त्र व्यवसाय में फैशन, रुचि, उत्पाद विविधता में इतने तेजी से परिवर्तन होते हैं कि उनका निम्नस्तरीय प्रबन्धक जो दिन-प्रतिदिन उपभोक्ता के सम्पर्क में रहते हैं, आसानी से सामना कर सकते हैं, अतः उन्हें निर्णयन अधिकार मिलने चाहिए जो विकेन्द्रीकरण प्रदससान करेगा।

4, उपयुक्त नियन्त्रण का सिद्धान्त (Principle of Appropriate Control) – अधिकार अन्तरण तथा विकेन्द्रीकरण से पूर्व उपयुक्त तथा सामयिक नियन्त्रणों की व्यवस्था विकेन्द्रीकरण की सफलता के लिए आवश्यक है। पूँजीगत व्ययों का सामयिक अंकेक्षण नियन्त्रण का एक उदाहरण है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित राशि तक के पूँजीगत विनियोग सम्बन्धी निर्णयों का अधिकार प्रबन्धकों को सौंपा जा सकता है।

5, समय का सिद्धान्त (Theory of Time) – विकेन्द्रीकरण ऐसे प्रबन्ध क्षेत्रों में अवश्य किया जाना चाहिए जहाँ से आपको समय की बहुत अधिक बचत हो सकती है और केन्द्रीकृत नियन्त्रण द्वारा सही परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

6, क्षमता का सिद्धान्त (Theory of Capacity) – विकेन्द्रीकरण करते समय अधीनस्थों की क्षमता का आकलन भी कर लेना चाहिए। अधीनस्थों की क्षमता पर हो विकेन्द्रीकरण की सफलता निर्भर करती है।

7, भारार्पण का सिद्धान्त (Theory of Delegation) – चूंकि विकेन्द्रीकरण में अधिकारों का अन्तरण किया जाता है अतः भारार्पण या अधिकार अन्तरण के सिद्धान्त भी विकेन्द्रीकरण में लागू होते हैं, जैसे किसी त्रुटि के लिए अधीनस्थों की आलोचना न की जाए, अधिक कार्यभार के लिए उचित क्षतिपूर्ति की जाए आदि।

8, उपयुक्त सम्प्रेषण का सिद्धान्त (Theory of Suitable Communication) – विकेन्द्रीकरण तभी सफल हो सकता है जब संगठन के अन्तर्गत उपयुक्त एवं प्रभावी सम्प्रेषण को व्यवस्था हो, क्योंकि प्रभावी सम्प्रेषण द्वारा ही समन्वय तथा नियन्त्रण किया जा सकता है।

9, लिक फैलाव का द्वान्त (Theory of Geographical Spread) – यदि एक संगठन में उत्पादन व विक्रय भौगोलिक रूप में दूर-दूर तक फैले हुए हैं तो विकेन्द्रीकरण अवश्यम्भावी होता है। यदि उत्पादन किसी एक स्थान पर या एक भवन में ही किया जा रहा है तो विकेन्द्रीकरण उतना आवश्यक नहीं रह जाता है।

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मानव संसाधन नियोजन (Human Resource Planning)

उपक्रम में मानव संसाधन या मानव शक्ति (man power) नियोजन के अन्तर्गत गुणात्मक और संख्यात्मक दोनों दृष्टियों से मानव संसाधनों की आवश्यकताओं और विभिन्न स्त्रोतों से उनकी आपूर्ति के लिए योजना बनाई जाती है। मानव संसाधन नियोजन के दो चरण हैं- पहले चरण में मानव संसाधनों की आवश्यकताओं का नियोजन किया जाता है कि नियोजन की समयावधि में किस प्रकार के कितने लोगों की आवश्यकता होगी। दूसरे चरण में मानव संसाधनों की नियोजित आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से उनकी आपूर्ति सुनिश्चित करने की योजना बनाई जाती है, अर्थात् नियोजित आवश्यकताओं के सन्दर्भ में आन्तरिक स्रोतों के माध्यम से कितने लोग उपलब्ध हो सकेंगे और शेष लोगों की उपलब्धि के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाएँगे। मानव संसाधन नियोजन के अन्तर्गत निम्नलिखित बातें शामिल हैं –

 

(1) मानव संसाधनों की आवश्यकताओं का प्रक्षेपण

(2) मानव संसाधनों की सम्पत्ति सूची

(3) उपलब्ध मानव संसाधनों और अपेक्षित मानव संसाधनों के बीच अन्तराल का पता

(4) जॉब-विश्लेषण।

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भर्ती के स्रोत (Sources of Recruitment)

 

भर्ती के विभिन्न स्रोतों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जाता है –

(I) आन्तरिक स्रोत, (II) बाह्य स्रोत

 

प्रायः भर्ती हेतु उपक्रम उपर्युक्त दोनों ही स्रोतों का उपयोग करते हैं, यद्यपि किसी एक स्रोत की तुलना में दूसरे स्रोत का अपेक्षाकृत कम या अधिक प्रयोग बहुत कुछ प्रबन्धकीय नीति जॉब के विशिष्टीकरण के स्तर, श्रम संघों के दबाव तथा प्रशिक्षण आवश्यकताओं के आधार पर प्रभावित होता है।

 

(I) आन्तरिक स्त्रोत (Internal Sources) – भर्ती के आन्तरिक स्रोत में उन कर्मचारियों को सम्मिलित किया जाता है जो कम्पनी में पहले से ही कार्यरत हैं। रिक्त पदों का कर्मचारियों की प्रोन्नति अथवा स्थानान्तरण द्वारा भरा जाना ही भर्ती के आन्तरिक स्रोत का प्रयोग करना है।

(II) प्रोन्नति के लाभ या गुण (Merits of Promotions) – आन्तरिक स्रोत द्वारा भर्ती (प्रोन्नति) के प्रमुख लाभ या गुण निम्नलिखित है –

 

(1) प्रोन्नति में कर्मचारियों के चयन में गुणात्मक सुधार सम्भव है क्योंकि एक कम्पनी को बाह्य व्यक्तियों की तुलना में अपने कर्मचारियों की अच्छाइयों तथा बुराइयों की बेहतर जानकारी होती है।

(2) प्रोन्नति से वर्तमान कर्मचारी अधिक जिम्मेदारी वाले पदों पर पहुँचने के लिए अभिप्रेरित होते हैं।

(3) प्रारम्भिक स्तर पर बाह्य स्रोतों से कम्पनी को अच्छे अभ्यर्थी मिल जाते हैं क्योंकि वे कम्पनी की प्रोन्नति नीति का लाभ उठाना चाहते हैं।

(4) यह कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि करता है।

(5) प्रोन्नति से कम्पनी अपने कर्मचारियों का सर्वोपयुक्त एवं सर्वाधिक उपयोग कर पाती है। स्थानान्तरण कर्मचारियों को विभिन्न क्षेत्रों में कार्य सीखने का अवसर भी प्रदान करता है।

(6) भर्ती की यह विधि कम खर्चीली है क्योंकि इसमें विज्ञापन लिखित परीक्षा आदि पर व्यय नहीं करना पड़ता।

(7) प्रोन्नति से कर्मचारी अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक वफादार बनते हैं, वे कम्पनी छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहते।

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प्रोन्नति के दोष या अवगुण (Demerits of Promotions) – आन्तरिक स्रोत द्वारा भर्ती के निम्नलिखित दोष या अवगुण कहे जा सकते हैं –

(1) इस विधि में कम्पनी में प्रोन्नति एक क्रम में धीरे-धीरे होती है जो अत्यधिक कुशाग्र कर्मचारी के विकास में बाधक होती है।

(2) इस विधि में कभी-कभी विशिष्ट ज्ञान वाले पदों के लिए योग्य व्यक्ति नहीं मिल पाते हैं और कम्पनी को कर्मचारियों के गुणात्मक स्तर पर समझौता करना पड़ता है।

(3) इस विधि में जब वरिष्ठता के साथ-साथ योग्यता पर भी ध्यान दिया जाता है तो कुछ लोगों को इच्छानुकूल पद नहीं मिल पाता और उनमें असन्तोष उभरने लगता है।

(4) प्रोन्नति से कम्पनी में नवीन दृष्टिकोण का विकास अवरुद्ध होता है क्योंकि कार्यरत कर्मचारी कम्पनी की विद्यमान प्रणाली तथा कार्य शैली में ही कार्य करना पसन्द करते हैं।

उपर्युक्त अवगुणों के बावजूद भी बड़ी कम्पनियाँ भर्ती के आन्तरिक स्रोत को काफी सीमा तक अपनाती रही है। प्रोक्टर एण्ड गेम्बल, डूपोन्ट, सीअर्स, जनरल मोटर्स, टेलको, टिस्को आदि विदेशी एवं भारतीय कम्पनियाँ प्रबन्ध के मध्यम एवं उच्च स्तर पर नियुक्तियों में इस विधि का कम-से-कम आधे से अधिक पदों को भरने में प्रयोग करती रही हैं।

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(II) बाह्य स्त्रोत (External Sources) – भर्ती के प्रमुख बाह्य स्रोत निम्नलिखित है –

 

(1) प्रत्यक्ष भर्ती (Direct Recruitment) –  बहुत-सी कम्पनी विज्ञापन व्यय कम करने तथा एजेन्सीज को कमीशन देने के स्थान पर अपने ही कार्यालय द्वारा प्रत्यक्ष भर्ती को प्रोत्साहन देती हैं। इसमें कम्पनी रिक्तियों की सूचना अपने सूचना पट पर लगा देती है तथा अपने वर्तमान कर्मचारियों को सूचित कर देती है। इसके पश्चात् ये कर्मचारी अपने मित्रों या रिश्तेदारों या अन्य जानकार व्यक्तियों को कम्पनी कार्यालय में सीधे आवेदन करने को प्रोत्साहित करते हैं।

(2) शिक्षा संस्थान (Educational Institutes) – शिक्षा संस्थान जैसे विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, इंजीनियरी संस्थान, प्रबन्ध संस्थान आदि भी भर्ती के प्रमुख स्रोत हैं। यद्यपि ‘कैम्पस भर्ती काफी खर्चीली होती है तथापि बड़ी कम्पनियाँ भारत में विभिन्न संस्थानों से प्रतिवर्ष कैम्पस साक्षात्कार द्वारा इंजीनियरों, प्रबन्धकों, कम्प्यूटर विशेषज्ञों की नियुक्ति करती हैं। इस प्रणाली में कम्पनियों को सीधी भर्ती द्वारा उच्च शिक्षित तथा योग्य कर्मचारी मिल जाते हैं।

(3) परामर्शदाता (Consultants)- बड़े-बड़े औद्योगिक नगरों जैसे मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली आदि में परामर्शदाता संगठनों की स्थापना कर ली गई है जो अन्य प्रबन्धकीय कार्यों के साथ-साथ मध्यम व उच्चस्तरीय प्रबन्धकों की खोज का कार्य भी करते हैं। ये अपने पास उन प्रबन्धकों की सूची तथा जानकारी रखते हैं जो जॉब परिवर्तन चाहते हैं। ये परामर्शदाता विश्वस्त तरीके से इनके साक्षात्कार आदि की व्यवस्था करते हैं तथा भुगतान पैकेज के निर्धारण में भी मदद करते हैं। नियुक्ति हो जाने पर ये अपना कमीशन कम्पनी से प्राप्त करते हैं जिससे नियुक्ति कराई है। कमीशन की राशि नियुक्त प्रबन्धक के दो से तीन माह के वेतन के बराबर होती है।

(4) रोजगार एजेन्सी (Employment Agencies) – रोजगार एजेन्सी सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही प्रकार की हो सकती है। भारत में सरकार की ओर से पूरे देश में रोजगार कार्यालय खुले हुए हैं जिनके माध्यम से कोई भी कम्पनी श्रमिक तथा लिपिक आदि कार्यों हेतु आवेदकों की सूची माँग सकती है। कुछ निजी अभिकर्त्ता भी श्रमिकों की आपूर्ति करते हैं और उसके बदले में निर्धारित शुल्क लेते हैं।

(5) विज्ञापन (Advertisement) – भर्ती हेतु विज्ञापन अभ्यर्थियों को आकर्षित करने का एक अच्छा स्त्रोत है। यह वैज्ञानिक, पेशेवर तथा तकनीकी कर्मचारियों की भर्ती के लिए अत्यन्त उपयोगी पाया गया है। इसके अन्तर्गत कम्पनी राष्ट्रीय अथवा स्थानीय समाचार पत्रों में रिक्त स्थानों के लिए विज्ञापन देकर उपयुक्त योग्यता रखने वाले लोगों को आवेदन पत्र भेजने के लिए आमन्त्रित करती हैं। कभी-कभी ये विज्ञापन पेशेवर पत्रिकाओं जैसे दी चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट, दी मैनेजमेण्ट आदि में भी दिए जाते हैं।

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कर्मचारियों का चयन (Selection of Employees)

 

किसी भी कर्मचारी को कार्य पर लगाने से पूर्व उसका चयन करना आवश्यक होता है। कर्मचारी चयन का उद्देश्य सही व्यक्ति को सही काम सौंपना होता है ताकि न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन किया जाना सम्भव हो सके। कर्मचारियों का चयन उपक्रम के भीतरी तथा बाहरी व्यक्तियों में से किया जाता है। आन्तरिक व्यक्तियों का चयन उनकी पदोन्नति, स्थानान्तरण तथा पदावनति द्वारा किया जा सकता है। बाहरी व्यक्तियों का चयन उनका साक्षात्कार लेकर किया जा सकता है। यहाँ पर कर्मचारी चयन से आशय बाहरी व्यक्तियों में से योग्य व्यक्तियों का चयन करने से होता है। भर्ती किए गए कर्मचारियों में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को कार्य के योग्य घोषित करना चयन कहलाता है।

जब कर्मचारियों की भर्ती करके यह मालूम कर लिया जाता है कि कौन-कौन व्यक्ति संगठन में कार्य करने के योग्य हैं, तो फिर उन व्यक्तियों में से अपनी आवश्यकतानुसार व्यक्तियों का चयन किया जाता है। चयन प्रक्रिया में वास्तव में किसी व्यक्ति को किसी कार्य लिए चुन लिया जाता है। संगठन के रिक्त स्थानों की पूर्ति हेतु कर्मचारियों का निर्वाचन करना ही चयन कहलाता है।

डेल योडर (Dale Yoder) के अनुसार, “चयन वह प्रक्रिया है, जिससे रोजगार के प्रार्थियों को दो भागों में विभाजित कर दिया जाता है-वे जिन्हें रोजगार दिया जाना है तथा वे जिन्हें रोजगार नहीं देना है।” चयन करते समय उपक्रम के विभिन्न विभागों में आवश्यक व्यक्तियों की संख्या ज्ञात करके रिक्त पदों की जानकारी प्राप्त की जाती है, कार्य विवरणों की सहायता से कर्मचारियों की अपेक्षित योग्यताएँ मालूम की जाती है तथा कार्य विवरण द्वारा निर्धारित योग्यताओं एवं व्यक्ति की योग्यता का मिलान करके उपयुक्त व्यक्ति का चयन किया जाता है।

 

इस प्रकार कर्मचारी चयन में निम्नलिखित बातों का समावेश किया जाता है – (1) भर्ती के माध्यम से विभिन्न स्रोतों से कर्मचारियों की उपलब्धता को ज्ञात करना तथा उन्हें उपक्रम में कार्य करने के लिए तत्पर करना।

(2) कार्य विवरण तथा कार्य मूल्यांकन द्वारा विभिन्न पदों पर नियुक्त किए जाने वाले कर्मचारियों की योग्यता, गुण, अनुभव, दायित्व तथा वेतन आदि का निर्धारण करना।

(3) उपक्रम के विभिन्न रिक्त पदों तथा नवसृजित पदों की संख्या ज्ञात करना।

(4) भर्ती किए गए कर्मचारियों का परीक्षण करना तथा साक्षात्कार करना और अपेक्षित योग्यताओं से मेल खाने वाले कर्मचारियों का चयन करना।

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समन्वय का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Coordination)

 

कुछ प्रबन्धशास्त्री समन्वय को प्रबन्ध का कार्य मानते हैं, जबकि कुछ अन्य इसे प्रबन्ध का सार कहते हैं। इसे कहा कैसे भी जाए परन्तु यह निश्चित है कि समन्वय प्रबन्ध का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाग है। वास्तव में, समन्वय एक संस्था की अन्तर-आश्रित क्रियाओं में कार्य की एकजुटता लाने की प्रक्रिया मात्र है। विभिन्न विद्वानों ने समन्वय को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है –

हेनरी फेयोल के अनुसार, “समन्वय एक संस्था की सभी क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित करता है ताकि संस्था का कार्य सुविधाजनक ढंग से एवं सफलतापूर्वक चलता रहे।” कूण्ट्ज तथा ओ ‘डोनेल के अनुसार, “समन्वय प्रबन्ध का सार है जो निर्धारित समूह लक्ष्य को पूरा करने के लिए व्यक्तिगत प्रयासों में सामंजस्य पैदा करता है।”

ई०एफ०एल० ब्रेच के अनुसार, “समन्वय से आशय विभिन्न सदस्यों के मध्य कार्यों का औचित्यपूर्ण आवंटन सुनिश्चित करके तथा यह निश्चित करके कि सदस्य स्वयं पूर्ण सामंजस्य के साथ कार्य निष्पादन में लगे हैं, संगठन में सन्तुलन एवं समूह एकजुटता उत्पन्न करने से है।”

 

समन्वय की प्रकृति या लक्षण (Nature or Characteristics of Coordination) – समन्वय की प्रकृति का निरूपण करने वाले प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

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1, प्रणाली विचारधारा (System Concept) – समन्वय एक प्रणाली विचारधारा है जो एक उपक्रम को सामूहिक प्रयासों के समन्वय की प्रणाली मानता है तथा संगठन संरचना में विभिन्न क्रियाओं के बीच अन्तर-आश्रितता तथा समूह प्रयासों के सामंजस्य को सुनिश्चित करता है

2, उद्देश्य की एकता (Unity of Purpose) – जब संस्था तथा कर्मचारियों का उद्देश्य एक ही हो तो विभिन्न विभागों तथा क्रियाओं में समन्वय बनाना सहज हो जाता है।

3, प्रबन्ध का उत्तरदायित्व (Responsibility of Management) – समन्वय प्रबन्ध का ऐसा आधारभूत उत्तरदायित्व है जो प्रबन्धकीय कार्यों द्वारा प्राप्त किया जाता है। सामान्यतः प्रबन्धक इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहते हैं।

4, सतत प्रक्रिया (Continuous Process) – समन्वय एक सतत प्रक्रिया है सम्पूर्ण उपक्रम में निरन्तर चलती रहती है।

5, स्वैच्छिक कार्य (Voluntary Function) – प्रबन्ध की स्वेच्छा का परिणाम समन्वय है। यह अचानक या दबाव द्वारा सृजित नहीं किया जा सकता।

6, प्रबन्ध का सार (Essence of Management) – समन्वय प्रबन्ध का एक विशिष्ट कार्य न होकर उसका ‘सार’ है। यह प्रबन्ध के सभी कार्यों में व्याप्त होता है।

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समन्वय का महत्त्व (Significance of Coordination)

 

1, सिनर्जी प्रभाव (Synergy Effect) – जब समूह का सामूहिक योगदान समूह के प्रत्येक सदस्य द्वारा पृथक्-पृथक् किए जा सकने वाले योगदान के योग से अधिक हो तो इसे सिनर्जी लाभ कहा जाता है। समन्वय द्वारा एक संगठन को सिनर्जी लाभ प्राप्त होना सम्भव होता है क्योंकि समन्वय द्वारा वैयक्तिक प्रयास समूह प्रयास में बदल दिए जाते हैं और इस प्रकार संगठन की कुल कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

2, विभागीय अन्तर आश्रितता (Departmental Inter-dependence) – निर्माणी तथा सेवा उपक्रमों में उच्च स्तर की विभागीय आश्रितता पायी जाती हैं, जैसे एक निर्माणी उपक्रम में उत्पादन विभाग, विपणन विभाग, वित्त विभाग तथा सेविवर्गीय विभाग मे अन्तर सम्बन्धित तथा अन्तर आश्रित होते हैं तथा एक विभाग की अक्षमता सम्पूर्ण उपक्रम पर कुप्रभाव डालती है, तब इन विभागों में समन्वय बनाए रखकर ही वांछित परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

3, एकजुट कार्य (Team Work) – समन्वय के बिना एक संस्था के कर्मचारों भिन्न-भिन्न दिशाओं में जा सकते हैं, समन्वय समूह के सदस्यों में सामान्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एकजुट हो जाने का आह्वान करता है।

4, बढ़ते हुए आकार की समस्या (Problem of Increasing Size) – जैसे-जैसे उदारीकरण और भूमण्डलीकरण पर जोर दिया गया है, उपक्रमों के आकार में बेतहाशा वृद्धि होने लगी है। उपक्रमों का बढ़ता हुआ आकार, जटिल संगठन संरचना तथा दोषपूर्ण सम्प्रेषण को जन्म देता है और ऐसी दशा उपक्रम की प्रवाहपूर्ण कार्यप्रणाली के लिए समन्वय की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

5, विरोधाभासी लक्ष्य (Conflicting Goals) – प्रायः यह देखा गया है कि एक हो संगठन के विभागीय लक्ष्य तथा वैयक्तिक लक्ष्य परस्पर विरोधी होते हैं और इससे संसाधनों का दुरुपयोग होने लगता है। समन्वय ऐसे विरोध को दूर करके संसाधनों के सदुपयोग को सम्भव बनाता है।

6, अनेकता में एकता (Unity in Diversity) – प्रबन्धकीय कार्यों में समन्वय का स्थान सर्वोपरि होता है; इसीलिए इसे प्रबन्ध का सार कहा जाता है। प्रत्येक संगठन या संस्था में विविध योग्यताओं, इच्छाओं, दृष्टिकोणों तथा क्रियाओं वाले व्यक्ति कार्य करते हैं। यदि इस विविधता को उद्देश्य की एकता में परिवर्तित न किया जाए तो परिणाम घातक होंगे। एक समन्वय ही है जो अनेकता को एकता में बदलकर संगठन को कार्यकुशल बनाता है।

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समन्वय की तकनीकें अथवा विधियाँ (Techniques or Methods of Coordination)

 

एक उपक्रम में प्रबन्धकों को समन्वय प्राप्त करने के लिए विभिन्न तकनीकों का प्रयोग करना पड़ता है। इनमें प्रमुख तकनीकें निम्नवत् हैं –

 

1, विशिष्ट व्यक्ति द्वारा समन्वय (Coordination by Special Person) – जब दो या अधिक विभागों के मध्य संविदा की मात्रा अधिक हो जाती है तो एक विशिष्ट व्यक्ति को समन्वय कार्य सौंप दिया जाता है जैसे विपणन और उत्पादन विभाग में अत्यधिक समन्वय की आवश्यकता है तो ऐसा व्यक्ति निरन्तर उत्पादन विभाग से सम्पर्क रखेगा तथा विपणन आवश्यकतानुसार उत्पादन तालिका तैयार कराएगा।

2, समिति द्वारा समन्वय (Coordination through Committee) – बहुत-सी कम्पनियों में समन्वय का कार्य अन्तर विभागीय समिति बनाकर किया जाता है। इस समिति में सभी विभागों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं जो समय-समय पर मीटिंग करते हैं और समन्वय हेतु निर्णय लेते हैं।

3, विभागीकरण द्वारा समन्वय (Coordination by Departmentalization) – यदि कम्पनी में कार्यात्मक विभागीकरण प्रणाली अपनायी गयी है तो उत्पादन, विपणन, वित्त आदि विभाग ऐसे होंगे जो पूर्णतया अन्तर-आश्रित हैं और उनमें समन्वय बनाए रखना आवश्यक है, समन्वय का यह कार्य मुख्य प्रबन्धक सम्पन्न करेगा।

4, प्रबन्धकीय उत्तराधिकार द्वारा समन्वय (Coordination through Managerial Hierarchy) – आदेश श्रृंखला का सिद्धान्त भी समन्वय उत्पन्न करता है। एक अधिकारी के अधीन कार्यरत दो या अधिक अधीनस्थ अधिकारी के आदेशानुसार कार्य करते हैं। तो उनके कार्यों में समन्वय बना रहता है। इसमें समन्वय उत्पन्न करने में समस्या तब उत्पन्न होती है जब अधीनस्थों की संख्या अधिक होती है और उनमें आपसी टकराव की स्थिति बन गई हो।

5, नियम व क्रियाविधि द्वारा समन्वय (Coordination by Rules and Procedure) – नैत्यक (routine) कार्यों के समन्वय हेतु नियम व क्रियाविधि भी उपयोग में लायी जाती है जैसे एक विद्यालय में प्रत्येक शिक्षक को कक्षा की समय-सारणी के अनुसार पढ़ाना होता है, उससे विभिन्न अध्यापकों के शिक्षण कार्य का समन्वय स्वयमेव ही हो जाता है। समय-सारणी विद्यालय की क्रियाविधि का ही एक अंग है।

6, लक्ष्य के आधार पर समन्वय (Coordination by Target or Goals) – अधिकांश प्रबन्धक अपने अधीनस्थों के लिए लक्ष्य निर्धारित कर देते हैं। जब सभी प्रबन्धक अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करने हेतु प्रयास करते हैं तो स्वयं ही समन्वय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उदाहरणार्थ- यदि विक्रय प्रबन्धक का लक्ष्य, वर्ष में 1 लाख इकाई विक्रय करना रखा गया है तो उत्पादन प्रबन्धक का लक्ष्य 1 लाख इकाई उत्पादन करना तथा वित्त प्रबन्धक का लक्ष्य आवश्यक संसाधन जुटाना है, तीनों प्रबन्धकों द्वारा लक्ष्य प्राप्ति का उद्देश्य उनमे समन्वय उत्पन्न करना है।

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नियन्त्रण से आशय एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Control)

 

प्रबन्धन के क्षेत्र में नियन्त्रण एक प्रमुख उपादान है। नियन्त्रण के द्वारा ही प्रबन्धन तन्त्र को कार्य निष्पादन की जानकारी प्राप्त होती है। विभिन्न विद्वानों ने नियन्त्रण के सम्बन्ध में निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं

 

ई०एफ०एल० ब्रीच के शब्दों में, “नियन्त्रण का अभिप्राय पर्याप्त प्रगति तथा सन्तोषजनक निष्पादन को निश्चित करने के लिए वर्तमान निष्पादन का योजनाओं में पूर्व निश्चित प्रमापों के साथ मिलान करना होता है तथा योजना को कार्यान्वित करने में प्राप्त अनुभव को भविष्य की अपेक्षित क्रियाओं के मार्गदर्शन के लिए संचित करना होता है।”

 

कूण्ट्ज एवं ‘डोनेल के अनुसार, “नियन्त्रण एक प्रबन्धकीय कार्य है, जो अधीनस्थ कर्मचारियों के निष्पादन का मापन एवं उसमें सुधार करता है, जिससे यह निश्चित हो सके कि उपक्रम के उद्देश्य एवं उनको प्राप्त करने के लिए निर्धारित योजनाओं को कार्यान्वित किया ज रहा है।”

जॉर्ज आर० टैरी के शब्दों में, “नियन्त्रण से आशय इस तथ्य का पता लगाना है कि क्या उपलब्धि हुई है अर्थात् निष्पादन, निष्पादित कार्य का मूल्यांकन और यदि आवश्यक हो तो सुधारात्मक कदमों को उठाना ताकि निष्पादन नियोजन के अनुकूल हो सके।”

प्रो० हैमन के अनुसार, “नियन्त्रण जाँच द्वारा यह निर्धारित करने की प्रक्रिया है कि योजनाओं का पालन किया जा रहा है अथवा नहीं, उद्देश्यों र लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में उपयुक्त प्रगति हो रही है अथवा नहीं और यदि आवश्यक हो तो इस अन्तर को सुधारने के लिए, आवश्यक कदम उठाना।”

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नियन्त्रण की विशेषताएँ (Characteristics of Control)

 

नियन्त्रण की विभिन्न परिभाषाओं के अवलोकन व अध्ययन के पश्चात् इसकी कुछ विशेषताएँ प्रकट होती हैं, जो निम्नलिखित हैं –

 

(1) नियन्त्रण प्रक्रिया वैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा सांख्यिकीय तत्त्वों आधारित होती है।

(2) नियन्त्रण प्रबन्धन का महत्त्वपूर्ण कार्य होता है, जिससे उपक्रम के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

(3) नियन्त्रण स्वीकारात्मक प्रकृति का होता है।

(4) प्रबन्धन के प्रत्येक स्तर पर इसकी आवश्यकता पड़ती है।

(5) नियन्त्रण भविष्य से सम्बन्धित होता है क्योंकि जो कुछ भूतकाल में हो चुका है, उस पर नियन्त्रण का प्रश्न ही नहीं उठता है।

(6) नियन्त्रण आन्तरिक, बाहरी तथा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हो सकता है।

(7) नियन्त्रण का प्रारम्भ उद्देश्यों के निर्धारण से होता है तथा उद्देश्य प्राप्ति के साथ ही यह समाप्त होता है।

(8) नियन्त्रण एक गतिशील प्रक्रिया है, जो किसी निश्चित काल अथवा कार्य के लिए नहीं होती है अपितु एक सतत चलने वाली क्रिया है।

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नियन्त्रण का महत्त्व (Importance of Control)

 

कूण्ट्ज एवं ओ ‘डोनेल के शब्दों में, “जैसे एक नाविक निरन्तर यह निश्चित करने के लिए अध्ययन करता है कि वह निर्धारित मार्ग की ओर अग्रसर है, वैसे ही एक व्यावसायिक प्रबन्धक भी निरन्तर यह निश्चित करने के लिए अध्ययन करता है कि उसकी संस्था या विभाग सही मार्ग पर है।”

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व्यावसायिक प्रबन्ध में नियन्त्रण के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है –

 

1, एक प्रकार का बीमा (A type of Insurance) – प्रबन्ध में नियन्त्रण की प्रक्रिया एक प्रकार से बीमे का कार्य करती है क्योंकि कुशल नियन्त्रण होने पर व्यवसायी को इस बात का दृढ़ विश्वास हो जाता है कि निर्धारित योजना के अनुसार ही वास्तविक कार्य होगा, यदि उसमें कुछ अन्तर हुआ तो उसका तत्काल उपाय कर दिया जाएगा।

2, जोखिम से सुरक्षा (Safety from Risk) – नियन्त्रण के अन्तर्गत संगठन के प्रत्येक कार्य की भली प्रकार जाँच की जाती है तथा कार्य में होने वाली त्रुटियों का सम्यक निराकरण तलाशा जाता है। ऐसा उपाय किया जाता है ताकि भविष्य में पुनः ऐसी त्रुटि से बचा जा सके।

3, समन्वय में सहायक (Helpful in Coordination) – नियन्त्रण प्रणाली विभिन्न विभागों की क्रियाओं में समन्वय स्थापित करती है, जिससे उनके बीच उत्पन्न होने वाला गतिरोध समाप्त हो जाता है और संगठन का समस्त कार्य योजना के अनुसार सफलतापूर्वक निर्विरोध चलता रहता है।

4, उत्प्रेरण का साधन (Means of Motivation) – नियन्त्रण प्रक्रिया का महत्त्व इस बात में निहित है कि इसके द्वारा कर्मचारी के कुशल होने अथवा न होने का पता लगाया जा सकता है। ऐसा होने पर कार्यानुसार प्रोत्साहन के रूप में पुरस्कार या दण्डस्वरूप दण्ड दिया जा सकता है।

5, भावी नियोजन का आधार (Basis of Future Plans) – नियन्त्रण प्रक्रिया भावी नियोजन का आधार है क्योंकि इसके द्वारा संगठन को ऐसे तथ्य एवं सूचनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनके आधार पर भविष्य में की जाने वाली कार्यवाहियों की योजना तैयार की जाती है।

6, व्यावसायिक जटिलताएँ (Business Complexities) – औद्योगिक युग व्यावसायिक जगत की जटिलताओं में वृद्धि होती जा रही है। इन समस्त जटिलताओं नियन्त्रण प्रक्रिया द्वारा कारगर ढंग से सामना किया जा सकता है।

7, अनुशासन की स्थापना (Establish Discipline) – व्यवसाय में अनुशासन स्थापित करने के लिए नियन्त्रण प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण होती है। कुशल नियन्त्रण द्वारा की जाने वाली बेईमानी, कामचोरी, अनुचित व्यवहार आदि की सम्भावनाओं को बहुत बड़ी सीमा तक कम किया जा सकता है, जिससे अनुशासन का वातावरण उत्पन्न होता है।

8, भारार्पण की प्रक्रिया में सहायक (Helpful in Delegation) – एक संगठन मे अनेक व्यक्तियों के मध्य कार्यों का विभाजन होता है, उसी के अनुसार उन्हें अधिकारों और उत्तरदायित्वों को सौंपा जाता है। नियन्त्रण प्रक्रिया के द्वारा सौंपे गए अधिकारों व दायित्वों सम्यक् निरूपण होते हुए देखा जा सकता है तथा त्रुटि की अवस्था का भी पता लगाया जा सकता है।

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नियन्त्रण की तकनीकें (Techniques of Control)

 

नियन्त्रण की तकनीकें वे उपकरण हैं, जिनके माध्यम से कर्मचारियों के कार्यों पर सम्यक् नियन्त्रण किया जाता है। नियन्त्रण की प्रमुख तकनीकें निम्नलिखित हैं-

1, सामग्री नियन्त्रण (Inventory Control) – यह वह तकनीक है, जिसके द्वारा कच्चे माल आदि की पूर्ति को आवश्यकतानुसार बनाए रखा जाता है। इस दृष्टि से ‘क्रयादेश बिन्दुओं’ और ‘स्टॉक लेबल’ आदि का निर्धारण किया जाता है।

2, उत्पादन नियन्त्रण (Production Control) – उत्पादन नियन्त्रण में उत्पादन “क्रियाओं के नियोजन, मार्गदर्शन, समय निर्धारण, निर्गमन तथा अनुगमन की क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं। उत्पादन नियन्त्रण का उद्देश्य उत्पादन क्रियाओं का नियोजन और संचालन इस प्रकार करना है कि निर्धारित समय में निर्धारित मात्रा में और निर्धारित कीमत निर्धारित किस्म का माल उत्पादित किया जा सके।

3, किस्म नियन्त्रण (Quality Control) – इसके द्वारा निर्मित वस्तु की गुणवत्ता को सही रूप में रखा जाता है। इसका ध्येय उत्पादित वस्तु को अधिकतम शुद्धता प्रदान करना होता है। इस विधि में वस्तु के रंग, रूप, आकार, परिधि आदि के प्रमाप निश्चित करके प्रमापों के अनुसार ही वस्तु तैयार करने पर बल दिया जाता है।

4, लागत नियन्त्रण (Cost Control) – इसके द्वारा उत्पादित वस्तु की लागत को कम रखने का प्रयत्न किया जाता है। इस दृष्टि से विभिन्न लागतों का विश्लेषण करके उसके प्रमाप तथा मानक निश्चित किए जाते हैं, तत्पश्चात् वास्तविक लागतें मालूम करके प्रमापित विचलन लेकर विचलन के कारणों को मालूम किया जाता है और उन्हें भविष्य में दूर करने का प्रयत्न किया जाता है।

5, बजट (Budget) – बजट के द्वारा प्रबन्धन तन्त्र विभिन्न ध्येयों की पूर्ति एक साथ कर सकता है। नियन्त्रण विधा को लागू करने के लिए बजट एक कारगर प्रक्रिया है। संस्था के आय तथा व्यय पर नियन्त्रण रखने का बजट एक अत्यन्त प्रभावशाली तरीका है।

6, लेखाकर्म (Accounting) – हिसाब-किताब विधिवत् ढंग से रखने तथा हानि-लाभ ज्ञात करके भी अनेक कार्यों पर प्रभावशाली नियन्त्रण किया जाता है।

7, लाभ-हानि द्वारा नियन्त्रण (Control by Profit and Loss) – लाभ-हानि की प्रक्रिया को अपनाकर तथा विभिन्न खातों की वास्तविक जाँच करके संस्थान के लाभ तथा हानि का पता लगाया जा सकता है तथा उस पर नियन्त्रण किया जा सकता है।

8, नियन्त्रण प्रभाव (Effect of Control) – जिन संस्थाओं में नियन्त्रण विभाग का अस्तित्व पृथक् रूप से होता है, वहाँ प्रभावी नियन्त्रण स्थापित करना सहज हो जाता है। यह विभाग नियन्त्रण की योजनाएँ बनाता है, उनका क्रियान्वयन और समन्वय करता है तथा उनके परिणामों का मूल्यांकन करता

9, लिखित निर्देशन (Written Direction) – लिखित निर्देशों के द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों पर स्थिर रूप से नियन्त्रण स्थापित किया जा सकता है तथा इस प्रकार सही कार्य का निस्तारण हो जाता है।

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10, कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Action on Employees) – त्रुटि करने वाले दोषी कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करके उन पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।

11, अधिकार सीमाओं का निर्धारण (Determination of Standing Limitations) – विभिन्न अधिकारियों व कर्मचारियों के अधिकार क्षेत्रों की स्थायी सीमाओं का निर्धारण करके उनके कार्यों पर नियन्त्रण रखा जाता है।

12, अभिप्रेरण (Motivation) – आत्मनियन्त्रण और स्वतः नियन्त्रण स्थापित करने के लिए अभिप्रेरण एक श्रेष्ठ विधि है। इसमें कर्मचारियों को उत्प्रेरित करके उनका ऐच्छिक रूप से अधिकतम सहयोग प्राप्त किया जाता है और नियन्त्रित विधि से कार्य कराया जाता है।

13, अंकेक्षण (Audit) – अंकेक्षण भी एक प्रभावशाली विधि है। इसे अपनाकर घन व माल की धोखाधड़ी, चोरी आदि को रोका जा सकता है। अंकेक्षण संस्था के ही उच्चाधिकारियों द्वारा करने पर आन्तरिक अंकेक्षण’ तथा बाह्य व्यक्तियों द्वारा किए जाने पर ‘बाहा अंकेक्षण’ कहलाता है।

14, सम-विच्छेद बिन्दु विश्लेषण (Break-even Point Analysis) – सम-विच्छेद बिन्दु विश्लेषण भी प्रबन्धकीय नियन्त्रण की प्रमुख तकनीक है। इसके माध्यम से लाभ, विक्रय तथा सुरक्षा सीमा आदि का निर्धारण किया जा सकता है।

15, चार्ट एवं नियम पुस्तिका (Chart and Rule Book) – चार्ट कार्यों तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कर नियन्त्रण में सहायता करते हैं। इसी प्रकार नियम पुस्तिका अधिकारियों को उनके अधिकार क्षेत्र एवं दायित्वों का ज्ञान कराकर परोक्ष रूप से नियन्त्रण सहायता करती है।

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16, प्रबन्ध सूचना प्रणाली (Management Information System) – प्रबन्ध सूचना प्रणाली भी प्रबन्धकीय नियन्त्रण का प्रमुख साधन है। संगठन में सूचना प्रणाली जितनी सुदृढ़ एवं व्यवस्थित होती है, प्रबन्धकीय नियन्त्रण उतना ही सरल रहता है। इसके विपरीत सूचना व्यवस्था में रुकावट उत्पन्न होने पर नियन्त्रण कार्य व्यर्थ एवं शिथिल हो जाता है।

17, अवलोकन (Observation) – कार्यस्थल पर जाकर प्रबन्धन तन्त्र द्वारा कर्मचारियों के कार्यों का मौके पर ही निरीक्षण किया जाता है। इस प्रकार के निरीक्षण के द्वारा नियन्त्रण की सहजरूपेण स्थापना हो जाती है। सर्वाधिक कारगर विधियों में नियन्त्रण के लिए निरीक्षण को मान्यता प्रदान की गई है।

18, प्रत्याय व प्रतिवेदन (Return and Reports) – कर्मचारियों से समय-समय पर उनके द्वारा किए गए कार्यों का प्रतिवेदन, विवरण आदि माँगकर भी उन पर नियन्त्रण रख जा सकता है।

19, उदाहरण (Examples) – उच्च पदाधिकारियों द्वारा उच्च आदर्शों को स्थापन कर आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जो अधीनस्थ कर्मियों के लिए प्रेरणा तथा नियन्त्रण का कारगर उपाय बनते हैं।

20, नीतियाँ (Policies) – नीतियाँ भी नियन्त्रण की महत्त्वपूर्ण तकनीक हैं। ये दैनिक कार्यों के निष्पादन के लिए मार्गदर्शन करती हैं और कर्मचारियों को नियन्त्रित ढंग से कार्यक हेतु बाध्य करती हैं।

21, अन्य तकनीकें (Other Techniques) – आजकल नियन्त्रण हेतु अनेक वैज्ञानिक विधियों का भी प्रयोग किया जाने लगा है; जैसे

 

(i) ए०बी०सी० विश्लेषण,

(ii) सी०पी०एम०,

(iii) पर्ट,

(iv) वी०ई०डी० विश्लेषण |

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नियन्त्रण की सीमाएँ (Limitations of Control)

 

यद्यपि नीतियों के निर्धारण तथा संस्था के कार्यों को सुव्यवस्था प्रदान करने में नियन्त्रण विधा को प्रबन्धन में अति महत्त्व प्राप्त है तथापि इसमें कुछ दोष भी प्रकट होते हैं, जिस कारण इसकी सीमाओं का निर्धारण निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है –

 

1, अत्यधिक व्ययसाध्य (Costly) – कई बार नियन्त्रण तथा विचलनों को ज्ञात करने की प्रक्रिया इतनी व्ययसाध्य होती है कि संस्था उतना खर्च करने में असमर्थ होती है।

2, नियन्त्रण आन्तरिक घटकों पर ही सम्भव (Control is Possible only on Internal Elements) – नियन्त्रण की सबसे महत्त्वपूर्ण सीमा यह है कि इसका प्रयोग केवल संगठन की आन्तरिक क्रियाओं में ही सम्भव होता है। संगठन को प्रभावित करने वाले बाह्य घटकों जैसे सरकारी नीति, जनसंख्या में परिवर्तन, माँग पूर्ति, बाजार की स्थिति आदि पर नियन्त्रण नहीं किया जा सकता।

3,सुधारात्मक कार्यवाही असम्भव (Impossibility of Remedial Actions) – अनेक बार विचलनों को ज्ञात करने का कार्य अपने आप में बड़ा कठिन तथा दुरूह होता है। उसके लिए विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करनी आवश्यक होती हैं। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में नियन्त्रण की विधा का विलोपन होने लगता है तथा उद्देश्य की प्राप्ति अपूर्ण रह जाती है।

4, प्रमाप निर्धारण की कठिनाई (Difficulty in Determination of Standards) – नियन्त्रण के लिए प्रमापों का निर्धारण एक पूर्व आवश्यकता है, किन्तु अनेक परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें निर्धारण करना पूर्णतया अव्यावहारिक होता है, फलतः उन मामलों में नियन्त्रण नहीं किया जा सकता।

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प्रबन्धकीय नियन्त्रण प्रक्रिया (Managerial Control Process)

नियन्त्रण की प्रक्रिया वह प्रक्रिया है जिसमें कार्य करने के लिए उपयुक्त निष्पादन के प्रमाप (Standards of Performance) स्थापित किए जाते हैं। वास्तविक कार्य की प्रगति की तुलना निर्धारित निष्पादन के प्रमापों से की जाती है तथा यदि उनमें किसी प्रकार का कोई विचलन पाया जाता है तो उसे दूर करने के लिए सुधारात्मक कार्यवाही की जाती है। प्रबन्धशास्त्र के विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न चरणों का वर्णन किया है। निष्कर्ष रूप में, नियन्त्रण प्रक्रिया के निम्नलिखित चार तत्त्व (चरण) बतलाए जा सकते हैं

 

(1) लक्ष्यों एवं प्रमापों का निर्धारण,

(2) वास्तविक निष्पादनों का मापन करना,

(3) निष्पादनों की प्रमापों से तुलना,

(4) सुधारात्मक कार्यवाही।

 

1, लक्ष्यों एवं प्रमापों का निर्धारण (Establishment of Goals and Standards) – नियन्त्रण प्रक्रिया का पहला चरण लक्ष्यों, प्रमापों, नीतियों, योजनाओं मान्यताओं अथवा किन्हीं ऐसे प्रमापों का निर्धारण करना है जिनके आधार पर किसी कर्मचारी के कार्य को मापा जा सके। सरल शब्दों में, प्रमाप निश्चित करने से हमारा अभिप्राय यह निश्चित करना है कि एक कार्य विशेष से हम किस परिणाम (result) की आशा एवं अपेक्षा करते हैं। कोई भी कार्य सही ढंग से हो रहा है या नहीं, इस बात की जानकारी उस समय तक नहीं हो सकती जब तक कि प्रमापों को निर्धारित नहीं कर दिया जाता है। प्रमापों के निर्धारण के सम्बन्ध में यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्रमाप बहुत अधिक ऊँचे अथवा बहुत अधिक नीचे रखे जाने चाहिए। प्रमापों का निर्धारण उपक्रम के आकार, स्थिति क्षमता आदि को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। संक्षेप में, प्रमापों के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है। कि ये प्रमाप ऐसे हों, ताकि एक सामान्य (औसत) व्यक्ति अपने प्रयासों के द्वारा इनको प्राप्त कर सके।

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प्रमाणों के प्रकार (Types of Standards) – नियन्त्रण की सुविधा के लिए प्रमापो को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है

 

(i) भौतिक और मौद्रिक प्रमाप (Physical and Monetary Standards) –

(अ) भौतिक प्रमाप- भौतिक प्रमाप वे होते हैं जिन्हें भौतिक इकाइयों में जैसे प्रति घण्टा, प्रति इकाई या अन्य किसी इसी प्रकार की भौतिक इकाइयों में व्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, यह कहा जा सकता है कि एक मशीन प्रतिदिन कितना काम करेगी या कोई निश्चित कार्य कितने घण्टे या कितने दिन में पूरा किया जाएगा।

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(ब) मौद्रिक प्रमाप- मौद्रिक प्रमाप वे होते हैं जो मुद्रा में व्यक्त किए जाते हैं जैसे किसी मशीन के प्रति घण्टा काम करने की लागत क्या होगी या प्रति इकाई कच्ची सामग्री की क्या लागत होगी या प्रति इकाई मजदूरी पर कितना व्यय होगा आदि।

(ii) मूर्त और अमूर्त मापदण्ड (Tangible and Intangible Standards) –

 

(अ) मूर्त मापदण्ड – मूर्त मापदण्डों के अन्तर्गत वे मापदण्ड आते हैं जिन्हें निश्चित इकाइयों में व्यक्त किया जा सके; जैसे—प्रतिदिन उत्पादन लागत या उत्पादन की मात्रा आदि अतः मूर्त मापदण्डों में वे सभी भौतिक एवं मौद्रिक मापदण्ड आते हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित किया सकता है।

(ब) अमूर्त मापदण्ड- अमूर्त मापदण्डों के अन्तर्गत वे मापदण्ड होते हैं जिन्हें निश्चित एवं स्पष्ट रूप से इकाइयों में व्यक्त नहीं किया जा सकता; जैसे- श्रमिकों का मनोबल बढ़ाना, संस्था की प्रबन्धकीय कुशलता में वृद्धि करना आदि। ये ऐसे मापदण्ड हैं जिन्हें मापा नहीं जा सकता, बल्कि जिनका केवल अनुभव ही किया जा सकता है। अमूर्त मापदण्डों की अपेक्षा मूर्त मापदण्ड अधिक स्पष्ट निश्चित एवं मापने योग्य होते हैं, इसलिए मूर्त मापदण्डों का अधिक प्रयोग किया जाता है।

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(iii) आयगत एवं पूँजीगत मापदण्ड (Revenue and Capital Standards) –

(अ) आयगत मापदण्ड (Revenue Standards) – इसके अन्तर्गत वे मापदण्ड आते हैं जिन्हें बिक्री के मूल्य के रूप में व्यक्त किया जा सकता है; जैसे- दिल्ली में प्रति व्यक्ति बिक्री का मापदण्ड या प्रति व्यक्ति औसत विक्री या किसी ट्रांसपोर्ट कम्पनी के प्रति यात्री प्रति किलोमीटर आय आदि।

(ब) पूँजीगत मापदण्ड (Capital Standards) – आयगत मापदण्डों के विपरीत पूँजीगत मापदण्ड वे होते हैं जो पूँजीगत व्ययों के अनुपात के रूप में प्रकट किए जाते हैं; जैसे- चालू अनुपात (Current ratio), ऋण और स्वामित्व पूँजी का अनुपात (Debts equity ratio) आदि।

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2, वास्तविक निष्पादनों का मापन करना (Measurement of Actual Performance) – प्रमाप निर्धारित करने के पश्चात् नियन्त्रण प्रक्रिया के अन्तर्गत उठाया जाने वाला दूसरा कदम वास्तविक निष्पादनों का मापन करना है। वास्तविक निष्पादनों के मापन का कार्य निम्नलिखित विधियों से किया जा सकता है:

(i) प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अवलोकन एवं निरीक्षण द्वारा (By Direct Personal Observation and Inspection),

(ii) नियमित प्रतिवेदनों द्वारा (By Direct Reports),

(iii) सर्वेक्षण द्वारा (By Survey),

(iv) सांख्यिकीय एवं गणितीय विधियों द्वारा (By Statistical and Mathematical Methods) वास्तविक निष्पादनों का मापन करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

(1) वास्तविक निष्पादन के आँकड़े यथासम्भव सही होने चाहिए।

(2) कार्य-निष्पादन के आँकड़े नियमित रूप से तथा निरन्तर तैयार किए जाने चाहिए।

(3) निष्पादन मापन हेतु प्रमाप वैसे ही होने चाहिए जैसे कि कार्य-प्रमाप तय करने के लिए प्रयोग किए गए हैं।

(4) जहाँ तक हो सके प्रगति का मापन पूर्वापेक्षी अर्थात् पहले से यह आभास देने वाला होना चाहिए कि आगे क्या होने जा रहा है जिससे विचलन होने से पहले ही इसका संकेत मिल जाए एवं उनके कारणों को दूर किया जा सके। (5) व्यक्तिगत गुणों का मापन व्यक्तिगत अवलोकन द्वारा सफलता से किया जा सकता है।

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3, निष्पादनों की प्रमापों से तुलना (Comparison of Performance with Standards) – नियन्त्रण प्रक्रिया का तीसरा चरण वास्तविक निष्पादनों की निर्धारित प्रमापों से तुलना करके विचलनों को ज्ञात करना है। हेनरी फोर्ड के अनुसार, “एक ही तरह की दो मशीनों का एक ही पुर्जा एक ही तरह का नहीं होता।” अतः विभिन्नता होना प्रकृति का नियम है। देखने की आवश्यकता यह है कि यह विचलन अथवा अन्तर कितना है। यह विचलन महत्त्वहीन हो सकता है, स्वीकृत सीमा के अन्दर हो सकता है अथवा बाहर भी हो सकता है। यदि विचलन स्वीकृत सीमा के अन्दर न हो अर्थात् बाहर हो तो यह प्रमाप का अपवाद माना जाता है और उसे पृथक् कर दिया जाना चाहिए। जो अपवाद सामने आए उनके कारणों की खोज करनी चाहिए। विचलन के कारणों की खोज करना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कारणों की जानकारी के अभाव में सुधारात्मक कदम उठाना कठिन होता है, परन्तु विचलन के कारणों को ज्ञात करना एक जटिल कार्य है। इसमें इस तथ्य का पता लगाया जाता है कि गलती आखिर योजना बनाने में अथवा उस योजना को क्रियान्वित करने में की गई है। जाँचकर्त्ता को इस सन्दर्भ में निम्नलिखित बातों को और ज्ञात करना चाहिए–(i) विचलन का कारण स्थायी है अस्थायी, बढ़ रहा है अथवा घट रहा है? (ii) विचलन का प्रभाव क्या है? (iii) विचलन का आकार क्या है? (iv) मूल्यांकन के द्वारा प्रभावों में सुधार किस प्रकार किया जा सकता है?

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4, सुधारात्मक कार्यवाही (Corrective Action)- नियन्त्रण प्रक्रिया का अन्तिम चरण सुधारात्मक कार्य करना है। यदि वास्तविक निष्पादन एवं प्रमापों के मध्य विचलन एक निश्चित सीमा से अधिक हो तो सुधारात्मक कार्यवाही करना अपरिहार्य हो जाता है, सुधार सम्बन्धी कुछ निर्णय ऐसे हो सकते हैं, जो बिगड़े हुए कार्य को सुधार दें। इन्हें “सुधारात्मक कार्य” की संज्ञा दी जा सकती है, किन्तु कुछ सुधार ऐसे भी हो सकते हैं जो भविष्य के लिए उत्तम हों। नियन्त्रण का सारा ‘सार’ सुधारात्मक कार्यवाही में ही निहित है। जॉर्ज टैरी के अनुसार, “सुधार के बिना नियन्त्रण शून्यवत् है और इसकी कोई उपयोगिता नहीं है।” सुधारात्मक कार्य ऐसा हो जिसे सम्पूर्ण उपक्रम को प्रभावित किए बिना ही सम्पन्न किया जा सके एवं सुधारा जा सके। किन्तु यदि वह नियोजन, संगठन, समन्वय तथा अभिप्रेरण आदि प्रबन्ध के कार्यों को प्रभावित करता है तो ऐसी स्थिति में आपसी विचार-विमर्श के पश्चात् ही सुधारात्मक कार्य किया जाना चाहिए।

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