Unit 4 Group Dynamics and Team Development Mcom Notes

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Unit 4 Group Dynamics and Team Development Mcom Notes

 

Unit 4 Group Dynamics and Team Development Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that Mcom 1st year Group Dynamics and Team Development: Group dynamics: definition and importance; types of groups; group formation; group development, group composition, group performance factors; principle: centered approach to team development { Group Dynamics Team Development }

 

समूह से आशय (Meaning of Group)

 

एक व्यक्ति एक ही समय में एक या एक से अधिक समूहों का सदस्य हो सकता है। व्यक्ति की रुचि, स्वभाव, वृत्ति काफी सीमा तक उसके साथियों व समूहों पर निर्भर करती है। व्यक्ति का व्यवहार उस समूह की सदस्यता से प्रभावित होता है और समूह का अपने सदस्यों के ऊपर नियन्त्रण रहता है। समूह के द्वारा सदस्य अनेक प्रकार के भौतिक अथवा अभौतिक लाभों की प्राप्ति करता है। सदस्यों की आपस में एक-दूसरे के साथ अन्तःक्रिया होती है, साथ ही साथ अपनी

 

आवश्यकता की पूर्ति भी होती है जो समूह के अभाव में अन्यथा सम्भव नहीं थी। समूह गतिशीलता से आशय समूह में होने वाले परिवर्तन के अध्ययन करने से है। इस प्रकार के परिवर्तन समूह के संगठनात्मक ढाँचे, संरचना, सदस्यता, सामूहिक व्यवहार आदि किसी एक या अधिक के बारे में हो सकते हैं। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों एवं राजनीतिज्ञों ने समूह गतिशीलता के अध्ययन में योगदान दिया है। इन्होंने परिवर्तन, परिवर्तन के विरोध, सामाजिक दबाव, शक्ति प्रभाव, नेतृत्व समूहों में लागत एवं समूह अभिप्रेरणा आदि समस्याओं पर शोध कार्य किया है।

 

समूह की विशेषताएँ (Characteristics of Group)

 

समूहों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

 

1, समूह संस्कृति (Group Culture) – एक समूह दूसरे समूह से सर्वथा भिन्न होता है। उनके उद्देश्य तथा संस्कृति में पर्याप्त भिन्नता होती है। प्रत्येक समूह की अपनी कार्य संस्कृति होती है, जिसके द्वारा उसे अन्यों के सापेक्ष विशिष्टता प्राप्त होती है।

 

2, सामाजिक दबाव एवं अनुरूपता (Social Pressure and Conformity) – समूह की सदस्यता से व्यक्तियों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं, परन्तु बदले में समूह कार्य एवं विचार करने के तरीकों में अनुरूपता की माँग करता है। सदस्यों से अनुरूपता की माँग के लिए सामाजिक दबाव का भी प्रयोग किया जा सकता है।

 

3, लगाव (Cohesiveness) – एक समूह के सभी सदस्यों के बीच ‘मैं’ के स्थान पर ”हम’ की भावना का संचार होता है। यही भावना समूह के सदस्यों के बीच एकता को प्रकट करती है। जब समूह के सदस्यों को प्रबन्ध से किसी प्रकार का भय दिखाई देता है तो समूह में सुरक्षा बनाए रखने के लिए भी सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति अधिक आकर्षण, लगाव एवं सहानुभूति उत्पन्न होती है। 4, क्रियाएँ (Activities) कार्य समूहों के मध्य औपचारिक तथा अनौपचारिक प्रकार की अनेक क्रियाएँ लगातार होती रहती हैं।

 

5, आदर्श, सिद्धान्त एवं नियम (Norms, Principles and Laws) – कार्य समूहों के कुछ आदर्श, सिद्धान्त एवं नियम होते हैं जिनके अनुसार समूह का प्रत्येक सदस्य व्यवहार करता है। प्रायः कार्य समूहों को इस प्रकार संचालित किया जाता है, जिसके कारण सदस्य स्वयमेव ही समूह के नियमों व आदर्शों का अनुगामी बन जाता है।

 

6, अन्तःक्रिया (Interaction) – अन्तः क्रियाओं के द्वारा सदस्य आपस में सम्बन्धित रहते हैं। अन्तःक्रियाओं को करने के विभिन्न माध्यम हो सकते हैं। इनका संचार संदेशवाहन, चेहरे तथा विभिन्न हावभावों के द्वारा हो सकता है।

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समूहों का निर्माण (Formation of Groups)

संगठन में नए कर्मचारी के आने पर प्रारम्भ में उसका नए माहौल के साथ सामंजस्य नहीं हो पाता है, अतः उसको अकेलेपन का अहसास होने लगता है। इसको दूर करने के लिए वह अन्य कर्मचारियों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की कोशिश करता है। इन परिस्थितियों को विस्तार देते हुए धीरे-धीरे वह उनके साथ विश्राम के समय, जलपान गृह आदि में समय व्यतीत करता है एवं मनोरंजन करता है। पुराने कर्मचारी उसे कार्य करने के अच्छे तरीके, पर्यवेक्षक एवं प्रबन्ध और संगठन के विभिन्न नियमों आदि से अवगत कराते हैं। नए माहौल के साथ कुछ अन्तराल के पश्चात् नया कर्मचारी अपने को समायोजित कर लेता है, तब यह कार्य समूह उसके लिए अपना परिवार हो जाता है। इसके द्वारा अब उसे समय-समय पर सहायता व सहानुभूति प्राप्त होती रहती है। इस प्रकार धीरे-धीरे कार्य समूह भी विस्तार को प्राप्त होता जाता है।

 

समूह का महत्त्व (Importance of Group)

 

आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। इसी सिद्धान्त के अनुसार कार्य समूह का निर्माण होता है। कार्य-समूह उद्योग में विशिष्ट तथा महत्त्वपूर्ण स्थिति रखता है। उसका महत्त्व निम्नलिखित प्रकार से प्रकट किया जा सकता है

1, सन्देशवाहन एवं सूचनाएँ (Communication and Informations) – कार्य समूहों में सन्देशवाहन की प्रक्रिया बड़े अच्छे एवं प्रभावी ढंग से होती है। कार्य-समूह को संगठित अवस्था में सभी आवश्यक सूचनाओं का सम्प्रेषण सभी सदस्यों तक सुविधापूर्वक हो जाता है।

2, सहकारिता की भावना का उदय (Germination of the Feeling of Cooperation) – कर्मचारियों के सामने दिन-प्रतिदिन ऐसी समस्याएँ आती हैं, जिनके समाधान के लिए वे एक-दूसरे की सलाह एवं सहायता चाहते हैं। जो लोग अपने को समूह से अलग रखते हैं, वे इस प्रकार की सहायता से वंचित रह जाते हैं।

3, समूह की स्थिति का विकास (Development of Group’s Position) – इसकी सहायता से कर्मचारी आपसी सहयोग के द्वारा स्वयं की तथा समूह की स्थिति में बदलाव लाकर उच्चता प्रदान कर सकते हैं, जिसके लिए एक अनौपचारिक नेता की आवश्यकता पड़ती है, जो समूह की एकता एवं शक्ति का प्रयोग करके समूह के सदस्यों को नियोक्ता से अनेक सुविधाएँ प्रदान कराता है।

4, सहचारिता (Companionship) – विभिन्न प्रकार के शोध व अनुसन्धानों से भी ऐसा आभास मिलता है कि घनिष्ठता के अभाव में कार्य में सामंजस्य का अभाव रहता है तथा उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। मनुष्य प्रारम्भ से ही एकाकीपन पसन्द नहीं करता तथा अन्य व्यक्तियों के साथ सहचारिता एवं मित्रता करना चाहता है।

5, सुरक्षा एवं बचाव (Security and Protection) कर्मचारी किसी ऐसे कार्य-समूह का सदस्य बनना चाहता है, जिससे उसके हितों की सुरक्षा हो सके और उसका बचाव हो सके। विपत्ति के समय सभी सदस्य एकजुट होकर सामूहिक रूप से उस विपत्ति के निराकरण का उपाय प्रस्तुत करते हैं।

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समूह के प्रकार (Types of Group)

 

समाज में अनेक प्रकार के कार्यों के सम्यक् निरूपण के लिए विभिन्न प्रकार के समूहों का निर्माण मानव द्वारा किया गया है। इनके विभाजन के अनेक पैमाने हो सकते हैं। प्रमुख रूप से बनने वाले समूह निम्नलिखित हो सकते हैं—

 

1, प्राथमिक एवं द्वितीयक समूह (Primary and Secondary Groups) – कुछ विद्वानों के अनुसार समूह प्राथमिक एवं द्वितीयक भी हो सकते हैं। प्राथमिक समूहों के अन्तर्गत परिवार, खेल संगठन, पास-पड़ोसियों के समूह, एक ही रोजगार में लगे हुए व्यक्तियों के स्थानीय समूह आदि को सम्मिलित किया जाता है। द्वितीयक समूहों का क्षेत्र विस्तृत होता है। जैसे—विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापकों का समूह, प्रदेश स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर अध्यापको का समूह आदि।

 

2, खुले समूह (Open Groups) – खुले समूह का आशय ऐसे समूह से है, जिसमें समय-समय पर सदस्यों की संख्या में कमी या वृद्धि होती रहती है। दूसरे शब्दों में, इस प्रकार के समूहों में नए सदस्यों के आने या पुराने सदस्यों के जाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता है।

 

3, समूहों का संगठन के आधार पर वर्गीकरण (Classification of Groups on the basis of Organization) – संगठन के आधार पर समूह दो प्रकार के होते हैं

 

(i) औपचारिक समूह – ये ऐसे समूह होते हैं जो संस्था में निर्धारित नियमों के अनुसार बनाए जाते हैं। ऐसे समूहों की सदस्यता कार्य प्रणाली, कार्य क्षेत्र आदि संस्था के हित में निर्धारित नियमों के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं।

 

(ii) अनौपचारिक समूह – अनौपचारिक समूहों से आशय ऐसे समूहों से है, जिनका निर्माण किसी भी औपचारिक विधि से नहीं होता बल्कि इनका निर्माण स्वतः ही एक प्रक्रिया के अधीन सम्पर्क में आने से धीरे-धीरे होता जाता है।

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4, समूहों का उद्देश्यों के आधार पर वर्गीकरण (Classification of Groups on the basis of Objectives) – इस प्रकार के समूहों का निर्माण समूहों के उद्देश्यों पर निर्भर करता है। इस प्रकार के समूहों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं

 

(i) कर्मचारी समूह (Employees Group) – एक ही रोजगार में लगे हुए व्यक्तियों के निर्मित समूह को कर्मचारी समूह के नाम से जाना जाता है।

 

(ii) राजनीतिक समूह (Political Group) – एक ही विचारधारा और एक ही राजनीतिक दृष्टि को मानने वाले व्यक्ति एक प्रकार के समूह में आते हैं, इसे राजनीतिक समूह कहा गया है; जैसे- भारतीय जनता पार्टी, लोकदल, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी आदि।

 

(iii) बचत समूह (Savings Group) – समाज के विभिन्न वर्गों में बचत को श्रोत्साहित करने वाले व्यक्तियों के समूह को बचत समूह के नाम से जाना जाता है।

 

(iv) महिला समूह (Women Group) –  इस प्रकार के समूह केवल महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं।

 

(v) सामाजिक समूह (Social Group) – इस प्रकार के समूहों का निर्माण विशिष्ट प्रकार के लोगों में एकात्मकता होने पर किया जाता है; जैसे-एक ही धर्म या मत को मानने वालों का समूह |

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व्यक्ति व समूह का अन्तर्सम्बन्ध तथा परस्पर प्रभाव (Inter-relation and Mutual Influence of Man and Group)

 

1, समूह की संस्कृति (Group Culture) – प्रत्येक समूह अपनी संस्कृति के अनुसार क्रिया-कलापों को व्यावहारिक रूप देता है। समूह की संस्कृति सदस्यों के व्यक्तिगत अथवा सामूहिक व्यवहार को भी पर्याप्त सीमा तक प्रभावित करती है।

 

2, उचित मार्गदर्शन (Perfect Guidance) – प्रत्येक समूह का नेतृत्व या मार्गदर्शन एक नेता करता है। यह समूह के सदस्यों को समझाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेकर उनका मार्गदर्शन करता है। योग्य नेतृत्व के सहारे कार्य समूह को आगे बढ़ने का रास्ता मिल जाता है तथा उचित मार्गदर्शन के कारण विकास का मार्ग खुल जाता है।

 

3, सहभागिता (Participation) – हाथोर्न प्रयोग तथा अन्य शोध कार्यों से यह सिद्ध चुका है कि जिन समूहों के सदस्यों के मध्य उचित सहभागिता व संचार होता है, वहाँ प्रभावशाली परिणामों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार का वातावरण न केवल समूह के सदस्यों के लिए लाभप्रद सिद्ध होता है अपितु समूह के लिए भी लाभदायक होता है।

 

4, सामाजिक दबाव तथा समरूपता (Social Pressure and Uniformity) – सामाजिक भावना का उदित किया जाना इसका एक प्रमुख कार्य है। सामाजिक दबाव, समूह सदस्यों को एक निश्चित दिशा में और निश्चित ढंग से चलने के लिए प्रेरित करते हैं जिसके परिणामस्वरूप सदस्यों के व्यवहार में समरूपता आती है।

 

5, मैत्री एवं सहयोग का प्रसार (Extension of Friendship and Cooperation) – समूह अपने सदस्यों में परस्पर लगाव, सहयोग, सदाचार तथा मित्रवत व्यवहार का भी सम्प्रेषण करता है। जब कोई व्यक्ति किसी समूह का सदस्य बन जाता है तो यह स्वभावतः समूह के दूसरे सदस्यों का मित्र बन जाता है और उन सभी से अपने अन्तसम्बन्ध स्थापित करता है।

 

6, लगाव (Cohesiveness) – किसी समूह की वास्तविक सफलता के लिए यह अति आवश्यक है कि उसके समस्त सदस्यों के बीच लगाव का तत्व हो । समूह प्रभावशीलता और शक्ति इस तथ्य में निहित है कि उसके सदस्य आपस में मिलजुलकर कितनी लगन से कार्य करते हैं तथा उनकी समूह के प्रति क्या धारणा है। सदस्यों के पारस्परिक लगाव से सम्प्रेषण व्यवस्था अधिक विकसित एवं प्रभावी होती है। ऐसी स्थिति में समूह के सदस्यों को सभी महत्त्वपूर्ण बातों की जानकारी आसानी से हो जाती है।

 

7, समूह के आदर्श (Group Norms) – औपचारिक समूह अपने सदस्यों के व्यवहार को नियमित और नियन्त्रित करने के लिए कुछ-न-कुछ नियम अवश्य बनाते हैं। ये नियम ही समूह के लिए आदर्श की रचना करते हैं। इनका पालन सभी सदस्य प्रसन्नतापूर्वक स्वेच्छा से करते हैं।

 

8, प्रतिस्पर्द्धा (Competition) – समूह का प्रतिस्पर्द्धात्मक वातावरण भी सदस्यों के सामूहिक व्यवहार को प्रभावित करता है। इससे सदस्यों की क्षमता, कार्य-शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इन समूहों में स्वस्थ प्रतियोगिता का माहौल होता है। इस प्रतियोगी वातावरण में भी सभी के मध्य सहयोग की भावना रहती है।

 

कार्यकारी समूहों में यद्यपि कार्य के प्रति प्रतियोगिता तथा सहयोग दोनों पाए जाते हैं, परन्तु समूह की सफलता काफी मात्रा में सदस्यों के सहयोग पर निर्भर करती है और समूह का व्यक्ति पर और व्यक्ति का समूह पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है।

 

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्धन (Management by Objective, MBO) एक प्रबन्धन प्रयास है जिसका उद्देश्य पूरे संगठन में लक्ष्य और अधीनस्थ उद्देश्यों को संरेखित करके संगठनात्मक प्रदर्शन को बढ़ाना है। MBO को स्पष्ट रूप से परिभाषित मात्रात्मक और/या गुणात्मक उद्देश्यों पर सहमत होने के लिए प्रबन्धनों के सभी स्तरों की आवश्यकता होती है। फिर इन लक्ष्यों को समय-समय पर प्रबन्धन के उच्च स्तरों द्वारा समीक्षा करने की आवश्यकता होती है।

 

दूसरे शब्दों में, MBO में शामिल गतिविधियों के बजाय परिणामों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना शामिल है। शीर्ष प्रबन्धन अनिवार्य रूप से कार्यान्वयन के लिए एक विस्तृत रोडमैप तय किए बिना अपने अधीनस्थों के साथ लक्ष्यों के अनुबन्ध पर बातचीत कर रहा है।

 

MBO पद्धति को अधिक परिणाम केन्द्रित बनाने के लिए संगठन प्राप्त करके संगठनात्मक प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए माना जाता है। यह लाइन प्रबन्धकों के बीच स्वतन्त्रता और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने की कला है। इस दर्शन की उत्पत्ति सन् 1970 के दशक में आरम्भ हुई।

 

पीटर एफ० ड्रकर के अनुसार- “उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक प्रणाली है जिसमें प्रबन्ध एवं सम्पूर्ण प्रतिष्ठान दोनों की कार्यकुशलता में सुधार के लिए विभाग तथा प्रत्येक व्यक्तिगत प्रबन्धन के स्तर पर उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है।”

 

तोषी एवं केरोल के अनुसार- “उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक प्रक्रिया है जिसमें प्रबन्धक और उसके अधीनस्थ दोनों मिलकर ऐसी निर्धारित क्रियाओं, लक्ष्यों, विधियों एवं उद्देश्यों के बारे में सहमत हो जाते हैं। जिनका उपयोग अधीनस्थों के निष्पादन एवं उसके मूल्यांकन के आधार के रूप में उपयोग किया जाएगा।

 

हैण्डरसन एवं सुओजानिन के अनुसार– “उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध वह प्रबन्धकीय व्यवहार है जो विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति पर बल देता है।” हिक्स एवं गुलेट के अनुसार- “उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध अभिप्रेरण समस्या का हल है। यह कर्मचारी और उसके अधिकारी को कर्मचारी के भावी निष्पादन के लक्ष्य निर्धारण की स्वीकृति देता है।”

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उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की पद्धति अथवा विभिन्न चरण अथवा सोपान (Procedures of steps in MBO Approach)

 

1, संगठनात्मक लक्ष्यों का निर्धारण (Determining Organizational Goals) – किसी संगठन का सम्पूर्ण विकास निर्धारित लक्ष्यों पर निर्भर करता है। एक संगठन की प्रभावशीलता व दक्षता के पीछे एक लक्ष्य सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक कारक है, इसलिए एकल या विभिन्न प्रकार के लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्रबन्धित करना महत्त्वपूर्ण है।

 

निर्धारित लक्ष्यों पर काम शुरू करने से पहले, प्रबन्धकों को सम्भावित प्रबन्धन बनाने के उद्देश्य से संगठनात्मक लक्ष्यों को निर्धारित करना चाहिए जो विभिन्न प्रकार के लक्ष्यों को आसानी से सम्भालने में सक्षम होना चाहिए। लक्ष्यों को निर्धारित करने का मतलब लक्ष्य बनाना नहीं है, क्योंकि प्रारंभिक स्तर के शीर्ष स्तर के पर्यवेक्षकों द्वारा गहराई से विश्लेषण और निर्णय के आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या पूरा किया जाना चाहिए और एक निश्चित अवधि में ऐसा कैसे किया जाए।

 

2, कर्मचारियों के उद्देश्यों का निर्धारण (Determining Employees Objectives) – संगठनात्मक लक्ष्यों को निर्धारित करने के बाद, अगली बात यह है कि व्यक्ति के लक्ष्यों या अधिक स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के लक्ष्यों को जानना है। यह प्रबंधकों की जिम्मेदारी है कि वे कर्मचारियों से पूछे कि वे एक निश्चित समयावधि में क्या लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए वे किन संसाधनों का उपयोग करेंगे। इसके अलावा, यदि आवश्यक हो, तो प्रबंधक और कर्मचारी लक्ष्य को सबसे अधिक महत्वपूर्ण से कम से कम एक तक वर्गीकृत कर सकते हैं ताकि लक्ष्य प्राप्त करने की प्रक्रिया को अधिक आसानी से और संगठन के पक्ष में किया जा सके।

 

3, निरन्तर निगरानी प्रगति और प्रदर्शन (Constant Monitoring Progress and Performance) – MBO की प्रक्रिया केवल संगठन भर में प्रबंधकों के अतिरिक्त प्रभावशीलता को प्रदान करने के लिए निर्धारित नहीं है, बल्कि कर्मचारियों की प्रगति और प्रदर्शन की निरन्तर निगरानी के लिए भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

 

4, प्रदर्शन का मूल्यांकन (Performance Evaluation) – MBO की मूल आवधारणा के अनुसार, प्रदर्शन मूल्यांकन सम्बन्धित प्रबंधकों कि जिम्मेदारी के तहत आता है और उनकी भागीदारी से बनता है। ध्यान रखें, प्रदर्शन मूल्यांकन संगठन के सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। जो कुछ उद्देश्यों को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद कर सकता है।

 

5, प्रतिक्रिया प्रदान करना (Providing Feedback) – MBO का मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावशाली कारक लगातार कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन और व्यक्तिगत लक्ष्यों के बारे में प्रतिक्रिया दे रहा है ताकि वे अपने कौशल और गलतियों को मॉनीटर, सही और अतिरिक्त सुधार सकें। ज्यादातर, प्रतिक्रिया समय-समय पर बैठकों में प्रदान की जाती है। जहाँ पर्यवेक्षक और उनके अधीनस्थ लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए प्रदर्शन और प्रगति की समीक्षा करते हैं। एक बिन्दु पर, प्रतिक्रिया व्यक्तियों को उनकी कमजोरियों को जानने में मदद करती है। दूसरी ओर, यह पहले से ही संभावित व्यक्तियों को अपने प्रदर्शन को बढ़ाने और विकास करने के लिए प्रेरित करता है।

 

6, प्रदर्शन मूल्यांकन (Performance Appraisal) – प्रदर्शन मूल्यांकन उद्देश्य द्वारा प्रबन्धन की प्रक्रिया का अन्तिम चरण है। परिभाषा के अनुसार, संगठन में कर्मचारी के प्रदर्शन की दिन-प्रतिदिन की समीक्षा को प्रदर्शन मूल्यांकन कहा जाता है। प्रदर्शन, मूल्यांकन शब्द प्रदर्शन मूल्यांकन के साथ जुड़ा होता है, लेकिन कुछ मामलों में, दोनों एक-दूसरे से अलग हैं।

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उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध के लाभ अथवा महत्त्व (Advantages and Importance of Management by Objectives)

 

1, अच्छा प्रदर्शन (Improved Performance) – MBO मूल रूप से एक परिणाम उन्मुख प्रक्रिया है। इसके मुख फोकस लक्ष्यों को स्थापित करने और नियन्त्रित करने पर है। प्रबन्धकों को विस्तृत योजना बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। वे लागत कम करके और अवसरों का दोहन करके प्रदर्शन को बेहतर बनाने के महत्त्वपूर्ण कार्य पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। बेहतर नियोजन से उत्पादकता में सुधार होगा तथा और अधिक लाभ होगा।

 

2, पहचान की अधिक से अधिक संवेदना (Greater sense of Identification) – संगठन के अलग-अलग संदस्यों में कंपनी के लक्ष्यों के साथ पहचान की भावना अधिक होती है। MBO के साथ अधीनस्थों की संगठनात्मक लक्ष्यों में शामिल होने पर गर्व महसूस होता है। इससे संगठनात्मक उद्देश्यों के लिए उनके मनोबल और प्रतिबद्धता में सुधार होता है।

 

3, मानव संसाधनों का अधिकतम उपयोग (Maximum Utilisation of Human Resources) – चूंकि लक्ष्यों को अधीनस्थों के परामर्श से निर्धारित किया जाता है, ये हासिल करना अधिक कठिन होता है और इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण अगर वरिष्ठों ने लगाया था। इसके अलावा, चूंकि ये लक्ष्य अधीनस्थों का विशेष क्षमताओं के अनुसार तय किए आते हैं। इसलिए यह उनसे अधिकतम योगदान प्राप्त करता है और इस तरह यह मानव संसाधनों का अधिकतम उपयोग होता है।

 

4, बेहतर संचार (Improved Communication) – MBO में प्रबन्धन और अधीनस्थों के बीच बेहतर संचार होता है। यह लगातार दो तरह से संचार किसी भी प्रक्रिया या उद्देश्यों के किसी भी पहलू को परिष्कृत और संशोधन करने में मदद करता है।

 

5, बेहतर संगठनात्मक संरचना (Improved Organisation Structure ) – किसी भी क्षेत्र में चाहे वह आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, न्यायिक, औद्योगिक अथवा व्यावसायिक हो, प्रबन्ध एवं प्रबन्धकों का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह व्यक्तियों के समूह के लिए नये विचार, नई कल्पनाएँ एवं नया दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है तथा उनके प्रयत्नों के उचित रूप से समग्र करता है। सच तो यह है कि तथाकथित ‘पिछड़ी’ और विकसित अर्थव्यवस्थाएँ कहीं नहीं हैं। यदि कहीं कुछ है तो ‘कुप्रबन्ध’ या सुप्रबन्ध अर्थव्यवस्थाएँ हैं। इसके महत्त्व का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

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1, आधुनिक व्यवसाय में प्रबन्ध का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान है (Management Plays a Most Important Role in Modern Business) – प्रोफेसर रॉबिन्स के अनुसार, “कोई भी व्यवसाय स्वयं नहीं चल सकता, चाहे वह संवेग (Momentum) की स्थिति में क्यों न हो। उसके लिए इसे नियमित उद्दीपन (Repeated stimulus) की आवश्यकता पड़ती है।

 

2, औद्योगिक समाज के एक प्रभाव समूह के रूप में (As a Leading Group in Industrial Society) – आधुनिक औद्योगिकी समाज में प्रबन्ध एवं पृथक् प्रभावी समूह के रूप में माना जाता है। आज हम श्रम तथा पूँजी की बातें ना करके प्रबन्ध तथा श्रम की बातें करते हैं।

 

3, गलाकाट प्रतियोगिता का सामना करने एवं अस्तित्व के संरक्षण के लिए (To Face Cut Throat Competition and Survival Existence) – वे दिन गए जब उत्पादन का आकार केवल स्थानीय सीमाओं तक ही सीमित रहने के कारण कारीगर ही उत्पादक, निर्माता, प्रबन्धक तथा विक्रेता होता था।

 

4, वृहद् उत्पादन को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए (To Run Large Scale Production Efficiently) – आज का युग वृहद उत्पादन का युग है। इसके लिए एक विशाल एवं सुदृढ़ संगठन की आवश्यकता पड़ती है।

 

5, आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी अविष्कारों, आदि का अधिकतम लाभ उठाने के लिए (To take Maximum Advantage of the Modern Scientific and Technological Discoveries etc) – आज विज्ञान सभी क्षेत्रों में दिन-दुगुनी रात चौगुनी गति से प्रगति कर रहा है। फिर व्यावसायिक एवं औद्योगिक क्षेत्र इससे कैसे वंचित रह सकता है? परिणामस्वरूप आज हाथ से चलने वाले यन्त्रों का स्थान स्वचालित यन्त्रों ने ले लिया है।

 

समूह विकास के चरण (Stages of Group Development)

 

समूह विकास एक गतिशील प्रक्रिया है। अधिकांश समूहों में लगातार परिवर्तन होते रहते हैं। वे कभी पूर्ण स्थायित्व तक नहीं पहुँचते। लेकिन इसके उपरान्त भी समूहों के उद्गम व

 

विकास के विभिन्न चरणों की पहचान की जा सकती है। समूह विकास के निम्नांकित पाँच चरण होते हैं

 

1, रूपीकरण (Forming)

2, विप्लवीकरण (Storming)

3, मानकीकरण (Norming)

4, निष्पत्तिकरण (Performing) और

5, स्थगनीकरण (Adjourning)

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1, रूपीकरण (Forming) – समूह विकास का प्रथम चरण रूपीकरण है। शुरू-शुरू में समूह के उद्देश्य, इसकी संरचना और नेतृत्व को लेकर बड़ी अनिश्चितता बनी रहती है। सदस्यों का ध्यान इस ओर रहता है कि “तेल देखो, तेल की धार देखो।” जब सदस्यों द्वारा स्वयं को समूह का हिस्सा मानना शुरू हो जाता है तब यह चरण पूरा हो जाता है।

 

2, विप्लवीकरण (Storming) – विप्लवीकरण समूह-विकास का दूसरा चरण है। इस चरण पर समूह के भीतर मतभेद व संघर्ष की स्थिति देखी जा सकती है। यद्यपि सदस्यों द्वारा समूह के अस्तित्व को स्वीकारा जाता है, लेकिन वे समूह द्वारा अपने ऊपर लगाए जाने वाले नियन्त्रण का प्रतिरोध करते हैं। फिर इस बात को लेकर संघर्ष बढ़ता है कि समूह पर नियन्त्रण किसका रहेगा। जब यह चरण पूरा हो जाता है तब समूह के भीतरी नेतृत्व सौपानिकता (Hierarchy of leadership within the group) सुस्पष्ट होने लगती है।

 

3, मानकीकरण (Norming) – मानकीकरण तीसरा चरण है। इस तीसरे चरण पर समूह के सदस्यों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध विकसित होने लगते हैं और समूह की संसक्तिशीलता (Cohesiveness) प्रदर्शित होती है। इस कारण सदस्यों में ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ की भावना बलवती होती है। वे स्वयं को समूह के सदस्य के रूप में पहचाने जाने में गर्व महसूस करते हैं समूह की संरचना सुव्यवस्थित व सुदृढ़ होने तथा सदस्यों के प्रत्याशित व्यवहार पर आत्म सहमति होने के साथ ही यह चरण पूरा हो जाता है।

 

4, निष्पत्तिकरण (Performing) – समूह-विकास का चौथा चरण निष्पत्तिकरण है। इस चरण पर समूह पूरी तरह से सक्रिय, क्रियाशील व स्वीकार्य हो जाता है। समूह प्रत्येक सदस्य कार्य को हाथो हाथ पूरा करने के लिए आवश्यक बातों को जानने व उसे समझने के लिए तत्पर रहता है।

 

5, स्थगनीकरण (Adjourning) –  समूह-विकास की दृष्टि से, स्थायी कार्य समूहों के लिए उपर्युक्त निष्पत्तिकरण का चरण ही अन्तिम चरण है, लेकिन अस्थायी समितियों, कार्यदलों और अन्य इसी तरह के समूहों के लिए, जो कुछ निश्चित कार्य के लिए बनाए जाते है, उनके लिए अन्तिम चरण है- स्थगनीकरण इस चरण पर समूहों द्वारा अपना कार्य पूरा कर लेने के बाद समूहों को भंग करने की बारी आती है। इस चरण पर समूह की प्राथमिकता यह हो है कि कार्य को जल्द से जल्द निपटाया जाए। इस चरण पर समूह के सदस्यों की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग हो सकती है। कुछ सदस्य समूह की उपलब्धि पर आनंदित होते हैं। सदस्य यह सोचकर हताश होते हैं कि समूह से गुजारे गए वे जीवन्त समय आगे नहीं होंगे। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि चूंकि समूह-विकास की प्रक्रिया एक गतिशील प्रक्रिया है, इसलिए यह जरूरी नहीं कि उनका विकास बिल्कुल इसी तरह से क्रमिक रूप में ही हो। कई बार ऐसा हो सकता है कि चरणों में कुछ चरणों का विकास साथ-साथ ही हो। यही नहीं, समूह अपने पूर्ववर्ती चरणों की तरफ भी लौट सकता है। अतः उक्त विवेचित पाँच चरणों को एक सामान्य संरचनात्मक विकास के रूप में देखना बेहतर होगा।

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दल निर्माण (Team Building)

संगठनात्मक परिवर्तन एवं विकास हेतु दल निर्माण उपागम का प्रयोग भी महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। फ्रेंच तथा बेल (French and Bell) के अनुसार, “सम्भवतः दल निर्माण सामूहिक हस्तक्षेप की महत्त्वपूर्ण विधि है।” इस उपागम का मुख्य उद्देश्य संगठन के विभिन्न स्तरों पर व्याप्त समूहों में सुधार तथा उनकी प्रभावशीलता में वृद्धि करना है। इस तकनीक को अन्तर्वैयक्तिक या अन्तर-समूह पर प्रयोग में लाया जा सकता है। अधिकांश औद्योगिक संगठनों में इस उपागम का प्रयोग फैमिली ग्रुप में किया जाता है। (फैमिली ग्रुप से आशय उस कार्य समूह से है जहाँ अधीनस्थ व्यक्ति एवं उच्चाधिकारी एक साथ लम्बी अवधि से कार्य कर रहे हैं)।

 

सामान्यतः संगठनात्मक परिवर्तन एवं विकास हेतु प्रयुक्त इस उपागम में तीन चरण सम्मिलित होते हैं—न जमा हुआ, गतिशील तथा पुनः जमा हुआ होना। प्रथम चरण में सम्पूर्ण टीम को परिवर्तन की आवश्यकताओं से अवगत कराया जाता है। सम्पूर्ण दल के अन्तर्गत खुलेपन एवं विश्वास की जलवायु विकसित की जाती है ताकि समूह परिवर्तन हेतु तैयार रहे। द्वितीय चरण में दल के सदस्य यह निर्णय करते हैं कि आगे उन्हें क्या करना चाहिए। अन्त में, जब एक बार योजना का क्रियान्वयन किया जाता है और कार्यक्रम का मूल्यांकन कर लिया जाता है तो समूह अपेक्षाकृत बेहतर निष्पादन हेतु अपने को सुदृढ़ बनाने लगता है।

 

निष्पादन मूल्य और संगठन में इसकी आवश्यकता और इसके महत्त्व

 

प्रदर्शन मूल्यांकन सबसे महत्त्वपूर्ण और अवसर प्रबन्धन के सबसे गलत पहलुओं में से एक है। आमतौर पर हम एक अधीनस्थ का मूल्यांकन करने वाले बॉस को शामिल करते हुए प्रदर्शन मूल्यांकन के बारे में सोचते हैं। हालांकि प्रदर्शन मूल्यांकन में तेजी से

अधीनस्थों को शामिल किया जाता है प्रतिपुष्टि (Feedback) प्रक्रिया के माध्यम से बॉस को अपने अधीनस्थों, कर्मचारियों, ग्राहकों की सम्पूर्ण जानकारी देने से है। क्या अधीनस्थों साथियो ग्राहकों या वरिष्ठों द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, इस प्रक्रिया में संगठन के जीवनकाल के लिए महत्त्वपूर्ण है। प्रदर्शन मूल्य प्रणाली विभिन्न प्रदर्शन आयामों में कर्मचारियों को व्यवस्थित से मूल्यांकन करने का एक साधन प्रदान करती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संगठ को भुगतान कर रहे हैं। वे कर्मचारियों व प्रबन्धकों को मूल्यवान प्रतिक्रिया प्रदान करते हैं, और वे प्रचारक के साथ-साथ समस्याओं की पहचान करने में सहायता करते हैं, हालांकि ऐसे मूल्यांकन तब तक निर्रथक है जब तक वे एक प्रभावी प्रतिक्रिया प्रणाली के साथ नहीं होते हैं। जो यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारी को प्रदर्शन से सम्बन्धित सही सन्देश मिले।

रिवार्ड सिस्टम संगठनों में एक शक्तिशाली, प्रेरक शक्ति का प्रतिनिधत्व करते हैं। लेकिन यह केवल तभी सच होता है जब सिस्टम निष्पक्ष और प्रदर्शन से बंधा होता है क्योंकि मूल्यांकन प्रदर्शन के लिए कई प्रकार के दृष्टिकोण मौजूद हैं। प्रबन्धकों को प्रत्येक के लाभ और नुकसान के बारे में पता होना चाहिए। बदले में इनाम प्रणालियों की समझ प्रबन्धकों को संगठन की आवश्यकताओं और लक्ष्यों के लिए सबसे उपयुक्त प्रणाली का चयन करने में मदद करेगी।

Group Dynamics Team Development

प्रदर्शन मूल्यांकन की आवश्यकता (Need for Performance Appraisal)

 

कर्मचारियों से कुछ आवश्यकताओं की अपेक्षा की जाती है, जिनके लिए प्रदर्शन। मूल्यांकन किया जाता है।

 

1, वेतन निर्धारण, पदोन्नति, आदि के सम्बन्ध में निर्णय रैंक के बारे जानकारी प्रदान करना।

2, अधीनस्थों के प्रदर्शन की समीक्षा |

3, ऐसी जानकारी प्रदान करना जो अधीनस्थों को परामर्श देने में मदद करती है।

4, कौशल, ज्ञान आदि के सम्बन्ध में कर्मचारियों की कमी का निदान करने के लिए जानकारी प्राप्त करना।

5, शिकायत को रोकने के लिए और अनुशासनात्मक गतिविधियों में।

6, कर्मचारी के प्रदर्शन का मूल्यांकन स्थानान्तरण, पदोन्नति, वेतन वृद्धि आदि पर प्रबंधन के निर्णय लेने में मदद करता है।

7, प्रदर्शन मूल्यांकन नियोक्ता के प्रशिक्षण और विकास की जरूरतों का पता लगाने में मदद करता है।

8, प्रदर्शन का मूल्यांकन या किसी व्यक्ति के प्रदर्शन का मूल्यांकन इनाम प्रणाली को डिजाइन करने में मदद करता है।

9, एक प्रेरक के रूप में एक व्यक्ति के प्रदर्शन के मूल्यांकन के बाद प्रतिक्रिया अध्यक्षता की।

10, प्रदर्शन मूल्यांकन चयन प्रक्रिया के सत्यापन के रूप में कार्य करता है।

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प्रदर्शन मूल्यांकन का महत्त्व (Importance of Performance Appraisal)

 

1, प्रदर्शन मूल्यांकने कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाता है और संगठन के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अधिक काम करने के लिए प्रेरित करता है।

2, प्रदर्शन की समीक्षा और मूल्यांकन एक व्यक्ति के प्रदर्शन का विश्लेषण करने में मदद करते हैं और व्यक्तिगत कर्मचारी की भूमिका टीम के प्रदर्शन को कैसे प्रभावित करेगी।

3, प्रदर्शन मूल्यांकन कमजोर क्षेत्रों और कर्मचारी की ताकत वाले क्षेत्रों की पहचान करने का सबसे अच्छा तरीका है, जो उन्हें खुले संचार और प्रतिक्रिया सत्रों के माध्यम से आत्म मूल्यांकन और आत्म-विकास का अवसर देता है।

4, यह एक योग्यता आधारित प्रणाली स्थापित करता है जो कर्मचारियों को अपने प्रयासों के लिए पहचाने जाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है।

5, प्रदर्शन की समीक्षा उम्मीदों को साफ करने और भविष्य योजनाओं के बारे में चर्चा करने के लिए प्रबंधन तक पहुँचने के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण प्रदान करती है। इसके अलावा यह संगठन में कर्मचारी की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करता है और नई ऊँचाइयों तक पहुँचता है।

6, प्रदर्शन के मूल्यांकन कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर बढ़ावा देने के लिए एक बहुत प्रभावी तरीका है। यह प्रबंधन को कंपनी की आवश्यकताओं के अनुसार स्थानान्तरण निर्णय लेने में भी मदद करता है।

7, प्रदर्शन रेटिंग और समीक्षाएँ मानव संसाधन विभाग के लिए बहुत फायदेमन्द हैं क्योंकि यह उन्हें मानव संसाधन नियोजन के लिए समय देता है और भविष्य में कर्मचारी भर्ती के लिए तैयार रहना चाहिए, यदि कोई कर्मचारी संगठन को त्याग-पत्र दे रहा है या उसका कार्यकाल समाप्त हो रहा है।

8, प्रदर्शन मूल्यांकन संगठन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं जब यह निर्णय लेने की बात आती है क्योंकि यह कर्मचारी के प्रदर्शन में एक स्पष्ट जानकारी देता है कि क्या कर्मचारी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है या कम प्रदर्शन कर रहा है। अण्डरपरफॉर्मेन्स को विलम्ब होने से पहले सुधार करने के मौके दिए जाते हैं।

9, प्रबन्धकों द्वारा अपने कर्मचारियों, अधीनस्थों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना होता है। उनके मूल्यांकन के आधार पर ही उनके नये-नये प्रशिक्षण कार्यों व तकनीकों को सीखाने की व्यवस्था करनी पड़ती है। सभी कर्मचारियों का लक्ष्य पदोन्नति पाकर कम्पनी के उच्च पदों को प्राप्त करना होता है।

10, कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए प्रदर्शन मूल्यांकन महत्त्वपूर्ण हैं। जब संगठन कर्मचारियों को प्रेरित करते हैं और सन्तुष्ट करते हैं तो कर्मचारी स्वचालित रूप से कम्पनी में बने रहेंगे और इस प्रकार यह कम्पनी में अच्छे, मेहनती और कुशल कर्मचारियों को बनाए रखने में मदद करता है।

Unit 4 Group Dynamics and Team Development Mcom Notes
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