Unit 3 Motivation Mcom Notes

Unit 3 Motivation Mcom Notes

Contents

Unit 3 Motivation Mcom Notes

 

Unit 3 Motivation Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that Mcom 1st year Motivation: Process of motivation; theories of motivation: need hierarchy theory: theory x and theory Y; Two factor theory; alderfer’s ERG theory, McCleland’s learned need theory, victor Vroom’s expectancy theory, stacy adams equity theory.

Motivation Mcom Notes HIndi

 

अभिप्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Motivation)

 

अभिप्रेरणा मानव की अन्तःप्रेरणा है जिससे प्रेरित होकर व्यक्ति स्वयं कार्य करने के लिए प्रेरित होता है। किसी भी व्यक्ति में कार्य करने की योग्यता हो सकती है, परन्तु वह कार्य अपनी पूर्ण योग्यता से तब ही सम्पन्न करेगा, जबकि उसे कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाए, अतः किसी भी व्यक्ति से कार्य का निष्पादन कराने के लिए अभिप्रेरणा देना अत्यन्त आवश्यक है। प्रमुख विद्वानों ने अभिप्रेरणा को निम्न प्रकार परिभाषित किया है –

 

माइकल जे० जूसियस के शब्दों में, “अभिप्रेरणा स्वयं की अथवा किसी अन्य व्यक्ति को वांछित कार्य करने हेतु प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया है अर्थात् वांछित प्रक्रिया प्राप्त करने के लिए सही बटन को दबाना है।”

 

डेल एस० बीच के अनुसार, “अभिप्रेरणा को किसी लक्ष्य या पुरस्कार प्राप्त करने की दृष्टि से अपनी शक्ति का विस्तार करने की तत्परता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

 

डाल्टन ई० मैकफारलैण्ड के शब्दों में, “अभिप्रेरणा का विचार मुख्यतः मनोवैज्ञानिक है। यह उन कार्यकारी शक्तियों से सम्बन्धित है, जो व्यक्तिगत रूप में कर्मचारी को अथवा उसके अधीनस्थ को निर्धारित दिशा में कार्य करने अथवा न करने के लिए प्रेरित करती हैं।” स्टेनले वेन्स के अनुसार, “ऐसा कोई विचार अथवा इच्छा, जिससे किसी की भावना इस प्रकार परिवर्तित होती है कि वह कार्य करने के लिए कृतसंकल्प हो जाता है, अभिप्रेरणा है।” केरोल शार्टल के शब्दों में, “किसी निश्चित दिशा में गतिमान होने अथवा निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निश्चित प्रेरणा या तनाव ही अभिप्रेरणा है।”

 

ई० एफ० एल० बीच के अनुसार, “अभिप्रेरणा सामान्य प्रेरणा देने वाली प्रक्रिया है, जो किसी दल के सदस्यों को कारगर रूप में मिलकर काम करने, अपने दल के प्रति निष्ठा दिखाने, सौपी हुई जिम्मेदारी को ठीक प्रकार से निभाने तथा संगठन के उद्देश्य अथवा कर्त्तव्यपूर्ति के लिए प्रभावी ढंग से भाग लेने के लिए प्रेरित करती है।”

 

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है— “अभिप्रेरणा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव को अभिप्रेरित किया जाता है, जिससे वह अपनी समस्त शक्ति एवं क्षमता निश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लगा सके। वास्तव में, अभिप्रेरणा व्यक्ति की अन्तःप्रेरणा है, जो उसे स्वयं कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।”

 

अभिप्रेरणा के तत्त्व अथवा विशेषताएँ (Elements or Characteristics of Motivation)

 

अभिप्रेरणा के प्रमुख तत्त्व अथवा विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

 

1, अन्तःप्रेरणा (Self-incentive) – अभिप्रेरणा ही व्यक्ति की अन्तःप्रेरणा है अर्थात यह व्यक्ति के अन्दर से उत्पन्न होती है। वास्तव में, कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही कार्य करने के लिए प्रेरित होता है।

 

2, अनन्त प्रक्रिया (Unending Process) – अभिप्रेरणा एक अनन्त प्रक्रिया है, जो कभी भी समाप्त नहीं होती है अर्थात् व्यक्ति सदैव कार्य करने के लिए प्रेरित होता है।

 

3, मनोवैज्ञानिक अवधारणा (Psychological Concept) – अभिप्रेरणा एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। यह व्यक्ति की मानसिक शक्ति को विकसित करके अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।

 

4, कार्य करने की शक्ति (Power to Act) – अभिप्रेरणा व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह कार्य करने की शक्ति प्रदान करती है, जिससे व्यक्ति अपनी क्षमताओं का अधिकतम प्रयोग कर पाता है। अभिप्रेरणा से सम्पूर्ण व्यक्ति प्रभावित होता है, उसका कोई भाग नहीं क्योंकि व्यक्ति एक अविभाज्य इकाई है। अतः वह पूर्ण रूप से ही अभिप्रेरित होता है।

 

5, कार्यक्षमता में वृद्धि (Increase in Efficiency) – अभिप्रेरणा व्यक्ति कार्यक्षमता में वृद्धि करती है, इससे व्यक्ति अपनी योग्यता एवं क्षमता का अधिकतम प्रयोग करता है और इसके परिणामस्वरूप उसकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। अभिप्रेरणा से व्यक्ति के उत्पादन की किस्म में सुधार होता है तथा वह अधिकतम उत्पादन करता है।

 

6, मनोबल में वृद्धि (Increase in Morale) – मनोबल एक सामूहिक भावना है। अभिप्रेरणा व्यक्तियों को सहयोग से कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती है, अतः अभिप्रेरणा मनोबल में वृद्धि करने में सहायक होती है।

 

कूण्ट्ज एवं ‘डोनेल ने अभिप्रेरणा के चार तत्त्व बताए हैं—(1) उत्पादकता (Productivity), (2) प्रतिस्पर्द्धा (Competition) (3) व्यापकता (Comprehension), एवं (4) लोचपूर्णता (Flexibility)।

Motivation Mcom Notes HIndi

अभिप्रेरणा के उद्देश्य (Aims of Motivation)

 

अभिप्रेरणा के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-

(1) कर्मचारियों को अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित करना।

(2) कर्मचारियों की आर्थिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को पूरा

(3) उपक्रम में मानवीय सम्बन्धों का विकास करना।

(4) कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि करना।

(5) कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि करना।

(6) कर्मचारियों से सहयोग प्राप्त करना ।

(7) श्रम और पूँजी के मध्य मधुर सम्बन्ध स्थापित करना।

(8) मानवीय साधनों का सदुपयोग करना।

(9) उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करना ।

 

अभिप्रेरणा को प्रभावित करने वाले घटक (Factors affecting Motivation)

 

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से अभिप्रेरणा को प्रभावित करने वाले घटकों को निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

1, मौद्रिक प्रेरणाएँ (Monetary Incentives) – उपक्रम में कर्मचारी मौद्रिक प्रेरणाओं से प्रत्यक्ष रूप से अभिप्रेरित होते हैं। मौद्रिक प्रेरणाओं में निम्नलिखित घटकों को सम्मिलित किया जाता है –

(i) उचित मजदूरी या वेतन, (ii) बोनस, (iii) ओवरटाइम, (iv) मौद्रिक पुरस्कार, एवं (v) विनियोग पर ब्याज

 

मौद्रिक प्रेरणाएँ कर्मचारियों की आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।

 

2, अमौद्रिक प्रेरणाएँ (Non-monetary Incentives) – कर्मचारियों से अधिक कार्य कराने के लिए केवल मौद्रिक प्रेरणाएँ ही पर्याप्त नहीं होतीं, अपितु अमौद्रिक प्रेरणाएँ भी कर्मचारियों को अधिक कार्य करने हेतु अभिप्रेरित करती हैं। अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं में निम्नलिखित घटकों को सम्मिलित किया जाता है—

 

(i) कार्य की सुरक्षा, (ii) कार्य की प्रशंसा, (iii) कर्मचारियों का सम्मान, (iv) कर्मचारियों से समानता का व्यवहार, (v) पदोन्नति के अवसर, (vi) अधिकारों का भारार्पण, (vii) कर्मचारियों के सुझावों को मान्यता, (viii) कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ: जैसे— आवास गृह, चिकित्सा, मनोरंजन, शिक्षा, बीमा आदि, (ix) प्रबन्ध में सहभागिता।

Motivation Mcom Notes HIndi

अभिप्रेरणा की आवश्यकता (Necessity of Motivation)

 

प्रबन्ध का प्रमुख कार्य दूसरे व्यक्तियों से कार्य कराना है। किसी उपक्रम की स्थापना निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए की जाती है। इन लक्ष्यों की पूर्ति उपक्रम में लगे व्यक्तियों को कार्य के प्रति प्रोत्साहित करके ही की जा सकती है। किसी भी व्यक्ति में कार्य करने की मानसिक एवं शारीरिक क्षमता तो हो सकती है, परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वह उस क्षमता का पूर्ण उपयोग करे। किसी भी कार्य का श्रेष्ठ निष्पादन उसी दशा में सम्भव है, जबकि व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता के साथ-साथ कार्य करने की इच्छा भी हो। किसी व्यक्ति से कार्य का भली प्रकार से निष्पादन कराने के लिए यह आवश्यक है कि उस व्यक्ति को कार्य करने के लिए अभिप्रेरणा दी जाए। प्रायः व्यवहार में यह देखने में आया है कि यदि किसी व्यक्ति को उचित प्रेरणा प्राप्त नहीं होती है, तब निश्चय ही वह अपनी क्षमता का केवल 50% से 75% तक ही उपयोग करता है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति को उचित अभिप्रेरणा दी जाती है तो वह अपनी क्षमता का उपयोग 90% से 100% तक करता है और अपने कार्य से सन्तुष्ट रहता है, अतः किसी भी उपक्रम में कार्य का उचित मात्रा में निष्पादन कराने के लिए कर्मचारियों को अभिप्रेरित किया जाना आवश्यक है।

 

अभिप्रेरणा की विधियाँ या अभिप्रेरणा के आधार (Methods of Motivation or Basis of Motivation)

 

कर्मचारियों की क्षमता का पूर्ण लाभ उठाने के लिए एवं उनसे श्रेष्ठ उत्पादन कराने के लिए उन्हें प्रेरणा देना आवश्यक है। अभिप्रेरणा देने की कोई एक निश्चित विधि नहीं है, अपितु अभिप्रेरणा अनेक विधियों से दी जा सकती है। श्रेष्ठ अभिप्रेरणा विधि उपक्रम की स्थिति, कर्मचारियों की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति एवं सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। यदि अभिप्रेरणा देने की उचित विधि का प्रयोग नहीं किया जाता है, तब इसका कर्मचारियों पर ऋणात्मक प्रभाव पड़ता है और वे उपक्रम के लिए दुष्कर सिद्ध हो सकते हैं, अतः अभिप्रेरणा विधि उपयुक्त होनी चाहिए।

 

किसी भी उपक्रम से कर्मचारियों को निम्नलिखित विधियों से अभिप्रेरणा दी जा सकती है –

 

1, धनात्मक एवं ऋणात्मक अभिप्रेरणाएँ (Positive and Negative Incentives) – धनात्मक अभिप्रेरणाओं से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है, जिनके द्वारा कर्मचारियों को अधिक मजदूरी, वेतन, बोनस आदि देकर अधिक उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। ऋणात्मक अभिप्रेरणाओं से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है, जिनके द्वारा व्यक्तियों भयभीत करके अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसमें निष्कासन, पदावनति, दण्ड, प्रताड़ना आदि को सम्मिलित किया जाता है। आज के युग में धनात्मक अभिप्रेरणाओं का प्रभाव ऋणात्मक अभिप्रेरणाओं की तुलना में अधिक पड़ता है। धनात्मक अभिप्रेरणाओं से कर्मचारी उपक्रमों में अपना अस्तित्व समझते हैं और अधिक कुशलता से कार्य करते हैं।

 

2, व्यक्तिगत एवं सामूहिक अभिप्रेरणाएँ (Individual and Collective Incentives) – व्यक्तिगत अभिप्रेरणाओं से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है, जो व्यक्ति विशेष को प्रत्यक्ष रूप से दी जाती हैं। ये केवल उन्हीं व्यक्तियों को दी जाती हैं जो उपक्रम को अधिक लाभ पहुंचाते हैं। ये अभिप्रेरणाएँ मौद्रिक एवं अमौद्रिक रूप में दी जा सकती हैं।

 

सामूहिक अभिप्रेरणाओं से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है, जो सम्पूर्ण समूह अभिप्रेरित करती हैं। ये प्रेरणाएँ समूह को प्रत्यक्ष रूप से प्रदान की जाती हैं। इनसे व्यक्ति विशेष प्रभावित न होकर, व्यक्तियों का पूर्ण समूह प्रेरित होता है। ये अभिप्रेरणाएँ भी मौद्रिक एवं अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं के रूप में दी जा सकती हैं।

 

3, मौद्रिक एवं अमौद्रिक अभिप्रेरणाएँ (Monetary and Non-monetary Incentives) – मौद्रिक अभिप्रेरणाओं से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है, जिनमें व्यक्ति को मुद्रा देकर कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है। किसी भी व्यक्ति की प्रथम आवश्यकता जीवनयापन एवं सुरक्षा की है, जिसके लिए धन की आवश्यकता होती है। प्रत्येक व्यक्ति धन प्राप्त करने के लिए ही कार्य करता है, अतः मौद्रिक अभिप्रेरणा सबसे महत्त्वपूर्ण प्रेरणा है। इससे व्यक्ति शीघ्र ही कार्य करने के लिए प्रेरित होता हैं। मौद्रिक अभिप्रेरणा उचित मजदूरी या वेतन, बोनस, प्रीमियम, विनियोग पर ब्याज आदि के द्वारा दी जा सकती है।

 

अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं से आशय ऐसी प्रेरणाओं से है, जिनमें व्यक्ति को धन न देकर अन्य विधियों से अभिप्रेरित किया जाता है। व्यक्ति केवल धन प्राप्त करने के लिए ही कार्य नहीं करता है अर्थात् व्यक्ति सामाजिक सम्मान, आत्मसन्तुष्टि, लगाव आदि आवश्यकताओं की प्राप्ति के लिए भी कार्य करता है। इन सबकी पूर्ति अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं के द्वारा ही सम्भव है। अमौद्रिक अभिप्रेरणाओं में कार्य सुरक्षा, प्रशंसा, प्रबन्ध में सहभागिता, पदोन्नति, परामर्श, अधिकारों का भारार्पण, कार्य को मान्यताएँ, कल्याणकारी योजनाएँ जैसे आवास गृह, चिकित्सा, शिक्षा, प्रशिक्षण सुविधाएँ, बीमा आदि अनेक विधियों को सम्मिलित किया जा सकता है।

 

मौद्रिक अभिप्रेरणाओं की तुलना में अमौद्रिक अभिप्रेरणाएँ अधिक प्रभावी सिद्ध होती हैं, अतः उपक्रम में कर्मचारियों को मौद्रिक अभिप्रेरणाओं के साथ-साथ अमौद्रिक अभिप्रेरणाएँ भी दी जानी चाहिए।

 

प्रत्यक्षात्मक चयनशीलता को प्रभावित करने वाले आन्तरिक घटक कुछ इस प्रकार है –

 

1, आदत (Habit)

2, अभिप्रेरणा और रूचि ( Motivation and Interest )

3, सीखना (Learning)

4, संगठनात्मक और विशेषज्ञता (Organizational and Specialization)

5, आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि (Economic and Social Background)

6, व्यक्तित्व (Personality)

7, आवश्यकताएँ और इच्छाएँ (Needs and Desires)

8, अनुभव (Experience)

9, अभिप्रेरणा (Motivation)

Motivation Mcom Notes HIndi

1, आदत (Habit) – आदतें मुश्किल से बदलती हैं और इसलिए व्यक्ति वस्तुओं, स्थितियों और परिस्थितियों को अपनी आदतों के अनुसार अलग-अलग रूप से अनुभव करते है। एक हिन्दू अपनी अच्छी तरह से स्थापित आदत के कारण, जब वह एक मन्दिर को देखता है, तो वह प्रणाम करता है। ये जीवन सेटिंग्स में कई उदाहरण है जहाँ व्यक्ति गलत संकेतों के लिए सही प्रतिक्रिया करता है। जैसे एक सेवानिवृत्त सैनिक खुद जमीन पर लेट जाता है जब वह कार के टायर के फटने की आवाज सुनता है।

 

2, अभिप्रेरणा और रुचि (Motivation and Interest) – प्रेरक कारकों के दो उदाहरण भूख और प्यास है। मोटीवेशनल फैक्टर्स उन उत्तेजनाओं के लिए व्यक्ति को संवेदनशीलता को बढ़ाते है जिन्हें वह अपने अतीत के अनुभव के मद्देनजर अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रासंगिक मानता है। एक प्यासे व्यक्ति को अपनी प्यास बुझाने के लिए एक पानी के फव्वारे तथा एक भूखे व्यक्ति को होटल की तलाश होती है। भूखे व प्यासे व्यक्ति इनके अलावा किसी और वस्तु की कोई कल्पना नहीं होती है। वह भरपेट भोजन तथा प्यास बुझाने लायक पानी से ही पूर्ण सन्तुष्ट हो जाता है। इसके लिए वह रेस्तरां या होटल का चयन अपने उपलब्ध संसाधनों के अनुसार ही करता है।

 

3, सीखना (Learning) – सीखना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आदत है। किसी व्यक्ति को यदि कोई कार्य नहीं आता है लेकिन वह उस कार्य को सीखने के लिए इच्छुक है तो वह व्यक्ति अपने निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति बहुत ही आसानी से कर लेता है। सीखने की आवधारणा से ही कर्मचारियों व अधिकारियों के प्रदर्शन में प्रभावी सुधार होता है। संस्था को समय-समय पर अपने यहाँ ट्रेनिंग व नयी-नयी तकनीकों का ज्ञान देने की व्यवस्था उपलब्ध करवानी चाहिए।

 

4, संगठनात्मक भूमिका और विशेषज्ञता (Organizational Role and Specialization) – आधुनिक संगठन विशेषज्ञता को महत्त्व देते हैं। नतीजन एक व्यक्ति की विशेषता जो उसे एक विशेष संगठनात्मक भूमिका में डालती है, उसे कुछ उत्तेजनाओं का चयन करने और दूसरों की अवहेलना करने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार एक लंबी रिपोर्ट एक विभागीय प्रमुख पहले अपने विभाग से सम्बन्धित पाठ को नोटिस करेगा।

 

5, आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि (Economic and Social Background) – कर्मचारी की धारणाएँ आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित होती हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित कर्मचारियों का काम विकसित कर्मचारियों के बजाय विकास के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण है।

 

6, व्यक्तित्व (Personality) – माना जाता है कि व्यक्ति के साथ-साथ उद्दीपक की धारणा प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है। दोनों व्यक्तियों की आयु, लिंग, जाति, पहनावा आदि धारणा प्रक्रिया पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

 

7, आवश्यकताएँ और इच्छाएँ (Needs and Desires) – उत्तेजनाओं के बारे में एक व्यक्ति की धारणा उस समय, अंतर, उसकी आवश्यकताओं और इच्छाओं से प्रभावित होती है। धारणा समय-समय पर उसकी जरूरतों और इच्छाओं में भिन्नता के आधार पर बदली रहती है।

 

8, अनुभव (Experience) – घटनाओं या संघों के पैटर्न ने अतीत में जो सीखा है वह वर्तमान धारणाओं को प्रभावित करता है। व्यक्ति उन तरीकों से धारणाओं का चयन करेगा जो अतीत में पाए गए चीजों के साथ फीट होते हैं।

 

9, अभिप्रेरणा (Motivation) – लोग इस क्षण के अनुसार धारणाओं का चयन करेंगे जिनकी उन्हें आवश्यकता है। वे उन चयनों का पक्ष लेंगे जो उन्हें लगता है कि उनकी वर्तमान जरूरतों के साथ उनकी मदद करेंगे और उनकी जरूरतों के लिए अप्रासंगिक होने की अनदेखी करने की अधिक सम्भावना होगी।

 

कुछ धारणाओं को चुने जाने के बाद उन्हें अलग तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है। निम्नलिखित कारक वे हैं जो आवधारणात्मक संगठन निर्धारित करते हैं—

 

1, चित्रा ग्राउण्ड (Figure-ground) – चित्रा-ग्राउण्ड संगठन एक प्रकार का अवधारणात्मक समूहन है जो दृष्टि के माध्यम से वस्तुओं को पहचानने के लिए एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, एक मुद्रित पेपर पर काले शब्द को आँकडा और पृष्ठभूमि के रूप में सफेद शीट के रूप में देखा जाता है।

 

2, अवधारणात्मक समूह (Perceptual Grouping) – समूहन तब होता है जब धारणाओं को एक पैटर्न में एक साथ लाया जाता है।

 

3, क्लोजर (Closure) – यह कथित भागों से बाहर बनाने की कोशिश करने की प्रवृत्ति है। कभी-कभी यह गलती से हो सकता है, हालांकि, जब विचारक अपने विचारों अथवा फार्म को पूरा करने के लिए अप्रमाणिक जानकारी भरता है।

 

4, निकटता (Proximity) – वे धारणाएँ जो शारीरिक रूप से एक-दूसरे के समीप हो, एक पैटर्न या सम्पूर्ण में व्यवस्थित करना आसान है।

 

5, समानता (Similarity) – धारणाओं के बीच समानता उन्हें एक साथ समूहित करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं।

 

6, अवधारणात्मक निरंतरता (Perceptual Constancy) – इसका मतलब है कि अगर किसी वस्तु को हमेशा एक निश्चित तरीके से माना जाता है या कार्य करता तो व्यक्ति यह अनुमान लगाएगा कि यह वास्तव में हमेशा ऐसा ही होता है।

 

7, अवधारणात्मक संदर्भ (Perceptual Context) – लोग अन्य प्रासंगिक धारणाओं के सम्बन्ध में धारणाओं को व्यवस्थित करते हैं, और उन कनेक्शनों से एक सन्दर्भ बनाते हैं।

 

 

(I) ‘आवश्यकता क्रमबद्धता की मैसलो की विचारधारा (Maslow’s Theory of ‘ Need Hierarchy’)

 

अब्राहम मैसलो ने मानव अभिप्रेरणा का अपना एक मॉडल वर्ष 1943 ई० में बनाया था। उन्होंने अपने अनुसन्धान में उपस्थित सभी व्यक्तियों के समक्ष एक प्रश्न रखा था कि व्यक्तियों को एक निर्धारित मार्ग की ओर अग्रसर करने के लिए किसकी प्रेरणा प्राप्त होती है। इस विचारधारा को ‘आवश्यक क्रमबद्धता’ की विचारधारा के रूप में निरूपित किया गया।

Motivation Mcom Notes HIndi

मैसलो की आवश्यकता क्रमबद्धता अवधारणा की मान्यताएँ (Assumptions of Maslow’s Need Hierarchy Theory)

 

अब्राहम मैसलो की मानव अभिप्रेरणा की आवश्यकता क्रमबद्धता अवधारणा निम्नलिखित दो मान्यताओं पर आधारित है—

 

(1) मनुष्य की अनेक आवश्यकताएँ होती हैं, जिनकी प्रकृति भिन्न-भिन्न प्रकार होती हैं, जो निचले स्तर पर जीवविज्ञानी आवश्यकताओं से लेकर ऊपरी स्तर पर मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं तक विस्तृत हैं।

 

(2) इस अवधारणा में आवश्यकता की पूर्ति करने का ढाँचा क्रमबद्ध रूप में बनता है। और उसी रूप में नीचे से ऊपर की ओर इनकी पूर्ति की जाती है। पहले निचले स्तर आवश्यकताओं की पूर्ति और बाद में ऊपरी स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति मनुष्य को कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती है।

 

आवश्यकता क्रमबद्धता का यह मॉडल मानवीय व्यवहार को अधिक गतिशीलता एवं वास्तविकता से स्पष्ट करता है क्योंकि यह मूल रूप से व्यक्तियों के अन्तर्मन की बात को अभिप्रेरण के रूप में कहता है। मैसलो ने अपनी पुस्तक ‘Motivation and Personality’ में व्यक्तियों की आवश्यकताओं का विश्लेषण पाँच स्तरों पर किया है

 

1, शारीरिक आवश्यकताएँ (Physiological Needs) – मनुष्य की शारीरिक आवश्यकताएँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं जिनमें भोजन, पानी, मकान व यौन सम्बन्धी आवश्यकताएँ सम्मिलित की जाती हैं। ये अनिवार्य आवश्यकताएँ’ कहलाती हैं और इनकी पूर्ति के उपरान्त ही अन्य स्तर की आवश्यकताएँ उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती हैं।

 

2, सुरक्षात्मक आवश्यकताएँ (Safety Needs) – जब शारीरिक आवश्यकताएँ  पूर्णता प्राप्त कर लेती हैं तो सुरक्षात्मक उपायों की ओर बढ़ा जाता है। इन आवश्यकताओं में अपनी वृद्धावस्था की चिन्ता तथा परिवार के उज्ज्वल भविष्य का चिन्तन रहता है। भविष्य के अनिश्चित होने तथा वृद्धावस्था में कार्यक्षमता कम होने की आशंका ही वर्तमान में भविष्य के लिए प्रबन्ध करने की आवश्यकता के रूप में अभिप्रेरणा का कार्य करती है। वर्तमान में शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के उपरान्त अनिश्चित भविष्य में इन आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे, यह भावना एक श्रेष्ठ उत्प्रेरक का कार्य करती है।

 

3, सामाजिक आवश्यकताएँ (Social Needs) – शारीरिक व सुरक्षात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाने के पश्चात् व्यक्ति सामाजिक आवश्यकताओं की ओर बढ़ता है, जिसमें मित्र बनाना, सामाजिक कार्यों में आदान-प्रदान करना, विभिन्न सामाजिक मान-मर्यादा के पदों की प्राप्ति करना शामिल है।

 

4, स्वाभिमान आवश्यकताएँ (Esteem Needs) – मनुष्य की सामाजिक आवश्यकताएँ पूरी होने के बाद स्वाभिमान सम्बन्धी आवश्यकताएँ जन्म लेती हैं जिनमें पद, प्रतिष्ठा, सम्मान आदि को सम्मिलित किया जाता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति से व्यक्ति के अहम् की तुष्टि होती है, उपलब्धियों का ज्ञान होता है तथा समाज व समुदाय में एक सम्मानित स्थान की इच्छा होती है।

 

5, आत्मविकास की आवश्यकताएँ (Self Actualization Needs) – उच्च स्तर की ये आवश्यकताएँ व्यक्ति की क्षमता, योग्यता तथा उपलब्धियों का भान कराने से सम्बन्धित होती हैं।

Motivation Mcom Notes HIndi

(II) अभिप्रेरणा की द्वि-घटक विचारधारा (Two-Factors Theory of Motivation)

 

हर्जबर्ग की यह विचारधारा दो घटकों पर आधारित है, अतः इसे अभिप्रेरणा की द्वि-घटक विचारधारा के रूप में ख्याति प्राप्त हुई। इसमें कार्य स्थल पर कर्मचारियों के व्यवहार को प्रभावित करने वाले घटकों को दो समूहों में विभाजित किया गया है— स्वास्थ्य एवं अभिप्रेरणा। जहाँ ‘स्वास्थ्य’ घटक कार्य वातावरण से सम्बन्धित है वहीं ‘अभिप्रेरणा’ घटक कार्य को करने की प्रेरणा देता है।

 

1, स्वास्थ्य घटक (Hygienic Factors) – कर्मचारियों के कार्य वातावरण को प्रभावित करने वाले स्वास्थ्य घटकों में संस्था की नीतियों, पर्यवेक्षण, व्यवस्था, कार्य स्थितियों, पारस्परिक सम्बन्धों व वेतन आदि को सम्मिलित किया जाता है। चूंकि ये घटक कर्मचारी कार्यक्षमता को बनाए रखते हैं, अतः इन्हें ‘रखरखाव घटक’ भी कहा जाता है।

 

2, अभिप्रेरणा घटक (Motivation Factors) – चुनौतीपूर्ण कार्य, उपलब्धि उन्नति, मान्यता, विकास जैसे तत्वों का समावेश अभिप्रेरणा घटक के रूप में है। इनके द्वारा कर्मचारियों में प्रेरणा का संचार होता है। ये अभिप्रेरक तत्त्व कर्मचारियों में कार्य करने भावना भरकर उन्हें उत्प्रेरित करते हैं, जबकि स्वास्थ्य तत्त्व केवल सन्तुष्टि प्रदान करते हैं।।

 

इस विचारधारा के अनुसार, स्वास्थ्य घटकों पर ध्यान देकर कर्मचारियों को असन्तुष्टि को दूर किया जा सकता है।

Motivation Mcom Notes HIndi

(III) अभिप्रेरणा की त्रि-घटक या ERG विचारधारा (Three-Factors or ERG Theory of Motivation)

 

वास्तव में यह विचारधारा मैसलो तथा हर्जबर्ग की विचारधारा का संशोधित रूप है। इस विचारधारा को एल्डरफर ने प्रस्तुत किया, अतः इसे ‘एल्डरफर की त्रि-घटक विचारधारा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। एल्डरफर ने आवश्यकताओं को तीन घटकों के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया है- अस्तित्व (Existence), सम्बद्धता (Relatedness) तथा विकास (Growth)। संक्षेप में, इसी को ‘ERG विचारधारा’ अथवा ‘त्रि घटक विचारधारा के नाम से पुकारा जाता है।

 

1, अस्तित्व (Existence) – ऐसी आवश्यकताएँ, जो व्यक्ति का अस्तित्व बनाए रखने के लिए अनिवार्य है, अस्तित्व सम्बन्धी आवश्यकताएँ कही जाती हैं, जिनमें रोटी, कपड़ा और मकान तथा सुरक्षा की आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जाता है।

 

2, सम्बद्धता (Relatedness) – इसके अन्तर्गत सामाजिक सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में उदित होने वाली विभिन्न आवश्यकताएँ समाहित हैं। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य अन्तर्सम्बन्धों को स्थान दिया जाता है। 3, विकास (Growth)– व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास से जुड़ी आवश्यकताओं को इस समूह में सम्मिलित किया गया है, जिसमें आन्तरिक स्वाभिमान व आत्मविकास कारण उदय होने वाली आवश्यकताएँ सम्मिलित हैं।

Motivation Mcom Notes HIndi

एल्डरफर द्वारा प्रतिपादित श्रेणीकरण का यह सिद्धान्त व्यक्ति की भावना समाहित विभिन्न तत्त्वों पर आधारित है। ये तत्त्व भावना के स्तर को कम या अधिक प्रभावित करते हैं, जो निम्नलिखित है –

 

1, नैराश्य (Frustration) – बारम्बार असफलता की स्थिति प्राप्त होने पर इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति अलभ्य हो जाने पर व्यक्ति में नैराश्य का समावेश हो जाता है। लेकिन नैराश्य की अवस्था प्रेरणा का संवाहक भी बन सकती है। ऐसी अवस्था में अर्थात् नैराश्य का अवस्था में प्रेरणा सफलीभूत होती है और इसका परिणाम भी उत्तम रहता है।

 

2, प्रतिगमन (Regression) – जब व्यक्ति किसी आवश्यकता की पूर्ति में बार-बार विफल रहता है, तब वह पीछे की ओर चला जाता है, जिसे ‘प्रतिगमन’ कहा जाता है। ऐस विपरीत अवस्था आने पर व्यक्ति प्रतिगामी हो जाता है और वह निचले स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति में हो लग जाता है। ऐसी स्थिति में विकास, स्वाभिमान तथा सामाजिकता से उसका सरोकार लगभग समाप्त हो जाता है।

 

3, अग्रगमन (Progression) – जब व्यक्ति की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है, तब वह सन्तुष्ट होकर ऊपरी स्तर की आवश्यकताओं की ओर अग्रसर हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए स्वाभिमान व आत्मविकास जैसी आवश्यकताएँ अभिप्रेरक का कार्य करती हैं।

 

4, लालसा (Aspiration) – जैसे-जैसे व्यक्ति विकास की ओर अग्रसर होता जाता है, वैसे-वैसे ही उसकी और अधिक विकास की लालसा बलवती होती जाती है तथा इस लालसा की पूर्ति के निमित्त उसमें नई शक्ति का संचार होने लगता है।

 

एल्डरफर की यह विचारधारा मैसलो व हर्जबर्ग की विचारधारा का सुधरा हुआ रूप है जो अधिक व्यावहारिक है।

 

(IV) स्टेसी एडम्स की समता अभिप्रेरणा विचारधारा (Stacy Adam’s Equity Theory of Motivation)

कोई भी व्यक्ति कार्य करने को अभिप्रेरित तभी होगा जब उसको उसके कार्य का निष्पक्ष व न्यायोचित पुरस्कार मिलेगा। निष्पक्ष व न्यायोचित से कम पुरस्कार मिलने पर व्यक्ति असन्तुष्ट हो जाता है और कार्य के प्रति उसकी रुचि निरुत्साह में परिवर्तित हो जाती है। यदि किसी व्यक्ति को न्यायोचित से अधिक पुरस्कार मिला है, तब वह दूसरों को पुरस्कार से वंचित करके उसे दिया गया होगा। इससे जिनका पुरस्कार का अधिकार छिना, वे तो असन्तुष्ट होंगे ही, साथ ही जिसको आवश्यकता से अधिक मिला वह और अधिक पक्षपात की आशा करेगा तथा सन्तुष्ट वह भी नहीं होगा।

Motivation Mcom Notes HIndi

1, आगत (Input) – अभिप्रेरण हेतु कार्य करने वाले व्यक्ति की शिक्षा, ज्ञान, अनुभव, कौशल, चातुर्य, प्रयास आदि को पुरस्कार प्राप्ति का आगत आधार माना जाता है।

 

2, परिणाम (Outcomes) – अभिप्रेरण के परिणाम मौद्रिक व गैर-मौद्रिक दोनों रूपों में हो सकते हैं। मौद्रिक परिणामों में वेतन वृद्धि, बोनस, भविष्य निधि, पेन्शन आदि को समाहित किया जाता है, जबकि गैर-मौद्रिक परिणामों में प्रशंसा, पदोन्नति, मान्यता आदि का समावेश होता है।

 

3, ग्राह्य समता (Perceived Equity) – जब किसी कार्य में कर्मचारी का योगदान और उसके बदले उसे प्राप्त पुरस्कार समान होते हैं, तब इसे ‘ग्राह्य समता’ कहा जाता है, जो पक्षपातरहित है।

 

4, वितरण न्यायोचितता (Distributive Justice) – कर्मचारियों को पुरस्कार के वितरण में न्यायोचितता का आभास होना चाहिए। पुरस्कार न्यायोचित रूप में वितरित हुए हैं केवल यही पर्याप्त नहीं है वरन् पुरस्कारों का वितरण न्यायोचित लगना भी चाहिए। एक कर्मचारी अन्य कर्मचारी को प्राप्त पुरस्कार से तुलना कर अपने पुरस्कार की न्यायोचितता की परख करता है।

 

5, तुलना (Comparison) – एक कर्मचारी द्वारा कार्य के निष्पादन में लगे योगदान व प्राप्त पुरस्कार की तुलना दूसरे कर्मचारी द्वारा कार्य निष्पादन के योगदान व पुरस्कार से की जाती है।

 

(i) यह तुलना अपने ही संगठन में लगे अपने समान कर्मचारी से हो सकती है, जिसे स्व-आन्तरिक तुलना (Self-inside comparison) कहा जाता है।

 

(ii) यह तुलना अपने ही संगठन के दूसरे पद पर आरूढ़ व्यक्तियों से की जा सकती है, जिसे अन्य आन्तरिक तुलना (Other-inside comparison) कहा जाता है।

 

(iii) यह तुलना अपने संगठन के बाहर अपने समान कार्यरत व्यक्ति से की जा सकती है, जिसे स्व-बाह्य तुलना (Self-outside comparison) कहा जाता है।

 

(iv) यह तुलना अपने संगठन के बाहर भिन्न-भिन्न पदों पर आरूढ़ व्यक्तियों से की जाती है, जिसे अन्य बाह्य तुलना (Other-outside comparison) कहा जाता है। स्टेसी एडम्स की यह विचारधारा व्यावहारिक तथा उचित मानी जाती है।

Motivation Mcom Notes HIndi

(V) ग्रूम की प्रत्याशा अभिप्रेरणा विचारधारा (Vroom’s Motivation Theory of Expectancy)

 

मैसलो व हर्जबर्ग की सन्तुष्टि घटक विचारधारा की आलोचना करते हुए ब्रूम ने वैकल्पिक अभिप्रेरण विचारधारा का प्रतिपादन किया, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति कुछ लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु इसलिए अभिप्रेरित होते हैं कि उन्हें कुछ क्रियाओं की प्रत्याशा होती हैं, जो उनके लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करती है अर्थात् व्यक्ति प्रत्याशा में भी अभिप्रेरित होते हैं। ब्रूम का यह मॉडल मूल्य, प्रत्याशा व शक्ति तीन आधारभूत अवधारणाओं पर टिका है। ब्रूम की अवधारणा बीजगणितीय सूत्र के समतुल्य है, जिसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है

 

अभिप्रेरणा (शक्ति) = सदृढ़ता x प्रत्याशा

Motivation (Force) = Valence x Expectancy

 

1, सदृढ़ता (Valence) – ब्रूम के शब्दों में सदृढ़ता से आशय किसी विशिष्ट परिणाम के लिए व्यक्ति की वरीयता से है, जिसमें मौद्रिक व गैर-मौद्रिक प्रेरणाएँ (Incentives), धारणाएँ (Attitudes) तथा प्रत्याशित उपयोगिता (Expected Utility) सम्मिलित हैं। किसी लक्ष्य के प्रति व्यक्ति की सदृढ़ता तभी सकारात्मक होती है, जबकि वह परिणाम को वरीयता देता है।

 

2, प्रत्याशा (Expectancy) – अभिप्रेरण को प्रभावित करने वाला दूसरा घटक प्रत्याशा है, जिसमें व्यक्ति की यह सम्भावना निहित है कि विशिष्ट क्रिया से परिणाम प्राप्त होंगे। सदृढ़ता (Valence) शक्ति का अभिन्न अंग ‘कर्म’ (Instrumentality) है। विचारधारा का महत्त्व (Importance of the Theory)

 

वूम की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह विचारधारा कार्य अभिप्रेरण में व्यक्तिगत भिन्नताओं को मान्यता देती है और यह बताती है कि अभिप्रेरणा एक जटिल प्रक्रिया है।

Motivation Mcom Notes HIndi

(VI) उपलब्धि विचारधारा (Achievement Theory)

 

उपलब्धि विचारधारा का प्रतिपादन मैक्कलीलैण्ड एवं उनके सहयोगियों ने किया था। मैक्कलीलैण्ड के शोध-कार्यों से स्पष्ट होता है कि अभिप्रेरण के लिए मानवीय आवश्यकताओं को समझना आवश्यक होता है। उन्होंने मानवीय अभिप्रेरक आवश्यकताओं को तीन भागों में विभक्त किया है |

 

1, उपलब्धि की आवश्यकता (Need for Achievement) – इसके लिए व्यक्ति समस्याओं के समाधान का व्यक्तिगत उत्तरदायित्व लेने तथा कार्य को अधिक कुशलता से करने एवं चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार करता है।

 

2, सम्बन्ध की आवश्यकता (Need for Affiliation) – प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से अच्छे एवं मित्रवत् सम्बन्ध बनाए रखने का प्रयास करता है। वह अन्य व्यक्तियों से सम्मान एवं मान्यता चाहता है। वह इसके लिए सामाजिक संगठनों में भी सम्मिलित होता है।

 

3, अधिकार की आवश्यकता (Need for Power) – इस आवश्यकता के कारण ही वह अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करना चाहता है। वह अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए दूसरों से प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए हमेशा तैयार रहता है।

 

अभिप्रेरणा देते समय मुख्यतः ‘X’ सिद्धान्त तथा ‘Y’ सिद्धान्त को ध्यान में रखा जाता है। ‘X’ सिद्धान्त निराशावादी दृष्टिकोण तथा ‘Y’ सिद्धान्त आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

Motivation Mcom Notes HIndi

‘एक्स’ सिद्धान्त (‘X’ Theory)

 

मैक्ग्रेगर द्वारा प्रतिपादित ‘X’ सिद्धान्त की यह मान्यता है कि व्यक्ति स्वतः कार्य नहीं करना चाहता है, अत: व्यक्ति को डरा-धमकाकर अथवा दण्ड का भय दिखाकर काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

 

“एक्स’ सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions of ‘X’ Theory)

 

‘X’ सिद्धान्त की मान्यताएँ निम्नलिखित है –

 

(1) ‘एक्स’ सिद्धान्त को परम्परागत विचारधारा के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।

(2) आर्थिक रूप से अधिक लाभ अर्जित होने का लालच देकर कार्य के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

(3) अमिक के प्रति प्रबन्धन तन्त्र की भावना कुण्ठित होने के कारण वह श्रमिक को एक मशीन समझता है तथा उसी रूप में लगातार काम लेना चाहता है।

(4) व्यक्ति अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को दबाए रखता है क्योंकि वह अपनी अथवा परिवार की सुरक्षा के प्रति अधिक सतर्क रहता है। महत्त्वाकांक्षी होने में जोखिम बढ़ जाता है

(5) इसमें व्यक्ति की कार्य के प्रति कोई रुचि नहीं होती है।

(6) व्यक्ति स्वेच्छा तथा प्रसन्नतापूर्वक कार्य करने का इच्छुक कदापि नहीं होता है।

(7) निर्देशन की अवस्था में ही व्यक्ति कार्य करने की ओर प्रेरित होता है।

(8) भयातुर होने पर ही व्यक्ति कार्य करने की ओर उन्मुख होता है।

(9) व्यक्ति स्वतः किसी उत्तरदायित्व को वहन करने से सदैव बचता है। मजबूरी में हो वह उत्तरदायित्व का भार अपने ऊपर लेता है।

Motivation Mcom Notes HIndi

भारत के में ‘एक्स’ सिद्धान्त का प्रयोग (Use of ‘X’ Theory with Reference to India)

 

उपर्युक्त मान्यताओं का अध्ययन कर हम इस सिद्धान्त की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं तथा यह कह सकते हैं कि ‘X’ सिद्धान्त अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है। यह सिद्धान्त उत्पादन के मुख्य साधन श्रमिक को केवल एक मशीन के पुर्जे की तरह महत्त्व देता है। भारत में निरन्तर लम्बे समय तक गुलाम रहने के कारण यहाँ के श्रमिकों की मानसिकता नहीं बदली है, उन्हें नियन्त्रण चाहिए।

 

इस प्रकार, ‘X’ सिद्धान्त परम्परागत है तथा निराशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है इसके अन्तर्गत व्यक्ति से कार्य लेने के लिए दबाव का प्रयोग किया जाता है तथा श्रमिक को कोई प्रेरणा नहीं दी जाती है।

 

‘वाई’ सिद्धान्त (‘Y’ Theory)

 

‘X’ सिद्धान्त के दोषों को दूर करने के लिए ‘Y’ सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया। इसका इ प्रतिपादन भी मैक्ग्रेगर ने किया है। यह सिद्धान्त आशावादी दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें मानवीय सम्बन्धों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। मैक्ग्रेगर के अनुसार, “एक प्रभावशाली संगठन वह है जिसमें निर्देशन एवं नियन्त्रण के स्थान पर सत्यनिष्ठा एवं सहयोग हो और जिसमें प्रत्येक निर्णय से प्रभावित होने वाले को सम्मिलित किया जाता हो।”

 

‘वाई’ सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions of ‘Y’ Theory)

 

‘Y’ सिद्धान्त की मान्यताएँ निम्नलिखित है –

 

(1) इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति को पद की सन्तुष्टि रहती है तथा अपने सामाजिक स्वरूप के अनुसार जीवन स्तर भी सही रहता है।

(2) यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि व्यक्ति को मौद्रिक अभिप्रेरणाओं के साथ-साथ अमौद्रिक अभिप्रेरणाएँ भी दी जानी चाहिए।

(3) इसमें कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण पर विशेष जोर दिया जाता है। प्रजातान्त्रिक अवधारणाओं पर आधारित होने के कारण ऐसा किया जाना स्वाभाविक है।

(4) कोई भी व्यक्ति कार्य से नहीं घबराता है। वह स्वेच्छा से कार्य करना चाहता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को कार्य करने का उचित अवसर प्रदान किया जाए।

(5) कार्य के द्वारा व्यक्ति को पूर्ण सन्तुष्टि प्राप्त होती है, अत: उसको कार्य का किया जाना अरुचिकर नहीं लगता है।

(6) किसी भी व्यक्ति को डरा-धमकाकर कार्य का निष्पादन नहीं कराया जा सकता है। कार्य का निष्पादन कराने के लिए उचित वातावरण, साधन एवं अवसर प्रदान किए जाते हैं।

(7) इस सिद्धान्त में व्यक्ति में महत्त्वाकांक्षा का तत्त्व महत्त्वपूर्ण होता है। वह उत्तरदायित्व के गुरुतर भार को सहर्ष स्वीकार करने के लिए सदैव उद्यत रहता है।

(8) इसमें मानवीय सम्बन्धों पर जोर दिया जाता है जिस कारण सम्बन्धों में मधुरता परिव्याप्त रहती है तथा कर्मचारियों को सन्तुष्टि प्राप्त होती है।

Motivation Mcom Notes HIndi

भारत के सन्दर्भ में ‘वाई’ सिद्धान्त का प्रयोग (Use of ‘Y’ Theory with Reference to India)

 

भारत में नियोक्ता व कर्मचारी के बीच आज भी मालिक और नौकर का भाव बना हुआ है, इसीलिए श्रमिक यह सोचता है कि उसे अपने मालिक की आज्ञा, फिर चाहे वह कैसी भी हो, का पालन करना है और नियोक्ता यह सोचता है कि श्रमिक से अधिक से अधिक कार्य लेना और कम-से-कम पारिश्रमिक तथा न्यूनतम सुविधाएँ देना उसका अधिकार है। इसी कारण भारत में ‘Y’ सिद्धान्त के आधार पर अधिकतर प्रबन्ध में कार्य नहीं किया जाता है। वर्तमान समय में वैधानिक प्रावधानों और श्रम संघों में जागरूकता आने के पश्चात् भी इस सिद्धान्त के उपयोग में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई है। अब श्रमिक अपने अधिकारों की माँग धीरे-धीरे करने लगा है। इसी प्रकार कुछ नियोक्ता भी लाभ विभाजन एवं प्रबन्ध में सहभागिता आदि के विचार को व्यवहार में ला रहे हैं। ये विचार ‘Y’ सिद्धान्त के अन्तर्गत ही आते हैं। ‘Y’ सिद्धान्त की मान्यताओं को भारत में अभी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन इसके सम्बन्ध में श्रम संघों तथा सरकार द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं।

 

भारत में ‘Y’ सिद्धान्त की मान्यताओं का अभी पूर्ण रूप से विकास तो नहीं हुआ है, परन्तु यह आशा अवश्य की जा सकती है कि भविष्य में धीरे-धीरे ही यहाँ ‘Y’ सिद्धान्त की मान्यताओं को महत्त्व मिलेगा।

 

‘Y’ सिद्धान्त आज के युग में अधिक महत्त्वपूर्ण तथा कारगर है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत श्रमिकों का स्तर ऊँचा रहता है तथा उन्हें उपक्रम में मान्यता मिलती है, इसीलिए आजकल इस सिद्धान्त का उपयोग किया जाता है।

Unit 3 Motivation Mcom Notes
Unit 3 Motivation Mcom Notes

Related Post:-

Unit 1 Managerial Functions Mcom Notes

Unit 2 Organizational Behaviour Mcom Notes

Unit 4 Group Dynamics and Team Development Mcom Notes

Unit 5 Leadership Mcom Notes

 Motivation Mcom Notes Hindi


Follow me at social plate Form
FacebookInstagramYouTubeTwitter

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Home
B/M.com
B.sc
Help
Profile
Scroll to Top