Unit 2 Organizational Behaviour Mcom Notes

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Unit 2 Organizational Behaviour Mcom Notes

 

Unit 2 Organizational Behaviour Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that Mcom 1st year Organizational Behaviour: Organizational behavior; Concept and significance; Emergence and ethical perspective; Attitudes; Perception; Learning; Personality; Transactional Analysis.  [organizational Behaviour Mcom Notes ]

 

संगठनात्मक व्यवहार से आशय Meaning of Organizational Behaviour)

 

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में, जहाँ सम्प्रेषण व कार्य प्रणाली की तकनीकी व्यवस्था अपने नवीनतम रूप में विद्यमान होती है, वहाँ संगठन प्रणाली को भली प्रकार समझने के लिए जटिल सामाजिक तकनीकी प्रणाली को समझना आवश्यक हो जाता है।

 

संगठनात्मक व्यवहार के अध्ययन में उन मार्गों से परिचित होना है, जिनमें व्यक्ति अधिक प्रभावपूर्ण विधि से कार्य करते हैं।

 

 ‘जॉन डब्ल्यू० न्यूस्टोर्म एवं कीथ डेविस ने अपनी पुस्तक ‘Organizational Behaviour’ में संगठनात्मक व्यवहार को परिभाषित करते हुए कहा है— “एक संगठन में

 

व्यक्तियों के वैयक्तिक व समूह के रूप में कार्य करने के ढंग के ज्ञान का अध्ययन व प्रयोग संगठनात्मक व्यवहार है।”

 

रोबिन्स के अनुसार, “संगठनात्मक व्यवहार अध्ययन का वह क्षेत्र है जो संगठन के भीतर व्यक्तियों, समूहों व संरचना का व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव की जाँच करता है ताकि संगठन की प्रभावशीलता में सुधार लाने हेतु ऐसी जानकारी को काम में लिया जा सके।”

 

संगठनात्मक व्यवहार की अवधारणा (Concept of Organizational Behaviour)

 

संगठनात्मक व्यवहार की निम्नलिखित अवधारणाएँ हैं –

 

1, संगठन की प्रकृति (Nature of Organization) – संगठनात्मक व्यवहार से सम्बद्ध संगठनात्मक प्रकृति की अवधारणाएँ निम्नलिखित हैं—

 

(i) हितोन्मुखी अवधारणा (Interested Onset Concept) – प्रत्येक संगठन मानवीय हितों की पूर्ति के लिए ही गठित किया जाता है। ये हित व्यक्तिगत भी होते हैं और पारम्परिक भी।

 

(ii) प्रणालित अवधारणा (System-oriented Concept) – प्रत्येक संगठन की अपनी सामाजिक संरचना व प्रणाली होती है, जिन्हें औपचारिक व अनौपचारिक प्रणालियों के रूप में जाना जा सकता है। इस सामाजिक संरचना के द्वारा संस्था के संगठनात्मक वातावरण को बल प्राप्त होता है।

 

(iii) नैतिकतापरक अवधारणाएँ (Moralistic Concepts) – प्रत्येक संगठन की अपनी नैतिक नीतियाँ होती हैं, जो सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं धार्मिक नैतिकता का संगठन के हित में मिलाजुला रूप होता है। इन नैतिक धारणाओं के द्वारा कर्मियों को मानसिक सम्बल की प्राप्ति होती है तथा वे उच्च आदर्शों की ओर प्रेरित होते हैं।

 

2, व्यक्तिगत भिन्नताएँ (Individual Differences) – व्यक्तियों में परस्पर अनेक समानताएँ पायी जाती हैं; जैसे सभी को भूख लगती है, प्यास लगती है, रहने को मकान की इच्छा होती है, एक समूह या समाज से जुड़ने की कामना होती है आदि। ऐसा होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से नाना रूपों में भिन्नता रखता है। प्रत्येक व्यक्ति का चेहरा भिन्न होता हैं, सोच भिन्न होती है, अँगूठे की छाप भिन्न होती है, डी०एन०ए० व क्रोमोसोम्स की संरचना भिन्न होती है आदि। व्यक्तिगत भिन्नताओं के कारण ही संगठनात्मक प्रबन्ध प्रत्येक व्यक्ति या समूह को भिन्न-भिन्न तरीके से प्रशिक्षित करता है, अभिप्रेरित करता है और तदनुसार कार्यायोजन करता है।

 

3, संलग्नता (Attachment) – संस्थान के कर्मियों में कुछ कर्मी तो संगठन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं तथा उसके प्रति उनमें व्यापक संलग्नता भी होती है। इसके विपरीत, कुछ कर्मी उदासीन प्रकृति के होते हैं। संलग्नता के द्वारा अनुभवों का आदान-प्रदान किया जाता है तथा दूसरे के अनुभवों से अपने ज्ञान क्षेत्र को विस्तार दिया जाता है।

 

4, चेतनता (Perception) – लक्ष्यों के प्रति प्रत्येक व्यक्ति की भावना ही चेतनता के धरातल पर भिन्नता उत्पन्न कर देती है। चेतनता की यह भिन्नता ही व्यक्ति व मशीन में अन्तर का कारण है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी चेतनता के अनुरूप ही प्रतिक्रिया करता है।

 

5, अभिप्रेरण (Motivation) – हमारे समस्त व्यवहारों का संचालन सामाजिक आवश्यकताओं के अनुगामी होता है तथा शारीरिक व पारिवारिक पृष्ठभूमि से किसी-न-किसी रूप में प्रभावित रहता है। इसी कारण मनुष्य किसी-न-किसी कार्य में व्यस्त रहता है। मनुष्य को अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पारिवारिक व सामाजिक वातावरण अभिप्रेरित करते हैं। अभिप्रेरण वह शक्ति है, जो मनुष्य को कार्य करने के प्रति जागरूक बनाती है तथा प्रेरणा देती है।

 

6, सम्पूर्णता (Wholeness) – संगठन में व्यक्ति अपनी सम्पूर्णता से कार्य करता है। ऐसा नहीं है कि व्यक्ति को आंशिक रूप से संगठन की सेवा में ले लिया जाए अर्थात् केवल उसका कौशल व चातुर्य प्रयोग किया जाए और अन्य शारीरिक आवश्यकताओं व क्रियाओं से कोई सम्बन्ध न रखा जाए। इसी प्रकार व्यक्ति के घरेलू जीवन व कार्य जीवन को पूर्णतः पृथक् नहीं किया जा सकता अर्थात् मनुष्य को केवल घर पर ही भूख-प्यास लगे, शारीरिक क्रियाओं से निवृत्त होने की आवश्यकता केवल घर पर ही हो, यह सम्भव नहीं है। संगठनात्मक प्रबन्धन के द्वारा व्यक्ति को श्रेष्ठ कर्मचारी के रूप में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की जाती है।

 

7, मूल्य (Value) – उत्पादन के लिए पाँच अंगों का निरूपण किया गया है— भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन तथा साहस। इन सभी का संगठन में एक मूल्य होता है। चूँकि व्यक्ति ही उत्पादन के इन समस्त अंगों को एकत्रित करके कार्य लेता है, इसलिए व्यक्ति के मूल्य उत्पादन के अन्य साधनों के मूल्य के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है। वह केवल उत्पादन एक अंग मात्र ही नहीं है वरन् इस भूमण्डल का सर्वोच्च प्राणी भी है। अतः संगठन का भी इसी प्रकार मूल्यांकन करके व्यवहृत करना होता है जो संगठनात्मक व्यवहार को प्रभावित करता है।

संगठनात्मक व्यवहार की अवधारणा का महत्त्व (Importance of the Concept of Organizational Behaviour)

 

प्रत्येक संगठन हेतु व्यवहार की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

 

संगठनात्मक व्यवहार की अवधारणा इस प्रकार की है, जिसमें व्यवहार विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान आदि विषयों का योगदान है। संगठन में कार्यरत कर्मियों के मानस पटल पर इन विषयों से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार की शंकाएँ उत्पन्न होती रहती हैं तथा उत्तर प्राप्ति के अभाव में मन में विचलन उत्पन्न होने लगता है। इस प्रकार के कुछ प्रश्नों का स्वरूप निम्नवत् हो सकता है

 

(i) प्रबन्धन कुछ व्यक्तियों को ही अधिक कार्य व सम्मान क्यों देते हैं?

(ii) संगठन में कार्यरत व्यक्ति इस प्रकार का व्यवहार क्यों और कैसे करते हैं?

(iii) कुछ व्यक्ति कार्य में सहयोग एवं कुछ असहयोग क्यों करते हैं?

(iv) कुछ व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा समान योग्यता रखते हुए भी अधिक सफल क्यों होते हैं?

(v) व्यक्ति घर, समाज व संगठन में पृथक्-पृथक् व्यवहार क्यों करते हैं?

 

उपर्युक्त प्रश्नों का सही उत्तर संगठनात्मक व्यवहार के अध्ययन से मिल जाता है क्योंकि इसमें सामाजिक विज्ञान, व्यवहार विज्ञान व मनोविज्ञान आदि का अध्ययन किया जाता है, जिससे व्यक्ति के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व व्यावहारिक प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं।

 

संगठनात्मक व्यवहार में निरन्तर हो रहे विश्लेषण व शोध के कारण इसके क्षेत्र में भी वृद्धि हो रही है। निरन्तर शोध से स्पष्ट हो रहा है कि एक संगठन में व्यक्ति किस प्रकार व क्यों सोचते हैं, क्या अनुभव करते हैं तथा क्या प्रतिक्रिया देते हैं। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप व्यावहारिक व श्रेष्ठ विचारधाराएँ विकसित हो रही हैं, जो संगठनात्मक व्यवहार को नियन्त्रित करने में अर्थपूर्ण सिद्ध होती हैं तथा प्रबन्ध का भी मार्गदर्शन करती हैं।

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संगठन व्यवहार के मुख्य तत्त्व (Key Elements of Organization Behaviour)

 

एक संगठन व्यवहार के आधारभूत तत्त्व निम्नलिखित हैं–

 

1, विभागीकरण (Departmentation) – विभागीकरण से आशय एक उपक्रम के विभिन्न कार्यों को उनकी प्रकृति के अनुसार इस प्रकार समूहबद्ध करना है जिससे कि सभी विभागों में समन्वय स्थापित हो सके और संगठन संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव हो सके। ये विभाग क्रय, विक्रय, उत्पादन, वित्त आदि रूपों में हो सकते हैं। कभी-कभी विभागीकरण भौगोलिक या उत्पादन के आधार पर भी किया जाता है।

 

2, अधिकार अन्तरण व विकेन्द्रीकरण (Delegation and Decentralization) – कार्यों के विभागीकरण के साथ-साथ इस बात की आवश्यकता होती है कि विभागीय कार्यों का दायित्व उपयुक्त व्यक्तियों को सौंपा जाए तो उच्च प्रबन्ध के निर्देशों के अन्तर्गत दक्षतापूर्ण तरीके से अपने दायित्वों का निर्वहन करें। दायित्वों के साथ-साथ उन्हें अधिकारों का अन्तरण भी किया जाना चाहिए। अधिकार व दायित्वों का अन्तरण करते समय भी देखा जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रबन्धक का नियन्त्रण विस्तार सीमा से अधिक न हो जाए अन्यथा वह अपने अधीनस्थों पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण नहीं रख सकेगा।

 

3, औपचारिक सम्बन्धों की स्थापना (Establishment of Formal Relations) – संगठन का कार्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मानवीय एवं भौतिक संसाधनों को समन्वित करना है। इस कार्य में विभिन्न विभागों या प्रबन्धकों के मध्य अधिकार, कर्त्तव्य व उत्तरदायित्वों के अनुसार पारस्परिक औपचारिक सम्बन्धों की स्थापना करनी होती है कि कौन किसका अधीनस्थ है अथवा किसके प्रति जवाबदेय है। इन सम्बन्धों को मूर्तरूप देने के कई प्रारूप हो सकते हैं और इन प्रारूपों को ही संगठन संरचना के नाम से जाना जाता है जैसे रेखा संगठन, रेखा एवं स्टॉफ संगठन, कार्यात्मक संगठन आदि।

 

संगठनात्मक संरचना को निर्धारित करने वाले सांयोगिक तत्त्व (Contingency Elements determining Organizational Structure)

 

एक उपक्रम की संगठनात्मक संरचना करते समय प्रबन्ध को बहुत सारी बातों को ध्यान में रखना होता है जो निम्नलिखित हैं

 

1, लक्ष्य एवं रणनीतियाँ (Goals and Strategies)-

 

अल्फ्रेड केन्डलर, जॉश एवं

 

ग्लूक आदि विद्वानों द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि आधुनिक प्रबन्ध में

 

संगठन संरचना निर्धारित लक्ष्य व रणनीतियों के अनुरूप की जाती है। इस प्रकार लक्ष्य व

 

रणनीति संगठन संरचना के निर्धारित घटक माने जाते हैं।

 

2, बाह्य वातावरण (External Environment) – आधुनिक समय में उपक्रमों के लिए बाह्य वातावरण प्रभुत्वपूर्ण हो गया है। अतः प्रबन्धकों को वातावरण के अनुसार अपने आन्तरिक संगठन को समायोजित करना होता है ताकि उपक्रम बदलते हुए बाह्य वातावरण के प्रभाव को वहन कर सके और उपक्रम का संचालन समुचित तरीके से होता रहे। इसके लिए संगठन संरचना में पर्याप्त लोच तथा अनुकूलता रखी जाती है।

 

3, उत्पादन प्रणाली (Production System) – एक उपक्रम की उत्पादन प्रणाली भी संगठन संरचना को प्रभावित करती है। संगठन के तत्त्व जैसे प्रबन्ध विस्तार, विभागों की संख्या, प्रबन्धकीय व गैर-प्रबन्धकीय व्यक्तियों का अनुपात आदि उत्पादन प्रणाली व टेक्नोलॉजी द्वारा प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, आधुनिक टेक्नोलॉजी में गैर-प्रबन्धकीय व्यक्तियों की कम तथा प्रबन्धकीय व्यक्तियों की अधिक आवश्यकता होती है तथा प्रबन्ध का विस्तार भी छोटा होता है।

 

4, कर्मचारी (Employees) – एक उपक्रम के कर्मचारियों (प्रबन्धक व गैर प्रबन्धक) की आवश्यकताएँ, आकांक्षाएँ, योग्यताएँ तथा मनोभावनाएँ भी संगठन संरचना को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, ऐसे उपक्रम जिनमें अधिकांशतः शिक्षित व प्रशिक्षित कर्मचारी ही काम करते हैं, वे कार्य में अधिक स्वतन्त्रता तथा चुनौती चाहते हैं। ऐसी दशा में बड़े पिरामिड आकार की संरचना उपयुक्त नहीं मानी जाती।

 

“प्रबन्ध सिर्फ व्यवसाय के लिए नहीं बल्कि समस्त प्रकार की संगठित क्रियाओं के लिए सामान्य जरूरत है। “विवेचना कीजिए।

Management is not exclusive to business but common to all kinds of organised activities, Discuss,

 

उत्तरप्रबन्धन संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संसाधनों के विकास, रखरखाव और आवंटन का मार्गदर्शन करने की प्रक्रिया है। प्रबन्धक इस प्रबन्धन प्रक्रिया को विकसित करने और आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार संगठन के लोग हैं। प्रबन्धन स्वभाव से गतिशील है और संगठन के आन्तरिक और बाहरी वातावरण में जरूरतों और बाधाओं को पूरा करने के लिए विकसित होता है। वैश्विक बाजार में जहाँ परिवर्तन की दर तेजी से बढ़ रही है, लचीलापन और अनुकूलनशीलता प्रबन्धकीय प्रक्रिया के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह प्रक्रिया संगठन के चार प्रमुख कार्यात्मक क्षेत्रों में आधारित है। यह क्षेत्र है- नियोजन, आयोजन, अग्रणी और नियन्त्रण। हालांकि इन गतिविधियों पर अध्याय में अलग-अलग चर्चा की जाती है, लेकिन वे वास्तव में विचारों और कार्यों के एक संग एकीकृत चक्र का निर्माण करते हैं।

 

हेरोल्ड कोंट्ज के अनुसार, “प्रबन्धन औपचारिक रूप से संगठित समूहों में लोगों के माध्यम से और उनके साथ काम करने की कला है। यह एक वातावरण बनाने कि एक कला है जिसमें लोग प्रदर्शन कर सकते हैं और व्यक्ति समूह लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग कर सकते हैं।”

 

एफ०डब्ल्यू० टेलर के अनुसार, “प्रबन्धन यह जानने कि कला है कि क्या करना है, कब करना है और यह देखना है कि यह सबसे अच्छे और सस्ते तरीके से किया जाता है।” जे०एन० शुल्ज के अनुसार, “प्रबन्धन वह बल है जो किसी पूर्व निर्धारित वस्तु की सिद्धि में किसी संगठन का नेतृत्व, मार्गदर्शन और निर्देशन करता है।”

 

एस०जॉर्ज के अनुसार, “प्रबन्धन में दूसरों के माध्यम से किए गए काम होते हैं। प्रबन्धक वह है जो दूसरों के प्रयासों को निर्देशित करके उद्देश्यों को पूरा करता है।”

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वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रबन्ध की महत्ता (Importance of Management in the Present Day Context)

 

1, समूह लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है (It Helps in Achieving Group Goals) – यह उत्पादनों के कारकों को व्यवस्थित करता है, संयोजन करता है और संसाधनों को व्यवस्थित करता है। लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रभावी तरीके से संसाधनों को एकीकृत करता है। यह पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए समूह के प्रयासों को निर्देशित करता है। संगठन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने से समय, धन और प्रयास का अपव्यय नहीं होगा। प्रबंधन पुरूषों, मशीनों, धन आदि के अव्यवस्थित संसाधनों को उपयोगी उद्यम में परिवर्तित करता है। ये संसाधन इस तरह से समन्वित, निर्देशित और नियन्त्रित होते हैं कि उद्यम लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए काम करते हैं।

 

2, संसाधनों का इष्टतम उपयोग (Optimum Utilization of Resources) – प्रबन्धन सभी भौतिक और मानव संसाधनों का उत्पादक रूप से उपयोग करता है। इससे प्रबन्धन में प्रभावकारिता आती है। प्रबन्धन विभिन्न उपयोगों से उद्योग में इसके सर्वोत्तम संभव वैकल्पिक उपयोग का चयन करके दुर्लभ संसाधनों का अधिकतम उपयोग प्रदान करता है। यह विशेषज्ञों, पेशेवर का उपयोग करता है और इन सेवाओं से उनके कौशल, ज्ञान और क्षमता का उचित उपयोग होता है और अपव्यय होने से बचता है। यदि कर्मचारी और मशीनें इसका अधिकतम उत्पादन कर रहे हैं तो किसी भी संसाधन के तहत कोई रोजगार नहीं है।

 

3, लागत कम करता है (Reduces Cost) – यह उचित योजना द्वारा न्यूनतम इनपुट के माध्यम से और न्यूनतम इनपुट का उपयोग करके और अधिकतम आउटपुट प्राप्त करके अधिकतम परिणाम प्राप्त करता है। प्रबन्धन भौतिक, मानव और वित्तीय संसाधनों का इस तरह से उपयोग करता है जिसके परिणामस्वरूप सबसे अच्छा संयोजन होता है। इससे लागत में कमी लाने में मदद मिलती है।

 

4, ध्वनि संगठन स्थापित करता है (Establishes Sound Organization) – प्रयासों (सुचारू और समन्वित कार्यों) का कोई अतिव्यापीकरण नहीं। ध्वनि संगठनात्मक संरचना स्थापित करना प्रबन्धन का एक उद्देश्य है जो संगठन के उद्देश्य के अनुरूप है और इसे पूरा करने के लिए, यह प्रभावी प्राधिकारी और जिम्मेदारी सम्बन्ध स्थापित करता है अर्थात् कौन किसके प्रति जवाबदेह है, कौन किसको निर्देश दे सकता है, जो वरिष्ठ है और जो अधीनस्थ है। प्रबंधन सही व्यक्तियों के साथ विभिन्न पदों को भरता है, जिनके पास सही कौशल प्रशिक्षण और योग्यता है। सभी नौकरियों को सभी को मंजूरी देनी चाहिए।

 

5, संतुलन स्थापित करता है (Establishes Equilibrium) – यह संगठन को बदलते परिवेश में जीवित रहने में सक्षम बनाता हैं। यह बदलते परिवेश के संपर्क में रहता है। परिवर्तन बाहरी वातावरण है, संगठन के प्रारंभिक समन्वय को बदलना होगा। इसलिए यह बाजार की बदलती माँग या समाज की बदलती जरूरतों के लिए संगठन को गोद लेती है। यह संगठन के विकास और अस्तित्व के लिए जिम्मेदार है।

 

6, समाज की समृद्धि के लिए आवश्यक (Essentials for Prosperity of Society) – कुशल प्रबन्धन बेहतर आर्थिक उत्पादन की ओर जाता है जो लोगों के कल्याण को बढ़ाने में मदद करता है। अच्छा प्रबन्धन कठिन संसाधन के अपव्यय से बचकर एक कठिन कार्य को आसान बना देता है। यह जीवन स्तर में सुधार करता है। यह लाभ को बढ़ाता है जो व्यापार के लिए फायदेमंद है और रोजगार के अवसरों को न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त होगा जो हाथों में आय उत्पन्न करते हैं संगठन नए उत्पादों के साथ आता है और समाज के लिए लाभकारी शोध करता है।

 

7, कई लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करता है (Helps to Maintain the Balance Between the Multiple Goals) – इसका अर्थ है कि प्रत्येक संगठन के प्रबन्धन में दो लक्ष्य होते है और दूसरा संगठनात्मक लक्ष्य होता है। ये दोनों लक्ष्य बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्तिगत लक्ष्य एक संगठन के कर्मचारियों और नियोक्ताओं को संतुष्ट करते हैं और संगठन के लक्ष्य दोनों (नियोक्ता) और कर्मचारी या स्वयं संगठन भी) को संतुष्ट करते हैं।

 

8, समन्वय बनाना (Maintain Coordination) – इसका अर्थ है कि प्रभावी प्रबन्धन हमेशा अपने व्यक्तियों और संगठनात्मक लक्ष्यों के समन्वय से किया जाता है। यह कर्मचारियों की प्रेरणा को तेज करता है ताकि वह अपने पूरे प्रयासों को किसी भी काम में लगा सके और संगठन या व्यक्तिगत लक्ष्यों को भी प्राप्त कर सके। यही कारण है कि, समन्वय भी मुख्य महत्त्व है। जिसके माध्यम से प्रबन्धन व्यवसाय लेने-देन की निरन्तरता को बढ़ाने में मदद करता है।

 

9, गलाकाट प्रतियोगिता का सामना करने एवं अस्तित्व के संरक्षण के लिए (To Face Cut-throat Competition and Survival of Existence) – इसका आशय यह है कि प्रत्येक संगठन का प्रबंधन आधुनिक कारोबारी माहौल में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करने में मदद करता है। अच्छा प्रबंधन हमेशा अपने संगठन को आगे बढ़ाने के लिए सोचता है ताकि वे बाद में एक बड़े बाजार पर कब्जा कर सकें। प्रबंधन नवाचार प्रौद्योगिकी, सामाजिक प्रक्रियाओं की पहचान करता है, और अन्य संगठनात्मक संरचनाएँ संगठनात्मक कार्य या पूर्व निर्धारित हिस्सा बन गई है। यह जटिल पर्यावरणीय परिवर्तनों को मानने या अपनाने में मदद करता है और उनकी क्षमता के स्तर को बढ़ाता है।

 

10, सामाजिक विकास (Social Development) – इसका अर्थ है कि सर्वोत्तम प्रबन्धन हमेशा सामाजिक कल्याण के लिए व्यवसाय को तैयार करता है क्योंकि यह समाज की आवश्यकताओं या शिक्षा जैसे शिक्षा, स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य देखभाल, आदि के लिए मानव ऊर्जा को निर्देशित करने में मदद करता है। किसी संगठन में किसी भी प्रबंधक की मुख्य जिम्मेदारी यह है कि वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सके और साथ ही सामाजिक कल्याण और विकास कर सके।

 

11, पर्यावरणीय विश्लेषण (Environmental Analysis) – इसका मतलब है कि प्रबन्धन ताकत, कमजोरी, अवसरों और खतरों का मूल्यांकन या विश्लेषण करने में मदद करता है जो उनके संगठन से संबंधित हैं। इसे SWOT विश्लेषण के रूप में जाना जा सकता है। इस विश्लेषण के माध्यम से, कम्पनी का प्रबन्धन जोखिमों को कम करता है और पर्यावरणीय लाभ को अधिकतम करता है।

 

SWOT विश्लेषण हमेशा प्रबंधन को प्रतियोगियों, विपणन रणनीतियों उत्पाद रणनीतियों, प्लेसमेंट रणनीतियों और अनय व्यावसायिक गतिविधियों को भी निर्धारित करने में मदद करता है।

 

12, सामाजिक नवाचार (Social Innovation) – यह बारहवाँ महत्त्व है और इसका मतलब है कि प्रत्येक संगठन का प्रबन्धन हमारे हितधारकों को सामाजिक और आर्थिक विकास का ढ़ांचा प्रदान करता है। यह एडुकेयर, हेल्थकेयर, स्वच्छ वातावरण, उद्यमशीलता और इतने पर विभिन्न सुविधाएँ प्रदान करता है। यह सामाजिक विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

व्यक्तित्व से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Personality)

 

‘व्यक्तित्व’ शब्द का उद्गम लैटिन भाषा के शब्द ‘per sonare‘ से हुआ है जिसका अर्थ ‘के माध्यम से बोलना’ (to speak through) है। यह शब्द प्राचीन ग्रीस एवं रोम में अभिनेताओं द्वारा पहने जाने वाले मुखौटों (Masks) के लिए प्रयोग में लाया जाता था। व्यक्तित्व का विश्लेषण करने में यह लैटिन अर्थ सहायक है।

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व्यक्तित्व का सामान्य तात्पर्य उस भूमिका (Role) से है जो एक व्यक्ति दूसरों के सामने प्रदर्शित करता है। किन्तु दूसरी ओर ‘व्यक्तित्व’ की शैक्षणिक परिभाषाएँ ‘व्यक्ति’ से अधिक सम्बन्धित हैं, उसकी भूमिका से नहीं। वस्तुतः व्यक्तित्व का सही अर्थ व्यक्ति के गुणों एवं भूमिका दोनों से जुड़ा हुआ है। व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार से व्यक्तित्व की रचना होती है। मैक्क्लीलैण्ड ने व्यक्तित्व को मानवीय व्यवहारों के अति उपयुक्त अवबोधन के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रकार के अवबोधन के अन्तर्गत व्यवहारों के सभी पक्षों को सम्मिलित किया जाता है। वैलेन्टाइन का मत है— “व्यक्तित्व जन्मजात एवं अर्जित प्रवृत्तियों का योग है।” फ्रेड लुधान्स के अनुसार, “व्यक्तित्व सम्पूर्ण व्यक्ति’ विचार को दर्शाता है। इसमें अवबोधन, सीखना, अभिप्रेरणा एवं अन्य मनोवैज्ञानिक तत्त्व शामिल होते हैं।” उनके अनुसार व्यक्तियों के बाह्य स्वरूप एवं व्यवहार, स्व की आन्तरिक चेतना, परिभाष्य गुणों के प्रारूप तथा व्यक्ति वातावरण अन्तर्व्यवहार के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

 

गोर्डन आलपोर्ट के अनुसार, “व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोभौतिक (Psychophysical) प्रणालियों का गतिशील संगठन है, जो उसके वातावरण से उसके विलक्षण समायोजन को निर्धारित करती है।”

 

रोबिन्स के अनुसार, “व्यक्तित्व व्यवहारों का योग है जिसमें एक व्यक्ति दूसरों के साथ क्रिया तथा प्रतिक्रिया करता है। ”

 

फ्लोयड रच के अनुसार मानव व्यक्तित्व में निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

(i) बाह्य प्रतीति (Appearance) एवं व्यवहार अथवा सामाजिक उद्दीपन मूल्य (Social Stimulus Value) –

(ii) स्थायी एकीकरण शक्ति के रूप में ‘स्व’ की आन्तरिक चेतना,

(iii) आन्तरिक व बाह्य मापनीय लक्षणों का विशिष्ट प्रारूप । फ्रेड लुथान्स के अनुसार, “व्यक्तित्व एक बहुत व्यापक एवं जटिल मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। इसका सम्बन्ध बाह्य दर्शन (Appearance) एवं व्यवहार, ‘स्व’, मापनीय लक्षणों तथा परिस्थितिगत अन्तर्व्यवहारों से है।”

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क्लुकोहन एवं मुरे का मत है – “कुछ अंश तक तो व्यक्ति का व्यक्तित्व सबके समान होता है, लेकिन कुछ अंश तक वह दूसरे लोगों से मिलता है तथा कुछ अंश तक किसी से भी नहीं मिलता है।”

 

व्यक्तित्व के प्रमुख निर्धारक तत्त्व Major Determinants of Personality)

 

व्यक्तित्व कैसे निर्धारित होता है? वास्तव में, मानवीय व्यवहार के अध्ययन में यह सबसे जटिल प्रश्न है क्योंकि संज्ञान एवं मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के साथ अनेक घटक व्यक्तित्व के निर्माण में योगदान देते हैं। व्यक्तित्व के प्रमुख निर्धारक तत्त्व निम्नलिखित हैं—

 

1, वंश परम्परा (Heredity) – मनोवैज्ञानिकों का मत है कि व्यवहार में वंश परम्परा का प्रभाव कम दिखायी पड़ता है। स्कॉट के मतानुसार, “इसकी भूमिका के सम्बन्ध में वंश परम्परा पर प्रभाव डालने वाले तत्वों के निर्धारकों का विकास होता है। अनुकरणशीलता इसमें पायी जाती है। वंशक्रम का समस्त ज्ञान वैयक्तिक भिन्नता को प्रकट करता है।” स्कॉट का मत है— “व्यक्ति को अपने वंशानुक्रम के द्वारा जीवित रहने और विकास करने हेतु अपेक्षित आधारभूत संरचना की प्राप्ति होती है।” जे० कैली के अनुसार, “वास्तव में, व्यक्तित्व के प्रारम्भिक कार्य को श्रृंखलाओं के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। वंशानुगतता जीन्स के द्वारा रूपान्तरित होती है, जीन्स हॉर्मोन्स सन्तुलन को निर्धारित करते हैं तथा शारीरिक रचना व्यक्तित्व को आकार प्रदान करती है।” एक नवीनतम अध्ययन से जिसमें 350 जोड़ों का चयन किया था, यह ज्ञात हुआ है कि व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुगत की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। विशेषतः संगठनात्मक व्यवहार के सन्दर्भ में यह ज्ञात हुआ है कि नेतृत्व, परम्परावाद तथा सत्ता की आज्ञाकारिता जैसे गुण मूलतः वंशानुक्रम द्वारा निर्धारित होते हैं।

 

2, शारीरिक रचना (Physique) – शरीर के स्नायुमण्डल और क्रियाओं का व्यक्तित्व के विकास पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। इसमें शरीर का आकार, स्नायुविक प्रणाली, प्राण प्रणाली आदि को सम्मिलित किया जाता है, जिसके माध्यम से व्यक्ति को आधारभूत बौद्धिक योग्यता की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति स्वयं को आगे के जीवन में प्रकट करता है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि शारीरिक कमी का मनुष्य के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। मनुष्य की बुद्धि, मानसिक योग्यता, मानसिक दुर्बलता, व्यक्तित्व के विकास में प्रत्यक्षतः सहायक होती है। दुर्बल व्यक्ति का व्यक्तित्व पूर्णतः विकसित नहीं होता है।

 

3, वातावरणीय प्रभाव (Environmental Effects) – वातावरणीय घटकों का व्यक्तित्व के विकास पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य एक गतिशील सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में रहता है तथा वातावरणीय विशेषताओं के अनुसार ही उसका विकास होता है। वातावरण दो रूपों में प्रभाव डालता है- सामाजिक वातावरण तथा सांस्कृतिक वातावरण। व्यक्तित्व के निर्धारण में परिवार तथा संस्कृति का अत्यधिक महत्त्व होता है। सामाजिक तथा मनोरंजन सम्बन्धी क्रियाएँ व्यक्तित्व के विकास में विशेष भूमिका निभाती हैं।

 

4, बाल्यावस्था के अनुभव (Childhood Experiences) – बाल्यकाल के अनुभव भी स्थायी रूप से मनुष्य के व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं। माता-पिता तथा घर के अन्य सदस्यों का व्यवहार भी बच्चे के विकसित मस्तिष्क पर प्रभाव डालता है।

 

लुथांस के अनुसार व्यक्तित्व के प्रमुख निर्धारक घटक निम्नलिखित हैं

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1, जीवविज्ञान सम्बन्धी योगदान (Biological Contributions) – व्यक्तित्व विकास में जीवविज्ञान सम्बन्धी घटकों की विशेष भूमिका होती है जिन्हें निम्न प्रकार से विभक्त किया जा सकता है –

 

(i) वंशानुगतता की भूमिका, (ii) जीन्स सम्बन्धी व्यवस्था एवं बुद्धि वैभव, (iii) प्रबन्धकीय चिन्तन, (iv) स्पिलिट ब्रेन चिन्तन, (v) बायोफीड बैंक, (vi) शारीरिक विशेषताएँ एवं परिपक्वता की दर

2, सांस्कृतिक योगदान (Cultural Contributions) – जीवविज्ञान सम्बन्धी घटकों की तुलना में व्यक्तित्व के निर्धारण में सांस्कृतिक घटकों का योगदान अपेक्षाकृत अधिक होता है। व्यक्तित्व विकास में सीखने की प्रक्रिया (Learning process ) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सीखने की प्रक्रिया तथा विषय-वस्तु में संस्कृति आधारभूत अवधारणा है क्योंकि एक व्यक्ति जो कुछ सीखता है, वही उसकी विषय वस्तु होती है। संस्कृति स्वतन्त्रता, आक्रामकता, प्रतिस्पर्द्धा तथा सहयोग जैसे घटकों की प्रमुख निर्धारक होती है। उदाहरण के लिए, पश्चिम की संस्कृति एक व्यक्ति को स्वतन्त्र एवं प्रतिस्पर्द्ध बनाने पर बल देती है, जबकि अन्य संस्कृतियाँ व्यक्ति को धार्मिक तथा सहनशील बनने पर जोर देती हैं। यही कारण है कि पश्चिम के व्यक्तियों का व्यक्तित्व अन्यों से सदैव पृथक् पाया जाता है। संगठनात्मक व्यवहार के विश्लेषण में न्यायसंगत सांस्कृतिक प्रभाव को मद्देनजर रखना आवश्यक होता है।

 

3, परिवार से योगदान (Contributions from the Family) – व्यक्तित्व का एक अन्य प्रमुख निर्धारक परिवार है। विशेषतः माता-पिता की भूमिका पहचान प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाती है, जो कि एक व्यक्ति के प्रारम्भिक विकास में महत्त्वपूर्ण होती है। बाद में यह समाजीकरण प्रक्रिया के रूप में परिवर्तित हो जाती है। 4, स्थिति (Situation) व्यक्तित्व की एक अन्य महत्त्वपूर्ण निर्धारक स्थिति है। सामान्यतः यह माना जाता है कि एक व्यक्ति का व्यक्तित्व स्थिर होता है तथा विभिन्न परिस्थितियों में परिवर्तित नहीं होता है। इसके विपरीत, वास्तविक जगत में विभिन्न स्थितियों में व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की माँग होती है। इसका कारण यह है कि व्यक्तित्व शैली अलगाव में नहीं देखा जा सकता है।

 

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व्यवहारीय विश्लेषण (Transactional Analysis)

 

विगत कुछ वर्षों में संगठन विकास के एक उपागम के रूप में व्यवहारीय विश्लेषण का प्रयोग तीव्र गति से बढ़ा है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं को अच्छी तरह समझ सकता है और यह जान सकता है कि वह दूसरे व्यक्ति को किस रूप में प्रभावित करता है। यह बतलाती है कि व्यक्ति के व्यवहार के पीछे कौन-कौन से सिद्धान्त तथा अहं स्थितियाँ कार्यरत हैं तथा ये किसी प्रकार प्रभावी तरीके से एक-दूसरे के साथ कार्य कर सकते हैं। लुथांस का मत है कि “यद्यपि व्यवहार विश्लेषण संगठन विकास की एक प्रमुख (Mainline) तकनीक नहीं है फिर भी प्रबन्धकों में यह विधि लोकप्रिय हो रही है।” अनेक बड़ी कम्पनियाँ अपने प्रबन्धकीय तथा अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए व्यवहारीय विश्लेषण कार्यक्रम आयोजित करती हैं। विशेषतः परामर्श, समूह गतिशीलता तथा अन्तर्वैयक्तिक सम्प्रेषण के क्षेत्र में इनका व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। जब संगठन विकास के उपागम के क्षेत्र में इसका व्यापक प्रयोग किया जाता है तो यह व्यक्तियों एवं अन्य पूरक व्यवहारों में वयस्क स्थिति विकसित करने का प्रयास करती है। दल निर्माण के विभिन्न चरणों में भी अन्तर्वैयक्तिक विकास हेतु इस तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

 

संगठन विकास की एक तकनीक के रूप में व्यवहारीय विश्लेषण के सफल प्रयोग हेतु बोवन तथा नाथ ने निम्नलिखित मार्गदर्शक तत्त्व सुझाए हैं

 

(i) यदि संगठन विकास में व्यवहारीय विश्लेषण का प्रयोग किया जाता है तो यह अत्यधिक प्रभावी हो सकता है, यदि निदान चरण के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जाता है।

(ii) व्यवहारीय विश्लेषण ढाँचे के सतत प्रयोग को प्रोत्साहित करने हेतु नियोजन, कार्यवाही तथा स्थिरीकरण प्रक्रिया की प्ररचना की जानी चाहिए।

(iii) संगठन विकास में व्यवहारीय विश्लेषण का प्रयोग संगठन विकास की व्यापक प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

(iv) संगठन विकास के अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्धों तथा प्रक्रिया परामर्शन में व्यवहारीय विश्लेषण का सर्वोत्तम प्रयोग होता

(v) परिवर्तन हेतु व्यवहारीय विश्लेषण के प्रयोग का आशय यह नहीं है कि परामर्शदाता में अन्तर्वैयक्तिक सामर्थ्य की आवश्यकता नहीं है।

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थॉमस हैरिस के अनुसार, “व्यवहारीय विश्लेषण एक बौद्धिक उपकरण है जिससे  व्यवहार एवं भावनाओं के आधार को समझा जा सकता है।”

 

पॉल हर्से एवं ब्लैंचर्ड के अनुसार, “व्यवहारीय विश्लेषण मानवीय व्यवहार को विश्लेषण करने और समझने की विधि व्यवहारीय विश्लेषण फ्रायडियन मनोविज्ञान की धारणा से प्रेरित है।

 

सिगमण्ड फ्रायड पहले ऐसे मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने बताया कि मानवीय व्यक्तित्व के भीतर तीन स्रोत हैं जो उसके व्यवहार को प्रेरित और नियन्त्रित करते हैं। फ्रायड ने इन्हें इदम् (Id), अहम् (Ego) और परम अहम् (Super Ego) का नाम दिया।

 

एरिक बर्न ने व्यवहारीय विश्लेषण को मानवीय व्यवहार के विश्लेषण की एक विधि कहा है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Games People Play’ में व्यवहारीय विश्लेषण का विस्तृत विवेचन किया है और बताया है कि इसका प्रमुख उद्देश्य यह समझ उपलब्ध करना है कि व्यक्ति किस प्रकार एक-दूसरे से सम्बन्धित है ताकि वे सुव्यवस्थित सम्प्रेषण तथा मानव सम्बन्ध का विकास कर सके।

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व्यवहारीय विश्लेषण के आयाम (Dimensions of Transactional Analysis)

 

व्यवहारीय विश्लेषण को मुख्य रूप से चार भागों में बाँटते हैं –

1, संरचनात्मक विश्लेषण (Structural Analysis) व्यक्तित्व विश्लेषण (Analysis of individual personality),

2, व्यवहारीय विश्लेषण (Transactional Analysis) अन्तर्व्यक्तिगत व्यवहार का विश्लेषण (Analysis of what people do and say to one another),

3, खेलों का विश्लेषण (Games Analysis) – अव्यक्त व्यवहार का विश्लेषण जिसका अन्त किसी रूप में चुकाने में होता है। (Analysis of ulterior transactions leading to a pay off),

4, रचना विश्लेषण (Script Analysis) मानवीय व्यवहार में खेले जाने वाले जीवन नाटक का विश्लेषण (Analysis of specific life dramas that persona compulsively play out),

 

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मनोवृत्ति का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Attitude)

 

मनोवृत्ति किसी व्यक्ति की मानसिक तस्वीर या प्रतिच्छाया है जिसके आधार पर वह व्यक्ति, समूह, वस्तु, परिस्थिति या फिर किसी घटना के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल दृष्टिकोण अथवा विचार को प्रकट करता है। मनोवृत्ति का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार पर दिशासूचक रूप में पड़ता है। मनोवृत्ति व्यक्ति की शक्ति को एक खास दिशा में लगा देती है, जिसके कारण वह अन्य दिशाओं को छोड़कर एक निश्चित दिशा में व्यवहार करने लगता है। प्रमुख विद्वानों ने मनोवृत्ति को निम्न प्रकार परिभाषित किया है—

 

ऑलपोर्ट के अनुसार, “मनोवृत्तियाँ तत्परता की वह मानसिक व तन्त्रिकीय दशा है जो अनुभव द्वारा संगठित होती है और अपने से सम्बन्धित सभी वस्तुओं व स्थितियों के प्रति व्यक्ति के प्रत्युत्तर पर गत्यात्मक प्रभाव डालती है।”

 

काट्जस्कॉटलैण्ड के अनुसार, “मनोवृत्तियाँ वह प्रवृत्ति हैं जो चीजों या उनके प्रतीकों को एक निश्चित तरीके से मूल्यांकन करती हैं।” रॉबिन्स के अनुसार, “मनोवृत्तियाँ वस्तुओं, लोगों या घटनाओं के प्रति मूल्यांकन वक्तव्य या फैसले होते हैं।” जैसा कि मनोवृत्ति की परिभाषाओं से स्पष्ट है- मनोवृत्ति सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। अगर व्यक्ति की मनोवृत्ति सकारात्मक है तो उसकी प्रतिक्रिया भी अनुकूल होगी परन्तु अगर मनोवृत्ति नकारात्मक है तो प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं बल्कि प्रतिकूल होगो अर्थात् व्यक्ति की मनोवृत्ति तथा उसके व्यवहार के बीच सदा सम्बद्धता होती हैं। मनोवृत्ति की विशेषताएँ (Characteristics of Attitude)

 

वी०एस०पी० राव और एस०पी० नारायणा ने अपनी पुस्तक संगठनात्मक सिद्धान्त और व्यवहार में मनोवृत्तियों की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है

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1, संयोजकता (Valence) – यह घटनाओं के प्रति अनुकूलता या प्रतिकूलता के मात्रात्मक महत्त्व को दर्शाती है। जब हम मनोवृत्तियों का मापन करते हैं तो हमारा सम्बन्ध मूलतः संयोजकता से होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक अनुकूल या प्रतिकूल रुख रखता है तब उसकी मनोवृत्ति उच्च संयोजकता से युक्त होती है अर्थात् यह मनोवृत्ति की तीव्रता की सूचक है।

 

2, बहुतत्त्वी (Multiplexity) – मनोवृत्ति का निर्माण बहुत से तत्वों से मिलकर होता है।

 

3, आवश्यकताओं के साथ सम्बन्ध (Relation with Needs) – अपेक्षित आवश्यकताओं के सन्दर्भ में मनोवृत्तियों में भिन्नता हो सकती है। उदाहरणार्थ- कोई व्यक्ति फिल्मों के सम्बन्ध में यह मनोवृत्ति रख सकता है कि वे सिर्फ मनोरंजनार्थ होती हैं। जबकि वह व्यक्ति अपने कृत्य के बारे में यह मनोवृत्ति रख सकता है कि उससे कृत्य, सुरक्षा, उपलब्धि, मान्यता व सन्तुलित की आवश्यकताएँ पूरी होनी चाहिए।

 

4, केन्द्रीयता (Centrality) – यह इस बात को दर्शाती है कि व्यक्ति को मनोवृत्ति के सन्दर्भ में वस्तुओं का क्या महत्त्व है। जो मनोवृत्ति उच्च केन्द्रीयतापूर्ण होती हैं, उसमें परिवर्तन लाना सुगम नहीं होता।

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मनोवृत्ति के कार्य ( (Functions of Attitude)

 

मनोवृत्ति निम्नलिखित चार महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पादित करती है—

 

1, समायोजन का कार्य (Adjustment Function) – मनोवृत्ति व्यक्ति को वांछित 1, लक्ष्यों की तरफ अग्रसर करने में मदद करती है तथा अवांछित लक्ष्यों की ओर जाने से रोकती है। यह कार्य इस सिद्धान्त पर आधारित है कि लोग पुरस्कार को अधिकतम करने व दण्ड को न्यूनतम बनाने का प्रयास करते हैं।

 

2, अहम् प्रतिरक्षात्मक कार्य (Ego-defensive Function) – इसका सम्बन्ध व्यक्ति की आत्म-छवि की रक्षा करने से होता है। आन्तरिक व बाह्य खतरों या निराशापूर्ण घटनाओं के साथ समायोजित होने के लिए अहम् प्रतिरक्षात्मक मनोवृत्तियाँ जन्म लेती हैं।

 

3, मूल्य अभिमुखी कार्य (Value-oriented Function) – मनोवृत्तियों का यह कार्य न केवल आत्म-छवि को सुस्पष्टता प्रदान करता है बल्कि आत्म-छवि को आन्तरिक इच्छाओं के करीब बनाता है।

 

4, ज्ञानमूलक कार्य (Knowledge Function) – मनोवृत्तियों का यह कार्य संसार को समझने की आवश्यकता पर आधारित है। परिस्थितियों के अनुकूल मनोवृत्तियों को धारित रखा जाता है और प्रतिकूल मनोवृत्तियों को त्यागा जाता है।

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संगठनात्मक विकास को परिभाषित कीजिए। इसकी विशेषताओं और उद्देश्यों को समझाइए।

Define the organizational development, Discuss its Characteristics and objectives,

 

संगठनात्मक विकास (OD) किसी संगठन की प्रभावकारिता और व्यावहारिकता को बढ़ाने के लिए एक नियोजित संगठन स्तरीय प्रयास होता है। संगठनात्मक विकास में व्यवहारात्मक विज्ञान की जानकारी का प्रयोग करते हुए संगठन की ‘प्रक्रियाओं’ में हस्तक्षेप करना तथा साथ ही संगठनात्मक प्रतिबिम्ब, प्रणाली सम्मिलन नियोजन व स्वतः विश्लेषण शामिल हो सकता है।

 

वॉरेन बेनिस (Warren Bennis) ने संगठनात्मक विकास का उल्लेख परिवर्तन के प्रति एक प्रतिक्रिया, एक जटिल शिक्षात्मक रणनीति के रूप में किया है, जिसका उद्देश्य संगठन के विश्वासों, दृष्टिकोणों, मूल्यों और संरचना को बदलना होता है, ताकि उन्हें नई प्रौद्योगिकियों, विपणन और चुनौतियों तथा स्वतः परिवर्तन की आश्चर्यचकित कर देने वाली दर से साथ बेहतर ढंग से अनुकूलित किया जा सके। अलग-अलग लोगों ने संगठनात्मक विकास को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया है।

 

कुन्ज एट के अनुसार (According to Koonzet) “OD उद्यम की प्रभावशीलता में सुधार करने के लिए एक व्यवस्थित एकीकृत और नियोजित दृष्टिकोण है। यह उन समस्याओं को हल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है जो सभी स्तरों पर परिचालन दक्षता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं।

 

बर्क के अनुसार (According to Burke)– “व्यवहार विज्ञान प्रौद्योगिकी अनुसन्धान और सिद्धांत के उपयोग के माध्यम से एक संगठन की संस्कृति में बदलाव की एक नियोजित प्रक्रिया” के रूप में परिभाषित है।

 

संगठनात्मक विकास एक महत्त्वपूर्ण और विज्ञान-आधारित प्रक्रिया है जो संगठनों को रणनीति, संरचनाओं और प्रक्रियाओं को विकसित करने, सुधारने और मजबूत करने के द्वारा अधिक से अधिक प्रभावशीलता को बदलने और प्राप्त करने में उनकी क्षमता बनाने में मदद करती है।

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संगठनात्मक विकास की विशेषताएँ (Characteristics of organisational Development)

 

संगठन विकास की विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

 

1, पूरे संगठन पर ध्यान केन्द्रित किया (Focused on the Entire Organization) – संगठन विकास कार्यक्रम एक ऐसा वातावरण बनाता है जो कर्मचारियों को सीखने और बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह पारम्परिक प्रशिक्षण नहीं है कि इसके बजाय एक कर्मचारी पूरे संगठन पर केन्द्रित है।

 

2, कार्यवाही पर शोध (Research on Action) – संगठन विकास प्रक्रिया की एक अनिवार्य विशेषता यह है कि यह विभिन्न कार्य स्थितियों के अनुसंधान पर ध्यान केन्द्रित रखता हैं जो कि मुद्दों को बनाने वाले क्षेत्रों को समझते हैं। विधि संगठनात्मक प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए व्यवहार्य उपाय खोजने की कोशिश करती है।

 

3, प्रणाली दृष्टिकोण (System Approach) – संगठन विकास अन्तर-समूह और पारस्परिक समन्वय और सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए एक प्रणाली दृष्टिकोण पर आधारित है।

 

4, समस्या को सुलझाना (Solving the Problem) – समस्या समाधान संगठन विकास प्रणाली की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। कार्यवाही अनुसंधान मुद्दों पर आवश्यक डाटा प्रदान करता है और उन्हें प्रभावी ढंग से हल करने में मदद करता है। इससे आत्मनिर्भरता बढ़ती है।

 

5, समूह प्रक्रिया (Group Process) – संगठन विकास प्रक्रिया में व्यक्तिगत गतिविधियों के बजाय समूह प्रक्रिया पर जोर दिया जाता है। यह समूहों के बीच व्यावहारिक चर्चा के माध्यम से कार्यात्मक संघर्ष और पारस्परिक संबंधों को बेहतर बनाने के तरीके विकसित करता है।

 

6, प्रतिपुष्टि (Feedback) – डबैक संगठन विकास प्रक्रिया की एक अनिवार्य विशेषता है क्योंकि यह महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है जो निर्णय लेने में मदद करता है।

 

7, अनुभव के माध्यम से जाने (Know through Experience) – संगठन प्रक्रिया की एक आवश्यक विशेषता अनुभव के माध्यम से सीखकर नए व्यवहार पैटर्न को अपनाना है। इस प्रणाली में, लोग व्यवहार की आवधारणा को विकसित करने और उन स्थितियों के आधार पर बदलाव करेंगे जो उनके सामने आ रही हैं और उनके संबंधित अनुभव। जैसा की संगठन विकास आकस्मिकताओं और समाधानों के मामले में लचीला है, इसमें सही समाधान चुनने की व्यवहार्यता है।

 

8, चेन्ज एजेण्ट (Change Agent) – बाहरी विशेषज्ञों की सेवाएँ, आमतौर पर OD प्रक्रिया को लागू करने के लिए प्राप्त की जाती हैं। OD में “इसे स्वयं करें” कार्यक्रमों को हतोत्साहित किया जाता है। जब प्राथमिक परिवर्तन एजेण्ट संगठन के बाहर एक सलाहकार होता है, तो वह संगठन के संगठनात्मक पदानुक्रम और राजनीति के संबंधों के बिना स्वतन्त्र रूप से काम कर सकता है। कार्मिक निदेशक संगठन का आन्तरिक एजेण्ट होता है जो प्रबंधन और बाहरी एजेण्ट के साथ कार्यक्रम का समन्वय करता है।

 

चूँकि बाहरी एजेण्ट भी प्रबंधन के साथ काम करता है, कार्मिक निवेशक, प्रबंधन और बाहरी सलाहकार का तीन तरह से संबंध है क्योंकि वे OD कार्यक्रम विकसित करते हैं। बहुत कम ही, संगठन द्वारा आंतरिक परिवर्तन एजेण्ट का उपयोग किया जाता है, जो आमतौर पर कार्मिक कर्मचारियों का विशेषज्ञ होता है।

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संगठनात्मक विकास के उद्देश्य (Objectives of Organizational Development)

 

संगठनात्मक विकास के उद्देश्य इस प्रकार हैं –

 

1, व्यवहार विज्ञान सिद्धान्तों को लागू करने के लिए (To apply Behavioural Science Theories) – संगठन के विकास का पहला उद्देश्य संगठन में कुछ व्यवहार विज्ञान सिद्धान्तों को लागू करना है। इन सिद्धान्तों को लागू करने से संगठन विकास प्रथाओं के विकास की उम्मीद करता है।

2, संगठनात्मक प्रदर्शन में सुधार करने के लिए (To Improve Organizational Performance) – संगठन के विकास का अन्य उद्देश्य संगठन के समग्र प्रदर्शन में सुधार करना है। इस प्रकार संगठन को मानव इतिहास के महत्त्वपूर्ण संस्थानों में से एक के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

 

3, व्यक्तिगत प्रयासों का उचित उपयोग सुनिश्चित करने के लिए (To Ensure Proper Use of Individual Efforts) – व्यक्तिगत प्रदर्शन में सुधार किया जाना चाहिए। यह व्यक्तिगत प्रयासों का ठीक से उपयोग करके सम्भव है। संगठन विकास मानव प्रयासों और प्रतिबद्धता का उचित उपयोग सुनिश्चित करता है।

 

4, जागरूकता पैदा करने के लिए (To Create Awareness) – संगठन विकास उद्यम में काम करने वाले लोगों के बीच जागरूकता पैदा करता है। वे अन्य संगठनों की तुलना में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस करता है।

 

5, लोगों को समस्याओं को हल करने के लिए प्रोत्साहित करना (To Encourage People to Solve Problems) –  हर संगठन में कई समस्याएँ और चुनौतियाँ होती है। संगठन विकास लोगों को इन समस्याओं को हल करने और वर्तमान और भविष्य में चुनौतियों को सामना करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

 

6, पारस्परिक संबंधों को स्थापित करने और बनाए रखने के लिए (To Establish and Maintain Interpersonal Relations) – संगठन विकास गतिविधियों को स्थापित करने की दृष्टि से लागू किया जा सकता है और साथ ही संगठन के लोगों के बीच पारस्परिक संबंधों को बनाए रखता है। यह निरंतर विकास सुनिश्चित कर सकता है।

 

7, काम का माहौल बनाने और बनाए रखने के लिए (To Create and Maintain a Work Environment) – संगठन में काम करने का माहौल अनुकूल होना चाहिए। संगठन विकास व्यवसायी एक अनुकूल कार्य वातावरण बनाते है और भविष्य में सुचारू कामकाज के लिए इसे बनाए रखते हैं।

 

8, ज्ञान और कौशल बढ़ाने के लिए (To Increase Knowledge and Skill) – नवीनतम तरीकों का कौशल किसी भी संगठन के विकास को कारगार बना सकता है। संगठन का विकास प्रशिक्षण के माध्यम से ज्ञान और कौशल के स्तर को बढ़ाने का है।

 

9, परिवर्तन के प्रतिरोध को कम करने के लिए (To Minimize Resistance of Change) – ज्यादातर मामलों में, हर परिवर्तन का विरोध किया जाता है, यह लक्ष्य उपलब्धि को बोधित करता है। संगठन विकास एक सकारात्मक मनोदशा में परिवर्तन के प्रतिरोध को कम करने में मदद करता है ताकि प्रबंधन अधिक सतर्क हो जाए।

 

10, नौकरी से संतुष्टि पैदा करना (To Create a Job Satisfaction) – नौकरी से संतुष्टि लोगों की खुशी के साथ कड़ी मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित करती है। संगठन विकास उन कर्मचारियों के लिए नौकरी से संतुष्टि पैदा करता है जो संगठन विकास गतिविधियों में शामिल है।

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