Unit 1 The Insolvency and Bankruptcy code, 2016 Mcom Notes

Unit 1 The Insolvency and Bankruptcy code, 2016 Mcom Notes

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Unit 1 The Insolvency and Bankruptcy code, 2016 Mcom Notes

 

Unit 1 The Insolvency and Bankruptcy code, 2016 Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year The Insolvency and Bankruptcy code, 2016: Importance definitions, powers and functions of insolvency and bankruptcy. concept of information utility and insolvency professionals. resolution plan, liquidation udner IBC,
Porcess of Voluntary Winding up under the insolvency and bankruptcy code, 2016. [ Insolvency Bankruptcy code 2016 ]

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016)

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 भारत का दिवालियापन कानून है जो दिवालिया और शोधन अक्षमता के लिए एकल कानून बनाकर मौजूदा ढाँचे को मजबूत करने का प्रयास करता है। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2015 को दिसम्बर, 2015 में लोकसभा में पेश किया गया। यह 5 मई, 2016 को लोकसभा से और 11 मई, 2016 को राज्यसभा से पारित हुआ। संहिता को 28 मई, 2016 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई और उसी दिन अधिकारिक गजट में अधिसूचित किया गया। यह नया कानून दिवालियापन के पुराने कानून ‘प्रेसीडेंसी टाउन इन्सॉल्वेन्सी एक्ट, 1909’ और प्रोविन्शियल इन्सॉल्वेन्सी एक्ट, 1920 को रद्द करता है। यह नया कानून सम्पूर्ण भारत में लागू होता है।

 

आई०बी०सी० एक ऐसा अधिनियम है जो संकटग्रस्त निगमों, साझेदारी फर्मों और कर्ज में फँसे व्यक्तियों को फिर से संगठित करने और दिवालियापन संकल्प चुनने के लिए एक समयबद्ध तरीके से उनकी सम्पत्ति के मूल्य को अधिकतम करने के लिए मदद करता है। इस संहिता के प्रावधान निम्नलिखित इकाइयों के दिवाले समापन स्वैच्छिक समापन और शोधन अक्षमता के लिए लागू होंगे

 

(i) भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 या पूर्व के किसी कानून के अन्तर्गत निगमित कम्पनी;

(ii) किसी विशेष अधिनियम द्वारा संचालित कम्पनी;

(iii) सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम, 2008 में बनी सीमित दायित्व साझेदारी;

(iv) साझेदारी फर्म चाहे साझेदारी अधिनियम, 1992 में पंजीकृत हो या नहीं;

(v) अन्य कोई भी व्यक्ति।

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की संरचना (Structure of Insolvency and Bankruptcy Code, 2016)

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 में 255 धाराएँ और 11 अनुसूचियाँ हैं। यह संहिता मुख्य रूप से पाँच भागों में विभक्त है–

1, भाग I (Part 1) – संहिता के प्रथम भाग में तीन धाराएँ यह भाग प्रारम्भिक संवाद करता है। इस भाग की प्रथम धारा लघु शीर्षक, सीमा और इसके प्रारम्भ का वर्णन करती है। द्वितीय धारा इसकी प्रयोज्यता को बताती है और तृतीय धारा इस संहिता से सम्बन्धित मुख्य परिभाषाओं का वर्णन करती है।

2, भाग II (Part II) – इस द्वितीय भाग में धारा 4 से धारा 77 तक दी गई हैं जो निगमित व्यक्तियों के दिवाला समाधान और समापन से सम्बन्धित हैं।

3, भाग III (Part III) – इस तृतीय भाग में धारा 78 से धारा 187 तक हैं जो एक व्यक्ति और साझेदारी फर्म के दिवाला समाधान और शोधन अक्षमता के प्रावधानों से सम्बन्धित है।

4, भाग IV (Part IV) – इस चतुर्थ भाग में धारा 188 से धारा 223 तक हैं जो पेशेवर, संस्थागत और सूचनागत सेवाओं के दिवाले को नियन्त्रित करती हैं।

5, भाग V (Part V) – इस पाँचवें भाग में धारा 224 से 255 तक हैं जिनमें इस संहिता से सम्बन्धित अन्य प्रावधान दिए गए हैं।

 

आई०बी०सी०, 2016 के उद्देश्य (Objectives of IBC, 2016)

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

(1) निगमित व्यक्तियों, साझेदारी फर्म और व्यक्ति के दिवाला समाधान और पुनर्गठन से सम्बन्धित नियमों और कानूनों का एकीकरण और संशोधन करना।

(2) समय सीमित दिवाला समाधान के लिए कानून पालन का समय निर्धारित करना। इस संहिता में इस हेतु 180 दिन का समय निर्धारित है जोकि अधिकतम 90 दिन बढ़ाया जा सकता है।

(3) इच्छुक व्यक्ति की सम्पत्तियों का मूल्य अधिकतम करना।

(4) उद्यमिता को बढ़ावा देना।

(5) उधार की उपलब्धि को बढ़ाना।

(6) हितधारकों के हितों में सन्तुलन बनाना। सन्तुलन सरकारी देयताओं को प्राथमिकता देते हुए बनाया जाएगा।

(7) दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड की स्थापना करना। यह बोर्ड दिवाला और शोधन अक्षमता कानून की नियामक संस्था के रूप में कार्य करेगा।

(8) विभिन्न इकाइयों को कष्टरहित पुनर्जीवित करने की मशीनरी प्रदान करना।

(9) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दिवालिया में सहायता करना।

(10) भारत की अशोध्य ऋण की समस्या का त्रुटिकर्ता का डेटाबेस तैयार करके समाधान करना।

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की विशेषताएँ (Features of Insolvency and Bankruptcy Code, 2016)

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की विभिन्न विशेषताएँ निम्न प्रकार है –

 

1, व्यापक कानून (Comprehensive Law) – दिवाला संहिता, 2016 एक व्यापक कानून है जो कॉरपोरेट व्यक्ति, साझेदारी फर्म, सीमित साझेदारी फर्म और व्यक्तियों का दिवाला और शोधन अक्षमता की प्रक्रिया की परिकल्पना नियमित करता है।

2, कानूनों की बहुलता को दूर करना (Eliminates the Multiplicity of Laws) – यह संहिता ऋणों की वसूली और दिवाला एवं समापन प्रक्रिया से सम्बन्धित विभिन्न कानूनों को समाप्त करती है और ऋणों की वसूली एवं दिवाला से सम्बन्धित सभी राहतों के लिए एक मंच प्रदान करती है।

3, कम समय का संकल्प (Low Time Resolution) – यह सहिता कॉरपोरेट एवं व्यक्तियों के दिवाला समाधान में कम समय का संकल्प लेती है और इसके लिए एक निश्चित अवधि निर्धारित करती है। दिवाला प्रक्रिया 180 दिन में पूर्ण करने का समय निर्धारित है जो अधिकतम 90 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।

4, एकल खिड़की समाशोधन (One Window Clearance) – यह संहिता इस प्रकार बनायी गई है ताकि आवेदक को एकल खिड़की समाशोधन की सुविधा प्राप्त हो सके अर्थात् आवेदक एक ही प्राधिकारी के पास उचित राहत प्राप्त कर सकता है।

5, प्राधिकरण की एक श्रृंखला (One Chain of Authority) – संहिता प्राधिकरण की एक श्रृंखला प्रदान करती है। यह दीवानी न्यायालय को भी न्यायाधिकरण के समक्ष विचाराधीन प्रार्थना पत्र में दखल की अनुमति नहीं देता है। राष्ट्रीय कम्पनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal NCLT) कम्पनियों के दिवाला समाधान का न्यायिक निर्णय देगा और ऋण वसूली न्यायाधिकरण (Debt Recovery Tribunal DRT) व्यक्तियों के दिवाला समाधान का न्यायिक निर्णय देता है।

6, श्रमिकों एवं कर्मचारियों के हितों को प्राथमिकता (Priority to the Interests of Workman and Employees) – यह संहिता श्रमिकों और कर्मचारियों के हितों को सुरक्षा प्रदान करती है।

7, नया नियामक प्राधिकरण (New Regulatory Authority) – यह संहिता एक नये नियामक प्राधिकरण ‘भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड’ के संघटन को संस्तुति प्रदान करता है। यह बोर्ड दिवाला एवं दिवालियापन कार्यवाही की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास करता है।

Insolvency Bankruptcy code 2016

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 में दी गयी महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ दीजिए। Give the important definitions given in the Insolvency and Bankruptcy Code, 2016,

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 में दी गई महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ अग्रलिखित हैं –

(1) “दावा” से –

(क) संदाय का कोई अधिकार, चाहे वह किसी निर्णय, नियत, विवदित, अविवादित, विधिक साम्यपूर्ण प्रतिभूति या अप्रतिभूति के लिए घटा दिया गया, ऐसा अधिकार जिसके अन्तर्गत उधार या अग्रिम भी है; या (ख) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन संविदा के भंग के लिए उपचार, यदि ऐसा भंग संदाय के किसी अधिकार से उत्पन्न होता है निर्णय, नियतः परिपक्व, अपरिपक्व, विवादित, अविवादित, प्रतिभूति या प्रतिभूति की कटौती से दिया गया ऐसा अधिकार है या नहीं, अभिप्रेत है।

[धारा 3 (6)]

(2) “निगमित व्यक्ति” से कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 के खण्ड (20) में यथा परिभाषित कोई कम्पनी, सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम, 2008 की धारा 2 को उपधारा (1) के खण्ड (ढ) में यथा परिभाषित कोई सीमित दायित्व भागीदारी या कोई अन्य व्यक्ति, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन सीमित दायित्व के साथ निगमित है, किन्तु इसके अन्तर्गत कोई वित्तीय सेवाएँ प्रदाता नहीं है।

[धारा 3 (7))

(3) “निगमित ऋणी” से कोई निगमित व्यक्ति अभिप्रेत है जो व्यक्ति किसी ऋण से ऋणी है।

[धारा 3 (8)]

(4) “कोर सेवाएँ” से –

(क) किसी ऐसे रूप और रीति में वित्तीय जानकारी को इलेक्ट्रॉनिक प्ररूप में भेजने को स्वीकार करना, जो विहित की जाए;

(ख) वित्तीय जानकारी को सुरक्षित और शुद्ध अभिलिखित करना;

(ग) किसी व्यक्ति द्वारा भेजी गई वित्तीय जानकारी को अधिप्रमाणित और सत्यापित करना;

(घ) व्यक्तियों को उपयोगी जानकारी के साथ भंडारित जानकारी तक पहुँच उपलब्ध कराना जो विनिर्दिष्ट किया जाए; के लिए किसी उपयोगी जानकारी द्वारा दी जाने वाली सेवाएँ अभिप्रेत हैं।

[धारा 3 (9)]

(5) “लेनदार” से कोई व्यक्ति जो किसी ऋण से ऋणी अभिप्रेत है जो किसी व्यक्ति को शोध्य और जिसके अन्तर्गत कोई वित्तीय ऋण तथा प्रचालन ऋण भी है।

[धारा 3 (10)]

(6) “ऋण” से किसी दावे के सम्बन्ध में कोई दायित्व या बाध्यता अभिप्रेत हैं और किसी शंका को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि ऋण के अन्तर्गत कोई वित्तीय ऋण प्रचालन ऋण

[धारा 3 (11)]

(7) “वित्तीय जानकारी” किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में जानकारी के निम्नलिखित प्रवर्गों के एक या अधिक साधन अभिप्रेत है, अर्थात् (क) व्यक्ति के ऋण अभिलेख;

(ख) दायित्व के अभिलेख जब व्यक्ति ऋणशोधक्षम;

(ग) व्यक्ति की आस्तियों के अभिलेख जिन पर प्रतिभूति हित सृजित किए गए हैं;

(घ) किसी ऋण के विरुद्ध किसी व्यक्ति द्वारा व्यतिक्रम की घटना से अभिलेख साक्ष्य, यदि कोई हो और

(ङ) व्यक्ति के तुलनपत्र की विवरणी और नकदी प्रवाह के अभिलेख

(च) ऐसी अन्य सूचना, जो विनिर्दिष्ट की जाएँ।

[धारा 3 (13)]

(8) “वित्तीय संस्था” से—

(क) कोई अधिसूचित बैंक:

(ख) भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अधीन यथापरिभाषित वित्तीय संस्था; और

(ग) कोई अन्य संस्था जिसे केन्द्रीय सरकार किसी वित्तीय संस्था के अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे।

(9) “व्यक्ति” के अन्तर्गत –

(क) एक व्यक्ति

(ख) अविभक्त हिन्दु कुटुम्ब

(ग) कम्पनी

(घ) न्यास

(ङ) भागीदारी

(च) सीमित दायित्व भागीदारी

(छ) किसी कानून के अधीन स्थापित कोई अन्य अस्तित्व और जिसके अन्तर्गत भारत के बाहर निवासी कोई व्यक्ति भी है।

[धारा 3 (23)]

 

(10) “प्रतिभूति लेनदार” से कोई लेनदार अभिप्रेत है जिसमें प्रतिभूत हित सृजित किया

[धारा 3(30)]

(11) “प्रतिभूत हित” से अधिकार, हक या ब्याज या सम्पत्ति का कोई दावा, किसी संव्यवहार द्वारा किसी प्रतिभूति ऋणी के लिए उपबन्धित के पक्ष में या सृजित या उपलब्ध कराने के लिए, या किसी संव्यवहार द्वारा जो किसी बाध्यता के प्रतिभूति संदाय या अनुपालन द्वारा और जिसके अन्तर्गत बन्धक प्रभार आइमान, समनुदेशन और विलम्ब या कोई अन्य करार या किसी व्यक्ति की किसी बाध्यता या शंका को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि प्रतिभूति ब्याज का विचार, उसका समान प्रभाव रखने वाली प्रतिभूति की व्यवस्था, किसी अनुपालन गारण्टी के लिए नहीं होगा। परन्तु प्रतिभूति हित के अन्तर्गत अनुपालन प्रत्याभूत नहीं है।

[धारा 3 (31)]

(12) “संव्यवहार” के अन्तर्गत संविदा, निगमित लेनदार से या को आस्तियों, या निधियों, माल या सेवाओं के अन्तरण के लिए लिखित में कोई संविदा, उपहार, करार या व्यवस्था भी है।

[धारा 3 (33)]

(13) “अन्तरण” के अन्तर्गत विक्रय, क्रय, विनिमय, बन्धक, गिरवी, उपहार, ऋण या अधिकार, हक, कब्जा या धारणाधिकार के अन्तरण का कोई अन्य प्ररूप भी है।

[धारा 3 (34)]

(14) “सम्पत्तियों का अन्तरण” से किसी सम्पत्ति के अन्तरण अभिप्रेत है और सम्पत्ति में किसी हित का अन्तरण और सम्पत्ति पर किसी प्रभार का सृजन भी है।

[धारा 3(35)]

(15) ” न्यायनिर्णयन प्राधिकरण” से इस भाग के प्रयोजनों के लिए कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 408 के अधीन गठित राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण अभिप्रेत है।

[धारा 5 (1)]

(16) “लेखा परीक्षक” से चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अधिनियम, 1949 की धारा 6 के अधीन भारतीय चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट संस्थान द्वारा ऐसे रूप में व्यवसाय के लिए सत्यापित कोई चार्टर्ड अकाउन्टेण्ट अभिप्रेत हैं।

[धारा 5 (2)]

(17) “निगमित आवेदक” से निम्नलिखित अभिप्रेत है –

(क) कोई निगमित ऋणी:

(ख) निगमित व्यक्ति का कोई संदाय या भागीदार, जो निगमित व्यक्ति के गठन दस्तावेजों के अधीन निगमित दिवाला, संकल्प, प्रक्रिया के लिए कोई आवेदन कर सकेगा;

(ग) कोई व्यष्टि जो निगमित ऋणी के सम्पूर्ण प्रचालन और संसाधनों के प्रबन्ध का भारसाधक है।

(घ) कोई व्यक्ति जो निगमित ऋणी के वित्तीय मामलों का नियन्त्रण, अधीक्षण या अन्वेक्षा करता है।

[धारा 5 (5)]

(18) “वित्तीय लेनदार” से किसी व्यक्ति को, जिसे वित्तीय गुण देय हैं, और जिसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति जो किसी ऋण को विधिक रूप से समनुदेशित या अन्तरित कर सकता है।

[धारा 5 (7)]

Insolvency Bankruptcy code 2016

(19) “वित्तीय ऋण” से हित के साथ कोई ऋण, यदि कोई हों, जो धन की समय मूल्य के लिए प्रतिफल के विरुद्ध संवितरित कोई ऋण अभिप्रेत है और जिसके अन्तर्गत –

(क) ब्याज के संदाय के लिए धन उधार देना;

(ख) कोई स्वीकार्य प्रत्यय सुविधा के अधीन स्वीकार्य द्वारा ली गई कोई रकम या उसके अक्रियान्वयन के समतुल्य;

(ग) किसी नोट क्रय सुविधा के अनुसरण में उत्पन्न कोई रकम या बॉण्ड, नोट, डिबेंचर, उधार स्टाक या कोई समतुल्य लिखत द्वारा उत्पन्न कोई रकम;

(घ) किसी पड्ढे या अवक्रय संविदा के सम्बन्ध में किसी दायित्व की रकम जो भारतीय लेखा मानक या कोई अन्य लेखा मानकों के अधीन में किसी वित्तीय या पूँजी पट्टे के रूप में समझी गई है;

(ङ) गैर अवलम्ब आधार पर किसी प्राप्त करने योग्य विक्रय की गई से भिन्न प्राप्त करने योग्य बिक्री की गई छूट ली गई;

(च) किसी अन्य अन्तरण के अधीन उत्पन्न कोई रकम, जिसके अन्तर्गत कोई अग्रिम विक्रय या क्रय करार ली गई है जो किसी उधार लेने का वाणिज्यिक प्रभाव रखता है;

(छ) किसी दर या मूल्य में उतार-चढ़ाव के विरुद्ध या उससे लाभ के संरक्षण के सम्बन्ध में कोई व्युत्पन्न संव्यवहार करना और ऐसे संव्यवहार की मूल्य नीति की संगणना करने के लिए केवल लेखों में बाजार मूल्य लिया जाएगा।

(ज) किसी प्रत्याभूति, क्षतिपूर्ति, बन्धपत्र व्यवस्था या प्रत्यय का दस्तावेजी पत्र या किसी बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा जारी कोई अन्य लिखत के सम्बन्ध में कोई प्रति क्षतिपूर्ति बाध्यता ।

(झ) इस खण्ड के उपखण्ड (क) से (ख) तक निर्दिष्ट किसी मद के लिए किसी प्रत्याभूमि या क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में किसी दायित्व की रकम |

[धारा 5 (8)]

(20) “वित्तीय स्थिति” से किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में किसी कतिपय तारीख पर किसी व्यक्ति के रूप में वित्तीय जानकारी अभिप्रेत है।

[धारा 5 (9)]

(21) “आरम्भिक तारीख” से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको यथास्थिति कोई वित्तीय लेनदार, वित्तीय ऋण या प्रचालन लेनदार निगमित दिवाला संकल्प प्रक्रिया प्रारम्भ करने के लिए न्यायनिर्णयन प्राधिकारी को कोई आवेदन करता है।

[धारा 5 (11)]

(22) “दिवाला प्रारम्भ की तारीख” से न्यायनिर्णयन प्राधिकारी द्वारा निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया को प्रारम्भ करने के लिए, यथास्थिति धारा 7, धारा 9 या धारा 10 के अधीन किसी आवेदन ग्रहण की तारीख अभिप्रेत है।

[धारा 5 (12)]

(23) “दिवाला समाधान प्रक्रिया लागत” से निम्नलिखित अभिप्रेत हैं

(क) कोई अन्तरिम वित्त की रकम और ऐसे वित्त के उद्भूत में उपगत लागत;

(ख) किसी समाधान वृत्तिक के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को संदेय फीस; और

(ग) किसी चालू समुत्थान के रूप में निगमित श्रेणी के कारोबार को चलाने में समाधान वृत्तिक द्वारा प्रोद्भूत व्यय की कोई रकम;

(घ) दिवाला समाधान प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए सरकार द्वारा उपगत कोई लागते; और

(ङ) ऐसी अन्य लागतें जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएँ।

[धारा 5 (13)]

(24) “दिवाला समाधान प्रक्रिया विधि” से दिवाला आरम्भ होने की तारीख से एक सौ अस्सी दिन की अवधि और दिवाला आरम्भ होने की तारीख से एक सौ अस्सी दिन की समाप्ति तक की प्रारम्भ की अवधि अभिप्रेत है।

[धारा 5 (14)]

(25) “परिसमापन प्रारम्भ की तारीख” से वह तारीख अभिप्रेत है जिसके, यथास्थिति धारा 33 या धारा 59 के अनुसरण में परिसमापन प्रक्रिया प्रारम्भ की गई है।

[धारा 5 (17)]

(26) “प्रचालन लेनदार” से कोई व्यक्ति (जिसके अन्तर्गत भारत से बाहर निवासी अभिप्रेत हैं) जो कोई प्रचालन ऋण लेता है और जिसके अन्तर्गत कोई व्यक्ति जो ऐसा ऋण विधिक रूप से समनुदेशित करेगा, अभिप्रेत है।

[धारा 5 (20)]

(27) “सम्बन्धित पक्षकार” से किसी निगमित ऋणी के सम्बन्ध में निम्नलिखित अभिप्रेत है-

(क) निगमित ऋणी का निदेशक या भागीदार या निगमित ऋणी के निदेशक या भागीदार का कोई नातेदार;

(ख) निगमित ऋणी का प्रमुख प्रबन्धकीय कार्मिक या निगमित ऋणी के प्रमुख प्रबन्धकीय कार्मिक का नातेदार;

(ग) कोई सीमित दायित्व भागीदारी या भागीदारी फर्म, जिसमें कोई निदेशक, भागीदार या निगमित ऋणी का प्रबन्धक या उसका नातेदार भागीदार है;

(घ) कोई प्राइवेट कम्पनी, जिसमें कोई निदेशक, भागीदार या निगमित ऋणी का प्रबन्धक निदेशक है और अपने नातेदारों के साथ उसकी संदत्त शेयर पूँजी का दो प्रतिशत से अधिक धारण करता है;

(ङ) कोई पब्लिक कम्पनी, जिसमें कोई निदेशक, भागीदार या निगमित ऋणी का प्रबन्ध निदेशक है और अपने नातेदारों के साथ उसकी संदत्त शेयर पूँजी का दो प्रतिशत से अधिक धारण करता है।

(च) कोई निगमित निकाय, जिसका निदेशक बोर्ड, प्रबन्ध निदेशक या प्रबन्धक किसी निदेशक, भागीदार या निगमित ऋणी के प्रबन्धक के परामर्श, निदेशों या अनुदेशों के अनुसार प्रायिक कार्य करते हैं;

(छ) कोई सीमित दायित्व भागीदारी या भागीदारी फर्म, जिसके भागीदार या कर्मचारी, किसी निदेशक, भागीदार या निगमित ऋणी के प्रबन्धक के परामर्श, निदेशों या अनुदेशों के अनुसार प्रायिक कार्य करते हैं;

(ज) कोई व्यक्ति, जिसका परामर्श, निदेशों या अनुदेशों से निगमित ऋणी का निदेशक, भागीदार या प्रबन्धक प्रायिक कार्य करते हैं; (झ) कोई निगमित निकाय, जो निगमित ऋणी की धृति या अनुषंगी या कोई सहयुक्त कम्पनी है या किसी धृति कम्पनी की अनुषंगी है, जिसमें निगमि ऋणी की कोई अनुषंगी है;

(ञ) कोई व्यक्ति जो स्वामित्वता या किसी मतदान करार के मुद्दे निगमित ऋणी के मतदान अधिकार का बीस प्रतिशत से अधिक नियन्त्रण रखता है;

(ट) कोई व्यक्ति जिनको निगमित ऋण के स्वामित्वता या किसी मतदान करार के मध्य निगमित ऋण के बीस प्रतिशत से अधिक मतदान अधिकार नियन्त्रण में

(ठ) कोई व्यक्ति जो निगमित ऋणी के निदेशक बोर्ड या तत्स्थानी शासी निकाय की संरचना पर नियन्त्रण कर सकता है;

(ङ) कोई व्यक्ति जो निम्नलिखित के मध्य निगमित ऋणी के सम्बन्धित पक्षकार पर विचार कर सकता है

(i) निगमित ऋण की नीति निर्माण प्रक्रिया में भागीदारी; या (ii) निगमित ऋणी और ऐसे व्यक्ति के मध्य सम्मिलित दो से अधिक निदेशक रखना; या

(iii) निगमित ऋणी और व्यक्ति के मध्य प्रबन्ध कार्मिकों के अन्तः परिवर्तन; या

(iv) निगमित ऋणी को, या उससे आवश्यक तकनीकी जानकारी का उपबन्ध करना।

[धारा 5 (24)]

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड की शक्तियाँ और कार्य का वर्णन कीजिए। Explain the powers and functions of Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI),

Insolvency Bankruptcy code 2016

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की धारा 196 (1) भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड की शक्तियों और कार्य का उल्लेख करती है जो इस प्रकार है –

 

(1) बोर्ड, निम्नलिखित कृत्यों में से सभी या किन्हीं का पालन करेगा, अर्थात्

(क) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं को रजिस्टर करेगा और उनके रजिस्ट्रीकरण को नवीकृत, प्रत्याहत, निलम्बित या रद्द करेगा।

(ख) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं के रजिस्ट्रीकरण के लिए न्यूनतम अर्हता अपेक्षाएँ विनिर्दिष्ट करेगा।

(ग) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं के रजिस्ट्रीकरण के लिए फीस या अन्य प्रभारों का उदग्रहण करेगा।

(घ) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं केकार्यकरण के लिए विनियमों द्वारा मानक विनिर्दिष्ट करेगा।

(ङ) दिवाला वृत्तिकों के, दिवाला वृत्तिक अभिकरणों के सदस्यों के रूप में नामांकन के लिए परीक्षा हेतु विनियमों द्वारा न्यूनतम पाठ्यचर्या अधिकथित करना;

(च) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं के सम्बन्ध में निरीक्षण और अन्वेषण करेगा तथा ऐसे आदेश पारित करेगा, जो इस अधिनियम और तद्धीन जारी किए गए विनियमों के उपबन्धों के अनुपालन के लिए अपेक्षित हों।

(छ) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं के कार्यपालन की मॉनीटरी करेगा और ऐसे निर्देश पारित करेगा, जो इस संहिता और तद्धीन बनाए गए विनियमों के उपबन्धों के अनुपालन के लिए अपेक्षित

(ज) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं से किसी सूचना और अभिलेखों की माँग करेगा।

(झ) ऐसी सूचना, डाटा, अनुसन्धान अध्ययनों और ऐसी अन्य सूचनाओं का प्रकाशन करेगा, जिन्हें विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाएगा।

(ञ) सूचना उपयोगिताओं द्वारा डाटा का संग्रहण और भण्डारण करने की रीति और ऐसे डाटा तक पहुँच प्रदान करने की रीति को विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करेगा।

(ट) दिवाला और शोधन अक्षमता के मामलों से सम्बन्धित अभिलेखों का संग्रहण करेगा तथा उन्हें बनाए रखेगा और ऐसे मामलों से सम्बन्धित सूचना का प्रसार करेगा।

(उ) ऐसी समितियों का गठन करेगा, जो अपेक्षित हों और इनके अन्तर्गत विशिष्ट रूप से धारा 197 में अधिकथित समितियाँ भी हैं। (ड) अपने शासन में पारदर्शिता और सर्वोत्तम व्यवहारों का संवर्धन करेगा।

(ढ) वेबसाइटों और इलेक्ट्रॉनिक सूचना के सार्वभौमिक रूप से पहुँच रखने वाले ऐसे संग्रहों को बनाए रखेगा, जो आवश्यक हों।

(ण) किन्हीं अन्य कानूनी प्राधिकरणों के साथ परस्पर समझ के ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करेगा।

(त) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगा।

(थ) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं के विरुद्ध शिकायतों के समाधान के लिए तन्त्र विनिर्दिष्ट करेगा और इस संहिता तथा तद्धीन बनाए गए विनियमों के उपबन्धों के अनुसरण हेतु पूर्वोक्त के विरुद्ध फाइल की गई शिकायतों से सम्बन्धित आदेश पारित करेगा।

(द) बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाने वाले अन्तरालों पर दिवाला वृत्तिक अभिकरणों, दिवाला वृत्तिकों और सूचना उपयोगिताओं के कृत्यों और कार्यपालन के सम्बन्ध में आवधिक अध्ययन, अनुसन्धान और उनकी लेखापरीक्षा का संचालन करेगा।

(घ) किन्हीं विनियमों की अधिसूचना जारी करने से पूर्व उन्हें जारी करने के लिए तन्त्र विनिर्दिष्ट करेगा, जिसके अन्तर्गत लोक परामर्श की कार्यवाहियों का संचालन भी है।

(न) इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित किए गए अनुसार दिवाला और शोधन अक्षमता से सम्बन्धित मामलों पर विनियमों और मार्गदर्शक सिद्धान्तों को जारी करेगा।

(प) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करेगा, जो विहित किए जाएँ।

Insolvency Bankruptcy code 2016

(2) बोर्ड, दिवाला वृत्तिक अभिकरणों द्वारा अपनायी जाने वाली आदर्श उपविधियाँ बनाएगा, जिसके अन्तर्गत निम्नलिखित के लिए उपबन्ध हो सकेंगे –

(क) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों के सदस्य वृत्तिक सक्षमता के न्यूनतम मानक,

(ख) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों के सदस्यों की वृत्तिक और नैतिक आचार के लिए मानक,

(ग) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों के सदस्यों के रूप में व्यक्तियों के नामांकन के लिए अपेक्षाएँ, जो अविभेदकारी होंगी।

(घ) सदस्यता प्रदान करने की रीति

(ङ) बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट विनियमों के अनुसार दिवाला वृत्तिक अभिकरण के आन्तरिक अभिशासन और प्रबन्ध के लिए शासी बोर्ड की स्थापना

(च) सदस्यों द्वारा प्रस्तुत किए जाने के लिए अपेक्षित सूचना, जिसके अन्तर्गत ऐसी सूचना को प्रस्तुत करने का प्ररूप और समय भी है;

(छ) व्यक्तियों के ऐसे विनिर्दिष्ट वर्ग जिन्हें सदस्यों द्वारा रियायती दरों पर या बिना किसी पारिश्रमिक के सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी;

(ज) ऐसे आधार, जिन पर दिवाला वृत्तिक अभिकरणों के सदस्यों पर शास्तियाँ उद्गृहीत की जा सकेंगी और उनकी रीति;

(झ) दिवाला वृत्तिक अभिकरणों के सदस्यों के विरुद्ध शिकायतों के समाधान के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी तन्त्र,

(ञ) वे आधार, जिनके अधीन दिवाला वृत्तिकों को दिवाला वृत्तिक अभिकरण की सदस्यता से निष्कासित किया जा सकेगा;

(ट) सदस्यों के रूप में व्यक्तियों को प्रवेश देने के लिए फीस की मात्रा और फीस का संग्रहण करने की रीति;

(ठ) दिवाला वृत्तिक अभिकरण के सदस्यों के रूप में व्यक्तियों के नामांकन के लिए प्रक्रिया;

(ड) दिवाला वृत्तिकों के नामांकन के लिए परीक्षा का संचालन करने की रीति;

(ढ) ऐसे दिवाला वृत्तिकों के, जो सदस्य हैं, कार्यकरण की मॉनीटरी और पुनर्विलोकन करने की रीति;

(ण) सदस्यों द्वारा निष्पादित किए जाने वाले कर्त्तव्य और अन्य क्रियाकलाप;

(त) अपने सदस्यों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाहियाँ संचालित करने और शास्तियाँ अधिरोपित करने की रीति;

(थ) किसी दिवाला वृत्तिक के विरुद्ध अधिरोपित शास्ति के रूप में प्राप्त किसी रकम को उपयोग करने की रीति।

(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, निम्नलिखित विषयों के सम्बन्ध में कार्यवाही करते समय इस संहिता के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते समय, बोर्ड के पास वही शक्तियाँ होंगी, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती है, अर्थात् –

(i) ऐसे स्थान और ऐसे समय पर, जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, लेखाबाहियों और अन्य दस्तावेजों का प्रकटीकरण और उन्हें पेश किया जाना।

(ii) व्यक्तियों को समन करना तथा उनको हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना।

(iii) किसी भी स्थान पर किसी व्यक्ति की बाहियों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करना।

(iv) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन जारी करना।

 

धारा 197 के अनुसार बोर्ड, अपने कृत्यों के दक्ष निर्वहन के लिए ऐसी सलाहकार और कार्यपालक समितियों या अन्य ऐसी समितियों का गठन कर सकेगा, जिन्हें वह उचित समझे, जो अध्यक्ष और ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेंगी, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएँगे।

 

धारा 198 के अनुसार इस संहिता में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ बोर्ड इस संहिता में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर कोई कार्य नहीं करता है, वहाँ सुसंगत न्याय निर्णयन प्राधिकारी, लिखित में कारणों को लेखबद्ध करके विलम्ब को माफ कर सकेगा।

 

Insolvency Bankruptcy code 2016

संहिता के अन्तर्गत परिसमापन प्रकिया (Process of Liquidation under this Act)

अथवा

निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया (Insolvency Resolution of Corporate persons)

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 का अध्याय 2 निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया का वर्णन करता है। निगमित दिवाला समाधान वह प्रक्रिया है जहाँ कोई वित्तीय ऋणी, यह अनुमान लगाता है कि देनदार का व्यापार चालू रखना व्यावहारिक है और इसको बचाने और पुनः प्रवर्तन करने की सम्भावना उपस्थित है। यदि दिवाला समाधान प्रक्रिया असफल हो जाती है और ऋणी यह निर्णय लेता है कि देनदार का व्याप लाभदायक स्थिति में चालू नहीं रह सकता और इसका समापन कर देना चाहिए, तो देनदार की समापन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और देनदार की सम्पत्तियों से वसूली की जाएगी और निस्तारक द्वारा वितरित कर दी जाएगी।

धारा 7 (1) के अनुसार कोई वित्तीय लेनदार स्वयं या किसी अन्य वित्तीय लेनदार के साथ संयुक्त रूप से न्यायनिर्णयन प्राधिकारी के समक्ष किसी निगमित ऋणी के विरुद्ध, निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया प्रारम्भ करने के लिए आवेदन फाइल कर सकेगा।

स्पष्टीकरण- (1) इस उपधारा के प्रयोजन के लिए कोई व्यतिक्रम, जिसके अन्तर्गत निगमित ऋणी के किसी वित्तीय लेनदार से लिए जाने वाले किसी वित्तीय ऋण के सम्बन्ध में कोई व्यतिक्रम भी है किन्तु आवेदक केवल किसी अन्य निगमित ऋणी का कोई वित्तीय लेनदार नहीं होगा।

(2) वित्तीय लेनदार उपधारा (1) के अधीन ऐसे प्ररूप और रीति में आवेदन कर सकेगा तथा जिसके साथ ऐसी फीस भी होगी, जो विहित की जाएँ।

(3) वित्तीय लेनदार आवेदन के साथ निम्नलिखित देगा –

(क) जानकारी उपयोगिता के साथ अभिलिखित व्यतिक्रम के सबूत या व्यतिक्रमों के ऐसे अन्य अभिलेख, जो विनिर्दिष्ट किए जाएँ –

(ख) किसी अन्तरिम समाधान वृत्तिक के रूप में कार्य करने को समाधान वृत्तिक का नाम: और

(ग) ऐसी अन्य जानकारी जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए।

(4) न्यायनिर्णयन प्राधिकारी उपधारा (2) के अधीन आवेदन की प्राप्ति के चौदह दिन के भीतर या जानकारी उपयोगिता के अभिलेखों उपधारा (3) के अधीन वित्तीय लेनदार के द्वारा अन्य साक्ष्य के अभिलेख देने के आधार पर किसी व्यतिक्रम के विद्यमानतः को सुनिश्चित करेगा।

((5) जहाँ न्यायनिर्णयन प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि –

(क) जहाँ कोई व्यतिक्रम हुआ है और उपधारा (2) के अधीन आवेदन पूर्ण है और प्रस्तावित समाधान वृत्तिक के विरुद्ध कोई अनुशासनिक प्रक्रिया लम्बित नहीं है, आदेश द्वारा ऐसे आवेदन को स्वीकार कर सकेगा।

(ख) जहाँ कोई व्यतिक्रम नहीं हुआ है और उपधारा (2) के अधीन आवेदन अपूर्ण है और प्रस्तावित समाधान वृत्तिक के विरुद्ध कोई अनुशासनिक प्रक्रिया लम्बित है, आदेश द्वारा ऐसे आवेदन को अस्वीकार कर सकेगा –

परन्तु न्यायनिर्णयन प्राधिकारी, उपधारा (5) के खण्ड (ख) के अधीन अपूर्ण होने के आधार पर आवेदन को निरस्त करने से पूर्व इस सम्बन्ध में आवेदक को न्यायनिर्णयन प्राधिकारी से ऐसी सूचना की प्राप्ति के तीन दिन के भीतर अपने आवेदन के दोषों को दूर करने के लिए आवेदक को अवसर देना आवश्यक होगा। धारा 4 कॉरपोरेट ऋणियों के दिवाला और समापान से सम्बन्धित विषयों पर लागू होगी, जहाँ व्यतिक्रम की रकम एक लाख रुपये से अधिक है या ऐसी अन्य रकम, जो एक करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे।

धारा (11) के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति इस अध्याय के अधीन निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया प्रारम्भ करने के लिए कोई आवेदन करने का हकदार नहीं होगा, अर्थात्

(क) कोई निगमित लेनदार किसी निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया को करा रहा है।

(ख) कोई निगमित लेनदार ने आवेदन करने की तारीख से निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया बारह मास में प्रक्रिया पूर्ण की है।

(ग) कोई निगमित ऋणी या कोई वित्तीय ऋणी जिसकी समाधान योजना इस अध्याय के अधीन किसी आवेदन की तारीख से बारह महीने पूर्व अनुमोदित की गई थी और जिसमें ऐसी योजना के किसी निबन्धन का उल्लंघन किया है। (घ) कोई निगमित ऋणी, जिसके सम्बन्ध में कोई परिसमापन आदेश किया गया है।

धारा 12 (1) के अनुसार उपधारा (2) के अधीन रहते हुए निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया ऐसे प्रक्रिया के प्रारम्भ करने को आवेदन के स्वीकार करने की तारीख से 180 दिन की अवधि के भीतर पूर्ण होगी।

(2) समाधान वृत्तिक 180 दिन की अवधि से परे न्यायनिर्णयन प्राधिकारी को निगमित दिवाला समाधान की अवधि का विस्तार करने को आवेदन फाइल करेगा यदि ऋणियों की समिति की किसी बैठक में ऐसा पारित संकल्प मतदान शेयर का 75 प्रतिशत किसी बोर्ड द्वारा समर्थित होगा, ऐसा करने का निर्देश दिया जाता है।

(3) उपधारा (2) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर यदि न्यायनिर्णयन प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि मामले की विषयवस्तु ऐसी है कि कोई निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया विधिपूर्वक एक सौ अस्सी दिन के भीतर पूरी नहीं की जा सकती हैं, वह आदेश द्वारा ऐसी प्रक्रिया की अवधि को एक सौ अस्सी दिन से परे ऐसी और अवधि के लिए विस्तारित कर सकेगा जो नब्बे दिन से अधिक नहीं होगी, विस्तारित कर सकेगा

परन्तु इस धारा के अधीन निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया का कोई विस्तार एक बार से अधिक अनुदत्त नहीं होगा। धारा 14 (1) के अनुसार उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए दिवाला प्रारम्भ की तारीख को, न्यायनिर्णयन प्राधिकारी सभी को आदेश द्वारा प्रतिषिद्ध के लिए निम्नलिखित अधिस्थगन की घोषणा करेगा, अर्थात्

(क) निगमित ऋणी के विरुद्ध वाद को संस्थित करने या वादों को जारी रखने, कार्रवाइयाँ जिसके अन्तर्गत विधि के किसी न्यायालय, अधिकरण, माध्यस्थम, पैनल या अन्य प्राधिकारी के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश का निष्पादन भी है, संस्थित करना या उसको जारी रखना।

(ख) निगमित ऋणी से उसकी किसी आस्ति का अन्तरण विल्लंगम करना, अन्य संक्रामण या व्ययन करना या किसी विधिक अधिकार या उसमें हित का कोई फायदा।

(ग) किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में निगमित ऋणी द्वारा सृजित किसी प्रतिभूत हित के पुरोबन्ध, वसूली या प्रवृत्त की कोई कार्रवाई जिसके अन्तर्गत वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 के अधीन कोई कार्रवाई भी है।

(घ) किसी स्वामी या पट्टाधारी द्वारा किसी सम्पत्ति की वसूली जहाँ ऐसी सम्पत्ति निगमित ऋणी द्वारा अधिभोग में है या उसके कब्जे में है— अन्तरिम समाधान वृत्तिक निगमित ऋणी के विरुद्ध प्राप्त सभी दावों का संग्रह करने के पश्चात् निगमित ऋणी की वित्तीय स्थिति का अवधारण करेगा और लेनदारों की समिति गठित करेगा। लेनदारों की समिति के सभी निर्णय मतदान के द्वारा लिए जाएँगे जोकि कम-से-कम 75 प्रतिशत होने चाहिए। मतदान अंश का निर्धारण लेनदार के ऋण की मात्रा और नियमित ऋण के कुल ऋण के अनुपात में किया जाएगा।

लेनदारों की समिति की पहली बैठक लेनदारों की समिति का गठन होने के तीन दिन के भीतर आयोजित की जाएगी। लेनदारों की समिति अपनी पहली बैठक में वित्तीय लेनदारों के मतदान भाग के 75 प्रतिशत से अधिक के बहुमत द्वारा या तो समाधान वृत्तिक के रूप में अन्तरिम समाधान वृत्तिक को नियुक्त करने का संकल्प करेगी या अन्तरिम समाधान वृत्तिक को प्रतिस्थापित करने के लिए किसी दिवाला समाधान वृत्तिक के नाम का प्रस्ताव करेगी। समाधान वृत्तिक किसी समाधान योजना को बनाने के लिए बोर्ड द्वारा यथा विनिर्दिष्ट ऐसी सुसंगत जानकारी ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति में जानकारी ज्ञापन को तैयार करेगा। समाधान वृत्तिक, समाधान आवेदक तक सभी सुसंगत जानकारी तक पहुँच को भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक प्ररूप में उपलब्ध कराने के अधीन रहते हुए ऐसे समाधान वृत्तिक को –

(क) गोपनीयता और आन्तरिक व्यापार से सम्बन्धित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबन्धों का अनुपालन करना। (ख) निगमित ऋणी के किसी बौद्धिक सम्पदा को सुरक्षित करना जो उसकी पहुँच में है।

(ग) इस धारा के खण्ड (क) और खण्ड (ख) का अनुपालन जब तक किसी तृतीय पक्षकार के साथ सम्बन्धित जानकारी नहीं देने को सहमत होना।

समाधान ज्ञापन लेनदारों की समिति के द्वारा कम-से-कम 75 प्रतिशत वित्तीय लेनदारों के मतों से अनुमोदित किया जाए। लेनदारों की समिति के द्वारा लिया गया निर्णय सभी निगमित देनदारों एवं लेनदारों पर बाध्य होगा। इसके पश्चात् समाधान वृत्तिक, लेनदारों की समिति द्वारा अनुमोदित समाधान योजना को न्यायनिर्णय प्राधिकारी को प्रस्तुत करेगा।

यदि समाधान योजना इसके प्रारम्भ होने की तारीख से 180 दिन के अन्दर जमा नहीं की जाती तो न्याय निर्णय प्राधिकारी निगमित देनदार के समापन का आदेश पारित कर सकता है।

Insolvency Bankruptcy code 2016

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अनुसार निगमित व्यक्तियों के स्वैच्छिक समापन से क्या समझते हैं? What do you understand by Voluntary winding up of corporate persons under Insolvency and Bankruptcy Code, 2016?

 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 का अध्याय V निगमित व्यक्तियों के स्वैच्छिक समापन की प्रक्रिया का वर्णन करता है जो कि इस संहिता की धारा 59 में दिया गया है।

(1) कोई कॉरपोरेट व्यक्ति, जिसका स्वयं का स्वेच्छया समापन का आशय है और उसने कोई व्यतिक्रम नहीं किया है, इस अध्याय के उपबन्धों के अधीन स्वेच्छया समापन कार्यवाहियाँ आरम्भ कर सकेगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी कॉरपोरेट व्यक्ति की स्वेच्छया समापन की प्रक्रिया में ऐसी शर्तों और प्रक्रियात्मक अपेक्षाओं को पूरा किया जाएगा, जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएँ।

(3) उपधारा (2) पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किसी कम्पनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किसी कारपोरेट व्यक्ति की स्वेच्छया समापन प्रक्रियाओं में निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाएगा, अर्थात्

(क) कम्पनी के अधिकांश निदेशकों द्वारा ऐसे शपथ पत्र द्वारा सत्यापित घोषणा, जिसमें यह कथन हो कि –

(i) उन्होंने कम्पनी के कार्यकलापों की पूरी जाँच की है और उनकी यह राय है कि या तो कम्पनी का कोई ऋण नहीं है या वह स्वेच्छया समापन में विक्रय की जाने वाली आस्तियाँ के आगमों से अपने सम्पूर्ण ऋणों को चुकाने में समर्थ है; और

(ii) कम्पनी का, किसी व्यक्ति को कपटवंचन करने के लिए, समापन नहीं किया जा रहा है –

(ख) उपखण्ड (क) के अधीन की गई घोषणा के साथ निम्नलिखित दस्तावेज संलग्न किए जाएँगे

(i) पूर्ववर्ती दो वर्ष का या कम्पनी के निगमन की अवधि से लेकर अब तक का इनमें से जो भी कम हो, कम्पनी के संपरीक्षित वित्तीय विवरण और उसके कारोबार प्रचालन के अभिलेख; और

(ii) कम्पनी की आस्तियों के मूल्यांकन की रिपोर्ट, यदि रिजस्ट्रीकृत मूल्यांकक द्वारा तैयार की गई हो।

(ग) उपखण्ड (क) के अधीन घोषणा करने के चार सप्ताह भीतर –

(i) कम्पनी के साधारण अधिवेशन में उसके सदस्यों का ऐसा विशेष संकल्प होगा, जिसमें कम्पनी के स्वेच्छया समापन किए जाने और समापक के रूप में कार्य करने के लिए एक दिवाला वृत्तिक को नियुक्ति करने की अपेक्षा होगी; या

(ii) कम्पनी के साधारण अधिवेशन में उसके सदस्यों का एक संकल्प होगा, जिसमें कम्पनी के, यथास्थिति उसके अनुच्छेदों द्वारा नियत उसके कार्यकाल की अवधि, यदि कोई हो, समाप्त होने के परिणामस्वरूप या कोई ऐसी घटना के घटित होने पर, जिसके सम्बन्ध में अनुच्छेद में यह उपबन्धित है कि कम्पनी को समाप्त कर दिया जाएगा, स्वेच्छया समापन करने की और समापक के रूप में कार्य करने के लिए एक दिवाला वृत्तिक की नियुक्ति करने की अपेक्षा होगी।

परन्तु यदि कम्पनी किसी व्यक्ति के प्रति किसी ऋण की देनदार है, तो कम्पनी के ऋण के दो-तिहाई मूल्य का प्रतिनिधित्व करने वाले लेनदार ऐसे संकल्प के सात दिन के भीतर खण्ड (ग) के अधीन पारित संकल्प का अनुमोदन करेंगे।

(4) कम्पनी, यथास्थिति ऐसे संकल्प के दो दिन के भीतर या लेनदारों के पश्चात्वर्ती अनुमोदन पर, कम्पनी के समापन के लिए उपधारा (3) के अधीन संकल्प के बारे में कम्पनी रजिस्ट्रार और बोर्ड को अधिसूचित करेगी।

(5) उपधारा (3) के अधीन लेनदारों के अनुमोदन के अधीन रहते हुए, किसी कम्पनी के सम्बन्ध में स्वेच्छया समापन कार्यवाहियों को उपधारा (3) के उपखण्ड (ग) के अधीन संकल्प पारित किए जाने की तारीख से आरम्भ हुआ समझा जाएगा।

(6) अध्याय 3 की धारा 35 से धारा 54 और अध्याय 7 के उपबन्ध, इस अध्याय के अधीन कॉरपोरेट व्यक्तियों को स्वेच्छया समापन कार्यवाहियों के लिए उस प्रकार लागू होंगे जैसा सन्दर्भ में अपेक्षित हो और पूर्वोक्त धाराओं में से किसी धारा के अधीन दिवाला प्रारम्भ होने की तारीख के प्रति निर्देश का इस अध्याय के अधीन स्वेच्छया समापन के प्रारम्भ होने की तारीख के रूप में अर्थान्वयन किया जाएगा।

(7) जहाँ कॉरपोरेट व्यक्ति के कार्यकलाप पूर्णतया समाप्त हो गए हैं और उसकी आस्तियों का पूर्णतया परिनिर्धारण हो गया है, वहाँ समापक न्यायनिर्णायक प्राधिकारी को ऐसे कॉरपोरेट व्यक्ति की समाप्ति के बारे में एक आवेदन करेगा।

(8) न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, उपधारा (7) के अधीन समापक द्वारा फाइल किए गए आवेदन पर यह आदेश पारित करेगा कि कॉरपोरेट ऋणी उस आदेश की तारीख से समाप्त हो जाएगा और तदनुसार कॉरपोरेट ऋणी को समाप्त कर दिया जाएगा।

(9) उपधारा (8) के अधीन आदेश की एक प्रति ऐसे आदेश की तारीख से चौदह दिन की अवधि के भीतर ऐसे प्राधिकारी को भेजी जाएगी, जिसके पास कॉरपोरेट व्यक्ति रजिस्ट्रीकृत है।

Insolvency Bankruptcy code 2016

आई०बी०सी० अधिनियम, 2016 के अन्तर्गत निगमित व्यक्तियों के लिए न्याय निर्णायक प्राधिकारी की विवेचना कीजिए। Describe the adjudicating authority for corporate persons under the IBC Act, 2016,

 

प्रत्येक कानून एक उपयुक्त विधायी प्राधिकरण के बिना अधूरा है जो उस कानून के प्रभावी और सुचारू कामकाज की निगरानी के लिए जिम्मेदार होगा। कानून को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है कि एक विशेष प्राधिकरण होगा जो उस कानून के क्रियान्वयन और कार्यान्वयन के दौरान आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को हल करने और उम्र कानून के तहत आने कार्यान्वयन वाले पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए जिम्मेदार होगा।

Insolvency Bankruptcy code 2016

(1) कॉरपोरेट देनदार और कॉरपोरेट गारण्टियों सहित कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए दिवाला प्रस्ताव और परिसमापन के सम्बन्ध में न्यायाधिकरण होगा जहाँ कॉरपोरेट व्यक्तियों के पंजीकृत कार्यालय के स्थान पर क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र है।

(2) उप-धारा (1) के पक्षपात के बिना और इस संहिता में निहित कुछ भी नहीं होने के बावजूद, जहाँ एक कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया या एक कॉरपोरेट देनदार के परिसमापन की कार्यवाही एक राष्ट्रीय कम्पनी कानून, एक आवेदन से पहले लम्बित है इनसॉल्वेन्सी रेजोल्यूशन या 1 (कॉरपोरेट गारण्टर या पर्सनल गारण्टर का परिसमापन या दिवालियापन, जैसा भी हो, ऐसे कॉरपोरेट देनदार का) इस तरह के नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर किया जाएगा।

(3) किसी इनसॉल्वेन्सी रेजोल्यूशन प्रोसेस या 2 (कॉरपोरेट गारण्टर या पर्सनल गारण्टर का लिक्विडेशन या दिवालियापन की कार्यवाही जैसा भी हो, कॉरपोरेट देनदार का) किसी भी कोर्ट या ट्रिब्यूनल में लम्बित हो सकता है, जो इनसॉल्वेन्सी रिजोल्यूशन से निपटने के लिए Adjudicating Authority को ट्रांसफर होगा ऐसे कॉरपोरेट देनदार की प्रक्रिया या परिसमापन।

(4) राष्ट्रीय कम्पनी कानून न्यायाधिकरण ऋण वसूली न्यायाधिकरण की सभी शक्तियों के साथ निहित होगा जैसा कि उप-धारा (2) के उद्देश्य से इस संहिता के भाग 111 के तहत विचार किया गया है।

(5) लागू होने के समय किसी भी अन्य कानून में निहित कुछ के बावजूद, नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास मनोरंजन या निपटान के लिए अधिकार क्षेत्र होगा –

(a) किसी भी आवेदन या कॉरपोरेट देनदार या कॉरपोरेट व्यक्ति के खिलाफ या उसके खिलाफ कार्यवाही;

(b) कॉरपोरेट देनदार व्यक्ति के खिलाफ या भारत में स्थित अपनी किसी भी सहायक कम्पनी के किसी भी दावे के खिलाफ या उसके खिलाफ किया गया दावा; तथा

(c) इस संहिता के तहत कॉरपोरेट देनदार या कॉरपोरेट व्यक्ति के दिवाला प्रस्ताव या परिसमापन कार्यवाही के सम्बन्ध में प्राथमिकताओं या कानून या तथ्यों के किसी भी सवाल का,

या उससे उत्पन्न होने का कोई प्रश्न।

(6) सीमा अधिनियम, 1963 या किसी अन्य कानून में लागू होने के बावजूद, किसी भी सूट या आवेदन के लिए निर्दिष्ट सीमा की गणना के लिए स्थगन आदेश दिया गया है, उसमें कुछ भी शामिल नहीं है। इस भाग के तहत, उस अवधि के दौरान जब इस तरह की स्थगन व्यवस्था को बाहर रखा जाएगा।

दि इनसॉल्वेन्सी एण्ड बैंकरप्सी कोड, 2016 में दो सहायक अधिकारी हैं। संहिता के तहत निलम्बित दो अधिनिर्णय अधिकारी इस प्रकार हैं –

1, नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) – कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए।

2, डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) – व्यक्तियों और साझेदारी फर्मों के लिए।

दि इनसॉल्वेन्सी एण्ड बैंकरप्सी ने NCLT को कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 408 के तहत गठित के रूप में मान्यता दी, जो कि कॉरपोरेट व्यक्तियों के दिवालिया होने और उनके परिसमापन के लिए सहायक प्राधिकारी है। NCLT के गठन का प्रस्ताव एराडी समिति ने बनाया था। इसके अलावा NCLT को पूर्ववर्ती कम्पनी लॉ बोर्ड (CLB) औद्योगिक और वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (BIFR) और उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के स्थान पर कम्पनी न्यायालय के रूप में अपने अधिकार क्षेत्र में लाने के लिए डिजाइन किया गया था। एक बार NCLT का गठन हो गया और उसने कार्य करना शुरू कर दिया, दिवाला कानून सुधार समिति ने अपनी अन्तिम रिपोर्ट में NCLT को कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए IBC के तहत उपयुक्त सहायक प्राधिकरण माना।

NCLT को उचित माना गया क्योंकि कम्पनी अधिनियम 2013 के तहत, NCLT के पास कम्पनियों के समापन और परिसमापन प्रक्रिया पर अधिकार क्षेत्र था। इसी प्रकार सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008 ने भी सीमित देयता भागीदारी के विघटन और समापन के लिए NCLT को अधिकार क्षेत्र प्रदान किया।

 

IBC के तहत NCLT की भूमिका –

NCLT, IBC के तहत कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए सहायक प्राधिकारी होने के नाते विभिन्न शक्तियों और भूमिकाओं के साथ निहित है संहिता की धारा 60 की उपधारा (5) के अनुसार, NCLT के पास निम्नलिखित के मनोरंजन और निपटान की शक्ति होगी –

1, कॉरपोरेट देनदार या कॉरपोरेट व्यक्ति द्वारा या उसके खिलाफ कोई भी आवेदन या कार्यवाही;

2, कॉरपोरेट देनदार या कॉरपोरेट व्यक्ति के खिलाफ या भारत में स्थित किसी भी सहायक कम्पनी द्वारा या उसके खिलाफ दायर किए गए किसी भी दावे सहित किसी भी दावे को;

3, इस कोड के तहत कॉरपोरेट देनदार या कॉरपोरेट व्यक्ति के दिवाला प्रस्ताव या परिसमापन कार्यवाही के सम्बन्ध में प्राथमिकताओं का कोई प्रश्न या कानून या तथ्यों का कोई प्रश्न या उत्पन्न होने वाला।

कॉरपोरेट इकाई के पंजीकृत कार्यालय की स्थिति, इनसॉल्वेन्सी रेजोल्यूशन और कॉर्पोरेट व्यक्तियों, कॉरपोरेट देनदारों और व्यक्तिगत गारण्टियों के परिसमापन के लिए निर्णायक मानदण्ड होगी।

इस नोट पर, NCLT के उस स्थान पर अधिकार क्षेत्र होने से पहले कॉरपोरेट देनदारों के इनसॉल्वेन्सी रेजोल्यूशन प्रोसेस या लिक्विडेशन को शुरू करने के लिए आवेदन किया जाएगा।

कोड की धारा 63 में यह भी कहा गया है कि सिविल कोर्ट के पास किसी भी मामले के सम्बन्ध में कोई भी मुकदमा या कार्यवाही का अधिकार नहीं होगा, जिस पर NCLT के पास कोड के तहत मनोरंजन करने की शक्ति हो ।

साथ ही सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 9,1908 अदालतों को यह अधिकार देती हैं। कि वे सिविल प्रकृति के उन सभी मुकछमों की सुनवाई के लिए प्रसास करें, जिनमें से ऐसे न्यायालय स्पष्ट या निहित रूप से वर्जित हैं। संहिता की धारा 63 द्वारा रोक दी गई है। उन मामलों पर क्षेत्राधिकार नहीं होगा जिन पर NCLT का अधिकार क्षेत्र है।

कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए सहायक प्राधिकरण NCLT होगा। NCLT के आदेश के खिलाफ कोई भी अपील NCLT के समक्ष दायर की जाएगी। इसके अलावा NCLT के आदेश से कोई भी व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर अपील केवल NCLT या NCLT के आदेश से पारित कानून के सवाल पर होगी।

 

Unit 1 The Insolvency and Bankruptcy code, 2016 Mcom Notes
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