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Unit 2 The Competition Act, 2002 Mcom Notes

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Unit 2 The Competition Act, 2002 Mcom Notes

 

Unit 2 The Competition Act, 2002 Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year The Competition Act, 2002: Important Definitions and Provisions of the act. [ The Competition Act 2002 ]

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (Competition Act, 2002) )

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 भारत का एक अधिनियम है जो भारत में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पारित किया गया। इस अधिनियम में एकाधिकार तथा अवरोधक व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) 1969 का स्थान लिया है।

अर्थव्यवस्था में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सृजन के लिए संसद द्वारा 13 जनवरी, 2003 को प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 को सम्पूर्ण भारत (जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त) में लागू किया गया। इसके अन्तर्गत भारत प्रतिस्पर्धा आयोग [CCI] की स्थापना भी की गयी। प्रतिस्पर्धा आयोग

निम्न चार मुख्य बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित करता है—

(1) प्रतियोगिता पर प्रतिकूल असर डालने वाली प्रथाओं को रोकने के लिए

(2) बाजारों में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और बनाए रखने के लिए

(3) उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए

(4) भारत में और इसके साथ जुड़े मामलों के लिए या उसके बारे में प्रासंगिक बाजारों में अन्य प्रतिभागियों द्वारा किए गए व्यापार की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के लिए।

The Competition Act 2002

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के महत्त्व, विस्तार एवं क्रियान्वयन (Importance, Extent and Application of the Competition Act, 2002)

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की नीतियों को पूरा करने और प्रतिस्पर्धा विरोधी प्रथाओं को रोकने और इस तरह के कृत्यों के दण्ड के लिए प्रदान करने के लिए कानूनी ढाँचा और उपकरण प्रदान करना चाहता है। अधिनियम मुक्त और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की रक्षा करता है जो व्यापार की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है, जो बदले में उपभोक्ता के हितों की रक्षा करता है। अधिनियम एकाधिकार को रोकने के लिए और सरकार द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप को रोकने के लिए भी करना चाहता है। प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के प्रमुख उद्देश्य, महत्त्व एवं क्रियान्वयन इस प्रकार हैं –

1, प्रतिस्पर्धा आयोग की स्थापना के लिए रूपरेखा प्रदान करना।

2, एकाधिकार को रोकने और बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए।

3, उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना।

4, व्यापार की स्वतन्त्रता की रक्षा करना।

5, बाजार में भाग लेने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के हितों की रक्षा करना।

6, भारतीय बाजार में प्रतिभागियों द्वारा किए गए व्यापार की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करना।

7, भारत में प्रतियोगिता आयोग की शक्ति और कार्यों का निर्धारण करना।

8, विरोधी प्रतिस्पर्धी समझौतों का निषेध

9, प्रभुत्व के दुरूपयोग को रोकना।

10, संयोजन का विनियमन (अधिग्रहण विलय और कुछ आकार का समामेलन) आदि।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 को लागू करने में सरकार के नये प्रयास सही दिशा में एक प्रशंसनीय कदम है और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और पॉलिसी को सुव्यवस्थित करने के लिए भारत की प्रतिस्पर्धा पॉलिसी की सीमाओं में एक नई शुरुआत है। यह अधिनियम 2007 और 2009 में संशोधित भी किया गया था।

(1) अधिनियम, 2002 अन्य बातों के साथ-साथ हमें प्रदान करता है—

(i) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की स्थापना जो एक विशेषज्ञ निकाय होगा और अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार देश में विरोधी प्रतिस्पर्धात्मक प्रथाओं को रोकने और नियन्त्रित करने के लिए बाजार नियामक के रूप में कार्य करेगा और इसके लिए सलाहकार भी प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 को लागू करने में सरकार के नये प्रयास सही दिशा में ‘एक’ प्रशासनीय कदम है और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और पॉलिसी को सुव्यवस्थित करने के लिए भारत की प्रतिस्पर्धा पॉलिसी की सीमाओं में एक नई शुरूआत है। यह अधिनियम 2007 और 2009 में संशोधित भी किया गया था।

1, अधिनियम, 2002 अन्य बातों के साथ-साथ हमें प्रदान करता है—

(i) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की स्थापना, जो एक विशेषज्ञ निकाय होगा और अधिनयम के प्रावधानों के अनुसार देश में विरोधी प्रतिस्पर्धात्मक प्रथाओं को रोकने और नियन्त्रित करने के लिए बाजार नियामक के रूप में कार्य करेगा और इसके लिए सलाहकार भी होंगे और वकालता एक नियामक के रूप में अपनी भूमिका में है जो अधिनियम में निर्दिष्ट कुछ मामलों में जुर्माना भी लगा सकता है।

(ii) प्रतियोगिता अपील-सम्बन्धी अधिकरण की स्थापना, जो एक ऐसे व्यक्ति की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय अर्द्ध-न्यायिक निकाय होगा जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश है या रह चुका है जो प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा पारित किए गए किसी भी दिशा या आदेश और मुआवजे के दावों के फैसले और अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के परिणामस्वरूप किसी भी नुकसान या क्षति के लिए किसी भी उद्यम से मुआवजे की वसूली के लिए आदेश देने के खिलाफ अपील को सुनने और निपटाने के लिए है।

(2) अधिनियम की धारा 66, MRTP अधिनियम, 1969 को रद्द करने और MRTP आयोग के विघटन के लिए प्रदान करता है। हालांकि MRTPC को दो साल की अवधि के लिए निरसित अधिनियम के तहत अधिकार क्षेत्र और शक्तियों का प्रयोग करने की अनुमति दी गई थी।

(3) अनैतिक व्यापार प्रथाओं से सम्बन्धित मामलों के सम्बन्ध में यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत गठित राष्ट्रीय आयोग को स्थानान्तरित किया जाएगा।

(4) अधिनियम की धारा 66, 1 सितम्बर, 2009 को लागू की गई थी। चूँकि MRTPC अध्यक्ष और सदस्यों के पद पर रिक्ति के कारण गैर-कार्यात्मक हो। गया, और प्रतिस्पर्धा अपील-सम्बन्धी अधिकरण को पर्याप्त कार्यभार नहीं मिला, सरकार ने 14 अक्टूबर, 2009 को प्रतियोगिता (संशोधन) अध्यादेश, 2009 को लागू करना आवश्यक समझा ताकि MRTPC से लम्बित मामले तत्काल परिप्रेक्ष्य अपील सम्बन्धी अधिकरण और राष्ट्रीय आयोग को तुरन्त ट्रांसफर कर सके। प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2009 के पारित किए जाने पर प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अध्यादेश को निरस्त कर दिया गया है जो 14 अक्टूबर, 2009 को लागू हुआ था।

 

प्रतिस्पर्धा संशोधन अधिनियम, 2009 के प्रभाव यह हैं कि –

(1) एकाधिकार व्यापार प्रथाओं (MTP) या प्रतिबन्धित व्यापार प्रथाओं (RTP) से सम्बन्धित सभी मामले [जिसमें ऐसे मामले शामिल हैं, जिनमें गैर-कानूनी व्यापार प्रैक्टिस (यूटीपी) का आरोप लगा है। और MRTP अधिनियम, 1969 की धारा 36 A की उपधारा (1) की शर्त (X) में निर्दिष्ट UTP से सम्बन्धित सभी मामले तत्काल प्रभाव से प्रतिस्पर्धा अपील-सम्बन्धी अधिकरण को स्थानान्तरित किए जाएँगे।

[अधिनियम की धारा 66 की उपधारा (3) और (5)]

(2) MRTP अधिनियम, 1969 की धारा 36 A की उपधारा (1) की शर्त (X) में उल्लेखित UTP से सम्बन्धित सभी जाँचों या कार्यवाहियों और UTP से सम्बन्धित के अलावा सभी जाँचों या कार्यवाहियों को, जो महानिदेशक के समक्ष लम्बित हैं जाँच और पंजीकरण [DG (I & R)] तत्काल प्रभाव से भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग में स्थानान्तरित किया जाएगा।

[अधिनियम की धारा 66 की उपधारा (6) और (8)]

(3) MRTP अधिनियम, 1969 की धारा 36 A की उपधारा (1) की शर्त (X) में निर्दिष्ट उन लोगों को छोड़कर, MRTP अधिनियम, 1969 की धारा 36A के तहत परिभाषित सभी मामलों, जाँच या कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत गठित राष्ट्रीय आयोग में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा।

[अधिनियम की धारा 66 की उपधारा (4) और (7)]

The Competition Act 2002

प्रतिस्पर्धा कानून की मुख्य सामग्री (Main Content of Competition Law)

नए कानून का फोकस निम्न प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाले क्षेत्रों की ओर है –

(a) कुछ समझौतों का निषेध, जिन्हें प्रकृति में प्रतिस्पर्धी-विरोधी माना जाता है। इस तरह के समझौते [अर्थात् व्यवस्था में विशेष सौदे (आपूर्ति और वितरण), मूल्य को सँभालने और पुनर्विक्रय करने से इनकार में बंधे। प्रतिस्पर्धा विरोधी के रूप में माने जाएंगे यदि वे भारत में प्रतिस्पर्धा पर होने वाले प्रतिस्पर्धी प्रभावों का कारण बनते हैं या सम्भावित हैं।

(b) अनैतिक या भेदभावपूर्ण परिस्थितियों को लागू करके या वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन को सीमित या बाधित करके या ऐसे कार्यों में शामिल होकर जो बाजार पहुँच से रोकती हैं या निषेध के किसी भी अन्य तरीके से प्रभावी स्थिति का दुरुपयोग निषिद्ध है। (c) भारत में सम्बन्धित बाजार के भीतर ऐसे संयोगों के विनियमन को जो प्रतिस्पर्धा पर एक प्रतिकूल प्रभाव का कारण है या कारण बनने की सम्भावना रखते हैं, अमान्य माना जाता है।

 

प्रतिस्पर्धा आयोग की शक्तियाँ, कर्त्तव्य और कार्य (Powers, Duties and Functions of Competition Commission)

 

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की मुख्य शक्तियाँ, कर्त्तव्य एवं कार्य निम्नलिखित हैं –

1, प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली प्रथाओं को हटाना और प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और अन्य प्रतिभागियों द्वारा व्यापार की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के लिए।

2, कुछ समझौतों और उद्यम की प्रमुख स्थिति में पूछताछ (Inquire into Certain Agreements and Dominant Position of Enterprise) – आयोग धारा 3 के कथित उल्लंघन की किसी भी सूचना पर या स्वयं (प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौतों को प्रतिबन्धित करने के लिए) पूछताछ कर सकता है।

3, संयोजन में जाँच (Inquiry into Combinations) अधिनियम की धारा 20 आयोग को अधिग्रहण से सम्बन्धित किसी भी जानकारी की जाँच करने की शक्ति प्रदान करती है और यह निर्धारित करती है कि इस तरह के संयोजन या अधिग्रहण का प्रतिस्पर्धा (AAEC) पर एक सराहनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

4, एक सांविधिक प्राधिकरण द्वारा अयोग के लिए एक मुद्दे का सन्दर्भ (Reference of an Issue by a Statutory Authority to the Commission) अधिनियम की धारा 21 में यह कहा गया है कि कार्यवाही के दौरान यदि मुद्दा उठाया जाता है। कि एक सांविधिक प्राधिकरण का कोई भी निर्णय प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के विरुद्ध होगा तो वैधानिक प्राधिकरण आयोग को इस सम्बन्ध में एक सन्दर्भ देगा।

5, आयोग द्वारा सन्दर्भ (Reference by Commission) अधिनियम की धारा 21A में यह प्रावधान है कि यदि किसी मुद्दे पर कार्यवाही के दौरान किसी पक्ष द्वारा यह मुद्दा उठाया जाता है कि आयोग द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय प्रतिस्पर्धा अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है, जिसका अधिकार तब एक सांविधिक को सौंपा जाता है। आयोग वैधानिक प्राधिकरण को इस मुद्दे के सन्दर्भ में एक सन्दर्भ बना सकता है।

6, अन्तरिम आदेश जारी करने की शक्ति (Power to Issue Interim Order) अधिनियम की धारा 33 आयोग को प्रतिस्पर्धी विरोधी समझौतों और प्रभावी स्थिति के दुरुपयोग के मामलों में अन्तरिम आदेश जारी करने का अधिकार देती है, जिससे किसी भी पक्ष को इस तरह के कार्य को करने से अस्थायी रूप से प्रतिबन्धित किया जाता है।

7, प्रतियोगिता की वकालत (Competition Advocacy) अधिनियम की धारा 49 प्रतियोगिता की वकालत करती है और यह मानती है कि प्रतिस्पर्धा पर किसी भी नीति को बनाते समय केन्द्र या राज्य सरकार ऐसी नीति के सम्भावित प्रभाव पर आयोग की राय ले सकती है। हालाँकि आयोग द्वारा दी गई राय केन्द्र सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है।

योग की स्वयं की प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्तियाँ (धारा 36) [Powers of Commission to Regulate its Own Procedure (Section 36)]

 

1, सिविल न्यायालय की शक्ति (Power of Civil Court) इस अधिनियम के अन्तर्गत अपने कार्यों का निर्वहन करने के लिए आयोग के पास समान अधिकार होंगे जैसा सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत एक नागरिक न्यायालय को प्राप्त होते हैं। विवरण इस प्रकार है –

(I) किसी व्यक्ति को उपस्थित होने के लिए बाध्य करना और शपथ पर उसकी जाँच करना।

(ii) दस्तावेजों की खोज एवं प्रस्तुतीकरण की माँग करना।

(iii) शपथ पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना।

(iv) गवाहों या दस्तावेजों की जाँच के लिए कमीशन बनाना।

(v) किसी भी सार्वजनिक दस्तावेज या रिकॉर्ड या किसी कार्यालय के दस्तावेजों की प्रतिलिपि की माँग करना।

2, विशेषज्ञों से सहायता लेने की शक्ति (Power to take Help of Experts) – आयोग अर्थशास्त्र, वाणिज्य, लेखा, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार या अन्य किसी क्षेत्र के विशेषज्ञों को बुला सकता है, जो आयोग के द्वारा किसी भी जाँच के संचालन में आयोग की सहायता करने के लिए आवश्यक समझे जाते हैं।

3, आयोग की कार्यवाही न्यायिक कार्यवाही होगी (Commission proceeding is Judicial Proceeding) – आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता के भीतर न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी और आयोग एक दीवानी न्यायालय माना जाएगा।

4, दस्तावेज या रिकॉर्ड प्रस्तुत करवाने की शक्ति (Power to Call Records) – आयोग किसी भी व्यक्ति को निर्देशित कर सकता है –

(i) महानिदेशक या रजिस्ट्रार या उसके द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष ऐसी किताबें, खाते या अन्य दस्तावेज परीक्षण के लिए प्रस्तुत करना जिनकी परीक्षा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक है।

(ii) महानिदेशक या रजिस्ट्रार या आयोग द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष व्यापार के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्रस्तुत करना जो अधिनियम के उद्देश्यों के लिए आवश्यक है।

आयोग के दायित्व (Duties of Commission)

 

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के अन्तर्गत गठित आयोग के दायित्व अधिनियम की धारा 18 के अनुसार निम्नलिखित है—

(1) प्रतियोगिता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली प्रथाओं को हटाना।

(ii) प्रतिस्पर्धा को बनाए रखना एवं बढ़ावा देना।

(iii) उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना।

(iv) भारतीय बाजार में व्यापार की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करना।

आयोग अपने दायित्वों को पूरा करने और अपने कार्यों को करने के लिए केन्द्र सरकार की पूर्व अनुमति के आधार पर किसी विदेशी संस्था के साथ समझौता कर सकती है।

 

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India)

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग भारत सरकार की एक विनियामक संस्था है जिसका उद्देश्य स्वच्छ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है ताकि बाजार उपभोक्ताओं के हित का साधन बनाया जा सके। अर्थव्यवस्था में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सृजन और इस सन्दर्भ में ‘सबको समान अवसर प्रदान करने के लिए भारतीय संसद द्वारा 13 जनवरी, 2003 को प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 को लागू किया गया। इसके उपरान्त 14 अक्टूबर, 2003 को प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौतों और गतिविधियों को रोकने के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की स्थापना की गयी।

 

प्रतिस्पर्धा अधिनियम आयोग की स्थापना (Establishment of Commission)- की धारा 7 केन्द्र सरकार को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का गठन करने की शक्ति प्रदान करती है।

आयोग शाश्वत उत्तराधिकार और सार्वमुद्रा के साथ एक निकाय होगा। आयोग चल और अचल सम्पत्ति अधिग्रहण कर सकता है या उनका निपटान कर सकता है। अनुबन्ध कर सकता है। उक्त नाम से मुकदमा कर सकता है या उस पर मुकदमा किया जा सकता है।

 

प्रतिस्पर्धा आयोग की संरचना (Structure of Competition Commission)

(1) सम्बन्धित विधानों के अनुसार, आयोग में एक अध्यक्ष होगा और इसमें दो से कम और दस से अधिक अन्य सदस्य नहीं होंगे। इन्हें केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग वर्तमान में एक अध्यक्ष और 6 सदस्यों के साथ कार्य कर रहा है।

(2) आयोग एक अर्द्ध- न्यायिक निकाय है जो वैधानिक अधिकारियों को राय देता है। और अन्य मामलों से भी निपटता है। अध्यक्ष और अन्य सदस्य इसके पूर्णकालिक सदस्य होंगे।

(3) सदस्यों की पात्रता- अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य क्षमता, अखण्डता वाले व्यक्ति होंगे और जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के लिए योग्य रहे हैं या जिनके पास विशेष ज्ञान है और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, अर्थशास्त्र, व्यवसाय, वाणिज्य, कानून, वित्त, लेखा, प्रबन्धन, उद्योग, सार्वजनिक मामलों, प्रशासन या किसी अन्य मामले में कम से कम पन्द्रह साल का पेशेवर अनुभव है, जो केन्द्र सरकार की राय में आयोग के लिए उपयोगी हो सकता है।

(4) आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के पद की अवधि (Term of office of Chairperson and Members of Commission (Section 10) – (i) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य पाँच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा, जिस तिथि पर वह अपने कार्यालय में प्रवेश करेगा और पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होगा।

(ii) धारा 11 के अन्तर्गत अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के इस्तीफे या निष्कासन के कारण या मृत्यु के कारण या किसी अन्य कारण से हुई रिक्ति को धारा 9 के प्रावधानों के अनुसार नई नियुक्ति से भरा जाएगा।

(iii) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य, अपने कार्यालय में प्रवेश करने से पहले, पद और गोपनीयता की शपथ इस रूप तरीके और ऐसे अधिकारी के समक्ष लेंगे जैसाकि निर्धारित किया जा सकता है।

(iv) अध्यक्ष के कार्यालय में उनकी मृत्यु, त्यागपत्र या अन्य कारण से पद रिक्त होने की स्थिति में, वरिष्ठतम सदस्य अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा, जिस तिथि तक एक नया अध्यक्षः नियुक्त किया जाता है। इस पद को भरने के लिए इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, अपने कार्यालय में प्रवेश करता है।

(v) जब अध्यक्ष बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कार्यों का निर्वहन करने में असमर्थ होता है, तो वरिष्ठतम सदस्य अध्यक्ष के कार्यों का उस तिथि तक निर्वहन करेगा, जिस दिन तक अध्यक्ष अपने कार्यों के प्रभार को फिर से शुरू नहीं कर देता है। ‘बशर्ते कि किसी भी अध्यक्ष या अन्य सदस्य की आयु पद ग्रहण करते समय निम्न में से कम न हो

(a) अध्यक्ष के मामले में, सड़सठ वर्ष की आयुः

(b) किसी अन्य सदस्य के मामले में, पैंसठ वर्ष की आयु

The Competition Act 2002

प्रतिस्पर्धा आयोग के उद्देश्य (Objectives of Competition Commission)

(1) मुक्त उद्यम को बढ़ावा देना (Promote Free Enterprise) – प्रतिस्पर्धा कानूनों को मुक्त उद्यम के मैग्नाकार्टा के रूप में वर्णित किया गया है। प्रतिस्पर्धा आर्थिक स्वतन्त्रता और हमारे मुक्त उद्यम प्रणाली के संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

(2) बाजार की विकृतियों से रक्षा करना (Protect against Market Distortions) – प्रतिस्पर्धा कानून की आवश्यकता इसलिए

उत्पन्न होती है क्योंकि बाजार विफलताओं और विकृतियों से पीड़ित हो सकता है, और मुख्य व्यवसायी प्रतिस्पर्धा विरोधी

गतिविधियों जैसे कार्टेल, प्रभुत्व का दुरुपयोग आदि का सहारा ले सकते हैं जो आर्थिक दक्षता और उपभोक्ता कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

इस प्रकार, एक नियामक बल प्रदान करने के लिए प्रतिस्पर्धा कानून की आवश्यकता है। जो आर्थिक गतिविधियों पर प्रभावी नियन्त्रण स्थापित करता है।

(3) घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना (Promote Domestic Industries) – उस युग के दौरान जिसमें अर्थव्यवस्थाएँ बन्द अर्थव्यवस्थाओं से खुली अर्थव्यवस्थाओं की ओर बढ़ रही होती हैं, विदेशी निवेश में हुई वृद्धि प्रतिस्पर्धा के लाभों को प्राप्त करने के साथ सावधानीपूर्वक सन्तुलित होती है। घरेलू उद्योगों की निरन्तर व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी प्रतिस्पर्धा आयोग आवश्यक है।

The Competition Act 2002

 

बाजार प्रभुत्व से आशय (Meaning of Dominant Position in Market)

भारत में सम्बन्धित बाजार में एक उद्यम द्वारा उपयोग की गई शक्ति की स्थिति के अनुसार अधिनियम में अति प्रभावशाली स्थिति (प्रभुत्व) को परिभाषित किया गया है जो इसे निम्नलिखित के लिए समर्थ बनाता है—

(i) सम्बद्ध बाजार में प्रचलित प्रतिस्पर्धी ताकतों को स्वतन्त्र रूप से संचालित करना अथवा

(ii) अपने हक में अपने प्रतियोगियों अथवा उपभोक्ताओं अथवा सम्बद्ध बाजार को प्रभावित करना।

एक उद्यम का यह सामर्थ्य है कि वह उन बाजारी ताकतों के साथ स्वतन्त्र रूप से व्यवहार/ कार्य करे तो अपनी प्रभुत्व की स्थिति का निर्धारण करती हैं। एक आदर्श प्रतिस्पर्धी बाजार में किसी भी उद्यम का बाजार पर नियन्त्रण नहीं होता है विशेष रूप से उत्पाद के मूल्य निर्धारण में, तथापि सम्पूर्ण बाजार की स्थितियाँ वास्तविक की तुलना में ‘आदर्श’ अर्थव्यवस्था के अनुकूल होती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए अधिनियम में अनेक कारणों को निर्दिष्ट किया गया है जिन्हें इस बात का निर्धारण करते समय कि एक उद्यम प्रभावशाली स्थिति का है अथवा नहीं, ध्यान में रखा जाना चाहिए।

सम्बद्ध बाजार

प्रभावशाली स्थिति (प्रभुत्व) का प्रतिस्पर्धा के लिए तभी महत्त्व है जब सम्बद्ध बाजार को परिभाषित किया गया हो। अधिनियम में अधिनियम की धारा 2 (ध) और 2 (न) के अन्तर्गत ‘सम्बद्ध बाजार’ तथा ‘सम्बद्ध भौगोलिक बाजार’ दोनों ही को परिभाषित किया गया है। सम्बद्ध बाजार का अर्थ है-“एक ऐसा बाजार जिसका निर्धारण सम्बद्ध उत्पाद के बाजार अथवा सम्बन्धित भौगोलिक बाजार अथवा दोनों ही बाजारों के सन्दर्भ में आयोग द्वारा किया जाए।” अधिनियम में अनेक कारकों का निर्धारण किया गया है जिनमें से कोई भी एक अथवा सभी कारकों को आयोग द्वारा सम्बद्ध बाजार को परिभाषित करते समय ध्यान में रखा जाएगा।

सम्बद्ध उत्पाद बाजार को प्रतिस्थापन के सन्दर्भ में परिभाषित किया गया है। यह उन उत्पादों (वस्तुओं और सेवाओं) की सबसे छोटी सूची है जो अपने आप में स्थानापन्न हैं और जो मूल्यों में बहुत कम किन्तु महत्त्वपूर्ण दीर्घकालिक वृद्धि (SSNIP) करते हैं। उदाहरण के लिए, कारों के बाजार में छोटी कारों, मध्यम आकार की कारों, लक्जरी कारों आदि के लिए अलग ‘सम्बद्ध उत्पाद बाजार’ शामिल हो सकते हैं क्योंकि ये मूल्यों में थोड़ा-सा परिवर्तन होने पर एक-दूसरे के लिए स्थानापन्न नहीं हैं।

सम्बद्ध भौगोलिक बाजार को उस क्षेत्र विशेष के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें वस्तुओं की आपूर्ति अथवा सेवाओं के प्रावधान अथवा वस्तुओं या सेवाओं की माँग के लिए प्रतिस्पर्धा की शर्तें स्पष्ट रूप से समरूप हों तथा जिन्हें आस-पास के क्षेत्रों में प्रचलित परिस्थितियों से अलग किया जा सकता हो ।

The Competition Act 2002

प्रभावशाली स्थिति (प्रभुत्व) का निर्धारण करने वाले कारक

सम्बन्धित उद्यम अथवा उद्यमों के समूह की बाजार भागीदारी के अनुसार प्रभावशाली स्थिति (प्रभुत्व) को परम्परागत रूप से परिभाषित किया गया है, तथापि बाजार में एक उद्यम अथवा उद्यमों के एक समूह के प्रभाव के निर्धारण में कई अन्य कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं –

(i) बाजार भागीदारी

(ii) उद्यम का आकार और संसाधन

(iii) प्रतियोगियों का आकार और महत्त्व

(iv) उद्यम की आर्थिक शक्ति

(v) शीर्ष संघटन

(vi) उद्यम पर उपभोक्ताओं की निर्भरता

(vii) बाजार में आवागमन सम्बन्धी बाधाओं की सीमा

(viii) क्रय शक्ति का समायोजन

(ix) बाजार ढाँचा तथा बाजार का आकार।

(x) प्रभुत्व की स्थिति का स्रोत अर्थात् क्या इसे कानून आदि के माध्यम से प्राप्त किया

(xi) आर्थिक विकास के लिए प्रभुत्व की स्थिति का लाभ उठा रहे उद्यम की सामाजिक हैसियत एवं दायित्व और योगदान। गया है।

आयोग को अन्य किसी कारक को ध्यान में रखने के लिए अधिकृत किया गया है जिसे यह प्रभुत्व की स्थिति का निर्धारण करने के लिए उचित/प्रासंगिक समझे ।।

The Competition Act 2002

प्रभुत्व की स्थिति का दुरुपयोग

दरअसल प्रभुत्व की स्थिति को नहीं बल्कि इसके दुरुपयोग को बुरा समझा जाता है। दुरुपयोग वहीं होता है जब एक उद्यम अथवा

उद्यमों का एक समूह सम्बन्धित बाजार में विशिष्ट रूप से अथवा और अनुचित रूप से लाभ कमाने में अपनी प्रभावशाली स्थिति (प्रभुत्व) का प्रयोग करते हैं।

अधिनियम में ऐसे व्यवहारों की एक विस्तृत सूची दी गई है जो प्रभुत्व की स्थिति के दुरुपयोग का निर्धारण करेंगी, अतएव ये निषेध हैं। इस प्रकार के व्यवहारों से दुरुपयोग तभी होगा जब भारत में; सम्बन्धित बाजार में एक उद्यम अपने प्रभुत्व की स्थिति का लाभ उठाने के लिए इस प्रक्रिया को अपनाए।

एक प्रभुत्व वाले उद्यम द्वारा किए गए विनि कार्यों के अनुसार ही प्रभुत्व की स्थिति के दुरुपयोग का निर्णय लिया जाता है। कानून के अन्तर्गत ऐसे कार्यों को करना निषेध है। एक प्रभुत्व वाली फर्म द्वारा अधिनियम में निर्दिष्ट प्रकार के किसी भी दुरुपयोग को निषेध माना जाएगा।

अधिनियम की धारा 4 (2) में प्रभुत्व वाले उद्यमों अथवा उद्यमों के एक समूह द्वारा किए गए निम्नलिखित कार्य दुरुपयोग के रूप में निर्दिष्ट हैं –

(1) वस्तुओं अथवा सेवाओं के क्रय अथवा विक्रय में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अनुचित अथवा भेदभावपूर्ण शर्तें थोपना।

(2) वस्तुओं अथवा सेवाओं के क्रय अथवा विक्रय (लगत से कम मूल्य पर वस्तु अथवा सेवा बेचने) सहित में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अनुचित अथवा भेदभावपूर्ण मूल्य थोपना।

(3) वस्तुओं के उत्पादन अथवा सेवाओं अथवा बाजार को सीमित करना अथवा बाधा डालना।

(4) उपभोक्ताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने तक वस्तुओं अथवा सेवाओं के बारे में तकनीकी अथवा वैज्ञानिक विकास को सीमित करना अथवा बाधा डालना।

(5) किसी भी प्रकार से नए उद्यमियों के व्यवसाय प्रवेश में अवरोध पैदा करना।

(6) पूरक दायित्वों के अन्य पक्षकारों द्वारा स्वीकृति के अधीन संविदाओं को अन्तिम रूप देना जिनका उनकी प्रकृति अथवा वाणिज्यिक प्रयोग के अनुसार ऐसी संविदाओं के विषय के बारे में कोई सम्बन्ध नहीं है।

(7) सम्बन्धित एक बाजार में अपनी प्रबल प्रभुत्व स्थिति को दूसरे संगत बाजार में इस्तेमाल करना अथवा उसका संरक्षण करना।

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प्रभुत्व की स्थिति के दुरुपयोग की जाँच

अधिनियम की धारा 19 के अन्तर्गत प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते हुए, आयोग अधिनियम की धारा 4(1) के किसी भी कथित उल्लंघन की जाँच कर सकता है जिसमें प्रभुत्व की स्थिति के दुरुपयोग का उल्लेख हो। अधिनियम की धारा 19 (4) में उन कारकों की एक विस्तृत सूची दी गई है कि आयोग प्रभुत्व की स्थिति के दुरुपयोग के किसी भी आरोप की जाँच करते समय उन पर विचार करेगा। इनमें से कुछ कारक उद्यम की बाजार में हिस्सेदारी, उद्यम का आकार और संसाधन तथा प्रतियोगियों का आकार एवं महत्त्व, उपभोक्ताओं की निर्भरता, एकाधिकार या प्रभुत्व से प्रवेश में बाधा एवं सामाजिक दायित्व तथा सम्बन्धित भौगोलिक और उत्पाद बाजार में लागत है।

आयोग, इस बात को मानते हुए कि प्रथम दृष्ट्या यह मामला ‘प्रभुत्व की स्थिति दुरुपयोग का बनता है, मामले की जाँच करने और इसकी रिपोर्ट भेजने हेतु महानिदेशक को निर्देश दे सकता है। आयोग के पास किसी भी व्यक्ति को समन भेजने अथवा उसकी उपस्थिति पर जोर देने तथा शपथ पर उसकी जाँच करने, उसकी खोज अनिवार्य करने एवं दस्तावेज प्रस्तुत करने और शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करने जैसे मामलों के बारे में सिविल प्रक्रिया विधि संहिता के अन्तर्गत सिविल न्यायालय की प्रत्यायोजित शक्तियाँ हैं। जाँच करने के प्रयोजन हेतु महानिदेशक को तलाशी एवं गिरफ्तारी (सर्च एण्ड सीजर) करने की शक्तियों के अलावा सिविल न्यायालय की शक्तियाँ भी प्रत्यायोजित है।

टिप्पणीजाँच और अन्वेषणों से सम्बन्धित प्रक्रियाओं के विवरण हेतु कृपया भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सामान्य) विनियम, 2009 दिनांक 21 मई, 2009 का अवलोकन करें। (यह भा०प्र० आ० की वेबसाइट www,cci,gov,in पर भी उपलब्ध है)

 

आयोग की शक्तियाँ

 

जाँच के बाद, अन्य बातों के साथ-साथ, आयोग अधिनियम की धारा 27 के अन्तर्गत कोई भी अथवा निम्नलिखित सभी आदेशों को पारित कर सकता है –

(1) करार को समाप्त करने अथवा इस प्रकार के करार में पुनः शामिल न होने के लिए पक्षकारों को निर्देश देना।

(2) सम्बन्धित उद्यम को, करार को संशोधित करने का निर्देश देना।

(3) सम्बन्धित उद्यमों को आयोग द्वारा पारित किए जाने वाले ऐसे अन्य आदेशों का अनुपालन करने तथा लागत के भुगतान सहित निर्देशों की अनुपालना करने, यदि कोई हो, हेतु निर्देश देना तथा

(4) जैसा आयोग सही समझे, उसके अनुसार वह इस प्रकार का आदेश पारित कर सकता है अथवा ऐसे निर्देश जारी कर सकता है। (5) आयोग, जैसा उचित समझे, ऐसा जुर्माना लगा सकता है। यह जुर्माना (अर्थदण्ड) ऐसे प्रत्येक व्यक्तियों अथवा उद्यमों जो बोली में हेर-फेर अथवा बोली में मिलीभगत के लिए पक्षकार हैं, पर पिछले लगातार तीन वित्तीय वर्षों के औसत कारोबार के 10 प्रतिशत तक हो सकती है।

(6) धारा 28 आयोग को यह सुनिश्चित करने हेतु कि ऐसा उद्यम अपने प्रभुत्व की स्थिति का दुरुपयोग नहीं करता है, प्रभुत्व की स्थिति का लाभ उठाने वाले एक उद्यम का बँटवारा करने का निर्देश देने का अधिकार देती है।

 

अन्तरिम आदेश

 

अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत प्रभावशाली स्थिति (प्रभुत्व) के दुरुपयोग की जांच के लम्बित रहने के दौरान, आयोग, जहाँ वह आवश्यक समझे, ऐसे पक्षकार को नोटिस दिए बगैर जाँच का परिणाम आने तक अथवा आगामी आदेशों तक अधिनियम के कथित उल्लंघन को जारी रखने से किसी भी पक्षकार को अस्थायी रूप से रोक सकती है।

The Competition Act 2002

समुच्चयों का विनियमन (Regulation of Combination)

प्रतिस्पर्धा अधिनियम के अनुसार एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा एक या अधिक उद्यमों का अर्जन अथवा उद्यमों का विलयन या समामेलन ऐसे उद्यमों और व्यक्तियों का समुच्चय होगा यदि

(i) ऐसे अर्जन के पक्षकार की, जो अर्जनकर्त्ता और ऐसा उद्यम है, जिसका नियन्त्रण, शेयर, मत देने का अधिकार या आस्तियाँ अर्जित की गई है या की जा रही हैं, संयुक्त रूप से –

(अ) या तो भारत में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आस्तियाँ या तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक के आवर्त हैं, या

(आ) भारत में या भारत के बाहर कुल मिलाकर पाँच सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य से अधिक की आस्तियाँ हैं, जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पाँच सौ करोड़ रुपये मूल्य की आस्तियाँ हैं या पन्द्रह सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के आवर्त हैं, जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मूल्य के आवर्त हैं, या

(ii) किसी ऐसे समूह की, जिनका यह उद्यम, जिसका नियन्त्रण, शेयर, आस्तियाँ या मताधिकार अर्जित किए गए हैं या अर्जित किए जा रहे हैं, अर्जन के पश्चात् होगा, संयुक्त रूप से –

(अ) या तो भारत में, चार हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आस्तियाँ या बारह हजार करोड़ रुपये से अधिक के आवर्त है या होंगे, या

(आ) भारत में या भारत के बारह कुल मिलाकर दो बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य से अधिक की आस्तियाँ है, जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पाँच सौ करोड़ रुपये मूल्य की आस्तियाँ है या छह विलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के आवर्त हैं, जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मूल्य के आवर्त हैं, या

(ख) किसी व्यक्ति द्वारा किसी उद्यम पर नियन्त्रण का अर्जन करने के लिए, जब ऐसे व्यक्ति का पहले से ही किसी अन्य ऐसे उद्यम मामले पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियन्त्रण है, जो किसी समरूप या अनुकल्पी माल के उत्पादन, वितरण था व्यापार में लगा हुआ है या किसी समरूप या अनुकल्पी सेवा की व्यवस्था कर रहा है, यदि –

(6) ऐसे उद्यम का, जिस पर नियन्त्रण का अर्जन किया गया है, उस उद्यम के साथ, जिस पर अर्जनकर्त्ता का पहले से ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियन्त्रण है, संयुक्त रूप से

(अ) या तो भारत में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आस्तियाँ तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक के आवर्त हैं, या

(आ) भारत में, या भारत के बाहर कुल मिलाकर पाँच सौ बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य से अधिक की आस्तियाँ हैं जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पाँच सौ करोड़ रुपये मूल्य की आस्तियाँ है या पन्द्रह सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के आवर्त हैं, जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मूल्य के आवर्त हैं, या (ii) ऐसे समूह की, जिसका वह उद्यम, जिसका नियन्त्रण अर्जित किया गया है या अर्जित किया जा रहा है, अर्जन के पश्चात् संयुक्त रूप से

(अ) या तो भारत में चार हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आस्तियों या बारह हजार करोड़ रुपये से अधिक के आवर्त है; या होंगे, या

(आ) भारत में या भारत के बाहर कुल मिलाकर दो बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य से अधिक की आस्तियाँ हैं जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पाँच सौ करोड़ रुपये मूल्य की आस्तियाँ हैं या छह बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के आवर्त है, जिसके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मूल्य के आवर्त हैं, या

(ग) कोई विलयन या समामेलन, जिनमें

(i) यथास्थिति विलयन के पश्चात् बना रहा उद्यम या समामेलन के परिणामस्वरूप सृजित उद्यम की—

(अ) या तो भारत में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आस्तियाँ या तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक के आवर्त हैं, या (आ) भारत में, या भारत के बाहर कुल मिलाकर पाँच सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य से अधिक की आस्तियाँ हैं जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पाँच सौ करोड़ रुपये मूल्य की आस्तियाँ हैं या पन्द्रह सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के आवर्त हैं, जिसके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मूल्य के आवर्त हैं।

(ii) उस समूह की, जिसका विलयन के पश्चात् बचा उद्यम या समामेलन के परिणाम स्वरूप सृजित उद्यम, यथास्थिति, विलयन या समामेलन के पश्चात् होगा, संयुक्त रूप में –

(अ) या तो भारत में चार हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की आस्तियाँ या बारह हजार करोड़ रुपये से अधिक के आवर्त हैं; या होंगे, या

(आ) भारत में, या भारत के बाहर कुल मिलाकर दो बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य से अधिक की आस्तियाँ हैं जिनके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पाँच सौ करोड़ रुपये मूल्य की आस्तियाँ है या छह बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के आवर्त हैं, जिसके अन्तर्गत भारत में कम-से-कम पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मूल्य के आवर्त हैं।

समुच्चयों का विनियमन (Regulation of Combinations) – (1) कोई भी व्यक्ति या उद्यम, किसी ऐसे समुच्चय में सम्मिलित नहीं होगा, जिससे भारत में सुसंगत बाजार के भीतर प्रतिस्पर्धा पर पर्याप्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है या पड़ने की सम्भावना है, और ऐसा कोई समुच्चय शून्य होगा।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई ऐसा व्यक्ति या उद्यम, जो किसी समुच्चय में सम्मिलित होने का प्रस्ताव करता है, आयोग को, ऐसे प्रारूप में जो विहित किया जाए, और ऐसी फीस के साथ जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए (क) ऐसे उद्यमों के निदेशक बोर्ड द्वारा जो यथास्थिति ऐसे विलयन या समामेलन से सम्बद्ध है, धारा 5 के खण्ड (ग) में निर्दिष्ट ऐसे विलयन या समामेलन से सम्बन्धित प्रस्ताव के अनुमोदन के,

(ख) धारा 5 के खण्ड (क) में निर्दिष्ट अर्जन वा उस धारा के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट नियन्त्रण का अर्जन प्राप्त करने के लिए किसी करार या अन्य दस्तावेज के निष्पादन के, तीस दिन के भीतर सूचना देगा जिसमें प्रस्तावित समुच्चय के ब्योरे प्रकट होंगे। (23) कोई भी समुच्चय तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि उस तारीख से, जिसको उपधारा (2) के अधीन आयोग को सूचना दी गई है, दो सौ दस दिन बीत न गए हों या आयोग ने धारा 31 के अधीन आदेश पारित न कर दिया हो, इनमें से जो भी पूर्वतर हो ।

(3) आयोग, उपधारा (2) के अधीन सूचना प्राप्त करने के पश्चात् ऐसी सूचना का निपटान धारा 29, धारा 30 और धारा 31 के उपबन्धों के अनुसार करेगा।

(4) इस धारा के उपबन्ध किसी ऋण करार या विनिधान करार की किसी प्रसंविदा के अनुसरण में शेयर अभिधान या वित्तपोषण प्रसुविधा या किसी लोक वित्तीय संस्था, विदेशी संस्थागत विनिधानकर्त्ता, बैंक या जोखिम पूँजी निधि द्वारा किसी अर्जन को लागू नहीं होंगे।

(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट लोक वित्तीय संस्था, विदेशी संस्थागत विनिधानकर्त्ता, बैंक या जोखिम पूँजी निधि, अर्जन की तारीख से सात दिन के भीतर, उस प्रारूप में, जो विनियमों द्वारा विहित किया जाए, अर्जन के ब्योरे, जिनके अन्तर्गत नियन्त्रण के ब्योरे, ऐसा नियन्त्रण करने की परिस्थितियाँ और यथास्थिति, ऐसे ऋण करार या विनिधान करार से उद्भूत व्यतिक्रम के परिणामों से सम्बन्धित ब्योरे भी हैं, आयोग को फाइल करेगी।

Unit 2 The Competition Act, 2002 Mcom Notes
Unit 2 The Competition Act, 2002 Mcom Notes

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