Unit 3 The Companies Act, 2013 Mcom Notes

Unit 3 The Companies Act, 2013 Mcom Notes

Contents

Unit 3 The Companies Act, 2013 Mcom Notes

Unit 3 The Companies Act, 2013 Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year The Companies Act, 2013: Procedural Aspects relating to preparation and alteration of memorandum of association and articles of association; appointment and removal of directors and auditors; meetings of the company-procedure. The Companies Act 2013

 

पार्षद सीमानियम का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Memorandum of Association)

पार्षद सीमानियम से अभिप्राय कम्पनी के महत्त्वपूर्ण प्रलेख से है। इसे कम्पनी का संविधान अथवा कम्पनी निर्माण की आधारशिला भी कहते हैं। पार्षद सीमानियम कम्पनी का ‘चार्टर होता है जो कम्पनी के उद्देश्यों, कार्य क्षेत्र तथा अधिकारों की सीमाओं का उल्लेख करता है। चार्टर से अभिप्राय, वैधानिक एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेख से है। प्रत्येक कम्पनी को अपने पार्षद सीमानियम के अन्तर्गत ही कार्य करना होता है, क्योंकि इसके बाहर किया गया कार्य व्यर्थ माना जाएगा।

(1) भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (56) के अनुसार, “सीमानियम से अभिप्राय, एक कम्पनी के ऐसे पार्षद सीमानियम से हैं, जो पिछले किसी भी कम्पनी सन्नियम अथवा इस अधिनियम के अधीन मूल रूप से बनाया गया हो अथवा समय-समय पर परिवर्तित किया गया हो।”

(2) लार्ड केयर्न्स के अनुसार, “पार्षद सीमानियम किसी कम्पनी का आज्ञा-पत्र होता है और यह अधिनियम के अधीन स्थापित कम्पनी के अधिकारों की सीमाओं का उल्लेख करता है।”

(3) न्यायाधीश चार्ल्सवर्थ के अनुसार, “पार्षद सीमानियम कम्पनी का अधिकार पत्र हैं जो उसके अधिकारों की सीमाओं का उल्लेख करता है।”

(4) एशबरी बनाम वाटसन के विवाद में न्यायाधीश द्वारा दिए गए निर्णय के अनुसार, “सीमानियम में वे मूलभूत दशाएँ होती हैं जिन पर कि कम्पनी के समामेलन की अनुमति दी जाती है।”

The Companies Act 2013

पार्षद सीमानियम की विषय सामग्री (Subject-matter of Memorandum of Association)

 

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 4 पार्षद सीमानियम में दिए जाने वाले विवरण को प्रदर्शित करती है। धारा 4(1) के अनुसार पार्षद सीमानियम में निम्नलिखित बातों को शामिल किया जाता है—

I, नाम वाक्य – यह पार्षद सीमानियम का प्रथम वाक्य है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रावधान दिए गए हैं

1, धारा 4 (1) (a) के अनुसार, एक सार्वजनिक कम्पनी के नाम के अन्त में ‘लिमिटेड’ शब्द तथा एक निजी कम्पनी के नाम के अन्त में प्राइवेट लिमिटेड’ शब्द लिखा होना अनिवार्य है।

2, एक कम्पनी अपनी इच्छा से कम्पनी का कोई भी नाम रख सकती है, किन्तु कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 4(2) के अनुसार पार्षद सीमानियम में वर्णित नाम ऐसा नहीं होना चाहिए जो किसी पूर्व अधिनियम के द्वारा पंजीकृत किसी विद्यमान कम्पनी के नाम के समान हो ।

3, धारा 4(3) के अनुसार उपधारा (2) के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कोई भी कम्पनी अपने नाम के साथ ऐसा शब्द या कथन का प्रयोग केन्द्र सरकार से पूर्व अनुमोदन प्राप्त किए बिना नहीं करेगी।

4, नाम सुरक्षित करने के लिए आवेदन- धारा 4 (4) के अनुसार एक व्यक्ति आवेदन में (अ) प्रस्तावित कम्पनी के नाम; या (ब) वह नाम, जिसे कम्पनी अपने नाम के परिवर्तन का प्रस्ताव करती है, को सुरक्षित रखने के लिए ऐसे प्रारूप और रीति में तथा निर्धारित फीस के साथ, रजिस्ट्रार को आवेदन कर सकता है।

5, नाम सुरक्षित करने की अवधि-धारा 4(5) के अनुसार –

(i) उपर्युक्त आवेदन प्राप्त होने के बाद रजिस्ट्रार आवेदन के साथ दी गई सूचना और प्रपत्रों के आधार पर कम्पनी के नाम को संशोधित अधिनियम, 2017 के अनुसार अनुमोदन की तिथि से 20 दिन अथवा कोई अन्य निर्धारित अवधि के लिए सुरक्षित रख सकता है तथा एक मौजूदा कम्पनी द्वारा नाम सुरक्षित करने या नाम में परिवर्तन के लिए आवेदन की दशा में रजिस्ट्रार अनुमोदन की तिथि से 60 दिन की अवधि के लिए नाम सुरक्षित कर सकता है।

(ii) जहाँ इस उपधारा के खण्ड (i) के अधीन नाम को सुरक्षित रखने के पश्चात् यह पाया जाता है कि नाम के लिए आवेदन गलत या असत्य सूचना देकर किया गया है, तो –

(a) यदि कम्पनी अभी समामेलित नहीं की गयी है तो सुरक्षित नाम रद्द कर दिया जाएगा और आवेदन करने वाला व्यक्ति एक लाख रुपये तक के जुर्माने का दायी होगा।

(b) यदि कम्पनी समामेलित हो गयी है तो रजिस्ट्रार कम्पनी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् कम्पनी को एक साधारण प्रस्ताव पास करके 3 माह की अवधि में नाम परिवर्तन करने का निर्देश देगा या कम्पनी रजिस्ट्रार से कम्पनी का नाम काटने की कार्यवाही करेगा या कम्पनी के समापन की पिटीशन दायर कर सकता है।

6, सीमानियम का प्रारूप-धारा 4(6) के अनुसार – किसी कम्पनी का पार्षद सीमानियम अनुसूची की तालिका A, B, C, D और E में निर्दिष्ट प्रारूप में होगा, जैसा भी उस कम्पनी की दशा में लागू हो ।

7, गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी की दशा में – धारा 4(7) के अनुसार गारण्टी द्वारा सीमित और अंशपूँजी न रखने वाली कम्पनी की दशा में पार्षद सीमानियम में कोई प्रावधान जो एक व्यक्ति को सदस्य के रूप में अलावा कम्पनी के लाभों में भाग लेने का अधिकार देता है तो ऐसा प्रावधान व्यर्थ होगा।

II, स्थान वाक्य – धारा 4(1) (b) के अनुसार इस वाक्य में कम्पनी को उस राज्य का नाम लिखना होता है, जिस राज्य में कम्पनी का रजिस्टर्ड ऑफिस स्थित होगा, किन्तु पार्षद सीमानियम में रजिस्टर्ड ऑफिस का पता लिखना आवश्यक नहीं होगा। कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 12 के रजिस्टर्ड ऑफिस के सम्बन्ध में प्रावधान निम्नलिखित हैं –

1, पंजीकृत कार्यालय – 2017 के संशोधित अधिनियम के अनुसार, एक कम्पनी का उसके समामेलन के 30 दिन के अन्दर एक रजिस्टर्ड ऑफिस होना चाहिए जहाँ ऐसी सभी सूचनाओं और सन्देशों को भेजा जा सके।

2, कार्यालय का सत्यापन करना – कम्पनी ऐसी विधि से जो विहित की जाए, उसके समामेलन के 30 दिनों के अन्दर, अपने रजिस्टर्ड ऑफिस का सत्यापन रजिस्ट्रार को प्रस्तुत करेगी।

3, नाम तथा पता अंकित करना- कम्पनी अपने सभी कारोबारी पत्रों, बिल शीर्षकों, नोटिसों, हुण्डी, विनिमय विपत्रों, प्रतिज्ञा पत्रों और अन्य सभी अधिकारिक प्रकाशनों में कम्पनी के नाम सहित रजिस्टर्ड ऑफिस का पता, निगमीय पहचान संख्या (CIN), टेलीफोन नम्बर, फैक्स नम्बर, ई-मेल नम्बर तथा वेबसाइट का पता मुद्रित कराएगी।

धारा 12(4) के अनुसार कम्पनी के समामेलन के पश्चात् यदि कम्पनी के रजिस्ट ऑफिस की स्थिति में कोई परिवर्तन किया जाता है

तो परिवर्तन के 30 दिन के अन्दर इस सूचना रजिस्ट्रार को देनी होगी। III, उद्देश्य वाक्य- पार्षद सीमानियम का उद्देश्य वाक्य कम्पनी का महत्वपूर्ण वाक् है। एक कम्पनी निम्नलिखित हेतु अपने उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन कर सकती है

(1) अपने व्यापार के अधिक कुशलतापूर्वक संचालन के लिए, अथवा

(2) नए साधनों से अपना मुख्य प्रयोजन प्राप्त करने के लिए,

अथवा

(3) अपने क्रियाकलापों के स्थानीय क्षेत्र में परिवर्तन के लिए, अथवा

(4) व्यापार के संचालन के लिए जो वर्तमान परिस्थितियों के अन्तर्गत लाभकारी रूप कम्पनी के व्यापार के साथ संयोजित किया जाता है, अथवा

(5) सीमानियम में विशिष्ट उद्देश्यों में से किसी को प्रतिबन्धित करने के लिए, अथवा

(6) कम्पनी की किसी इकाई के विक्रय के लिए, अथवा

(7) किसी अन्य कम्पनी या व्यक्तियों के निकाय के साथ एकीकरण के लिए।

धारा 8 के अधीन निर्मित कम्पनियों को छोड़कर प्रत्येक कम्पनी को सीमानियम में अपने प्रस्तावित समामेलन का उद्देश्य बताना होता है। एक कम्पनी अपने सीमानियम में दिए गए उद्देश्यों के बाहर कोई कार्य नहीं कर सकती है। यद्यपि एक कम्पनी अपने उद्देश्य स्वयं निर्धारित करती है किन्तु ये गैर-कानूनी, अवैध कम्पनी अधिनियम व लोक नीति के विरुद्ध नहीं होने चाहिए।

उद्देश्य वाक्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह —

(i) कम्पनी निर्माण के प्रयोजन और इसकी क्षमता निर्धारित करता है।

(ii) कम्पनी की गतिविधियों का क्षेत्र दर्शाता है।

(iii) कम्पनी की शक्तियों का क्षेत्र और सीमाएँ बताता है।

(iv) कम्पनी से व्यवहार करने वाले व्यक्तियों को इसकी गतिविधियों का कार्य विस्तार की जानकारी देता है।

IV, दायित्व वाक्य – सदस्य का दायित्व निम्नलिखित दो तरीकों से सीमित है सकता है –

1, अंशों द्वारा सीमित कम्पनी होने पर सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा धारित अंशों की अदत्त राशि तक सीमित होता है। अंशधारी द्वारा अपने अंशों के निर्गम मूल्य की समस्त राशि चुका देने पर उसका कम्पनी के प्रति दायित्व समाप्त हो जाता है।

2, गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी– धारा 2 (21) के अनुसार जब सदस्य का दायित्व उसके द्वारा दी गयी गारण्टी की राशि तक सीमित होता है तो उसे गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी कहते हैं।,

यदि अंशधारियों के दायित्व में बढ़ोतरी के लिए या अंश खरीद करने हेतु विवश करने के *लिए पार्षद सीमानियम में परिवर्तन किए जाते हैं तो ऐसा प्रत्येक परिवर्तन न केवल व्यर्थ मान जाएगा, बल्कि अंशधारी इससे बाध्य भी नहीं होंगे।,,

इस प्रकार की कम्पनियाँ अंश पूँजी वाली तथा बिना अंशपूँजी वाली दोनों ही हो सकती हैं।

V, पूँजी वाक्य – इस वाक्य में निम्नलिखित दो बातें होती है –

(1) इसमें ऐसी कम्पनी की पूँजी की राशि का उल्लेख होता है जिससे कम्पनी पंजीकृत होती है। इस पूँजी को अधिकृत पूँजी, पंजीकृत या नाममात्र की पूँजी कहते हैं।

(2) इसमें अभिदाताओं द्वारा लिए गए अंशों की संख्या का उल्लेख उनके नाम के साथ होता है। किसी भी अभिदाता द्वारा कम-से-कम एक अंश लेना अनिवार्य है।

VI, संघ अथवा अभिदान वाक्य – यह पार्षद सीमानियम का अन्तिम वाक्य है। इस वाक्य के द्वारा पार्षद सीमानियम में हस्ताक्षर होते हैं जोकि कम्पनी बनाने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

 

“पार्षद सीमानियम बदलाव (संशोधन)” से आप क्या समझते हैं? इसका क्या उद्देश्य (कारण) है? What do you understand by the “Alteration of articles of association”? What is its purpose?

निगमन से पहले या बाद में बहुत सी कम्पनियों को बाहरी दुनिया के साथ अपने सम्बन्धों को प्रबन्धित करने के लिए नियमों और विनियमों के एक समूह की आवश्यकता होती है और संगठन के अन्दर के आन्तरिक मामलों को नियन्त्रित करने के लिए भी। दो प्रासंगिक दस्तावेज जो एक कम्पनी के पास होने चाहिए वह MOA और AOA है। एसोसिएशन ऑफ एसोसिएशन (AOA) एक दस्तावेज है जो कम्पनी और उसके सदस्यों के बीच सम्बन्धों को परिभाषित करता है। यह कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्धन के लिए नियमों और विनियमों का पालन करता है। एक कम्पनी का AOA यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर कार्यों को कैसे पूरा किया जाना चाहिए, जिसमें निदेशकों की नियुक्ति की प्रक्रिया और वित्तीय रिकॉर्ड को सम्भालना शामिल है। इसके अलावा, एसोसिएशन (AOA) के लेखों में कोई भी परिवर्तन जोड़, विलोपन, संशोधन, प्रतिस्थापन या किसी अन्य तरीके से किया जा सकता है।

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(5) “एसोसिएशन के अनुच्छेद” को परिभाषित करती है। AOA में सभी नियम और कानून शामिल हैं जो कम्पनी की नीति को नियन्त्रित करते है। कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार, प्रत्येक कम्पनी का अपना AOA होना चाहिए। एसोसिएशन के अनुच्छेद में कम्पनी के उपनियम शामिल हैं। जैसे कि,

1, शेयर कैपिटल जिसमें शेयर कैपिटल का उपखण्ड शामिल है; शेयरों, शेयरों के हस्तान्तरण, और शेयरों में स्टॉक में रूपान्तरण, शेयरों का एक आत्मसमर्पण।

2, निदेशकों की योग्यता, नियुक्ति, पारिश्रमिक, शक्तियाँ और कार्यवाही। इसमें शेयरधारकों की आम बैठकों की कार्यवाही भी शामिल है।

3, शेयरधारक मतदान या प्रॉक्सी द्वारा या शेयरधारकों की आम बैठकों की कार्यवाही द्वारा मतदान के अधिकार हैं।

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 14 के अनुसार, एक कम्पनी विशेष प्रस्ताव पारित करके अपने AOA में उल्लिखित अपने लेखों को बदल सकती है। किसी कम्पनी के AOA में किया गया परिवर्तन 15 दिनों के भीतर लेखों की मुद्रित प्रति के साथ रजिस्ट्रार के पास दर्ज किया जाना चाहिए।

AOA को निम्न तरीकों से बदला जा सकता है –

1, लेखों के एक नए सेट को अपनाकर।

2, किसी भी एक नए लेख को जोड़ने या डालने से।

3, किसी भी लेख को हटाकर

4, किसी विशिष्ट नियम में संशोधन या प्रतिस्थापन करके।

किसी कम्पनी के AOA में फेरबदल करने के लिए आवश्यक विशिष्ट कदम है –

1, सबसे पहले, बोर्ड बैठक आयोजित करें और उस विशेष लेख को खोजें जिसमे परिवर्तन की आवश्यकता हो । परिवर्तन का मतलब केवल मौजूदा लेखों को बदलना नहीं है। इसमें किसी लेख को जोड़ना या हटाना भी शामिल हो सकता है। उसके बाद, इसके लिए एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया जाता है।

2, AOA के लेखों में किसी भी बदलाव को कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों और कम्पनी के MOA में निहित शर्तों का पालन करने की आवश्यकता है। आपको यह जांचने की आवश्यकता है कि इस तरह के कोई भी परिवर्तन के बाद किसी सदस्य के दायित्व या निष्कासन में वृद्धि नहीं हो।

3, प्रस्ताव को ठीक करने के लिए आम बैठक के लिए एक समय, तिथि और स्थल तय किया जाता है।

4, कम्पनी के सचिव को सामान्य बैठक की सूचना जारी करने के लिए अधिकृत किया जाता है।

5, इसके बाद, यदि आपकी कम्पनी के शेयरों को किसी भी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेज के साथ सूचीबद्ध किया गया है, तो AOA में स्टॉक एक्सचेंज में परिवर्तन के बारे में शेयरधारकों को सभी नोटिसों की अग्रेषित किया जाता है।

6, फॉर्म MGT-14ROC (कम्पनियों के रजिस्ट्रार) के पास दायर किया जाता है।

7, अन्त में, आप AOA की सभी प्रतियों में आवश्यक परिवर्तन कर सकते हैं।

एसोसिएशन के लेखों के परिवर्तन के कारण इस प्रकार हैं –

1, पब्लिक लिमिटेड कम्पनी के लिए एक प्राइवेट लिमिटेड का रूपान्तरण;

2, पब्लिक लिमिटेड का एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में रूपान्तरण

3, कम्पनी के नाम में परिवर्तन;

4, कोई अन्य संशोधन किया गया। एक कम्पनी के एसोसिएशन (AOA) के लेख एक कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्धन को नियन्त्रित करने वाले नियम और कानून हैं। AOA विभिन्न मामलों जैसे प्रबन्धन और शेयर पूँजी, शेयरधारक बैठकें, निदेशकों की नियुक्ति कम्पनी के खातों का प्रबन्धन और इसी तरह के मुद्दों को निष्पादित करने के लिए प्रक्रियाओं को निर्दिष्ट करता है।

कम्पनी का AOA Table F से J के अनुसार निर्धारित प्रारूप में होना चाहिए, जैसा कि कम्पनी पर लागू हो सकता है। एक को कम्पनी निगमन के समय अपने लेखों को पंजीकृत करना होता है। एक कम्पनी अपने प्रबन्धन के लिए आवश्यक होने के बाद अपने लेख में परिवर्तन के लिए जा सकती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 14 में कम्पनी के एसोसिएशन के लेख के परिवर्तन के प्रावधान है।

कम्पनी निम्नलिखित तरीकों से किसी भी लेख को संशोधित, हटा या जोड़ सकती है –

1, निदेशक मण्डल की बैठक – कम्पनी को निर्देशक मण्डल की बैठक बुलानी होती है। सभी निदेशकों को बोर्ड की बैठक के सात दिन के नोटिस दिए जाने चाहिए। बोर्ड को सदस्यों को प्रस्तावित परिवर्तन की सिफारिश करनी होगी। एक विशेष प्रस्ताव, जिसमें 75% बहुमत के साथ, बोर्ड द्वारा लेखों के किसी भी परिवर्तन को प्रभावी करने के लिए पारित किया जाना है। यदि प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया जाता है, तो यह संख्या कम से कम तीन गुना अधिक होनी चाहिए।

2, कम्पनी की सामान्य बैठक – कम्पनी को सामान्य बैठक या असाधारण बैठक (EGM) के लिए बुलाना चाहिए। बैठक की तारीख, समय और स्थान को निर्दिष्ट करने के लिए और लेन-देन करने के लिए कम्पनी को कम से कम 21 दिन का नोटिस देना होगा। एक EGM को वोट के हकदार कम से कम 95% सदस्यों की सहमति के साथ एक छोटे नाटिस के साथ बुलाया जा सकता है। कम्पनी के साथ निदेशकों, सदस्यों और लेखा परीक्षक को नोटिस भेजा जाना चाहिए। बैठक में निर्धारित कोरम, ऑडिटर की उपस्थिति (अन्यथा अनुपस्थिति को छोड़ना), AOA के परिवर्तन के लिए एक विशेष प्रस्ताव पारित करने के साथ आयोजित किया जाना चाहिए। कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुपालन में संशोधन या AOA के लिए परिवर्तन कम्पनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए। उदाहरण के लिए, परिवर्तन को कम्पनी की सदस्यता या हिस्सेदारी को संशोधित नहीं करना चाहिए। परिवर्तन कम्पनी के किसी भी सदस्य या शेयरधारक के दायित्व में वृद्धि या परिवर्तन नहीं करना चाहिए। लेख प्रक्रियात्मक हैं, और इसलिए परिवर्तन केवल प्रक्रियात्मक मामलों में ही हो सकते हैं। पार्षद सीमानियम का अनुपालन: लेखों का परिवर्तन कम्पनी के एसोसिएशन के ज्ञापन का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। परिवर्तन कम्पनी की वस्तुओं या कम्पनी को पंजीकृत कार्यालय के पते को बदल नहीं सकता है। इन मामलों को कम्पनी के पार्षद सीमानियम द्वारा निपटाया जाता है। AOA कम्पनी के सहयोग के ज्ञापन के अधीनस्थ हैं। परिवर्तन ज्ञापन द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अनुसार होना चाहिए।

3, कम्पनी की स्थिति को बदलना– कम्पनी की स्थिति में परिवर्तन से अंशधारकों अथवा हितधारकों की स्थिति में परिवर्तन नहीं होना चाहिए। ऐसे मामले में जहाँ परिवर्तन का प्रभाव किसी निजी कम्पनी को सार्वजनिक कम्पनी में या सार्वजनिक कम्पनी को निजी कम्पनी में परिवर्तित करने का होता है, वहीं यह सब केन्द्र सरकार के अनुमोदन के बिना नहीं किया जा सकता है।

 

पार्षद अन्तर्नियम का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definition of Articles of Association)

 

पार्षद अन्तर्नियम कम्पनी का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रलेख होता है जो समामेलन हेतु रजिस्ट्रार के पास दाखिल कराया जाता है। एक कम्पनी के पार्षद अन्तर्नियम इसके उपनियम अथवा नियम एवं विनियम होते हैं जो इसके आन्तरिक मामलों के प्रबन्ध और इसके व्यवसाय के व्यवहारों को शासित करते हैं। पार्षद सीमानियम में कम्पनी का कार्यक्षेत्र और शक्तियाँ निर्दिष्ट की जाती है तथा पार्षद अन्तर्नियमों में नियमों एवं उपनियमों की व्याख्या की जाती है जो सीमानियम द्वारा निर्धारित सीमाओं के द्वारा कार्य करते हुए इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।

(1) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(5) के अनुसार, “पार्षद अन्तर्नियम से अभिप्राय एक कम्पनी के ऐसे प्रलेख से है जो पिछले कम्पनी अधिनियमों अथवा इस अधिनियम के अधीन मूल रूप से बनाया गया अथवा समय-समय पर परिवर्तित किया गया है।”

(2) न्यायाधीश चार्ल्सवर्थ के अनुसार, “पार्षद अन्तर्नियम एक प्रपत्र है जो कम्पनी के सदस्यों के बीच पारस्परिक अधिकारों तथा उस विधि का नियमन करता है जिसके अनुसार कम्पनी का व्यापार चलाया जाएगा।

अन्तर्नियमों का अनिवार्य होना – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 5 (1) तथा 7(1) के अनुसार, प्रत्येक कम्पनी के लिए अनिवार्य है कि वह अपने अन्तर्नियमों का निर्माण करे तथा इसकी छपी हुई प्रति कम्पनियों के रजिस्ट्रार के पास दाखिल कराए।

 

पार्षद अन्तर्नियमों की आवश्यकता (Need of Articles of Association)

 

यह कम्पनी का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रलेख है जिसे समामेलन हेतु रजिस्ट्रार के पास प्रस्तुत करना होता है। अन्तर्नियमों के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

1, उद्देश्य प्राप्ति में सहायक – सीमानियम उन उद्देश्यों को स्पष्ट करता है जिनके लिए कम्पनी की स्थापना की गई है, जबकि अन्तर्नियम उन नियमों एवं उपनियमों की व्याख्या करता है जो उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। इस प्रकार अन्तर्नियम कम्पनी के उद्देश्य प्राप्ति में सहायक होते हैं।

2, रजिस्ट्रेशन हेतु आवश्यक – अंशों द्वारा सीमित दायित्व वाली कम्पनी को छोड़कर प्रत्येक कम्पनी के रजिस्ट्रेशन के लिए अन्तर्नियम तैयार करना व रजिस्ट्रार के पास प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इसके अभाव में अंशों द्वारा सीमित दायित्व वाली कम्पनी पर ‘तालिका ” के नियम लागू होते हैं।

3, सार्वजनिक प्रलेख – पार्षद अन्तर्नियम एक सार्वजनिक प्रलेख है अर्थात् इसे कोई भी व्यक्ति देख सकता है। इसी आधार पर यह माना जाता है कि कम्पनी के साथ व्यवहार करने वाले प्रत्येक पक्षकार को इस प्रलेख की समुचित जानकारी है।

4, पारस्परिक समझौता- पार्षद अन्तर्नियम, कम्पनी एवं सदस्यों जो दोनों पक्षकारों को परस्पर बाध्य करता है। मध्य ठहराव है |

5, आन्तरिक प्रबन्ध संचालन में सहायक – इससे कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध संचालन में सुविधा रहती है क्योंकि आन्तरिक प्रबन्ध व्यवस्था से सम्बन्धित नियमों व उपनियमों का उल्लेख अन्तर्नियमों में ही होता है।

क्या प्रत्येक कम्पनी के लिए पार्षद अन्तर्नियम को तैयार करना अनिवार्य है। (Is it necessary to have its own Articles of Association)

भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार, प्रत्येक कम्पनी को अपने अन्तर्नियम तैयार करना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई अंशों द्वारा सीमित सार्वजनिक कम्पनी अन्तर्नियम तैयार नहीं करती, तो उस पर सारणी ‘एफ’ (Table F) के समस्त नियम लागू होंगे। इस सारणी में 90 नियम दिए गए हैं। यदि पार्षद अन्तर्नियम कम्पनी के समामेलन के समय प्रस्तुत नहीं किए जाते हैं तो पार्षद सीमानियम के ऊपर ‘बिना अन्तर्नियमों के रजिस्टर्ड’ (Registered without Articles) लिखा रहना चाहिए।

(i) निजी कम्पनियों, (ii) गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनियों तथा (iii) असीमित दायित्व वाली कम्पनियों को अपने अन्तर्नियम प्रस्तुत करना अनिवार्य है। एक व्यक्ति वाली कम्पनी अपने अन्तर्नियम फाइल करने के लिए स्वतन्त्र है या सारणी F, G या H में दिए गए आदर्श अन्तर्नियम अपना सकती है।

 

अन्तर्नियमों का मॉडल प्रारूप (Model Format of Association) )

 

अधिनियम की अनुसूची-I में अनेक प्रकार की कम्पनियों हेतु अनेक प्रकार के अन्तर्नियमों के प्रारूप के मॉडल दिए गए हैं। अनुसूची को अलग-अलग सारणियों में विभाजित किया गया है जो विभिन्न प्रकार की कम्पनियों हेतु अन्तर्नियमों के आदर्श प्रारूप का कार्य करती हैं—

1, अंशों द्वारा सीमित सार्वजनिक कम्पनी के अन्तर्नियम – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 5 (7) के अनुसार, अंशों द्वारा सीमित सार्वजनिक कम्पनी अधिनियम द्वारा बनाए गए अन्तर्नियमों के मॉडल प्रारूप में दिए गए अथवा कुछ प्रावधानों को अपना सकती है।

अतः उपर्युक्त कम्पनी द्वारा –

(i) इस अधिनियम के प्रावधानों में उल्लेख अथवा पार्षद सीमानियम के अधीन कम्पनी स्वयं ही अपने अन्तनियमों का निर्माण एवं पंजीकरण करा सकती है; अथवा

(ii) तालिका F में उल्लेख अन्तर्नियमों के मॉडल प्रारूप के सभी अथवा किन्हीं नियमों को अपना सकती है; अथवा

(iii) आंशिक रूप से तालिका में उल्लेख मॉडल प्रावधानों और शेष के स्वयं बनाए गए अन्तर्नियमों को अपना सकती है।

2, निजी कम्पनी से सम्बन्धित अन्तर्नियम – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(68) में उल्लेख प्रतिबन्धों को शामिल करते हुए एक निजी कम्पनी अपने स्वयं के अन्तर्नियमों को अपना सकती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 5(1) तथा 7(1) के अनुसार सभी कम्पनी को अपने अन्तर्नियम बनाना अनिवार्य है। यदि प्रस्तावित कम्पनी इन प्रतिबन्धों का पालन किए बिना ही अपने अन्तर्नियमों को बनाती है तो उसे निजी कम्पनी का दर्जा नहीं दिया जाएगा।

एक निजी कम्पनी अन्तर्नियमों में निम्नलिखित प्रावधानों को सम्मिलित करें –

(i) उसे अपने अंशों के हस्तान्तरण पर प्रतिबन्ध लगाना होता है।

(ii) एक व्यक्ति कम्पनी को छोड़कर किसी अन्य कम्पनी में सदस्यों की संख्या 200 अधिक नहीं होनी चाहिए।

निम्नलिखित व्यक्ति कम्पनी के सदस्य नहीं माने जाएँगे –

(a) ऐसे व्यक्ति, जो कम्पनी में कार्यरत हैं तथा

(b) ऐसे व्यक्ति, जो कम्पनी के भूतपूर्व कर्मचारी थे, जो कर्मचारी होते हुए भी कम्पनी के सदस्य थे तथा रोजगार के समाप्त होने के बाद भी कम्पनी के सदस्य हैं।

(iii) उसे अपनी प्रतिभूति क्रय करने के लिए जनता को आमन्त्रित करने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

3, गारण्टी द्वारा सीमित तथा असीमित दायित्व वाली कम्पनियों के अन्तर्नियम – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 5 (6) के अनुसार, अंशों द्वारा सीमित कम्पनी को छोड़कर कोई भी कम्पनी अनुसूची-I की तालिका G, H, I तथा J में उल्लेख प्रारूपों में से किसी भी प्रारूप को अपना सकती है तथा अपने अन्तर्नियमों का निर्माण कर सकती है। बिना अंश पूँजी वाली कम्पनियाँ अधिनियम में उल्लेख निम्न में से किसी भी रूपरेखा को अपनाते हुए अन्तर्नियमों का निर्माण कर सकती हैं—

तालिका G – अंश पूँजी वाली गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के अन्तर्नियम वर्णित हैं।

तालिका H – बिना अंश पूँजी वाली गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी के अन्तर्नियम वर्णित हैं।

तालिका I – अंश पूँजी वाली असीमित कम्पनी के अन्तर्नियम वर्णित हैं।

तालिका J – बिना अंश पूँजी वाली असीमित कम्पनी के अन्तर्नियम वर्णित हैं।

4, अन्तर्नियमों का छपा हुआ अथवा हस्ताक्षरित होना – कम्पनी के अन्तर्नियमों का छपा हुआ तथा पैराग्राफ में बँटा हुआ होना अनिवार्य है। इन पैराग्राफों पर क्रम संख्या भी अंकित होनी चाहिए। इस पर उन सभी व्यक्तियों के हस्ताक्षर कम-से-कम एक गवाह की उपस्थिति में होना अनिवार्य है जिनके पार्षद सीमानियम पर हस्ताक्षर हैं। इसमें हस्ताक्षरकर्त्ताओं का पता, व्यवसाय तथा विवरण भी होना चाहिए।

 

अन्तर्नियमों की विषय सामग्री

अन्तर्नियम में कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध से सम्बन्धित नियमों, उपनियमों तथा प्रावधानों का वर्णन होता है। कम्पनी अपने आन्तरिक प्रबन्ध के लिए जो भी चाहे नियम व उपनियम बना सकती है। हाँ, अन्तर्नियम के नियम, उपनियम व अन्य प्रावधान कम्पनी अधिनियम तथा सीमानियम के प्रावधानों के विपरीत न हीं। कम्पनी के सामान्य कानून जननीति के सिद्धान्तों का विरोध न करते हों तथा कम्पनी के उद्देश्यों की पूर्ति को सुगम व कार्यों में कुशलता प्रदान करते हों।

 

सामान्यतया एक कम्पनी के अन्तर्नियमों की विषय सामग्री निम्नलिखित है—

(1) अन्तर्नियमों में कम्पनी अधिनियम की तालिका F, G व H लागू होंगी।

(2) अंश पूँजी की कुल राशि तथा उसका विभिन्न प्रकार के अंशों में विभाजन|

(3) अंशों के आवंटन की विधि।

(4) अंशों की याचना राशि एवं याचना विधि।

(5) अंश प्रमाण-पत्र निर्गमन करने की विधि।

(6) दो याचनाओं के बीच अन्तराल की स्पष्टता।

(7) अंश-पूँजी के पुनर्गठन की विधि।

(8) अंश के हरण एवं पुनर्निर्गमन की विधि।

(9) अंशों के हस्तान्तरण एवं हस्तांकन की विधि।

(10) न्यूनतम अभिदान की राशि का निर्धारण करना।

(11) अंशों के पुनर्क्रय का अधिकार।

(12) संचालकों की नियुक्ति, पारिश्रमिक, कर्त्तव्य एवं अधिकार सम्बन्धी नियम|

(13) अंश-पूँजी में परिवर्तन तथा कमी सम्बन्धी नियम|

(14) अंशों का अभौतिकीकरण।

(15) अंशों का स्टॉक में तथा स्टॉक का अंशों में परिवर्तन सम्बन्धी नियम

(16) संचालक मण्डल तथा अंशधारियों की सभाओं से सम्बन्धित नियम।

(17) प्रारम्भिक प्रसंविदे के पुष्टिकरण की विधि |

(18) ऋण लेने के अधिकार एवं ऋणपत्रों का निर्गमन

(19) अभिगोपकों के कमीशन के भुगतान की विधि।

(20) सभाओं के आयोजन एवं सदस्यों को सूचना देने की विधि |

(21) प्रस्तावों से सम्बन्धित नियम|

(22) सदस्यों के मताधिकार और प्रॉक्सी सम्बन्धी नियम

(23) लाभांश की घोषणा एवं उसके भुगतान सम्बन्धी नियम

(24) प्रबन्धक, प्रबन्ध संचालक, पूर्णकालिक संचालक एवं सचिव का पूर्ण विवरण।

(25) सार्वमुद्रा के प्रयोग सम्बन्धी नियम।

(26) लेखा-पुस्तकों के रखने एवं लिखने की विधि।

(27) अंकेक्षक की नियुक्ति एवं उसका पारिश्रमिक।

(28) लाभों का पूँजीकरण।

(29) संचिति एवं कोषों के निर्माण के नियम।

(30) कम्पनी के समापन की विधि।

 

अन्तर्नियमों का परिवर्तन (Alteration of Articles of Association)

 

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 14 के अनुसार, एक कम्पनी को अपने अन्तर्नियमों में परिवर्तन करने के लिए वैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई भी नियम अप्रभावी एवं व्यर्थ होगा जिसके अनुसार किसी विशेष व्यक्ति की सहमति के बिना अन्तर्नियमों के किसी भी प्रावधान में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

न्यायाधिकरण के आदेश के अधीन अन्तर्नियमों का परिवर्तन कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 के अधीन किसी सदस्य के आवेदन पर कम्पनी में अनुचित आचरण तथा कुप्रबन्ध के विरुद्ध शिकायत को दूर करने के लिए न्यायाधिकरण कम्पनी को अपने अन्तर्नियमो में परिवर्तन का आदेश दे सकता है। कम्पनी को इस आदेश को प्रमाणित प्रति 1 माह के अन्दर रजिस्ट्रार के पास भेजनी चाहिए।

अन्तर्नियमों में परिवर्तन की शक्ति की सीमाएँ-एक कम्पनी कुछ सीमाओं के भीतर रहते हुए ही अपने अन्तर्नियमों को परिवर्तित कर सकती है, जो निम्नलिखित हैं –

The Companies Act 2013

1, अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप – अन्तर्नियमों में परिवर्तन करते समय इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि परिवर्तन अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए। कोई भी परिवर्तन, जो अधिनियम द्वारा स्पष्ट अथवा गर्भित रूप से व्यर्थ घोषित कर दिया जाएगा।

2, सीमानियम का विरोध नहीं होना चाहिए – परिवर्तन के माध्यम से सीमानियम को न तो विस्तार प्रदान किया जा सकता है और न ही इन्हें संशोधित किया जा सकता है। पार्षद सीमानियम एक श्रेष्ठ एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। अतः अन्तर्नियमों के प्रावधान इन पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं कर सकते हैं। संक्षेप में, अन्तर्नियमों में किया गया ऐसा कोई भी परिवर्तन शून्य, व्यर्थ एवं अप्रभावी हो जाता है जिससे या तो सीमानियम का उल्लंघन होता है या फिर जिसके परिणामस्वरूप सीमानियम को परिवर्तित करना पड़ता है। अन्त में, अन्तर्नियमों द्वारा उन कार्यों को करने की शक्ति भी प्रदान नहीं की जा सकती जो सीमानियम द्वारा प्रतिबन्धित हैं।

3, न्यायाधिकरण की धारा 241 तथा 242 के आदेश का असंगत न होना – अन्तर्नियमों में परिवर्तन न्यायाधिकरण के आदेश से असंगत नहीं होना चाहिए।

4, वैधानिक कार्य हेतु अनुमति नहीं दी जा सकती – कोई कम्पनी किसी अवैधानिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए अन्तर्नियमों में परिवर्तन नहीं कर सकता है। अन्तर्नियमों परिवर्तन करने के लिए यह आवश्यक है कि परिवर्तन कानूनी हो।

5, परिवर्तन करने हेतु केन्द्र सरकार की अनुमति हो – कम्पनी के अन्तर्नियमों में परिवर्तन करके सार्वजनिक कम्पनी को निजी कम्पनी में तब तक नहीं बदला जा सकता है जब तक केन्द्र सरकार से इसकी अनुमति प्राप्त न कर ली जाए। यदि ऐसे परिवर्तन के लिए केन्द्र सरकार अपनी अनुमति दे देती हैं तो ऐसी दशा में कम्पनी द्वारा अनुमति 30 दिन के अन्दर परिवर्तित अन्तर्नियमों की छपी हुई प्रति रजिस्ट्रार के पास भेजनी आवश्यक है। [धारा-14]

6, केवल विशेष प्रस्ताव द्वारा परिवर्तन होना – अधिनियम में उल्लिखित प्रावधानों के अनुसार अन्तर्नियमों में परिवर्तन केवल विशेष प्रस्ताव द्वारा ही सम्भव है। यदि कम्पनी ने अपने अन्तर्नियमों में यह व्यवस्था कर भी रखी है कि सामान्य प्रस्ताव द्वारा अन्तर्नियमों में परिवर्तन किया जा सकता है तो भी सामान्य प्रस्ताव द्वारा अन्तर्नियमों में परिवर्तन मान्य नहीं होगा।

7, परिवर्तन के कारण अनुबन्ध खण्डित नहीं होना चाहिए- कम्पनी अपने अन्तर्नियमों में कोई भी ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती है जिससे कम्पनी का अनुबन्ध भंग हो अथवा इस उद्देश्य से किया गया हो कि अनुबन्ध से उत्पन्न दायित्वों की पूर्ति से बचाव हो सके।

8, सदस्यों के दायित्वों की वृद्धि न होना – कोई भी परिवर्तन पार्षद सीमानियम अथवा पार्षद अन्तर्नियम में नहीं किया जा सकता है जिसके अनुसार कम्पनी के दायित्वों को उसके सदस्यों के दायित्वों को बढ़ाकर पूरा किया जा सके, परन्तु यदि सदस्य अथवा सदस्यों द्वारा ऐसे परिवर्तन के सम्बन्ध में परिवर्तन से पहले या परिवर्तन के बाद लिखित सहमति प्रदान कर दी जाती है तो ऐसा सम्भव है।

9, परिवर्तन कम्पनी के हित में होना चाहिए- अन्तर्नियमों में किया जाने वाला ‘परिवर्तन तब ही मान्य होगा जब वह पूर्ण रूप से कम्पनी के हित में हो।

10, परिवर्तन न्यायसंगत होना चाहिए – अन्तर्नियमों में परिवर्तन करते समय यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है कि परिवर्तन न्यायसंगत होना चाहिए। यदि परिवर्तन बहुमत वाले अंशधारियों को अल्पमत अंशधारियों की लागत पर लाभ के लिए है तो ऐसा परिवर्तन अवैध व व्यर्थ माना जाएगा।

11, अन्तर्नियमों को अपरिवर्तनीय नहीं बनाया जा सकता है – अन्तर्नियमों में कोई भी परिवर्तन ऐसा नहीं किया जा सकता है जिससे अन्तर्नियमों की किसी व्यवस्था या प्रावधान को अपरिवर्तनीय बनाया जा सके। इसके लिए कानून मान्यता नहीं देता है।

The Companies Act 2013

पार्षद सीमानियम में परिवर्तन (Alteration in Memorandum of Association)

 

सामान्यतः पार्षद सीमानियम कम्पनी का एक अपरिवर्तनशील अधिकार पत्र (Charter) कहलाता है, परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसमें परिवर्तन किया ही नहीं जा सकता। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 13 में यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी कम्पनी अपने पार्षद सीमानियम में दी हुई शर्तों में परिवर्तन केवल अधिनियम में दी हुई स्पष्ट दशाओं, निर्धारित तरीकों एवं निर्धारित सीमाओं के अतिरिक्त नहीं कर सकती है। इस प्रकार का परिवर्तन कुछ दशाओं में अंशधारियों के बहुमत से कुछ दशाओं में कम्पनी विधान मण्डल की अनुमति प्राप्त होने पर कुछ दशाओं में केन्द्रीय सरकार की सहमति प्राप्त करके और साथ में कम्पनी के सदस्यों की सभा में आवश्यक प्रस्ताव पारित होने पर ही किया जा सकता है। पार्षद सीमानियम के विभिन्न वाक्यों (Clause) को निम्नलिखित प्रकार से परिवर्तित किया जा सकता है –

1, नाम वाक्य में परिवर्तन (Change in Name Clause) कम्पनी के नाम में कोई परिवर्तन धारा 4 की उपधारा (2) और (3) के प्रावधानों के अनुसार होगा एवं केन्द्र सरकार की लिखित अनुमति के बिना प्रभावी नहीं होगा, परन्तु ऐसी अनुमति आवश्यक नहीं होगी जहाँ नाम में केवल उससे ‘निजी’ शब्द को जोड़ने अथवा घटाने के सम्बन्ध में है जो एक कम्पनी को दूसरी कम्पनी में परिवर्तित करने के कारण इस अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत हुआ है।

जहाँ उप-धारा (2) के अन्तर्गत नाम में परिवर्तन किया जाता है तो रजिस्ट्रार कम्पनी रजिस्टर में पुराने नाम के स्थान पर नया नाम लिख देगा और नए नाम के साथ एक नया समामेलन का प्रमाण-पत्र जारी करेगा। नाम में परिवर्तन केवल ऐसा प्रमाण-पत्र जारी करने पर पूर्ण एवं प्रभावी होगा।

केन्द्रीय सरकार के निर्देश पर कम्पनी के नाम को ठीक करना (धारा 16) यदि भूल या अन्य कारण से पहली बार या नए नाम से कम्पनी का पंजीकरण किसी ऐसे नाम से हो जाए जो सरकार की राय में विद्यमान कम्पनी के नाम जैसा है या उससे अधिक मिलता-जुलता हैं तो केन्द्र सरकार, कम्पनी को नाम में परिवर्तन करने का निर्देश दे सकती है और कम्पनी ऐसे निर्देश के जारी होने के तीन माह में एक साधारण प्रस्ताव पारित करके इसका नाम या नया नाम बदल लेगी, जैसी भी स्थिति हो।

2, रजिस्टर्ड कार्यालय वाक्य में परिवर्तन (Change in Registered Office Clause) [धारा 12] – इस वाक्य में परिवर्तन की निम्नलिखित तीन दशाएँ हो सकती हैं –

(i) एक कम्पनी अपने रजिस्टर्ड कार्यालय को एक ही शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाती है तो इसे पार्षद सीमानियम का परिवर्तन नहीं माना जाता है। इसके लिए केवल संचालक मण्डल द्वारा प्रस्ताव पास किया जाता है तथा इसकी सूचना 30 दिन के अन्दर रजिस्ट्रार को दी जाती है।

(ii) एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान पर कम्पनी का रजिस्टर्ड कार्यालय ले जाना – यदि कम्पनी एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपना रजिस्टर्ड कार्यालय ले जाना चाहती है तो उसे इसके बारे में विशेष प्रस्ताव पास करना पड़ेगा एवं ऐसे परिवर्तन हेतु क्षेत्रीय निदेशक द्वारा परिवर्तन की पुष्टि अनिवार्य होगी। इसके लिए कम्पनी निर्धारित प्रारूप में क्षेत्रीय निदेशक (Regional Director) को एक प्रार्थना पत्र देगी एवं प्रार्थना पत्र प्राप्त करने की तिथि से 30 दिन (चार सप्ताह) के अन्दर क्षेत्रीय निदेशक द्वारा पुष्टिकरण की सूचना दी जाएगी।

(iii) एक राज्य से दूसरे राज्य में रजिस्टर्ड कार्यालय ले जाना – यदि कम्पनी अपने रजिस्टर्ड कार्यालय को एक राज्य से दूसरे राज्य में किसी स्थान पर ले जाना चाहती है तो एक विशेष प्रस्ताव इसके लिए पास कराया जाता है और केन्द्रीय सरकार की स्वीकृति लेनी पड़ती है। केन्द्र सरकार उपधारा (4) के अन्तर्गत प्रार्थना पत्र का 60 दिन के अन्दर निपटान कर देती है, परन्तु कार्यालय परिवर्तन की आज्ञा देने से पूर्व इस बात की पूर्ण सन्तुष्टि कर लेती है कि प्रस्तावित परिवर्तन का लेनदारों एवं ऋणपत्रधारियों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेगा तथा लेनदारों एवं ऋणपत्रधारियों की लिखित सहमति प्राप्त कर ली गई है और सहमति न मिलने पर उनके ऋणों का भुगतान अथवा उन्हें सन्तुष्ट कर दिया गया है। इसके पश्चात् केन्द्रीय सरकार द्वारा उक्त परिवर्तन को अनुमोदित करने के आदेश की प्रमाणित प्रति एवं विशेष प्रस्ताव की प्रतिलिपि सम्बन्धित कम्पनी द्वारा निर्दिष्ट समय तथा प्रारूप में दोनों राज्यों के रजिस्ट्रार के पास फाइल की जाती है, जो इसे पंजीकृत करते हैं एवं जिस राज्य में पंजीकृत कार्यालय स्थानान्तरित किया जा रहा है उस राज्य का रजिस्ट्रार परिवर्तन प्रकट करते हुए समामेलन का नया प्रमाण पत्र जारी करेगा। अन्त में रजिस्टर्ड कार्यालय परिवर्तित नए स्थान पर स्थानान्तरित कर दिया जाएगा तथा स्थान परिवर्तन की सूचना परिवर्तन के 15 दिनों के अन्दर नए पते सहित नए रजिस्ट्रार को प्रेषित कर दी जाएगी।

3, उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Object Clause) (धारा 13) – धारा 61 में किए गए प्रावधानों को छोड़ कर कम्पनी विशेष प्रस्ताव पारित करके और इस धारा में निर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुपालन करके अपने उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन कर सकती है।

(i) उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन के लिए विशेष प्रस्ताव पारित करना – कम्पनी जिसने प्रविवरण के माध्यम से जनता से धन एकत्रित किया है और अभी तक उस धन का उपयोग नहीं किया है तो जिस उद्देश्य के लिए कम्पनी ने प्रविवरण के द्वारा धन इकट्ठा किया है तब तक उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन नहीं कर सकती जब तक कि कम्पनी द्वारा विशेष प्रस्ताव पारित न किया जाए एवं

(ii) विवरण समाचार पत्रों में प्रकाशित करना – उपर्युक्त पारित विशेष प्रस्ताव के सम्बन्ध में निर्धारित विवरण समाचार पत्रों (एक अंग्रेजी में और एक स्थानीय भाषा) में प्रकाशित किया जाएगा जो उस स्थान पर परिचारित है जहाँ कम्पनी का पंजीकृत कार्यालय स्थापित है एवं कम्पनी की वेबसाइट पर भी, यदि कोई है, ऐसे परिवर्तन के औचित्य को सूचित करना होगा, एवं

(iii) असन्तुष्ट अंशधारियों को कम्पनी छोड़ने का अवसर प्रदान करना – ऐसे अंशधारी जो प्रस्तावित परिवर्तन से असहमत हों उन्हें प्रवर्तकों एवं नियन्त्रण रखने वाले अंशधारियों द्वारा सेबी (SEBI) द्वारा नियमित नियमों के अनुसार कम्पनी छोड़ने का अवसर प्रदान किया जाएगा।

(iv) परिवर्तन का रजिस्ट्रार द्वारा पंजीकरण – कम्पनी रजिस्ट्रार पार्षद सीमानियम के उद्देश्य वाक्य में हुए किसी भी परिवर्तन को पंजीकृत करेगा एवं विशेष प्रस्ताव फाइल करने की तिथि के 30 दिन के अन्दर पंजीकरण को प्रमाणित करेगा।

(v) परिवर्तन, बिना पंजीकरण – के प्रभावी नहीं इस धारा अन्तर्गत किया गया कोई भी परिवर्तन तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि उसे इस धारा के प्रावधानों के अनुसार पंजीकृत न किया जाए।

(vi) कुछ दशाओं में गारण्टी वाली कम्पनी के उद्देश्य वाक्य में परिवर्तन वैध नहीं – गारण्टी द्वारा सीमित कम्पनी एवं जिस कम्पनी के पास अंश पूँजी नहीं है, उसके सीमा नियम के परिवर्तन की दशा में ऐसा परिवर्तन अवैध होगा जो उसे सदस्य के अन्यथा लाभों हिस्सा देने का अधिकार देता हो।

4, दायित्व वाक्य में परिवर्तन (Alteration in Liability Clause) (धारा 7 धारा 18] – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 7 के अनुसार कम्पनी के सदस्यों दायित्व में परिवर्तन दो प्रकार से किया जा सकता है- (i) अधिकरण के आदेश द्वारा एक (ii) स्वेच्छा से ।

धारा 18 के अनुसार, एक सीमित दायित्व वाली कम्पनी अपना नया पंजीकरण कराके अपना दायित्व असीमित करा सकती है। इसी प्रकार से एक असीमित दायित्व वाली कम्पनी भी इस अधिनियम के प्रावधानों का अनुपालन करके अपने आपको सीमित कम्पनी के रूप में पंजीकृत करा सकती है। रजिस्ट्रार पुराने पंजीकरण को निरस्त करके नया पंजीकरण कर लेगा एवं कम्पनी पंजीकरण का नया प्रमाण पत्र जारी कर देता है। इस धारा अन्तर्गत नए पंजीकरण के कारण कम्पनी के पुराने दायित्वों अथवा अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जैसे कि नया पंजीकरण किया ही न गया हो। असीमित कम्पनी को सीमित कम्पनी में परिवर्तित करने पर धारा 65 के अन्तर्गत सुरक्षित अंश पूँजी का भी प्रावधान करना पड़ता है।

The Companies Act 2013

अधिकारातीत का सिद्धान्त (Doctrine of Ultra Vires)

 

Ultra’ शब्द का आशय ‘बाहर’ और ‘Vires’ शब्द का आशय ‘शक्तियों’ से होता हैं। इस प्रकार Ultra Vires’ का शाब्दिक अर्थ ‘शक्ति के बाहर’ (beyond the power) से होता है। ‘उद्देश्य वाक्य’ की परिधि से बाहर के कार्य व्यर्थ होते हैं अर्थात् इनका कोई विधिक परिणाम नहीं होता है। न तो कम्पनी और न ही अन्य अनुबन्ध करने वाला पक्षकार इसके अनुपालन के लिए वाद दायर कर सकते हैं। कम्पनी के सभी सदस्यों के सहमत हो जाने पर भी कम्पनी इसे वैध नहीं बना सकती है। इस नियम का उद्देश्य कम्पनी के अंशधारियों और लेनदारों को सुरक्षा प्रदान करना है। किन्तु यदि कार्य संचालकों की शक्ति के बाहर है तो अंशधारी इसको पुष्टि कर सकते हैं और यदि यह कार्य पार्षद अन्तर्नियमों के अधिकारातीत है तो कम्पनी अपने अन्तर्नियमों में परिवर्तन कर इसे वैध बना सकती है। अधिकारातीत का सिद्धान्त हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा एशबरी रेलवे । एण्ड आइरन कं० बनाम रिचे (1878) के मामले में प्रथम बार प्रकाश में आया। इस मामले में कम्पनी के उद्देश्य वाक्य में इसके उद्देश्य इस प्रकार निर्दिष्ट थे –

“The object for which the company is established are to make and sell or lend on hire railway carriages and wagons and all kinds of railway plants etc, to carry on its business of mechanical engineers, and general contractors,,,,,,,,,,,,,,”,

बाद में कम्पनी ने रेलवे ठेकेदारों की एक फर्म रिचे (Riche) के साथ बेल्जियम में रेलवे लाइन के निर्माण के वित्त पोषण के लिए एक अनुबन्ध किया। बाद में कम्पनी ने अधिकारातीत होने के आधार पर अनुबन्ध अपनाने से इनकार कर दिया। रिचे ने अनुबन्ध भंग के

लिए इस आधार पर कम्पनी पर वाद दायर कर दिया कि अनुबन्ध कम्पनी की शक्तियों के अन्तर्गत था क्योंकि ‘general contractors’ एक व्यापक शब्द है तथा अंशधारियों के बहुमत ने प्रसंविदे की पुष्टि कर दी थी। इस वाद पर विद्वान न्यायाधीश लॉर्ड केर्न्स एल० सी० ने अवधारित किया कि ‘general contractors’ शब्द का आशय यान्त्रिक इन्जीनियरिंग का व्यवसाय से है, न कि निर्माण के वित्त पोषण से। अतः यह अनुबन्ध सीमानियम में निर्दिष्ट उद्देश्यों के पूर्णतया बाहर है, अतः यह कम्पनी की शक्तियों के बाहर कार्य है, अतः यह अनुबन्ध व्यर्थ है। ऐसे अनुबन्ध की अंशधारियों की पुष्टि भी इसे वैध नहीं बना सकती।

The Companies Act 2013

अधिकारातीत सौदों के परिणाम (Consequences of Ultra Vires Transactions)

एक अधिकारातीत सौदे के परिणाम निम्नवत् होंगे—

1, निषेधाज्ञा आदेश (Injunction Order) – यदि कोई कम्पनी अधिकारातीत सौदा करती हैं तो कम्पनी का कोई भी सदस्य कम्पनी के विरुद्ध निषेधाज्ञा आदेश प्राप्त कर सकता है जो कि उसे उस सौदे पर आगे कारवाई पर रोक लगाएगा।

2, संचालकों का व्यक्तिगत दायित्व (Personal Liability of Directors) – कम्पनी के संचालकों का यह कर्तव्य है कि वे कम्पनी के कोषों को सीमानियम में उल्लिखित उद्देश्यों को पूरा करने में ही उपयोग करें। यदि कोई संचालक कम्पनी के कोषों का प्रयोग उसके उद्देश्यों के क्षेत्र के बाहर प्रयोजन के लिए करता है तो वह उस धनराशि की प्रतिपूर्ति के लिए व्यक्तिगत रूप से दायी होगा। अंशधारी ऐसे संचालक के विरुद्ध, कम्पनी को वाद का पक्षकार बनाये बिना, वाद दायर करके उसे उस धनराशि को लौटाने के लिए विवश कर सकते हैं जो उसने अधिकारातीत सौदों में त्रुटिवश लगायी थी।

3, प्राधिकार की वारंटी का उल्लंघन (Breach of Warranty of Authority) – एक कम्पनी के संचालक मूलतः इसके एजेन्ट होते हैं। अतः उनका यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वे उन्हें कम्पनी द्वारा प्रदान की गई शक्तियों की सीमाओं के अधीन ही कार्य करें। यदि वे कम्पनी की ओर से कम्पनी की शक्तियों के बाहर मामलों पर किसी बाहरी व्यक्ति से अनुबन्ध करते हैं तो तृतीय पक्षकारों को हुई हानि के लिए संचालक व्यक्तिगत रूप से दायी होंगे क्योंकि उन्होंने अपने प्राधिकार की वारंटी उल्लंघन किया है।

4, अधिकारातीत प्राप्त सम्पत्ति (Ultra Vires Acquired Property) – यदि कम्पनी के कोषों का प्रयोग किसी सम्पत्ति के क्रय के लिए अधिकारातीत किया है, फिर भी कम्पनी का उस सम्पत्ति पर अधिकार निरपेक्ष व पूर्ण होगा क्योंकि उस सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाए गए कोष निगमीय पूँजी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके स्वामी अनेक अंशधारी हैं।

The Companies Act 2013

आन्तरिक प्रबन्ध (संचालन) का सिद्धान्त (Doctrine of Indoor Management)

 

‘रचनात्मक समूह’ सिद्धान्त के अनुसार यह माना जाता है कि प्रत्येक उस व्यक्ति ने जो कम्पनी के साथ व्यवहार कर रहा है, न केवल सीमानियम व अन्तर्नियमों को पढ़ लिया है। बल्कि उनके प्रावधानों को सही अर्थों में समझ भी लिया है। अतः यदि वह कम्पनी के साथ कोई ऐसा अनुबन्ध करता है जो इन प्रलेखों द्वारा प्रदत्त अधिकार क्षेत्र बाहर है तो वह ऐसे अनुबन्ध के क्रियान्वयन हेतु कम्पनी पर वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता। परन्तु बाहरी व्यक्ति का यह कार्य कदापि नहीं है कि वह यह देखे कि कम्पनी की आन्तरिक कार्यवाहियाँ नियमानुसार हैं। या नहीं। जैसे अन्तर्नियमों ने संचालकों को कोई अधिकार दिया है तो बाहरी व्यक्ति, यह ज्ञात करने के लिए कि कम्पनी से अमुक व्यवहार संचालकों के अधिकार में हैं या नहीं, यह नहीं देखेंगे कि इस अधिकार का प्रयोग जिस सभा द्वारा किया जाना चाहिए था, वह उचित प्रकार बुलाई गई थी या नहीं तथा उनमें कोरम पूरा था या नहीं आदि। ये विषय कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध से सम्बन्धित है। संक्षेप में, कम्पनी के साथ आर्थिक या व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करते समय बाहरी व्यक्तियों का यह कर्त्तव्य नहीं है कि वे कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध की उचित क्रियाशीलता की जाँच करें। वे यह मानकर कम्पनी से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं कि आन्तरिक प्रबन्ध से सम्बन्धित कार्यवाहियाँ नियमानुसार कर ली गई होंगी। इस मान्यता को ही आन्तरिक प्रबन्ध (संचालन) का सिद्धान्त कहते हैं।

केस लॉ (Case Law ) – इस सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1856 में रॉयल ब्रिटिश बैंक बनाम टरक्वैड नामक विवाद में किया गया था। इस विवाद में कम्पनी के संचालकों को अन्तर्नियमों के अधीन बॉण्ड के निर्गमित करने का अधिकार था, यदि एक उचित प्रस्ताव द्वारा कम्पनी उन्हें ऐसा करने का अधिकार दे देती है। उन्होंने एक बॉण्ड टरक्वैड को दिया परन्तु इस बॉण्ड के निर्गमन के पहले कोई भी प्रस्ताव कम्पनी द्वारा पास नहीं किया गया था। यह निर्णय दिया गया था कि टरक्वैड इस बॉण्ड के आधार पर कम्पनी पर वाद प्रस्तुत कर सकता था। क्योंकि बाहरी व्यक्ति होने के नाते उसे यह मानने का अधिकार था कि कम्पनी द्वारा प्रस्ताव पास किया जा चुका था।

आन्तरिक प्रबन्ध के सि ‘के अपवाद (Exceptions of the Doctrine of Indoor Management) – यद्यपि आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त के अनुसार बाहरी व्यक्तियों को कम्पनी के आन्तरिक प्रबन्ध के कार्यों की नियमित जाँच करना आवश्यक नहीं है, परन्तु फिर भी इस सिद्धान्त के निम्नलिखित अपवाद है|

1, अनियमितता का ज्ञान होने पर यह सिद्धान्त लागू नहीं होता है – यदि कोई व्यक्ति कम्पनी के आन्तरिक नियम की अनियमितता से परिचित है और फिर भी वह कम्पनी के साथ व्यवहार करता है तो उसे इस सिद्धान्त का लाभ प्राप्त नहीं हो सकता।

2, अनियमितताओं की शंका होने पर लापरवाही बरतना – संदेहजनक परिस्थितियों में, जहाँ उचित जाँच-पड़ताल द्वारा अनियमितता का पता लगाया जा सकता है, लापरवाही बरतते हुए अनुबन्ध कर लेने पर भी यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा।

3, कपटपूर्ण एवं व्यर्थ कार्य होने पर – यह सिद्धान्त ऐसे व्यवहारों पर भी लागू नहीं होता जो प्रारम्भ से व्यर्थ अथवा कपटपूर्ण है और कम्पनी के नाम से किए गए हैं। सामान्यतः एक कम्पनी अपने अधिकारियों द्वारा की गई जालसाजियों के लिए उत्तरदायी नहीं होती है।

केस लॉ (Case Law ) – रुबिन बनाम ग्रेट फिंगाल कन्सोलिडेटेड कम्पनी नामक विवाद में कम्पनी के सचिव ने जाली अंश प्रमाण-पत्र बिना किसी अधिकार के निर्गमित कर दिया। धारक ने इस प्रमाण पत्र के आधार पर धारित अंशों के सम्बन्ध में रजिस्टर्ड होने का वाद प्रस्तुत किया। न्यायालय ने अंश प्रमाण पत्र को जाली होने के आधार पर व्यर्थ घोषित कर दिया और कहा कि जाली अंश प्रमाण पत्र के अधीन धारक को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

4, अन्तर्नियमों की अज्ञानता – एक व्यक्ति जो कम्पनी के साथ व्यवहार कर रहा है, यदि कम्पनी के अन्तर्नियमों की जानकारी नहीं रखता है तो वह इस नियम का लाभ प्राप्त नहीं कर सकता।

5, सामान्यतया अधिकार क्षेत्र के बाहर कार्य – यदि कम्पनी का कोई अधिकारी या प्रतिनिधि बाहरी व्यक्ति के साथ ऐसा अनुबन्ध कर रहा है जो सामान्यतया उसके अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं हो सकता, किन्तु बाहरी व्यक्ति, बिना यह जानकारी प्राप्त किए कि सम्बन्धित व्यक्ति उस कार्य के लिए अधिकृत है अथवा नहीं उस अधिकारी के साथ यह सोचकर अनुबन्ध करता है कि वह अधिकारी इस कार्य के लिए अधिकृत होगा, जबकि यह अधिकारी अधिकृत नहीं था, तो ऐसे व्यवहार को आन्तरिक प्रबन्ध के सिद्धान्त के आधार पर, कम्पनी पर बाधित नहीं किया जा सकता।

6, कम्पनी के साधारण व्यापार से सम्बन्धित व्यवहार न होने पर – यदि कम्पनी के साथ किए जाने वाला व्यवहार कम्पनी के साधारण व्यापार से सम्बन्धित नहीं है तो भी यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा। अपवाद (Exception) उपर्युक्त नियम का एक अपवाद है जिसे ‘आन्तरिक प्रबन्ध का सिद्धान्त’ कहा जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि बाहरी व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला व्यवहार सीमानियम एवं अन्तर्नियमों के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत है तो कम्पनी उन व्यवहारों से बाध्य होगी भले ही कम्पनी ने उन व्यवहारों के सम्बन्ध में कुछ आन्तरिक अनियमितताएँ बरती हों।

The Companies Act 2013

अंकेक्षकों की नियुक्ति (Appointment of Auditors)

 

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 139 (1) के अनुसार –

(i) प्रत्येक कम्पनी अपनी प्रथम वार्षिक साधारण सभा में एक व्यक्ति अथवा फर्म को एक अंकेक्षक के रूप में नियुक्त करेगी जो कि सभा की समाप्ति से छठी वार्षिक साधारण सभा की समाप्ति तक पद धारण करेगा और उसके पश्चात् प्रत्येक छठी सभा की समाप्ति तक पद धारण करेगा। ऐसी सभा में सदस्यों द्वारा अंकेक्षकों के चयन का तरीका और विधि वह रहेगी जैसी निर्दिष्ट की जाती है।

(ii) इस प्रकार की नियुक्ति से पूर्व ऐसी नियुक्ति के लिए अंकेक्षक से उसकी सहमति एक प्रमाण पत्र के साथ लेनी होगी कि उसकी नियुक्ति निर्धारित शर्तों के अनुरूप इस प्रमाण पत्र में यह भी सूचित करना होगा कि क्या अंकेक्षक धारा 141 में दिए गए मापदण्डों को सन्तुष्ट करता है।

(iii) कम्पनी सम्बन्धित अंकेक्षक को उसकी नियुक्ति की सूचना देगी और जिस सभा में अंकेक्षक नियुक्त किया गया है, उसके 15 दिनों के अन्तर्गत इसकी सूचना रजिस्ट्रार को देनी होगी। इस उपधारा के साथ जोड़े गए स्पष्टीकरण के अनुसार नियुक्ति में पुनर्नियुक्ति सम्मिलित है।

 

नियुक्ति की अवधि (Term of Appointment )

 

कम्पनी अधिनियम की धारा 139 (2) के अनुसार –

(1) कोई भी सूचीकृत कम्पनी अथवा निर्धारित वर्ग या वर्गों की कम्पनियों की एक कम्पनी नियुक्त अथवा पुनर्नियुक्त नहीं करेगी –

(a) एक व्यक्ति को एक अंकेक्षक के रूप में लगातार पाँच वर्षों की एक अवधि से अधिक के लिए और वह अपनी अवधि के पूरा किए जाने से पाँच वर्षों के लिए उसी कम्पनी में पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।

(b) एक अंकेक्षक फर्म को अंकेक्षक के रूप में लगातार पाँच वर्षों की दो पारियों (terms) के लिए और इस अवधि को पूरा करने से पाँच वर्षों के लिए उसी कम्पनी में एक अंकेक्षक के रूप में पुनर्नियुक्ति की पात्र नहीं होगी।

(ii) नियुक्ति की तिथि पर कोई अंकेक्षक फर्म जिसके एक या अधिक साझेदार किसी अन्य ऐसी अंकेक्षण फर्म के भी साझेदार है जिसकी अंकेक्षण अवधि एक कम्पनी में तुरन्त पूर्ववर्ती वित्तीय में समाप्त हुई है, उसी कम्पनी में पांच वर्षों तक अंकेक्षक नहीं नियुक्त की जा सकेगी।

(iii) मौजूदा कम्पनियों को इस उपधारा के प्रावधानों का इस अधिनियम के प्रारम्भ की तिथि से तीन वर्षों के अन्तर्गत पालन करना होगा। है कि धारा 139 (3) के अनुसार कम्पनी के सदस्य यह प्रावधान करने का प्रस्ताव कर सकते है की –

(a) इसके द्वारा नियुक्त अंकेक्षण फर्म में अंकेक्षण करने वाले साझेदार और उसकी टीम का सदस्यों द्वारा प्रस्तावित अन्तरालों पर पराक्रमण होगा, अथवा

(b) अंकेक्षण एक से अधिक अंकेक्षकों द्वारा किया जाएगा। उपधारा 4 के अनुसार केन्द्र सरकार नियम बनाकर वह तरीका निर्धारित कर सकती है जिसके अनुसार कम्पनी उपधारा (2) के परिपालन में अंकेक्षकों का परिक्रमण करेगी।

The Companies Act 2013

सरकारी कम्पनी का अंकेक्षक (Auditor of Government Company)

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 139 (5) के अनुसार एक वित्तीय वर्ष के लिए एक सरकारी कम्पनी का अंकेक्षक नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने से 180 दिनों के अन्तर्गत नियुक्त किया जाएगा जो वार्षिक साधारण सभा की समाप्ति तक अपना पद धारण करेगा।

The Companies Act 2013

प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति (Appointment of First Auditor)

(i) धारा 139 (6) के अनुसार एक सरकारी कम्पनी के अलावा एक कम्पनी का प्रथम अंकेक्षक कम्पनी के पंजीयन की तिथि से 30 दिन के अन्तर्गत संचालक मण्डल द्वारा नियुक्त किया जाएगा और यदि संचालक मण्डल इसमें असफल रहता है तो वह इसकी सूचना कम्पनी के सदस्यों को देगा जो असामान्य साधारण सभा में 90 दिनों के अन्तर्गत ऐसे अंकेक्षक की नियुक्ति करेंगे और ऐसा अंकेक्षक प्रथम वार्षिक साधारण सभा की समाप्ति तक पद धारण करेगा।

(ii) धारा 139 (7) के अनुसार एक सरकारी कम्पनी का प्रथम अंकेक्षक कम्पनी के पंजीयन की तिथि से 60 दिनों के अन्तर्गत भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा नियुक्त किया जाएगा। यदि वह निर्धारित अवधि में ऐसे अंकेक्षक की नियुक्ति में असफल रहता है तो कम्पनी का संचालक मण्डल अगले 30 दिनों के अन्तर्गत ऐसे अंकेक्षक को नियुक्त करेगा। यदि संचालक मण्डल भी अगले 30 दिनों के अन्तर्गत ऐसे अंकेक्षक को नियुक्त करने में असफल रहता है तो वह इसकी सूचना कम्पनी के सदस्यों को देगा जो कि 60 दिनों के ‘अन्तर्गत एक असाधारण सामान्य सभा में ऐसे अंकेक्षक की नियुक्ति करेंगे तथा ऐसा अंकेक्षक प्रथम वार्षिक साधारण सभा की समाप्ति तक अपना पद धारण करेगा।

The Companies Act 2013

अंकेक्षक की आकस्मिक रिक्ति (Casual Vacancy of Auditor)

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 139 (8) के अनुसार –

(i) एक सरकारी कम्पनी के अतिरिक्त अन्य कम्पनी की दशा में अंकेक्षक की आकस्मिक रिक्ति को संचालक मण्डल द्वारा 30 दिनों के अन्तर्गत भरा जाएगा किन्तु यदि ऐसी रिक्ति एक अंकेक्षक के त्याग-पत्र के परिणामस्वरूप है तो ऐसी नियुक्ति को बोर्ड की संस्तुति के 30 दिनों के अन्तर्गत आयोजित साधारण सभा में कम्पनी द्वारा अनुमोदन भी करना होगा और वह अगली वार्षिक साधारण सभा की समाप्ति तक पद धारित करेगा।

(ii) एक सरकारी कम्पनी की दशा में ऐसी रिक्ति भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा 30 दिन के अन्तर्गत भरी जाएगी तथा उल्लिखित अवधि के अन्तर्गत रिक्ति भरे जाने की असफलता की स्थिति में कम्पनी के संचालक मण्डल द्वारा अगले 30 दिनों के अन्तर्गत भरी जाएगी।

The Companies Act 2013

सेवानिवृत्त होने वाले अंकेक्षक की पुनर्नियुक्ति (Re-Appointment of a Retiring Auditor)

धारा 139 (9) के अनुसार एक सेवानिवृत्त होने वाले अंकेक्षक की वार्षिक साधारण सभा में पुनर्नियुक्ति की जा सकती है यदि (अ) वह पुनर्नियुक्ति के लिए अयोग्य नहीं है। (ब) उसने कम्पनी को पुनर्नियुक्ति किए जाने के लिए अपनी लिखित में अनिच्छा की सूचना नहीं दी है और (स) कम्पनी ने सभा में किसी अन्य को अंकेक्षक नियुक्त किए जाने अथवा उसके नियुक्त न किए जाने के लिए स्पष्टतया एक विशेष प्रस्ताव पारित नहीं किया है। धारा 139 (10) के अनुसार जहाँ कम्पनी की किसी वार्षिक साधारण सभा में किसी अंकेक्षक की नियुक्ति अथवा पुनर्नियुक्ति नहीं की जाती है तो कम्पनी का मौजूदा अंकेक्षक ही अपने पद पर बना रहेगा।

 

अंकेक्षक को हटाने की प्रक्रिया (Process of Removal of Auditor)

(1) अंकेक्षक को हटाया जाना (Removal of Auditor) – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 140 के अनुसार, धारा 139 के अधीन नियुक्त किए गए अंकेक्षक को उसकी नियुक्ति की अवधि बीत जाने से पूर्व एक विशेष प्रस्ताव द्वारा केन्द्र सरकार का निर्धारित तरीके से पूर्व अनुमोदन लेकर उसके पद से हटाया जा सकता है। उसके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई करने से पूर्व सम्बन्धित अंकेक्षक को सुने जाने का उचित अवसर दिया जाएगा।

(2) त्याग-पत्र देने वाले अंकेक्षक का कथन (Statement by Resigning Auditor) – अंकेक्षक जिसने कम्पनी को त्यागपत्र दे दिया है, उसे त्याग पत्र की तिथि से 30 दिनों की अवधि के अन्तर्गत कम्पनी और रजिस्ट्रार को तथा एक सरकारी कम्पनी की दशा में नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को भी अपना एक कथन फाइल करना होगा जिसमें उसके त्याग-पत्र से सम्बन्धित कारण और अन्य तथ्यों को सूचित किया जाएगा।

(3) अर्थदण्ड (Penalty) – यदि अंकेक्षक उपधारा (2) का पालन नहीं करता है तो वह न्यूनतम ₹50,000 अथवा अंकेक्षक का पारिश्रमिक, जो भी कम हो किन्तु जिसे ₹5 लाख तक बढ़ाया जा सकता है, के अर्थदण्ड से दण्डनीय होगा।

(4) प्रस्ताव की विशेष सूचना (Special Notice of Resolution) – निवृत्तमान अंकेक्षक के अन्यथा किसी अन्य व्यक्ति को अंकेक्षक नियुक्त करने अथवा निवृत्तमान अंकेक्षक के पुनर्नियुक्त न किए जाने की स्पष्ट व्यवस्था करने के लिए वार्षिक साधारण सभा में प्रस्ताव के लिए एक विशेष सूचना की आवश्यकता होती है। किन्तु धारा 139(2) के अधीन प्रावधानित अवधि पूर्ण करने वाले निवृत्तमान अंकेक्षक के लिए इसकी आवश्यकता नहीं होती है। ऐसे प्रस्ताव की सूचना प्राप्त होने पर कम्पनी तुरन्त ही इसकी एक प्रति निवृत्तमान अंकेक्षक को भेजेगी।

‘अंकेक्षक द्वारा निवेदन (Representation by Auditor) – ऐसी सूचना दिए जाने पर यदि निवृत्तमान अंकेक्षक कम्पनी को लिखित में निवेदन करता है और उसकी कम्पनी के सदस्यों को अधिसूचना किए जाने की प्रार्थना करता है तो कम्पनी को प्रस्ताव की सूचना के साथ ही सदस्यों को यह भी बतलाना होगा कि उसे निवृत्तमान अंकेक्षक से निवेदन प्राप्त हुआ है तथा उसकी एक प्रति कम्पनी के प्रत्येक सदस्य को भेजनी होगी। यदि निवेदन के अधिक देरी से प्राप्त होने के कारण अथवा कम्पनी की चूक के कारण निवेदन की प्रति नहीं भेजी गई है तो अंकेक्षक उस निवेदन को सभा में पढ़े जाने के लिए अपेक्षा कर सकता है। यदि कम्पनी अथवा किसी पीड़ित व्यक्ति द्वारा न्यायाधिकरण को किए आवेदन पर न्यायाधिकरण यह पाता है कि अंकेक्षक द्वारा अपने इस अधिकार दुरुपयोग किया जा रहा है तो न तो अंकेक्षक का निवेदन सदस्यों को भेजा जाएगा और न उसे सभा में पढ़ा जाएगा।

The Companies Act 2013

न्यायाधिकरण द्वारा अंकेक्षक का बदला जाना (Change of Auditor by Tribunal)

न्यायाधिकरण या तो स्वतः संज्ञान पर अथवा केन्द्र सरकार अथवा किसी सम्बन्धित व्यक्ति द्वारा इसको किए गए आवेदन पर यदि सन्तुष्ट है कि कम्पनी के अंकेक्षक ने प्रत्यक्ष या • अप्रत्यक्ष रूप से कपटमय तरीके से कार्य किया है अथवा कम्पनी या इसके संचालकों या अधिकारियों द्वारा या इनके सम्बन्ध में किसी कपट के लिए उकसाया या साठगाँठ की है तो वह कम्पनी को आदेश द्वारा अंकेक्षक के बदलने का निर्देश दे सकता है।

यदि केन्द्र सरकार के आवेदन पर न्यायाधिकरण सन्तुष्ट है कि अंकेक्षक में परिवर्तन किया जाना आवश्यक है तो इस आवेदन की प्राप्ति के 15 दिनों के अन्तर्गत न्यायाधिकरण आदेश दे सकता है कि वह अंकेक्षक के रूप में कार्य नहीं करेगा और केन्द्र सरकार उसकी जगह कोई दूसरा अंकेक्षक नियुक्त कर सकती है। ऐसा अंकेक्षक चाहे एक व्यक्ति हो अथवा फर्म आदेश पारित किए जाने की तिथि से पाँच वर्ष की अवधि के लिए किसी भी कम्पनी का एक अंकेक्षक नियुक्त किए जाने का पात्र नहीं होगा और धारा 447 के अधीन कार्रवाई किए जाने के लिए भी दायी होगा।

एक फर्म की दशा में यह दायित्व फर्म और प्रत्येक साझेदार का होगा जिन्होंने कपटमय तरीके से कार्य किया है अथवा कम्पनी या इसके संचालकों या अधिकारियों द्वारा या इनके सम्बन्ध में किसी कपट के लिए उकसाया या साँठगाँठ की है।

The Companies Act 2013

कम्पनी अंकेक्षक की शक्तियाँ (Powers of Company Auditors)

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 143(1) में अंकेक्षक की शक्तियों और कर्तव्यों से सम्बन्धित प्रावधान दिए गए हैं। अंकेक्षक की मुख्य शक्तियाँ अनलिखित हैं –

(i) खाता पुस्तकों और प्रमाणकों तक पहुँच (Access to Books of Account and Vouchers) – कम्पनी के प्रत्येक अंकेक्षक को हर समय कम्पनी की खाता पुस्तकों और प्रमाणकों को देखने व जाँच करने का अधिकार होता है चाहे वे कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय में रखी हो अथवा किसी अन्य स्थान पर। एक सूत्रधारी कम्पनी के अंकेक्षक को अपनी सभी सहायक कम्पनियों और सहयोगी कम्पनियों के अभिलेखों, जो कि इसके वित्तीय विवरणों में सहायक और सहयोगी कम्पनियों पर विचार करने से सम्बन्धित हैं, को देखने का अधिकार होता है।

(ii) अधिकारियों से सूचनाएँ और स्पष्टीकरण प्राप्त करना (To Obtain Information and Explanation from Officers) – एक अंकेक्षक को अपने कर्तव्यों के निष्पादन के लिए कम्पनी के अधिकारियों से ऐसी सूचनाएँ और स्पष्टीकरण मांगने का हक है जिन्हें वह आवश्यक समझे। भावनगर वेजीटेबिल प्रोडक्ट्स (1977) के मामले में गुजरात उच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि अंकेक्षक की शक्ति कम्पनी का समापन प्रारम्भ हो जाने तथा न्यायालय द्वारा निस्तारक की नियुक्ति के पश्चात् भी बनी रहती है। कम्पनी के अन्तर्नियम भी अंकेक्षक को अपनी इस शक्ति के प्रयोग करने से नहीं रोक सकते हैं।

(iii) अंकेक्षक प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करना (To Sign the Audit Report) – धारा 145 के अनुसार अंकेक्षण प्रतिवेदन पर केवल कम्पनी द्वारा नियुक्त अंकेक्षक ही हस्ताक्षर कर सकता है और यदि अंकेक्षण कार्य एक फर्म को दिया गया है तो भारत में व्यवसायरत फर्म का साझेदार ही अंकेक्षण प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर कर सकता है।

The Companies Act 2013

(iv) साधारण सभाओं की सूचना प्राप्त करना और उपस्थित होना (To Receive Notice and Attend General Meetings) – धारा 146 के अनुसार अंकेक्षक को कम्पनी की व्यापक सभाओं की सूचना प्राप्त करने और उसमें उपस्थित होने का अधिकार है।

(v) कम्पनी के शाखा कार्यालय भ्रमण करने और वहाँ की लेखा-पुस्तकों तक पहुँच (To Visit Branch Office of the Company and have Access to Books etc,) – धारा 143 (8) के अनुसार अंकेक्षक को अपने कर्त्तव्य के निर्वाह के लिए यदि आवश्यक हो तो उस शाखा कार्यालय के भ्रमण करने तथा वहाँ की खाता पुस्तकों और प्रमाणकों को देखने का अधिकार है।

(vi) केन्द्र सरकार को कम्पनी में किए जा रहे कपट के बारे में सूचित करने का अधिकार (Right to Inform the Central Government about the Fraud being Committed Against the Company) – यदि अंकेक्षक को कम्पनी के अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा कम्पनी के विरुद्ध कपट किए जाने का विश्वास है तो धारा 143 (12) के अनुसार उसे इसकी सूचना केन्द्र सरकार को देने का अधिकार है।

The Companies Act 2013

अंकेक्षक के कर्त्तव्य (Duties of Auditors)

कम्पनी अंकेक्षक का प्रमुख उद्देश्य कम्पनी के अंशधारियों और निवेशकों को कम्पनी के वित्तीय मामलों में मिथ्या वर्णन तथा कपटों से सुरक्षा प्रदान करना है। ऐसे मामले धारा 143 (1) में निर्दिष्ट किए गए हैं। अंकेक्षक का कर्तव्य है कि वह इन मामलों की सही जाँच करें। ये मामले निम्नलिखित हैं –

(1) क्या कम्पनी द्वारा प्रतिभूति के आधार पर दिए गए ऋण एवं अग्रिम उचित प्रकार से सुरक्षित हैं और क्या इनकी शर्तें कम्पनी अथवा इसके सदस्यों के हित में हैं;

(2) क्या कम्पनी के लेन-देन जो केवल किताबी प्रविष्टियों द्वारा किए गए हैं कम्पनी के हितों के विरुद्ध तो नहीं है;

(3) जहाँ कम्पनी एक निवेश कम्पनी या बैंकिंग कम्पनी नहीं है तो क्या इसकी सम्पत्तियों का वह भाग जो अंशों, ऋणपत्रों या अन्य प्रतिभूतियों में है, उन्हें क्रय मूल्य से कम पर बेचा गया है:

(4) क्या कम्पनी द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिमों को जमाओं की तरह दिखाया गया है;

(5) क्या व्यक्तिगत व्ययों को आगम खाते से चार्ज गया है;

(6) क्या नकद के लिए आवंटित अंशों से नकद राशि वास्तव में प्राप्त कर ली गई है और यदि नकद राशि नहीं प्राप्त की गई है तो क्या जो स्थिति लेखा-पुस्तकों में दिखाई गई है, वह ठीक है।

The Companies Act 2013

अंकेक्षण प्रतिवेदन (Audit Report)

अंकेक्षक का प्राथमिक उद्देश्य अपनी प्रतिवेदन के माध्यम से कम्पनी के वित्तीय मामलों में मिथ्यावर्णन और कपटों को उजागर करना होता है। इस सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम, 2013 के प्रावधान निम्नवत् हैं –

(i) कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 143(2) के अनुसार कम्पनी के अंकेक्षक को उसके द्वारा जाँचे गए खातों पर और प्रत्येक वित्तीय विवरण-पत्रों पर जो अधिनियम द्वारा साधारण सभा में कम्पनी के समक्ष प्रस्तुत किए जाने होते हैं, कम्पनी के सदस्यों को एक रिपोर्ट देनी होती है। रिपोर्ट में यह बतलाना होता है कि क्या खातों की तैयारी में लेखांकन और अंकेक्षण मानदण्डों का उचित रूप से पालन किया गया है और क्या कम्पनी के वित्तीय विवरण-पत्र कम्पनी के क्रियाकलापों का अपने वित्तीय वर्ष के अन्त में और वर्ष के लाभ-हानि तथा रोकड़ प्रवाह का सच्चा एवं उचित चित्र प्रस्तुत करते हैं।

(ii) धारा 143 (3) के अनुसार अंकेक्षक की रिपोर्ट में निम्नलिखित बातों को स्पष्टतया बतलाना होगा :

(a) क्या उसने वे सभी सूचनाएँ और स्पष्टीकरण पता लगा लिए तथा प्राप्त कर लिए हैं जो उसके सर्वोत्तम ज्ञान और विश्वास के अनुसार उसके अंकेक्षण कार्य के लिए आवश्यक थीं और यदि ऐसा नहीं है तो उनके ब्योरे और ऐसी सूचना कार्यवित्तीय विवरणों पर प्रभाव:

(b) क्या उसकी राय में कम्पनी द्वारा विधि द्वारा अपेक्षित उचित खाता पुस्तकें रखी गयी हैं और क्या उसने भ्रमण नहीं की गयी शाखाओं से उसके अंकेक्षण के प्रयोजन के लिए पर्याप्त उचित विवरणियाँ प्राप्त कर ली हैं;

(c) क्या कम्पनी के अंकेक्षक के अन्यथा एक व्यक्ति द्वारा अंकेक्षित कम्पनी के किसी शाखा कार्यालय के खातों पर रिपोर्ट उसे भेज दी गई है:

(d) क्या रिपोर्ट में संव्यवहारित कम्पनी का आर्थिक चिट्ठा और लाभ-हानि खाता लेखा पुस्तकों और विवरणियों से मेल खाते हैं;

(e) क्या उसकी राय में वित्तीय विवरण पत्र लेखांकन मानदण्डों का पालन करते हैं,

(f) वित्तीय लेन – देनों अथवा कम्पनी के कार्यकरण पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले मामलों पर अंकेक्षक की मर्यादाएँ, अवलोकन अथवा टिप्पणियाँ:

(g) क्या धारा 164(2) के अधीन कोई संचालक कम्पनी का संचालक नियुक्त किए जाने के लिए अयोग्य है;

(h) खातों के रख-रखाव और उससे जुड़े अन्य मामलों के सम्बन्ध में कोई मर्यादा, आपत्ति अथवा प्रतिकूल टिप्पणी:

(i) क्या वित्तीय विवरण पत्रों के सन्दर्भ में कम्पनी का आन्तरिक वित्तीय नियन्त्रण पर्याप्त है और ऐसे नियन्त्रणों की परिचालन प्रभावशीलता;

(j) ऐसे अन्य मामले जो निर्धारित किए जाते हैं।

(iii) धारा 143(4) के अनुसार जहाँ इस धारा के अन्तर्गत अंकेक्षण रिपोर्ट में सम्मिलित किए जाने के लिए अपेक्षित मामलों में से किसी का उत्तर नकारात्मक है अथवा एक मर्यादा के साथ है तो रिपोर्ट में इसके कारण बतलाने होंगे।

The Companies Act 2013

एक सरकारी कम्पनी का अंकेक्षण प्रतिवेदन (Audit Report of a Government Company)

(i) धारा 143 (5) के अनुसार सरकारी कम्पनी के अंकेक्षक को अंकेक्षण रिपोर्ट की एक प्रति नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को प्रस्तुत करनी होगी जिसमें कैग द्वारा निर्गमित निर्देश, उन पर की गई कार्रवाई और इसका कम्पनी के खातों और वित्तीय विवरण पत्र पर प्रभाव सम्मिलित होंगे।

(ii) धारा 143 (6) के अनुसार अंकेक्षण रिपोर्ट के प्राप्त होने की तिथि के 60 दिनों के अन्तर्गत कैग को निम्न अधिकार होंगे

(a) कम्पनी के वित्तीय विवरण पत्र का पूरक अंकेक्षण कराए और निर्देशित मामलों पर सूचना इसके लिए अधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को पहुंचाए।

(b) ऐसी अंकेक्षण रिपोर्ट पर टिप्पणी करे या पूरा करे। कम्पनी द्वारा अंकेक्षण प्रतिवेदन पर कैग की टिप्पणियाँ उन सब व्यक्तियों को भेजी जाएँगी जो कि अंकेक्षित वित्तीय विवरण पत्रों की प्रतियाँ प्राप्त करने के हकदार हैं तथा इसे कम्पनी की वार्षिक साधारण सभा के समक्ष भी रखा जाएगा। धारा 143(7) के अनुसार यदि आवश्यक हो तो कैग ऐसी कम्पनियों के परीक्षण जाँच के भी आदेश दे सकता है।

The Companies Act 2013

संचालकों की नियुक्ति अयोग्यताएँ” क्या हैं? एक संचालक के अधिकारों व दायित्वों को समझाइए। What are the “Appointment Disqualifications” of directors? Explain the rights and duties of director,

एक कम्पनी का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है, यह केवल एक कानूनी इकाई है। यह एक कृत्रिम व्यक्ति के रूप के कार्य करती है, कम्पनी की और से कार्य करने वाले व्यक्ति को निदेशक कहते हैं। यह पेशेवर लोग होते हैं, कम्पनी द्वारा अपने मामलों को निर्देशित करने के लिए इनको काम पर रखा जाता है। यह भी कहा जा सकता है एक कम्पनी के अधिकारी अथवा निदेशक अथवा संचालक आदि। कोई भी व्यक्ति निदेशक का धारण कर सकता है। भारत में कम्पनी कानून निदेशकों के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं करता है इसलिए, भारतीय कम्पनी अपने लेखों में निदेशकों के लिए योग्यताएँ निर्धारित करती हैं।

The Companies Act 2013

निदेशकों की अयोग्यता (Disqualifications of Directors)

कम्पनी कानून के तहत एक निदेशक को निम्नलिखित कारणों में से किसी के लिए अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि –

1, वह एक दोषी हो अथवा अदालत द्वारा दोषी करार दिया गया हो।

2, वह दिवालिया है।

3, वह दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया में है और उसका आवेदन लम्बित है।

4, उसे किसी भी अपराध के लिए अदालत ने दोषी ठहराया है अथवा वह 6 माह अथवा अधिक जेल में सजा के रूप में रहा हो, तो वह किसी भी कम्पनी के निर्देशक के रूप में नियुक्त होने के योग्य नहीं रहेगा।

5, यदि कोई आदेश जिसमें अदालत या ट्रिब्यूनल द्वारा निदेशक के रूप में नियुक्त किए। जाने के अयोग्य घोषित किया गया है।

6, उसने अपने पास रखी कम्पनी के किसी भी शेयर के सम्बन्ध में किसी भी कॉल का भुगतान नहीं किया है, चाहे वह अकेले हो या दूसरों के साथ संयुक्त रूप से, और कॉल के भुगतान के लिए निर्धारित अन्तिम दिन से छह महीने की अवधि समाप्त हो गई है।

7, उसने पिछले पाँच वर्षों के दौरान किसी भी समय सम्बन्धित पार्टी से लेन-देन से सम्बन्धित अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है।

8, वह एक निदेशक पहचान संख्या हासिल करने में विफल रहा है।

 

अयोग्यता के प्रभाव (Effects of Disqualifications)

एक बार अयोग्य घोषित होने के बाद कोई व्यक्ति उस कम्पनी या किसी अन्य कम्पनी के निदेशक के रूप में नियुक्त होने के योग्य नहीं है। यह प्रतिबन्ध पाँच साल की अवधि के लिए लगाया जाता है या जैसा भी मामला हो। वर्ष 2017 से, कॉरपोरेट मामलों के मन्त्रालय (MCA) कम्पनी अधिनियम के इन प्रावधानों को सख्ती से लागू कर रहा है। इसने हाल ही में सरकारी वेबसाइट पर अयोग्य निदेशकों के नाम प्रकाशित किए हैं।

The Companies Act 2013

कम्पनी के निदेशक के अधिकार (Rights of Directors of the Company)

1, धारा 86 कम्पनी पूँजी और मुद्दा (Further issue of Company Capital) – आगे के शेयरों के मुद्दे से कम्पनी की पूँजी बढ़ाने का निर्णय ऐसी कंपनी के निदेशकों के पास है। शेयरों के आगे जारी करने के सम्बन्ध में, यदि मौजूदा सदस्य गिरावट और नए शेयरों की पेशकश की सदस्यता नहीं लेते हैं, तो निदेशकों के पास ऐसे शेयरों को आवंटित करने और जारी करने की शक्ति है, जैसे वे फिट होते है। निदेशक (या निदेशकों द्वारा अधिकत एक अधिकारी) को इस खण्ड के तहत नए शेयरों के किसी भी प्रस्ताव के साथ आने वाले परिपत्र पर अस्ताक्षर करना होता है।

2, धारा 159: असाधरण आम बैठक का आह्वान (Calling of Extraordinary General Meeting) – एक सामान्य बैठक में कम्पनी के अनुमोदन की आवश्यकता वाले किसी भी मामले पर विचार के लिए निदेशकों द्वारा किसी भी समय अतिरिक्त सामान्य बैठक बुलाई जा सकती है।

3, धारा 160: सामान्य बैठक की अध्यक्षता करना (Presiding General Meeting) – निदेशक मण्डल का अध्यक्ष कम्पनी की प्रत्येक सामान्य बैठक में अध्यक्ष नहीं है, या यदि किसी बैठक में वह बैठक आयोजित करने के लिए नियुक्त समय के बाद पन्द्रह मिनट के भीतर मौजूद नहीं है, या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो उपस्थित निदेशकों में से किसी एक को अध्यक्ष चुना जा सकता है।

4, धारा 174: पहले निदेशक (First Directors) – पहली वार्षिक आम बैठक में निदेशकों के चुनाव तक पहले निदेशकों को पद सम्भालने का अधिकार होता है।

5, धारा 180: निदेशक मण्डल पर आकस्मिक रिक्ति (Casual Vacancy on the Board of Directors) – किसी कम्पनी के निदेशक मण्डल में किसी भी आकस्मिक रिक्ति को निदेशकों द्वारा भरा जाता है।

6, धारा 191 निदेशकों का पारिश्रमिक (Remuneration of the directors) – आम बैठक में निदेशक अतिरिक्त सेवाओं के प्रदर्शन के लिए एक निदेशक के पारिश्रमिक का निर्धारण करते हैं, जिसमें अध्यक्ष के पद को धारण करना शामिल है।

7, धारा 195: निदेशकों को ऋण (Loans to Directors) – कम्पनी के निदेशकों को कुछ आवश्यकताओं की पूर्ति के अधीन कम्पनी से ऋण प्राप्त करने का अधिकार है।

8, धारा 196: कम्पनी के व्यवसाय के प्रबन्धन के सम्बन्ध में निदेशकों की शक्तियाँ (Powers of Directors with Regard to Managing the Business of the Company) – किसी कम्पनी को बढ़ावा देने और पंजीकरण करने में होने वाले सभी खर्ची का भुगतान कर सकता है, और कम्पनी की ऐसी सभी शक्तियों का उपयोग कर सकता है जो इस अध्यादेश द्वारा, या लेखों द्वारा, या किसी विशेष संकल्प द्वारा नहीं की जाती है, सामान्य बैठक में कम्पनी द्वारा प्रयोग किया जाना आवश्यक है।

The Companies Act 2013

निदेशक के कर्त्तव्य (Duties of Directors)

1, शक्तियों के भीतर अधिनियम (Act within Powers) – आपको कम्पनी के संविधान के अनुसार कार्य करना चाहिए, और केवल उन्हीं उद्देश्यों के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए जिनके लिए उन्हें दिया गया था। कम्पनी के संविधान में संघ और संकल्प और संवैधानिक प्रकृति के समझौतों (जैसे शेयरधारक या संयुक्त उद्यम समझौतों) के अपने लेख शामिल हैं।

2, कम्पनी की सफलता में योगदान देना (Contribute in the Success of the Company) कम्पनी के निदेशक का कर्तव्य है कि वह कम्पनी के लाभों का अपने सदस्यों में उचित वितरण करे तथा कम्पनी अंशधारियों को उचित आय के साथ-साथ उचित लाभांश का भी वितरण करके कम्पनी की सफलता को बढ़ाने में सहायक योगदान दे अंशधारियों की आय तथा लाभांश दर ही कम्पनी की सफलता का सूचक होती है।

3, स्वतन्त्र निर्णय का प्रयोग करें (Exercise Independent Judgement) – आपको स्वतन्त्र निर्णय का प्रयोग करना चाहिए और अपने निर्णय स्वयं करने चाहिए। यह आपको कम्पनी के संविधान या कम्पनी द्वारा किए गए समझौते के अनुसार कार्य करने से नहीं रोकता है।

4, तीसरे पक्ष से लाभ स्वीकार नहीं (Benefits from Third Party not Acceptable) – एक निदेशक को किसी भी तीसरे पक्षकार से कोई भी लाभ स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि आप निदेशक के रूप में कुछ भी करते हों या न करते हों। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। आपकी एक गलत स्वीकृति कर्त्तव्य का उल्लंघन मानी जायेगी।

 

निदेशकों की नियुक्ति (Appointment of Directors) (धारा 152)

1, प्रथम निदेशक, प्रवर्तकों द्वारा नियुक्त किए जाएँगे – प्रायः प्रवर्तक प्रथम निदेशको की नियुक्ति करते हैं। यदि प्रवर्तक अपने अधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं अर्थात् वे निदेशकों को नियुक्त नहीं करते हैं तो पार्षद सीमानियम के अभिदाताओं को कम्पनी का प्रथम निदेशक मान लिया जाता है। एक व्यक्ति वाली कम्पनी की दशा में एक व्यक्ति ही सदस्य होने के कारण इसका पहला निदेशक माना जाता है। निदेशकों की नियुक्ति से सम्बन्धित नियम प्रायः कम्पनी के अन्तर्नियमों में दिए होते हैं। प्रतिवर्ष ऐसे निदेशकों में से जो बारी-बारी से अवकाश ग्रहण करने वाले हैं कम-से-कम एक-तिहाई निदेशक अनिक रूप से अवकाश ग्रहण करेंगे, परन्तु अवकाश ग्रहण करने वाले निदेशक पुनः नियुक्ति के योग्य होंगे। कम्पनी के प्रथम निदेशक कम्पनी की प्रथम वार्षिक सभा समाप्त होने तक पद पर बने रहेंगे, अर्थात् वे कम्पनी की प्रथम वार्षिक सभा में अवकाश ग्रहण करेंगे।

2, कम्पनी द्वारा निदेशकों की नियुक्ति (Appointment of Directors by the Company) – (i) प्रथम वार्षिक सभा पर सभी प्रथम निदेशक और अन्य मामलों में एक तिहाई निदेशक बारी-बारी से अवकाश ग्रहण करेंगे।

(ii) इस अधिनियम में अन्यथा स्पष्ट प्रावधान होने के अतिरिक्त प्रत्येक निदेशक की नियुक्ति साधारण सभा में की जाएगी।

The Companies Act 2013

निदेशकों की नियुक्ति के लिए अयोग्यता (धारा 164) (Disqualification for Appointment of Directors)

(1) एक व्यक्ति एक कम्पनी में निदेशक के रूप में नियुक्त होने के योग्य नहीं होगा; यदि

(i) वह अस्वस्थ मस्तिष्क वाला है। उसे सक्षम न्यायालय ने ऐसा घोषित किया है;

(ii) वह एक अमुक्त (Undischarged) दिवालिया है;

(iii) उसने दिवालिया घोषित करने के लिए आवेदन किया है और उसका आवेदन लम्बित है;

(iv) उसे न्यायालय द्वारा किसी अपराध की सजा दी गई हैं चाहे नैतिक पतन (Moral Turpitude) के कारण या अन्यथा और उसको उस सम्बन्ध में कम-से-कम 6 माह की सजा हुई है और उसकी सजा समाप्त होने के बाद पाँच वर्ष की अवधि पूरी नहीं हुई है, परन्तु शर्त यह है कि यदि उसे सात वर्ष या अधिक की सजा हुई है तो वह किसी भी कम्पनी में निदेशक नियुक्त करने के योग्य नहीं है।

(v) किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा उसे निदेशक के रूप में नियुक्त होने के अयोग्य आदेश जारी किया गया है जो अभी लागू है; (vi) उसने कम्पनी के अंशों पर बकाया याचना का भुगतान नहीं किया है अकेले या अन्यों के साथ और याचना देने की अन्तिम तिथि के बाद 6 माह बीत गए हैं;

(vii) पिछले पाँच वर्षों में उसे धारा 188 के अन्तर्गत सम्बन्धित पक्ष से लेन-देन के अपराध में सजा हुई है; या

(viii) उसने धारा 152 (3) का अनुपालन नहीं किया है।

(2) एक व्यक्ति जो एक कम्पनी का निदेशक है या रहा है जिसने—

(i) वित्तीय विवरण या वार्षिक विवरणी लगातार तीन वित्तीय वर्षों के लिए फाइल नहीं की है; या

(ii) इसके द्वारा स्वीकार किए गए निक्षेप या उन पर देय ब्याज या किसी ऋणपत्र को देय तिथि पर शोधित करने या उन पर देय ब्याज और घोषित लाभांश का भुगतान करने में असफल रहता है और ऐसी असफलता एक वर्ष या उससे अधिक अवधि के लिए रहती है, कम्पनी के निदेशक के रूप में या किसी अन्य कम्पनी में सम्बन्धित कम्पनी की असफलता की तिथि से पाँच वर्ष की अवधि के लिए पुनः नियुक्ति के योग्य नहीं होगा।

(3) एक निजी कम्पनी अपने अन्तर्नियमों द्वारा निदेशक की नियुक्ति के लिए अतिरिक्त अयोग्यता के आधारों का प्रावधान कर सकती है–

“परन्तु शर्त यह है कि उपधारा (1) के वाक्यांश (iv), (v), (vi) प्रभावी नहीं होंगे –

(i) सजा या अयोग्यता के आदेश की तिथि से 30 दिन के लिए: (ii) जहाँ इन 30 दिनों में सजा के विरुद्ध अपील या याचिका दायर की गई है तो 7 दिन के बीतने तक अपील या याचिका का निर्णय होने के बाद; या

(iii) जहाँ इसके विरुद्ध 7 दिन में अपील या याचिका दायर की गई है तो ऐसी अपील या याचिका के निर्णय हो जाने तक।

The Companies Act 2013

संचालित कम्पनियों की संख्या (Number of Directorship) (धारा 165) –

(1) कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के लागू होने के बाद वैकल्पिक निदेशक के पद सहित, 20 कम्पनियों से अधिक कम्पनियों में निदेशक का पद धारण नहीं करेगा, परन्तु शर्त यह है कि सार्वजनिक कम्पनियों की अधिकतम संख्या जिसमें एक व्यक्ति की निदेशक के रूप में नियुक्ति की जा सकती हैं दस से अधिक नहीं होगी।

स्पष्टीकरण (Explanation) – सार्वजनिक कम्पनी की सीमा की गणना करने के लिए जिसमें एक व्यक्ति को निदेशक नियुक्त किया जा सकता है, निजी कम्पनियों में निदेशक के पद सम्मिलित किए जाएँगे चाहे वह सार्वजनिक कम्पनी की सूत्रधारी या सहायक पनी है।

 

प्रबन्धकीय अधिकारियों का अधिकतम समग्र पारिश्रमिक (धार 7) (Overall Maximum Managerial Remuneration)

धारा 197 एवं अनुसूची V के प्रावधानों के अनुसार प्रबन्ध निदेशक, पूर्णकालिक निदेशक या प्रबन्धक की नियुक्ति की जाएगी और नियुक्ति की शर्तें एवं देय पारिश्रमिक निदेशक मण्डल के अनुमोदन द्वारा किया जाएगा जो कि कम्पनी की अगली साधारण सभा में अनुमोदित किया जाना चाहिए। यदि नियुक्ति अनुसूची V के प्रावधानों के अनुसार नहीं हैं तो केन्द्र सरकार द्वारा अनुमोदन किया जाना चाहिए।

किसी वित्तीय वर्ष के लिए एक सार्वजनिक कम्पनी द्वारा अपने निदेशकों, प्रबन्ध निदेशक और पूर्णकालिक निदेशक और इसके प्रबन्धक सहित को दिया जाने वाला पारिश्रमिक कम्पनी के उस वित्तीय वर्ष के शुद्ध लाभ के 11 प्रतिशत से अधिक नहीं रहेगा लाभ की गणना धारा 198 के अनुसार की जाएगी सिवाय इसके कि सकल लाभ में से निदेशकों का पारिश्रमिक घटाया नहीं जाएगा।

कम्पनी केन्द्र सरकार की अनुमति से साधारण सभा के द्वारा कम्पनी के शुद्ध लाभ के 11 प्रतिशत से अधिक पारिश्रमिक अनुसूची (V) के प्रावधानों के अनुसार दे सकती है।

The Companies Act 2013

एक प्रबन्ध निदेशक, एक पूर्णकालिक निदेशक या प्रवन्धक का पारिश्रमिक (Remuneration Payable to a Managing Director, Whole Time Director or Manager)

 

प्रबन्ध निदेशक, पूर्णकालिक निदेशक या प्रबन्धक का पारिश्रमिक कम्पनी के शुद्ध लाभ के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा और यदि उनमें से एक से अधिक ऐसे निर्देश के हैं तो पारिश्रमिक ऐसे सभी निदेशक और प्रबन्धक, इन सभी को मिलाकर शुद्ध लाभ के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

निदेशकों का पारिश्रमिक जो न तो प्रबन्ध निदेशक हैं और न ही पूर्णकालिक निदेशक हैं (Remuneration payable to directors who are neither managing director nor whole time director) – ऐसे निदेशकों का पारिश्रमिक निम्नलिखित मे अधिक नहीं होगा –

(i) कम्पनी के शुद्ध लाभ का 1 प्रतिशत यदि वहाँ प्रबन्ध निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक हैं या प्रबन्धक हैं;

(ii) किसी अन्य मामले में शुद्ध लाभ का 3 प्रतिशत । उपर्युक्त प्रतिशतों में निदेशकों को उपधारा (5) के अन्तर्गत देय फीस सम्मिलित नहीं होगी।

The Companies Act 2013

लाभ के न होने या अपर्याप्त होने पर प्रबन्धकीय पारिश्रमिक [धारा 197 (3)] (Managerial Remuneration in Case of Absence or Inadequacy of Profit)

अनुसूची V के प्रावधानों के अनुसार यदि किसी वित्तीय वर्ष में कम्पनी को लाभ नहीं हुए हैं या इसके लाभ अपर्याप्त हैं तो कम्पनी अपने निदेशकों, प्रबन्धकीय या पूर्णकालिक निदेशक या प्रबन्धक सहित पारिश्रमिक के द्वारा कोई राशि उपधारा (5) के अन्तर्गत देय फीस को छोड़कर सिवाय अनुसूची (V) के प्रावधानों के अनुसार भुगतान नहीं करेगी। यदि कम्पनी इन प्रावधानों का पालन करने में अयोग्य है तो केन्द्र सरकार की अनुमति से निदेशको प्रबन्ध या पूर्णकालिक निदेशक या प्रबन्धक सहित को देय पारिश्रमिक इस धारा के अनुसार या कम्पनी के अन्तर्नियम या एक कम्पनी की साधारण सभा में विशेष प्रस्ताव द्वारा निदेशकों को देय पारिश्रमिक निर्धारित किया जाएगा और इसमें किसी अन्य हैसियत से की गई सेवा पारिश्रमिक सम्मिलित होगा।

पारिश्रमिक देने का तरीका (Mode of Remuneration) – 1, एक निदेशक, मण्डल या उसकी समिति की सभाओं में भाग लेने के लिए या मण्डल द्वारा निर्णीत किसी उद्देश्य के लिए फीस के रूप में पारिश्रमिक प्राप्त कर सकता है, बशर्ते कि ऐसी फीस की राशि निर्दिष्ट राशि से अधिक नहीं होगी।

2, एक निदेशक या प्रबन्धक को पारिश्रमिक मासिक भुगतान या कम्पनी के शुद्ध लाभ का निर्दिष्ट प्रतिशत या आंशिक रूप से एक तरीके से या आंशिक रूप से दूसरे तरीके से किया जा सकता है।

The Companies Act 2013

केन्द्र सरकार या कम्पनी द्वारा पारिश्रमिक की सीमा निर्धारित करना (धारा 200) (Fixation of Limit for Remuneration by Central Govt, or Company)

 

केन्द्र सरकार या कम्पनी धारा 196 के अन्तर्गत या धारा 197 के अन्तर्गत किसी नियुक्ति या पारिश्रमिक के सम्बन्ध में अनुमोदन करते समय यदि कम्पनी के लाभ अपर्याप्त हो या न हो तो इस अधिनियम की सीमाओं के अन्दर कम्पनी के लाभ का प्रतिशत या उसकी राशि, जैसा यह उचित समझें, निश्चित कर सकती है।

पारिश्रमिक निश्चित करते समय केन्द्र सरकार निम्नलिखित बिन्दुओं को ध्यान में रखेगी –

(i) कम्पनी की आर्थिक स्थिति;

(ii) सम्बन्धित व्यक्ति द्वारा किसी अन्य हैसियत से प्राप्त किए गए पारिश्रमिक या कमीशन:

(iii) किसी अन्य कम्पनी से प्राप्त किए गए पारिश्रमिक या कमीशन;

(iv) सम्बन्धित व्यक्ति की पेशेवर योग्यताएं और अनुभव;

(v) अन्य कोई निर्दिष्ट विषय

 

The Companies Act 2013

(a) एक व्यक्ति की सभाएँ। one man meeting

(a) एक व्यक्ति की सभाएँ (One Man Meeting) – बैठक शब्द कम्पनी अधिनियम में कहीं भी परिभाषित नहीं है। आमतौर पर किसी वैध व्यवसाय की चर्चा और लेन-देन के लिए एक कम्पनी को दो या दो से अधिक व्यक्तियों के एक साथ इकट्ठा होने या एक साथ आने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। एक कम्पनी की बैठक को एक सहमति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है या कम्पनी के सामान्य या विशेष व्यवसाय को हस्तान्तरित करने के लिए कम से कम सदस्यों के एक कोरम के साथ आ सकता है।

The Companies Act 2013

1, शार्प बनाम दाएज़ (1971) के मामले में बैठक को “एक वैध उद्देश्य के लिए लोगो की एक सभा “या” किसी भी वैध उद्देश्य के लिए कम से कम दो व्यक्तियों के साथ आने के रूप में परिभाषित किया गया है।

 

2, पी०के० घोष के अनुसार, “आम चिंता के कुछ वैध व्यापार के लेन-देन के लिए किसी भी सभा के दो या अधिक व्यक्तियों के एक साथ आने को बैठक कहा जाता है।”

 

3, के० किशोर के अनुसार, “एक सहमति या पिछले नोटिस द्वारा कम से कम सदस्यों के एक कोरम के साथ आने या एक सामान्य हित के लिए लेन-देन व्यवसाय के लिए आपसी समझौते की बैठक है।” बैठक की उपर्युक्त परिभाषाओं से, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है। कि बैठक कुछ महत्वपूर्ण मामलों पर चर्चा करने और उठाए गए प्रश्नों पर अपनी राय व्यक्त करने के उद्देश्य से एक विशेष स्थान पर कई व्यक्तियों की मण्डली है।

The Companies Act 2013

एक कम्पनी की बैठक के लक्षण (Characteristics of a Company Meeting)

1, दो या अधिक व्यक्तियों (जो कम्पनी के सदस्य हैं।) को बैठक में उपस्थित होना चाहिए।

2, व्यक्तियों की वैधानिक सभा कुछ वैध व्यापार की चर्चा और लेन-देन के लिए होनी चाहिए।

3, बैठक बुलाने के लिए एक पूर्व सूचना दी जानी चाहिए।

4, बैठक किसी विशेष स्थान, तिथि और समय पर होनी चाहिए।

5, बैठक को कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों/नियमों के अनुसार आयोजित किया जाना चाहिए।

एक बैठक बुलाने के लिए, दो या अधिक व्यक्तियों को उपस्थित होना चाहिए। एक बैठक एक व्यक्ति द्वारा गठित नहीं की जा सकती है। हालाँकि कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं जहाँ एक व्यक्ति एक वैध बैठक का गठन कर सकता है।

The Companies Act 2013

कम्पनी की बैठक के प्रकार (Kinds of Company Meetings)

कंपनी की बैठकों को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

1, सांविधिक बैठक

2, वार्षिक आम बैठक

3, असाधारण सामान्य बैठक

4, निदेशक मण्डल की बैठक

5, निदेशकों की बैठक

6, लेनदारों की बैठक

(b) सभा की गणपूर्ति (Quorium) – कम्पनी अधिनियम, 2013 (बाद में इस अधिनियम के रूप में सन्दर्भित) के लिए आवश्यक है कि अधिनियम के तहत स्थापित कम्पनी को समय-समय पर बोर्ड बैठकों के साथ-साथ आम बैठकें आयोजित करनी हों। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कम्पनियाँ इस विनियम का पालन करती है और इस तरह की बैठके ठीक से आयोजित की जाती हैं, इसे एक वैध बैठक के रूप में पूरा करने के लिए एक कोरम की आवश्यकता होती है।

सरल शब्दों में एक ‘कोरम’ का अर्थ है कि उपस्थित सदस्यों की न्यूनतम संख्या अधिनियम के तहत एक सामान्य बैठक, एक बोर्ड बैठक और एक असाधारण आम बैठक के लिए कोरम को इसके प्रावधानों के भीतर गणना की जाती है।

The Companies Act 2013

सामान्य बैठक के लिए आवश्यक कोरम (Quorum Required for a General Meeting)

अधिनियम की धारा 103 में सामान्य बैठक के लिए आवश्यक ‘कोरम’ बताया जाता है। इस धारा के तहत, जब तक कि कम्पनी के ऐसोसिएशन ऑफ आर्टिकल एक बड़े कोरम के लिए प्रदान नहीं करते, न्यूनतम कोरम होना चाहिए।

1, सार्वजनिक कम्पनियों के लिए (For Public Companies) – (i) 5 सदस्य उपस्थित होते हैं जैसे कि बैठक की तारीख पर,

कम्पनी के सदस्यों की संख्या एक हजार से ऊपर नहीं होती है।

(ii) 15 सदस्य उपस्थित होते हैं जैसे कि बैठक की तारीख में एक हजार सदस्य होते हैं, लेकिन पाँच हजार से कम सदस्य होते हैं।

(iii) 30 सदस्य उपस्थित होते हैं जैसे कि बैठक की तारीख में पाँच हजार से अधिक सदस्य होते हैं।

2, निजी कम्पनियों के लिए (For Private Companies) – सदस्यों की संख्या की परवाह किए बिना एक निजी कम्पनी मामले में, कोरम के लिए दो सदस्यों को एक बैठक के लिए उपस्थित होना चाहिए। एक ही खण्ड के उप-खण्ड (2) और (3) अधिनियम के लिए प्रदान करता है जब कोरम पूरा नहीं हुआ है। यदि बैठक शुरू होने के आधे घण्टे के भीतर कोरम मौजूद नहीं है, तो निम्नलिखित विकल्प लागू होंगे

The Companies Act 2013

(i) बैठक स्थगित हो जाएगी और यह उसी दिन या अगले सप्ताह या उसी समय बोर्ड द्वारा निर्धारित किसी अन्य तिथि और समय पर आयोजित की जाएगी। यदि बैठक स्थगित कर दी जाती है तो बैठक की तिथि, समय और स्थान को व्यक्तिगत रूप से या विज्ञापन के माध्यम से सूचित किया जाएगा। विज्ञापन को अंग्रेजी में और साथ ही एक अखबार में स्थानीय भाषा में प्रकाशित किया जाना चाहिए, जो उस स्थान में प्रचलन में है जहाँ कम्पनी का पंजीकृत कार्यालयः स्थित है।

(ii) यदि धारा 100 के तहत अपेक्षितकर्ताओं द्वारा बुलाया जाता है, तो बैठक रद्द कर दी जाएगी।

(iii) उपखण्ड (3) के तहत, यदि कोरम स्थगित बैठक में मौजूद नहीं है, तो उपस्थित सदस्य कोरम होंगे।

(c) सभा की कार्यवाही (Agenda) – एजेण्डा का मतलब होता है काम करना। यह आमतौर पर बैठक की सूचना के साथ भेजा जाता है। यह एक बैठक में चर्चा किए जाने वाले विषयों की सूची है। कभी-कभी सदस्य की राय को शामिल करने के लिए नोटिस के प्रसार के बाद एजेण्डा तैयार किया जाता है। यदि बैठक का विषय गुप्त है, तो एजेण्डा प्रसारित किया जा सकता है। एजेण्डा की कुछ परिभाषाएँ इस प्रकार हैं|

राजेन्द्र पाल और कोरलहल्ली के अनुसार, “एजेण्डा एक दस्तावेज है जो आगे आने वाली बैठक की सामग्री को रेखांकित करता है।”

तो, एजेण्डा एक आइटम अथवा सचिव द्वारा तैयार किए गए मुद्दे हैं, और इन पर चर्चा की जानी है या आगामी सभा में लेन-देन किया जाना है।

The Companies Act 2013

एजेण्डा की विशेषताएँ (Characterstics of Agenda)

एजेण्डा की विशेषताएँ निम्नानुसार बताई जा सकती हैं –

1, आमतौर पर बैठक की सूचना के साथ एजेण्डा भेजा जाता है।

2, यह अन्त में लिखा जाता है, लेकिन बैठक के संयोजक के हस्ताक्षर से पहले या बाद

3, यह अन्त के महत्त्व के अनुसार व्यवस्थित है।

4, विवादास्पद विषयों को अन्त में लिखा जाना चाहिए।

5, विषयों का निर्धारण सचिव द्वारा उच्च अधिकारी या बैठक के संयोजक से किया जाता है।

6, यह संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट तरीके से लिखा गया है।

7, यह एक त्वरित निर्णय लेने में मदद करता है।

8, यह उन सभी विषयों का सम्मिलित करना सुनिश्चित कर सकता है जिन पर एक बैठक में चर्चा की जाएगी।

9, यह बैठक में अनावश्यक बात को नियन्त्रित करने में मदद करता है।

10, यह मीटिंग के मिनट और रेजोल्यूशन को लिखने में मदद करता है।

11, बैठक के सदस्य बैठक से पहले अनौपचारिक रूप से अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

12, यह चेयरपर्सन को मीटिंग को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करता है।

The Companies Act 2013

 

कम्पनी की सभा Meeting of the Company

 

सभा का आशय दो या दो से अधिक व्यक्तियों का किसी पूर्व निर्धारित समय एवं स्थान पर किसी निश्चित विषय पर विचार-विमर्श करने हेतु एकत्र होने पर विचार-विमर्श कर निर्णय लेने से है। दूसरे शब्दों में, सभा पूर्व सूचना के आधार पर एकत्रित दो या दो से अधिक व्यक्तियों का समूह है जो किसी वैध व्यावसायिक कार्य को करने के लिए प्रस्ताव पारित कर निर्णय करता है।

शार्प बनाम डेविस विवाद में ‘सभा’ को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया गया है—“विधि संगत उद्देश्यों के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों का एकत्रित होना सभा है।”

सभा के सामान्य अर्थ की उपर्युक्त विवेचना के उपरान्त कम्पनी सभा को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। जब कम्पनी द्वारा अपने संचालकों, अंशधारियों, ऋणपत्रधारियों आदि को पूर्व सूचना द्वारा कम्पनी से सम्बन्धित विभिन्न मामलों पर विचार-विमर्श करने हेतु किसी एक स्थान पर एकत्र किया जाता है तो उसे कम्पनी की सभा कहते हैं। एक कम्पनी के प्रबन्ध एवं संचालन में इन सभाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इन सभाओं के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 96 से 122 में आवश्यक प्रावधान दिए गए हैं।

The Companies Act 2013

कम्पनी सभाओं के प्रकार (Types of Company’s Meetings)

कम्पनी में अलग-अलग स्तर पर सभाएँ होती है चूँकि प्रत्येक सभा का अलग-अलग उद्देश्य व कार्य होता है। अध्ययन की सुविधा के दृष्टिकोण से कम्पनी की सभाओं को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है—

(I) अंशधारियों की सभाएँ – 1, वर्ग सभाएँ, 2, वार्षिक साधारण सभा, 3, असामान्य सभा।

(II) संचालकों की सभाएँ।

(III) ऋणपत्रधारियों की सभाएँ

(IV) ऋणदाताओं की सभाएँ।

The Companies Act 2013

(1) अंशधारियों की सभाएँ (Meeting of Shareholders) – अंशधारियों की सभाओं को प्रायः निम्न तीन प्रकार से विभाजित किया जा सकता है –

1, वर्ग सभाएँ (Group Meeting) – यदि कम्पनी की अंश पूँजी विभिन्न प्रकार के अंशों में विभक्त है तो प्रत्येक प्रकार के अंशधारियों का समूह एक वर्ग कहलाता है। वर्ग सभा से आशय किसी एक विशेष प्रकार के अंशधारियों की सभा से है। ऐसी सभाओं का आयोजन कम्पनी द्वारा एक विशेष वर्ग के अंशधारियों के लिए किया जाता है। वर्ग समाएँ प्राय: निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए बुलाई जाती हैं –

(i) कम्पनी व सदस्यों के बीच प्रस्तावित किसी समझौते या प्रबन्ध योजना के सम्बन्ध। में विचार-विमर्श करने हेतु|

(ii) कम्पनी द्वारा ऐच्छिक समापन के समय|

(iii) न्यायालय द्वारा अनिवार्य समापन के समय|

(iv) किसी विशेष वर्ग के अंशधारियों के अधिकारों में परिवर्तन करना।

वर्ग सभा में उसी वर्ग के अंशधारी भाग ले सकते हैं जिस वर्ग के लिए ऐसी सभा बुलाई जाती है जैसे यदि शोध्य पूर्वाधिकार अशी की शोधन अवधि बढ़ाने हेतु सभा बुलाई है तो इसमें शोध्य पूर्वाधिकार अंशों के धारक सदस्य ही सभा में भाग लेंगे।

यह उल्लेखनीय है कि ‘अन्तर्नियमों में कोई अलग व्यवस्था न हो तो वर्ग सभाओं के सम्बन्ध में सूचना देने, कार्यवाहक संख्या प्रति पुरुष, मतदान आदि के लिए वे ही सभी नियम लागू होते हैं जो वार्षिक साधारण सभा के लिए लागू होते हैं।

The Companies Act 2013

2, वार्षिक साधारण सभा (Annual General Meeting) – वार्षिक साधारण सभा से आशय सदस्यों की ऐसी सभा से है जो कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रतिवर्ष बुलाई जाती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 96 के अनुसार, प्रत्येक कम्पनी को वर्ष में एक बार वार्षिक साधारण सभा बुलाना आवश्यक है। लेकिन दो वार्षिक सभा of 15 माह से अधिक का अन्तर नहीं होना चाहिए। पहली वार्षिक सभा पहला वित्तीय न्द होने के 9 महीने के अन्दर की जाएगी एवं अन्य किसी दशा में 6 महीने के अन्दर का जाएगी। विशेष कारणों से कम्पनी रजिस्ट्रार इस सभा के कराने की अवधि को 3 महीने तक बढ़ा सकता है, परन्तु कम्पनी की प्रथम वार्षिक साधारण सभा की अवधि बढ़ाने का उसे अधिकार नहीं है। इस सभा में कम्पनी के अन्तिम खाते प्रस्तुत करना, संचालक मण्डल व अंकेक्षक की रिपोर्ट पर विचार करना लाभांश घोषित करना आदि निर्णय लिए जाते हैं।

3, असामान्य साधारण सभा (Extra-ordinary General Meeting) – धारा 100, यह सभा अन्तर्नियमों की व्यवस्था के अधीन संचालकों द्वारा स्वयं अपनी इच्छा से या अंशधारियों की मांग पर बुलाई जाती है। ये सभाएँ उस समय बुलाई जाती है जबकि कम्पनी के समक्ष कोई ऐसा आवश्यक कार्य आ जाए जिसके लिए वार्षिक सभा तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती; जैसे पार्षद सीमानियम में परिवर्तन, पार्षद अन्तर्नियम में परिवर्तन, ऋणपत्रों का निर्गमन, निर्धारित अवधि से पूर्व किसी संचालक को उसके पद से हटाना आदि।

(II) संचालक की सभाएँ (Board Meetings) – निदेशकों (संचालकों) के लिए आवश्यक है कि वे मण्डल की सभाओं के माध्यम से कार्य करें। एक अकेला निदेशक स्वयं कम्पनी की ओर से कोई कार्य करने का अधिकार नहीं रखता, परन्तु निदेशक मण्डल अपनी कुछ शक्तियों को निदेशकों की एक उपसमिति को सौंप सकते हैं।

The Companies Act 2013

1, स्वतन्त्र निदेशक के न होने पर सभा में निर्णय को सभी सदस्यों के बीच में परिचारित करना [ धारा 173 (3)] – स्वतन्त्र निदेशक के मण्डल की सभा में न होने पर ऐसी सभा में लिए गए निर्णय सभी निदेशकों के बीच परिचालित किए जाएंगे और कम-से-कम एक व्यक्ति वाली लघु कम्पनी और निष्क्रिय कम्पनी की दशा में यह माना जाएगा कि कम्पनी ने इस धारा के प्रावधान का अनुपालन कर लिया है। यदि निदेशक मण्डल की कम-से-कम एक सभा एक कैलेण्डर वर्ष के आधे भाग में कर ली गई है और दो सभाओं के बीच 90 दिन से अधिक का अन्तर नहीं है परन्तु शर्त यह है कि इस उपधारा एवं धारा 174 का कुछ भी ऐसी एक व्यक्ति वाली कम्पनी पर लागू नहीं होगा जहाँ इसके निदेशक मण्डल में केवल एक ही निदेशक है।

उपर्युक्त निर्णय स्वतन्त्र निदेशक द्वारा यदि कोई है, पुष्टिकरण किए जाने पर अन्तिम माने जाएँगे।

दण्ड, धारा 173 (4) – कम्पनी का प्रत्येक अधिकारी जिसका कर्तव्य इस धारा अन्तर्गत सभा की सूचना देना है, यदि वह सूचना देने में असफल हो जाता है तो वह पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना देने का दायी होगा।

2, सभा की सूचना – मण्डल को प्रत्येक सभा को उचित सूचना अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। मण्डल की सभा के लिए कम से कम 7 दिन को लिखित सूचना प्रत्येक निदेशक के पंजीकृत पते पर दी जाएगी और ऐसी सूचना हस्त सुपुर्दगी या डाक से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी जा सकती है। 3, सभाओं की संख्या (धारा 173 ) प्रत्येक कम्पनी के लिए इसके निदेशक मण्डल की प्रतिवर्ष कम-से-कम चार सभाएँ इस ढंग से की जाएँगी कि दो लगातार निदेशक मण्डल की सभाओं के बीच 182 दिन से अधिक का अन्तर नहीं होगा।

छूट – केन्द्र सरकार, अधिसूचना के द्वारा यह निर्देश दे सकती है कि उस उपधारा के प्रावधान किसी वर्ग या वर्गों की कम्पनियों पर कुछ अपवाद, संशोधनों एवं शर्तों के साथ लागू होंगे, जैसा कि अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जाए।

4, निदेशकों द्वारा सभा में व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के द्वारा भाग लिया जा सकता है [धारा 173 (2)] – निदेशक सभा में व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग या अन्य श्रवण दृश्य माध्यम से शामिल हो सकते हैं जैसा कि निर्दिष्ट हो जो निदेशकों द्वारा भाग लेने को रिकॉर्ड करने, मान्यता देने एवं सभा की कार्यवाही तिथि तथा समय सहित भण्डारित करने में सक्षम हो परन्तु केन्द्र सरकार अधिसूचना द्वारा उन विषयों को निर्दिष्ट कर सकती है जो वीडियो कॉन्फ्रेन्सिग या अन्य श्रवण दृश्य माध्यम के द्वारा सभा में विचारार्थ नहीं किए जाएँगे।

The Companies Act 2013

5, मण्डल की सभाएँ (धारा 173) – प्रत्येक कम्पनी निदेशक मण्डल की पहली सभा अपने समामेलन के 30 दिन के अन्दर करेगी। (III) ऋणपत्रधारियों की सभाएँ (Meetings of Debentureholders) – ऋणपत्रधारियों की सभा से सम्बन्धित नियम या तो इसके ट्रस्ट पत्र में या ऋण-पत्र में दिए हुए होते हैं। इसकी सभा उस समय बुलायी जाती है जबकि ऋणपत्रधारियों के हित प्रभावित होते हैं। ऋणपत्रधारियों की सभा प्रायः निम्नलिखित परिस्थितियों में बुलायी जाती है।

(1) ऋणपत्रों की शर्तों को परिवर्तित करने के लिए,

(2) समझौता योजनाओं पर विचार करने के लिए।

The Companies Act 2013

(IV) ऋणदाताओं की सभाएँ (Meetings of Lenders) – ऋणदाताओं के हितों को प्रभावित करने वाले मामलों पर निर्णय लेने के लिए ऋणदाताओं की सभाएँ बुलायी जाती हैं। ऐसी सभाएँ कम्पनी द्वारा अथवा ऋणदाताओं की मांग पर न्यायालय द्वारा बुलायी जा सकती है। सामान्यतः ऋणदाताओं की सभाएँ निम्नलिखित परिस्थितियों में बुलाई जाती हैं—

(1) ऋणदाताओं द्वारा ऐच्छिक समापन की समाप्ति पर निस्तारक द्वारा ऋणदाताओं की अन्तिम सभा बुलाना।

[धारा 318]

(2) ऋणदाताओं द्वारा ऐच्छिक समापन का प्रस्ताव पारित करने के लिए।

[धारा 306]

(3) ऋणदाताओं द्वारा ऐच्छिक समापन की अवधि में निस्तारक द्वारा ऋणदाताओं की वार्षिक सभा बुलाना यदि समापन की कार्यवाही एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए जारी रहती है।

(4) कम्पनी द्वारा किसी समझौता योजना को स्वीकार करने की दशा में।

[धारा 230]

(5) कम्पनी की पूँजी के पुनर्गठन अथवा पूँजी में परिवर्तन करने की दशा में|

[धारा 230]

The Companies Act 2013

असामान्य साधारण सभा किसे कहते हैं (What is extra-ordinary meeting)

असाधारण सभा उस समय आयोजित की जाती है जब कम्पनी के समक्ष कोई ऐसा आवश्यक कार्य आ जाए जिसके लिए आगामी वार्षिक सभा तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती: जैसे- पार्षद सीमानियम एवं अन्तर्नियमों में परिवर्तन करना, निर्धारित अवधि से पूर्व किसी संचालक को उसके पद से हटाना आदि।

The Companies Act 2013

असामान्य साधारण सभा कौन बुला सकता है (Who can Call Extra-ordinary General Meeting)

असामान्य साधारण सीमा निम्नलिखित में से किसी के भी द्वारा बुलायी जा सकती है –

(1) संचालक मण्डल द्वारा स्वेच्छा से,

(2) सदस्यों की माँग पर संचालक मण्डल द्वारा,

(3) माँगकर्त्ता सदस्यों द्वारा तथा

(4) अधिकरण द्वारा

The Companies Act 2013

(1) संचालक मण्डल द्वारा स्वेच्छा से – सामान्यतः कम्पनी के अन्तर्नियम के अन्तर्गत संचालक मण्डल को यह अधिकार होता है कि वह आवश्यक प्रस्ताव पारित करके जब कभी चाहे असामान्य साधारण सभा बुला सकता है। इस प्रकार संचालकों द्वारा असामान्य साधारण सभा बुलाने के लिए यह आवश्यक है कि इस आशय का संचालक मण्डल द्वारा अपनी सभा प्रस्ताव पारित किया जाए।

(2) सदस्यों की माँग पर संचालक मण्डल द्वारा – कम्पनी के सदस्यों को सामान्य साधारण सभा बुलाने की माँग करने का अधिकार है। सदस्यों द्वारा माँग करने पर संचालकों को ऐसी सभा बुलाना आवश्यक होता है। असामान्य साधारण सभा बुलाने की माँग निम्नलिखित सदस्यों द्वारा की जा सकती है|

(i) यदि कम्पनी अंश पूँजी वाली है तो कम्पनी की कुल प्रदत्त पूँजी के कम-से-कम 1/10 भाग पर अधिकार रखने वाले सदस्य जिन्हें मत देने का अधिकार है, या

(ii) यदि कम्पनी अंश पूँजी वाली नहीं है तो कम्पनी के मताधिकार के कम-से-कम 1/10 भाग पर अधिकार रखने वाले सदस्य।

 

सदस्यों द्वारा की जाने वाली ऐसी माँग लिखित में होनी चाहिए और इसमें सभा बुलाने के उद्देश्य का उल्लेख किया जाना चाहिए।

ऐसी माँग पर सभा बुलाने की माँग करने वाले सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए और इसे कम्पनी के रजिस्टर्ड कार्यालय में जमा कराया जाना चाहिए। संचालक को माँग पत्र प्राप्ति के 21 दिन के भीतर सभा बुलाने की कार्यवाही शुरू कर देनी चाहिए और 45 दिन के भीतर ऐसी असामान्य साधारण सभा बुला लेनी चाहिए।

(3) माँगकर्त्ता सदस्यों द्वारा – यदि कम्पनी के संचालक माँगपत्र जमा होने के 21 दिन के अन्तर्गत असाधारण सभा बुलाने की कार्यवाही प्रारम्भ नहीं करते तथा मांगपत्र जमा होने की तिथि से 45 दिन के अन्तर्गत सभा बुलाने की सूचना नहीं भेजते हैं तो सभा की माँग करने वाले सदस्यों द्वारा स्वयं कम्पनी के खर्ची पर यह सभा बुलायी जाती है। इस सभा का समस्त खर्चा कम्पनी वहन करेगी जिसे कम्पनी संचालकों के पारिश्रमिक में से काटकर अपनी क्षतिपूर्ति करेगी। मांग करने वाले अंशधारियों द्वारा भी यह मांगपत्र जमा करने के बाद 3 माह के अन्तर्गत आयोजित कर लेनी चाहिए। माँग करने वाले सदस्यों द्वारा कम्पनी की सभा को उसी प्रकार बुलाया जाएगा।

यदि मांग करने वालों द्वारा सभा का आयोजन किया जाता है तो उस सभा में केवल वे ही कार्य किए जा सकते हैं जिनका उल्लेख माँगपत्र में किया गया है। भले ही सभा बुलाने की सूचना में अन्य कार्य दिए गए हों। यदि सदस्यों को यह सभा बुलाने के लिए पंजीकृत स्थान उपलब्ध नहीं कराया जाता तो यह सभा सदस्यों द्वारा किसी भी उचित स्थान पर आयोजित की जा सकती है।

(4) अधिकरण द्वारा – जब कोई कम्पनी इस अधिनियम अथवा अपने अन्तर्नियमों की व्यवस्थाओं के अनुसार वार्षिक सभा के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की सभा आयोजित अथवा संचालित नहीं कर सकती है तो धारा 98 के अन्तर्गत अधिकरण कम्पनी की असामान्य साधारण सभा बुलाने का आदेश दे सकता है। अधिकरण ऐसी सभा बुलाने का आदेश निम्नलिखित दशाओं में देता है

(1) जब अधिकरण स्वयं उपयुक्त समझता है।

(ii) जब कम्पनी का कोई संचालक अधिकरण से प्रार्थना करता है।

(iii) जब कम्पनी की सभा में मतदान का अधिकार रखने वाला कोई सदस्य प्रार्थना करता है|

The Companies Act 2013

असामान्य साधारण सभा कब बुलायी जा सकती है। (When Extra-ordinary General Meeting may be Called)

अथवा

असामान्य साधारण सभा के कार्य अथवा उद्देश्य (Business and Purpose of Extra-ordinary General Meeting)

 

जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि असामान्य साधारण सभा असाधारण एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए ही बुलायी जाती है। आवश्यकता पड़ने पर यह एक वर्ष में कई बार तथा कभी भी बुलायी जा सकती है परन्तु इस सभा में केवल वे ही कार्य किए जा सकते हैं जिन्हें करने के लिए यह सभा बुलायी जाती है। असामान्य साधारण सभा सामान्यतः निम्नलिखित कार्यों को करने के लिए बुलाई जा सकती है –

(1) कम्पनी के सीमानियम के विभिन्न वाक्यों में परिवर्तन करने के लिए; जैसे कार्यालय को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरित करने के लिए, उद्देश्यों में परिवर्तन करने के लिए, अधिकृत पूँजी में परिवर्तन करने एवं पूँजी के पुनर्गठन करने, सदस्यों के दायित्व परिवर्तन करने आदि के लिए।

(2) अन्तर्नियमों में परिवर्तन, संशोधन एवं विस्तार करने के लिए; जैसे— अंशों को बढ़े पर निर्गमित करने, संचालकों के ऋण लेने की अधिकार सीमा बढ़ाने, संचालकों के पारिश्रमिक में वृद्धि करने, संचालकों को ऋण प्रदान करने, एकाकी विक्रय प्रतिनिधि नियुक्त करने, अंकेक्षक नियुक्त करने आदि के लिए।

(3) अन्य किसी मामले पर प्रस्ताव पारित करने के लिए जिसके लिए अधिनियम द्वारा अनिवार्य रूप से व्यवस्था की हुई हो। उदाहरण के लिए, संचालक मण्डल का पुनर्गठन करने के लिए, असाधारण सभा बुलायी जा सकती है। 1986 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने जीवन बीमा निगम को यह अधिकार प्रदान किया था कि वह एस्कोर्ट कम्पनी के संचालक मण्डल का पुनर्गठन करने के लिए असामान्य साधारण सभा बुला सकता है।

The Companies Act 2013

वार्षिक साधारण सभा का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Annual General Meeting, AGM)

वार्षिक साधारण सभा से आशय सदस्यों की ऐसी सभा से है जो कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रतिवर्ष बुलाई जाती है। धारा 96 के अनुसार, प्रत्येक कम्पनी को प्रतिवर्ष अन्य सभाओं के अतिरिक्त सदस्यों की एक साधारण सभा का आयोजन करना आवश्यक है जिसे वार्षिक साधारण सभा कहा जाता है। ऐसी सभा की सूचना में इस बात का उल्लेख किया। जाता है कि यह कम्पनी की वार्षिक साधारण सभा है।

The Companies Act 2013

वार्षिक साधारण सभा के उद्देश्य (Objectives of Annual General Meeting)

कम्पनी की वार्षिक साधारण सभा बुलाए जाने के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

(1) कम्पनी के सदस्यों का कम्पनी के कार्य एवं प्रबन्ध पर अन्तिम नियन्त्रण बनाए

(2) कम्पनी के सदस्यों को कम्पनी के गत वर्ष के कार्यों एवं प्रगति से अवगत कराना।

(3) वार्षिक खातों की अन्तिम स्वीकृति प्राप्त करना।

(4) लाभांश घोषित करना।

(5) सेवानिवृत्त अथवा अन्य कारणों से रिक्त होने वाले संचालकों के पदों पर नवीन संचालकों की नियुक्ति करना।

(6) अंकेक्षकों की नियुक्ति करना।

The Companies Act 2013

वार्षिक साधारण सभा से सम्बन्धित वैधानिक प्रावधान (Statutory Provisions Regarding Annual General Meeting)

1, प्रतिवर्ष सभा बुलाना (Call Meeting Every Year) – प्रत्येक कम्पनी के लिए प्रतिवर्ष वार्षिक साधारण सभा बुलाना आवश्यक है। ऐसी सभा की सूचना में इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाता है कि यह कम्पनी की वार्षिक साधारण सभा है।

2, दो वार्षिक साधारण सभाओं के मध्य समयान्तर (Gap between Two AGMs) – कम्पनी की दो वार्षिक साधारण सभाओं के मध्य 15 माह से अधिक अवधि का अन्तराल नहीं होना चाहिए।

3, प्रथम वार्षिक साधारण सभा का समय (Time of First AGM) – कम्पनी द्वारा प्रथम वार्षिक व्यापक सभा प्रथम वित्तीय वर्ष बन्द होने के 9 महीने के अन्दर की जाएगी एवं अन्य किसी मामले में 6 महीने के अन्दर

4, सभाओं की अवधि बढ़ाना (Extension of Meeting Time) – यद्यपि दो वार्षिक साधारण सभाओं के बीच की अवधि 15 महीनों से अधिक की नहीं होनी चाहिए किन्तु यदि रजिस्ट्रार चाहे तो विशेष कारणों के आधार पर इस अवधि को तीन महीने के लिए बढ़ा सकता है। परन्तु यह ध्यान रहे कि वह रजिस्ट्रार प्रथम वार्षिक साधारण सभा की अवधि को नहीं बढ़ा सकता है।

5, वार्षिक साधारण सभा का समय दिन एवं स्थान (Time Date and Day of AGM) – प्रत्येक वार्षिक साधारण सभा व्यावसायिक घण्टों में किसी भी समय ऐसे दिन, जो कि सार्वजनिक छुट्टी का न हो, बुलायी जाएगी तथा व्यापार के रजिस्टर्ड कार्यालय पर की जाएगी या ऐसे स्थान पर की जाएगी, जो उस शहर, गाँव या कस्बे में हो, जहाँ कम्पनी का रजिस्टर्ड कार्यालय है।

6, केन्द्रीय सरकार द्वारा छूट (Exemption by Central Government) – केन्द्रीय सरकार को यह अधिकार है कि यदि वह चाहे तो किसी भी कम्पनी को उन शर्तों के अन्तर्गत जिन्हें वह उपयुक्त समझे, सभा के समय स्थान तथा दिन सम्बन्धी व्यवस्थाओं से मुक्त कर सकती है।

7, अधिकरण द्वारा वार्षिक साधारण सभा बुलाने की शक्ति (Power of Tribunal to Call AGM) – यदि कम्पनी द्वारा धारा 96 के अन्तर्गत वार्षिक साधारण सभा करने में चूक की जाती है तो अधिकरण इस अधिनियम या कम्पनी के अन्तर्नियम में दिए गए प्रावधान की अनदेखी करके किसी सदस्य के आवेदन पर कम्पनी की वार्षिक साधारण सभा बुला सकता है या बुलाने का निर्देश दे सकता है।

8, एक व्यक्ति की व्यक्तिगत रूप से या प्रतिपुरुष के रूप में उपस्थिति को सभा माना जाना (Presence of One Member of Company in Person or by Proxy shall be Deemed to Constitute Meeting) – केन्द्र सरकार द्वारा दिए गए निर्देश में यह निर्देश भी सम्मिलित हो सकता है कि कम्पनी का एक सदस्य जो व्यक्तिगत रूप से या प्रतिपुरुष के द्वारा उपस्थित है, इस अधिनियम के अन्तर्गत कम्पनी की सभा माना जाएगा।

The Companies Act 2013

9, सभा का सभापति (Chairman of Meeting)

[धारा 104]

(i) जब तक कि कम्पनी के अन्तर्नियमों में कोई अन्य प्रावधान न हो, सभा में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित सदस्य हाथ उठाकर अपने में से किसी एक को सभापति चुनेंगे।

(ii) यदि सभापति के चुनाव के लिए मतदान की माँग की जाती है तो इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार मतदान तुरन्त कराया जाएगा और उपर्युक्त तरीके से हाथ उठाकर चुना गया सभापति उस समय तक सभापति बना रहेगा जब तक मतदान के परिणाम के अनुसार नया सभापति न चुन लिया जाए। शेष सभा के लिए ऐसा चुना गया व्यक्ति सभापति होगा।

10, सभापति के उपस्थित न होने पर (In Absence of the Chairman) – यदि सभा के निर्धारित समय के 15 मिनट के भीतर सभापति उपस्थित नहीं होता या उपस्थित होने के बावजूद सभापति पद स्वीकार नहीं करना चाहता है तो सदस्यों द्वारा सभा में किसी को सभापति चुना जाएगा। यदि सभा में उपस्थित कोई भी संचालक सभापति बनने को तैयार नहीं है तो उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से किसी सदस्य को सभापति चुना जा सकता है।

11, सभा की सूचना (Notice of the Meeting) – वार्षिक साधारण सभा की सूचना सभा से कम-से-कम 21 दिन पूर्व दिया जाना आवश्यक है किन्तु यदि सभा में भाग लेने वाले एवं मत देने का अधिकार रखने वाले कम-से-कम 95 प्रतिशत सदस्य कम अवधि की सूचना पर लिखित अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सहमति दे देते हैं तो कम अवधि की सूचना देकर भी यह सभा बुलायी जा सकती है।

12, सभा की सूचना की विषयवस्तु (Contents of Notice of Meeting) – वार्षिक साधारण सभा की सूचना में सामान्यतः निम्नलिखित बातों का समावेश होना आवश्यक है –

(i) इस आशय का उल्लेख कि वार्षिक साधारण सभा का आयोजन किया जा रहा है।

(ii) सभा का समय, स्थान तथा तिथि।

(iiii) सभा में किए जाने वाले कार्यों का विवरण।

(iv) वित्तीय खातों तथा चिट्ठे की प्रतिलिपि|

(v) संचालकों का प्रतिवेदन |

(vi) अंकेक्षकों का प्रतिवेदन।

(vii) सभा में किए जाने वाले विशिष्ट कार्यों (यदि हो तो) का व्याख्यात्मक विवरण।

[धारा 102]

13, सभा की सूचना प्राप्त करने के अधिकारी (Persons Entitled to get Notice of the Meeting) – वार्षिक साधारण सभा की सूचना सामान्यतः निम्नलिखित को दी जानी चाहिए

(i) कम्पनी का प्रत्येक सदस्य।

(ii) किसी मृतक सदस्य के उत्तराधिकारी।

(iii) दिवालिया सदस्य के राजकीय प्रापक या निस्तारक।

(iv) कम्पनी के अंकेक्षक।

14, कार्यवाहक संख्या (Quorum) – सामान्यतः प्रत्येक कम्पनी के अन्तर्नियमों में कार्यवाहक संख्या का उल्लेख रहता है। यह संख्या अधिनियम द्वारा निर्धारित न्यूनतम संख्या से कम नहीं होनी चाहिए। यदि कम्पनी के अन्तर्नियमों में कार्यवाहक संख्या का उल्लेख नहीं है तो (अ ) सार्वजनिक कम्पनी की दशा में (i) 5 सदस्य व्यक्तिगत रूप से उपस्थित यदि सभा की तिथि को सदस्यों की संख्या एक हजार से अधिक नहीं है, (ii) 15 सदस्य व्यक्तिगत रूप से उपस्थित यदि सभा की तिथि को सदस्यों की संख्या एक हजार से अधिक और पाँच हजार तक है, (iii) 30 सदस्य व्यक्तिगत रूप से उपस्थित यदि सभा की तिथि को सदस्यों की संख्या पाँच हजार से अधिक है। (ब) निजी कम्पनी की दशा मेंव्यक्तिगत रूप से उपस्थित 2 सदस्य कम्पनी की सभा की गणपूर्ति संख्या में गिने जाएंगे।

15, स्थगित सभा (Adjournment of the Meeting) – यदि कम्पनी की किसी वार्षिक साधारण सभा को स्थगित किया जाता है तो ऐसी स्थगित सभा में केवल उन्हीं विषयों पर विचार किया जा सकता है जिन पर पिछली सभा में विचार नहीं किया जा सका। यह सभा निर्धारित अवधि में सम्पन्न होना आवश्यक है।

16, स्थगित सभा की सूचना (Notice of Adjourned Meeting) – यदि वार्षिक साधारण सभा का स्थगन 20 दिन या इससे अधिक अवधि के लिए किया जाता है तो ऐसी स्थगित सभा की सूचना सदस्यों को उसी प्रकार दी जाएगी जैसे मूल वार्षिक साधारण सभा की दी जाती है। अन्य शब्दों में, 20 दिन या अधिक अवधि के लिए स्थगित करने पर सभा की सूचना 21 दिन पूर्व दी जाएगी।

17, दण्ड (Penalty) [धारा 99] – यदि कम्पनी की सभा बुलाने अथवा करने में कोई चूक की जाती है तो कम्पनी और इसका प्रत्येक दोषी अधिकारी जुर्माना देने का भागी होगा जो एक लाख रुपये तक हो सकता है एवं लगातार चूक के सम्बन्ध में इसके अतिरिक्त जुर्माने के साथ प्रत्येक दिन के लिए पाँच हजार रुपये का जुर्माना देने का दायी होगा जिस अवधि के दौरान चूक जारी रहती है।

The Companies Act 2013

वार्षिक साधारण सभा के कार्य (Business of the Annual General Meeting)

वार्षिक साधारण सभा में किए जाने वाले कार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है –

1, साधारण कार्य (General Business) – ‘साधारण कार्य’ नैत्यिक प्रकृति (Routine nature) के होते हैं। ये कार्य प्रतिवर्ष ही साधारण सभा में किए जाते हैं। इन कार्यों में प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं –

(i) कम्पनी के वार्षिक खातों, चिट्ठे, संचालकों तथा अंकेक्षकों रिपोर्ट पर विचार-विमर्श करना तथा उन्हें स्वीकार करना।

(ii) वार्षिक लाभांश की घोषणा करना।

(iii) पारी से रिटायर होने वाले संचालकों के स्थान पर संचालक नियुक्त करना।

(iv) आगामी वित्तीय वर्ष के लिए अंकेक्षकों की नियुक्ति करना तथा उनका पारिश्रमिक निर्धारित करना ।

The Companies Act 2013

2, विशेष कार्य (Special Business) – वार्षिक साधारण सभा में साधारण कार्यों के अतिरिक्त किए जाने वाले सभी कार्य विशेष

कार्य कहलाते हैं। इन कार्यों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं|

(i) कम्पनी के पार्षद अन्तर्नियमों में परिवर्तन करना।

(ii) कम्पनी की अधिकृत पूँजी को बढ़ाना।

(iii) प्रबन्धक अथवा प्रबन्ध संचालक की नियुक्ति करना।

(iv) कम्पनी के पार्षद सीमानियम में परिवर्तन करना।

(v) नए संचालकों की नियुक्ति करना।

The Companies Act 2013

साधारण एवं विशेष कार्य में अन्तर (Difference Between General Business and Special Business) – साधारण एवं विशेष कार्यों में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि सामान्य कार्यों को करने के लिए साधारण प्रस्ताव ही पारित करना पड़ता है, जबकि विशेष कार्यों को करने के लिए साधारण या विशेष किसी भी प्रकार का प्रस्ताव पारित करना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, सभा की सूचना के साथ विशेष कार्यों से सम्बन्धित व्याख्यात्मक विवरण भी भेजना पड़ता है।

Unit 3 The Companies Act, 2013 Mcom Notes
Unit 3 The Companies Act, 2013 Mcom Notes

Related Post:-

Unit 1 The Insolvency and Bankruptcy code, 2016 Mcom Notes
Unit 2 The Competition Act, 2002 Mcom Notes
Unit 4 Corporate Governance 1st Mcom Notes
Unit 5 Corporate Governance 2nd Mcom Notes

The Companies Act 2013


Follow me at social plate Form
FacebookInstagramYouTubeTwitter

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Home
B/M.com
B.sc
Help
Profile
Scroll to Top