Unit 5 Taxation of International Transactions Mcom Notes

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Unit 5 Taxation of International Transactions Mcom Notes

Unit 5 Taxation of International Transactions Mcom Notes:- Unit-V in this post, we want to tell you that, mcom 1st year Taxation of international transactions and non-residents under the Income Tax Act, 1961: Specific provisions relating to non-residents: double taxation relief transfer pricing and Advance rulings. Taxation of International Transactions

 

अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन पर करारोपण (Taxation of International Transactions)

 

अनिवासी का आशय (Meaning of Non-resident)

‘अनिवासी’ का आशय उस व्यक्ति से है जो भारत का निवासी’ अथवा ‘असाधारण निवासी’ नहीं है। एक व्यक्ति का निवास स्थान आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 6 के प्रावधानों के अनुसार, निर्धारित किया जाता है। एक करदाता का ‘निवास स्थान’ ‘नागरिकता’ (Citizenship) एवं ‘निवास’ (Domicile) से पृथक् होता है। किसी व्यक्ति की नागरिकता एवं निवास भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं, जबकि निवास स्थान का निर्धारण आयकर अधिनियम के अनुसार किया जाता है। एक विदेशी नागरिक ‘भारत का निवासी’ हो सकता है तथा एक भारतीय नागरिक ‘अनिवासी’ हो सकता है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 6 एक करदाता का निवास स्थान निर्धारित करने के नियमों की व्याख्या करती है।

(अ) एक व्यक्ति (An individual) अनिवासी है यदि वह धारा 6 (1) में दी गई शर्तों में से एक भी शर्त पूरी नहीं करता है।

(ब) एक हिन्दू अविभाजित परिवार (A Hindu undivided family) अनिवासी है यदि उसका सम्पूर्ण नियन्त्रण एवं प्रबन्ध भारत के बाहर से होता है।

(स) एक फर्म या व्यक्तियों का समुदाय (A Firm or Association of persons) अनिवासी है यदि उसका सम्पूर्ण नियन्त्रण एवं प्रबन्ध भारत के बाहर से होता है।

(द) एक कम्पनी (A Company) अनिवासी है यदि वह –

(i) भारतीय कम्पनी नहीं है; अथवा

(ii) उस वर्ष में उसके प्रभावी प्रबन्ध का स्थान भारत में नहीं है।

(य) प्रत्येक अन्य व्यक्ति (Every other person) अनिवासी है, यदि उसका सम्पूर्ण नियन्त्रण एवं प्रबन्ध भारत के बाहर से होता है।

 

अनिवासी का कर दायित्व (Tax-liability of Non-resident)

धारा 5 (2) के अनुसार, एक अनिवासी करदाता का केवल भारत में प्राप्त अथवा प्राप्त समझी जाने वाली तथा भारत में उपार्जित या उपार्जित समझी जाने वाली आयों पर ही कर देने का दायित्व होता है। अनिवासी विदेशी आयों पर कर देने को दायी नहीं है।

एक अनिवासी करदाता अपनी निम्न आयों पर कर देने को दायी है—

(i) वे सभी आये, जो चाहे किसी भी स्रोत से हों तथा जो गत् वर्ष में उसे अथवा उसकी ओर से भारत में प्राप्त हुई अथवा प्राप्त हुई समझी गई हों;

(ii) वे सभी आयें, जो चाहे किसी भी स्रोत से हों तथा जो गत वर्ष में उसको भारत में उपार्जित या उदय समझी गई हों।

आय के विभिन्न रूपों का स्पष्टीकरण (Explanation of Different Types of Incomes)

करदाता का कर दायित्व निर्धारित करते समय विभिन्न प्रकार की आयों का वर्णन किया गया है, जिनका स्पष्टीकरण निम्नवत् है –

(1) प्राप्त आय – आय की प्राप्ति से आशय प्रथम प्राप्ति से हैं। कोई भी आय अर्जित होने के बाद जहाँ सर्वप्रथम प्राप्ति होती है, वही उस आय का प्राप्ति स्थान होता है। प्राप्ति के बाद यदि उसे कहीं भी भेज दिया जाए तो इससे उसका प्राप्ति-स्थल नहीं बदल सकता। यदि कोई आय, सर्वप्रथम अमेरिका में प्राप्त होती है और बाद में उसे भारत लाया जाता है तो वह भारत में प्राप्त नहीं होगी। आय मुद्रा या वस्तु के रूप में प्राप्त हो सकती है। वस्तु के रूप में प्राप्त आय की प्राप्ति के दिन बाजार मूल्य में परिवर्तित करके उसे मौद्रिक रूप दे दिया जाता है। यदि कोई आय सर्वप्रथम भारत में प्राप्त होती है तो उसके अर्जित होने के स्थान का कोई महत्त्व नहीं होता। प्राप्ति आय की हो, पूँजी प्रकृति की न हो। ‘आय’ के रूप में प्राप्त राशि ही कर दायित्व उत्पन्न करती है।

(2) प्राप्त समझी जाने वाली आय – ऐसी आयें जो गत वर्ष में करदाता को वास्तव में प्राप्त नहीं हुई हैं, बल्कि अधिनियम के अन्तर्गत उन्हें करदाता को प्राप्त हुई मान लिया जाता है। धारा 7 के अनुसार, निम्न आये भारत में प्राप्त हुई मानी जाती हैं—

(i) प्रॉवीडेण्ट फण्ड में वार्षिक वृद्धि – एक कर्मचारी, जो प्रमाणित प्रॉवीडेण्ट फण्ड का सदस्य है, के प्रॉवीडेण्ट फण्ड में गत वर्ष में हुई वार्षिक वृद्धि, अर्थात् कर्मचारी के प्रॉवीडेण्ट फण्ड खाते में जमा हुई ब्याज तथा नियोक्ता का अंशदान। ये राशियाँ वास्तव में कर्मचारी को प्राप्त नहीं होती, बल्कि उसके प्रॉवीडेण्ट फण्ड खाते में जमा होती हैं, परन्तु फिर भी इन्हें कर्मचारी को प्राप्त हुई समझा जाता है।

(ii) प्रमाणित प्रॉवीडेण्ट फण्ड में हस्तान्तरित शेष – प्रमाणित प्रॉवीडेण्ट फण्ड में स्थानान्तरित शेष अर्थात् अप्रमाणित प्रॉवीडेण्ट फण्ड को प्रमाणित फण्ड में परिवर्तित करते समय हस्तान्तरित राशि में नियोक्ता का अंशदान तथा उस पर ब्याज की राशि हस्तान्तरित शेष मानी जाती है। यह राशि यद्यपि कर्मचारी को प्राप्त नहीं होती, परन्तु फिर भी उसको प्राप्त हुई समझा जाता है।

(iii) पेंशन फण्ड में अंशदान – केन्द्रीय सरकार अथवा किसी अन्य नियोक्ता द्वारा गत वर्ष में कर्मचारी के पेंशन फण्ड, जो धारा 80CCD के अन्तर्गत किसी पेंशन योजना से संचालित हैं, में अंशदान। यह अंशदान उस कर्मचारी की भारत में प्राप्त आय मानी जाती है, जिसके पेंशन फण्ड में यह अंशदान किया गया है।

(iv) घोषित, वितरित या भुगतानित लाभांश – धारा 8 के अनुसार, कम्पनी द्वारा घोषित लाभांश उसी गत वर्ष की प्राप्त की हुई आय समझा जाएगा, जिस वर्ष कम्पनी ने लाभांश घोषित, वितरित या भुगतान किया है।

(v) अन्तरिम लाभांश – धारा 8 के अनुसार, अन्तरिम लाभांश उसी गत वर्ष की प्राप्त हुई आय माना जाएगा, जिस वर्ष कम्पनी ने ऐसा लाभांश बिना किसी शर्त के अंशधारियों को उपलब्ध करा दिया है।

(vi) स्त्रोत पर कर कटौती- धारा 198 के अनुसार, स्त्रोत पर आयकर की कटौती को प्राप्त हुई आय समझा जाएगा।

(3) उपार्जित या उदित आय – उपार्जित या उदित दोनों शब्द एक से प्रतीत होते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। आय उपार्जित तब होगी, जबकि उसको प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा, किन्तु उदित तब मानी जाएगी, जब उसे खातों में आय के रूप में प्रदर्शित कर दिया। जाएगा। वैसे दोनों में यह तकनीकी अन्तर आयकर की दृष्टि से नहीं किया जाता है आयकर को दृष्टि से आय ‘उपार्जित एवं उदित’ उस समय मानी जाती है, जब करदाता को उसे प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

(4) उपार्जित या उदित समझी जाने वाली आय – भारत में उपार्जित एवं उदय समझी जाने वाली वे आये हैं जो यद्यपि भारत के बाहर उपार्जित या उदय हुई हैं, किन्तु उन्हें भारत में ही उपार्जित या उदय हुआ मान लिया जाता है। धारा 9 के अनुसार, निम्न आयें भारत में उपार्जित या उदित समझी जाएँगी |

ये सभी आयें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करदाता को निम्न स्रोतों से उपार्जित या उदय हो –

(अ) भारत में किसी व्यापारिक सम्बन्ध से आय; या

(ब) भारत में किसी सम्पत्ति से आय; या

(स) भारत में किसी पूँजी या अन्य स्रोत से आय; या

(द) भारत में स्थित किसी पूँजी सम्पत्ति के हस्तान्तरण से आय

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अग्रिम निर्णय का अर्थ (Meaning of Advance Ruling)

अनिवासी करदाता द्वारा अनावश्यक अपीलों एवं विवादों (मुकदमों) से बचने के लिए, ऐसे पूरे हो चुके व्यवहारों के सम्बन्ध में जिनकी कर निर्धारण की तिथि अभी नहीं आयी है तथा किन्हीं प्रस्तावित व्यवहारों के सम्बन्ध में पूर्व से ही ‘अधिकारी के विचार जानने की प्रक्रिया को ही अग्रिम निर्णय कहते हैं। अग्रिम निर्णय (Advance ruling) करदाता को भावी कार्य-योजना बनाने में सहायता करता है। आयकर अधिनियम, 1961 में अग्रिम निर्णय के सम्बन्ध में एक अलग अध्याय XIX-B जोड़ दिया गया है जो 1 जून, 1993 से प्रभावी हो गया था।

 

अग्रिम निर्णय की परिभाषा (Definitions of Advance Ruling)

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 245-H के अनुसार, अग्रिम निर्णय (Advance ruling) से तात्पर्य –

(i) अनिवासी आवेदक द्वारा सम्पन्न किए जा चुके या सम्पन्न किए जाने वाले व्यवहार के सम्बन्ध में प्राधिकारी द्वारा निर्धारण (determination) करने से है अथवा

(ii) एक निवासी आवेदक द्वारा एक अनिवासी के साथ सम्पन्न किए जा चुके या सम्पन्न किए जाने वाले व्यवहार के सम्बन्ध में ऐसे अनिवासी के कर दायित्व का प्राधिकारी द्वारा निर्धारण करने से है, अथवा

(iii) एक निवासी द्वारा अनिवासी आवेदक के साथ सम्पन्न किए जा चुके या सम्पन्न किए जाने वाले व्यवहार के सम्बन्ध में ऐसे निवासी के कर दायित्व का प्राधिकारी द्वारा निर्धारित करने से हैं; तथा ऐसे कर निर्धारण के आवेदन में प्रदत्त किसी विधि (law) सम्बन्धी या तथ्य (Fact) सम्बन्धी प्रश्न का निर्धारण भी सम्मिलित होता है।

(iv) किसी भी आयकर प्राधिकारी अथवा ट्रिब्यूनल के समक्ष कुल आय की गणना के सम्बन्ध में लम्बित पड़े मामले में प्राधिकारी अथवा ट्रिब्यूनल द्वारा निर्णय करने से है तथा ऐसे निर्णय (decision) में उस विधि सम्बन्धी एवं तथ्य सम्बन्धी प्रश्न पर निर्णय करना भी सम्मिलित है, जो आवेदन में उल्लेखित कुल आय की गणना से सम्बन्धित है।

(v) प्राधिकारी द्वारा एक निर्धारण या निर्णय से है जो एक निवासी या अनिवासी द्वारा सम्पन्न की जाने वाली व्यवस्था है तथा एक अनानुमोदित बचाव व्यवस्था है जो भले ही अध्याय XA में संदर्भित है अथवा नहीं।

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अग्रिम निर्णय प्राप्त करने वाले प्राधिकारी (Adjudicating Authority)

करदाता द्वारा अग्रिम निर्णयों के सम्बन्ध में आवेदन अग्रिम निर्णयों के लिए प्राधिकारी के समक्ष ही कर सकेगा जोकि इस प्रकार होंगे कोई भी ऐसा व्यक्ति निम्न पदों के लिए योग्य अर्ह होगा जो –

1, अध्यक्ष की दशा में सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश तथा किसी भी उच्चन्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अथवा कम से कम 7 वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहा हो।

2, उपाध्यक्ष की दशा में किसी भी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो।

3, राजस्व सदस्य की दशा में, वह व्यक्ति जो रिक्तता (Vacancy) की तिथि को –

(i) भारतीय राजस्व सेवा (Indian Revenue Service) से हो तथा जो बोर्ड का सदस्य होने की अर्हता रखता हो, या

(ii) भारतीय सीमा शुल्क एवं केन्द्रीय उत्पादन कर सेवा से हो तथा जो केन्द्रीय उत्पादन एवं सीमा शुल्क बोर्ड (Central Board of Excise and Customs) का सदस्य होने की अर्हता रखता हो । भारतीय राजस्व सेवा (Indian Revenue Service) का सदस्य रहा हो तथा प्रमुख कमिश्नर या प्रमुख डायरेक्टर जनरल या मुख्य कमिश्नर या डायरेक्टर जनरल हो।

4, विधि सदस्य की दशा में रिक्तता की तिथि को भारतीय विधि सेवा (Indian Legal Service) का सदस्य रहा हो तथा भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव (Additional Secretary) के लिए अर्ह है अथवा अर्ह रहा हो।

5, प्राधिकारी का मुख्य कार्यालय दिल्ली परिक्षेत्र में स्थापित होगा तथा इसकी सभी ब्रांचों की स्थापना भी इसी परिक्षेत्र में ही होगी।

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अग्रिम निर्णय की प्रयुक्तता (Applicability of Advance Ruling)

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 245-8 के अनुसार, अग्रिम निर्णय निम्न पर बाध्य (binding) (लागू) होगा –

1, उस आवेदक पर जिसने उसकी माँग की है।

2, उस व्यवहार पर जिसके सम्बन्ध में अग्रिम निर्णय की माँग की गई है।

3, आवेदक एवं उस व्यवहार से सम्बन्धित प्रमुख आयुक्त या आयुक्त तथा उसके अधीन आयकर प्राधिकारियों पर जिसके सम्बन्ध में अग्रिम निर्णय की माँग की गई। उपर्युक्त के सम्बन्ध में अग्रिम निर्णय उस समय तक लागू होता रहेगा, जब तक कि उस कानून में या उन तथ्यों में परिवर्तन न हो जाए जिनके आधार पर अग्रिम निर्णय की घोषणा की गई हो।

 

कुछ परिस्थितियों में अग्रिम निर्णय व्यर्थ होता है (Advance Ruling is Void in Certain Circumstances)

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 245 T के अनुसार, यदि अग्रिम निर्णय के बाद कभी यह ज्ञात होता है कि आवेदक ने कपट या तथ्यों के मिथ्या वर्णन द्वारा अग्रिम निर्णय आदेश प्राप्त किया है तो ऐसा अग्रिम निर्णय आदेश प्रारम्भ से ही व्यर्थ (Void ab initio) माना जाएगा।

अग्रिम निर्णय के व्यर्थ घोषित करने के आदेश की एक प्रति आवेदक एवं मुख्य आयुक्त या आयुक्त को प्रेषित की जाएगी।

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अनिवासी करदाता की आय का निर्धारण (Determination of Income of Non-resident Assessee)

अनिवासी करदाता पर कर निर्धारण करने से पूर्व उसकी सकल कुल आय ज्ञात करनी पड़ती है। सकल कुल आय की गणना के लिए आयकर अधिनियम में निम्नलिखित प्रावधान दिए गए हैं –

(1) सामान्य व्यापार की आय का निर्धारण – आयकर नियमावली, 1962 के नियम 10 के अनुसार, यदि कर निर्धारण अधिकारी की सम्मति में एक अनिवासी की भारत में उपार्जित अथवा उदित आयों की गणना ठीक प्रकार से नहीं की जा सकती है तो वह निम्न में से किसी भी विधि से अपनी आय की गणना कर सकता है –

(i) भारत में उपार्जित या उदित बिक्री का वह प्रतिशत, जिसे कर निर्धारण अधिकारी उचित समझे; अथवा

(ii) अनिवासी के व्यापार या पेशे के कुल लाभों (इस अधिनियम प्रावधानों के अन्तर्गत गर्णित) का वह प्रतिशत जो अनिवासी की भारत में उपार्जित अथवा उदित होने वाली प्राप्तियों का उसकी कुल प्राप्तियों से है अथवा

(iii) किसी भी अन्य ऐसी विधि से जिसे कर निर्धारण अधिकारी उचित समझे।

(2) बीमा व्यवसाय की आय का निर्धारण – अधिनियम की प्रथम अनुसूची के नियम

6 के अनुसार, एक अनिवासी द्वारा संचालित बीमा व्यवसाय के लाभों का निर्धारण, आवश्यक विश्वसनीय आँकड़ों की अनुपस्थिति में निम्न सूत्र से ज्ञात किया जाएगा –

Taxable Profits = Total World Income x Premium derived from India × Total Premium

इस प्रकार, बीमा व्यवसाय की भारत में कर योग्य आय उसकी कुल विश्व की आय भारत में प्राप्त प्रीमियम से कुल प्रीमियम पर अनुपात होगी। भारत में अनिवासी किसी व्यक्ति की जीवन बीमा व्यवसाय के सम्बन्ध में कुल विश्व आयों की गणना उसी विधि से की जाएगी जो इस अधिनियम में भारत में जीवन बीमा व्यवसाय के लाभ-हानि की गणना के लिए निर्धारित है।

(i) समुद्री जहाज संचालन व्यापार की आय (Income from shipping business) [धारा 44-B] – एक अनिवासी, जो समुद्री जहाजों के संचालन के व्यापार में संलग्न है, की कुल आय तदर्थ आधार (Adhoc basis) पर गर्णित की जाती है। एक अनिवासी द्वारा जहाज के संचालन के कारोबार में प्राप्त या प्राप्य (Received or receivable) कुल भाड़े का विलम्ब शुल्क (Demurrage charge), उठाने-रखने के व्यय (Handling charges) आदि को सम्मिलित करते हुए 7.5% उसकी कर योग्य आय मानी जाती है। यह भाड़ा यात्रियों, माल, पशु, डाक तथा अन्य सामान भारत में किसी बन्दरगाह पर अथवा भारत के बाहर किसी बन्दरगाह (Port) पर ले जाने के लिए प्राप्त या प्राप्य हो सकता है।

(ii) खनिज तेल निकालने के व्यापार की आय (Profit of the business of exploration etc. of mineral oils) (धारा 44 BB] – एक अनिवासी करदाता जो भारत में खनिज तेल की खोज करने या निकालने या उत्पादन करने के व्यापार में लगा है, यदि इस सम्बन्ध में अपनी सेवाएँ या सुविधाएँ प्रदान करता है अथवा इन कार्यों के लिए अपनी मशीने किराये पर देता है तो इस सन्दर्भ में उसे जो राशि प्राप्त या प्राप्य (due) होती है (चाहे वह राशि भारत में देय या प्राप्त हो अथवा भारत के बाहर), उसका 10% उस करदाता का कर योग्य लाभ माना जाता है।

यदि करदाता उचित खाता-पुस्तकें एवं प्रपत्रों का रख-रखाव करता है तथा इनका अंकेक्षण कराता है एवं अंकेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो वह यह दावा कर सकता है कि उसके लाभ एवं प्राप्तियाँ 10% से कम हैं। ऐसी दशा में कर निर्धारण अधिकारी करदाता की कुल आय का पुनः निर्धारण करेगा तथा करदाता द्वारा देय आयकर अथवा करदाता को देय वापसी की गणना करेगा।

(iii) हवाई जहाज संचालन व्यापार की आय (Income from aircraft business) [धारा 44 BBA] – एक अनिवासी, जो हवाई जहाजों के संचालन के कारोबार में संलग्न हैं, की कुल आय तदर्थ आधार (adhoc basis) पर गर्णित की जाती है। एक अनिवासी द्वारा हवाई जहाज के संचालन के कारोबार में यात्रियों, माल, पशु, डाक तथा अन्य सामान ले जाने तथा लाने के लिए प्राप्त या प्राप्य (received or receivable) सम्पूर्ण भाड़े का 5% उसकी कर योग्य आय मानी जाती है।

(iv) ऊर्जा योजनाओं में निर्माण आदि कार्यों के व्यापार के लाभ (Profit of the business of civil construction etc. in certain turnkey power projects) [धारा 44 BBB] – किसी ऐसी विदेशी कम्पनी करदाता की दशा में, जो किसी ऐसी ऊर्जा योजना, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है तथा किसी अन्तर्राष्ट्रीय सहायता योजना (International aid programme) द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त है, के निर्माण कार्य अथवा प्लाण्ट एवं मशीन लगाने या उसको चालू करने के व्यापार में लगी है तो ऐसे व्यापार से कम्पनी को प्राप्त या देय (due) राशि का 10% कम्पनी की कर योग्य व्यापारिक आय मानी जाएगी। यदि करदाता उचित खाता-पुस्तकें एवं प्रपत्रों का रख-रखाव करता है तथा इनका अंकेक्षण कराता है एवं अंकेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो वह यह दावा कर सकता है कि उसके लाभ एवं प्राप्तियाँ 10% से कम हैं। ऐसी दशा में कर निर्धारण अधिकारी करदाता की कुल आय का पुनः निर्धारण करेगा तथा करदाता द्वारा देय आयकर अथवा करदाता को देय वापसी की गणना करेगा।

(v) मुख्य कार्यालय व्ययों की कटौती (Deduction of head-office expenses) [धारा 44-C] – यदि किसी अनिवासी करदाता की शाखा भारत में है तथा मुख्य कार्यालय भारत के बाहर है तो भारत में स्थित शाखा की व्यापारिक आय की गणना करते समय मुख्य कार्यालय के व्यय निम्नलिखित सीमा तक ही घटाए जाएँगे –

(अ) समायोजित कुल आय (Adjusted total income) का 5%, अथवा यदि समायोजित कुल आय हानि है तो करदाता की समायोजित औसत कुल आय (Average adjusted total income of the assessee) का 5%; अथवा

(ब) भारतीय कारोबार से सम्बन्धित मुख्य कार्यालय के वास्तविक व्यय (दोनों में जो भी कम हैं)

नोट – (अ) समायोजित कुल आय का आशय आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार गर्णित उस कुल आय से है, जिसमें से निम्न नहीं घटाए गए हैं—

(i) इस धारा के अन्तर्गत कोई भी मुख्य कार्यालय भत्ता, (ii) अशोधित ह्रास, (iii) विनियोग भत्ता, (iv) विकास छूट, (v) विकास भत्ता, (vi) कम्पनी द्वारा अपने सदस्यों में परिवार नियोजन के प्रोत्साहन हेतु किया गया व्यय, (vii) आगे लायी गई हानियाँ (viii) धारा 80 की कटौतियाँ।

(ब) समायोजित औसत कुल आय से तात्पर्य निम्न से है- (i) गत 3 वर्षों की समायोजित कुल आयों के योग का 1/3,

(ii) यदि यह आय 3 वर्ष से कम अवधि के लिए है तो उसी अवधि की औसत आय।

(vi) विदेशी कम्पनी की रॉयल्टी आदि से आय (Income from royalty etc. in the case of foreign companies) [ धारा 44 D] – इस धारा में ऐसी विदेशी कम्पनी आती है, जो सरकार से अथवा किसी भारतीय संस्था से तकनीकी सेवाओं के बदले कोई रॉयल्टी अथवा फीस प्राप्त करती है। विदेशी कम्पनी द्वारा तकनीकी सेवाओं के बदले प्राप्त या प्राप्य (due) रॉयल्टी या फीस की सकल राशि के 20% के बराबर विदेशी कम्पनी की स्वीकृत व्यापारिक कटौती मानी जाती है। बशर्ते कि विदेशी कम्पनी का तकनीकी सेवाएँ प्रदान करने का प्रसंविदा सरकार से अथवा भारतीय संस्था से 1 अप्रैल, 1976 से पूर्व हो गया था। 31 मार्च, 1976 के बाद किन्तु 1 अप्रैल, 2003 से पूर्व प्रसंविदा होने की दशा में उक्त कटौती स्वीकृत नहीं होगी।

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अनिवासी करदाताओं की कुल आय की गणना (Computation of Total Income of Non-Resident Assessee)

अनिवासी करदाताओं की कुल आय की गणना भी आयकर अधिनियम की विभिन्न व्यवस्थाओं के अन्तर्गत ठीक उसी प्रकार से की जाती है, जिस प्रकार से निवासी करदाताओं के लिए की जाती है। ऐसा करते समय हमें आयकर अधिनियम की निम्नलिखित व्यवस्थाओं को विशेष रूप से ध्यान में रखना चाहिए –

(I) वे छूटें और कटौतियाँ एवं कर-मुक्त आयें जो निवासी करदाताओं के लिए नहीं होती, परन्तु अनिवासी करदाताओं के लिए होती हैं और

(II) वे छूटे और कटौतियाँ एवं कर-मुक्त आयें जो अनिवासी करदाताओं के लिए नहीं होतीं, परन्तु निवासी करदाताओं के लिए होती हैं।

I, अनिवासी करदाताओं को उपलब्ध छूटें एवं कटौतियाँ – अनिवासी करदाताओं को उपलब्ध छूटे एवं कटौतियाँ निम्न प्रकार हैं (1) अनिवासी द्वारा प्रतिभूतियों अथवा बॉण्डों पर प्राप्त व्याज तथा अनिवासी (बाह्य) के खाते पर व्याज।

(2) बचत प्रमाण पत्रों पर ब्याज यदि उन्हें परिवर्तनीय विदेशी विनिमय से खरीदा जाए।

(3) मुफ्त या रियायती यात्रा धनराशि या भारत का नागरिक नहीं होने पर प्राप्त पारिश्रमिक।

(4) विदेशी कम्पनी की तरफ तकनीकी सेवाओं की फीस पर देय आयकर।

(5) विदेशी कम्पनी अथवा अनिवासी की ओर से कुछ विशेष प्रकार की आय पर देय कर।

(6) वायुयान किराये पर देने से प्राप्त आय।

(7) भारतवर्ष में सुरक्षा से सम्बन्धित कार्य में तकनीकी सेवा के बदले विदेशी कम्पनी की आय।

(8) भारत के बाहर प्राप्त भत्ते या अनुलाभ।

(9) सहकारी तकनीकी सहायता कार्यक्रम के अधीन प्राप्त पारिश्रमिक।

(10) विदेशी जहाज पर नौकरी से आय

(11) अनिवासी सलाहकार एवं उसके विदेशी नियोक्ता को प्राप्त फीस या पारिश्रमिक।

 

II, अनिवासियों को न दी जाने वाली छूटें – एक अनिवासी करदाता को निम्नलिखित छूटे प्राप्त नहीं होती है –

(1) अपंग आश्रित के रख-रखाव व चिकित्सा हेतु छूट (धारा 80 DD)

(2) विशिष्ट रोगों की चिकित्सा उपचार के व्ययों पर छूट (धारा 80 DDB)

(3) पेटेन्ट से प्राप्त रॉयल्टी के सम्बन्ध में छूट (धारा 80RRB)

(4) शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति को छूट (धारा 80 U)

(5) कर की गणना करते समय दीर्घकालीन पूँजी लाभों को घटाने के बाद अन्य आय ₹2,50,000 से कम होने पर दीर्घकालीन पूँजी लाभों में से कमी की राशि को घटाने की सुविधा धारा 112 के अनुसार अनिवासी को उपलब्ध नहीं है।

 

अनिवासी भारतीय के लिए विशेष प्रावधान (Special Provisions for Indian Non resident)  अनिवासी भारतीय का अर्थ एक ऐसे व्यक्ति से है जो भारत का नागरिक है या भारतीय मूल का है और जो ‘निवासी’ नहीं है। अनिवासी भारतीय की ‘विनियोग आय’ ज्ञात करते समय किसी तरह के खर्चे या कटौती की व्यवस्था नहीं है। ऐसे करदाता की सकल कुल आय में यदि केवल Investments की आय अथवा दीर्घकालीन पूँजी लाभ अथवा दोनों ही सम्मिलित है तो उसे धारा 80C से धारा 80U की कटौतियाँ नहीं देते हैं तथा पूँजी लाभों की गणना करते समय सूचकांकित लागत की सुविधा नहीं दी जाती है। विनियोग की आय पर 20% तथा दीर्घकालीन पूँजी लाभ पर 10% की दर से कर लगता है।

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कर की गणना (Computation of Tax)

गैर-कम्पनी करदाता (Non-company assessee) सभी अनिवासी करदाताओ पर (कम्पनी को छोड़कर) उन्हीं दरों से आयकर लगाया जाता है जो निवासी करदाताओं पर लागू होती है।

कम्पनी करदाता (Company assessee) विदेशी कम्पनी की कुल आय पर कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए निम्न दरों से आयकर लगाया जाएगा –

(i) एक भारतीय कम्पनी से प्राप्त रॉयल्टी (जो 1 अप्रैल, 1961 से 31 मार्च, 1976 तक की अवधि में किसी भारतीय संस्था से हुए प्रसंविदे के अन्तर्गत प्राप्त हुई हो) एवं फीस (जो 1 मार्च, 1964 से 31 मार्च, 1976 के मध्य केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी तकनीकी सेवा के अनुबन्ध के अन्तर्गत उदय हुई हो) से प्राप्त राशि के सम्बन्ध में 50%

(ii) विदेशी कम्पनी की अन्य आयों में सम्बन्ध में 40%

अधिकर (Surcharge) अनिवासी एक व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार, व्यक्तियों का समुदाय या व्यक्तियों का संघ करदाता की दशा में गणित आयकर पर 10% की दर से अधिकर लगाया जाएगा बशर्ते कि करदाता की कुल आय ₹50 लाख से अधिक है किन्तु ₹1 करोड़ से अधिक नहीं है। यदि कुल आय ₹1 करोड़ से अधिक है तो 15% दर से अधिभार लगाया जाएगा। यदि करदाता की कुल आय ₹50 लाख से अधिक नहीं है, तो सरचार्ज देय नहीं होगा।

एक अनिवासी कम्पनी करदाता की दशा में गणित आयकर पर 2% की दर से अधिकर लगाया जाएगा बशर्ते कि अनिवासी कम्पनी करदाता की कुल आय 1 करोड़ से अधिक किन्तु ₹10 करोड़ से अधिक नहीं है, किन्तु यदि अनिवासी कम्पनी करदाता की कुल आय ₹10 करोड़ से अधिक है तो अधिकर की दर गणित आयकर पर 5% होगी।

स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर (Health and education cess) आयकर एवं अधिकर का 4% होगी।

वैकल्पिक न्यूनतम कर (Alternate minimum tax) अनिवासी एक व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार, व्यक्तियों के संघ/निकाय की दशा में करदाता द्वारा देव AMT को दर समायोजित कुल आय के 18.5% (+ SC, if payable) + HEC) होगी। न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum alternate tax) अनिवासी कम्पनी करदाता की दशा में कम्पनी द्वारा देय MAT की दर कम्पनी के पुस्तकीय लाभों के 18.5% (+ SC, if payable + HEC) होगी।

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दोहरे करारोपण की छूट से क्या आशय है? इस सम्बन्ध में आयकर अधिनियम के प्रावधान बताइए। What is the meaning of double taxation relief ? Give the provisions of Income Tax Act in this connection.

जब कोई करदाता एक ही आय पर दो देशों में कर देता है, तो उसे दोहरा करारोपण’ कहा जाता है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि एक करदाता अपनी विदेशी आय पर उस देश में भी आयकर चुकाता है, जहाँ उसे वह आय उदित या उपार्जित हुई है तथा उसी आय पर भारत में भी आयकर चुकाता है। उदाहरणार्थ, भारत में निवासी कोई व्यक्ति अगर इंग्लैण्ड में कोई आय कमाता है, तो उसे उस आय पर इंग्लैण्ड में आयकर चुकाना होगा, जो उस देश के कर नियमों के अनुसार गणित और देय होगा। इंग्लैण्ड की उस आय पर उसे भारत में भी कर चुकाना होगा, क्योंकि एक निवासी अपनी सम्पूर्ण विदेशी आयों पर भारत में कर चुकाने को दायी है। इस प्रकार भारत के इस निवासी ने अपनी विदेशी आय पर दो अलग-अलग देशों में कर चुकाया। यही दोहरा करारोपण है।

विदेशी सरकार से समझौता (Agreement with Foreign Government)

इस प्रकार के दोहरे करारोपण से बचने के लिए तथा करदाता को ऐसे करारोपण से राहत दिलाने के लिए आयकर अधिनियम की धाराएँ 90, 904 एवं 91 में विभिन्न प्रावधान हैं। धारा 90(1) के प्रावधानों के अनुसार, केन्द्रीय सरकार भारत के बाहर की किसी भी विदेशी सरकार अथवा विशिष्ट क्षेत्र की सरकार से निम्न के लिए समझौता कर सकती है –

(अ) कर से छूट प्रदान करना (Granting relief from tax) – ऐसी आय के सम्बन्ध में छूट देने का समझौता, जिस पर दोनों देशों में आयकर लगाया गया है, अर्थात् जिस आय पर भारत में भी आयकर लगाया गया है तथा उस पर दूसरे देश में अथवा विशिष्ट क्षेत्र में, जैसी भी स्थिति हो, आयकर लगाया गया है।

(ब) निम्न के सम्बन्ध में छूट प्रदान करने के लिए

(ii) ऐसी आय के सम्बन्ध में, जिस पर इस अधिनियम के अन्तर्गत अथवा उस देश के अधिनियम के अन्तर्गत अथवा विशिष्ट क्षेत्र में, जैसी भी स्थिति हो, आयकर चुकाया जा चुका है; अथवा

(ii) ऐसे आयकर के सम्बन्ध में, जो इस अधिनियम के अन्तर्गत देय है तथा सम्बन्धित दूसरे देश अथवा विशिष्ट क्षेत्र में, जैसी भी स्थिति हो, अधिनियम के अन्तर्गत भी देय है, देशों के आपसी आर्थिक सम्बन्ध, व्यापार अथवा विनियोग बढ़ाने के लिए, देय हो ।

(स) दोहरा करारोपण रोकना (Avoiding double taxation) – किसी आय को दोहरे करारोपण से बचाने का समझौता अर्थात् ऐसा समझौता करना, जिसके परिणामस्वरूप किसी आय-विशेष पर या तो भारत में कर लगे या उस अन्य देश या विशिष्ट क्षेत्र में कर लगे ।

(द) कर चोरी एवं कर-अपवंचना रोकना (Preventing tax evasion or tax avoidance ) – इस अधिनियम के अन्तर्गत अथवा उसे दूसरे देश के अधिनियम के अन्तर्गत विशिष्ट क्षेत्र के अधिनियम के अन्तर्गत जैसी भी स्थिति हो, (जिस देश के साथ समझौता किया जाता है) कर-चोरी (tax-evasion) अथवा कर अपवंचना (tax-avoidance) को रोकने के लिए सूचनाओं को आदान-प्रदान करने का समझौता अथवा ऐसे कर चोरी या कर अपवंचना के मामलों की जाँच (investigation) करने हेतु सूचनाओं के आदान-प्रदान करने का समझौता।

(इ) आयकर वसूली के लिए (For recovery of income tax) भारत में तथा उस देश में अथवा विशिष्ट क्षेत्र में (जिससे समझौता किया गया है) कर वसूल करने का समझौता। सरकार ऐसे समझौते के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में आवश्यक प्रावधान बनाकर सरकारी गजट में प्रकाशित करा सकती है।

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समझौते के प्रकार (Types of Agreements)

दोहरे करारोपण की छूट के विदेशों के साथ किए जाने वाले समझौते (प्रसंविदे) सामान्यतः दो प्रकार के होते हैं–

(1) सीमित समझौते (Limited agreements)

(2) पूर्ण समझौते (Comprehensive agreemtns)।

(1) सीमित समझौते – ये सामान्यतः निम्न दशाओं में दोहरे करारोपण से बचने के लिए किए जाते हैं –

(अ) जहाजों के संचालन से होने वाले लाभों के सम्बन्ध में;

(ब) हवाई जहाज के संचालन से होने वाले लाभों के सम्बन्ध में;

(स) माल या भाड़े से होने वाली आय के सम्बन्ध में।

(2) पूर्ण समझौते – ये समझौते लगभग सभी मामलों में दोहरे करारोपण से बचने के लिए किए जाते हैं जैसे अचल सम्पत्ति से होने वाले लाभ, पूँजी लाभ, विनियोगों से आय, अशो एवं प्रतिभूतियों से आय, रॉयल्टी अथवा तकनीकी फीस तथा अन्य कोई भी आय आदि।

दोहरे करारोपण को रोकने का समझौता (Agreement for Avoiding Double Taxation)

दोहरे करारोपण को रोकने के समझौते के अन्तर्गत करदाता किसी आय विशेष पर किसी भी एक देश में ही कर चुकाता है। इसमें करदाता दोनों देशों में कर चुकाने तथा बाद में दोहरे करारोपण की छूट माँगने के झंझट से मुक्त रहता है, जैसा कि दोहरे करारोपण की छूट के समझौते के अन्तर्गत होता है। दोहरे करारोपण रोकने के समझौते के अन्तर्गत प्रत्येक आय की प्रकृति एवं स्रोत के आधार पर यह निर्धारित कर लिया जाता है कि किस आय पर तथा आय के किस भाग पर दूसरे देश में कर लगेगा। सामान्यतया जो आय जिस देश के क्षेत्र में आती है उसी छूट देश में उस पर कर लगाने का प्रावधान रखा जाता है।

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समझौते न होने की दशा में दोहरे करारोपण की (Relief from double taxation when there is no agreement with the other country)

जिन देशों के साथ भारत सरकार का दोहरे करारोपण सम्बन्धी छूट या बुचाव का कोई समझौता नहीं है, ऐसे देशों में भुगतान किए गए आयकर के सम्बन्ध में धारा 91 (1) के अन्तर्गत कुछ छूट मिलती है। इस छूट को पाने के लिए अग्र शर्तें पूरी होनी चाहिए—

(अ) करदाता गत वर्ष में भारत में निवासी रहा हो;

(ब) आय भारत के बाहर उपार्जित और उदित हुई हो, जिसे भारत में उपार्जित या उदित हुआ नहीं माना जा सकता।

(स) उस आय पर भारत में तथा जिस देश में उसे आय उपार्जित और उदित हुई है, उस देश में उसने आयकर चुका दिया है तथा

(द) उस देश के साथ, जिसमें आय उपार्जित और उदय हुई है तथा आयकर चुकाया गया है, भारत सरकार का दोहरे करारोपण सम्बन्धी छूट या बचाव का कोई समझौता नहीं है।

एकपक्षीय छूट (Unilateral relief) करदाता द्वारा दूसरे देश में चुकाए गए आयकर के सम्बन्ध में उस विदेशी आय भारत में देय आयकर में से निम्न छूट मिलेगी

(अ) विदेश में कर लगी आय पर भारतीय कर की दर से गणित राशि अथवा

(ब) विदेश में कर लगी आय पर उसी देश की कर की दर से गणित राशि (जो भी दोनों में कम हो) ।

पाकिस्तान की कृषि आय के सम्बन्ध में छूट (Relief in connection with the agricultural income of Pakistan) -पाकिस्तान की कृषि आय भारतीय करदाता के लिए कर योग्य आय होती है और उस पर भारत में आयकर देना पड़ता है, किन्तु पाकिस्तान की कृषि आय पर पाकिस्तान में आयकर अथवा कृषि आयकर लगाया जा सकता है। वैसे भारत सरकार का पाकिस्तान सरकार के साथ सभी प्रकार की आयो के सम्बन्ध में दोहरे करारोपण की छूट सम्बन्धी समझौता है, किन्तु यह समझौता कर मुक्त आयों के सम्बन्ध में लागू नहीं होता। अतः कृषि आय, चूंकि भारत में कर मुक्त है, उस समझौते में कृषि आय सम्मिलित नहीं। है। अब यदि भारतीय करदाता ने पाकिस्तान में कोई कृषि आय अर्जित की है और उस आय पर पाकिस्तान में कर चुकाया गया है, तो उस पर दोहरा करारोपण हो सकता है, क्योंकि भारतीय करदाता, जो निवासी है, उस आय पर भारत में भी कर चुकाने को दायी है।

अतः आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 91(2) के अनुसार, ऐसे करदाता को भारत में उसके द्वारा देय आयकर में से निम्न छूट दी जाएगी –

(अ) ऐसी आय पर पाकिस्तान में किसी भी कानून के अन्तर्गत, लगा कर

अथवा

(ब) ऐसी आय पर भारतीय कर की दर से गणित राशि (जो भी राशि में कम हो)

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निवासी पंजीकृत फर्म के विदेशी साझेदार को दोहरे करारोपण की छूट (Double Taxation Relief to a Non-resident Partner in a Resident Registered Firm)

धारा 91 (3) के अनुसार, निम्न शर्तों के पूरा होने पर एक निवासी पंजीकृत फर्म के विदेशी साझेदार को दोहरे करारोपण की छूट प्रदान की जाएगी –

(अ) उस पंजीकृत फर्म पर, जिसमें अनिवासी साझेदार है, भारत में निवासी की तरह कर निर्धारण हुआ है।

(ब) अनिवासी साझेदार की पंजीकृत फर्म की आय के भाग में वह आय भी शामिल है जो भारत के बाहर उपार्जित और उदित है तथा जिसे भारत में उपार्जित अथवा उदित नहीं माना गया है।

(स) जिस देश में उक्त आय उपार्जित और उदित हुई है उस देश के साथ भारत सरकार का दोहरे करारोपण की छूट सम्बन्धी कोई समझौता नहीं है।

(द) अनिवासी साझेदार ने यह साक्ष्य प्रस्तुत कर दिया है कि उसने ऐसी विदेशी आय पर उस देश में आयकर चुकाया है जिस देश में वह आय उपार्जित तथा उदित हुई है।

छूट की राशि (Amount of relief)– उपर्युक्त शर्तों के पूरा हो जाने पर अनिवासी साझेदार को उसके द्वारा भारत में देय आयकर में से निम्न छूट मिलेगी –

(अ) ऐसी विदेशी आय पर भारतीय कर की दर से गणित राशि |

अथवा

(ब) ऐसी विदेशी आय पर उसी देश की कर की दर से गर्णित राशि (जो भी दोनों में कम हो)

अथवा

भारतीय दर से गणित आयकर यदि दोनों दरें समान

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दोहरे करारोपण की छूट की गणना करने के चरण हैं। (Steps for Calculation of Double Taxation Relief)

दोहरे करारोपण की छूट गणित करने के लिए निम्न प्रक्रियाएँ अपनानी पड़ती हैं –

प्रथम चरण (First Step) – सर्वप्रथम करदाता की कुल आय, विदेशी आय को सम्मिलित करके, आयकर की गणना की जाती है। आयकर की गणना अधिनियम में प्रदत्त कर-कटौती प्रदान करके, किन्तु धाराएँ 90, 90A एवं 91 की राहतों को घटाने से पूर्व की जाएँगी।

द्वितीय चरण (Second Step) – गर्णित कर पर सरचार्ज, यदि देय है तथा आयकर एवं सरचार्ज पर 4% की दर से स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर को जोड़े।

तृतीय चरण (Third Step) – भारतीय कर की औसत दर निम्न प्रकार कीजिए –

भारतीय कर की औसत दर = द्वितीय चरण में कुल आय पर कर / प्रथम चरण की कुल आय x 100

चतुर्थ चरण (Fourth Step) विदेशी कर की औसत दर निम्न प्रकार ज्ञात कीजिए –

विदेशी कर की औसत दर = विदेशी आय पर विदेश में भुगतानित कर / विदेशी आय x 100

पंचम चरण (Fifth Step) – विदेशी आय पर कर छूट की दर निम्न प्रकार ज्ञात कीजिए –

विदेशी आय पर कर छूट = भारतीय कर की औसत दर अथवा विदेशी कर की औसत दर (जो भी दोनों में कम है)

 

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(a) विलम्बित विवरणी (Belated Return)

विलम्बित विवरणी (Belated return) u/s 139 (4) of the Income Tax Act 1961 (Due date के बाद फाइल की हुई) आयकर अधिनियम अधिनियम, 1961 की धारा 139 (1) की समय सीमा के समाप्त होने के बाद फाइल की हुई रिटर्न विलम्बित विवरणी (Belated Return) होती है। यानि कि अन्तिम तिथि के बाद फाइल की गयी विवरणी को बिलेटेड रिटर्न माना जाता है।

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(b) दोहरे करारोपण से बचाव (Double Taxations Avoidance)

दोहरे करारोपण को रोकने के समझौते के प्रावधान आयकर अधिनियम के प्रावधानों पर प्रभावी रहेंगे।

स्पष्टीकरण 1: यदि किसी विदेशी कम्पनी के सम्बन्ध में, किसी घरेलू कम्पनी की तुलना में अधिक दर से कर वसूला जाता है, तो ऐसी कर वसूली उस विदेशी कम्पनी के लिए कम अनुकूल नहीं मानी जाएगी।

स्पष्टीकरण 2: “विशिष्ट क्षेत्र” से यहाँ आशय भारत के बाहर स्थित किसी भी ऐसे क्षेत्र से है, जिसे केन्द्र सरकार ने इस उद्देश्य के लिए अधिसूचित कर दिया है।

स्पष्टीकरण 3: यदि दोहरे करारोपण की छूट के लिए विदेशी सरकार के साथ हुए

किसी समझौते में कोई ‘शब्द’ ऐसा प्रयुक्त किया गया है, जिसको न तो उक्त समझौते में परिभाषित किया गया है और न उसकी परिभाषा अधिनियम के अन्तर्गत दी गई हैं, किन्तु उस शब्द की परिभाषा ऐसे समझौते के सन्दर्भ में निर्गत अधिसूचना में दी गई है, तो अधिसूचना में प्रदत्त परिभाषा को ही उस तिथि से प्रभावी माना जाएगा जिस दिन से वह समझौता प्रभावी है।

स्पष्टीकरण 4: यदि कोई शब्द (term) जो कि दो राज्यों की सरकारों के मध्य हुए प्रसंविदे में प्रयुक्त एवं परिभाषित किया गया है तो ऐसे शब्द का अर्थ वही या समान (same meaning) माना जाएगा, किन्तु यदि शब्द ऐसे प्रसंविदा में परिभाषित नहीं किया है परन्तु अधिनियम में परिभाषित है तो ऐसे शब्द का अर्थ वहीं माना जाएगा जो अधिनियम में परिभाषित एवं केन्द्र सरकार द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण में है।

 

(c) बोनस अंशों की प्राप्ति लागत (Cost of Acquisition of Bonus Shares)

1 अप्रैल 2001 से पूर्व प्राप्त किए गए बोनस अंशों की लागत 1 अप्रैल, 2001 को उनका बाजार मूल्य होगी तथा इसके पश्चात् प्राप्त किए गए बोनस अंशों की लागत शून्य होगी।

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(d) कर-मुक्त पूँजी लाभ (Capital Gains Exempted from Tax)

कर-मुक्त पूँजी लाभों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है –

(अ) बिना विनियोग के कर-मुक्त पूँजी लाभ

(ब) विनियोग करने पर कर मुक्त पूँजी लाभ

 

(अ) बिना विनियोग के कर-मुक्त पूँजी लाभ (Exempted Capital Gain Without any Investment) –

(i) यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया (UTI) की यूनिट स्कीम 1964 की यूनिट्स के हस्तान्तरण पर प्राप्त पूँजी लाभ की सम्पूर्ण राशि आयकर अधिनियम 1961 की धारा 10(33) के अनुसार पूर्णतया कर-मुक्त है।

(ii) 1 मार्च 2003 से 29 फरवरी, 2004 के बीच अवधि में प्राप्त किए गए योग्य समता अंशों के विक्रय अथवा हस्तान्तरण पर प्राप्त दीर्घकालीन पूँजी लाभों की सम्पूर्ण राशि आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10(36) के अनुसार पूर्णतया कर-मुक्त है।

(iii) शहरी कृषि भूमि के अनिवार्य अधिग्रहण पर उत्पन्न पूँजी लाभों की सम्पूर्ण राशि आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10(37) के अनुसार पूर्णतया कर मुक्त है।

(ब) विशिष्ट विनियोग करने पर कर मुक्त पूँजी लाभ (Exempted Capital Gain with Specified Investments)-

1, रिहायशी मकान के हस्तान्तरण से दीर्घकालीन पूँजी लाभ

[धारा 54]

2, शहरी कृषि भूमि में हस्तान्तरण से अल्पकालीन या दीर्घकालीन पूँजो लाभ

[धारा 54-B]

3, औद्योगिक भूमि या भवन के अनिवार्य अधिग्रहण से अल्पकालीन या दीर्घकालीन पूँजी लाभ

[धारा 54D]

4, भूमि या भवन अथवा दोनों के हस्तान्तरण से होने वाले दीर्घकालीन पूँजी लाभ का निर्धारित बॉण्ड्स में विनियोग

[धारा 54EC]

5, रिहायशी मकान के अलावा अन्य किसी सम्पत्ति से प्राप्त दीर्घकालीन पूँजी लाभ

[धारा 54F]

6, शहरी औद्योगिक उपक्रमों को विशेष आर्थिक क्षेत्र में हस्तान्तरित करने से अल्पकालीन या दीर्घकालीन पूँजी लाभ

[धारा 54 G एवं धारा 54 GA]

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Taxation of International Transactions Numerical Question.

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Taxation of International Transactions

Unit 5 Taxation of International Transactions Mcom Notes
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