Unit 3 Tax Planning Mcom Notes

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Unit 3 Tax Planning Mcom Notes

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कर नियोजन (Tax Planning)

 

पूँजी संरचना निर्णयन से सम्बन्धित कर नियोजन (Tax Planning Relating to Capital Structure Decision)

किसी व्यवसाय को शुरू करने के लिए निजी पूँजी और ऋण के रूप में ली जाने वाली पूँजी को पूँजी संरचना के अन्तर्गत रखा जाता है। पूँजी संरचना की गणना करते समय व्यापार में आने वाले जोखिम, पूँजी की लागत, पूँजी पर प्रत्याय, कर भार जैसे तमाम पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए। यदि व्यापार में जोखिम की आशंका कम है लेकिन एक निश्चित व नियमित रूप से होने वाली आय की सम्भावना है तो ऋणपत्रों के माध्यम से पूँजी को अधिकाधिक एकत्रित करने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा करने से व्यापार पर पूँजी की लागत कम पड़ेगी क्योंकि ब्याज स्वीकृत व्यय माना जाता है। इस प्रकार कर योग्य लाभ कम हो जाएगा, कम्पनी पर कम कर लगेगा और अंशधारियों के लिए लाभांश देने के लिए अधिक राशि बचेगी। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि अंश पूँजी तथा ऋण पूँजी में अनुपात सन्तुलित हो। यदि व्यापार में जोखिम अधिक हो तो ऋण पूँजी कम-से-कम लेनी चाहिए। ऐसा न करने पर हानि अथवा कम लाभ के वर्षों में ब्याज का भार वहन करना भी मुश्किल हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ऋण पूँजी लेने का समस्त व्यय एक ही वर्ष में स्वीकृत होता है। इसके विपरीत, अंश पूँजी लेने का व्यय पाँच वर्ष में समान किस्तों में स्वीकृत होता है।

ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है जब अतिरिक्त सम्पत्ति का क्रय करना होता है ताकि मौजूदा व्यापारिक गतिविधियों को विस्तार दिया जा सके, ऐसी स्थिति में ऋण लेने की तिथि से उस तिथि तक जिसको ऐसी सम्पत्ति पहली बार प्रयोग में लायी गई है, की अवधि के ब्याज की कटौती नहीं मिलेगी। इस ब्याज की राशि को मूल सम्पत्ति के मूल्य में जोड़कर ह्रास का आकलन किया जाना चाहिए।

प्रायः ऐसा प्रतीत होता है कि ऋण लेने से कर की बचत होती है और अंशधारियों का लाभांश बढ़ जाता है, परन्तु यह नियम हमेशा लागू नहीं होता क्योंकि इसमें लगातार परिवर्तन होता रहता है। यदि कुल पूँजी पर प्रत्याय (return) की दर ब्याज की दर से अधिक है तो ऋण लेने पर अंश पूँजी पर लाभ की दर बढ़ जाएगी। यदि कुल पूँजी पर प्रत्याय की दर ब्याज की दर से कम है तो अधिक ऋण लेने से अंश पूँजी पर लाभ की दर कम हो जाएगी।

कर-छूट अथवा सकल आय में से कटौती का पूँजी संरचना पर प्रभाव

किसी उपक्रम को धारा 10AA के अन्तर्गत कर में छूट मिलती है या धारा 80IA अथवा धारा 80IB अथवा धारा 80IC अथवा धारा 80ID अथवा धारा 80IE आदि के अन्तर्गत सकल कुल आय में से कटौती मिलती है तो आयकर देने के पश्चात् लाभांश की धनराशि में अधिक बढ़ोतरी होती है अर्थात् साधारण अंश पूँजी पर प्रत्याय की दर बढ़ जाती है। लेकिन उसके विपरीत यदि उपक्रम अधिक ऋण लेता है तो लाभ में से ब्याज की राशि घटाने के पश्चात् लाभांश की मात्रा कम बचती है और इसी अनुपात में कर छूट अथवा सकल कुल आय में से कटौती की राशि कम हो जाती है। औद्योगिक यूनिट लगाने वाले उद्योगपतियों को इस तथ्य से अवगत हो जाना चाहिए कि जहाँ तक सम्भव हो औद्योगिक उपक्रम आरम्भ करते समय कम-से-कम ऋण लिया जाए।

पूँजी संरचना के सम्बन्ध में कर नियोजन

(1) जब विनियोग पर प्रत्याय की दर (Rate of Return) ब्याज की दर से कम हो तो ऐसी अवस्था में कम से कम पूँजी ऋण के रूप में लेनी चाहिए।

(2) जब विनियोग पर प्रत्याय की दर ब्याज की दर से अधिक हो तो इससे साधारण अंश पूँजी पर प्रत्याय की दर बढ़ जाएगी। पूँजी एकत्रित करने के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम में जो प्रावधान हैं उनकी किसी भी रूप में अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

(3) जहाँ तक सम्भव हो अपनी पूँजी से वे सम्पत्तियाँ खरीदनी चाहिए जिन पर हास की आशंका अत्यल्प होती है। ऋण पूँजी से केवल वे सम्पत्तियाँ ही खरीदनी चाहिए जिन पर हास मिलता हो। ऋण पर, व्यापार स्थापित करने के पश्चात् परन्तु सम्पत्ति को काम में लेने की तिथि तक के ब्याज की राशि सम्पत्ति का मूल्य मानी जाती है और हास की अधिक राशि की कटौती मिल सकेगी।

(4) यदि किसी उद्योग को स्थापित करने के पश्चात् चालू होने में (Gestation Period) बहुत अधिक समय लगता है तो ऐसी अवस्था में ऋण पूँजी की अपेक्षा अंश पूँजी लेना उचित होता है। ऋण पूँजी पर अंश पूँजी की धनराशि से ब्याज देना होगा। ब्याज की राशि व्यावसायिक हानि मानी जाएगी जिसकी पूर्ति व्यावसायिक लाभ में से अगले आठ वर्षों में करनी होगी। हो सकता है निर्धारित अवधि में इसकी पूर्ति न हो सके। इसके विपरीत, ऋणदाताओं को ब्याज की आय पर प्रतिवर्ष आयकर देना होता है।

(5) यदि ऋण पर ब्याज की राशि भारत के भूभाग के बाहर दी जा रही है तो इस पर कर की कटौती करनी चाहिए। अन्यथा व्यवसाय से आय की गणना करते समय ब्याज की राशि की कटौती नहीं मिलेगी।

 

प्रश्न 2 – ” ऋण पूँजी कर की बचत में सहयोग करती है जिससे स्वामियों की पूँजी पर अधिक दर से प्रत्याय प्राप्त होता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? यदि नहीं, तो अपने उत्तर को एक उचित उदाहरण की सहायता से समझाइए।

“The loan capital contributes to tax saving resulting a higher rate of return on owners’ equity.” Do you agree with this statement? If not, illustrate your answer by a suitable example.

अथवा

समता अंश पूँजी पर व्यापार की नीति एक ओर लाभ को बढ़ाती है एवं दूसरी ओर लाभ को कम करती है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।

“The policy of trading on equity increases the profit on one hand and decreases the profit on the other.” Signify this comment.

पूँजी संरचना तैयार करते समय व्यापार की जोखिम, पूंजी की लागत, पूँजी पर प्रत्याय, कर भार आदि को ध्यान में रखना चाहिए। यदि व्यापार में जोखिम कम है और आय नियमित होने की सम्भावना है तो अधिकतर पूँजी ऋणपत्रों से प्राप्त करनी चाहिए ताकि व्यापार पर पूँजी की लागत कम पड़े, क्योंकि ब्याज स्वीकृत व्यय माना जाता है। इस प्रकार कर योग्य लाभ कम हो जाएगा। कम्पनी पर कम कर लगेगा और अंशधारियों के लिए लाभांश देने के लिए अधिक राशि बचेगी, परन्तु अंश पूँजी तथा ऋण-पूँजी कम-से-कम लेनी चाहिए अन्यथा हानि अथवा कम लाभ के वर्षों में ब्याज का भार वहन करना भी मुश्किल हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ऋण-पूँजी लेने का समस्त व्यय एक ही वर्ष में स्वीकृत होता है और अंश-पूँजी लेने का व्यय पाँच वर्ष में समान किस्तों में स्वीकृत होता है।

इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है ऋण लेने से कर की बचत होती हैं और अंशधारियों का लाभांश बढ़ जाता है, परन्तु यह नियम हमेशा लागू नहीं होता। यदि कुल पूँजी पर प्रत्याय (return) की दर, ब्याज की दर से अधिक है तो ऋण लेने पर अंश पूँजी पर लाभ की दर बढ़ जाएगी परन्तु यदि कुल पूँजी पर प्रत्याय की दर, ब्याज की दर से कम है तो अधिक ऋण लेने से अंश पूँजी पर लाभ की दर कम हो जाएगी।

अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक स्थिति में ऋण पूँजी के अधिक प्रयोग से समता पूँजी पर प्रत्याय की दर में वृद्धि नहीं होती है। इस बात को निम्नलिखित उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है –

उदाहरण – माना तीन कम्पनियों की पूँजी संरचना निम्नलिखित प्रकार है –

Suppose Capital Structure of three companies are as follows:

Particulars Companies
X  (₹) Y (₹) X (₹)
Capital

Loans

3,00,000 1,60,000 1,40,000
1,40,000 1,60,000
Total Investment 3,00,000 3,00,000 3,00,000

 

ऋण पर ब्याज दर (Rate of Interest on Loan): 12%

प्रत्याय दर (Rate of Return ): 20%, 12%, 10%

कर की दर उपकर सहित (Rate of Tax including cess) 31.2%

बताइए कि किसकी पूँजी संरचना श्रेष्ठ है एवं क्यों? Explain whose capital structure is best and why?

 

Rate of Return = 20%

Particulars Companies
X (₹) Y (₹) Z (₹)
Return (3,00,000 × 20%) 60,000 60,000 60,000
Less: Interest on loans @ 12% __ 16,800 19,200
Profit Before Tax 60,000 43,200 40,000
Less: Tax @ 31.2% 18,720 13,478 12,730
Profit After Tax 41,280 29,722 28,070
Rate of Return on Capital 13.76 % 18.58 % 20.05 %

 

Rate of Return = 12%

Particulars Companies
X (₹) Y (₹) Z (₹)
Return (3,00,000 × 12% 30,000 36,000 36,000
Less: Interest on loans @ 12% __ 16,800 19,200
Profit Before Tax 36,000 19,200 16,680
Less: Tax @ 31.2% 11,232 5,990 5,242
Profit After Tax 24,768 13,210 11,558
Rate of Return on Capital 8.26 % 8.26 % 8.26 %

 

Rate of Return = 10%

Particulars Companies
X (₹) Y (₹) Z (₹)
Return (3,00,000 × 10%) 30,000 30,000 30,000
Less: Interest on loans @ 12% __ 16,800 19,200
Profit Before Tax 36,000 13,200 10,800
Less: Tax @ 31.2% 9,360 4,118 3,370
Profit After Tax 20,640 9,082 7,430
Rate of Return on Capital 6.88 % 5.68 % 5.31 %

Working Notes:
Rate of Return on Capital = Profit after Tax / Capital × 100

निष्कर्ष – उपर्युक्त विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं –

(1) यदि विनियोग पर प्रत्याय की दर 20% हो जो कि कम्पनी द्वारा लिए गए ऋण पर चुकाने वाली ब्याज दर से अधिक है तो उस स्थिति में 2 लिमिटेड की पूँजी संरचना श्रेष्ठ है क्योंकि इस दशा में अंशधारियों को अधिक दर पर लाभांश बाँटा जा सकता है।

(2) यदि विनियोग पर प्रत्याय की दर, ऋण पर ब्याज की दर के समान हो तो किसी भी कम्पनी के लिए पूँजी संरचना का लाभांश की दर पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा।

(3) यदि विनियोग पर प्रत्याय की दर कम्पनी द्वारा लिए गए ऋण पर चुकाने वाली ब्याज दर से कम हो तो उस स्थिति में अंशधारियों को कम लाभांश मिलेगा अथवा कोई भी लाभांश नहीं मिलेगा। इस स्थिति में जितना अधिक ऋण लिया जाएगा स्वयं की पूँजी पर प्रत्याय कम होता जाएगा। इस स्थिति में X कम्पनी की पूँजी संरचना श्रेष्ठ है।

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पूँजी संरचना निर्णय से सम्बन्धित कर नियोजन (Tax Planning Relating to Capital Structure Decisions)

पूँजी संरचना से तात्पर्य पूँजी की रूपरेखा बनाने से होता है अर्थात् स्वामी की पूँजी कितनी हो, ऋण-पत्रों से सम्बन्धित पूँजी कितनी हो, बैंक ऋण पूँजी कितनी हो आदि। सरकार द्वारा मिलने वाली कोई वित्तीय सहायता (subsidy) के लिए नियोजन करना आदि। जब भी कोई नया व्यापार या परियोजना प्रारम्भ की जाती है, तो सबसे पहले पूँजी की आवश्यकता का नियोजन किया जाता है। इसी पूँजी को एकत्रित करने के स्रोतों का नियोजन ही पूँजी संरचना कहलाता है।

कम्पनी द्वारा वाहित पूँजी एकत्रित करने के स्त्रोत इस प्रकार हैं –

(1) पूर्णत: अंशों के निर्गमन द्वारा (Wholly by issue of shares)

(2) अंशत: अंशों के निर्गमन से एवं अंशतः ऋण-पत्रों के निर्गमन द्वारा (Partly by issue of shares and partly by issue of debenture)

(1) पूर्णतः अंशों के निर्गमन द्वारा (Wholly issue of shares) – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(84) के अनुसार, अंश का तात्पर्य कम्पनी की अंशपूँजी में एक अंश से है जिसमें स्टॉक (stock) भी सम्मिलित है। एक कम्पनी की अंशपूँजी पार्षद सीमा में उल्लेखित अर्थात् कम्पनी का रजिस्ट्रेशन या समामेलन करते समय निश्चित की जाने वाली पूँजी से है। इस पूँजी को अधिकृत पूँजी भी कहते हैं। कम्पनी सारे अंशों का निर्गमन एक साथ ही करे यह आवश्यक नहीं होता, संचालक अपनी वित्तीय आवश्यकता के अनुरूप ही अंशों का निर्गमन कर सकते हैं। संचालकों द्वारा अंशों के निर्गमन वाली पूँजी ही निर्गमित पूँजी (issued capital) कहलाती है। जनता द्वारा जितनी पूंजी प्रार्थित (subscribe) की जाती है उसे प्रार्थित पूँजी (subscribed capital) कहते हैं। यह आवश्यक नहीं होता है कि कम्पनी प्रत्येक अंश की पूरी राशि की माँग करे। कम्पनी अंश की आंशिक राशि की भी माँग कर सकती है। कम्पनी द्वारा माँगी गई पूँजी को (called up capital) कहते हैं। कम्पनी द्वारा माँगी गई पूँजी में जितनी राशि अंशधारियों द्वारा भुगतान की जाती है उसे दत्त पूँजी (paid up Capital) कहते हैं। शेष बची राशि जिसकी मांग नहीं की गई है उसे ‘न माँगी पूँजी (uncalled capital) कहते हैं। कम्पनी भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर इस न माँगी पूँजी को माँग सकती है।

(2) अंशततः अंशों के निर्गमन द्वारा व अंशत ऋण-पत्रों के निर्गमन द्वारा (Partly by issue of shares and Partly by issue of debentures) – कम्पनी द्वारा अपनी पूँजी संरचना की व्यवस्था अंशतः अंशों के निर्गमन से एवं अंशत ऋण पत्रों के निर्गमन से कर सकती है अर्थात् कम्पनी अंशधारियों या स्वामियों की पूँजी तथा जनता से ऋण के रूप में प्राप्त पूँजी (ऋण-पत्र) के द्वारा पूँजी संरचना की व्यवस्था कर सकती है। कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(30) के अनुसार, “ऋण पूँजी अथवा ऋण-पत्र में ऋण-पत्र स्टॉक, बॉण्ड्म एवं कम्पनी की कोई भी अन्य प्रतिभूति, जो ऋण का साक्ष्य प्रकट करती हो, भले ही वह कम्पनी की सम्पत्तियों पर प्रभार उत्पन्न करती है अथवा नहीं। कम्पनी ऋण-पत्रों पर ब्याज का भुगतान भी करती है। कम्पनी प्रबन्धन द्वारा तय किया जाता है कितनी ऋण पूँजी तथा कितनी अंश पूँजी संरचना में होनी चाहिए। एक आदर्श पूँजी संरचना वह होती है, जो संस्था के लाभों को अधिकतम करें।

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कम्पनी द्वारा वित्तीय प्रबन्ध सम्बन्धी निर्णय के आवश्यक तत्त्व (Essential Factors of Financial Management Decisions by Company)

कम्पनी द्वारा वित्तीय प्रबन्ध सम्बन्धी निर्णय करते समय निम्नलिखित तत्त्वों का ध्यान रखना आवश्यक है –

1, जोखिम तत्त्व (Risk Factors) – कम्पनी द्वारा पूँजी अंशों के निर्गमन द्वारा एकत्रित करने पर जोखिम नहीं रहता है, किन्तु उधार (borrowings) कम्पनी के दायित्व हैं। अतः उनका जोखिम बना रहता है। अतः ऋण समता का अनुपात (Debt-Equity ratio) उचित होना चाहिए। यह प्रत्येक कम्पनी की परिस्थिति एवं व्यापार की प्रकृति पर अलग-अलग हो सकता है लेकिन ऋण समता अनुपात उचित नहीं होने की दशा में कम्पनी दिवालिया भी हो सकती है। सामान्यतः यह अनुपात 2 1 का होता है क्योंकि यह अनुपात जितना अधिक होगा वित्तीय जोखिम उतना ही अधिक होगा। अधिक ऋण पूँजी की दशा में कम्पनी पर ब्याज की देयता बहुत अधिक हो जाएगी जिसमें कम्पनी के लाभों पर विपरीत असर पड़ेगा।

2, पूँजी की लागत (Cost of Capital) – जोखिम तत्त्व के बाद दूसरा आवश्यक तत्त्व पूँजी की लागत होता है। पूँजी की लागत से आशय वित्त व्यवस्था करने की लागत से है। यह वित्त व्यवस्था अंशपूँजी निर्गमन द्वारा अथवा ऋण लेकर की जा सकती है। पूँजी अंशपूंजी एवं ऋणपूँजी प्राप्त करने की लागत में प्रारूप तैयार करने (drafting) की लागत, टाईपिंग, छपाई एवं प्रॉस्पेक्टस के विज्ञापन की लागत, अभिगोपन कमीशन (under writing commision), दलाली (brokerage) एवं स्टाम्प आदि सम्मिलित है। ऋण पूँजी (borrowed capital) को प्राप्त करने की लागत को, उसी वर्ष के लाभों में से व्ययों के रूप में कटौती के रूप में स्वीकार की जाती हैं। किन्तु अंशपूंजी प्राप्त करने की लागतें धारा 35 D के अनुसार 5 वर्षों में बराबर राशि को कटौती की जाती है।

3, पूँजी को बनाए रखने की लागत (Cost of Maintaning Capital) – वह लाभों पर पूँजी के प्रभाव को दर्शाता है। सर्वोत्तम पूँजी संरचना वह होती है जिसमें अंशधारियों को पूँजी पर सर्वाधिक आय प्रदान करती है, उधार पूँजी लेने का मुख्य कारण समता अंशपूँजी की आय में वृद्धि करना है। उधारपूँजी पर ब्याज का एक निश्चित दायित्व होता है जबकि समता अंशपूँजी पर ऐसा कोई निश्चित दायित्व नहीं होता। ऋण-पत्रों पर ब्याज देने तथा करों के भुगतान करने के बाद जो लाभ शेष बचता है वह अंशधारियों का होता है। अतः ऋण समता अनुपात समता पूँजी पर लाभों को अधिकतम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

4, कर प्रभाव (TAX Implications) – पूँजी संरचना का नियोजन इस प्रकार करना चाहिए जिससे कम्पनी पर कर प्रभाव न्यूनतम हो तथा कर के बाद के लाभ अधिकतम हो । अतः पूँजी संरचना का नियोजन करते समय कर अधिनियम के निम्नलिखित प्रावधानों को ध्यान में रखना चाहिए

(i) यदि करदाता एक साझेदारी फर्म हो- साझेदारों की पूँजी एवं ऋण पूँजी पर देय ब्याज अधिकतम 12% की दर से कटौती के रूप में स्वीकृत होता है।

(ii) यदि करदाता एक कम्पनी हो –

(अ) ऋण-पूँजी एवं ऋण-पत्रों पर सम्पूर्ण व्याज धारा 36 (1) (iii) के अन्तर्गत कटौती योग्य होता है।

(ब) अंशों पर लाभांश कटौती के रूप में स्वीकृत नहीं होता। यद्यपि वितरित लाभों अर्थात् लाभांशों पर लाभांश कर लगाया जाता है। (स) ऋण पूँजी को प्राप्त करने की लागत जिस वर्ष व्यय की जाती है, उसी वर्ष के लाभों से कटौती योग्य होती है। यदि ऐसी लागत कम्पनी के समामेलन (पंजीकरण) से पूर्व की जाती है तो इसका पूँजीकरण कर दिया जाता है।

(ब) अंशपूंजी एकत्रित करने की लागत अर्थात् अंशपूँजी निर्गमित करने की लागत धारा 35D के अन्तर्गत पाँच वर्षों में कटौती योग्य होती है अर्थात् ऐसी लागत का 20% प्रतिवर्ष लाभों में से घटाया जाता है जब तक कि पूरी लागत घट न जाए।

5, छूटों/कटौतियों का प्रभाव (Impact of exemptions / deductions) – कुछ औद्योगिक संस्थान एवं उपक्रम लाभों में से धारा 10A या धारा 10AA या धारा 10BB के अन्तर्गत कर मुक्ति पाने का अधिकारी है तथा धाराएँ 80IA, 80IAB और 80LAC, 80IB, 80IBA, 80IC, 80ID 80IE, 80 JJA, SOJJAA अथवा 80CAPA के अन्तर्गत कुछ। अवधि के लिए कटौती पाने के अधिकारी हैं। ऐसी कर-मुक्तियाँ अथवा कटौतियाँ संस्था में कर बाद के लाभों में वृद्धि करती हैं। परिणामस्वरूप पूँजी पर प्रत्याय (return on capital) बढ़ जाती है।

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कर नियोजन हेतु विचारणीय बिन्दु (Considerations for Tax Planning)

1, यदि संस्था को कुछ कर मुक्तियाँ एवं कटौतियाँ स्वीकृत है तो उस अवधि के लिए समता अंश पूँजी एवं ऋण पूँजी के मुकाबले अधिक होने चाहिए जिससे समता पूँजी पर प्रत्याय दर बढ़ सके।

2, यदि ब्याज की दर एवं प्रत्याय दर एक-सी है तो समता अंश पूँजी एवं ऋण पूँजी दोनों का संस्था के लाभों पर एक-सा प्रभाव पड़ता है। अतः समता पूँजी एवं ऋण पूंजी किसी भी अनुपात में रखी जा सकती है।

3, यदि प्रत्याय की दर ब्याज की दर से अधिक है, तो ऋण पूँजी समता पूँजी से अधिक होनी चाहिए ताकि अंशधारियों को उपलब्ध लाभ अधिक हो सके अर्थात् संस्था उपलब्ध पूँजी पर अधिक दर से लाभ कमा रही है, जबकि ऋण पूँजी पर कम दर से ब्याज देना पड़ रहा है। इस स्थिति में ऋण लेना लाभदायक है।

4, यदि प्रत्याय दर ब्याज दर से कम है तो उधार ली गई पूँजी न्यूनतम स्तर पर रखनी चाहिए एवं समता अंश पूंजी अधिक होनी चाहिए ताकि ब्याज बाद के लाभ अधिक हों। इसका अर्थ है कि संस्था कम दर से कमा रही है, जबकि उसे ब्याज अधिक दर से देना पड़ रहा है। यह संस्था के लिए लाभप्रद स्थिति नहीं है।

5, जहाँ तक सम्भव हो, हास न लगाने वाली सम्पत्तियों जैसे- भूमि समता अंश पूँजी से प्राप्त करनी चाहिए, एवं ऋण पूँजी का उपयोग ह्रास योग्य सम्पत्तियों को क्रय करने में करना चाहिए। समामेलन से पूर्व अवधि के ऋण पर ब्याज की राशि को पूँजीकृत कर दिया जाता है, परिणामतः सम्पत्ति की लागत बढ़ जाती है। ह्रास की गणना इस बढ़ी हुई लागत पर की जाती है और इस प्रकार अधिक मात्रा में ह्रास माँगा जा सकता है।

6, यदि किसी भी उद्योग में गर्भावस्था काल (Gestation Period) अधिक है, तो समता अंश पूँजी प्रयुक्त करनी चाहिए न कि ऋण पूँजी क्योंकि ऋण पूँजी पर देय ब्याज को व्यापारिक हानि के रूप में आगे ले जाया जाएगा, जिसे करदाता निर्धारित अवधि (8 वर्षों) में पूरा नहीं कर पाएगा।

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लाभांश नीति (Dividend Policy)

सामान्यतया लाभांश का अर्थ- सामान्यतया लाभांश का अर्थ कम्पनी के अंशधारी द्वारा प्राप्त वह रकम है जो कम्पनी ने अपने लाभों का वितरण करने के रूप में बाँटी हो, जो चाहे कर योग्य आय में से बाँटी हो अथवा कर-मुक्त आय में से। यह चाहे रोकड़ में प्राप्त हो अथवा वस्तु के रूप में।

लाभांश की परिभाषा

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(22) के अन्तर्गत कम्पनी द्वारा अपने अंशधारियों को, एकत्रित लाभों में से निम्नलिखित वितरण अथवा भुगतान लाभांश माना जाता है –

(i) कम्पनी द्वारा ऐसा कोई वितरण जिससे कम्पनी की सम्पत्तियाँ कम हो जाएँ:

(ii) कम्पनी द्वारा बाँटे हुए ऋणपत्र अथवा जमा प्रमाण-पत्र अथवा अपने पूर्वाधिकार अंशधारियों को अंशों के रूप में दिया हुआ बोनस;

(iii) कम्पनी के समापन पर किया हुआ कोई वितरण;

(iv) कम्पनी द्वारा अंश पूँजी में कमी करके किया हुआ कोई वितरण;

(v) एक कम्पनी द्वारा जिसमें जन का सारवान् हित न हो, अपने किसी ऐसे अंशधारी (वास्तविक अंशधारी) को, जिसे कम्पनी में कम-से-कम 10% का मताधिकार हो, दिया गया कोई ऋण अथवा ऐसी संस्था को दिया गया ऋण जिसमें ऐसे अंशधारी का सारवान् हित है।

 

लाभांश से आय के सम्बन्ध में नियम (Rules in Relation to Dividend Income)

लाभांश से आय किस गत वर्ष की आय मानी जाएगी –

1, सामान्य लाभांश (Normal Dividend) – सामान्य लाभांश की आय उस गत वर्ष की आय मानी जाएगी जिस वर्ष में वह कम्पनी द्वारा घोषित किया गया हो। यह सामान्य लाभांश कहलाता है।

2, माना गया लाभांश (Deemed Dividend) – धारा 2 (22) के अन्तर्गत माना गया लाभांश उस गत वर्ष की आय माना जाता है जिस गत वर्ष में उसका भुगतान हुआ है।

3, अन्तरिम लाभांश (Interim Dividend) – किसी वर्ष की वार्षिक साधारण सभा से पूर्व कम्पनी द्वारा जो लाभांश घोषित किया जाता है उसे अन्तरिम लाभांश कहते हैं। अन्तरिम लाभांश उस गत वर्ष की आय माना जाएगा जिस वर्ष में कम्पनी ने उसका भुगतान किया हो।

4, यदि पिछले कई वर्षों का लाभांश बाद के किसी वर्ष में घोषित कर दिया जाए और बाद वाले वर्ष में सब इकट्ठा भुगतान कर दिया जाए तो लाभांश जिस गत वर्ष घोषित किया है। उसी वर्ष में आय माना जाएगा।

5, एक विदेशी कम्पनी द्वारा भारत के बाहर चुकाया गया लाभांश भारत में उदय अथवा अर्जित हुआ नहीं माना जाएगा।

6, एक भारतीय कम्पनी ने यदि कोई लाभांश भारत के बाहर चुकाया हो तो वह भारत ही उदय अथवा अर्जित हुआ माना जाएगा।

7, विदेशी कम्पनी से प्राप्त शुद्ध लाभांश ही कुल आय में जोड़ा जाता है। यदि करदाता ऐसे लाभांश पर दोहरे करारोपण से छूट की माँग करता है तो सकल लाभांश आय में शामिल किया जाएगा।

[CIT vs Amalgamations Ltd. (1998) 232 ITR 608 (Mad.))

लाभांश वितरण

(1) लाभांश पूंजी में से नहीं दिया जाना चाहिए।

(2) लाभांश कर देने के पश्चात् शेष लाभों में से ही दिया जाना चाहिए।

लाभांश पर कर देयता

लाभांश पर कर देयता के सम्बन्ध में निम्न प्रावधान लागू होंगे –

(1) कम्पनी को वितरित लाभों पर धारा 115-0 के अन्तर्गत कर देना होगा।

(2) अंशधारी को लाभांश एवं माने गए लाभांश पर कर नहीं देना होगा। यदि निवासी व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार या फर्म को घरेलू कम्पनियों से गत वर्ष में र दस लाख से अधिक लाभांश मिलता है तो उसे इस पर 10% की दर से आयकर + स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर 4% की दर से देना होगा।

(धारा 115BBDA)

नोट w.e.f. Assessment Year 2018-19 धारा 115BBDA के प्रावधान घरेलू कम्पनी को छोड़कर सभी निवासी करदाताओं पर लागू होंगे।

(3) यदि लाभांश धारा 2 (22) (e) के अन्तर्गत माना गया लाभांश है तो इस लाभांश पर कम्पनी की अपेक्षा अंशधारी को कर देना होगा।

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लाभांश आय के सम्बन्ध में कर नियोजन (Tax Planning in Relation to Dividends Income)

(1) एक घरेलू कम्पनी को अपने समता अंशधारियों को लाभांश रोकड़ में न देकर बोनस अंशों के रूप में देना चाहिए। इससे कम्पनी का कर दायित्व कम हो जाएगा, परन्तु इससे अंशधारी का कर दायित्व बढ़ जाएगा।

(2) एक ऐसी कम्पनी जिसमें जनता का सारवान् हित न हो (Closely held Company) (जो बैंकिंग अथवा वित्तीय कम्पनी न हो) के ऐसे अंशधारी को जिसका उस कम्पनी में सारवान् हित हो (10% अथवा उससे अधिक मताधिकार रखने वाला) कम्पनी के एकत्रित लाभों की सीमा तक कम्पनी से कोई ऋण अथवा अग्रिम नहीं लेना चाहिए क्योंकि यह [धारा 2 (22)(e) के अन्तर्गत] कर योग्य लाभांश माना जाएगा।

(3) यदि 2 में वर्णित अंशधारी, ऐसी कम्पनी से जिसमें जनता का सारवान् हित नहीं है, ऋण ले लेता है जिसे [ धारा 2 (22) (e) के अन्तर्गत कर योग्य लाभांश मान लिया गया है, उसे इस ऋण को कम्पनी को वापस नहीं करना चाहिए। भविष्य में कम्पनी जब भी लाभांश वितरित करे, इस ऋण को उस लाभांश में समायोजित करा लेना चाहिए। इससे लाभांश पर दुहरा करारोपण नहीं होगा।

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अन्तर- निगमित लाभांश एवं बोनस अंश (Inter-Corporate Dividends and Bonus Shares)

अन्तर-निगमित लाभांश – जब एक घरेलू कम्पनी को दूसरी घरेलू कम्पनी से लाभांश प्राप्त होता है तो इसे अन्तर-निगमित लाभांश कहते हैं।

जब एक घरेलू कम्पनी को दूसरी घरेलू कम्पनी से लाभांश (जिसमें माना गया लाभांश भी शामिल है, परन्तु ऐसी कम्पनी से ऋण जिसमें जनता का सारवान् हित नहीं है शामिल नहीं है) मिलता है तो यह धारा 10(34) के अन्तर्गत कर मुक्त होगा। परन्तु लाभांश वितरित करने वाली कम्पनों को धारा 115-0 के अन्तर्गत कर चुकाना होगा।

यदि धारा 115BBDA में वर्णित शर्तें पूरी होती हैं तो घरेलू कम्पनी को छोड़कर अंशधारी को लाभांश पर कर चुकाना होगा।

कर नियोजन – यदि एक घरेलू कम्पनी लाभांश वितरित करने की अपेक्षा अपने साधारण अंशधारियों को बोनस अंश जारी करती है तो इसे लाभांश नहीं माना जाता और कम्पनी को धारा 115-0 के अन्तर्गत कर नहीं चुकाना होगा। अतः कम्पनी को लाभांश वितरित करने की अपेक्षा बोनस अंश जारी करने चाहिए।

बोनस अंश – जब एक कम्पनी विद्यमान अंशधारियों को लाभांश की अपेक्षा अंश जारी करती है तो इन्हें बोनस अंश कहते हैं। बोनस अंश जारी करके कम्पनी अपने लाभों का पूँजीकरण कर लेती है इससे कम्पनी का पूँजी आधार बढ़ जाता है।

बोनस अंश जारी करने का व्यय कटौती योग्य है।

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बोनस अंशों के सम्बन्ध में कर नियोजन (Tax Planning in Relation to Bonus Shares)

(1) साधारण अंशधारी को अपने बोनस अंश, अंश जारी करने के एक वर्ष के पश्चात् अपने किसी रिश्तेदार को बेच देने चाहिए। एक वर्ष के पश्चात् अंश बेचने पर प्राप्त शुद्ध राशि दीर्घकालीन पूँजी लाभ होगा जिस पर 10% + अधिभार की दर से कर लगेगा। यदि इन्हें अंश जारी करने की तिथि से एक वर्ष में ही बेच दिया जाएगा तो प्राप्त शुद्ध राशि अल्पकालीन पूँजी लाभ होगा जिस पर पूरी दर से कर देना होगा।

रिश्तेदार को बोनस अंश बेचने का दूसरा लाभ यह होगा कि जब वह बोनस अंश बेचेगा तो उसे लागत स्फीति सूचकांक का लाभ मिलेगा।

(2) एक अधिमानी अंशधारी को बोनस अंश प्राप्त करने से पूर्व अपने अंशों को साधारण अंशों में परिवर्तित करा लेना चाहिए। इससे बोनस अंश जारी करते समय ही इनके मूल्य पर कर नहीं देना पड़ेगा।

(3) एक कम्पनी बोनस अंश जारी करने की अपेक्षा अपने Partly paid shares को fully paid shares में परिवर्तित करके अपने लाभों का पूंजीकरण कर सकती है। इस प्रकार का परिवर्तन लाभांश नहीं माना जाएगा और कर दायित्व कम जाएगा। (4) यदि किसी अंशधारी को अपने अंशों पर कम्पनी से बोनस अंश मिलते हैं और बोनस अंश मिलने के बाद वह तुरन्त कुछ अंश बेचना चाहता है तो उसे मूल अंश बेचने चाहिए।

ताकि दीर्घकालीन पूंजी लाभ की राहत उसे मिल सके अन्यथा बोनस अंशों को बेचने से उसे

अल्पकालीन पूँजी लाभ हो जाएगा जो पूर्णतया कर योग्य होगा।

(5) कम्पनी को बोनस अंशों के रूप में साधारण अंश जारी करने चाहिए। यदि अंशधारी इन अंशों को बारह माह से अधिक अपने पास रखकर बेचता है और प्रतिभूति संव्यवहार कर चुकाता है तो दीर्घकालीन पूँजी लाभ धारा 10 (38) के अन्तर्गत कर मुक्त होगा।

यदि अंशधारी इन अंशों को अल्पकालीन पूँजी सम्पत्ति के रूप में बेचता है और प्रतिभूति संव्यवहार कर चुकाता है तो अल्पकालीन पूँजी लाभ पर 15% + अधिभार, यदि देय है शिक्षा उपकर एवं माध्यमिक और उच्च शिक्षा उपकर चुकाना होगा।

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अन्तर्कम्पनी लाभांश का अर्थ (Meaning of Inter-corporate Dividend)

अन्तर्कम्पनी लाभांश से आशय उस लाभांश से है जो एक कम्पनी द्वारा दूसरी कम्पनी से प्राप्त किया जाता है। अतः जब एक घरेलू या विदेशी कम्पनी किसी दूसरी घरेलू या विदेशी कम्पनी से कोई लाभांश प्राप्त करती है तो उसे अन्तर्कम्पनी लाभांश कहते हैं।

 

कर प्रभाव के प्रावधान (Provisions of Tax-incidence)

अन्तर्कम्पनी लाभांश के सम्बन्ध में कर प्रभाव के निम्नलिखित प्रावधान इस प्रकार हैं –

1, एक घरेलू कम्पनी की कोई भी आय लाभांश के रूप में माना हुआ लाभांश सहित) घोषित, वितरित या भुगतान की जाती है तो वह आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 (34) के अन्तर्गत कर-मुक्त होती है। यह लाभांश अन्तरिम अथवा अन्तिम लाभांश भी हो सकता है। साथ ही यह चालू लाभों में से अथवा एकत्रित लाभों में से घोषित अथवा वितरित किया जा सकता है।

2, अन्तर्कम्पनी लाभांश, जो किसी कम्पनी द्वारा अथवा अन्य किसी घरेलू कम्पनी से प्राप्त किया जाता है, वह भी आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 (34) के अन्तर्गत पूर्णतयाः कर मुक्त होता है।

3, अन्तर्कम्पनी लाभांश यदि किसी घरेलू या भारतीय कम्पनी के अलावा अन्य या विदेशी कम्पनी से प्राप्त होता है तो करदाता अथवा प्राप्तकर्ता के लिए पूर्णतयाः कर योग्य होता है।

4, अन्तर्कम्पनी लाभांश (अन्तरिम या अन्य) जो किसी घरेलू कम्पनी द्वारा 1-4-2003 को या उसके बाद घोषित वितरित या भुगतान किया जाता है तो उस पर कम्पनी द्वारा 20.555% अर्थात् 17.647% [15 /85]+12% SC + 4% HEC की दर से अतिरिक्त आयकर लगाया जाएगा। ऐसे कर की धारा 115-0 के अन्तर्गत वितरित लाभों पर कर कहा जाता है।

5, एक घरेलू कम्पनी द्वारा घोषित, वितरित या भुगतानित ऐसा लाभांश है जो किसी अन्य घरेलू कम्पनी द्वारा प्राप्त किया गया है, निम्न राशि में से घटा दिया जाएगा, बशर्ते कि धारा 115-O (IA) में प्रदत निम्नलिखित शर्तें पूरी की जाएँ –

(i) सहायक लाभांश से प्राप्त लाभांश |

(ii) सहायक कम्पनी द्वारा धारा 155-0 के अन्तर्गत कर चुकाने के दिया गया लाभांश अथवा सहायक कम्पनी से प्राप्त लाभांश |

(iii) वह घरेलू कम्पनी किसी अन्य कम्पनी की सहायक कम्पनी नहीं हो बशर्ते कि लाभांश की वही राशि एक से अधिक बार नहीं घटाई जाएगी।

(iv) ऐसे वितरित लाभों पर कर की राशि लाभांशों की घोषणा या वितरण या भुगतान, जो भी तिथि पहले आए, से 15 दिनों के अन्दर केन्द्रीय सरकार के खाते में जमा करनी होगी।

(v) एक घरेलू कम्पनी द्वारा वितरित लाभांशों पर भुगतानित कर, ऐसे घोषित, वितरित या भुगतानित लाभांशों पर कर का अन्तिम भुगतान माना जाएगा और ऐसी भुगतानित राशि के लिए कम्पनी द्वारा या अन्य किसी व्यक्ति के द्वारा कोई भी दावा या क्रेडिट नहीं दिया जाएगा।

 

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Tax Planning Numerical Question.

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Unit 3 Tax Planning Mcom Notes
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Realted Post:-

Unit 1 Income Tax Act 1961 Mcom Notes
Unit 2 Tax Management Mcom Notes
Unit 4 Return of Income Mcom Notes
Unit 5 Taxation of International Transactions Mcom Notes


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