Unit 2 Tax Management Mcom Notes

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कर- प्रबन्धन

कर नियोजन से आशय (Meaning of Tax Planning)

किसी अधिनियम के अन्तर्गत उपलब्ध छूटों, कटौतियों, रियायतों आदि का पूरा लाभ उठाते हुए विधिमान्य तरीकों से अपने कर दायित्व को न्यूनतम रखने की कला को ‘कर नियोजन’ कहते हैं। कर नियोजन एक सकारात्मक विधि है जिसमें विधान के आयोजनों का उल्लंघन किए बिना तथा विधान की भावनाओं व उद्देश्यों के अनुकूल छूटों, रियायतों एवं कटौतियों का पूरा लाभ उठाते हुए कर भार को कम किया जाता है। जिस प्रकार एक कलाकार अपनी सम्पूर्ण योग्यता एवं उपलब्ध साधनों के प्रयोग द्वारा अपनी योग्यता प्रदर्शित करता है, ठीक उसी प्रकार एक अच्छा कर नियोजक विधिमान्य तरीकों से उपलब्ध कर रियायतों का लाभ उठाते हुए कर नियोजन की उत्तम योजना के द्वारा कर दायित्व को न्यूनतम करता है। उदाहरण के लिए, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80-IB में उन नए औद्योगिक उपक्रमों को कटौती दी गई है जो औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए राज्यों अथवा जिलों में स्थापित किए जाते हैं। इस कटौती का आशय स्पष्ट है औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए जिलों एवं राज्यों का आर्थिक विकास।

कर नियोजन करदाता का वैधानिक अधिकार है, किन्तु कर नियोजन, विधान की भावनाओं एवं उद्देश्यों के अनुकूल होना चाहिए। प्रत्येक करदाता को अपने कर भार को कम करने का पूर्ण अधिकार है तथा इसे सरकार, समाज तथा न्यायालय बुरी नजर से नहीं देखते हैं।

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कर नियोजन के आवश्यक तत्त्व या विशेषताएँ (Essential Elements or Characteristics of Tax Planning)

कर नियोजन के आवश्यक तत्त्व या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1, कर नियोजन वैधानिक है (Tax planning is legal) – कर नियोजन करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि किसी कर कानून का उल्लंघन न हो। कर विधान की सीमा के अन्दर रहकर कर भार में कमी के लिए कर नियोजन किया जाता है। यह इस प्रकार करना चाहिए कि किसी अधिनियम की व्यवस्थाओं का उल्लंघन न हो।

2, कर नियोजन नैतिक है (Tax planning is moral) – कर नियोजन नैतिक एवं उचित होता है, क्योंकि इसमें अधिनियम की सम्मति होती है। कर नियोजन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किए बिना किया जाता है, अत: इसे कानून, समाज एवं राष्ट्र की मान्यता प्राप्त होती है। कर नियोजन पूर्णतः वैधानिक होता है।

3, कर नियोजन से कर दायित्व में कमी तथा कर के बाद की आय में वृद्धि होती है (Tax planning reduces tax liability and increases after tax income) – कर नियोजन का प्रमुख उद्देश्य कर दायित्व को न्यूनतम करना होता है जब करदाता का कर दायित्व न्यूनतम होगा, तो निश्चित रूप से उसकी वास्तविक आय (सकल आय कर दायित्व) अधिकतम भी होगी कर नियोजन कर की बचत के लिए ही किया जाता है। कर की बचत का आशय आय की वृद्धि भी है। अतः कहा जाता है कि ‘कर की बचत आय का अर्जन है’ (Tax saved is money earned) ।

4, कर नियोजन का आधार (Basis of tax planning) – कर नियोजन आयकर अधिनियम में प्रदत्त छूटे कटौतियाँ एवं कर राहतों के आधार पर किया जाता है। करदाता द्वारा अधिनियम द्वारा निर्दिष्ट विनियोग या व्यय करने पर उसे आयकर में बचत या छूट प्राप्त हो जाती है। ये छूटे, कटौतियाँ एवं प्रोत्साहन ही कर नियोजन के लिए प्रेरणा एवं आधार होती हैं। इनके द्वारा करदाता अपना कर दायित्व कम कर लेता है।

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5, कर नियोजन एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है (Tax planning is a continuous process) – कर नियोजन नियमित रूप से प्रत्येक वर्ष के लिए किया जाता है। किसी एक ही वर्ष कर नियोजन कर लेने से कर नियोजन नहीं हो जाता। हाँ, कुछ विनियोग ऐसे होते हैं, जिनमें एक बार विनियोजन करने से दीर्घकाल तक कर की बचत होती रहती है, किन्तु अधिकांश कर छूटे, राहतें एवं कर बचतें ऐसी हैं जिन्हें प्रत्येक वर्ष के लिए पृथक्-पृथक् रूप से नियोजित करना पड़ता है, तभी कर भार में कमी आती है।

6, आयों, व्ययों एवं विनियोगों का नियोजन (Planning in connection with income, expenditures and investments) – कुछ आये पूर्ण कर मुक्त तथा कुछ आंशिक कर मुक्ति होती हैं, जबकि कुछ आये पूर्णतः कर योग्य होती हैं। कुछ आयों के सम्बन्ध में छूट मिलती है, यदि ये किसी विशेष क्षेत्र या समयावधि में लगे उद्योग से प्राप्त हों। अतः करदाता अपना कर भार कम रखने के लिए अधिकाधिक कर मुक्त या आंशिक कर मुक्त आयों को प्राप्त करने की व्यवस्था करेगा। वह अपने धन का विनियोजन ऐसे क्षेत्र या स्रोतों में करेगा, जिनसे प्राप्त आय या तो पूर्णतः कर मुक्त हो अथवा आंशिक कर मुक्त।

इसी प्रकार, व्यय करते समय भी वह ध्यान रखेगा कि व्यय करते समय वे सभी औपचारिकताएँ या प्रावधान पूरे हों, जिससे व्ययों को पूर्ण कटौती मिल सके। व्यय केवल उन्हीं मदों पर किए जाएँ, जिन पर कटौती स्वीकृत है, ताकि सभी व्ययों को पूर्ण कटौती मिल सके।

विनियोगों का नियोजन इस प्रकार किया जाए कि उनसे प्राप्त आय पर कम आयकर लगे या आयकर न लगे। करदाता प्रेरणादायक योजनाओं में विनियोग करके आयकर से छूट प्राप्त कर सकता है।

7, कर नियोजन सरकारी नीतियों के अनुरूप होता है (Tax planning is in accordance with Government policy) – सरकार की नीतियाँ कर नियोजन को प्रोत्साहित करती हैं। सरकार अधिनियम में तथा विभिन्न परिपत्रों, अधिसूचनाओं एवं घोषणाओं द्वारा समय-समय पर ऐसे व्ययों एवं विनियोगों के बारे में घोषणा करती है जिससे करदाता अपने कर भार को न्यूनतम कर सके।

8, कर नियोजन वैज्ञानिक है (Tax planning is scientific) – कर नियोजन एक वैज्ञानिक तकनीक हैं। कर नियोजन तभी किया जा सकता है जबकि करदाता को अधिनियम में प्रदत्त विभिन्न छूटों, राहतों, कटौतियों एवं कर बचतों की गहन जानकारी हो । विभिन्न छटो, कटौतियों, प्रोत्साहनों एवं कर राहतों का तुलनात्मक अध्ययन एवं विश्लेषण करके करदाता यह निश्चित करता है कि वह कर नियोजन किस प्रकार करे जिससे उसे इन छूटों, कटौतियों एवं राहतो का अधिकतम लाभ मिल सके। इसके लिए वह गहन अध्ययन, तुलना एवं विश्लेषण करता है। यह बौद्धिक कार्य है। अतः कर नियोजन की सफलता या विफलता करदाता की बुद्धिमत्ता पर निर्भर करती है।

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कर नियोजन के उद्देश्य (Objectives of Tax Planning)

कर नियोजन का मुख्य उद्देश्य एक करदाता के लिए उसके कर दायित्व को न्यूनतम करना है। इसके अतिरिक्त, कर नियोजन के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं –

1, कर दायित्व में कमी (Reduction in tax-liability) – कर नियोजन का मुख्य उद्देश्य करदाता के कर दायित्व में कमी करना है। प्रत्येक व्यक्ति अपने परिश्रम से अर्जित आय का अधिक से अधिक भाग स्वयं अपने पास रखना चाहता है। अतः करारोपण से बचने के लिए करदाता या तो कर चोरी करता है अथवा कर नियोजन कर चोरी आपराधिक कार्य है, अतः प्रत्येक करदाता कर नियोजन द्वारा ही करारोपण से बचना चाहता है। इस प्रकार, कर नियोजन करदाता को करारोपण से बचाने का एक वैधानिक एवं नैतिक उपाय है। यही कर नियोजन का प्रमुख उद्देश्य भी है।

2, मुकदमेबाजी में कमी लाना (Minimisation of litigation) – एक करदाता अपनी आय पर कम-से-कम कर देना चाहता है जबकि आयकर प्राधिकारी उससे अधिक से अधिक कर वसूलना चाहते हैं। कभी-कभी अति उत्साही कर निर्धारण अधिकारी अत्यधिक कर लगा भी देते हैं। इसके परिणामस्वरूप करदाता को न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में न्यायालय में मुकदमों की भरमार हो जाती है जो करदाता एवं राष्ट्र दोनों के लिए हानिप्रद है। इस फिजूल की मुकदमेबाजी से बचने के लिए करदाता कर कानूनों के अनुरूप इस प्रकार से कर नियोजन करता है जिससे कि फिजूल की मुकदमेबाजी के लिए कोई मार्ग ही नहीं रहे। आयकर अधिनियम की धारा 158-A का सृजन भी इसी उद्देश्य को लेकर किया गया है। इस धारा के अन्तर्गत पुनः अपील के अधिकार को सीमित कर दिया गया है।

3, उत्पादक विनियोग (Productive investment) – कर नियोजन एक ऐसा उपाय है जिससे करदाताओं को अपनी आय ऐसे उत्पादक विनियोगों में विनियोजित करने का अवसर प्राप्त होता है जिससे उसको दीर्घ अवधि तक आय हो तथा कम-से-कम कर भार पड़े। सरकार कर बचत के लिए अनेक ऐसे विनियोगों की घोषणा करती है जिनमें रुपया विनियोजित करने पर एक ओर तो विनियोजक को कर में कटौती मिलती है तथा दूसरी ओर सरकार को

राष्ट्रीय विकास हेतु उपयुक्त धन की प्राप्ति भी हो जाती है। जनता की अन्य छोटी-छोटी बचतों के रूप में एकत्रित होकर राष्ट्रीय विकास में योगदान देती है और पूँजी निर्माण में सहयोग करती है। इस प्रकार, कर नियोजन का राष्ट्रीय उद्देश्य उत्पादक विनियोगों में जनता का धन एकत्रित करना तथा जनता को ऐसे विनियोगों में धन लगाने हेतु प्रेरित करना है।

4, अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक (Helpful in growth of economy) – किसी भी राष्ट्र का आर्थिक विकास तभी सम्भव है जबकि उसके निवासी अपनी अर्जित आय की बचत को राष्ट्र के विकास में लगाएँ। निवासियों की बचत राष्ट्र के विकास में तभी लगती है. जबकि उन्होंने वैधानिक रूप से ही आयकर चुकाकर बचत की है। कर दायित्व का निर्वाह किए बगैर की गई बचत ‘काला धन’ (Black Money) मानी जाती है और उसे राष्ट्र के विकास में नहीं लगाया जाता बल्कि ऐसे कार्यों में लगाया जाता है जिससे राष्ट्र का स्वस्थ आर्थिक विकास नहीं होता अपितु देश में कुछ आर्थिक अपराध एवं विकृतियाँ, जैसे जमाखोरी, रिश्वत, महँगाई, लाभखोरी, तस्करी आदि बढ़ती है। कर नियोजन इस उद्देश्य की पूर्ति करने का एक सरल एवं एकमात्र उपाय है।

5, आर्थिक स्थिरता (Economic stability) – समुचित कर नियोजन द्वारा वैधानिक रूप से देय कर का नियमित रूप से भुगतान किया जाता है। सरकार द्वारा घोषित प्रेरणाओं का लाभ उठाया जाता है तथा उन विनियोगों एवं क्षेत्रों में धन लगाया जाता है जिससे करदाता पर लगने वाला कर दायित्व न्यूनतम हो। इस प्रकार कर नियोजन होने से देश की विभिन्न योजनाओं में नियमित रूप से जनता का धन लगता है। जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में एक स्थिरता, सम्पन्नता एवं विकास की निरन्तरता बनी रहती है। इससे एक ओर करदाता का कर दायित्व न्यूनतम होने से उसकी सम्पन्नता बढ़ती है, परिणामतः उसकी माँग बढ़ती है जो विकासशील अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए अति आवश्यक तत्त्व है। दूसरी ओर, सरकारी योजनाओं एवं उद्योगों को धन की उपलब्धता की निरन्तरता बनी रहती है। जिससे विकास क्रम में कोई अवरोध या गतिरोध उत्पन्न नहीं होता और अन्ततः देश में आर्थिक स्थिरता उत्पन्न हो जाती है।

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कर नियोजन व कर अपवंचन में अन्तर (Differences between Tax Planning and Tax Evasion)

अन्तर का आधार कर नियोजन कर अपवंचन
1, अर्थ कर विधान की सीमा में रहकर वित्तीय गतिविधियों को इस प्रकार से नियन्त्रित करना कि कर दायित्व न्यूनतम हो जाए, ‘कर नियोजन’ कहलाता है। अवैधानिक तरीकों को अपनाकर कर दायित्व कम करना या कर न चुकाना ‘कर अपवंचन’ या ‘कर वंचन’ कहलाता है।
2, वैधानिकता कर नियोजन विधानसम्मत होता है। कर अपवंचन अवैधानिक होता है।
3, नियमों का पालन कर नियोजन कर विधान में उल्लिखित नियमों की सीमाओं में रहकर किया जाता है। कर अपवंचन कर विधान में उल्लिखित नियमों का उल्लंबन करके किया जाता है।
4, परिणाम कर नियोजन आर्थिक विकास का द्योतक है। कर अपवंचन से अर्थदण्ड मिलता है।
5, आय का उपयोग कर नियोजन के उपरान्त करदाता अपनी आय का स्वतन्त्रतापूर्वक उपभोग करता है। कर अपवंचन के उपरान्त करदाता सदैव छापे एवं सम्पत्ति जब्त होने के भय से पीड़ित रहता है।
6, आय की प्रकृति कर नियोजन के अन्तर्गत आय वैधानिक प्रकृति की होती है। कर अपवंचन के अन्तर्गत आय ‘काला धन’ कहलाती है।
7, हित कर नियोजन में करदाता, समाज व राष्ट्र का हित निहित होता है। कर अपवंचन समाज व राष्ट्र विरोधी गतिविधि है।
8, ज्ञान व साहस कर नियोजन के लिए सम्बद्ध विधान का यथोचित एवं विशिष्ट ज्ञान होना आवश्यक है। कर अपवंचन के लिए ज्ञान की नहीं। वरन् दुस्साहस की आवश्यकता होती है।

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(अ) कर नियोजन एवं कर प्रबन्ध में अन्तर (Differences between Tax Planning and Tax Management)

अन्तर का आधार

 

कर नियोजन

 

कर प्रबन्ध

 

1, क्षेत्र

 

कर नियोजन का क्षेत्र काफी व्यापक है। इसमें कर प्रबन्ध को शामिल किया जाता है। कर प्रबन्ध एक संकुचित शब्द है तथा यह कर नियोजन के लिए पहला कदम कहा जा सकता है।
2, उद्देश्य कर नियोजन का प्रमुख उद्देश्य कर दायित्व को कम करना है। कर प्रबन्ध का प्रमुख उद्देश्य वैधानिक कार्यों की पूर्ति करना है।

 

3, आवश्यकता कर नियोजन प्रत्येक करदाता के लिए आवश्यक नहीं है, परन्तु कर-प्रबन्ध प्रत्येक करदाता के लिए अनिवार्य है अन्यथा वह दण्डनीय ब्याज अर्थदण्ड एवं सजा का उत्तरदायी हो सकता है। कर प्रबन्ध प्रत्येक करदाता के लिए अनिवार्य है। इसके अभाव में करदाता को दण्डनीय ब्याज देना होगा, उस पर अर्थदण्ड लगाया जा सकता है और उसे जेल भेजा जा सकता है।
4, परिणाम कर नियोजन से करदाता के कर दायित्व में कमी तथा समाज एवं राष्ट्र का सही दिशा-निर्देशन होता है। कर प्रबन्ध से कर दायित्व में कमी एवं वैधानिक औपचारिकताओं की पूर्ति होती है।
5, काल कर नियोजन के अन्तर्गत वर्तमान क्रियाकलापों से भविष्य में लाभ उठाना है। कर प्रबन्ध कर नियोजन का व्यावहारिक पहलू है और यह भूत, वर्तमान एवं भविष्य से सम्बन्धित है।
6, प्रविधि कर नियोजन के अन्तर्गत कर विधान में उपलब्ध छूटों, कटौतियों एवं कर रियायतों आदि की माँग की जाती है। कर प्रबन्ध के अन्तर्गत उपलब्ध कटौतियों, रियायतों एवं छूटों आदि के सम्बन्ध में कानूनी औपचारिकता की पूर्ति की जाती है।
7, कार्य कर नियोजन में वैकल्पिक आर्थिक क्रियाओं में सर्वोत्तम क्रिया को चुना जाता है। कर प्रबन्ध के अन्तर्गत लेखे रखना, अंकेक्षण कराना, निर्धारित फार्म दाखिल करना तथा कर भुगतान आदि कार्य आते हैं।

 

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(ब) कर नियोजन व कर बचाव में अन्तर (Differences between Tax Planning and Tax Avoidance)

अंतर का आधार कार नियोजन कार बचाब
1, अर्थ कर विधि की सीमा में रहकर वित्तीय गातिविधियों को इस प्रकार नियंत्रित करना की कार दायित्त्व  न्यूनतम हो जाए, ‘कर नियोजन’ कहलाता है | कानून को तोड़े बिना कानून में छिपी हुई कमियों का लाभ उठाकर क़र दायित्त्व को न्यूनतम करना, ‘कर बचाव’ या ‘कर टलाव’ कहलाता है |
2, स्थायित्त्व कर नियोजन एक स्थायी प्रक्रिया है | कर बचाव एक अस्थायी प्रकिया है |
3, समाजिकता कर नियोजन से कर दायित्त्व कम होने के बाद भी यहाँ समाज व देश के हित में है | कर बचाब से कर दायित्त्व तो कम होता है लेकिन सरकारी आय में कमी होती है अर्थात यहाँ वैधानिक होते हुए भी अनैतिक है |
4, ज्ञान कर नियोजन हेतु सम्बद्ध कर विधान का ज्ञान होना आवश्यक है | कर बचाव हेतु सम्बद्ध कर विधान की कमियों का ज्ञान होना आवश्यक है |
5, वैधानिकता व नैतिकता कर नियोजन वैधानिक व नैतिक होता है | कर बचाव वैधानिक हो तो है, परन्तु नैतिक नही है |
6, हित कर नियोजन करदाता, समाज व राष्ट्र के हित में है | कर बचाव करदाता के तो हित में है, परन्तु समाज व राष्ट्र का विरोधी है |
7, आर्थिक विकास कर नियोजन किसी भी दक्ष के आर्थिक विकास को घोतक है | कर बचा देश के आर्थिकी विकास में बाधक है |

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(स) कर बचाव व कर अपवंचन में अन्तर (Differences between Tax Avoidance and Tax Evasion)

कर- प्रबन्धन
1, अर्थ कर बचाव के अन्तर्गत अधिनियम की कमियों अथवा कमजोरियों का लाभ उठाकर अथवा कमजोरियों का लाभ उठाकर कर दायित्त्व को कम किया जाता है | इसमें कर अधिनियमों का उल्लंधन करके अथवा अनुचित साधनों या विधियों का प्रयोग करके कर बचाने का प्रयास किया जाता है |
2, वैधानिकता कर बचाव वैधानिक है यघपि यह अनैतिक एवं नाजायज है | कर अपवंचन अवैधानिक एवं कर अधिनियमों के विपरीत है |
3, नियमों का पालन कर बचाव एक ऐसी कला है जिसके द्वारा बिना अधिनियम के उल्लंघन के कर से बचा जाता है | कर अपवंचन अधिनियम का उल्लंधन करके कर से बचने की कला है |
4, उद्देश्य इसमें अधिनियम की मुख्य भावना को धोखा दिया जाता है | इसमें अधिनियम का उल्लंधन किया जाता है |
5, दण्ड कर बाचक दण्डनीय नहीं है | कर अपवंचन दण्डनीय है |
6, ज्ञान कर बचाव वास्तविक कर दायित्त्व उत्पन्न होने से पूर्व जान–बुझकर किया गया कर नियोजन है | इसमें कर दायित्त्व उत्पन्न हो जाने के बाद जान-बुझकर कर बचना है |
7, तथ्यों का प्रस्तुतिकरण कर बचाव काल्पनिक एवं मिथ्या तथ्यों तथा तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए गाए तथ्यों पर आधारित होता है | कर अपबंचन महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने तथा महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रकट न करने पर अद्धारित  होता है |

 

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नये व्यवसाय के स्थान के सम्बन्ध में कर नियोजन (Tax Planning for Location of New Business)

नये व्यवसाय के स्थान के सम्बन्ध में कर नियोजन से तात्पर्य व्यवसाय के स्थान का नियोजन अर्थात् चुनाव करना है। आयकर अधिनियम, 1961 कुछ विशिष्ट स्थानों पर स्थापित कुछ व्यापारों या उपक्रमों को कर प्रेरणाएँ प्रदान करता है। अतः एक उद्यमी को अपना नया व्यवसाय ऐसे क्षेत्र में स्थापित करना चाहिए जहाँ पर उसे अधिकतम कर लाभ मिल सके। सरकार ने विशेष रूप से ऐसे क्षेत्र, राज्य एवं स्थान निर्धारित कर दिए हैं जहाँ पर यदि कोई व्यापार या कोई विशिष्ट व्यापार स्थापित किया जाता है तो उद्यमी को कुछ कर लाभ प्राप्त होंगे। ऐसे कर लाभ क्षेत्र की प्रकृति एवं ‘ क्षेत्र की विशेष स्थिति पर निर्भर करेंगे। कुछ क्षेत्रों में कर लाभ 100% है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में 100% से कम उद्यमी को ऐसे क्षेत्र का चुनाव करना है जिसमें उसे अपने व्यापार के सम्बन्ध में, जिसे वह प्रारम्भ करना चाहता है, अधिकतम कर लाभ मिल सके। ऐसे चुनाव को ही तकनीकी शब्दावली में नये व्यापार के स्थान के सम्बन्ध में कर नियोजन कहा जाता है। नये व्यापार के स्थान के सम्बन्ध में निम्न कर लाभ या कर राहते हैं

1, ‘विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में नये व्यापार की स्थापना [धारा 10AA] — यदि कोई उद्यमी किसी वस्तु या सामान के उत्पादन या निर्माण या सेवा प्रदान करने का नया व्यापार या कार्य, ‘किसी विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में, गत वर्ष 2006-07 के बाद किन्तु 1 अप्रैल, 2021 से पूर्व, प्रारम्भ करता है, तो ऐसे उद्यमी (करदाता) को (धारा 10AA) के अन्तर्गत ऐसे व्यापार द्वारा उत्पादित या निर्मित वस्तुओं, सामानों या सेवाओं के निर्यात से होने वाले लाभों का 100% प्रारम्भिक 15 वर्षों तक तथा 50% अगले 10 वर्षों तक कर मुक्त होगा।

2, किसी औद्योगिक पिछड़े राज्य अथवा केन्द्र शासित प्रदेश में नये व्यापार का स्थापन [धारा 80 IB] – यदि कोई औद्योगिक उपक्रम (Cold storage plant सहित) किसी औद्योगिक पिछड़े राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश में स्थापित है, तो करदाता को प्रारम्भिक 10 वर्षों तक ऐसे व्यापार से प्राप्त लाभों में 100% कटौती प्रदान की जाएगी।

3, वर्ग ‘अ’ या ‘ब’ के किसी पिछड़े राज्य में नये व्यापार की स्थापना [धारा 80 IB] – यदि कोई औद्योगिक उपक्रम (Cold storage plant को सम्मिलित करके) किसी औद्योगिक पिछड़े क्षेत्र वर्ग ‘अ’ पिछड़े जिले में या वर्ग ‘ब’ पिछड़े जिले में स्थापित किया जाता है, तो करदाता को धारा 80 IB के अन्तर्गत ऐसे व्यापार के लाभों को 100% तक वर्ग ‘अ’ एवं वर्ग ‘ब’ जिलों के सम्बन्ध में प्रारम्भिक 5 वर्षों तक कर मुक्ति प्रदान की जाएगी।

4, विशिष्ट क्षेत्र में नये होटल व्यापार की स्थापना [धारा 80-IB] – यदि किसी पहाड़ी क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र अथवा तीर्थ स्थान पर अथवा किसी अधिसूचित क्षेत्र में होटल व्यापार प्रारम्भ किया जाता है, तो करदाता को धारा 80 IB के अन्तर्गत प्रारम्भिक 10 वर्षों के लिए। लाभों की 50% की कटौती कर मुक्ति के रूप में प्रदान की जाएगी, किन्तु यदि होटल की स्थापना उक्त स्थानों के अलावा किन्हीं अन्य क्षेत्रों में की जाती है, तो उद्यमी को प्रारम्भिक 10 वर्षों के लिए लाभों के 30% तक की राशि कर मुक्ति कटौती के रूप में प्रदान की जाएगी।

5, कुछ ‘निश्चित विशिष्ट वर्ग के राज्यों में नये व्यापार की स्थापना [धारा 80 IC] – यदि कोई औद्योगिक उपक्रम या संस्थान किसी वस्तु या सामान, जो तेरहवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट नहीं है अथवा चौदहवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट है, का उत्पादन या निर्माण करता है तथा विशिष्ट वर्ग के राज्यों में स्थापित है अर्थात् सिक्किम, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड, तो करदाता को धारा 80 IC के अन्तर्गत कर मुक्ति के रूप में प्रारम्भिक 10 वर्षों तक लाभों की 100% की कटौती प्रदान की जाएगी। यदि नया व्यापार ‘सिक्किम’ राज्य में है, तो लाभों की 100% की कटौती प्रथम 5 वर्षों के लिए तथा तदुपरान्त अगले 5 वर्ष के लिए। लाभों का 25% (कम्पनी करदाता के लिए 30%) तक प्रदान की जाएगी। यदि वह व्यापार ‘सिक्किम’, ‘हिमाचल प्रदेश’ अथवा ‘उत्तराखण्ड’ राज्य में है। यह कटौती प्रथम कर निर्धारण वर्ष से प्रारम्भ की जाएगी।

6, किसी विशिष्ट क्षेत्र में नये होटल व्यापार एवं कन्वेंशन सेण्टर की स्थापना [धारा 80 ID] – यदि कोई उपक्रम, जो होटल व्यवसाय अथवा किसी कन्वेंशन सेण्टर के स्वामित्व एवं परिचालन में संलग्न है तथा वह विशिष्ट क्षेत्र में स्थापित किया जाता है अथवा होटल का व्यवसाय किसी Specified District having a World Heritage Site पर स्थापित हैं, तो करदाता को धारा 80 ID के अन्तर्गत ऐसे व्यापार के लाभों का 100% लगातार 5 वर्षों तक कटौती के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

‘विशिष्ट क्षेत्र’ (Specified area) – से तात्पर्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) एवं फरीदाबाद, गुरूग्राम, सोनीपत, गौतमबुद्धनगर एवं गाजियाबाद जिले से है।

‘विश्वदायी स्थल’ को विशिष्ट जिला (Specified district having a world heritage site) से तात्पर्य इन जिलों से है- आगरा, जलगाँव, औरंगाबाद, कांचीपुरम, पुरी, भरतपुर, छतरपुर, तंजावुर, बेल्लारी, साउथ चौबीस परगना, चमोली, रायसेन, गया, भोपाल, पंचमहल, गोलपाड़ा, साउथ गोवा, नॉर्थ गोवा, नीलगिरि, नौगाँव एवं दार्जिलिंग।

7, उत्तर पूर्वी राज्यों में नये व्यापार की स्थापना [धारा 80 IE] – यदि कोई नया उद्यम किसी वांछनीय वस्तु या सामग्री का निर्माण या उत्पादन प्रारम्भ करता है अथवा ऐसी वांछनीय वस्तु या सामग्री का उत्पादन करने हेतु पर्याप्त विस्तार करता है अथवा अन्य कोई वांछनीय व्यापार का संचालन करता है तथा यह कार्य उसने 1 अप्रैल, 2007 से 31 मार्च, 2017 के मध्य किसी भी उत्तर-पूर्वी राज्य में प्रारम्भ किया है, तो ऐसे करदाता को धारा 80 IE के अन्तर्गत ऐसे व्यापार के लाभों के 100% के बराबर कटौती प्रारम्भिक 10 वर्षों के लिए दी जाएगी।

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व्यवसाय की प्रकृति के लिए कर नियोजन (Tax Planning for Nature of Business)

व्यापार की प्रकृति से आशय व्यापार के वर्ग, प्रकार एवं विषय सामग्री से है। एक व्यापार किसी वस्तु या सामग्री के निर्माण या उत्पादन की प्रकृति का हो सकता है अथवा होटल का अथवा सेवा प्रदान करने का अथवा कोई कन्वेंशन सेण्टर संचालित करने का अथवा किसी थिएटर संचालन का अथवा किसी वस्तु या सामग्री के निर्यात का अथवा सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर का अथवा क्षेत्रों के विकास का अथवा पार्कों या आधारभूत सुविधाओं के विकास का अथवा पानी के जहाज के संचालन का अथवा वित्त प्रदान करने का हो सकता है। आयकर अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत कुछ वर्ग के व्यापारों को अनेक कर मुक्तियाँ, कर राहतें एवं कर प्रेरणाएँ या कटौतियाँ प्रदान की जाती हैं। इस प्रकार की राहतों को या तो कर मुक्तियाँ कहते हैं अथवा कटौतियाँ कहते हैं। यह कर राहतें या कटौतियाँ व्यापार की प्रकृति पर निर्भर करती हैं। किसी नये व्यापार को प्रारम्भ करते समय उद्यमी को ऐसे व्यवसाय का चयन करना चाहिए जिससे उसे अधिकतम कर छूटें एवं कटौतियाँ मिल सकें तथा अधिकतम कर लाभ मिलें। ऐसे नियोजन को ही व्यापार की प्रकृति के सम्बन्ध में कर नियोजन कहा जाता है। यहाँ व्यापार की प्रकृति पर निर्भर या प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित कुछ कर प्रेरणाएँ, राहते या कटौतियाँ दी गई है—

(1) नव स्थापित शत-प्रतिशत निर्यात संवर्धन उपक्रम [धारा 10B] — यदि नव स्थापित शत-प्रतिशत निर्यात संवर्धित उद्यम किसी वस्तु या सामान या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर का निर्माण या उत्पादन करता है, तो ऐसे उद्यम के सम्पूर्ण लाभों को ऐसे लाभों पर 100% कटौती देकर कर मुक्ति प्रदान की जाएगी, बशर्ते कि यह लाभ वस्तु, सामान या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के नियत से उत्पन्न हुए हो यह कटौती 10 कर निर्धारण वर्षों तक दी जाएगी, किन्तु कर निर्धारण वर्ष 2012-13 से इस धारा के अन्तर्गत कोई कटौती नहीं दी जाती।

(2) भारत में चाय या कॉफी या रबड़ उत्पादन करने एवं निर्माण करने का व्यवसाय (Business of growing and manufacturing tea or coffee or rubber in India ) [ धारा 33 AB] – यदि करदाता भारत में चाय या कॉफी या रबड़ का उत्पादन या निर्माण कर रहे हैं और वह चाय बोर्ड या कॉफी बोर्ड या रबड़ बोर्ड द्वारा अनुमानित योजना के अन्तर्गत कृषि एवं ग्राम्य विकास के राष्ट्रीय बैंक (NABARD) के एक विशेष खाते में या केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से चाय बोर्ड या कॉफी बोर्ड या रबड़ बोर्ड द्वारा बनाई गयी, किसी योजना के अन्तर्गत गत वर्ष की समाप्ति के 6 माह के अन्तर्गत किसी जमा खाते में कोई धनराशि जमा करता है तो उस करदाता को कटौती के रूप में निम्न कर मुक्ति प्रदान की जाएगी।

ऐसी जमा की गयी धनराशि अथवा ऐसे व्यापार के लाभों का 40% (जो भी दोनों में कम हो) इस प्रकार, यदि करदाता भारत में चाय या कॉफी या रबड़ के उत्पादन या निर्माण का व्यापार स्थापित करता है, तो उसको इस व्यापार के लाभों का 40% तक कटौती के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

(3) भारत में पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस अथवा दोनों को निकालने एवं उसका विकास करने या उत्पादन करने का व्यापार (Business of prospecting for and extraction of production of a petrolium or natural gas or both in India) [ धारा 33ABA] – यदि कोई करदाता भारत में केन्द्रीय सरकार के साथ हुए प्रसंविदे के अन्तर्गत पेट्रोलियम अथवा प्राकृतिक गैस अथवा दोनों को निकालने, उसका विकास या उत्पादन के व्यापार को संचालित कर रहा है तथा वह स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के किसी विशेष खाते में कोई धन जमा करता है अथवा स्थल पुनर्स्थापना खाता में कोई धनराशि जमा करता है, तो ऐसे करदाता को चालू वर्ष के व्यापारिक लाभों में से निम्न की न्यूनतम राशि के बराबर कटौती प्रदान की जाएगी

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उक्त खातों में जमा की गयी राशि या राशियाँ अथवा लाभों का 20%

(4) पात्र व्यापार के लाभों को कर मुक्ति (Exemption of profit on eligible business ) [ धारा 44 AD] – यदि कोई पात्र करदाता किसी पात्र व्यापार में संलग्न है तो उस करदाता को उसके ऐसे व्यापार से होने वाली कुल बिक्री या सकल प्राप्तियों के 8% के बराबर लाभ कर योग्य मानकर कर मुक्ति प्रदान की जाती है, किन्तु यदि किसी गत वर्ष में व्यापार का कुल विक्रय / आवर्त या सकल प्राप्तियाँ खाते में देय चैक या बैंक ड्राफ्ट या किसी इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग व्यवस्था (ECS) के अन्तर्गत बैंक के माध्यम से प्राप्त होती है, तो उस दशा में पात्र करदाता की आय 8% के स्थान पर 6% मानी जाएगी। करदाता अपना कर योग्य लाभ 8% या 6% जैसी भी स्थिति हो, से अधिक भी घोषित कर सकता है, किन्तु यदि करदाता यह दावा करता है कि उसको कर योग्य आय कुल आवर्त एवं कुल प्राप्तियों के 8% से भी कम है तो करदाता को वे सब खाता पुस्तकें या अन्य प्रपत्र रखने पड़ेंगे जिससे उसका यह दावा सही सिद्ध होता हो, किन्तु यह प्रावधान निम्न दशाओं में लागू नहीं होगा यदि एक व्यक्ति, जो धारा 44 AA (1) में सन्दर्भित पेशे का संचालन कर रहा है या कोई व्यक्ति, जो कमीशन या दलाली के रूप में आय अर्जित करता है या कोई व्यक्ति, जो किसी एजेन्सी का व्यापार करता है।

(5) मालवाहनों को चलाने, किराये या पट्टे पर देने का व्यापार (Business of plying, hiring or leasing goods carriages) [धारा 44AE] – यदि कोई करदाता, जो गत वर्ष में किसी भी समय 10 से अधिक माल वाहनों का स्वामी नहीं है तथा वह ऐसे माल वाहनों को चलाने, किराये पर देने या पट्टे पर देने के व्यापार में संलग्न हैं, तो ऐसे व्यापार के कर योग्य लाभों की गणना निम्न होगी –

(i) भारी मालवाहक (वाहन का सकल भार 12,000 किग्रा से अधिक) की दशा में सकल वाहन भार या लदान रहित भार के प्रति टन का ₹1,000 के बराबर राशि अथवा ऐसे वाहन से वास्तव में अर्जित की गयी राशि (जो भी दोनों में अधिक है) व्यापार के कर-योग्य लाभ माने जाएंगे।

(ii) भारी माल वाहन के अतिरिक्त माल वाहन की दशा में प्रति माह अथवा उसके भाग के लिए ₹7,500 अथवा करदाता द्वारा अर्जित की गई राशि, जो भी दोनों में से अधिक है, वहीं व्यापार में कर योग्य लाभ माने जाएंगे।

(6) समुद्री जहाज संचालन का व्यापार (Shipping business) [धारा 44 B] – यदि एक अनिवासी करदाता, जो समुद्री जहाजों के संचालन के व्यापार में संलग्न है, समुद्री जहाज से सामान, डाक, पशु या यात्रियों को किराये या भाड़े पर लाने-ले-जाने के कार्य में संलग्न है तो उसकी ऐसे किराये से प्राप्त कुल राशि का 7.5% उस व्यापार के कर योग्य लाभ माने जाएँगे।

(7) खनिज तेल निकालने के व्यापार की आय (Business of exploration of mineral oils) [धारा 44BB] – यदि कोई अनिवासी करदाता, भारत में खनिज तेल की खोज करने या निकालने या उत्पादन करने के व्यापार में संलग्न है तथा इस सम्बन्ध में अपनी सेवाएँ एवं सुविधाएँ प्रदान करता है अथवा इन कार्यों के लिए अपनी मशीने किराये पर देता है, तो इस सन्दर्भ में उसे जो राशि प्राप्त होगी। (चाहे वह राशि भारत में देय या प्राप्त हो अथवा भारत के बाहर) तो उसका 10% उस करदाता की कर योग्य आय माना जाएगा।

(8) हवाई जहाज संचालन का व्यापार (Business of aircraft operation) [धारा 44 BBA] – यदि कोई अनिवासी करदाता हवाई जहाज के संचालन के कारोबार में संलग्न है तथा वह यात्रियों, जानवरों, डाक या सामान के लाने-ले जाने का कार्य करता है तो इसके फलस्वरूप उसे भाड़े या किराये के रूप में जो राशि प्राप्त या देय होती है उसका 5% कर योग्य लाभ माना जाता है।

(9) एक विदेशी कम्पनी का ऊर्जा योजनाओं में निर्माण आदि कार्यों का व्यापार (Business of civil construction in certain turnkey power project by a foreign company) [धारा 44 BBB] – यदि एक विदेशी कम्पनी करदाता किसी ऐसी ऊर्जा योजना, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है, के निर्माण कार्य अथवा प्लाण्ट एवं मशीन लगाने के व्यापार में संलग्न है, तो ऐसे व्यापार से कम्पनी को प्राप्त या देय राशि का 10% ही कम्पनी की कर योग्य व्यापारिक आय मानी जाएगी।

(10) आधारभूत सुविधाओं के विकास में संलग्न औद्योगिक उद्यम या उपक्रम (Industrial undertaking or enterprise engaged in infrastructure development etc.) [धारा 80 IA] – यदि कोई औद्योगिक उद्यम या उपक्रम निम्न के व्यापार में संलग्न है— (1) आधारभूत सुविधाओं का प्रावधान करना, (II) दूरसंचार सेवाएँ प्रदान करना, (III) औद्योगिक पार्क या विशेष आर्थिक क्षेत्र का विकास करना, (IV) ऊर्जा के उत्पादन, वितरण अथवा सम्प्रेषण का व्यापार, (V) किसी विद्युत संयन्त्र का पुनः निर्माण एवं पुनर्जीवन प्रदान करना तथा वह इनसे लाभ प्राप्त करता है तो करदाता को कटौती के रूप में ऐसे लाभों के सम्बन्ध में धारा 80-IA के अन्तर्गत कर मुक्ति मिलेगी, जो कटौती के रूप में होगी। कटौती की राशि ऐसे व्यापार के लाभों की 100% होगी तथा प्रथम 10 कर निर्धारण वर्षों तक मिलेगी, किन्तु इस उपक्रम के सम्बन्ध में जो दूरसंचार सेवाएँ प्रदान करता है यह कटौती प्रथम 5 वर्षों तक लाभों का 100% होगी तथा अगले 5 वर्षों में लाभों का 30% होगी।

(11) औद्योगिक उपक्रम, जो आधारभूत सुविधाओं के विकास के अतिरिक्त अन्य किसी व्यापार में संलग्न है (Industrial undertaking engaged in the business other than infrastructure development ) [धारा 80 IB] – यदि कोई औद्योगिक उपक्रम निम्न व्यापार में संलग्न है— (I) किसी वस्तु या सामान के उत्पादन या निर्माण कार्य या कोल्ड स्टोरेज प्लाण्ट का संचालन (II) समुद्री जहाज का संचालन (III) होटल व्यापार या (IV) वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध एवं विकास का व्यापार या, (V) खनिज तेलों का उत्पादन, (VI) गृह निर्माण एवं विकास परियोजना व्यवसाय (VII) खाद्यान्न के एकीकृत प्रबन्ध, संग्रहण एवं परिवहन, (VIII) बहुविध थिएटर (Multiplex theater), (IX) सम्मेलन केन्द्र (Convention centre) या (X) किसी ग्रामीण क्षेत्र में किसी अस्पताल का संचालन एवं अनुरक्षण, (XI) वर्जित क्षेत्र (Excluded area) के अतिरिक्त भारत के किसी भी क्षेत्र में स्थित अस्पताल का संचालन एवं अनुरक्षण तो करदाता को ऐसे व्यापार के लाभों में से कटौती के रूप में कर मुक्ति प्रदान की जाएगी, जो लाभों के 100% 50%, 80% एवं 25% जैसी भी स्थिति होगी, कटौती की अवधि 3 प्रारम्भिक वर्षों से 10 प्रारम्भिक वर्षों तक हो सकती है, जो भिन्न-भिन्न व्यवसाय के प्रकार पर निर्भर करता है।

(12) होटल एवं सम्मेलन केन्द्र का व्यापार (Business of hotel and convention centre) [धारा 80ID] – यदि कोई करदाता किसी ऐसे होटल के व्यापार में संलग्न है, जो विशिष्ट क्षेत्र अथवा किसी विश्वदायी स्थल के विशिष्ट जिलों अथवा किसी सम्मेलन केन्द्र के स्वामित्व, निर्माण एवं संचालन के व्यापार में संलग्न है, तो उस करदाता को धारा 80 ID के अन्तर्गत ऐसे व्यापार के लाभों का 100% कटौती के रूप में स्वीकृत होगा। यह कटौती कर मुक्ति की तरह होगी जो लगातार 5 वर्षों तक प्रदान की जाएगी।

(13) कूड़े-करकट को एकत्रित करने एवं उसको प्रसंस्कृत करने का व्यापार (Business of collecting and processing of Bio-degradable waste) [धारा 80 JJA] – यदि कोई करदाता कूड़ा-करकट को एकत्रित करने एवं उसका प्रसंस्करण करने या प्रयोग करके विद्युत, बायोखाद, बायो कीटनाशक अथवा अन्य बायोलॉजिकल एजेण्ट, बायो गैस ईंधन के लिए गोल या चौकोर टुकड़े अथवा रासायनिक खाद के उत्पादन के व्यापार में संलग्न हैं, तो ऐसे करदाता की कर योग्य लाभों की गणना करने के लिए उनमें से 100% कटौती लगातार 5 कर निर्धारण वर्षों तक प्रदान की जाएगी।

(14) एक उपक्रम, जो नये कर्मचारियों को नियुक्ति प्रदान करता है (An undertaking providing employment to new workman) [धारा 80JJA] – यदि कोई उपक्रम करदाता गत वर्ष में नये नियमित कर्मचारियों की नियुक्त करता है, तो उस उपक्रम को उसके व्यापार के लाभों में नये कर्मचारियों की लागत के 30% के बराबर कटौती प्रदान की जाएगी। यह कटौती 3 लगातार कर निर्धारण वर्षों तक दी जाएगी, जिसमें वह कर निर्धारण वर्ष भी सम्मिलित है, जिसके गत वर्ष में ये नियुक्तियाँ की गई हैं।

(15) समुद्र तट की बैंकों एवं अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र (Off-shore banking business and International financial services centre) [धारा 80 LA] – यदि करदाता एक अधिसूचित बैंक है अथवा विदेशी बैंक है जिसकी किसी विशेष आर्थिक क्षेत्र में समुद्र तट पर बैंकिंग इकाई है अथवा अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र की इकाई है, तो उस करदाता को उसकी आय में से धारा 80 LA के अन्तर्गत प्रथम 5 वर्षों तक आय का 100% एवं अगले 5 वर्षों तक आय के 50% के बराबर कटौती प्रदान की जाएगी।

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व्यावसायिक संगठन के प्रारूप (Forms of Business Organisation)

एक साहसी को व्यापार प्रारम्भ करने से पूर्व उसके संगठन के प्रारूप का निर्णय लेना होता है। व्यापार के संगठन का प्रारूप निम्न में से कोई हो सकता है- (I) एकल स्वामित्व या हिन्दू अविभाजित परिवार, (II) साझेदारी फर्म या (III) कम्पनी संगठन के किसी प्रारूप का चयन करके दरें, कर प्रेरणाएँ एवं कर भार को ध्यान में रखकर किया जाता है। एक सम्भावित उद्यमी संगठन के उस प्रारूप का चयन करेगा जिसके अन्तर्गत कर दायित्व न्यूनतम हो और उसे कर के बाद लाभ अधिकतम प्राप्त हो। संगठन के चयन का निर्णय विभिन्न प्रारूपों के कर दायित्व की तुलना करके ही लिया जा सकता है।

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I, एकल स्वामित्व या हिन्दू अविभाजित परिवार (Proprietorship or Hindu Undivided Family)

संगठन का एकल स्वामित्व प्रारूप का कर निर्धारण ‘एक व्यक्ति’, ‘हिन्दू अविभाजित परिवार’, ‘व्यक्तियों का संघ’, ‘व्यक्तियों का निकाय’ अथवा ‘कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति के रूप में होता है। आयकर के वे सभी प्रावधान, जो ‘एक व्यक्ति’ के सम्बन्ध में लागू होते हैं वही सारे प्रावधान ‘हिन्दू अविभाजित परिवार’, ‘व्यक्तियों का संघ’ अथवा ‘व्यक्तियों का निकाय’ करदाताओं पर भी लागू होंगे कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए कर नियोजन करते समय निम्नलिखित प्रमुख तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए—

(1) कर मुक्त सीमा (Exemption limit)-  एक व्यक्ति की ₹ 2,50,000 तक की शुद्ध आय आयकर से मुक्त होती है। इस प्रकार यदि एक एकाकी व्यापारी ₹2,50,000 तक कमाता है तो उसका कोई कर दायित्व नहीं होगा। एकल व्यापारी का कर दायित्व आय के विभिन्न स्तरों पर निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है—

(i) निवासी वरिष्ठ नागरिक करदाता की दशा में लागू कर की दरें (Tax rates applicable in the case of a resident Senior Citizen) – यदि एक निवासी वरिष्ठ नागरिक, जो गत वर्ष में किसी भी समय 60 वर्ष की आयु का हो चुका है, किन्तु 80 वर्ष की आयु से कम है और वह किसी व्यापार का एकल स्वामी है, तो कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए निम्न दरों से कर चुकाएगा –

शुद्ध आय खण्ड (Net Income slab) कर की दरें (Rates of income-tax)
₹3,00,000 तक शून्य
अगले ₹2,00,000 पर 5%
अगले ₹5,00,000 पर 20%
शेष राशि पर अर्थात् ₹10,00,000 से अधिक पर 30%

 

(ii) निवासी अति वरिष्ठ नागरिक करदाता की दशा में लागू कर की दरें (Tax rates applicable in case of a Resident Super Senior Citizen) – यदि एक निवासी अति वरिष्ठ नागरिक गत वर्ष में 80 वर्ष या इससे अधिक की आयु का है तथा वह व्यापार का एकल स्वामी है, तो वह कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए निम्नलिखित दरों से कर चुकाएगा –

शुद्ध आय खण्ड (Net Income slab) कर की दरें (Rates of income-tax)
प्रथम ₹5,00,000 तक शून्य
अगले ₹5,00,000 पर 20%
शेष बची कुल आय पर अर्थात् ₹10,00,000 से अधिक पर 30%

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(2) अन्य प्रत्येक एक व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार, व्यक्तियों के समुदाय, व्यक्तियों का निकाय आदि के सम्बन्ध में लागू कर की दरें (Tax rates applicable to any other individual or Hindu Undivided Family or Association of Persons or Body of Individuals) – यदि इनमें से कोई व्यक्ति भले ही वह समामेलित हो अथवा नहीं अथवा प्रत्येक कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति, यदि किसी व्यापार का स्वामी है, तो कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए उसे निम्न दरों में आयकर चुकाना होगा

शुद्ध आय खण्ड (Net Income slab) कर की दरें (Rates of income-tax)
प्रथम ₹2,50,000 तक NIL
अगले ₹2,50,000 पर 5%
अगले ₹5,00,000 पर 20%
शेष बची कुल आय पर अर्थात् ₹10,00,000 से अधिक पर 30%

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(3) अधिभार (Surcharge) – आयकर का 10% यदि करदाता की शुद्ध आय ₹50,00,000 से अधिक किन्तु ₹1 करोड़ से अधिक नहीं है। आयकर का 15%, यदि शुद्ध आय ₹1 करोड़ से अधिक है।

(4) स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर (Alternate Minimum Tax) – कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए एक व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार, व्यक्तियों का समुदाय, व्यक्तियों का निकाय अथवा प्रत्येक कृत्रिम वैधानिक व्यक्ति करदाता, जिसका धारा 115 JC के अनुसार गणित ‘समायोजित कुल आय ₹20,00,000 से अधिक है, तो उसके द्वारा देय आयकर वैकल्पिक न्यूनतम कर से कम नहीं होना चाहिए। वैकल्पिक न्यूनतम कर की दर समायोजित कुल आय का 15% (+SC, यदि लगता है, +4% HEC) होगी।

एकल स्वामित्व में कर दायित्व निर्धारित करने से पूर्व सकल कुल आय में से निम्नलिखित कटौतियाँ प्रदान की जाती हैं –

(1) जीवन बीमा प्रीमियम, प्रॉविडेण्ट फण्ड, राष्ट्रीय बचत पत्र, मकान के लिए, लिए गए ऋण का भुगतान आदि के सम्बन्ध में अधिकतम कटौती ₹1,50,000 |

(धारा 80C)

(2) भारतीय जीवन बीमा निगम के पेंशन फण्ड में भुगतान, अधिकतम कटौती ₹1,50,000 |

(धारा 80CCC)

नोटधारा 80C एवं धारा 80CCC के अन्तर्गत कुल कटौती ₹1,50,000 से अधिक नहीं होगी।

(धारा 80CCE)

(3) स्वयं, जीवन साथी तथा आश्रित बच्चों के स्वास्थ्य के बीमे की प्रीमियम या केन्द्र सरकार स्वास्थ्य स्कीम में अंशदान के सम्बन्ध में अधिकतम कटौती ₹25,000 तक। इसके अतिरिक्त माता या पिता या दोनों के स्वास्थ्य बीमा की प्रीमियम के सम्बन्ध में कटौती ₹25,000 तक। यदि बीमा प्रीमियम वरिष्ठ नागरिक के सम्बन्ध में दिया जाता है तो ₹50,000 ..तक की कटौती मिल सकती है।

(धारा 80D)

(4) निःशक्त आश्रित की चिकित्सा आदि पर व्यय तथा उसके भरण-पोषण के लिए जमा कराई गई राशि के सम्बन्ध में कटौती– निःशक्तता के लिए कटौती ₹75,000 एवं गम्भीर निःशक्तता की दशा में कटौती ₹1,25,000 की मिलेगी।

(धारा 80DD)

(5) निर्धारित बीमारियों के (स्वयं अथवा आश्रित) इलाज पर व्यय के सम्बन्ध कटौती –

(1) भुगतान की गई राशि या ₹40,000 जो दोनों में कम हो,

(ii) वरिष्ठ नागरिक के सम्बन्ध में भुगतान की गई राशि या ₹ 1,00,000 (कर निर्धारण वर्ष 2020-21 से),

जो दोनों में कम हो, यदि चिकित्सा पर व्यय सम्बन्ध में कुछ राशि बीमा कम्पनी से प्राप्त होती है या नियोक्ता ने प्रतिपूर्ति की है तो इस राशि को उपर्युक्त वर्णित राशि में से घटा दिया जाएगा तथा शेष राशि की कटौती मिलेगी।

(धारा 80DDB)

(6) उच्चतर शिक्षा के लिए, लिए गए ऋण पर ब्याज के भुगतान की सम्पूर्ण राशि|

(धारा 80E)

(7) वित्तीय संस्थाओं से आवासीय मकान के लिए, लिए गए ऋण पर ब्याज के सम्बन्ध में कटौती। इस सम्बन्ध में ₹50,000 तक की कटौती मिलेगी।

(धारा 80EE)

(8) मकान किराये के सम्बन्ध में अधिकतम कटौती ₹5,000 प्रतिमाह।

(धारा 80GG)

(9) निःशक्त व्यक्ति की आय में से कटौती।

निःशक्तता के लिए कटौती ₹75,000 एवं गम्भीर निःशक्तता की दशा में कटौती ₹1,25,000 की मिलेगी।

(धारा 80U)

(10) बैंक / डाकघर बचत खाते के ब्याज के सम्बन्ध में अधिकतम कटौती ₹10,000 |

(धारा 80TTA)

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II, साझेदारी फर्म (Partnership Firm)

नये व्यवसाय को स्थापित करने के लिए संगठन के प्रारूपों में द्वितीय एवं मुख्य प्रारूप साझेदारी फर्म है। इसमें सीमित दायित्व साझेदारी अधिनियम, 2008 के अन्तर्गत गठित समित दायित्व साझेदारी भी सम्मिलित है। फर्म या सीमित दायित्व साझेदारी आयकर अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत ‘व्यक्ति’ है तथा इन्हें पृथक्-पृथक् करदाता मानकर इनका कर निर्धारण किया जाता है। इनके साझेदारों पर भी पृथक्-पृथक् रूप में एक व्यक्ति’ करदाता की भाँति कर-निर्धारण किया जाता है। साझेदार का कर निर्धारण करते समय फर्म के लाभों में उसका हिस्सा आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10 (2A) के अनुसार कर मुक्त होता है इसलिए उसकी कर योग्य आय में नहीं जोड़ा जाएगा, किन्तु साझेदार को देय या प्राप्त कोई ब्याज, कमीशन या पारिश्रमिक, जो फर्म की पुस्तकों में कटौती के रूप में स्वीकृत किया जा चुका साझेदार की कर योग्य आय में जोड़ा जाएगा और साझेदार द्वारा उस पर कर देय होगा। फर्म के कर प्रभाव के सम्बन्ध में प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित हैं—

(1) कोई कर मुक्त सीमा नहीं (No exemption limit) – किसी साझेदारी फर्म अथवा सीमित दायित्व साझेदारी के लिए ऐसी कोई कर मुक्त सीमा नहीं है जैसा एक व्यक्ति करदाता के लिए होती है। फर्म की कुल आय पर एकसमान दर से कर लगाया जाता है। फर्म की सम्पूर्ण कुल आय पर 30% की समान दर से कर लगाया जाएगा। यदि फर्म की कुल आय ₹1 करोड़ से अधिक है तो उस पर 12% की दर से सरचार्ज लगाया जाएगा। इसके अतिरिक्त आयकर एवं सरचार्ज पर 4% की दर से स्वास्थ्य एवं शिक्षा उप-कर लगाया जाएगा। वैकल्पिक न्यूनतम कर-एक फर्म की दशा में वैकल्पिक न्यूनतम कर (MAT), कर निर्धारण वर्ष 2020-21 के लिए, समायोजित कुल आय के 19.24% [18.5% (MAT) + 4% (HEC)] के बराबर होगा बशर्ते कि फर्म की समायोजित कुल आय ₹1 करोड़ से अधिक नहीं है। यदि फर्म की समायोजित आय ₹1 करोड़ से अधिक है तो वैकल्पिक न्यूनतम दर समायोजित कुल आय कर 21.5488% [18.5% (MAT) + 10%(SC) +4%(HEC)]।

(2) फर्म की कर योग्य आय की गणना (Computation of firm’s taxable income) – फर्म की कर योग्य आय में फर्म की व्यापार एवं पेशे की कर योग्य आय के अलावा फर्म की अन्य शीर्षकों से आय भी सम्मिलित होती है अर्थात् मकान सम्पत्ति से आय, पूँजी लाभ, अन्य साधनों से आय आदि। फर्म की व्यापार एवं पेशे की आय ज्ञात करते समय निम्न प्रावधानों को विशेष तौर से अपनाना पड़ेगा –

(i) साझेदारों को चुकाया गया ब्याज (Interest paid to partners) – साझेदारों द्वारा फर्म में विनियोजित पूँजी पर ब्याज वसूल करने का अधिकार होता है, यह ब्याज अधिकतम 12% प्रतिवर्ष की दर से लगाया जाता है। यदि साझेदारों को चुकाया गया ब्याज 12% प्रतिवर्ष से अधिक है तो आधिक्य की राशि को फर्म की कर योग्य आय की गणना करते समय कटौती के रूप में स्वीकृत नहीं किया जाएगा। ऐसा ब्याज साझेदारी संलेख द्वारा अधिकृत होना चाहिए।

(ii) फर्म द्वारा साझेदारों को चुकाया गया पारिश्रमिक (Remuneration paid to partners by the firm) – फर्म द्वारा अपने क्रियाशील साझेदारों को चुकाया गया पारिश्रमिक एक स्वीकृत व्यय होगा बशर्ते इसे साझेदारी संलेख द्वारा अधिकृत किया गया है, किन्तु यह पारिश्रमिक आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40(b) के अन्तर्गत प्रदत्त सीमा में है। स्वीकृत पारिश्रमिक निम्न है—

एक फर्म की दशा में, जो एक व्यापार, व्यवसाय अथवा पेशे का संचालन कर रही है, साझेदारों को धारा 40(b) के अन्तर्गत देय अधिकतम पारिश्रमिक निम्न प्रकार होगा –

(a) यदि पुस्तकीय लाभ के स्थान पर हानि है ₹1,50,000
(b) (i) यदि फर्म के पुस्तकीय लाभ ₹3,00,000 तक है ₹1,50,000 अथवा पुस्तकीय लाभों का 90% (जो भी दोनों में अधिक है)।
(ii) शेष पुस्तकीय लाभों पर पुस्तकीय लाभों का 60%

 

(iii) पुस्तकीय लाभ (Book profit) – पुस्तकीय लाभ किसी गत वर्ष का ऐसा व्यापारिक शुद्ध लाभ है जिनकी गणना धारा 28 से धारा 44D तक के प्रावधानों के अन्तर्गत की गई है। संक्षेप में ‘व्यापार एवं पेशे से लाभ एवं प्राप्तियाँ’ शीर्षक के कर योग्य लाभों में साझेदारों को देय ब्याज (12% से अधिक, वेतन, बोनस, कमीशन या पारिश्रमिक) को जोड़ने के बाद ज्ञात की जाती है। इसमें फर्म की केवल व्यापारिक आय ही ली जाती है, अन्य शीर्षकों की आय नहीं। इसी प्रकार, आगे लायी गयी व्यापारिक हानियाँ पुस्तकीय लाभों में से नहीं घटायी जाती हैं।

फर्म की कर योग्य व्यापारिक आय निम्न है –

Taxable business income = Book profits – Remuneration paid to partners

(i.e. salary, bonus, commission etc. paid to partners)

(3) सकल कुल आय में से कटौतियाँ (Deductions from Gross total income) – फर्म की सकल कुल आय में से धारा 80 की निम्न कटौतियाँ प्रदान की जाएगी – 80 G; 80 GGA; 80GGC; 80 IA, 80 IAB, 80 IAC, 80 IB, 80 IBA, 80IC, 80 ID, 80 IE, 80 JJA and 80JJAA

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III, कम्पनी (Company)

कम्पनी एक अति महत्त्वपूर्ण एवं अधिकतम प्रचलित संगठन का प्रारूप है। कम्पनी एक कृत्रिम व्यक्ति है, जो कम्पनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अन्तर्गत अथवा किसी पुराने कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत, जो तत्कालीन समय में प्रभावी रहा हो, निर्मित पंजीकृत या समामेलित किया जाता है। इसके स्वामियों को अंशधारी कहा जाता है। यदि कोई उद्यमी वृहद् स्तर पर व्यापार करने का इच्छुक है और अपना दायित्व सीमित नहीं रखना चाहता, तो वह व्यापार संगठन के लिए कम्पनी प्रारूप का चयन कर सकता है। कर नियोजन के लिए इसकी तुलना साझेदारी फर्म से की जा सकती है। कर-नियोजन हेतु इसकी विचारणीय मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) कर मुक्त सीमा नहीं (No exemption limit) – कम्पनी प्रारूप के लिए कोई कर मुक्ति सीमा नहीं है। कम्पनी को ₹1 से लेकर असीमित राशि तक की आय पर एकसमान दर से कर लगाया जाता है। कर की दरें निम्नवत् हैं

कम्पनी की ‘कर योग्य आय’ पर कर निर्धारण वर्ष 2020-21 में निम्न दरों से आयकर की गणना की जाती है

Percentage of taxable incomes

(i) एक देशी कम्पनी की दशा में (In the case of a domestic company):

(अ) यदि इसका कुल आवर्त या सकल प्राप्तियाँ गत वर्ष 2017-18 में ₹400 करोड़ से अधिक नहीं                    25%

(ब) किसी भी अन्य घरेलू (देशी) कम्पनी की दशा में                                                                              30%

(ii) एक विदेशी कम्पनी की दशा में (In case of foreign company):

(अ) तकनीकी सेवाएं प्रदान करने के सम्बन्ध में सरकार से अथवा एक भारतीय कम्पनी से प्राप्त रॉयल्टी [जो 1 अप्रैल, 1961 से 31 मार्च, 1976 तक की अवधि में किसी भारतीय संस्थान से हुए प्रसंविदे के अन्तर्गत प्राप्त हुई हो एवं फीस जो 1 मार्च, 1964 से 31 मार्च, 1976 के मध्य केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी तकनीकी सेवा अनुबन्ध के अन्तर्गत प्राप्त हुई] हो । से प्राप्त राशि के सम्बन्ध में।                                                                                                                                  50%

(ब) अन्य आयों के सम्बन्ध में (In respect of other) incomes)                                                          40%

अधिकर (Surcharge) – यदि कम्पनी की शुद्ध आय ₹1 करोड़ से अधिक है, किन्तु ₹10 करोड़ से अधिक नहीं है, तो, एक घरेलू कम्पनी द्वारा कुल आयकर दायित्व के 7% के बराबर अधिकर देय होगा तथा एक विदेशी कम्पनी द्वारा 2% की दर से अधिकर देय होगा, किन्तु यदि कम्पनी की शुद्ध आय ₹10 करोड़ से अधिक है, तो एक घरेलू कम्पनी द्वारा कुल आयकर दायित्व के 12% के बराबर अधिकर देना होगा तथा विदेशी कम्पनी को 5% की दर से अधिकर देना होगा, किन्तु यदि किसी कम्पनी की शुद्ध आय ₹1 करोड़ से अधिक नहीं है तो उस कम्पनी द्वारा काई अधिकर देय नहीं होगा।

स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर (Health and Education Cess) एक घरेलू एवं विदेशी कम्पनी की दशा में कम्पनी के आयकर एवं अधिकर के 4% के बराबर स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर देना होगा।

(2) धारा 80 के अन्तर्गत कटौतियाँ (Deductions u/s 80) – कम्पनी की सकल कुल आय में से धारा 80 की निम्न कटौतियाँ प्रदान की जाएँगी-80 G; 80GGA; 80 GGB; 80 IA, 80 LAB, 80 IAC, 80 IB, 80 IBA, 80 IC, 80 ID, 80 IE, 80 JJA, 80JJAA, 80 LA, 80PA.

(3) कम्पनी की कुल आय की गणना (Computation of company’s total income)- कम्पनी की कुल आय में इसके व्यापार एवं पेशे के लाभ एवं प्राप्तियाँ एवं अन्य शीर्षकों की आयें सम्मिलित होती हैं। कम्पनी की व्यापारिक आय ठीक उसी प्रकार गणित की जाती है जिस प्रकार एक फर्म की गणित की जाती है। कम्पनी की व्यापार एवं पेशे की आय कम्पनी के लाभ-हानि खाते को समायोजित करके ज्ञात की जाती है। यह ध्यान रखना चाहिए कि कम्पनी के व्यापारिक लाभों की गणना करते समय कोई ब्याज की देय या भुगतानित राशि एवं डिबेंचर पर ब्याज की राशि आदि कटौती योग्य होते हैं। इसी प्रकार प्रबन्ध संचालक एवं अथवा संचालक को देय कोई वेतन, बोनस, कमीशन एवं अनुलाभ आदि पूर्ण रूप से कटौती योग्य होते हैं, किन्तु अंशधारियों को भुगतानित लाभांश कटौती योग्य नहीं होता।

 

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Tax Management Numerical Question.

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Unit 2 Tax Management Mcom Notes
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Unit 5 Taxation of International Transactions Mcom Notes


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