Unit 5 Association of attributes Mcom Notes

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Unit 5 Association of attributes Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit V: Association of Attributes: Two Attributes Only, Chi Square Test. Interpolation and Extrapolation: Binominal, Newton and Langrange’s Method. Association of attributes Notes

 

गुण साहचर्य (Association of Attributes)

सामान्य भाषा में, यदि एक गुण दूसरे गुण साथ अधिक संख्या में पाया जाता है तो यह कहा जाता है कि दोनों गुणों में परस्पर सम्बन्ध है परन्तु सांख्यिकीय में ‘गुण-साहचर्य’ (Association of attributes) शब्द का विशिष्ट अर्थ है। सांख्यिकीय दृष्टि से दो गुणों में परस्पर गुण साहचर्य तब पाया जाता है जब वे दोनों प्रत्याशित (expected) इकाइयों से अधिक इकाइयों में एक साथ पाए जाएँ। यूल एवं कैण्डाल के अनुसार, ‘स्वतन्त्र होने पर दो · गुणों की जो प्रत्याशा (expectation) होती है यदि वास्तव में उस प्रत्याशा से कहीं अधिक मात्रा में वे दोनों— A और B— साथ-साथ पाए जाते हैं तो उनमें गुण-साहचर्य होता है।” दूसरे शब्दों में, यदि दो गुण A और B कई बार एक साथ दिखाई पड़े तो आम बोलचाल की भाषा में हम उन्हें ‘सहचारी’ (associated) कहते हैं, परन्तु सांख्यिकीय में A और B केवल तभी सहचारी कहलाते हैं, जब उनके एक-साथ दिखाई पड़ने वाली स्थितियों की संख्या (observed frequency) उन स्थितियों की प्रत्याशित संख्या (expected frequency) से बड़ी हो जिनमें वे गुण स्वतन्त्र (independent) या ‘असहचारी’ होने की सूरत में एक साथ दिखाई पड़ेंगे। दो या अधिक गुणों की पारस्परिक आश्रितता की कोटि को ‘साहचर्य’ कहते हैं। मान लीजिए किसी समष्टि के दो गुण A और B हैं जो स्वतन्त्र नहीं हैं बल्कि किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। हम A के अभाव को c से, B के अभाव को 3 से और लघु कोष्ठ लगाकर उस गुण वाले सदस्यों की संख्या को व्यक्त करते हैं। इस प्रकार हम निम्न रूप में 2 x 2 सारणी या नौ-वर्ग सारणी (Nine-square table) की रचना करते हैं –

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प्रकार-गुण-साहचर्य के प्रसंग में गुणात्मक समंकों में अग्र तीन प्रकार की स्थितियाँ पायी जाती हैं –

1, धनात्मक गुण साहचर्य (Positive Association) – दो गुणों की साथ साथ उपस्थिति अथवा साथ-साथ अनुपस्थिति को धनात्मक गुण साहचर्य या केवल ‘गुण- साहचर्य’ कहते हैं। इस स्थिति में वास्तविक आवृत्ति प्रत्याशित आवृत्ति से अधिक होती है। यदि (AB) > (A) (B) / N तो हम कहते हैं कि A और B में धनात्मक साहचर्य (Positive association) है या केवल इतना ही कहते हैं कि A और B में साहचर्य है (A and Bare associated)। धूम्रपान व कैन्सर रोग में शिक्षा तथा रोजगार में, निरक्षरता एवं अपराध-प्रवृत्ति में अधिकतर धनात्मक गुण साहचर्य पाया जाता है।

2, ऋणात्मक गुण साहचर्य (Negative Association or Disassociation) – जब एक गुण की उपस्थिति होने पर दूसरे की अनुपस्थिति हो तो उन दोनों में ऋणात्मक गुण साहचर्य या असाहचर्य होता है जैसे चेचक का टीका लगवाना और चेचक का प्रकोप होना, कुनैन और मलेरिया ज्वर आदि में इन परिस्थितियों में वास्तविक आवृत्ति, प्रत्याशित आवृत्ति से कम होती है।

यदि (AB) < (A) (B) N तो हम कहते हैं कि A और B में ऋणात्मक साहचर्य या असाहचर्य है।

3, स्वतन्त्रता (Independence) – जब दो गुणों में साथ-साथ पाए जाने की एक या एक उपस्थिति के साथ दूसरे की अनुपस्थिति की प्रवृत्ति नहीं पायी जाए तो गुण स्वतन्त्र, (Independent) कहलाते हैं। इन स्थिति में वास्तविक आवृत्ति प्रत्याशित आवृत्ति के बराबर होती है।

जब [ (AB) = (A) (B) / N ] तो A और B स्वतन्त्र कहे जाते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से गुण-साहचर्य के तीन प्रमुख लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं—

(i) साथ-साथ उपस्थिति या अनुपस्थिति- सर्वप्रथम, यह आवश्यक है कि दो गुण साथ-साथ उपस्थित अथवा अनुपस्थित (धनात्मक) हों अथवा एक गुण की उपस्थिति के साथ-साथ दूसरे की अनुपस्थिति हो (ऋणात्मक गुण साहचर्य) ।

(ii) तुलनात्मक अध्ययन-गुण – साहचर्य के लिए सह-उपस्थिति या अनुपस्थिति ही पर्याप्त नहीं है वरन् यह भी अनिवार्य है कि यह वास्तविक उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति प्रत्याशित (या सम्भावित) अनुपात से अधिक अनुपात में होनी चाहिए। गुण-साहचर्य में सदैव तुलनात्मक अध्ययन होता है। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि दोनों गुणों के एक साथ अत्यधिक अनुपात में पाए जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों में गुण साहचर्य है। निम्नलिखित तर्क पर विचार कीजिए

“शराब पीने वालों में से 99 प्रतिशत व्यक्ति अल्पायु होते हैं अर्थात् 80 वर्ष की आयु से पहले मर जाते हैं, अत: मद्यपान दीर्घ जीवन के लिए अहितकार है।” यहाँ शराब पीने वालों (4) में से 80 साल से पहले मरने वालों (B) का प्रतिशत [(AB)/A x 100] दिया हुआ है। प्रतिशत भी बहुत अधिक (99%) है परन्तु केवल इसी अनुपात से यह निष्कर्ष निकालना अनुचित है कि शराब पीना और अल्पजीवन में गुण-साहचर्य है। वास्तव में, हमें यह भी ज्ञात करना चाहिए कि शराब न पीने वालों

(α) में अल्पायु वालों का क्या प्रतिशत [(αB)  / (α) x 100] है। फिर इन दोनों अनुपातों की तुलना करने पर ही सही निष्कर्ष  निकाला जा सकता है।

इस तुलना से तीन प्रकार की परिस्थितियाँ सामने आ सकती है –

(a) यदि शराब न पीने वालों में से 80 साल से पहले मरने वालों का अनुपात (प्रतिशत) कम है (< 99% ) तो तर्क में निहित निष्कर्ष की पुष्टि होती है।

(b) यदि शराब पीने वालों में से अल्पायु व्यक्तियों का अनुपात, न पीने वालों में अल्पायु व्यक्तियों के अनुपात से कम है तो विपरीत निष्कर्ष निकलेगा अर्थात् यदि न पीने वालों में से 99,5% अल्पायु होते हैं तो कहना होगा कि मद्यपान स्वास्थ्य के लिए हितकर है।

(c) यदि न पीने वालों में से अल्पायु व्यक्तियों का प्रतिशत भी इतना ही (99%) है जितना पीने वालों में से अल्पायु का प्रतिशत हो यह निष्कर्ष निकलेगा कि मदिरापान का जीवन प्रत्याशा पर कोई असर नहीं पड़ता।

सारांश, गुण-साहचर्य के विषय में सही निष्कर्ष निकालने के लिए विभिन्न अनुपातों का तुलनात्मक विवेचन आवश्यक है।

(iii) कार्य-कारण सम्बन्ध – गुण-साहचर्य के लिए दो गुणों में परस्पर कारण और परिणाम का सम्बन्ध होना भी आवश्यक है। काली बिल्ली के रास्ता काटने को दुर्भाग्य व असफलता का द्योतक माना जाता है परन्तु यह कोरा अन्धविश्वास है। बिल्ली के रास्ता काटने और असफलता में कोई वैज्ञानिक या कार्य करण’ सम्बन्ध नहीं है। विचाराधीन गुणों में कारण परिणाम सम्बन्ध होना आवश्यक है परन्तु कभी-कभी दो गुणों में प्रतिचयन उच्चावचनों (sampling fluctuations) के कारण आकस्मिक साहचर्य (chance) association) भी उत्पन्न हो सकता है।

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I, काई वर्ग परीक्षण (Chi-Square Test)

काई-वर्ग का प्रयोग दो गुणों की स्वतन्त्रता की जाँच (Test of Independence) करने के लिए किया जाता है। इसकी सहायता से – (1) बहुगुणी वर्गीकरण में गुण-सहसम्बन्ध ज्ञात किया जाता है, (2) द्वन्द्वभाजन की दशा में यह प्रामाणिक रूप से पता चल जाता है कि वास्तविक एवं प्रत्याशित आवृत्तियों ( Expected Frequencies) में अन्तर का कारण केवल संयोग है या हमारी आधारभूत मान्यता के गलत होने के कारण है।

 

काई-वर्ग परीक्षण की प्रक्रिया (Procedure of Chi-Square Test)

इसकी जाँच विधि निम्न प्रकार है –

(1) सर्वप्रथम यह परिकल्पना की जाती है कि दोनों गुण पूर्णतः स्वतन्त्र है अर्थात् उनकी वास्तविक एवं प्रत्याशित आवृत्तियों का अन्तर शून्य है।

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(4) X2 सारणी में से प्राप्त d,f, का 5% सार्थकता स्तर पर मान देख लिया जाता है।

(5) यदि X2 का परिकल्पित मूल्य उसके सारणी मूल्य से अधिक होता है तो शून्य परिकल्पना गलत हो जाती है अर्थात् दोनों गुण स्वतन्त्र न होकर परस्पर आश्रित या सम्बन्धित होते हैं। इसके विपरीत, यदि परिकल्पित मूल्य सारणी मूल्य से कम होता है तो शून्य परिकल्पना ठीक मान ली जाती है अर्थात् दोनों गुण स्वतन्त्र होते हैं और उनमें साहचर्य नहीं होता।

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येट का संशोधन (Yate’s Correction)

काई-वर्ग बंटन अविच्छिन्न बंटन है। इसके अनुप्रयोग की एक आवश्यक शर्त यह है कि कोई भी अन्तस्थ आवृत्ति 5 से कम नहीं होनी चाहिए अन्यथा X2 का मान भ्रमात्मक होगा। ऐसी दशा में येट का संशोधन किया जाना आवश्यक है।

इसके अन्तर्गत 2 x 2 सारणी में दी हुई सबसे छोटी आवृत्ति में 0-5 जोड़ दिया जाता है और शेष 3 आवृत्तियों को इस ढंग से समायोजित किया जाता है कि सीमान्त जोड़ पूर्ववत् रहे। इसे संशोधन [(fo-fe)-0-5] क्रिया द्वारा भी सम्पन्न किया जा सकता है।

 

काई-वर्ग परीक्षण के प्रयोग की आवश्यक शर्तें (Essential Conditions for Applying of Chi-Square Test)

काई वर्ग परीक्षण के प्रयोग के लिए आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं-

(1) समग्र की इकाइयों की संख्या पर्याप्त (50 से अधिक) होनी चाहिए।

(2) कोई भी प्रत्याशित कोष्ठ आवृत्ति 5 से कम नहीं होनी चाहिए।

(3) न्यादर्श का चयन दैव आधार पर किया जाना चाहिए।

(4) कोष्ठ आवृत्तियों के अवरोध (constraints) रेखीय होने चाहिए।

 

काई-वर्ग परीक्षण की विशेषताएँ (Special Properties of Chi-Square Test)

काई-वर्ग परीक्षण की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) यदि किसी समग्र से अनेक दैव प्रतिदर्श चुनकर उनका अध्ययन किया जाए तो प्रतिदर्शी के अलग-अलग काई वर्गों के मान जोड़कर पूरे समय के बारे में अधिक विश्वसनीय निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

(2) काई-वर्ग बंटन का स्वरूप स्वातन्त्र्य संख्याओं पर निर्भर होता है और प्रत्येक स्वातन्त्र्य संख्या के लिए एक अलग x 2 वक्र बनता है।

काई-वर्ग परीक्षण के उपयोग (Uses of Chi-square Test)

सांख्यिकीय विश्लेषण में काई वर्ग विश्लेषण एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गया है। निम्नलिखित क्षेत्रों में इसका प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है –

1, गुणों की स्वतन्त्रता की जाँच (Test of Independence) – काई वर्ग परीक्षण द्वारा गुणों के मध्य गुण सम्बन्ध या स्वतन्त्रता का परीक्षण किया जाता है। उदाहरण के लिए काई-वर्ग परीक्षण द्वारा यह ज्ञात किया जा सकता है कि कुनैन का प्रयोग मलेरिया रोकने में प्रभावी है या नहीं? पिता की बुद्धिमत्ता पुत्रों की बुद्धिमत्ता के स्तर को प्रभावित कर रही है या दोनों स्वतन्त्र है? इस जाँच के लिए दोनों गुणों को स्वतन्त्र मानकर प्रत्याशित आवृत्तियों ज्ञात की जाती हैं और काई-वर्ग की गणना की जाती है। अन्त में, समकों की स्वातन्त्र्य मात्रा (Degree of Freedom) एवं एक निश्चित सार्थकता स्तर पर काई-वर्ग के सारणी मूल्य से काई-वर्ग के गणना किए गए मूल्य की तुलना की जाती है। यदि गणना किया गया मूल्य सारणी मूल्य से कम या बराबर होता है तो गुण स्वतन्त्र माने जाते हैं। इसके विपरीत, गणना किया हुआ मूल्य सारणी मूल्य से अधिक होने पर गुण सम्बन्ध माना जाता है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि काई-वर्ग परीक्षण इस पहलू पर जोर देता है कि गुण सम्बन्ध के लिए न्यादर्श में वास्तविक आवृत्तियों एवं प्रत्याशित आवृत्तियों में अन्तर होना ही पर्याप्त नहीं है वरन् वह अन्तर इतना पर्याप्त और सार्थक होना चाहिए, जिससे यह माना जा सके कि वास्तव में उसी प्रकार का सम्बन्ध समग्र में भी विद्यमान है।

2, अन्वायोजन की उत्तमता की जाँच (Test of Goodness of Fit) – काई-वर्ग परीक्षण का प्रयोग यह जाँच करने के लिए भी किया जाता है कि वास्तविक या अवलोकित आवृत्तियाँ किसी विशिष्ट सैद्धान्तिक आवृत्ति वितरण (जैसे-द्विपद, पॉयसन या प्रसामान्य) के अनुरूप हैं या नहीं। यदि वास्तविक आवृत्तियों और सैद्धान्तिक आवृत्तियों में अन्तर होता है तो यह पता लगाया जाता है कि अन्तर सार्थक है या अर्थहीन। दूसरे शब्दों में, अन्वायोजन की उत्तमता की जाँच में यह परीक्षण किया जाता है कि न्यादर्श के समक सैद्धान्तिक वितरण के साथ अन्वायोजित होने में सफल हैं या नहीं। यदि काई-वर्ग का गणना मूल्य इसके सारणी मूल्य से अधिक आता है तो अन्वायोजन उत्तम नहीं माना जाता। इसके विपरीत, काई-वर्ग का मूल्य सारणी मूल्य से कम आने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अन्वायोजन उत्तम है अर्थात् अवलोकित और प्रत्याशित आवृत्तियों में अन्तर अर्थहीन है और वह केवल न्यादर्श उच्चावचनों के कारण हो रहा है।

3, सजातीयता की जाँच (Test of Homogeneity) – इस जाँच हेतु काई-वर्ग द्वारा यह परीक्षण किया जाता है कि विभिन्न न्यादर्श एक ही समग्र से लिए गए हैं अथवा नहीं। काई-वर्ग का प्रयोग समग्र मापांक (Population variance) की जाँच करने के लिए भी किया जाता है।

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आन्तरगणन एवं बाह्यगणन से आशय (Meaning of Interpolation and Extrapolation)

सांख्यिकीय अध्ययन में आन्तरगणन वह विधि है, जिसके द्वारा कुछ निश्चित परिकल्पनाओं के अन्तर्गत ज्ञात समंकों के आधार पर समंक श्रेणी के बीच किसी अज्ञात मूल्य का सर्वोत्तम सम्भाव्य अनुमान लगाया जाता है। इसके विपरीत, बाह्यगणन वह विधि है, जिसके द्वारा उपलब्ध सांख्यिकीय समंकों के आधार पर विशेष परिकल्पनाओं के अन्तर्गत समंक श्रेणी के भावी समंक के पूर्वानुमान लगाए जाते हैं।

डब्ल्यू०एम० हार्पर के शब्दों में- “दो सीमान्त बिन्दुओं के मध्य विन्दु का मूल्य ज्ञात करना आन्तरगणन कहलाता है। बाह्यगणन का अर्थ दो सीमान्त बिन्दुओं के बाहर किसी बिन्दु का मूल्य ज्ञात करना है।”

संक्षेप में, “दिए हुए समंकों के आधार पर विशेष रीतियों द्वारा समंक श्रेणी के किसी अज्ञात मूल्य के सर्वोत्तम सम्भाव्य अनुमान लगाने की प्रक्रिया को आन्तरगणन और किसी भावी अवधि के लिए समंक का अनुमान लगाने की प्रक्रिया को बाह्यगणन कहते हैं।”

उदाहरणभारत की जनसंख्या 1971, 1981, 1991, 2001, 2011 और 2021 वर्षों के लिए दी गई हैं। और हम 1975, 1980, 1985, 1990, 2005, 2015 वर्ष के लिए जनसंख्या का अनुमान लगाना हो तो यह क्रिया आन्तरगणन (Interpolation) कहलाएगी। इसके विपरीत, यदि उपर्युक्त जनसंख्या की समंक श्रेणी के बाहर जैसे 1961 या 2025, 2027 वर्ष के लिए जनसंख्या का पूर्वानुमान लगाना हो तो यह क्रिया बाह्यगणन (Extrapolation) कहलाएगी।

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आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की आवश्यकता तथा महत्त्व (Necessity and Importance of Interpolation and Extrapolation)

सांख्यिकीय अध्ययन में आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की आवश्यकता तथा महत्त्व या उपयोगिता के सम्बन्ध में प्रसिद्ध विद्वान डॉ० बाउले ने कहा है- “एक सांख्यिकीय अनुमान अच्छा हो या बुरा, ठीक हो या गलत, परन्तु प्रायः प्रत्येक दशा में वह एक आकस्मिक प्रेक्षण के अनुमान से अधिक ठीक होगा।” सांख्यिकीय अध्ययन में आन्तरगणन एवं बाह्यगणन के द्वारा सर्वोत्तम सांख्यिकीय अनुमान की आवश्यकता तथा महत्त्व या उपयोगिता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

1, मध्यवर्ती वर्षों के लिए अनुमान (Estimation for Middle Years) — आन्तरगणन विधि का प्रयोग मध्यवर्ती वर्षों अर्थात् एकत्रित समंकों के बीच की किसी तिथि से सम्बद्ध समंकों का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए भारत में जनगणना प्रत्येक 10 वर्ष बाद की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर मध्यवर्ती वर्षों में जनसंख्या का अनुमान लगाने के लिए आन्तरगणन विधि का सहारा लिया जाता है।

2, समंकों का खो जाना अथवा नष्ट हो जाना (Loss of Data or Spoilage of Data) – यदि एकत्रित समंकों में से कुछ आवश्यक समंक खो जाएँ अथवा नष्ट हो जाएँ, तब आन्तरगणन विधि द्वारा उन समंकों का अनुमान लगाया जाता है क्योंकि उन समकों को पुनः संकलित करना सम्भव नहीं होता।

3, समंकों की अपर्याप्तता (Inadequacy of Data) – कभी-कभी भूतकालीन समंक या तो एकत्रित ही नहीं किए जाते अथवा एकत्रित समंक अपर्याप्त होते हैं। इस अभाव की पूर्ति आन्तरगणन विधि द्वारा सर्वोपयुक्त अनुमान लगाकर की जाती है।

4, तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Study) – यदि कुछ समस्याओं से सम्बन्धित विभिन्न देशों के समंक अलग-अलग अवधि हेतु लिए गए हैं तो उनका तुलनात्मक अध्ययन करना सम्भव नहीं है। अतः समंकों को तुलनीय बनाने के लिए आन्तरगणन एवं बाह्यगणन का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है।

5, भावी अनुमान (Future Estimation) – समय-समय पर व्यावसायिक, आर्थिक एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में विभिन्न उद्देश्यों के लिए समंकों के पूर्वानुमान लगाने आवश्यक होते हैं। इसके लिए बाह्यगणन का सहारा लिया जाता है। आर्थिक नियोजन के क्षेत्र में तो बाह्यगणन का अत्यधिक प्रयोग किया जाता है।

6, माध्यों का निर्धारण (Determination of Averages) – अविच्छिन्न समंक श्रेणी में बहुलक, मध्यका आदि माध्यों का तत्सम्बन्धी वर्गान्तरों में मूल्य निर्धारण करने के लिए कुछ निश्चित परिकल्पनाओं के अन्तर्गत आन्तरगणन विधि का प्रयोग किया जाता है।

आन्तरगणन व बाह्यगणन की क्रियाओं का सभी क्षेत्रों में सर्वाधिक महत्त्व है। आधुनिक व्यवसाय तो अनुमानों एवं सम्भाविताओं पर ही आधारित हैं। आन्तरगणन की सहायता से अर्थशास्त्री मूल्य-स्तर, उत्पादन, राष्ट्रीय आय आदि के भावी अनुमान लगाते हैं। योजना निर्माता इन्हीं रीतियों के प्रयोग द्वारा अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों के लक्ष्य निर्धारित करते हैं। भावी प्रवृत्तियों में सर्वोत्तम अनुमानों के आधार पर ही सरकार द्वारा करारोपण नीति, मूल्य नीति, औद्योगिक नीति आदि का निर्धारण किया जाता है। बजट में आय-व्यय सम्बन्धी अनुमान इन्हीं रीतियों द्वारा लगाए जाते हैं। संक्षेप में, व्यापारी, उद्योगपति, अर्थशास्त्री, नियोजन विशेषज्ञ, राजनीतिज्ञ, प्रशासक, समाज सुधारक आदि सभी के लिए आन्तरगणन व बाह्यगणन की रीतियाँ अत्यधिक आवश्यक एवं उपयोगी हैं।

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आन्तरगणन एवं बाह्यगणन में अन्तर (Difference between Interpolation and Extrapolation)

इन दोनों क्रियाओं के अन्तर को निम्नलिखित उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।

निम्नलिखित सारणी एक नगर की जनसंख्या के आँकड़े प्रस्तुत करती है—

 

वर्ष 1961 1971 1981 1991 2001 2011 2021
जनसंख्या 6,000 7,000 8,000 9,000 10,000 11,000 12,000

 

यदि हम प्रस्तुत सारणी के आधार पर 1961 से 2021 तक के बीच के किसी वर्ष अर्थात् 1965 या 1985 अथवा 2005 में जनसंख्या की गणना करते हैं तो इस गणना विधि को ‘आन्तरगणन’ (Interpolation) कहा जाएगा जबकि 1961 से लेकर 2021 के अतिरिक्त किसी अन्य वर्ष के लिए जनसंख्या का अनुमान लगाएँ; जैसे— 1951 या 2025 अथवा 2031 वर्ष के लिए, तो इस विधि को ‘बाह्यगणन’ (Extrapolation) कहा जाएगा।

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आन्तरगणन से सम्बन्धित मान्यताएँ (Assumptions Relating to Interpolation)

आन्तरगणन की प्रक्रिया निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

(1) समकों में विचाराधीन अवधि में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव नहीं होने चाहिए।

(2) समंकों में होने वाले परिवर्तन प्रत्येक अवधि में नियमित रूप से तथा लगभग समान दर से ही होने चाहिए।

(3) दोनों पद श्रेणियाँ परस्पर सम्बन्धित होनी चाहिए, जिनमें एक स्वतन्त्र श्रेणी हो तथा दूसरी उस पर आश्रित हो।

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आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की रीतियाँ (Methods of Interpolation and Extrapolation)

आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की प्रमुख नम्नलिखित हैं –

1, बिन्दुरेखीय रीति (Graphic Method),

II, बीजगणितीय रीतियाँ (Algebraic Methods)

(1) प्रत्यक्ष द्विपद विस्तार रीति (Direct Binomial Expansion Method),

(2) न्यूटन की प्रगामी अन्तर विधि (Newton’s Method of Advancing Differences),

(3) लग्रांज की रीति (Lagrange’s Method)

1आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की प्रमुख रीतियों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

 

I, बिन्दुरेखीय रीति (Graphic Method)

आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की यह सरलतम रीति है और सभी प्रकार के समंकों पर लागू होती, है। इस रीति के अनुसार स्वतन्त्र चर मूल्यों जैसे समय बिन्दु, काल या वर्ग सीमाएँ, को ग्राफ पर X-अक्ष पर आश्रित मूल्यों को ग्राफ पर y अक्ष पर प्रदर्शित किया जाता है। समंक श्रेणी की तालिका के अनुसार ग्राफ पर विभिन्न बिन्दु अंकित कर लिए जाते हैं और ग्राफ पर इन बिन्दुओं को मिला देने से एक वक्र (Curve) प्राप्त हो जाता है। X-अक्ष पर जिस समय, काल या वर्ग सीमा के लिए मूल्य का आन्तरगणन करना हो तब उस वक्र की X-अक्ष पर उस समय, या वर्ग सीमा पर एक लम्ब डाला जाता है तथा वक्र पर इस लम्ब पर स्पर्श बिन्दु से Y अक्ष पर लम्ब डाल दिया जाता है। Y-अक्ष पर जिस मूल्य पर यह लम्ब आता है, वही ‘आन्तरगणित मूल्य’ होता है।

बाह्यगणन के लिए वक्र की प्रवृत्ति के अनुसार उसे आगे बढ़ाया जाता है तथा X-अक्ष पर वह बिन्दु लेकर जिसके लिए Y-अक्ष के मूल्य का बाह्यगणन करना है, वक्र पर X-अक्ष पर लम्ब डाला जाता है और फिर Y-अक्ष पर वक्र से लम्ब डाल दिया जाता है। y-अक्ष पर जिस बिन्दु पर यह लम्ब आता है वही ‘बाह्यगणित मूल्य’ होता है।

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II, बीजगणितीय रीतियाँ (Algebraic Methods)

आन्तरगणन एवं बाह्यगणन की प्रमुख बीजगणितीय रीतियों का वर्णन निम्नवत् है—

1, प्रत्यक्ष द्विपद विस्तार रीति (Direct Binomial Expansion Method) – यह रीति द्विपद प्रमेय पर आधारित है। आन्तरगणन एवं बाह्यगणन के लिए इस रीति का प्रयोग तब ही किया जाना चाहिए जबकि निम्नलिखित दो शर्तें पूरी होती हों

(i) समंक श्रेणी के स्वतन्त्र चर (x) के पद बराबर अन्तर से दिए हों; जैसे— 1961, 1971, 1981, 1991, 2001, 2011, 2021 वर्षों में अन्तर समान (10 वर्ष) है।

(ii) इन समान अन्तर वाले पदों में से ही किसी एक के स्वतन्त्र चर का आश्रित चर मूल्य अनुमानित करना हो। उदाहरण के लिए जनगणना समंक 1951, 1961, 1981, 1991, 2001 वर्षों के लिए दिए हुए हों तथा 1971 और 2021 वर्षों के जनगणना समंक अनुमानित करने हों तो प्रत्यक्ष द्विपद विस्तार रीति का प्रयोग किया जाएगा।

गणन क्रिया (Calculation Method) – इस रीति की गणन क्रिया निम्न प्रकार है-

(1) समंक श्रेणी के स्वतन्त्र चर मूल्य के पदों को क्रमानुसार X0, X1, X2 X3,….. आदि संकेताक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार समंक श्रेणी के y के तत्संवादी मूल्यों के लिए Y0, Y1, Y2,Y3,….. आदि संकेताक्षरों का प्रयोग किया जाता है।y के संकेताक्षरों में एक अज्ञात होता है।

(2) y के जितने मूल्य ज्ञात होते हैं उतने क्रम के प्रमुख अन्तर (Leading Difference) को शून्य (0) माना जाता है। उदाहरण के लिए y के चार पद ज्ञात हैं तो चौथा प्रमुख अन्तर शून्य माना जाएगा।

सूत्र का प्रयोग करते समय घातों का प्रयोग उपसंकेत (Subscript) के रूप में करते हैं।

(3) द्विपद विस्तार का उपर्युक्त सामान्य स्वरूप जरा बड़ा और जटिल है अतः निम्नलिखित सरल नियमों द्वारा द्विपद विस्तार को ज्ञात करना चाहिए

(i) जिस प्रमुख अन्तर के लिए द्विपद विस्तार ज्ञात करना हो, पहले उस क्रम के y को लिखा जाएगा, फिर अवरोही क्रम में y की घात एक-एक कम करते जाएँगे जिससे अन्त में yo आ जाए। उदाहरण के लिए यदि y के 5 मूल्य ज्ञात हो तो –

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(ii) प्रथम y धनात्मक होगा, अगला y ऋणात्मक होगा और इसी प्रकार अन्त तक चिह्न जाएँगे; जैसे

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2, न्यूटन की प्रगामी अन्तर विधि (Newton’s Method of Advancing Differences ) – न्यूटन की प्रगामी अन्तर की विधि का प्रयोग उस समय किया जाता है, जब समंक श्रेणी के स्वतन्त्र चर (x) के दिए हुए पदों के अन्तर समान हों, परन्तु जिस पद (x) के लिए आश्रित चर के पद (y1) का आन्तरगणन करना हो वह दिए हुए स्वतन्त्र चर मूल्यों से सर्वथा भिन्न हो अर्थात् वह समान अन्तर वाले x 8 के बाहर का कोई मूल्य हो ।

उदाहरण के लिए यदि किसी नगर की 1931, 1941, 1951, 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 एवं 2011 वर्षों की जनसंख्या ज्ञात हो और 1955 या 1965 वर्ष की जनसंख्या का आन्तरगणन करना हो तो न्यूटन की प्रगामी अन्तर रीति प्रयुक्त की जाएगी।

गणन क्रिया (Calculation Method) – इस रीति की गणन क्रिया निम्नवत् है—

(1) सर्वप्रथम समंक श्रेणी के ज्ञात स्वतन्त्र चर मूल्यों (x) को क्रमशः xo, x1, x2, x3,…. आदि संकेताक्षरों द्वारा और समंक श्रेणी के ज्ञात आश्रित चर मूल्यों (y) को क्रमश: yo, y1, y2, y3,…. आदि संकेताक्षरों द्वारा व्यक्त किया जाता है।

(2) जिस स्वतन्त्र चर पद का आन्तरगणन किया जाना है, उसे xx संकेताक्षर द्वारा व्यक्त किया जाता है।

(3) आन्तरगणन किए जाने वाले आश्रित मूल्य के पद को yx द्वारा व्यक्त किया जाता है।

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(5) अन्तरण सारणी में विभिन्न अन्तर ज्ञात करते समय बीजगणितीय चिह्नों x 8 के समान अन्तरों का अनुपात निकाला जाता है—

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(6) अन्त में न्यूटन का सूत्र अन्तिम प्रमुखान्तर तक इस प्रकार लिखा जाएगा तथा विभिन्न मूल्यों को सूत्र में आदिष्ट करके yx का आन्तरगणन किया जाएगा –

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3, लग्रांज की रीति (Lagrange’s Method) – फ्रांस के प्रसिद्ध सांख्यिक लग्रांज द्वारा प्रतिपादित इस रीति का प्रयोग उस दशा में किया जाता है, जहाँ पर प्रत्यक्ष द्विपद विस्तार रीति या न्यूटन की प्रगामी अन्तर रीति उपयुक्त न हो अर्थात् जिस समंक श्रेणी में स्वतन्त्र चर (x) पदों के मूल्य समान्तर वर्गों में स्थित न हों अर्थात् मूल्यांतर असमान हो ।

गणन क्रिया (Calculation Method) – इस रीति की गणन क्रिया इस प्रकार है –

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आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Association of attributes Numerical Question.

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