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Unit 3 Sampling Large Sample Mcom Notes

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Unit 3 Sampling Large Sample Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit III: Sampling: Large Sample: Test of Hypothesis in Variables and Attributes-Z Test.
Small Samples: Test of Significance in t-test, F-test and Z-test. Sampling Large Sample Notes

 

परिकल्पना परीक्षण (Testing of Hypothesis)

सामान्यतया किसी तथ्य के सम्बन्ध में की गई मान्यता को परिकल्पना कहते हैं जो जाँच करने पर सही सिद्ध हो सकती है या गलत। सांख्यिकीय परिकल्पना किसी समष्टि प्राचल के संख्यात्मक मान के बारे में की गई मान्यता होती है जो सत्य हो सकती है या असत्य तथा जिसको किसी प्रायिकता बंटन की सहायता से यादृच्छिक प्रतिदर्श के आधार पर परीक्षण करके स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है।

सांख्यिकीय परिकल्पना के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं –

(1) एक सिक्का 100 बार उछाला जाता है, वह 60 बार चित (Heads) और 40 बार पट (Tails) गिरता है। इस अभिप्रयोग के आधार पर हम इस परिकल्पना का परीक्षण करना चाहते हैं कि सिक्का सुडौल (unbiased) है।

(2) किसी महाविद्यालय के चयनित 500 विद्यार्थियों की मध्यक ऊँचाई 160 सेमी (प्रतिदर्श) ज्ञात की गई है। इस आधार पर हम इस परिकल्पना की जाँच करना चाहें कि वह प्रतिदर्श विद्यार्थियों की उस समष्टि से लिया गया है जिसमें प्राचल-माध्य 162 सेमी है। (3) किसी कारखाने के दैनिक उत्पादन को बराबर आकार के 7 यादृच्छिक प्रतिदर्शों के आधार पर यह परीक्षण करना कि एक वर्ष में कारखाने के सकल उत्पादन का 5% उत्पाद दोषपूर्ण है।

(4) यह परीक्षण करना कि एक विशिष्ट औषधि को सेवन करने वाले 90% मलेरिया-पीड़ित रोगी स्वस्थ हो जाते हैं या नहीं। (5) विश्वविद्यालय छात्रों के दो बड़े प्रतिदर्शों से माध्य भार X1 व X2 क्रमश: 55 किलोग्राम तथा 58 किलोग्राम ज्ञात किया गया। इस परिकल्पना का परीक्षण करना है कि दोनों माध्यों में (X1 – X2) सार्थक सांख्यिकीय अन्तर नहीं है अर्थात् अन्तर केवल प्रतिचयन उच्चावचन के कारण है।

परिकल्पना परीक्षण की प्रक्रिया (Procedure of Testing Hypothesis) – सांख्यिकीय परीक्षण का अध्ययन आगमनात्मक सांख्यिकी (Inductive Statistics) का प्रमुख विभाग है। सांख्यिकीय अनुमिति (Statistical Inference) में परीक्षण प्रविधि के अनेक वैकल्पिक नाम हैं; जैसे- परिकल्पना परीक्षण, सार्थकता परीक्षण (Tests of significance), निर्णयन प्रक्रिया (decision-making procedure) आदि। सामान्यतया परीक्षण समस्या वह होती है जिसके अन्तर्गत सांख्यिक दो वैकल्पिक क्रियाओं में से एक का विवेकपूर्ण चयन करता है। उदाहरण के लिए एक पदार्थ को खरीदें या न खरीदें, एक उत्पादन प्रक्रिया को बदलें या न बदलें, गुणवत्ता के आधार पर किसी वस्तु को स्वीकार करें या अस्वीकार, एक अधिक महँगी विज्ञापन-वाहिका का प्रयोग करें या न करें, एक नई औषधि को किसी विशिष्ट रोग के उपचार के लिए बाजार में प्रस्तुत करें या नहीं इत्यादि। इस प्रकार की परीक्षण समस्या को सांख्यिकीय विश्लेषण में सर्वप्रथम हम निर्णय प्राचल के अविदित मान की परिकल्पना करते हैं और फिर समष्टि में से यादृच्छिक प्रतिदर्श का चयन करके यह निर्णय करते हैं कि उपयुक्त प्रायिकता बंटन के आधार पर प्रतिदर्श सूचना से हमारी परिकल्पना सत्य सिद्ध होती है या नहीं।

परिकल्पना परीक्षण की सामान्य प्रक्रिया के विशिष्ट चरण (steps) निम्नलिखित है –

1, परिकल्पना का प्रतिपादन (Formulation of Hypothesis) – सर्वप्रथम समष्टि प्राचल के मान के बारे में परिकल्पना प्रस्थापित की जाती है, फिर उस समष्टि से निकाले गए यादृच्छिक प्रतिदर्श के मान-प्रतिदर्शज का परिकल्पित प्राचल (hypothesized parameter) से अन्तर देखा जाता है और प्रमाप त्रुटि का प्रयोग करके यह ज्ञात किया जाता है। कि प्राचल और प्रतिदर्शज का अन्तर अथवा समष्टि में से चुने गए दो प्रतिदर्शों से परिकलित प्रतिदर्शजों का अन्तर सांख्यिकीय दृष्टि से सार्थक (statistically significant) है या वह अन्तर मात्र प्रतिचयन- उच्चावचनों के कारण उत्पन्न हुआ है इसलिए अर्थहीन (not) significant) है।

2, उपयुक्त सार्थकता-स्तर का निर्धारण (Determination of a Suitable Level of Significance) – परिकल्पना प्रतिपादित करने के बाद एक उपयुक्त सार्थकता-स्तर का निर्धारण किया जाता है। सार्थकता-स्तर पर उस विश्वास की मात्रा निर्भर करती है जिसके आधार पर अन्वेषक निराकरणीय परिकल्पना को अस्वीकार या स्वीकार करता है। सार्थकता-स्तर ” (alpha) संकेताक्षर द्वारा निरूपित किया जाता है और परीक्षण के लिए प्रतिदर्श चयन से पूर्व ही निर्धारित कर लिया जाता है। व्यवहार सार्थकता के 5% (a = 0,05) या 1% (a = 001) स्तर का प्रयोग किया जाता है। जब हम 5% सार्थकता स्तर का प्रयोग करते हैं तो इसका यह अर्थ होता है कि हमारे द्वारा सही Ho (जो स्वीकार किया जाना चाहिए) को अस्वीकार करने की प्रायिकता 0,05 या 5% है। दूसरे शब्दों में, हम 95% (100-5) विश्वास्यता के साथ यह कह सकते हैं कि हमारा निर्णय सही है।

3, उपयुक्त परीक्षण प्रतिदर्शज का निर्धारण (Determination of a Suitable Test-statistic) – परीक्षण प्रक्रिया का तीसरा चरण एक उपयुक्त परीक्षण प्रतिदर्शज और उसके प्रायिकता बंटन का निर्धारण करना है। परीक्षण प्रतिदर्शज को क्रान्तिक मान भी कहते हैं जिसका अग्र प्रकार निर्धारण किया जाता है—

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4, क्रान्तिक क्षेत्र का निर्धारण (Determination of the Critical Region) – अगले चरण में प्रतिदर्श समष्टि (sample spa को क्रान्तिक मान के आधार पर दो परस्पर अपवर्जी क्षेत्रों में बाँटा जाता है-स्वीकार क्षेत्र और अस्वीकार क्षेत्र। यदि प्रतिदर्श मान स्वीकार क्षेत्र में पड़ता है तो परिकल्पना स्वीकार कर ली जाती है, परन्तु अस्वीकार क्षेत्र में पड़ने पर Ho अस्वीकृत कर दिया जाता है। विभाजन का आधार सामान्यतया यह होता है कि परिकल्पना के सत्य होने पर इस बात की प्रायिकता कोई निर्दिष्ट संख्या a = 0,05 या 0,01 (सार्थकता-स्तर) होती है जबकि प्रतिदर्श से परिकलित प्रतिदर्शज मानक प्रसामान्य वक्र (standard normal curve) के क्रान्तिक क्षेत्र में होगा।

5, आवश्यक परिकलन कार्य का निष्पादन (Performing the Necessary Computations) – उपर्युक्त चार क्रियाएँ सम्पन्न होने पर परिकल्पना परीक्षण की रूपरेखा तैयार हो जाती है। अगला चरण आकार n के यादृच्छिक प्रतिदर्श से परीक्षण के लिए आवश्यक परिगणना करना होता है। मुख्य रूप से प्रतिदर्शज का मान प्रतिदर्शज की प्रमाप त्रुटि तथा परीक्षण प्रतिदर्शज अर्थात् क्रान्तिक मान का परिकलन किया जाएगा तत्पश्चात् यह देखा जाएगा कि प्रतिदर्शज का मूल्य क्रान्तिक क्षेत्र में पड़ रहा है या स्वीकार क्षेत्र में |

6, निष्कर्ष निकालना तथा निर्णय लेना (Drawing Conclusions and Making Decisions) – अन्त में परीक्षण से सांख्यिकीय निष्कर्ष निकाले जाते हैं जिनके आधार पर प्रबन्ध द्वारा विवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। सांख्यिकीय निर्णय के अनुसार शून्य परिकल्पना (Ho) स्वीकार की जाएगी या अस्वीकार यदि परीक्षण प्रतिदर्शज का परिकलित मान प्रसामान्य वक्र के अस्वीकार क्षेत्र में आता है तो हमारी शून्य परिकल्पना असत्य होती है और उसे अस्वीकार कर दिया जाता है।

परिकल्पना परीक्षण में त्रुटियाँ (Errors in Hypothesis-testing)-  जब किसी सांख्यिकीय परिकल्पना का परीक्षण किया जाता है तो निम्नलिखित चार प्रकार की सम्भावनाएँ होती हैं—

(1) शून्य परिकल्पना (H0) सत्य है, परन्तु परीक्ष्ण उसे अस्वीकार करता है | (प्रथम कोटि की त्रुटी – Type I Error P = α)

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परिकल्पना परीक्षण के सम्भावित परिणाम प्रायिकता सहित (Possible Outcomes of Hypothesis-Testing-with Probability)

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[I] एफ-परीक्षण (F-Test)

कभी-कभी इस तथ्य का परीक्षण करने के लिए कि समग्र के प्रसरण या विचरण मापांक के दो स्वतन्त्र आकलन सार्थक रूप से भिन्न हैं अथवा दोनों प्रतिदर्शज एक ही समष्टि प्रसरण वाले प्रसामान्य समग्र से निकाले गए हैं या नहीं अर्थात् दो प्रसरणों के अन्तर की सार्थकता की जाँच करने के लिए प्रसरण अनुपात परीक्षा का प्रयोग किया जाता है। इस परीक्षण विधि का प्रतिपादन प्रो० आर०ए० फिशर ने किया था इसलिए इस परीक्षण विधि का नाम उनके नाम के अक्षर के आधार पर F परीक्षण रखा गया है।

F-परीक्षण की प्रक्रिया (Procedure of F-Test)

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(3) दोनों प्रतिदर्शों में स्वतन्त्र कोटियों की संख्या ज्ञात की जाएगी। अधिक प्रसरण वाले प्रतिदर्शों में स्वातन्त्र्यांश V1 =n-1 और लघुतर प्रसरण वाले प्रतिदर्श में स्वातन्त्र्यांश V2 = n – 1 होंगे।

(4) F-सारणी में 5% सार्थकता स्तर पर V1 और V2 के लिए मूल्य देख लिया जाएगा। सारणी में बड़े प्रसरण वाले प्रतिदर्श का स्वातन्त्र्यांश बाएँ से दाएँ और छोटे प्रसरण से सम्बन्धित स्वातन्त्र्यांश पहले खाने में देखकर दोनों के संयोग वाली संख्या उपलब्ध की जाएगी।

(5) इसके पश्चात् F, सारणी के मूल्य और F’ के परिगणित मूल्य में तुलना की जाती है। यदि परिगणित मूल्य सारणी मूल्य से कम होता है तो अन्तर अर्थहीन माना जाता है। इसके विपरीत स्थिति में अन्तर सार्थक माना जाता है।

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[II] स्टूडेण्ट्स टी-बंटन (Student’s t-Distribution)

 

छोटे न्यादर्शो की विश्वसनीयता की माप करने के लिए प्रसिद्ध सांख्यिकी सलाहकार विलियम सीली गोस्सेट ने वितरण का विकास किया है।

टी-बंटन पर आधारित सार्थकता परीक्षण (Significance Test based on t-Distribution)

टी-बंटन पर आधारित सार्थकता परीक्षण के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनायी जाती है

1, लघु प्रतिदर्श के माध्य का सार्थकता परीक्षण (Testing the Significance of the Mean of a Small Sample) – एक छोटे प्रतिदर्श के समान्तर माध्य और समग्र के माध्य में अन्तर की सार्थकता की जाँच करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनानी पड़ती है—

(i) यह परिकल्पना की जाती है कि प्रतिदर्श माध्य और समग्र माध्य में कोई अन्तर नहीं है।

(ii) तत्पश्चात् प्राचल प्रमाप विचलन की गणना की जाती है।

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(iii) छोटे न्यादर्श में माध्य की महत्ता की जाँच करने के लिए का मान निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जाता है—

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(iv) d.f. = n – k सूत्र द्वारा स्वातन्त्र्य कोटियों की संख्या निकाल ली जाती है, जो अधिकतर n -1 होती है।

(v) स्वातन्त्र्यः कोटियों की संख्या से सम्बन्धित 5% सार्थकता स्तर पर आधारित 1 प्रतिदर्शन का मूल्य सारणी (t-Table) से देख लिया जाता है।

(vi) यदि का परिगणित मूल्य के सारणी मूल्य से अधिक है तो शून्य परिकल्पना असत्य है और न्यादर्श माध्य का समग्र माध्य से अन्तर सार्थक है। इसके विपरीत, यदि का परिगणित मूल्य सारणी मूल्य से कम है तो अन्तर अर्थहीन है और शून्य परिकल्पना सत्य हैं।

2, दो लघु प्रतिदर्शों के माध्यों के अन्तर का सार्थकता परीक्षण (Testing the Significance of Difference between Two Small Sample Means) – दो छोटे न्यादर्श के माध्यों के अन्तर की सार्थकता की जाँच करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

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[III] फिशर का जेड-बंटन (Fisher’s Z-Distribution)

प्रो० आर०ए० फिशर द्वारा प्रतिपादित इस विधि का प्रयोग अग्रलिखित प्रकार की समस्या के हल के लिए किया जाता है –

(1) यह देखने के लिए कि के अवलोकित मूल्यू का परिकलित मूल्य से अन्तर सार्थक है अथवा नहीं।

(2) यह देखने के लिए कि rj व 72 के बीच पाया जाने वाला अन्तर सार्थक है अथवा नहीं।

जेड-बंटन की प्रक्रिया (Procedure of Z-Distribution)

 

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(4) अन्य में सार्थकता अनुपात की तुलना सुनिश्चित सार्थकता भार (5% या 1%) पर प्राप्त क्रान्तिक मान से की जाती है। यदि परिगणित मान सारणी के मान से कम है तो अन्तर अर्थहीन माना जाता है और यदि परिगणित मान सारणी के मान से अधिक है तो अन्तर सार्थक माना जाता है।

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प्रमाप त्रुटि (Standard Error)

किसी प्रतिदर्शज के प्रतिदर्शी बंटन का प्रमाप विचलन उस प्रतिदर्शज की प्रमाप (मानक) त्रुटि या ‘प्रमाप विभ्रम’ कहलाता है। यदि एक बड़ी समष्टि में से बड़े आकार के अनेक सरल यादृच्छिक प्रतिदर्श चुने जाएँ और उन सभी प्रतिदर्शों के समान्तर माध्यों का आवृत्ति बंटन निर्मित किया जाए तो यह बंटन, माध्य का प्रतिदर्शी बंटन‘ कहलाएगा। उक्त प्रतिदर्शज माध्यों का समान्तर माध्य, मूल समष्टि के समान्तर माध्य के समकक्ष (μ) होगा। इस समष्टि माध्य (प्राचल) से विभिन्न प्रतिदर्शज माध्यों का प्रमाप विचलन, माध्य की मानक त्रुटि या प्रमाप विभ्रम (standard error of the mean) होगा। इसी प्रकार, विभिन्न प्रतिदर्शों के प्रमाप विचलनों के प्रतिदर्शी बंटन का प्रमाप विचलन, प्रमाप विचलन की प्रमाप त्रुटि (standard error of the standard deviation) कहलाएगा। मध्यका, सहसम्बन्ध-गुणांक, सफलता अनुपात आदि की प्रमाप त्रुटियाँ ज्ञात की जा सकती हैं जो सम्बन्धित प्रतिदर्शी-बंटन के प्रमाप-विचलन का निरूपण करती हैं। प्रमाप त्रुटि यह बताती है कि विभिन्न प्रतिदर्शों से ज्ञात प्रतिदर्शजों में परस्पर अन्तर या उनका समष्टि प्राचल से अन्तर संयोग या दैव के कारण (प्रतिचयन उच्चावचन – fluctuations of sampling due to chance) है अथवा किसी अन्य कारण से है। प्रमाप त्रुटि जितनी कम होगी प्रतिदर्शज और प्राचल में उतनी ही निकटता होगी।

प्रमाप विचलन और प्रमाप त्रुटि में प्रमुख अन्तर यह है कि प्रमाप विचलन मूल इकाइयों के समान्तर माध्य के दोनों ओर के विचरण का माप है जबकि प्रमाप त्रुटि समग्र के माप (प्राचल) से विभिन्न प्रतिदर्श मापों (प्रतिदर्शज) के विचरण का माप प्रस्तुत करती है। उदाहरणार्थ- 100 विद्यार्थियों के भार समंकों के समान्तर माध्य से निकाले गए विचलनों के वर्गों के माध्य का वर्गमूल प्रमाप विचलन है जबकि 100- 100 विद्यार्थियों के 50 प्रतिदर्श लेकर उनके 50 प्रतिदर्श माध्य ज्ञात करके इन माध्यों का समग्र माध्य (प्राचल जो कि प्रतिदर्श माध्यों का माध्य है) से निकाला गया प्रमाप विचलन माध्य की प्रमाप त्रुटि है।

प्रमाप त्रुटि के लिए भी σ (सिगमा) संकेताक्षर का ही प्रयोग किया जाता है, परन्तु के बाद सम्बन्धित प्रतिदर्शज का प्रतीक भी लिखा जाता है जैसे माध्य की प्रमाप त्रुटि के लिए σX प्रमाप विचलन की प्रमाप त्रुटि के लिए σσ, सहसम्बन्ध गुणांक के लिए σr, अनुपात की प्रमाप त्रुटि के लिए σp संकेत प्रयुक्त किए जाते हैं।

परिमित समष्टि गुणक (Finite Population Multiplier) – सामान्यतया किसी प्रतिदर्शज की प्रमाप त्रुटि का परिकलन इस मान्यता के आधार पर किया जाता है कि समष्टि जिसमें से प्रतिदर्शों का चयन किया गया है अपरिमित है या उसका प्रतिस्थापन सहित प्रतिचयन (sampling with replacement) किया गया है। व्यवहार में व्यावसायिक जगत में तथा अनेक सर्वेक्षणों या शोधकार्यों में निर्णयकर्त्ता के समक्ष सीमित या सुनिश्चित आकार की परिमित समष्टियाँ (finite populations) होती हैं जिनमें से बिना प्रतिस्थापन के प्रतिदर्शों का चयन (sampling without replacement) किया जाता है। ऐसी स्थितियों में प्रमाप त्रुटि के मूल सूत्र में परिमित समष्टि गुणक (F,P,M,) अर्थात् परिमित समष्टि संशोधन कारक (Finite Population Correction Factor F,P,C,F,) का प्रयोग करके आवश्यक संशोधन कर दिया जाता है।

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इसी प्रकार, अन्य प्रतिदर्शजों की प्रमाप त्रुटि के परिगणन में भी उपयुक्त परिस्थिति में यह परिमित समष्टि गुणक प्रयोग किया जाएगा। यदि प्रतिचयन अनुपात n/N बहुत कम लगभग 0.05 हो तो ये

 

गुणक (F,P,M,) लगभग 1 के बराबर होगा और उसे छोड़कर व्यंजक को सरल किया जा सकता है अर्थात् प्रमाप त्रुटि के मूल सूत्र का ही प्रयोग किया जा सकता है। व्यवहार में यदि प्रश्न में इस सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश न हो तो सूत्र में इस संशोधन गुणक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Sampling Large Sample Numerical Question.

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