Unit 2 Theoretical Frequency Distribution Mcom Notes

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Unit 2 Theoretical Frequency Distribution Mcom Notes

Unit 2 Theoretical Frequency Distribution Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit II: Theoretical Frequency Distribution: Binomial Distribution. Poisson Distribution and Normal Distribution, Their Characteristics and Application. Theoretical Frequency Distribution Notes

Statistical Decision Theory: Decision Environment, Expected Profit Under Uncertainty, Expected Monetary Value, Risk, Decision Tree, Utility Theory.

 

सैद्धान्तिक आवृत्ति बंटन से आशय (Meaning of Theoretical Frequency Distribution)

सैद्धान्तिक आवृत्ति बंटन से आशय ऐसे आवृत्ति बंटनों से है जिन्हें वास्तविक अवलोकनों या प्रयोगों द्वारा प्राप्त न करके कुछ निश्चित कल्पनाओं के आधार पर गणितीय रूप में अनुमोदित किया जाता है। सांख्यिकी में तीन प्रकार के आवृत्ति बंटनों का अधिक प्रयोग किया जाता है—

I, द्विपद बंटन,

II, पॉयसन बंटन, एवं

III, प्रसामान्य बंटन। इन आवृत्ति बंटनों का वर्णन निम्न प्रकार से है

 

I, द्विपद बंटन (Binomial Distribution)

द्विपद बंटन का प्रतिपादन स्विस गणितज्ञ जेम्स बर्नोली ने किया था। इसलिए इस बंटन को ‘बर्नोली बंटन’ के नाम से भी जाना जाता है। द्विपद का अर्थ ऐसे दो पदों से लगाया जाता है जिसमें एक तो घटना की सफलता तथा दूसरा घटना की असफलता से सम्बन्ध रखता हो। द्विपद बंटन को सिक्का उछालने के प्रयोग से आसानी से समझा जा सकता है जैसे यदि एक सुडौल सिक्के को उछाला जाए तो दो परिणाम प्राप्त हो सकते हैं, या तो वह चित गिर सकता है या वह पट गिर सकता है। यदि सिक्के के चित गिरने को सफलता और पट गिरने को असफलता माना जाए और उनके लिए क्रमश: p तथा q संकेत प्रयुक्त किए जाएँ तो प्रायिकता के सिद्धान्त के आधार पर यह कहा जा सकता है

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द्विपद बंटन की विशेषताएँ (Characteristics of Binomial Distribution)

द्विपद बंटन की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

1, सैद्धान्तिक आवृत्ति बंटन (Theoretical Frequency Distribution) – द्विपद बंटन बनली प्रमेय पर आधारित एक सैद्धान्तिक आवृत्ति बंटन है।

2, खण्डित आवृत्ति बंटन (Discrete Frequency Distribution) – यह एक खण्डित आवृत्ति बंटन होता है जिसमें सफलताओं की संख्या 0, 1, 2, 3, n होती है तथा तत्संवादी आवृत्तियाँ बंटन द्वारा परिकलित की जाती हैं।

3, आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygon) – इस बंटन को रेखाचित्र पर आवृत्ति बहुभुज के रूप में दर्शाया जा सकता है।

4, स्वरूप (Form) – द्विपद बंटन का स्वरूप p और q के माप और घातांक 1 के मूल्य पर आधारित होता है।

5, अचर मूल्य (Constants) – द्विपद बंटन में अचर मूल्य भी ज्ञात किए जा सकते हैं;

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6, द्विपद बंटन लिखने के लिए आवश्यक सामग्री (Necessary Material for writing Binomial Distribution) – n, p और q ज्ञात होने पर पूर्ण द्रिपद बटन लिखा जा सकता है |

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II, पॉयसन बंटन (Poisson Distribution)

पॉयसन बंटन का सूत्रपात प्रसिद्ध फ्रांसीसी गणितज्ञ साइमन डेनिस पॉयसन (Simon Denis Poisson) ने किया था इसलिए उनके नाम पर ही इसका नाम ‘पॉयसन बंटन’ रखा गया।

पॉयसन बंटन, द्विपद बंटन की सीमा निर्धारित करता है और इसका प्रयोग उन परिस्थितियों में किया जाता है जहाँ घटना के घटित होने की सम्भावना बहुत ही कम तथा घटना के घटित न होने की सम्भावना q बहुत अधिक हो, घातांक का मान भी काफी अधिक np अर्थात् समान्तर माध्य एक छोटी धनात्मक संख्या हो क्योंकि ऐसी स्थिति में द्विपद बंटन सही स्थिति का निरूपण नहीं कर सकता। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि पॉयसन बंटन उन घटनाओं पर लागू होता है जो असामान्य और दुर्लभ होती हैं और उनके घटने की सम्भावना बहुत कम होती

गणना विधि – पॉयसन बंटन भी एक बंटन है जिसमें 0, 1, 2, 3, सफलताओं की प्रायिकता ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित गणन क्रिया अपनायी जाती है|

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पॉयसन बंटन की विशेषताएँ (Characteristics of Poisson Distribution)

पॉयसन बंटन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1, खण्डित आवृत्ति बंटन (Discrete Frequency Distribution) – द्विपद बंटन की तरह पॉयसन बंटन भी एक खण्डित आवृत्ति बंटन है जिसमें सफलताओं की संख्या 0, 1, 2, 3, आदि पूर्णांकों के रूप में होती है और प्रायिकता पॉयसन प्रमेय द्वारा निकाली जाती है।

2, प्रमुख प्राचल (Main Parameter) – समान्तर माध्य इस बंटन का प्रमुख प्राचल है। और उसका मान ज्ञात होने के पश्चात् पूरा बंटन निकाला जा सकता है।

3, p और q की मात्रा (Quantity of p and q) – यह बंटन उस स्थिति में प्रयुक्त होता है जहाँ घटनाओं के घटने की प्रायिकता p बहुत ही कम होती है और न घटने की प्रायिकता अत्यधिक होती है एवं n भी अधिक होता है।

4, अचर मूल्य (Constants) – पॉयसन वंटन के निम्नलिखित अचर मूल्य है –

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5, स्वरूप (Form) – पॉयसन बंटन असममित (Skewed) होता है और जैसे-जैसे समान्तर माध्य (m) के मूल्य में वृद्धि होती है तो यह बंटन दायीं ओर को प्रवृत्त हो जाता है और विषमता की मात्रा में कमी आती जाती है।

 

III, प्रसामान्य बंटन (Normal Distribution)

प्रसामान्य बंटन का सूत्रपात सर्वप्रथम अब्राहम डी० मायर ने किया। सांख्यिकीय गुणों का व्यावहारिक प्रयोग फ्रांसीसी गणितज्ञ पीयरे एस० लाप्लास (Pierre S, Laplace) और जर्मन खगोलशास्त्री कार्ल गाँस (Karl Gauss) ने ही किया गॉस ने खगोलशास्त्र में अवलोकनों के विभ्रमों का सैद्धान्तिक वितरण द्विपद बंटन में घातांक 11 को अनन्त तक बढ़ाकर प्रसामान्य बंटन के रूप में प्रस्तुत किया। इसके प्रयोग के आधार पर प्रसामान्य बंटन को अब भी ‘गॉसियन वक्र’ (Gaussian Curve) कहा जाता है।

प्रसामान्य वंटन के सम्बन्ध में विद्वान् विलियम सी० मेरिल (William C, Merrill) एवं कार्ल ए० फॉक्स (Karl A, Fox) ने कहा है,—

“यदि एक सांख्यिक को अपने जीवनकाल में केवल एक बंटन का चयन करना हो तो वह निश्चित रूप से प्रसामान्य बंटन का ही चयन करेगा आधुनिक सांख्यिक और व्यावहारिक अर्थशास्त्री शायद विद्युत गुणकों के बिना काम चला सकें, परन्तु प्रसामान्य बंटन के बिना उनका कार्य चलना अत्यधिक कठिन हो जाएगा।”

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प्रसामान्य बंटन की विशेषताएँ (Characteristics of Normal Distribution)

प्रसामान्य बंटन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1, आकृति (Shape) – प्रसामान्य बंटन में दोनों सिरों पर आवृत्तियाँ कम होती हैं और वे केन्द्र की ओर अधिक होती जाती हैं। इस बंटन में वक्र घण्टे के आकार का होता है।

2, सतत चर (Continuous Variables) = प्रसामान्य बंटन सतत या अखण्डित चर मूल्यों का बंटन है, जबकि द्विपद एवं पॉयसन बंटन खण्डित चर मूल्यों का बंटन है।

3, एक बहुलक (Uni-modal) – इस बंटन में वक्र में केवल एक शीर्ष होता है इसलिए यह एक बहुलक वाला वंटन होता है।

4, केन्द्रीय मापों की समानता (Equality of Central Values) – इस बंटन केन्द्रीय प्रवृत्ति के सभी माप- समान्तर माध्य, बहुलक और मध्यका एकसमान होते हैं और वे उच्चतम कोटि अक्ष पर केन्द्रित होते हैं।

5, चतुर्थकों का समान अन्तर (Equidistance of Quartiles) – इस बंटन में प्रथम और तृतीय चतुर्थकों का मध्यका या माध्य से अन्तर होता है अर्थात्

(Q3 – M) = (M – Q1)

6, चतुर्थक विचलन (Quartile Deviation) – इस वंटन में चतुर्थक विचलन या अर्द्ध अन्तर चतुर्थक विस्तार सामान्य विभ्रम के बराबर होता है, जो प्रमाप विचलन का 2/3 भाग होता है अर्थात्

2σ = 3QD

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8, सम्भाव्य विभ्रम और माध्य विचलन (Probable Error and Mean Deviation) – इस बंटन में सम्भाव्य विभ्रम अर्थात् चतुर्थक विचलन का 0.845 गुना या लगभग 5/6 भाग होता है।

9, अनन्तस्पर्शी (Asymptotic) – इस बंटन में वक्र के दोनों सिरे आधार रेखा के निकट आते रहते हैं, परन्तु कभी भी एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते हैं।

10, बंटन के प्राचल (Parameters of Distribution) – इस बंटन में समान्तर माध्य और प्रमाप विचलन हैं जिनकी सहायता से पूरा बंटन तैयार हो जाता है।

11, प्रसामान्य वक्र का क्षेत्र (Area of Normal Curve) – प्रसामान्य वक्र तथा भुजाक्ष के मध्य का क्षेत्र ‘वक्र के अन्तर्गत क्षेत्र’ कहलाता है तथा वह उस क्षेत्र में आवृत्तियों के वितरण की संख्या स्पष्ट करता है।

प्रसामान्य वक्र के अन्तर्गत क्षेत्र का माध्य (Mean) तथा प्रमाप विचलन (Standard Deviation) के आधार पर वितरण निम्नलिखित प्रकार होता है –

(i) Mean ±σ के अन्तर्गत 68.27% आवृत्तियाँ आती है। माध्य के प्रत्येक और 34.135% आवृत्तियाँ होती हैं।

(ii) Mean ±2σ के अन्तर्गत 95.45% आवृत्तियाँ आती हैं। माध्य के प्रत्येक और 47.725% आवृत्तियाँ होती हैं।

(iii) Mean ±3σ के अन्तर्गत 99.73% आवृत्तियाँ आती हैं। माध्य के प्रत्येक ओर 49.865% आवृत्तियाँ होती हैं।

68-27%

 

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12, प्रसामान्य वितरण लिखने के लिए आवश्यक सामग्री (Necessary Materials for writing Normal Distribution) – माध्य (X) तथा प्रमाप विचलन (a) प्रसामान्य वितरण की दो मापों के आधार पर सम्पूर्ण लिखा जा सकता है। पूरे समग्र के माध्य के लिए संकेताक्षर का प्रयोग किया जाता है।

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प्रसामान्य बंटन की उपयोगिता (Utility of Normal Distribution)

आधुनिक सांख्यिकी में प्रसामान्य बंटन का केन्द्रीय स्थान है; यथा –

(1) अनेक क्षेत्रों से समकों के विचरण का स्वरूप बहुत कुछ प्रसामान्य बंटन के अनुरूप होता है। विशेष रूप से प्राकृतिक विज्ञानों, प्राणिशास्त्र, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र तथा आर्थिक व औद्योगिक क्षेत्रों में प्रसामान्य बंटन के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

(2) प्रतिचयन सिद्धान्त के आधार पर सांख्यिकीय निर्वाचन से प्रसामान्य बंटन का सर्वोपरि महत्त्व है।

(3) चर मूल्यों का रूपान्तर करके अनेक असामान्य बंटनों को प्रसामान्य बंटन में परिणत किया जा सकता है।

(4) प्रसामान्य बंटन में अनेक जातीय गुण होते हैं जिनके कारण इनकी महत्ता और भी अधिक हो जाती है।

 

I, निर्णय वृक्ष चित्र (Decision-Tree Diagram)

निर्णय वृक्ष निर्णय प्रक्रिया का चित्रमय प्रदर्शन है। वृक्ष की भाँति इस चित्र में अनेक शाखाएँ होती हैं जो कि बायीं ओर से दायीं ओर फैलती जाती हैं। सर्वप्रथम, एक वर्ग-ग्रन्थि (Square-node) से विभिन्न वैकल्पिक कार्यों की शाखाएँ आरम्भ होती हैं फिर उसी अनुक्रम में वृत्ताकार ग्रन्थियों (Circle-nodes) से घटनाओं की शाखाएँ निकलती हैं जो परिणामों पर जाकर पूरी होती हैं। जटिल और विविध चरणों वाली निर्णय संरचना में घटनाओं से आगे भी द्वितीय चरण वाले कार्यों और घटनाओं की ग्रन्थियाँ और शाखाएँ बढ़ती चली जाती हैं। निर्णय को निम्नांकित सरल निर्णय वृक्ष द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है—

 

सरल निर्णय वृक्ष चित्र (Simple Decision-Tree Diagram)

 

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(II) निर्णय वातावरण (Decision Environment)

निर्णयकर्त्ता को कई बार विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों अथवा वातावरण में निर्णय लेने पड़ते हैं। निर्णय वातावरण मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं जिनमें अलग-अलग मानदण्डों और प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।

1, निश्चितता की स्थिति में निर्णयन (Decision under Certainty) – निर्णय लेने की यह सबसे सरल स्थिति होती है। निश्चितता की स्थिति में किसी एक विशेष कार्यविधि का चयन करके उसका प्रयोग करने से परिणाम निश्चित रूप से ज्ञात हो जाता है। प्रत्येक वैकल्पिक कार्यविधि का एक सुनिश्चित परिणाम होता है और उसका निर्णयकर्त्ता को पूर्ण ज्ञान होता है। इस प्रकार की निश्चयात्मक स्थिति में निणर्यकर्ता निश्चयात्मक प्रतिमान बनाकर उपयुक्त विधि द्वारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन कर लेता है जिससे अनुकूलम उद्देश्य को पूरा किया जा सके। इसमें निर्णय लेने की कई महत्वपूर्ण प्रविधियाँ प्रचलित है। लागत मात्रा लाभ विश्लेषण (Cost) Volume Profit-CUP Analysis) इसके अन्तर्गत विक्रय मात्रा से सम्बद्ध लागत और लाभ की सूचना निश्चयात्मक रूप से उपलब्ध होती है। रेखीय प्रक्रमन प्रविधि (Linear Programming Technique) इसके अन्तर्गत उपलब्ध संसाधनों की मात्रा मशीनों की क्षमता, इकाई की लागत व लाभ रेखीय प्रतिबन्ध विभिन्न उत्पाद मिलों से होने वाले कुल प्रति लाभ आदि निश्चित रूप से ज्ञात हो जाते हैं। इसके अलावा अन्य प्रविधियाँ उपकार्य अनुक्रमन (Job sequencing) आदान-प्रदान विश्लेषण (Input output Analysis), परिवहन एवं आवंटन प्रतिमान (Transport and Assignment Models), समविच्छेद विश्लेषण (Break Even Analysis) निश्चयात्मक स्कन्ध प्रतिमान (Deterministic Inventory Models) आदि से भी निश्चितता निर्णय को ज्ञात किया जा सकता है।

2, जोखिम की स्थिति में निर्णयन (Decision Making under Risk) – जोखिम की स्थिति में प्रत्येक वैकल्पिक कार्यविधि का परिणाम निश्चित होना सम्भव नहीं होता वरन् विभिन्न परिस्थितियों में परिणाम की दीर्घकालिक सापेक्ष आवृत्ति (Long term relative frequency) अर्थात् उसके प्राप्त होने की प्रायिकता ज्ञात होती है। प्राचलः स्थितियों (States of nature) के सम्बन्ध में निर्णयकर्त्ता की सूचना प्रायिकतात्मक (probabilistic) होती है, निश्चयात्मक नहीं। अतः निर्णयकर्त्ता यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि इस विशिष्ट कार्यविधि का चयन करने से क्या परिणाम प्राप्त होता है, वह केवल परिणाम की सम्भावना को बता सकता है। वह पिछले अभिलेखों के आधार पर प्रत्येक प्राचल स्थिति से प्राप्त होने वाले सम्भाव्य परिणाम की प्रायिकता अनुमानित कर सकता है। क्रियाविधि और प्राचल स्थिति के प्रत्येक संयोग के लिए वह प्रतिफल अर्थात् प्रतिलाभ (Pay off) की प्रायिकता से गुणा करके प्रत्याशित प्रतिमूल्य (Expected Pay off value) ज्ञात कर लेता है और उसी क्रियाविधि का चयन करता है जिसका प्रत्याशित प्रतिफल सर्वाधिक हो।

जोखिम के वातावरण में निर्णय लेने के लिए आवश्यक प्रमुख मापदण्ड निम्न प्रकार हैं प्रत्याशित मौद्रिक मूल्य (Expected Monetary Value- EMV), प्रत्याशित अवसर हानि (Expected Opportunity Loss-EOL), पूर्ण सूचना का प्रत्याशित मूल्य (Expected Value of Perfect Information- EVPI), पूर्ण सूचना का प्रत्याशित लाभ (Expected Profit with Perfect Information- EPPI) – वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ प्रायिकता के आधार पर यादृच्छिक प्रक्रमन (Stochastic Programming) तथा बेज़ सिद्धान्त(Baye’s Theorem)

3, अनिश्चितता की स्थिति में निर्णय लेना (Decision-Making under Uncertainty) –  व्यापार में अधिकांश निर्णय अनिश्चितता के वातावरण में लिए जाते हैं। अनिश्चितता की स्थिति में संगठन की नीति और निर्णयकर्त्ता के अभिमत के आधार पर निर्धारित अनेक मानदण्डों के अनुसार अनुकूलतम विकल्प का चयन किया जाता है। अनिश्चितता की स्थिति में निर्णय लेने के लिए कुछ प्रमुख निर्णय मानदण्ड इस प्रकार हैं—निराशावादी दृष्टिकोण के आधार पर अधि-न्यून प्रतिलाभ मानदण्ड (Maximin Criterion) – आशावादी दृष्टिकोण के आधार पर अधिकाधिक प्रतिलाभ मानदण्ड (Maximax Criterion), न्यूनाधिक खेद मानदण्ड (Minimax Regret Criterion) निराशावाद तथा आशावाद के चरम परिणामों को सन्तुलित करने वाला हरविज मानदण्ड (Hurwicz Criterion) तथा समान सम्भाविता या अपर्याप्त कारण के नियम पर आधारित लाप्लास मानदण्ड (Laplace Criterion) आदि।

4, संघर्ष या प्रतियोगिता की स्थिति के निर्णयन (Decision-makings under Conflict or Competitive Situation) – वर्तमान व्यवसाय में संघर्ष या प्रतियोगिता की स्थिति में भी कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। दो या दो से अधिक प्रतिद्वन्द्वियों के मध्य प्रतिस्पर्धा की स्थिति क्रीड़ा सिद्धान्त (Game Theory) के प्रयोग द्वारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन किया जाता है। सामूहिक सौदेबाजी अथवा नेताओं और प्रबन्ध तन्त्र रेखीय महत्त्वपूर्ण विषयों पर निर्णय, विज्ञापन एवं विक्रय-संवर्धन निर्णय आदि क्रीड़ा सिद्धान्त प्रतिभागों की सहायता से सम्पन्न किए जाते हैं। क्रीड़ा सिद्धान्त के अन्तर्गत व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की स्थितियों में प्रतियोगी (खिलाड़ी) तर्कपूर्ण प्रक्रियाओं और परिमाणात्मक प्रविधियों का प्रयोग करके विजय प्राप्त करने की अनुकूलतम रणनीति निर्धारित करते हैं।

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सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त का अर्थ एवं क्षेत्र (Meaning and Scope of Statistical Decision Theory)

सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त उन सांख्यिकीय प्रविधियों का समूह है जिनके प्रयोग के द्वारा निर्णयकर्त्ता अज्ञात परिणामों वाले अनेक उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का विवेकपूर्ण चयन करता है। सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त एक ऐसी संरचना को व्याख्या करता है जिसके अन्तर्गत यह स्पष्ट किया जाता है कि विशिष्ट विकल्प का चयन कैसे और क्यों किया जाता है। जोसेफ बान मात्रे एवं ग्लैन गिलबंध के शब्दों में –

“सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त अनेक विकल्पों में से अनुकूलतम क्रियाविधि के चयन से सम्बन्धित है, जबकि प्रत्येक क्रिया से सम्बद्ध परिणाम अनिश्चित होता है।” सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त सन् 1763 ई० में प्रकाशित बेज़ की प्रमेय (Baye’s Theory) पर आधारित है, अत: इसे बेज़ का निर्णय सिद्धान्त (Bayesian Decision Theory) भी कहा जाता है। सन् 1960 ई० वाले दशक में बेज़ के प्रायिकता प्रमेय के प्रयोग से ही सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त का तीव्र विकास हुआ। आज व्यावसायिक प्रबन्ध के प्रत्येक क्षेत्र में अनिश्चितता की स्थिति में प्रयुक्त निर्णय की प्रक्रिया में इस सिद्धान्त का सर्वाधिक प्रयोग होता है। निर्णय सिद्धान्त का क्षेत्र भी व्यापक हो गया है। सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त की मूल संरचना और उसके अनुप्रयोगों तथा जोखिम व अनिश्चितता की स्थिति में प्रयुक्त निर्णय मानदण्डों का ही सरल विवेचन किया जाता है।

 

सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त की उपयोगिता (Utility of Statistical Decision Theory)

परिकल्पना परीक्षण की परम्परागत प्रविधि की तुलना में सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त अधिक उपयोगी और श्रेष्ठ है। इस सिद्धान्त की मुख्य उपयोगिताएँ निम्न प्रकार हैं –

(1) जोखिम और अनिश्चितता के वातावरण में अनुकूलतम निर्णय लेने की यह सर्वश्रेष्ठ प्रविधि है। दोनों स्थितियों में जबकि सम्भाव्य परिणामों की प्रक्रिया ज्ञात हो और पूर्ण अनिश्चितता हो और प्रायिकता ज्ञात न हो- विभिन्न निर्णय मापदण्ड अपनाकर अनुकूलतम निर्णय लिए जाते हैं।

(2) यह सिद्धान्त प्राचल की विभिन्न और बहुगुणी स्थितियों में निर्णय लेने का एक आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करता है। निर्णय सिद्धान्त का प्रायिकतात्मक प्रतिमान अधिक प्रभावी है।

(3) इस सिद्धान्त के अन्तर्गत गलत निर्णय के आर्थिक दुष्परिणामों का निर्णय प्रतिमान में प्रत्यक्ष रूप से समाविष्ट होता है।

(4) निर्णय सिद्धान्त में समस्या से सम्बन्धित किसी प्रतिचयन या प्रयोग परीक्षण से पूर्व उपलब्ध सूचना का उपयोग किया जाता है, चाहे वह सूचना प्रयोगजन्य समंकों के रूप में प्रस्तुत हो या निर्णयकर्त्ता के व्यक्तिनिष्ठ मूल्यांकन के रूप में उपलब्ध हो ।

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सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त की परिसीमाएँ (Limitations of Statistical Decision Theory)

सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त की कुछ परिसीमाएँ भी हैं, निर्णय लेते समय निर्णयकर्त्ता को इन परिसीमाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए।

सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त की निम्नलिखित प्रमुख परिसीमाएँ हैं –

1, सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त के अनुसार लिए गए निर्णय औसत रूप में ही सही होते हैं (Decisions under Statistical Decision Theory are Accurate only on the Average) – निर्णयकर्त्ता का उद्देश्य भविष्य के निर्णयों की दीर्घकालिक और औसत परिशुद्धता उपलब्ध करना नहीं होता वरन् उसका लक्ष्य यह होता है कि एक बार लिया जाने वाला अनावर्तक निर्णय (One time non-repetitive decision) भी पूर्णरूप से सही उतरे जिससे अनुकूलतम कार्य करने में उसके व्यवसाय को कोई क्षति न पहुँचे।

2, प्रत्याशित मौद्रिक मूल्य मानदण्ड की सीमित उपयोगिता (Limited Utility of EMV Criterion) – सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त के अधीन सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला प्रत्याशित मौद्रिक मूल्य मानदण्ड उन स्थितियों में उपयोगी होता है जिन स्थितियों में सम्भावित हानियाँ अत्यधिक नहीं होती और सम्भावित लाभ-क्षेत्र सीमित होता है। अत्यधिक हानि की सम्भावना वाली निर्णय स्थितियों में यह मानदण्ड उपयुक्त नहीं होता।

3, प्रत्याशित मौद्रिक प्रतिफल निर्णय का एकमात्र मानदण्ड नहीं है (Expected Monetary Payoff is not the Sole Criterion of Decision-making) – अनके निर्णय स्थितियों में प्रत्याशित मौद्रिक प्रतिफल निर्णय लेने का सर्वमान्य मानदण्ड नहीं होता। व्यवसाय में कई बार उपभोक्ता सन्तुष्टि, संगठन का स्थायित्व, सामाजिक दायित्व का निर्वहन इत्यादि अमौद्रिक घटक मौद्रिक प्रतिफल से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं और निर्णयकर्ता विवेकपूर्ण निर्णय लेने में इन उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहता है।

कुछ निर्णय स्थितियों में मौद्रिक प्रतिफल के स्थान पर उपयोगिता (Utility) की अवधारणा का प्रयोग किया जाता है। समय, परिस्थितियों और निर्णयकर्त्ता की व्यक्तिगत विचारधाराओं के अनुसार विभिन्न मानकों के आधार पर उपयोगिता का मापन किया जाता है।

4, प्रत्येक निर्णय स्थिति को मौद्रिक प्रतिलाभ के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता (Every Decision-situation cannot be expressed in terms of Monetary Pay-offs) – कुछ तथ्यों एवं घटनाओं के बारे में पर्याप्त सूचना उपलब्ध नहीं की जा सकती, कुछ घटना कार्य संयोगों को मौद्रिक प्रतिलाभों के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता है तथा कुछ घटकों को संख्यात्मक रूप नहीं दिया जा सकता। इन परिस्थितियों में सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त का प्रयोग उपयुक्त नहीं होता।

5, अनावर्तक प्रकार के निर्णयों के लिए अनुपयुक्त (Unsuitable for Non repetitive Decisions) – सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त अनावर्तक और असांख्यिकीय घटनाओं के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए उपयुक्त नहीं है। आवर्तक और सांख्यिकीय घटनाओं की प्रायिकता सापेक्ष आवृत्ति के आधार पर अनुमानित की जा सकती है, परन्तु अनावर्तक और असांख्यिकीय घटनाओं की प्रायिकता का आकलन नहीं किया जा सकता, अतः अनावर्तक प्रकार के निर्णयों के लिए सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त उपयुक्त नहीं होता।

6, उत्तरवर्ती प्रायिकता निर्धारण की जटिलता (Complexity in Assigning Posterior Probabilities) – प्राचल-स्थितियों की प्रायिकता के सम्बन्ध में तीन प्रकार के विश्लेषण किए जाते हैं—– (i) पूर्ववर्ती विश्लेषण (Prior Analysis) जिसमें पूर्व प्रायिकता अनुमानित की जाती है, (ii) पूर्व-उत्तरवर्ती विश्लेषण (Pre-posterior analysis) जिसके द्वारा पूर्व सूचना का प्रत्याशित मूल्य (EVPI) ज्ञात करके यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि प्राचल-स्थितियों के बारे में सर्वेक्षण आदि के द्वारा अतिरिक्त सूचना एकत्र करना उपयोगी और वांछनीय रहेगा या नहीं, (iii) उत्तरवर्ती विश्लेषण (Posterior analysis) जिसके अनुसार, प्राचल स्थितियों के बारे में अतिरिक्त सूचना एकत्र करके उसे पूर्व सूचना के साथ प्रयोग किया जाता है और प्रतिबन्धित प्रायिकताओं की सहायता से संयुक्त एवं सीमान्त प्रायिकताओं पर परिकलन करके उत्तरवर्ती प्रायिकताएँ ज्ञात की जाती हैं।

7, पूर्व प्रायिकता के निर्धारण की दुविधा (Ambiguity in the Determination of Prior Probabilities) – प्रायिकता घटना की सापेक्ष आवृत्ति (relative frequency) के आधार पर निर्धारित की जाती है तो विश्वसनीय अनुमान ज्ञात करने हेतु पर्याप्त सूचना उपलब्ध होनी चाहिए। इसके विपरीत घटनाओं के सम्बन्ध में निर्णयकर्त्ता के व्यक्तिगत ज्ञान, अनुभव व अवलोकन के आधार पर व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) पूर्व प्रायिकताएँ अनुमानित की जा सकती हैं।

व्यवहार में सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त का प्रयोग करते समय निर्णयकर्त्ता को उपर्युक्त प्रमुख परिसीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। वस्तुतः आधुनिक सांख्यिकी में, सांख्यिकीय निर्णय सिद्धान्त अनिश्चितता के वातावरण में विवेकपूर्ण निर्णय लेने में निर्णयकर्त्ता को महत्त्वपूर्ण निर्णय मानदण्ड प्रदान करता है जिनके प्रयोग द्वारा व्यवसाय में पूर्व निर्दिष्ट लक्ष्य सफलतापूर्वक प्राप्त किए जा सकते हैं।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Theoretical Frequency Distribution Numerical Question.

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