Unit 1 Probability Theory Mcom Notes

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Unit 1 Probability Theory Mcom Notes:-  In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit I: Probability Theory: Classical, Relative and Subjective Probability. Addition and Multiplication Rules, Conditional Probability. Baye’s Theorem, Bernoulli’s Theorem and Mathematical Expectation. [ Probability Theory Mcom Notes ]

 

प्रायिकता की परिभाषा एवं अवधारणाएँ (Definitions and Concepts of Probability)

सांख्यिकी में प्रायिकता की धारणा का विशेष महत्त्व है, परन्तु उसे सन्तोषजनक रूप में परिभाषित करना सरल कार्य नहीं है। सरल रूप में प्रायिकता की निम्न प्रकार व्याख्या की जा सकती है –

“समान ढंगों से घटित होने वाली अनेक घटनाओं में से किसी एक के घटने की प्रायिकता उस घटना की अनुकूल परिस्थितियों की संख्या का समस्त सम्भाव्य परिस्थितियों की संख्या से अनुपात है।”

प्रायिकता एक अनुपात है जिसे भिन्न या दशमलव के रूप में व्यक्त किया जाता है, 0 और 1 प्रायिकता की चरम सीमाएँ हैं। एक असम्भव ( impossible) घटना की प्रायिकता शून्य (0) है क्योंकि इसके घटने की अनुकूल परिस्थिति कोई नहीं होती जबकि पूर्णतया सुनिश्चित (certain) घटना की प्रायिकता 1 है क्योंकि ‘सभी सम्भाव्य परिस्थितियाँ’ इसके घटित होने के अनुकूल हैं। प्रायिकता का परिकलन उसकी अवधारणा के निर्वाचन पर निर्भर करता है। वस्तुतः प्रायिकता की विभिन्न विचारधाराओं के सम्बन्ध में विशेषज्ञों में गहन मतभेद हैं। विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर प्रायिकता की निम्नलिखित चार विचारधाराएँ (schools of thought) प्रचलित हैं –

(1) प्रायिकता की चिरप्रतिष्ठित अवधारणा अथवा गणितीय या पूर्ववर्ती प्रायिकता (Classical Approach to Probability or Mathematical or A Prior Probability)

(2) प्रायिकता की सापेक्ष आवृत्ति अवधारणा अथवा आनुभविक या सांख्यिकीय प्रायिकता (Relative Frequency Approach or Empirical or Statistical Probability)

(3) प्रायिकता की व्यक्तिनिष्ठ अवधारणा (Subjective or Personalistic Approach to Probability)

(4) प्रायिकता की अभिगृहीतीय अवधारणा अथवा आधुनिक दृष्टिकोण (Axiomatic: Approach or Modern Approach to Probability)

प्रायिकता की चिरप्रतिष्ठित अवधारणा अथवा गणितीय या पूर्ववर्ती प्रायिकताm(Classical Approach to Probability or Mathematical or A Prior Probability) प्रायिकता की चिरप्रतिष्ठित अवधारणा सबसे प्राचीन और सरलतम अवधारणा है। इस विचारधारा के प्रणेता लाप्लास (Laplace) के अनुसार, “अनुकूल घटनाओं की संख्या का समान रूप से सम्भावित समस्त घटनाओं की कुल संख्या से अनुपात ही प्रायिकता है।”

इस सिद्धान्त के अनुसार यह मान्यता है कि किसी प्रयोग द्वारा प्राप्त सभी परिणाम परस्पर अपवर्जी (mutually exclusive) हैं तथा समान रूप से घटित होने वाले अथवा समसम्भावी (equally likely) हैं। उदाहरण के लिए यदि एक सिक्का उछाला जाए तो वह चित (Head) गिरेगा या पट (Tail), ये दोनों परिणाम परस्पर अपवर्जी हैं अर्थात् दोनों एक साथ नहीं आ सकते। साथ ही दोनों—चित या पट-गिरने की समान सम्भावना है। चित गिरने की प्रायिकता ½ है और इसी प्रकार पट गिरने की प्रायिकता भी 1/2 है। एक छह पहलुओं वाले पासे (six-faced dice) के फेंके जाने पर 6 सम्भावनाएँ हो सकती हैं-1, 2, 3, 4, 5 या 6 बिन्दु वाले पहलू का ऊपर की ओर आना। 5 बिन्दुओं वाले पक्ष के ऊपर आने की प्रायिकता 1/6 है, विषम अंक वाले पहलू के ऊपर आने की प्रायिकता 3/6 = 1/2 है। इसी प्रकार ताश के 52 पत्तों की गड्डी में से यदि यादृच्छया एक पत्ता निकाला जाए तो उसके ‘पान का इक्का’ निकलने की प्रायिकता 1/52 है, ‘कोई भी इक्का’ होने की सम्भाविता 4/50 = 1/13 है क्योंकि इक्कों की संख्या 4 होती है। हुकुम का कोई भी पत्ता निकलने की प्रायिकता 13/52 = ¼ है |

व्याख्या (Explanation) चिरप्रतिष्ठित अथवा गणितीय अवधारणा के अनुसार प्रायिकता की व्याख्या निम्न प्रकार की जा सकती है

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घटना के घटित होने की स्थिति ‘सफलता’ या ‘सफल दृश्य परिणाम’ (Success or successful outcome) कहलाती है और उसे संकेताक्षर p या P (A) द्वारा निरूपित किया जाता है। घटना के न घटने को असफलता या असफल दृश्य परिणाम (failure or unsuccessful outcome) कहा जाता है और उसके लिए संकेताक्षर q या P (A) प्रयोग किया जाता है।

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प्रक्रिया (Mechanism) – प्रायिकता परिकलन की प्रक्रिया के निम्नलिखित चरण (steps) हैं—

(1) अभिप्रयोग के सभी सम्भाव्य दृश्य परिणामों की सम्पूर्ण संख्या ‘N’ या m +n की गणना कीजिए। ये सभी परिणाम सम्पूर्ण (exhaustive), परस्पर अपवर्जी (mutually exclusive) और समसम्भाव्य (equally likely) होने चाहिए।

(2) जिस घटना के घटित होने की प्रायिकता ज्ञात करनी हो, उसके अनुकूल परिस्थितियों की संख्या ‘m’ ज्ञात कीजिए।

(3) m को ‘Nm +n’ से भाग कीजिए। यही अभीष्ट प्रायिकता है। (4) प्रायिकता का माप सदा 0 और 1 की सीमाओं में होता है –

0 ≤ P (A) ≤ 1

यदि P (A) या p= 0 तो घटना का घटित होना असम्भव है तथा यदि P (A) या p = 1 तो घटना का होना सुनिश्चित है।

 

उदाहरण संयोगप्रधान खेलों में वास्तव में सिक्का उछालने, पासा फेंकने, बाजी लगाने या ताश का पत्ता निकालने की कोई आवश्यकता नहीं होती। अभिप्रयोग किए बिना तर्क द्वारा पहले ही प्रायिकता निर्धारित कर ली जाती है, अतः इस अवधारणा के अन्तर्गत ज्ञात प्रायिकता को पूर्व प्रायिकता (a prior probability) भी कहते हैं। इसके लिए प्रायोगिक समंकों या व्यक्तिगत अनुभव की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि उक्त अवधारणा संयोगप्रधान खेलों पर लागू होती है।

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योग प्रमेय (Addition Theorem)

यदि दो घटनाएँ परस्पर अपवर्जी हों, और एक घटना के घटित होने की प्रायिकता P (A) तथा दूसरी घटना के घटित होने की प्रायिकता P (B) हो तो दोनों में से किसी एक घटना A या B के घटने की प्रायिकता P (A) + P (B) होगी। इस प्रकार दो या दो से अधिक परस्पर अपवर्जी घटनाओं में से किसी एक घटना (A या B) के घटने की प्रायिकता उन घटनाओं की अलग-अलग व्यक्तिगत प्रायिकताओं का जोड़ है। यह नियम योग प्रमेय कहलाता है।

इसे पूर्ण या कुल प्रायिकता का प्रमेय (Theorem of Total Probability) भी कहते हैं।

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योग प्रमेय की परिसीमाएँ (Limitations of Addition Theorem)

योग प्रमेय तभी लागू होगी जब निम्नलिखित शर्तें पूरी हों –

(1) घटनाएँ परस्पर अपवर्जी हों, और

(2) वे एक ही समुच्चय (set) से सम्बन्धित हों। वॉन माइजेज ने दूसरी शर्त का एक रोचक उदाहरण दिया है। मान लीजिए किसी व्यक्ति के 40वें और 41वें जन्मदिन के बीच मरने की सम्भावना 0-011 है और उसी व्यक्ति के 40वें और 42वें जन्मदिन के बीच विवाह करने की प्रायिकता 0,009 है। दोनों घटनाएँ परस्पर अपवर्जी हैं, परन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि उस व्यक्ति के 40वें वर्ष में मरने या 41वें वर्ष में विवाह कर लेने की प्रायिकता 0011+0-009= 0,020 है। ये दोनों घटनाएँ, एक समूह (set) से सम्बद्ध नहीं हैं। 40वें वर्ष में मरने और 41वें वर्ष में विवाह करने की घटनाओं में परस्पर विरोधाभास है।

योग प्रमेय का संशोधित रूप- जब घटनाएँ परस्पर अपवर्जी न हों (Modified form of Addition Theorem: when events are not mutually exclusive) जब दो घटनाओं– A व B में से या तो A या B या दोनों (Either A or B or both) घट सकती हैं तो वे पूर्ण रूप से परस्पर अपवर्जी नहीं कहलातीं। ऐसी स्थिति में योग प्रमेय संशोधित रूप में प्रयोग किया जाएगा। दोनों घटनाओं के सर्वनिष्ठ अंश (Partially overlapped set or intersection) को प्रायिकताओं के योग में से घटा दिया जाएगा।

घटनाओं के अपवर्जी न होने पर –

 

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दो से अधिक ऐसी घटनाओं में भी योग-प्रमेय का संशोधित रूप लागू होता है, जो परस्पर अपवर्जी न हों। तीन ऐसी घटनाओं के लिए अग्रलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाएगा

 

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गुणन प्रमेय (Multiplication Theorem)

जहाँ सभी प्रदत्त स्वतन्त्र घटनाओं के एक साथ घटने की प्रायिकता ज्ञात करनी हो वहाँ प्रायिकता के गुणन प्रमेय का प्रयोग किया जाता है। गुणन प्रमेय के अनुसार दो या दो से अधिक स्वतन्त्र घटनाओं के एक साथ घटने की प्रायिकता उनके अलग-अलग घटित होने की व्यक्तिगत प्रायिकताओं का गुणनफल है। यही प्रायिकता का गुणन प्रमेय या मिश्र प्रायिकता का प्रमेय (Theorem of compound probability) कहलाता है। यदि A और B दो स्वतन्त्र घटनाएँ हैं तो उनके एक साथ घटने की प्रायिकता निम्नलिखित सूत्रानुसार निकलेगी –

 

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प्रायिकता का महत्त्व (Importance of Probability)

सांख्यिकीय आगमन और प्रतिचयन के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष प्रायिकता के रूप मे व्यक्त किए जाते हैं, निश्चितता के रूप में नहीं। संयोग पर आधारित क्रीड़ाओं (games of chance), प्राकृतिक व भौतिक विज्ञानों, अर्थशास्त्र, व्यवसाय प्रबन्धन, बीमा व्यवसाय आदि से सम्बद्ध विभिन्न निर्णय प्रायिकता सिद्धान्त के आधार पर ही लिए जाते हैं। कैनेकीपिंग के शब्दों में – “प्रायिकता सिद्धान्त आधुनिक गणित की अत्यन्त रोचक शाखाओं में से एक है और ज्ञान के अनेक क्षेत्रों में अनुप्रयोगों के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह केवल बीमा सिद्धान्त व सांख्यिकी में ही नहीं अपितु प्राणिशास्त्र और भौतिक विज्ञानों की अनेक शाखाओं में आधारभूत महत्त्व रखता है।” क्रॉक्सटन एवं काउडेन के अनुसार, “प्रायिकतात्मक तर्क का प्रयोग जुआ, बीमा, सैद्धान्तिक भौतिकी, प्राणिशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा ऐसे ही अनेक क्षेत्रों में किया जाता है।”

आजकल प्रायिकता सिद्धान्त की उपयोगिता जुआरियों, ताश खेलने वालों, पासा फेंकने वालों व सटोरियों तक ही सीमित नहीं है। एमाइल बोरेल के अनुसार, “प्रायिकता सिद्धान्त केवल अपने जन्मदाताओं-ताश खेलने वालों व पासा फेंकने वालों के लिए ही रुचि का विषय नहीं रहा है, अपितु उन सभी कार्यशील व्यक्तियों, उद्योग के अध्यक्षों अथवा सेनाध्यक्षों के लिए महत्त्वपूर्ण है जिनकी सफलता उचित निर्णयों पर आश्रित होती है।”

सशर्त प्रायिकता (Conditional Probability)

अनेक परिस्थितियों में एक घटना के एक परीक्षण (trial) में घटने या न घटने का उसके भावी परीक्षणों में घटित होने की प्रायिकता पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार की घटनाएँ ‘आश्रित घटनाएँ’ (dependent events) कहलाती हैं। सामान्यतः इस बात की सम्भावना कि एक बार एक घटना घटित होने पर दूसरी घटना घटेगी, ‘सप्रतिबन्ध प्रायिकता’ कहलाती है। ताश की गड्डी में से एक पत्ता निकालने के बाद यदि उसे उसमें पुनः वापस न रखा जाए तो दूसरी बार लाल रंग के पत्ते के निकल आने की प्रायिकता पहली बार के परिणाम पर निर्भर होगी। यदि पहली बार लाल रंग का पत्ता निकलता है और उसे वापस गड्डी में नहीं रखा जाता तो दूसरी बार लाल रंग के पत्ते के निकलने की प्रायिकता 25/51 होगी। यदि पहली बार काला पत्ता निकलता है और उसे वापस नहीं रखा जाता तो दूसरी बार लाल रंग के पत्ते के निकलने की प्रायिकता 26/51 होगी, अतः दोनों स्थितियों में दूसरी बार की घटना पूरी तरह पहली बार के परिणाम पर आश्रित है। दो आश्रित घटनाओं की संयुक्त प्रायिकता भी गुणन प्रमेय के संशोधित रूप द्वारा ज्ञात की जा सकती है। यदि A और B दो आश्रित घटनाएँ हों तो उनके एक साथ घटने की प्रायिकता पहली घटना के होने की प्रायिकता और दूसरी घटना के उस स्थिति में होने की प्रायिकता जबकि पहली हो चुकी है- इन दोनों का गुणनफल है।

P (A तथा B) = P (A) x P (B/A)

P (AB) = P (B) x P (A/B)

जहाँ P (B/A), B की सप्रतिबन्ध प्रायिकता है अर्थात् B की उस स्थिति की प्रायिकता है जिनमें A पहले ही घटित हो चुकी है और P (A/B), A की सप्रतिबन्ध प्रायिकता है जिनमें B घटना पहले ही घट चुकी है।

 

(अ) गणितीय प्रत्याशा (Mathematical Expectation)

सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यावहारिक जीवन में किसी भी कार्य को करने अथवा न करने का निर्णय लेते समय उससे होने वाले मौद्रिक लाभ या हानि का अनुमान अवश्य लगाता है। यदि किसी घटना के घटित होने पर किसी व्यक्ति को एक निश्चित धनराशि प्राप्त होती है तो उस घटना की सम्भावना एवं सफलता (p) की स्थिति में प्राप्त होने वाली धनराशि का गुणनफल, उस व्यक्ति के लिए ‘गणितीय प्रत्याशा’ कहलाएगा।

गणितीय प्रत्याशा से अभिप्राय उस प्रतिफल से है जो किसी व्यक्ति को सफलता की सम्भावना में पुरस्कार की कुल धनराशि से गुणा करने पर प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यापारिक जोखिम या सट्टेबाजी (शर्त आदि लगाना) या खेल आदि में किसी घटना विशेष के घटित होने की प्रायिकता p है तथा उस घटना के होने पर किसी व्यक्ति विशेष को m रुपये मिलते हों या देने पड़ते हों तो उस व्यक्ति को मिलने वाली धनराशि का प्रत्याशित मूल्य mp रुपये होगा। यह प्रत्याशित मूल्य ही उस व्यक्ति की गणितीय प्रत्याशा कही जाती है।

सूत्र के रूप में,

गणितीय प्रत्याशा = E (X) = pm

जहाँ p= घटना घटित होने की प्रायिकता तथा m= घटना के घटित होने पर मिलने वाली धनराशि |

यदि किसी व्यक्ति विशेष को एक से अधिक घटनाओं के होने पर निश्चित धनराशि प्राप्त होती है तो

गणितीय प्रत्याशा या प्रत्याशित मूल्य

= E (X) = pm1 + p2m2 +…………..Pxmx

जहाँ P1, P2…………. Px, x घटनाओं की प्रायिकताएँ हैं तथा m, m2 ……. mx ‘उनके संगत प्राप्त होने वाली धनराशियाँ हैं।

उदाहरण के लिए यदि एक सिक्का उछालने पर चित आने की प्रायिकता ½ है एवं चित आने पर 50 रुपये प्राप्त होते हैं तो चित आने का प्रत्याशित मूल्य ½ x 50 = 25 रुपये होगा। 1/2 इसके विपरीत यदि सिक्का उछालने पर पट आने की प्रायिकता ½ है एवं पट आने पर 25 रुपये दिए जाएँ तो पट आने का प्रत्याशित मूल्य ½  X 25 = 12.50 रुपये होगा। इस प्रकार चित एवं पट दोनों का कुल प्रत्याशित मूल्य 25 + 12.50 = 37.50 रुपये होगा।

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(ब) बर्नोली प्रमेय (Bernoulli Theorem)

प्रायिकता परिकलन की इस प्रमेय का प्रतिपादन प्रसिद्ध सांख्यिक जेम्स बर्नोली ने किया था, उन्हीं के नाम पर इसे बर्नोली प्रमेय कहा जाता है। उनके अनुसार, यदि किसी एक घटना के अभिप्रयोग (परीक्षण) में घटित होने की प्रायिकता ज्ञात हो तो इस प्रमेय के माध्यम से यह गणना की जा सकती है कि परीक्षणों में उस घटना के निश्चित रूप से बार घटित होने की प्रायिकता कितनी है।

जेम्स बनली द्वारा प्रायिकता परिकलन हेतु प्रयुक्त सूत्र निम्नलिखित है

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(1) प्रत्येक घटना के सम्बन्ध में सफलता एवं असफलता केवल दो ही परस्पर अपवर्जी विकल्प हैं। यदि किसी कारणवश अधिक विकल्प हों तो भी उन्हें दो विकल्पों के रूप में हो व्यक्त करना होता है। उदाहरणार्थ, एक सिक्का उछालने पर चित आएगा या पट एक पासा फेंकने पर 1, 2, 3, 4, 5, 6 में से कोई भी आ सकता है। ऐसी स्थिति में यदि यह माना जाए कि 6 आने पर सफलता है एवं 1, 2, 3, 4, 5 में से कुछ भी आए तो वह असफलता है – यह प्रायिकता को दो विकल्पों में व्यक्त करना कहलाएगा।

 

(2) एक परीक्षण कई बार किया जा सकता है एवं प्रत्येक परीक्षण का परिणाम स्वतन्त्र होगा। उदाहरणार्थ, यदि एक सिक्का 100 बार उछाला जाए तो 100वीं बार सिक्का उछालने की प्रायिकता 99 बार सिक्का उछालने के परिणाम से अप्रभावित रहेगी।

 

(स) बेज़ प्रमेय – प्रतिलोम प्रायिकता (Bayes’ Theorem: Inverse Probability)

सामान्यतः किसी घटना के घटित होने से पूर्व ही उस घटना के घटित होने या घटित न होने ,की प्रायिकता ज्ञात की जाती है, परन्तु प्रतिलोम प्रायिकता में घटना घटित होने के पश्चात् उस घटना के घटित होने के कारण की प्रायिकता ज्ञात की जाती है। बेज़ प्रमेय या प्रतिलोम प्रायिकता को एक उदाहरण की सहायता से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। मान लो एक थैले में 4 काली व 2 सफेद गेंद हैं तथा दूसरे थैले में 5 काली व 4 सफेद गेंद हैं। किसी एक थैले से गेंद निकाली जाती है। ऐसी स्थिति में यदि यह प्रश्न पूछा जाता है कि इस गेंद के काली होने की क्या प्रायिकता है तो उसे सामान्य प्रायिकता कहेंगे। इसके विपरीत यदि हम कहते हैं कि निकाली गई गेंद काली है परन्तु इस बात की क्या प्रायिकता है कि उक्त गेंद पहले वाले थैले में से निकाली। गई होगी। वस्तुतः प्रायिकता परिकलन का यह प्रश्न ही प्रतिलोम प्रायिकता से सम्बन्धित माना जाएगा।

प्रतिलोम प्रायिकता के परिकलन की अवधारणा ब्रिटिश गणितशास्त्री थॉमस बेज़ द्वारा प्रतिपादित की गई थी इसलिए इसे ‘बेज़ प्रमेय’ के नाम से भी जाना जाता है। यदि कोई घटना विभिन्न परन्तु परस्पर अपवर्जी कारणों से प्रभावित हो सकती है तो किसी कारण विशेष से प्रभावित होने की प्रायिकता ज्ञात करना ही प्रतिलोम प्रायिकता कहलाता है। मान लो इन कारणों की अलग-अलग प्रायिकताएँ P1, P2, P3,……….., Pn हैं तथा इन विभिन्न कारणों में से घटना के घटित होने की अलग-अलग प्रायिकताएँ P1, P2, P3 Pa हैं तो ऐसी स्थिति में किसी घटना के घटित हो जाने पर mवें कारण से घटना घटित होने की प्रायिकता को निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है—

 

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उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण- एक थैले में 1 सफेद और 4 काली गेंद हैं। दूसरे थैले में 2 सफेद और 3 काली गेंद हैं तथा तीसरे थैले में 3 सफेद और 2 काली गेंद हैं। एक थैला यादृच्छिक रूप से चुनकर एक गेंद निकाली गयी और वह सफेद निकली। इस बात की क्या प्रायिकता है कि वह गेंद पहले थैले में से निकाली गयी होगी।

यहाँ गेंद निकालने के तीन परस्पर अपवर्जी घटक (Mutually exclusive factors) तीन थैले हैं और गेंद किसी एक थैले में से ही निकलेगी। अतः इन तीन घटकों की प्रायिकता अर्थात् P1, P2 तथा P3 क्रमशः 1/3, 1/3, एवं 1/3 होगी। पहले थैले में से सफेद गेंद निकलने की तथा में से ही सफेद गेंद निकलने की प्रायिकता को निम्नलिखित सूत्र की सहायता से ज्ञात किया जा सकता है—

 

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आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Probability Theory Numerical Question.

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