Unit 4 Analysis of Variance Mcom Notes

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Unit 4 Analysis of Variance Mcom Notes :-  Unit IV: Analysis of Variance: One Way and Two Way Classification, Design of Experiment. Simulation Process of simulation. Monte Carlo simulation, simulation of and inventory system. Analysis of Variance Notes

 

प्रसरण विश्लेषण (Variance Analysis)

प्रसरण विश्लेषण विभिन्न समंक समूहों में पाए जाने वाले अन्तर का परीक्षण करने की प्रक्रिया है, जिससे समूह की सजातीयता का अध्ययन किया जाता है।

ओवेन डेविस के शब्दों में- “प्रसरण विश्लेषण आवश्यक रूप से विचरण के अभिनिर्धारित स्रोतों के अनुरूप विभिन्न संघटकों में प्रसरण का विश्लेषण करने की विधि है।”

इस प्रकार प्रसरण विश्लेषण एक ऐसी प्रविधि है जिसकी सहायता से कुल प्रसरण को विभिन्न कारणों से होने वाले प्रसरण संघटकों में विभाजित करके उनकी तुलना के द्वारा विभिन्न प्रतिदर्श माध्यों की सजातीयता की जाँच की जाती है। सामान्य रूप से कुल विचरण दो संघटकों में विभाजित किया जाता है—

कुल प्रसरण = प्रतिदर्शों के बीच प्रसरण + प्रतिदशों के अन्तर्गत प्रसरण

 

प्रसरण विश्लेषण की उपयोगिता (Utility of Variance Analysis)

विज्ञान की अनेक शाखाओं में प्रसरण विश्लेषण की प्रविधि का विस्तृत प्रयोग होता है। मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में इसका उपयोग होता है—

1, अनेक माध्यों के अन्तरों की जाँच (Test of Differences of Many Averages) – दो लघु प्रतिदर्शों की समान्तर माध्यों के अन्तर की सार्थकता की जाँच करने के लिए स्टूडेण्ट टेस्ट (Student Test) का प्रयोग किया जाता है, परन्तु दो से अधिक अर्थात् अनेक माध्यों के अन्तरों की एक साथ जाँच के लिए प्रसरण विश्लेषण विधि अपनायी जाती है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि सभी प्रतिदर्श (Samples) एक ही सजातीय मूल समष्टि (Universe) से चुने गए हैं और माध्यों में अन्तर केवल प्रतिचयन के कारण है।

2, प्रसरणों के अन्तर का सार्थकता परीक्षण (Significance Test of Difference of Variances) – प्रसरण विश्लेषण में प्रयुक्त गुणांक या प्रसरण अनुपात का अनुप्रयोग विभिन्न प्रतिदर्शों के प्रसरणों के अन्तर की सार्थकता की जाँच करने के लिए किया जाता है।

3, द्विमार्गीय वर्गीकरण में प्रयोग (Use in Two-way Classification) – जब समकों को दो आधारों पर अनेक वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है, तब भी प्रसरण विश्लेषण की प्रक्रिया के द्वारा सजातीयता का अध्ययन किया जाता है।

सहसम्बन्ध एवं प्रतीपगमन की जाँच (Test of Correlation and Regression) – सहसम्बन्ध व प्रतीपगमन की सार्थकता की जाँच करने के लिए भी प्रसरण विश्लेषण का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में प्रसरण विश्लेषण शोध कार्य का एक महत्वपूर्ण और उपयोगी उपकरण है। मॉरिस बुडिन के अनुसार, “सामाजिक एवं भौतिक विज्ञानों में प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन इस तथ्य का स्पष्ट रूप से निरूपण करता है कि विचरण एक ऐसा अभिन्न तत्व है, जो सर्वत्र व्याप्त रहता है।”

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प्रसरण विश्लेषण की मान्यताएँ (Assumptions of Variance Analysis)

प्रसरण विश्लेषण निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

1, प्रसामान्य (Normality) – उस समष्टि का बंटन प्रसामान्य होना चाहिए जिनमें प्रतिदर्शी का चयन किया जाता है और इसके साथ-ही-साथ यादृच्छिक रूप से उत्पन्न अवशिष्ट या विभ्रम प्रसरण भी प्रसामान्य होना चाहिए।

2, स्वतन्त्रता (Independence) – प्रतिदर्श इकाइयों का चयन यादृच्छिक समसम्भावी और स्वतन्त्र होना चाहिए। यदि चयन स्वतन्त्र नहीं होता है तो सहसम्बन्ध की उपस्थिति के कारण इस विश्लेषण की उपयोगिता कुछ कम हो जाती है।

3, संयोज्यता (Additive Property) – प्रसरण के विभिन्न स्रोतों का कुल प्रसरण के प्रति योगदान संयोज्य होना चाहिए अर्थात् विभिन्न संघटक प्रसरणों का योग कुल प्रसरण के बराबर होना चाहिए। यदि उपर्युक्त मान्यताएँ पूरी नहीं उतरती तो विश्लेषण के परिणामों की महत्ता कुछ कम हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में सार्थकता स्तर के चयन में और परिणामों के निर्वाचन में अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए।

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‘अनुरूपण प्रविधि’ का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of ‘Simulation Technique’)

‘अनुरूपण अनिश्चितता की परिस्थितियों में निर्णय लेने की एक ऐसी परिमाणात्मक प्रविधि है जिसके अन्तर्गत वास्तविक जगत की जटिल समस्याओं का भौतिक या गणितीय प्रतिमान प्रस्थापित किया जाता है और ‘जाँच व भूल’ के आधार पर उस प्रतिमान पर समुचित अभिप्रयोग करके विभिन्न वैकल्पिक कार्यविधियों के मूल्यांकन द्वारा समस्या का सर्वोत्तम सम्भाव्य हल प्राप्त किया जाता है।

नेलर के अनुसार, “अनुरूपण एक अंकीय कम्प्यूटर पर अभिप्रयोग संचालित करने की संख्यात्मक प्रविधि है जिसके अन्तर्गत विस्तृत कालावधि में एक जटिल वास्तविक जगत निकाय (या तन्त्र) के व्यवहार और संरचना का वर्णन करने के लिए आवश्यक सुनिश्चित प्रकार के गणितीय एवं तर्कसंगत सम्बन्धों का समावेश किया जाता है।”

चर्चमैन ने गणितीय तर्क के आधार पर अनुरूपण को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है— “X, Y का अनुरूपण करता है— यह तथ्य सही और केवल तभी सही है, जब (अ) X और Y औपचारिक निकाय है, (ब) y वास्तविक निकाय माना जाता है, (स) X वास्तविक निकाय का सन्निकट रूप माना जाता है, (द) X में तर्कसंगत नियम त्रुटिमुक्त नहीं होते अन्यथा X वास्तविक निकाय हो जाएगा।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से अनुरूपण प्रविधि के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण तत्व स्पष्ट हो जाते हैं –

(1) अनिश्चितता में निर्णय लेने की प्रविधि (Technique of Decision making under Uncertainty),

(2) संक्रिया विज्ञान का उपकरण (Tool of O,R,),

(3) जटिल समस्याओं में प्रयोग (Used in plex Problems), ,

(4) प्रतिमान का प्रस्थापन (Setting-up of Model), (5) समुचित अभिप्रयोग (Appropriate Experiments),

(6) अंकीय कम्प्यूटर का प्रयोग (Use of Digital Computer),

(7) यादृच्छिक अंकों का प्रयोग (Use of Random Numbers),

(8) वैकल्पिक कार्यविधियों का मूल्यांकन व निरन्तर सुधार (Evaluation Alternative Courses of Action and Continuous Improvement),

(9) सन्निकट हल (Approximate Solution),

(10) विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग (Use in various Fields) ।

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अनुरूपण के लाभ (Advantages of Simulation)

व्यवहार में अनुरूपण के निम्नलिखित लाभ हैं—

1, परिणामों का सत्यापन (Verification of Results) – जटिल समस्याओं गणितीय अथवा विश्लेषणात्मक समाधान के बाद अनुरूपण रीति द्वारा परिणामों का सत्यापन किया जा सकता है। इस प्रकार, अनुरूपण अन्य विधियों द्वारा प्राप्त परिणामों के सत्यापन उपकरण के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।

2, अपेक्षाकृत सरल प्रविधि (Comparatively Easier Technique) – गणितीय और विश्लेषणात्मक विधियों की तुलना में अनुरूपण प्रविधि का अनुप्रयोग बहुत सरल है। इसी कारण वास्तविक जगत की जटिल समस्याओं के समाधान में अनुरूपित प्रतिमान बनाकर उन पर अभिप्रयोग करके सन्निकट हल प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान होता है। जटिल गणितीय परिकलन से मुक्त होने के कारण यह प्रबन्धकों और कर्मचारियों द्वारा आसानी से समझ में आ जाती है।

3, लचकशील प्रविधि (Flexible Technique) – अन्य विधियों की तुलना में अनुरूपण प्रविधि अधिक लचकशील है। वास्तविक परिस्थितियों में विभिन्न चरों में समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों का अनुरूपित प्रतिमानों में आवश्यकतानुसार समावेश किया जा सकता है। इस प्रकार प्रतिमान में निरन्तर सुधार की सम्भावना रहती है।

4, शिक्षण सहायक (Teaching Aid) – अनुरूपित प्रतिमान व्यवसाय क्रीड़ाएँ (Business games) और वस्तुस्थिति प्रकरणों (Case Studies) के अध्ययन अध्यापन में विशेष सहायक होते हैं।

5, बहुमूल्य सूचना (Valuable Information) – अनुरूपित प्रतिमान वास्तविक निकायों के संचालन तथा वास्तविक समस्याओं के विभिन्न प्राचलों के बारे में बहुमूल्य सूचना प्रदान करते हैं। उनसे सम्बन्धित कार्य-कारण सम्बन्धों के बारे में व्यापक सूचना की सहायता से निकाय तथा विभिन्न उपनिकायों (Sub-systems) में आवश्यकतानुसार सुधार किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उपनिकायों का व्यक्तिगत व संयुक्त रूप से अध्ययन किया जा सकता है।

6, कम लागत तथा कम जोखिम (Lesser Cost and Lesser Risk) – वास्तविक समस्या पर कार्य करने की अपेक्षा उसके सरल प्रतिमान पर अभिप्रयोग करना अधिक मितव्ययी और कम जोखिम वाला होता है। विशेष उद्देश्य वाली अनुरूपण भाषाओं के उपयोग द्वारा प्रतिमान रचना और प्रक्रम लागत (Programming Cost) भी कम की जा सकती है। इस प्रकार नई-नई व्यावसायिक समस्याओं पर अनुरूपण का मितव्ययी ढंग से प्रयोग हो सकता है।

7, प्रशिक्षण देने में उपयोगी (Useful in Training People) – अत्यधिक लागत एवं जोखिम वाले वास्तविक संयन्त्र (जैसे- अन्तरिक्षयान, वायुयान, महँगा संयन्त्र आदि) कर्मचारियों को सौंपने से पूर्व उन संयन्त्रों के अनुरूपित प्रतिमानों की सहायता से उन्हें विशेष प्रशिक्षण देना सर्वथा उपयोगी होता है। वास्तविक संयन्त्र पर कार्य करने से पहले प्रतिमानों पर प्रशिक्षण प्राप्त करने से कर्मचारी अपने कार्य में प्रवीण और अनुभवी हो जाते हैं और उनमें आत्मविश्वास भी आ जाता है। इसके अतिरिक्त कम्प्यूटर पर समक-प्रक्रम (data processing) में भी वे विशेष योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। इससे संस्थान का विशेष लाभ होता है।

8, अज्ञात कठिनाइयों व अवरोधों का पूर्वानुमान (Prediction of Unknown difficulties and bottle necks) – वास्तविक वातावरण में जिन समस्याओं में अज्ञात अवरोधों व सम्भाव्य घटनाओं (eventualities) को पहचानना या उनका पूर्वानुमान लगाना अत्यन्त कठिन होता है। अनुरूपण प्रविधि के प्रयोग द्वारा उनका पूर्वाभास व पूर्वानुमान किया जा सकता है।

9, कम्प्यूटर अनुरूपण से समय की बचत (Saving of Time in Computer Simulation) – अनुरूपण प्रक्रिया में तीव्र गति वाले अंकीय कम्प्यूटर के प्रयोग से हमारे अध्ययन में कालावधि का समावेश किया जा सकता है। कम्प्यूटर अनुरूपण का सबसे महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि उससे समय की बहुत बचत होती है।

 

अनुरूपण की सीमाएँ (Limitations of Simulation)

यद्यपि जटिल निकायों के अनुरूपण प्रतिमान बहुत उपयोगी होते हैं, फिर भी अनुरूपण प्रविधि की कुछ सीमाएँ होती हैं, जो निम्नलिखित हैं –

1, चरों के परिमाणन ( संख्याकरण) में कठिनाई (Difficulty in Quantification of Variables) – अनेक परिस्थितियों में प्रयोग किए जाने वाले तथा निर्णय को प्रभावित करने वाले सभी चरों को संख्याओं के रूप में परिवर्तित करना असम्भव होता है। इस कारण भी अक्सर संतोषजनक समाधान प्राप्त नहीं होते।

2, केवल अनिश्चितता की परिस्थितियों में ही प्रभावी (Effective Only Under Conditions of Uncertainty) – अनुरूपण प्रविधि अनिश्चितता की परिस्थितियों में ही प्रभावी परिणाम देती हैं जिनमें यादृच्छिकता (randomness) का तत्त्व होता है। यादृच्छिकता-संघटक के बिना सभी प्रतिमान-अभिप्रयोगों से लगभग एक से परिणाम प्राप्त होते हैं।

3, अनुरूपण से अनुकूलतम समाधान प्राप्त नहीं होते (No Optimal Solutions) – अनुरूपण विधि का प्रयोग अनिश्चितता की परिस्थितियों में किया जाता है। अनुरूपण प्रतिमान पर ‘जाँच व भूल’ के आधार पर अभिप्रयोग किए जाते हैं, अतः उसे कोई अनुकूलतम समाधान प्राप्त नहीं होते वरन् केवल सन्निकट हल (approximate solutions) ही उपलब्ध होते हैं जिसमें त्रुटियाँ हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, अनुरूपण के पुनरावृत्त चक्रों (repeated runs) में विभिन्न समाधान प्राप्त होने की सम्भावना रहती है जिनका मूल्यांकन करके ही सन्निकट हल ज्ञात किया जा सकता है।

4, अनेक अत्यधिक जटिल चरों के लिए अनुपयुक्त (Unsuitable in a large number of Complex Variables) – कभी-कभी प्रतिमानों में प्रयुक्त जटिल चरों और प्राचलों की संख्या इतनी अधिक होती है और उनके अन्तर्सम्बन्ध इतने उलझे हुए होते हैं कि उन्हें उपलब्ध कम्प्यूटर कार्यक्रम की परिधि में रखना बहुत कठिन हो जाता है।

5, अधिक लागत और अधिक समय (Costly and Time Consuming) – अधिक चरों वाले अनुरूपण प्रतिमानों के निर्माण में अधिकतर अत्यधिक लागत और अत्यधिक समय लगता है।

 

अनुरूपण प्रविधि का तर्काधार (Rationale of Simulation Technique)

सामान्यतया जहाँ गणितीय विश्लेषण अत्यन्त जटिल, अत्यधिक लागत वाला, दीर्घसूत्री और विघटनकारी हो वहाँ अनुरूपण ही अन्तिम आश्रय वाली प्रविधि होती है। बीयरमैन, बोनाइनी एवं हॉसमैन ने ठीक ही कहा है-“अनेक वास्तविक जगत की समस्याओं में ऐसे निकाय या तन्त्र अन्तर्निहित होते हैं जो अनेक अन्तर्सम्बन्धित संघटक तत्त्वों पर आधारित होते हैं—निकाय कालान्तर में गतिशील हो सकता है तथा प्रायिक या अनिश्चित घटनाओं से सम्बद्ध हो सकता है। इस प्रकार की समस्याओं के परिमाणात्मक विश्लेषण के लिए अनुरूपण ही एकमात्र प्रविधि है।”

अतः अनुरूपण प्रविधि का प्रयोग करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1, सर्वाधिक मितव्ययी रीति (Most Economical Method) – अनुरूपण प्रविधि सर्वाधिक मितव्ययी प्रविधि होती है क्योंकि इसके अन्तर्गत अनुरूपित प्रतिमानों (Simulated) Models) पर जाँच व भूल विधि द्वारा अभिप्रयोग किए जाते हैं, जबकि किसी समस्या पर वास्तविक वातावरण में अभिप्रयोगों पर अत्यधिक व्यय होता है।

2, समय की बचत (Saving of Time) – कभी-कभी वास्तविक वातावरण में किसी जटिल समस्या या किसी निकाय के व्यापक विश्लेषण और क्रिया संचालन में बहुत अधिक समय लगता है, जबकि अनुरूपित प्रतिमानों की सहायता से समस्या का समाधान या निकाय का संचालन करने में समय की बहुत बचत होती है, अतः अनुरूपण प्रविधि का प्रयोग दीर्घसूत्री समस्याओं के हल के लिए आवश्यक है।

3, जटिल समस्याओं के समाधान की प्रभावी प्रविधि (Effective Method of Solving Complex Problems) – जब समस्या इतनी जटिल हो कि वास्तविक वातावरण में उसका अध्ययन व समाधान सम्भव न हो तो अनुरूपण ही एकमात्र प्रभावी विधि होती है।

4, अनुरूपण से जाँच व भूल’ विधि द्वारा सर्वोत्तम सन्निकट हल प्राप्त किया जाता है (Simulation Provides Approximate Optimal Solution by Trial and Error Approach) – अनुरूपण प्रविधि में निर्णयकर्त्ता अनुरूपित प्रतिमान पर अभिप्रयोग करके विकल्प का चयन करता है, समस्या के विभिन्न पहलुओं पर विकल्प के पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है और जाँच व भूल विधि द्वारा अभिप्रयोग करके उसमें तब तक निरन्तर सुधार करता रहता है जब तक कि अनुकूलतम के सन्निकट हल की प्राप्ति न जाए।

5, गणितीय या विश्लेषणात्मक समाधान के अभाव में सर्वोपयुक्त (Best Method in the Absence of Mathematical or Analytical Solution) – जब समस्या का गणितीय या सांख्यिकीय विश्लेषण सम्भव न हो तो अनुरूपण विधि ही निर्णयन की सर्वोपयुक्त विधि होती है।

6, विघटन की जोखिम से सुरक्षा (Safety from the Risk of Disruption) – व्यवहार में किसी वास्तविक निकाय का संचालन या भौतिक व व्यवसाय प्रबन्धन की किसी जटिल समस्या का अवलोकन व समाधान अधिक विघटनकारी या जोखिमपूर्ण होता है। ऐसी स्थिति में उसके अनुरूपित प्रतिमान पर अभिप्रयोगों द्वारा निरन्तर सुधार करके सर्वोत्तम सम्भाव्य हल या अनुकूलतम सन्निकट हल प्राप्त किया जा सकता है। अनुरूपण विधि का प्रयोग करने से वास्तविक समस्या में निहित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उपर्युक्त प्रमुख कारणों से ही अनिश्चितता की परिस्थितियों में वास्तविक जगत की अनेक जटिल समस्याओं का समाधान करने और सर्वोत्तम सम्भाव्य निर्णय लेने के लिए अनुरूपण प्रविधि का प्रयोग किया जाता है।

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Analysis of Variance Numerical Question.

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