Business Cycle Managerial Economics Mcom Notes

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व्यापार चक्र (Business Cycle)

व्यापार चक्र से आशय (Meaning of Business Cycle)

व्यापार चक्र, जिसे आर्थिक चक्र या व्यापार चक्र के रूप में भी जाना जाता है, दीर्घकालिक विकास की प्रवृत्ति के आस-पास सकल घरेलू उत्पाद (जी०डी०पी०) का उतार-चढ़ाव है। एक व्यापार चक्र की लम्बाई एक एकल बूम और अनुक्रम में संकुचन वाले समय की अवधि है। इन उतार-चढ़ावों में आमतौर पर अपेक्षाकृत तेजी से आर्थिक विकास (विस्तार या उछाल) की अवधि और सापेक्ष ठहराव या गिरावट (संकुचन या मन्दी) की अवधि के बीच बदलाव शामिल होते हैं।

व्यापार चक्रों को आमतौर पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को देखते हुए मापा जाता है। अक्सर लागू होने वाले टर्म साइकिल के बावजूद, आर्थिक गतिविधियों में ये उतार-चढ़ाव एक समान या अनुमानित समय-समय पर प्रदर्शित नहीं होते हैं। सामान्य या लोकप्रिय उपयोग बूम-एण्ड बस्ट चक्र में उतार-चढ़ाव को सन्दर्भित करता है जिसमें विस्तार तेजी से होता है और संकुचन गम्भीर होता है।

मुख्य धारा के अर्थशास्त्र का वर्तमान दृष्टिकोण यह है कि व्यापार चक्र अनिवार्य रूप से अर्थव्यवस्था को विशुद्ध रूप से यादृच्छिक झटके के योग हैं और इस तरह से दिखने के बावजूद, वास्तव में, चक्र नहीं है। हालांकि, कुछ विषमलैंगिक स्कूल वैकल्पिक सिद्धान्तों का प्रस्ताव करते हुए सुझाव देते हैं कि वास्तव में चक्र अन्तर्जात कारणों के कारण मौजूद हैं।

व्यापार चक्र की परिभाषा (Definition of Business Cycles)

डब्लू०सी० मिचैल के अनुसार, “व्यापार चक्रों से तात्पर्य संगठित समुदायों को आर्थिक क्रियाओं में होने वाले उच्चावचनों की श्रृंखला होता है। ”

जेम्स आर्थर इस्टे के अनुसार, “चक्रीय उच्चावचनों में विस्तार एवं संकुचन की वैकल्पिक लहरें उपस्थित होती हैं। इन उच्चावचनों की लय (Rhythm) स्थिर नहीं होती लेकिन वे चक्रीय इसलिए कहलाते हैं कि संकुचन एवं विस्तार की अवस्थाएँ बार-बार पुनरावृत्त होती हैं और उनका स्वरूप लगभग समान ही होता है।”

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व्यापार चक्र की प्रकृति (Nature of Business Cycle)

  1. कभी-कभार (Seldom) – जैसा कि हमने देखा, ये चरण समय-समय पर होते हैं। हालांकि वे विशिष्ट समय के लिए नहीं होते हैं, उनकी समय अवधि उद्योगों और आर्थिक स्थितियों के अनुसार अलग-अलग होगी। उनकी अवधि दो से दस या बारह साल के बीच कहीं से भी भिन्न हो सकती है। यहाँ तक कि चरणों की तीव्रता अलग होगी। उदाहरण के लिए, फर्म को उथले अल्पकालिक अवसादग्रस्तता चरण के बाद जबरदस्त वृद्धि दिखाई दे सकती है।
  2. सिंक्रोनस (Synchronous) – व्यापार चक्रों की एक और विशेषता यह है कि वे समकालिक है। व्यावसायिक चक्र एक फार्म या एक उद्योग तक सीमित नहीं है। वे मुक्त अर्थव्यवस्था में उत्पन्न होते हैं और प्रकृति में व्याप्त है। एक उद्योग में एक गड़बड़ी जल्दी से सभी अन्य उद्योगों में फैल जाती है और अन्त में एक पूरे के रूप में अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, इस्पात उद्योग में एक मन्दी की प्रतिक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक कि पूरी अर्थव्यवस्था में मन्दी न आ जाए।
  3. सभी सेक्टर प्रभावित हैं (All Sectors are Affected) – अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों को व्यापार चक्र के प्रतिकूल प्रभावों का सामना करना पड़ेगा। कुछ उद्योग जैसे पूँजीगत वस्तु उद्योग, उपभोक्ता वस्तु उद्योग असन्तुष्ट रूप से प्रभावित हो सकते हैं। 4. कॉम्प्लेक्स फेनोमेनन (Complex Phenomenon) व्यापार चक्र एक बहुत ही जटिल और गतिशील घटना है। उनमें कोई एकरूपता नहीं है। व्यावसायिक चक्रों के लिए भी कोई निर्धारित कारण नहीं है। इसलिए इन व्यावसायिक चक्रों की भविष्यवाणी या तैयारी करना लगभग असम्भव है।
  4. सभी विभागों को प्रभावित करें (Affect all Departments) व्यापार चक्र न केवल वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन तक सीमित है। इसका अन्य सभी चरों पर प्रभाव पड़ता है जैसे कि रोजगार, ब्याज की दर, मूल्य स्तर, निवेश गतिविधि आदि।

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व्यवसाय चक्र के चरण (Phases of a Business Cycle)

एक सामान्य व्यापार चक्र में दो चरण होते हैं विस्तार चरण या ऊपर या शिखर और संकुचन चरण या डाउनस्विंग या गर्त अपस्विंग या विस्तार चरण जी०एन०पी० के अधिक तीव्र विकास को लम्बे समय तक प्रवृत्ति विकास दर से प्रदर्शित करता है। कुछ बिन्दु पर, जी०एन०पी० अपने ऊपरी मोड़ पर पहुँच जाता है और चक्र या पतन शुरू हो जाता है। संकुचन चरण में, जी०एन०पी० में गिरावट आती है। कुछ समय में, जी०एन०पी० अपने निचले मोड़ पर पहुँच जाता है और विस्तार शुरू हो जाता है। निचले मोड़ से शुरू होकर, एक चक्र वसूली के चरण का अनुभव करता है और कुछ समय बाद यह ऊपरी मोड़ पर पहुँच जाता है। लेकिन, निरन्तर समृद्धि कभी नहीं हो सकती है और डाउनहिल की प्रक्रिया शुरू होती है। इस संकुचन चरण में, एक चक्र पहले मन्दी का प्रदर्शन करता है और फिर अन्त में नीचे तक पहुँचा जाता है। इस प्रकार, एक व्यापार चक्र के चार चरण होते हैं—

(1) अवसाद (Depression)

(2) पुनरुद्धार (Revival)

(3) बूम और (Boom and)

(4) मन्दी (Recession)

  1. अवसाद (Depression) – अवसाद या गर्त एक चक्र के नीचे है जहाँ आर्थिक गतिविधि अत्यधिक निम्न स्तर पर रहती है। आय, रोजगार उत्पादन मूल्य स्तर आदि नीचे जाते हैं। एक अवसाद आमतौर पर श्रम और पूँजी की उच्च बेरोजगारी और उपभोक्ता की निम्न स्तर की माँग की विशेषता है जो अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता के सम्बन्ध में है। माँग में यह कमी फर्मों को उत्पादन और ले-ऑफ श्रमिकों में कटौती करने के लिए मजबूर करती है।
  2. पुरूद्वार (Revival) – चूँकि गर्त एक स्थायी घटना नहीं है, एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था विस्तार का अनुभव करती है और इसलिए वसूली की प्रक्रिया शुरू होती है। अवसाद के दौरान कुछ मशीनें पूरी तरह से खराब हो जाती हैं और अन्ततः बेकार हो जाती हैं। उनके अस्तित्व के लिए, व्यवसायी पुरानी और खराब हो चुकी मशीनरी को बदल देते हैं। इस प्रकार, खर्च करना शुरू होता है – जाहिर है, हिचकिचाहट से यह अर्थव्यवस्था के लिए एक आशावादी संकेत देता है, उद्योग बढ़ने लगते हैं और अपेक्षाएँ अधिक अनुकूल हो जाती हैं। निराशावाद जो कभी अर्थव्यवस्था में प्रबल था, अब आशावाद के लिए जगह बनाता है। निवेश जब जोखिम भरा नहीं है। अतिरिक्त और ताजा निवेश से उत्पादन में वृद्धि होती है।
  3. बूम (Boom) – एक बार पुनरुद्धार की ताकतों को मजबूत होने के बाद आर्थिक गतिविधि का स्तर उच्चतम बिन्दु तक पहुँच जाता है— शिखर एक चोटी एक चक्र से सबसे ऊपर है। शिखर को अर्थव्यवस्था में आय, रोजगार, उत्पादन और मूल्य स्तर बढ़ने की एक चोतरफा आशावाद की विशेषता है। इस बीच, कुल माँग और लागत में वृद्धि से निवेश और मूल्य स्तर दोनों में वृद्धि होती है लेकिन एक बार अर्थव्यवस्था पूर्ण रोजगार के स्तर पर पहुँच जाती है, तो अतिरिक्त निवेश से जी०एन०पी० नहीं बढ़ेगा।
  4. मन्दी (Recession) – अवसाद, समृद्धि या मटर की तरह, कभी भी लम्बे समय तक नहीं रह सकता। वास्तव में, समृद्धि का बुलबुला धीरे-धीरे मर जाता है। यह मन्दी तब शुरू होती है जब अर्थव्यवस्था गतिविधि के चरम पर पहुँच जाती है और जब अर्थव्यवस्था अपने गर्त या अवसाद तक पहुँच जाती है तो समाप्त हो जाती है। गर्त और शिखर के बीच, अर्थव्यवस्था बढ़ती या फैलती है। सामान्य रूप से उत्पादन, रोजगार, वास्तविक आय और अन्य संकेतों में सामान्य रूप से दिखाई देने वाली कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था में फैली आर्थिक गतिविधियों में मन्दी एक महत्त्वपूर्ण गिरावट है।

व्यापार चक्र के सिद्धान्त (Theories of Business Cycle)

व्यापार चक्रों की जटिलता के कारण अर्थशास्त्री व्यापार चक्रों के कारणों की व्याख्या में एकमत नहीं हो पाए। यही कारण है कि व्यापार चक्रों की व्याख्या के लिए अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित किए गए। व्यापार चक्रों की उत्पत्ति अनेक कारणों मौद्रिक व गैर-मौद्रिक का परिणाम है। व्यापार चक्रों के कुछ सिद्धान्त अग्र प्रकार हैं –

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सैम्युलसन का गुणक-त्वरक एकीकृत सिद्धान्त (Samuelson’s Accelerator-Multiplier Unified Theory of Business Cycle)

सैम्युलसन की व्यापार चक्र की व्याख्या का आधार गुणक (Multiplier) एवं त्वरक (Accelerator) की पारस्परिक क्रियाएँ (Interactions) है। सैम्युलसन के विचार में अर्थव्यवस्था के सामाजिक उच्चावचनों की व्याख्या अकेले गुणक के विचार से नहीं की जा सकती। सैम्युलसन इस तथ्य पर बल देते हैं कि अर्थव्यवस्था की आर्थिक क्रियाओं के विश्लेषण में गुणक एवं त्वरक के प्रभावों को अलग नहीं किया जा सकता। सैम्युलसन के अनुसार आय स्तर (Income level) एवं विनियोग स्तर (Investment level) के दो विशेष सम्बन्ध पाए जाते हैं –

(1) गुणक के अनुसार, “आय स्तर विनियोग स्तर पर निर्भर है।” (Income Level is Dependent on Investment Level)

अर्थात् समय t पर में,

गुणक = (1/सीमान्त बचत क्षमता) = (आयपरिवर्तन/विनियोग परिवर्तन)

K = (1/S) = (Yt/It)

(2) त्वरक के अनुसार, “विनियोग स्तर आय में परिवर्तन की दर पर निर्भर होता है।” (Level of Investment depends upon the Rate of Change of Income) अर्थात् [अर्थात् AY = Y, Y,1] पर निर्भर करता है। समय का विनियोग आय में परिवर्तन सांकेतिक रूप में,

अर्थात्

I1 = β [AY]

I1 = β [Y1 – Yt- 1]

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हिक्स का व्यापार चक्र का सिद्धान्त (Hicksian Theory of Trade Cycle)

प्रो० हिक्स ने व्यापार चक्रों की व्याख्या के लिए एक नए सिद्धान्त का प्रतिपादन है, जिसे ‘आधुनिक सिद्धान्त’ के नाम से जाना जाता है।

सिद्धान्त की व्याख्या (Explanation of the Theory)

हिक्स के अनुसार व्यापार चक्र गुणक और त्वरक की अन्तःक्रिया का परिणाम है। हिक्स ने कहा है, “जिस प्रकार माँग का सिद्धान्त और पूर्ति का सिद्धान्त मूल्य सिद्धान्त की दो भुजाएँ हैं, ठीक उसी प्रकार गुणक सिद्धान्त तथा त्वरक सिद्धान्त उच्चावचनों के सिद्धान्त की दो भुजाएँ हैं।”

हिक्स के अनुसार निवेश के दो प्रकार होते हैं–(i) स्वायत्त निवेश, (ii) प्रेरित निवेश स्वायत्त निवेश वे निवेश होते हैं जो कि एक स्थिर दर से होते हैं तथा ये राष्ट्रीय आय और उपभोग स्तर जैसे वर्तमान आर्थिक तत्त्वों से प्रभावित नहीं होते हैं। इसके विपरीत प्रेरित निवेश वे निवेश होते हैं, जो आय स्तर और उपभोग स्तर के भूतकालीन परिवर्तनों से निर्धारित होते हैं।

हिक्स के सिद्धान्त के अनुसार तकनीकी उन्नति, जनसंख्या वृद्धि, पूंजी संचय तथा विकास के अन्य शक्तिशाली तत्त्वों के अभाव में अर्थव्यवस्था दीर्घावधि के लिए मंदी के दलदल में फँसी रहती है। अब यदि कोई स्वाभाविक निवेश किया जाता है तो गुणक के मूल्यानुसार उत्पादन और आय का विस्तार होगा। इस विस्तार से त्वरक के माध्यम द्वारा प्रेरित निवेश में वृद्धि होगी।

उत्पादन और निवेश का यह विस्तार तब तक जारी रहेगा जब तक कि यह पूर्ण रोजगार द्वारा निर्धारित ऊपरी सीमा तक नहीं पहुँच जाता। इस सीमा पर पहुँचने के बाद विस्तार की दर धीमी पड़ जाती है और गुणक-त्वरक प्रक्रिया विपरीत दिशा में क्रियाशील हो उठती है। निवेश की दर गिरने लगती है। गिरते हुए निवेश से उत्पादन और आय गिरने लगते हैं तथा कमजोर फर्म फेल होने लगती है और प्रबन्धकीय क्रियाओं का स्वाभाविक रूप से पतन होने लगता है तथा चारों ओर मंदी छा जाती है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions of the Theory)

हिक्स का सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

  1. हिक्स ने गुणक और त्वरक के मूल्य स्थिर माने हैं।
  2. विकास की साम्य दर (Equilibrium Rate of Growth) – हिक्स ने प्रतिरूप अर्थव्यवस्था में विकास की साम्य दर को माना है जिसमें प्राप्त विकास दर प्राकृतिक विकास दर के बराबर होती है।
  3. विकास और गिरावट की उच्चतम निम्नतम सीमा (Ceiling and Bottom for Upswing and Downswing) – हिक्स ने विस्तार की उच्चतम तथा गिरावट की निम्नतम सीमा बतायी है।
  4. स्वायत्त निवेश वर्तमान उत्पादन का प्रकार्य है (Autonomous Investment is a Function of Current Output) – हिक्स की मान्यता है कि स्वायत्त निवेश वर्तमान उत्पादन का प्रकार्य है और यह जर्जर पूँजी के प्रतिस्थापन के लिए किया जाता है।
  5. उपभोग प्रकार्य (Consumption Function) – हिक्स ने भी सैम्युलसन प्रकार का उपभोग प्रकार्य माना है जिसमें उपभोग में एक वर्ष की देरी होती है।

आलोचना (Criticism)

इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नवत् हैं –

(1) यह सिद्धान्त अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है।

(2) इस सिद्धान्त में मौद्रिक साधनों की भूमिका स्पष्ट नहीं है।

(3) हिक्स के अनुसार व्यापार चक्र की विस्तार अवस्था की तुलना में संकुचन अवस्था अधिक लम्बी होती है।

(4) हैरोड, हिक्स के इस तर्क से सहमत नहीं है कि मंदी के तल पर स्वायत्त निवेश होगा।

(5) इस सिद्धान्त में पूर्ण रोजगार सीमा की परिभाषा उत्पादन-पथ से स्वतन्त्र रूप में की गई है।

(6) स्वायत्त निवेश और प्रेरित निवेश के बीच अन्तर नहीं किया जा सकता।

(7) यह सिद्धान्त वास्तविक जीवन में उच्चावचन के विचार की व्याख्या करने में असमर्थ रहा है।

(8) यह सिद्धान्त रेखीय उपभोग प्रकार्य और एक स्थिर गुणक के कारण स्पष्ट नहीं करता है।

उपर्युक्त आलोचना के होने पर भी हिक्स का व्यापार चक्र का सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि यह सबसे अधिक पूर्ण और व्यवस्थित सिद्धान्त है। इसमें पूर्व के सिद्धान्तों की सभी अच्छी बातें सम्मिलित कर ली गई हैं। हिक्स ने ही स्पष्ट किया है कि तेजी के समय त्वरक सक्रिय रहता है किन्तु मंदी के समय अतिरिक्त उत्पादन के कारण यह निष्क्रिय हो जाता है।

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शुम्पीटर का व्यापार चक्र का नवप्रवर्तन सिद्धान्त (Schumpeter’s Theory of Innovation of Business Cycle)

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक अमेरिकी अर्थशास्त्री शुम्पीटर हैं। शुम्पीटर के अनुसार व्यापार चक्र पूँजीवादी आर्थिक प्रणाली की एक सतत प्रक्रिया है। उन्हीं के शब्दों में– “व्यापार चक्र लगभग पूर्णतया औद्योगिक और वाणिज्यिक संगठनों में नवप्रवर्तन का परिणाम हैं।” प्रो० शुम्पीटर के अनुसार नवप्रवर्तन से आशय किसी ऐसे नवीन परिवर्तन से हैं जो उत्पादन की वर्तमान प्रविधियों में रूपान्तरण कर देता है। उन्होंने निम्नलिखित बातों को नवप्रवर्तन में सम्मिलित किया है

(1) कोई नया यान्त्रिक परिवर्तन,

(2) उत्पादन या यातायात विधियों में परिवर्तन,

(3) किसी नवीन वस्तु का उत्पादन,

(4) वर्तमान वस्तुओं के नए बाजारों का विकास,

(5) ऊर्जा व कच्चे माल के नए स्रोतों का विकास,

(6) व्यावसायिक संगठन के नए रूपों का विकास,

(7) प्रबन्ध की नवीन प्रविधियों का विकास आदि।

शुम्पीटर के अनुसार समृद्धि ही मंदी का कारण है तथा नवप्रवर्तन व्यापार चक्र की उत्पत्ति का मौलिक कारण है। व्यापार चक्र का श्रीगणेश उस समय होता है, जबकि उद्यमी नवीन तकनीकों तथा नई सामग्री का व्यवसाय में उपयोग हेतु निवेश करते हैं।

शुम्पीटर का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित हैं कि अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार * विद्यमान है। ऐसी स्थिति में जब उत्पादन प्रक्रिया में नवप्रवर्तन लाया जाता है और किसी नई वस्तु का उत्पादन किया जाता है तो इसमें निवेश हेतु बैंक साख का विस्तार होता है और उत्पादन के सभी साधनों की माँग बढ़ जाती है।

इससे उत्पत्ति के साधनों की क्रय शक्ति बढ़ती है तथा बाजार में नई वस्तुओं की माँग बढ़ने लगती है और इस प्रकार अर्थव्यवस्था में समृद्धि का सूत्रपात होता है। नवप्रवर्तन के लाभो से आकर्षित होकर उद्योग की अन्य फर्मे भी नवप्रवर्तन को अपनाती हैं तथा कुछ नई फर्मे भी उस उद्योग में प्रविष्ट हो जाती है।

इसके साथ ही अग्रगामी फर्मों द्वारा अपने अर्जित लाभ में से बैंक ऋण चुकता किए जाने से बैंक साख का संकुचन होने लगता है। इस प्रकार अर्थव्यवस्था प्रतिसार की ओर अग्रसर होने लगती है तथा पुराने उद्योगों में संलग्न फर्मों द्वारा उत्पादन कम किए जाने पर श्रमिकों की छँटनी होने लगती है एवं बेरोजगारी फैलने लगती है। इस प्रकार श्रमिकों की क्रय शक्ति घट जाने से वस्तुओं की माँग में निरन्तर गिरावट आती जाती है और अर्थव्यवस्था मंदीकाल में प्रवेश कर जाती है। शुम्पीटर के विचार में समृद्धि व्यापार चक्र की प्रथम अवस्था है तथा पुनर्चेतना व्यापार चक्र की अन्तिम अवस्था है।

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आलोचना (Criticism)

इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ इस प्रकार हैं –

(1) यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि प्रत्येक उद्योग में कुछ नवप्रवर्तन की वित्तीय व्यवस्था बैंक साख के विस्तार द्वारा की जाती है और उससे देश में अन्ततः स्फीतिक स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

(2) कुछ लोगों का यह मानना है कि शुम्पीटर का सिद्धान्त विनियोग सिद्धान्त से भिन्न नहीं है।

(3) शुम्पीटर मंदी के बाद पुनर्चेतना आरम्भ होने की प्रक्रिया को ठीक प्रकार से नहीं, समझ पाए हैं।

(4) केवल नवप्रवर्तन व्यापार चक्र का एकमात्र कारण नहीं है, यह तो अनेक कारणों में से एक है।

(5) यह सिद्धान्त अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की मान्यता पर आधारित है, किन्तु यह मान्यता पूर्णतया गलत है।

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मकड़जाल सिद्धान्त (Cobweb Theory)

यह सिद्धान्त अर्थव्यवस्था के सामयिक उतार-चढ़ाव की गत्यात्मक व्याख्या करता है। यह सिद्धान्त कृषि उत्पादों की कीमतों एवं उत्पादन मात्राओं में नियमित समयान्तरालों के पश्चात् घटित होने वाले चक्रों की व्याख्या करता है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions of the Theory)

यह सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

(1) बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति है।

(2) सम्बन्धित वस्तु नाशवान होती है।

(3) कीमत पूर्णतया पूर्व अवधि की पूर्ति का फलन होती है।

(4) वर्तमान कीमतें भविष्य में भी जारी रहेंगी, उत्पादन परियोजनाओं से बाजार प्रभावित नहीं होता है।

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सिद्धान्त की व्याख्या (Explanation of the Theory)

कृषि पदार्थों की पूर्ति माँग परिवर्तन के साथ धीरे-धीरे समायोजित की जा सकती है, अतः इन पदार्थों की कीमतों एवं उत्पादन मात्राओं में अत्यधिक तथा तेजी से उतार- Image

चढ़ाव होते रहते हैं। इस प्रकार माँग और पूर्ति के ये उच्चावचन नियमित रूप से समयान्तर पर होते रहते हैं।

यदि इन उच्चावचनों को रेखाचित्र पर अंकित कर दिया जाए तो रेखाओं का एक जाल-सा बन जाता है। चूँकि यह जाल मकड़ी के जाल की भाँति होता है, इसीलिए निकोलस कालडोर ने इस सिद्धान्त को ‘मकड़जाल सिद्धान्त’ का नाम दिया है।

ये मकड़जाल तीन प्रकार के होते हैं –

(1) निरन्तर मकड़जाल

(2) केन्द्राभिमुखी मकड़जाल

(3) विपथगामी मकड़जाल ।

  1. निरन्तर मकड़जाल (Continuous Cobweb) – निरन्तर या अनुबद्ध मकड़ जाल में कीमत और उत्पादन सामयिक उतार-चढ़ाव के चारों ओर समान स्तर पर स्वयं को दोहराते हैं, उतार-चढ़ाव के आकारों में न तो कोई कमी होती है और न ही कोई वृद्धि होती है। यह स्थिति माँग और पूर्ति वक्र की समान लोच के कारण होती है।
  2. केन्द्राभिमुखी मकड़-जाल (Convergent Cobweb) – इस जाल में कीमतों एवं उत्पादन मात्राओं के उतार-चढ़ाव भीतरी सन्तुलन की ओर अग्रसर रहते हैं। प्रत्येक अगले उतार-चढ़ाव पर मकड़जाल आकार में संकुचित होता जाता है।

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ऐसा उस समय होता है जबकि पूर्ति वक्र की लोच, माँग वक्र की लोच की तुलना में कम होती है। दूसरे शब्दों में, कृषि पदार्थों की कीमत परिवर्तन के प्रति माँग की तुलना में पूर्ति कम संवेदनशील होती है। इस प्रकार यदि अर्थव्यवस्था कभी अपनी सन्तुलन स्थिति से हट जाती है तो इसमें कीमत और उत्पादन मात्रा के उच्चावचनों की श्रृंखला के द्वारा सन्तुलन की स्थिति को पुनः प्राप्त करने की प्रवृत्ति होती है। उच्चावचनों की श्रृंखला के क्रम में प्रत्येक उच्चावचन अपने पूर्व उच्चावचन की तुलना में छोटा होता है।

  1. विपथगामी मकड़-जाल (Divergent Cobweb) – यह केन्द्राभिमुखी मकड़जाल के बिल्कुल विपरीत होता है। इसमें प्रत्येक अगला जाल पहले जाल की तुलना में बड़ा होता है। इसमें माँग की तुलना में पूर्ति अधिक लोचदार होती है।

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आलोचना (Criticism)

इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ इस प्रकार हैं –

(1) यह सिद्धान्त व्यापार चक्रों की विभिन्न अवस्थाओं की क्रमबद्ध विवेचना नहीं करता।

(2) निरन्तर मकड़जाल की स्थिति अनन्तकाल तक नहीं बनी रह सकती। वस्तुतः यह एक व्यावहारिक असम्भाव्यता है।

(3) अनिश्चितकाल तक विपथगामी मकड़जालीय चक्र वास्तव में असम्भव है।

(4) इस सिद्धान्त की सभी मान्यताएँ अवास्तविक हैं क्योंकि – (i) बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता नहीं पायी जाती है। (ii) वर्तमान कीमतों के भविष्य में जारी रहने की मान्यता भी त्रुटिपूर्ण है। (iii) कीमत पूर्व अवधि की पूर्ति का फलन नहीं होती। (iv) प्रत्येक कृषि पदार्थ नाशवान् नहीं होता।

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(5) यह सिद्धान्त व्यापार चक्रीय सिद्धान्त नहीं है क्योंकि इसका सम्बन्ध अर्थव्यवस्था के केवल कृषि क्षेत्र से ही है।

(6) अगली अवधि के उत्पादन की मात्रा प्रचलित कीमत से ही नहीं निर्धारित होती है। वरन् अगली अवधि की प्रत्याशित कीमत से भी प्रभावित होती है।

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कीन्स का व्यापार चक्र सिद्धान्त (Keynes Business Cycle Theory)

लार्ड जे०एम० कीन्स (Lord J.M. Keynes) ने व्यापार चक्र का कोई पृथक् सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं किया है फिर भी आर्थिक उच्चावचनों की उनकी विचारधारा अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। कीन्स की व्यापार चक्र की व्याख्या को उनके रोजगार सिद्धान्त का एक पूरक घटक कहा जाता है। 1936 में प्रकाशित जे०एम० कीन्स की पुस्तक “The General Theory of Employment, Interest and Money’ के 22वें अध्याय में व्यापार चक्र की विचारधारा का उल्लेख मिलता है।

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उपर्युक्त रेखाचित्र से स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक क्रियाओं एवं रोजगार का स्तर आय के स्तर पर निर्भर करता है। उपभोग भी आय पर निर्भर है। अर्थव्यवस्था में विनियोग का स्तर आय एवं रोजगार के स्तर को निर्धारित करता है। विनियोग अल्पकाल में पूँजी की सीमान्त उत्पादकता (Marginal Efficiency of Capital) पर निर्भर है। अल्पकाल में पूँजी की सीमान्त उत्पादकता सम्भाव्य प्राप्ति (Prospective Vield) पर निर्भर करती है।

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व्यापार चक्र की अवस्थाओं की व्याख्या (Explanation of Stages of Business Cycle)

  1. समृद्धि काल (Prosperity) – जब ब्याज की दर की तुलना में पूँजी की सीमान्त उत्पादकता अधिक होती है तब ऐसी दशा में अर्थव्यवस्था में विनियोग दर में पर्याप्त वृद्धि होती है। विनियोग की बढ़ती दर से अर्थव्यवस्था में रोजगार और आय स्तरों में तात्कालिक वृद्धि होती है। गुणक का प्रभाव अर्थव्यवस्था को समृद्धि काल अथवा तेजी की स्थिति में पहुंचा देता है।
  2. प्रतिसार एवं मन्दी (Recession and Depression) – समृद्धि काल में जब पूँजी की सीमान्त उत्पादकता बढ़ती चली जाती है और उद्यमी विनियोग बढ़ाकर नए-नए उद्यम स्थापित करता चला जाता है तब इस संचयी एवं सतत् क्रिया का परिणाम यह होता है कि अर्थव्यवस्था में तेजी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाती है। तेजी की इस अवस्था में दो प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं|

(i) उत्पत्ति साधनों एवं कच्चे माल की सीमितता के परिणामस्वरूप उत्पादन लागते बढ़ना आरम्भ कर देती हैं जिसे सम्भाव्य प्राप्तियों (Prospective Yields) में कमी होती है और पूँजी की सीमान्त उत्पादकता घटने लगती है।

(ii) तीव्र विनियोग दर एवं आर्थिक क्रियाओं के कारण बाजार में वस्तुओं की पूर्ति अधिक हो जाती है। फलस्वरूप उत्पादकों की लाभ प्रत्याशाएँ धूमिल होने लगती हैं।

  1. पुनरुद्धार (Recovery) – कालान्तर तक पूँजीगत परिसम्पत्तियों का प्रयोग होने के कारण उनमें टूट-फूट। घिसावट होने लगती है तथा उनका प्रतिस्थापन करना पड़ता है। इससे पूँजीगत वस्तुओं जैसे मशीन, औजार एवं उपकरण की माँग में वृद्धि होती है। इसके फलस्वरूप विनियोग प्रोत्साहित होता है तथा रोजगार, आय एवं उपभोग में वृद्धि होती है। पुनः संचयी क्रम में विनियोग क्रियाएँ रोजगार, आय एवं उपभोग स्तरों में वृद्धि करके अर्थव्यवस्था को पुनरुद्धार की अवस्था में पहुँचा देती है।

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