Bcom Business Management Corporate Planning and Environment Analysis Notes

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Bcom Business Management Corporate Planning and Environment Analysis Notes
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निगमीय नियोजन तथा वातावरण विश्लेषण [Corporate Planning and Environment Analysis]

प्रश्न 17, निगमीय नियोजन से क्या आशय है ? निगमीय नियोजन के लाभ एवं सीमाएँ बताइये।

उत्तर-

निगमीय नियोजन का अर्थ एवं परिभाषा (MEANING AND DEFINITION OF CORPORATE PLANNING)

सरल शब्दों में, निगमीय नियोजन से आशय ऐसी योजनाओं से है जो किसी कम्पनी के विकास एवं विस्तार के लिए स्वयं उद्योगपतियों अथवा उच्च प्रबन्ध द्वारा दीर्घकालीन रणनीति के आधार पर बनाई जाती हैं। वस्तुत: निगमीय नियोजन दीर्घकालीन समयावधि का होता है। निगमीय नियोजन की मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

1, पीटर एफ० ड्रकर के अनुसार, “निगम नियोजन, सर्वोत्तम सम्भव भावी ज्ञान के आधार पर क्रमबद्ध रूप में साहसिक निर्णय करने, उन निर्णयों को लागू करने के लिए आवश्यक प्रयासों को क्रमबद्ध रूप में संगठित करने तथा संगठित क्रमबद्ध फीडबैक द्वारा लक्ष्यों के विरुद्ध परिणामों को मापने की एक सतत् प्रक्रिया है।”

2, स्टेनर के अनुसार, “निगमीय नियोजन एक संगठन के मुख्य लक्ष्यों तथा उन नीतियों एवं व्यूह रचनाओं का निर्धारण करने की प्रक्रिया है जो उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संसाधनों की प्राप्ति, उपयोग तथा निस्तारण को नियन्त्रित करती है।”

निगमीय नियोजन के लक्षण/विशेषताएँ (CHARACTERISTICS OF CORPORATE PLANNING)

1, व्यवस्थित प्रक्रिया- निगमीय नियोजन कम्पनी के दीर्घकालीन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संसाधनों की प्राप्ति, उपयोग तथा निस्तारण की व्यवस्थित प्रक्रिया है।

2, सतत् प्रक्रिया- बाह्य एवं आन्तरिक परिवर्तनों के अनुरूप निगमीय नियोजन में सुधार एवं संशोधन का कार्य सदैव चलता रहता है।

3, विस्तृत कार्य-योजनायह कम्पनी की मास्टर योजना होती है। समस्त कार्यात्मक योजनाएँ इसी से तैयार की जाती हैं।

4, दीर्घकालीन दृष्टि- निगमीय नियोजन दीर्घकालीन दृष्टि का अनुसरण करता है।

5, उच्च प्रबन्ध अथवा उद्योगपति द्वारा निर्माण- निगमीय नियोजन का निर्माण स्वयं उद्योगपतियों द्वारा अथवा उच्च प्रबन्ध द्वारा किया जाता है।

6, दूरगामी प्रभावों एवं चुनौतियों का पूर्वानुमान- निगमीय नियोजन के अन्तर्गत दूरगामी प्रभावों एवं चुनौतियों का पूर्वानुमान करके कम्पनी की क्षमताओं एवं संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर बल दिया जाता है।

7, रणनीतिक नियोजन एवं परिचालन नियोजन दोनों का समावेशयह उपक्रम की रणनीतिक योजना को अल्पकालीन परिचालन योजनाओं से एकीकृत करती है। रणनीतिक नियोजन का लक्ष्य अपनी विलक्षण आन्तरिक क्षमताओं व बाह्य अवसरों का उपयोग करते हुए अपनी ‘प्रतियोगी शक्ति’ को मजबूत करना है, जबकि संचालकीय योजनाएँ; जैसे—उत्पादन योजना, विपणन योजना, वित्त योजना आदि रणनीतिक नियोजन को कार्यान्वित करने के लिए तैयार की जाती हैं।

निगमीय नियोजन के लाभ (Advantages of Corporate Planning) – निगमीय नियोजन के निम्नलिखित प्रमुख लाभ हैं –

1, निगमीय नियोजन कम्पनी को एक दिशा एवं लक्ष्य-बोध प्रदान करता है। 2, निगमीय नियोजन दीर्घकालीन समस्याओं पर गहनता से ध्यान केन्द्रित करता

3 निगमीय नियोजन के माध्यम से जिस पर्यावरण में सम्बन्धित कम्पनी संचालित होगी, उक्त पर्यावरण की पूर्व जानकारी प्राप्त हो जाती है।

4, निगमीय नियोजन के द्वारा जोखिम व परिवर्तनों का प्रभावपूर्ण प्रबन्ध करके गम्भीर सकटो से बचा जा सकता है।

5, पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति एवं अपने बचाव के लिए मोर्चाबन्दी करने में सहायता मिलती है।

6, बाह्य चुनौतियों, खतरों एव अनिश्चितताओं के विरुद्ध सुरक्षा प्राप्त की जा सकती है।

7, निगमीय नियोजन के द्वारा भौतिक एवं मानवीय संसाधनों का प्रभावी उपयोग साभव होता है।

8, संस्था के कार्य-कलापो की गति में वृद्धि होती है।

9, निगमीय नियोजन के माध्यम से कम्पनी की नीतियाँ अधिक अर्थपूर्ण बन ३ जाती है एवं उचित प्रबन्धकीय नियन्त्रण सुनिश्चित हो जाता है।

निगमीय नियोजन के दोष व बाधाएँ (OBSTACLES OF CORPORATE PLANNING)

1, बन्द कमरों में तैयार किया गया निगमीय नियोजन व्यावहारिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं होता।

2, तीव्र परिवर्तनों एवं गतिशील वातावरण के साथ निगमीय नियोजन को समायोजित करना कठिन होता है।

3, बदलती हुई सरकारी नीतियाँ व कानून भी निगमीय नियोजन में बाधा उत्पन्न करते हैं।

4, भावी प्रतिस्पर्धा का पूर्वानुमान कठिन होता है।

भारत में निगमीय योजनाओं का क्रियान्वयनहमारे देश में निगमीय ते योजनाओं को क्रियान्वित करने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन ब समस्याओं को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है—(1) योजना की । कमियाँ, एवं (2) संस्था के बाहरी वातावरण में समय-समय पर होने वाले तीव्र परिवर्तन। इस सन्दर्भ में डी० एम० कोहली का यह कथन उल्लेखनीय है कि भारत में निगमीय योजनाएँ प्रथम तो इसलिए असफल होती हैं कि उन्हें आधुनिक विधियों से । प्रारम्भ न किया जाकर परम्परागत विधियों से प्रारम्भ किया जाता है और दूसरे उनके। उद्देश्य वास्तविकता से कहीं ऊँचे निर्धारित किए जाते हैं। दीर्घकालीन योजना तैयार करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि अल्पकालीन योजनाएँ जा दीर्घकालीन योजनाओं का ही अंग हैं, किस प्रकार लागू की जा सकती हैं।

प्रश्न 18, वातावरणीय विश्लेषण से क्या आशय है ? वातावरणीय विश्लेषण की स्वोट (SWOT) तकनीक को समझाइये।

उत्तर

व्यावसायिक वातावरण/पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषा (MEANING AND DEFINITION OF BUSINESS ENVIRONMENT)

व्यवसाय किसी रिक्तता (vacuum) में संचालित नहीं किया जाता, वरन् समाज के अन्तर्गत कार्यशील विभिन्न शक्तियों, दशाओं एवं तत्त्वों की अनुक्रिया (in response to) में किया जाता है। ये वातावरण की वास्तविकताएँ (environmental realities) व्यवसाय के संचालन एवं प्रगति को प्रभावित करती रहती हैं। अत: गोग व्यावसायिक निर्णय-कर्ताओं को सदैव वातावरण के प्रभावों को स्वीकार करके अपनी योजनाएँ बनानी चाहिएँ।

विलियम ग्लूक एवं जॉक के अनुसार, “पर्यावरण में फर्म के बाहर के घटक बन सम्मिलित किए जाते हैं, जो फर्म के लिए लगातार अवसर तथा खतरे उत्पन्न करते हैं। इनमें सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी एवं राजनीतिक दशाएँ प्रमुख हैं।”

रेनचे और सोहेल के अनुसार, “व्यावसायिक पर्यावरण में उन सभी तत्त्वों को शामिल किया जाता है जो परिवर्तनशील हैं तथा जो व्यवसाय को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मग रूप से प्रभावित करते हैं।”

रिचमैन एवं कोपेन के अनुसार, “वातावरण में दबाव एवं नियन्त्रण होते हैं + जो अधिकांशतः वैयक्तिक फर्म एवं इसके प्रबन्धकों के नियन्त्रण के बाहर होते हैं।”

स्वोट विश्लेषण तकनीक (SWOT Analysis Technique)

स्वोट-विश्लेषण का प्रयोग किसी व्यवसाय के आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण को समझने के लिए किया जाता है। इससे संस्था को अपनी संगठनात्मक रणनीति रोच तैयार करने में सहायता मिलती है। SWOT अंग्रेजी भाषा के चार शब्दों से मिलकर कुन बना है जिनका अर्थ है—S (Strength) शक्ति तथा क्षमता, W (Weaknesses) दुर्बलता, कमजोरी, O (Opportunities) अवसर, T (Threats) समस्याएँ, चुनौतियाँ।

इससे संस्था को ऐसी रणनीति तैयार करने में मदद मिलती है जिससे वह रह अपनी शक्तियों का प्रयोग करके व्यावसायिक अवसरों का अधिकतम लाभ उठा है सकती है तथा व्यवसाय की दुर्बलताओं को न्यूनतम करके चुनौतियों का सामना कर ॐ सकती है। वस्तुत: आधुनिक युग में व्यवसायी को प्रतिस्पर्धा के वातावरण में कार्य पार करना पड़ता है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने तथा अपनी संस्था को प्रगति की तरफ ले जाने के लिये प्रबन्धकों को व्यावसायिक, वातावरण की जानकारी होना अत्यन्त आवश्यक है। SWOT विश्लेषण की सहायता से संस्था ऐसी सूचनाएँ प्राप्त करती है जो उसे संस्था के संसाधन एवं क्षमताओं की जानकारी प्रदान करती है।

स्वोट विश्लेषण के अंग (COMPONENTS OF SWOT ANALYSIS)

स्वोट विश्लेषण के प्रमुख अंग निम्नांकित प्रकार हैं –

1, क्षमताएँ (Strength)— किसी भी व्यावसायिक संस्था की शक्ति उसके संसाधन, क्षमताओं तथा उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है। ये तत्त्व उसे प्रतिद्वन्द्व व्यवसाय से अधिक लाभ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिये, श्रेष्ठ अनुसंधा, सुविधाएँ तथा विकास की अधिकतम संभावनाएँ उस व्यवसाय की क्षमताएँ कहलात हैं। इन क्षमताओं के आधार पर अन्य व्यवसायों से प्रतिस्पर्धा की जा सकती है तथ

अधिक लाभ कमाया जा सकता है।

2, दुर्बलताएँ (Weaknesses)— व्यावसायिक उपक्रम में संसाधनों एक क्षमताओं की कमी ही उसकी कमजोरी बन जाती है। प्रत्येक व्यवसाय की कुछ सीमाएं होती हैं जो उसकी दुर्बलता का कारण बनती हैं; जैसे—कच्चे माल के लिये दूसरे व्यापारियों पर निर्भर रहना आदि। ये दुर्बलताएँ व्यवसायी के कार्य की सीमा निश्चित कर देती हैं तथा कभी-कभी इनके कारण व्यवसाय को हानि भी उठानी पड़ती है।

3, अवसर (Opportunities)- व्यवसाय में अनुकूल परिस्थितियों के विद्यमानता ही अवसर कहलाती है। संस्था का बाहरी वातावरण उसके लिए लाभ एव विकास के नए-नए अवसर प्रदान करता रहता है। इन अवसरों का लाभ उठाकर व्यवसाय अपने लाभ में वृद्धि कर सकता है। उदाहरण के लिए बाजार में नवीन माँग का विकसित हो जाना, निर्यात बाजार उपलब्ध होना, व्यापारिक प्रतिबन्धों में ढ़ील आदि व्यवसाय को लाभ एवं विकास के नए अवसर प्रदान करते हैं।

4, चुनौतियाँ (Threats)- बाहरी वातावरण जहाँ व्यवसाय को विकास के अवसर प्रदान करता है, वहीं उसके कारण उसे बहुत-सी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। बाह्य वातावरण में विद्यमान विपरीत परिस्थितियाँ व्यवसाय के सामने अनेक समस्याएँ एवं चुनौतियाँ खड़ी कर देती हैं। नए प्रतिद्वन्द्वियों का प्रवेश, सरकारी नीतियों में प्रतिकूल परिवर्तन, मूल्य युद्ध, उपभोक्ताओं की रुचि में परिवर्तन, व्यापारिक प्रतिबन्ध आदि ऐसी चुनौतियाँ हैं जिनका व्यवसाय को सामना करना पड़ता

अतः स्पष्ट है कि स्वोट विश्लेषण व्यवसाय के वातावरण को समझने तथा नीतिगत निर्णय लेने के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि SWOT विश्लेषण के विभिन्न तत्त्वों का सही तरीके से नियोजन किया जाए तथा एक उचित बाजार रणनीति तय की जाए तो निश्चित रूप से संस्था को अच्छी सफलता प्राप्त हो सकती है।

प्रश्न 19, रणनीति या व्यूह रचना (Strategy) से आप क्या समझते हैं ? व्यह रचना में उठाये जाने वाले कदमों को समझाइये।

उत्तर-

व्यूह-रचना का अर्थ एवं परिभाषा (MEANING AND DEFINITION OF STRATEGY)

व्यूहरचना की अवधारणा काफी प्राचीन है। मूलत: यह ग्रीक भाषा के शब्द ‘Strategia’ से आया है जिसका सम्बन्ध सेना के जनरल द्वारा अपनायी गयी रणनीति रूपी कला (Generalship— the actual direction of military force) से है।

इस प्रकार कार्यनीति/मोर्चाबन्दी/व्यूह रचना अथवा दाँवपेच (Strategy) शब्द प्रारम्भ में युद्ध के क्षेत्र में शत्र की सेना को पराजित करने के लिए अपनी रणनीति निर्धारित करने के लिए प्रयोग किया जाता था। समय के बदलाव तथा व्यावसायिक जटिलताओं में वृद्धि के साथ व्यावसायिक जगत में भी प्रतिद्वन्द्वी व्यावसायियों की कार्यनीतियों व क्रियाओं का अध्ययन करके उन्हें बाजार में हराकर अपने उत्पाद को बेचने तथा बाजार में जमने के लिए ‘व्यूहरचना’ (strategy) शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। आधुनिक व्यवसाय में ‘व्यूहरचना’ एक लोकप्रिय शब्द बन चुका है जो नियोजन का एक महत्वपूर्ण भाग है। सरल शब्दों में, व्यूह-रचना का आशय यह है कि अपनी योजना बनाते समय प्रतियोगियों की योजनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए वस्तुओं का मूल्य-निर्धारण करते समय व्यवसायी को देखना चाहिए कि उसके प्रतिद्वन्द्वी व्यवसायी उसी प्रकार के समान गुण की वस्तु ,, का कितना मूल्य ले रहे हैं।

जॉच तथा गुलिक (Jauch and Glueck) के अनुसार, “व्यूहरचना एक व्यापक, एकीकृत एवं समन्वित योजना है जो फर्म के व्यूहरचनात्मक लाभों को वातावरण की चुनौतियों से जोड़ती है तथा यह सुनिश्चित करने के लिए बनायी जाती है कि उचित क्रियान्वयन के द्वारा उपक्रम के आधारभूत लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।”

मेलविन जे० स्टानफोर्ड (Melivin J, Stanford) के अनुसार, “व्यूहरचना एक ऐसा तरीका है जिसमें प्रबन्ध फर्म के संसाधनों को उसके वातावरण के भीतर उसके उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए प्रयोग हेतु चुनता है। इस प्रकार, व्यूहरचना में फर्म, इसके उद्देश्यों तथा वातावरण के मध्य बहुआयामी सम्बन्ध सम्मिलित हैं।’2

कुण्ट्ज एवं डोनेल के अनुसार, “व्यूह रचना का सम्बन्ध उन दिशा निर्देशों से है जिनमें मानव एवं भौतिक संसाधनों को, कठिनाइयों के संदर्भ में, एक चयनित उद्देश्य को प्राप्त करने की सम्भावना को अधिकतम करने के लिए लगाया एवं प्रयोग किया जाएगा।’3

निष्कर्ष-उपरोक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि व्यूह रचना एक ऐसी योजना है जो विशेष कठिन परिस्थितियों में कछ चुने हुए उद्देश्यों को अपेक्षाकृत अधिक कुशलता के साथ प्राप्त करने के लिए संस्था की समस्त कार्यवाहियों को एक दिशा देने के लिए बनाई जाती है। अन्य शब्दों में व्यूहरचना एक व्यापक एवं समग्र योजना है जो प्रतिद्वन्द्वी व्यावसायियों की कार्यनीतियों एवं क्रियाओं को ध्यान में रखकर इस प्रकार बनायी जाती है, ताकि संगउनात्मक लक्ष्यों को सुगमता एवं प्रभावी दंग से उपक्रम के हित में प्राप्त किया जा सके।

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व्यूह-रचना का प्रतिपादन (FORMULATION OF STRATEGY)

व्यूह-रचना का प्रतिपादन विशिष्ट परिस्थितियों का लाभ उठाने अथवा विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए किया जाता है। सामान्यतया कम्पनी की व्यूह-रचना के प्रतिपादन हेतु निम्नलिखित कदम उठाये जाते हैं

1, व्यूहरचनात्मक उद्देश्यों का निर्धारण (Determination of Strategic Objectives)— व्यूह-रचना प्रतिपादन हेतु सर्वप्रथम हमें व्यूहरचनात्मक उद्देश्यों को निर्धारित करना होगा। हमें यह पता होना चाहिए कि व्यूह-रचना का प्रतिपादन किस लक्ष्य या लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाना है, क्योंकि जब तक हमें निश्चित लक्ष्य की ही जानकारी नहीं होगी, तब तक हम व्यूह-रचना का प्रतिपादन कैसे करेंगे।

2, बाह्य वातावरण का विश्लेषण (Analysis of External Environment) – बाह्य वातावरण में संगठन के बाहर के उन सब घटकों को सम्मिलित किया जाता है जो संगठन के लिए अवसर तथा चुनौतियों (Opportunities and threats) प्रस्तुत करते हैं। व्यूह-रचना का प्रतिपादन करने हेतु इन चुनौतियों एवं अवसरों का विश्लेषण अत्यन्त आवश्यक है।

3, फर्म की कमजोरियों एवं शक्ति का विश्लेषण (Analysis of the Weaknesses and Strengths of the Firm)— व्यूह-रचना प्रतिपादन के लिए सम्बन्धित फर्म की कमजोरियों एवं शक्ति का विश्लेषण करना भी जरूरी है। हमारे संगठन में जो कमजोरियाँ हैं, उन्हें दूर करने के लिए उचित प्रयास करने होंगे।

4, व्यूह-रचना का प्रतिपादन (Formulation of Strategy)- जब प्रबन्धकों को सभी परिस्थितियों, आन्तरिक शक्तियों एवं कमजोरियों तथा उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की स्पष्ट एवं पूर्ण रूप से जानकारी हो जाती है तभी व्यूह-रचना का प्रतिपादन करना चाहिए। व्यूह-रचना प्रतिपादित करने से पहले हमें वैकल्पिक कार्य-नीति का विकास करना चाहिए और उनका मूल्यांकन करने के बाद जो उनमें से अधिक ठीक एवं लाभदायक होती हैं, उनको अपनाने का निर्णय करना चाहिए।

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