Bcom 2nd Year Principles of Business Management Short Answer Questions Notes

Bcom 2nd Year Principles of Business Management Short Answer Questions Notes

Bcom 2nd Year Principles of Business Management Short Answer Questions Notes:- This post uploaded by sachin daksh. and in this post we share you bcom question paper First year. and all the question solution in this site you can find easily. if you can not able to find solution and all subject notes you can give a comment in comment box. and please share this post of your friends.learn and read this post and comment your feels and sand me. Principles of Business Management

 

Bcom 2nd Year Principles of Business Management Short Answer Questions Notes
Bcom 2nd Year Principles of Business Management Short Answer Questions Notes

 

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

प्रश्न 1, प्रबन्ध एक प्रक्रिया है, समझाइये।

उत्तर- प्रक्रिया के रूप में प्रबन्ध का अर्थ उन समस्त प्रबन्धकीय कार्यों, जैसे—नियोजन, संगठन, अभिप्रेरणा तथा नियन्त्रण से है जो निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं। सरल शब्दों में ‘प्रबन्ध’ एक सतत् प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न प्रबन्धकीय कार्यों का प्रयोग कार्यरत वर्ग के मानवीय प्रयासों, प्रसाधनों, मशीनों, कार्य-पद्धति व मुद्रा के श्रेष्ठतम उपयोग में किया जाता है, ताकि पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। यह ध्यान रखें कि विभिन्न कार्यों का प्रयोग एक निश्चित क्रम में ही किया जाता है। कोई एक कार्य अलग से नहीं किया जा सकता। सभी कार्य क्रमानुसार समन्वित ढंग से एक प्रक्रिया के रूप में किये जाते हैं।

प्रश्न 2, “प्रबन्ध लोगों का विकास है न कि वस्तुओं का निर्देशन” स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- इस अवधारणा के प्रमुख प्रवर्तक लारेंस ए० एप्पले हैं, जिन्होंने प्रबन्ध के क्षेत्र में मानव तत्त्व को सर्वोच्च स्थान दिया है और भौतिक साधनों के निर्देशन को इसके क्षेत्र से दूर रखा है। वास्तव में साधन मानव के लिए होते हैं, न कि मानव साधन के लिए। यदि प्रबन्ध की तकनीक के माध्यम से मानव का पूर। विकास किया जाये एवं ऐसे विकसित मानव अपनी पूर्ण क्षमता के साथ निष्ठापूर्वक कार्य करें, तो निश्चित ही उत्पादकता में वृद्धि होगी। यह सामान्य अनुभव की बात है कि यदि मनुष्य पूर्ण क्षमता के साथ कार्य करता है, तो समस्त भौतिक साधन भी पूर्ण क्षमता के साथ कार्य करेंगे, क्योंकि कम्प्यूटर जैसे उन्नत यन्त्र भी मनुष्य की सक्रियता पर निर्भर करते हैं। मनुष्यों के विकास में ही कारखाने या उद्योग का विकास छिपा रहता है। इसी तथ्य के आधार पर एक बार एक अमरीकन कारपोरेशन के अध्यक्ष ने अपने कर्त्तव्यों को बताते हुए कहा था, “हम मोटरें, हवाई जहाज, फ्रीज, रेडियो या जूतों के फीते नहीं बनाते; हम बनाते हैं मनुष्य और मनुष्य इन वस्तुओं का निर्माण करते हैं।”

अतः स्पष्ट है कि ‘प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है। एप्पले ने प्रबन्ध को कार्मिक (या सेविवर्गीय) प्रशासन की संज्ञा दी है, क्योंकि सेविवर्गीय प्रशासन के द्वारा ही मनुष्यों का विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 3, “प्रबन्ध एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है”, समझाइये।

उत्तर- इस अवधारणा के प्रवर्तक हेनरी फेयोल हैं। उनके मतानुसार प्रबन्ध एक सार्वभौमिक क्रिया है जो प्रत्येक संस्था में, चाहे वह आर्थिक हो या सामाजिक, धार्मिक हो या राजनैतिक, पारिवारिक हो या व्यावसायिक, समान रूप से सम्पन्न की जाती है। प्रबन्ध सिर्फ व्यवसाय के लिए ही नहीं बल्कि समस्त प्रकार की संगठित क्रयाओं के लिए सामान्य जरूरत है। लारेंस ए० एप्पले के अनुसार, “जो प्रबन्ध कर सकता है वह किसी का भी प्रबन्ध कर सकता है।” प्रबन्ध के सिद्धान्त सार्वभौमिक हैं जो सरल व्यक्तिगत कार्यों से लेकर बहुराष्ट्रीय निगमों पर लागू होते हैं।

प्रश्न 4, प्रबन्ध, प्रशासन तथा संगठन में अन्तर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- प्रबन्ध, प्रशासन एवं संगठन के अन्तर को निम्नलिखित तालिका की सहायता से सहज ही समझा जा सकता है –

अन्तर का आधारप्रबन्ध प्रशासन संगठन
1, अर्थप्रबन्ध एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा संगठन के माध्यम से पूर्व-निर्धारित उदेश्यों को प्राप्त किया जाता है |प्रशासन एक विचार करने की क्रिया है जिसके अन्तर्गत उदेश्य एवं नितियों का निर्धारण होता है |एक प्रभावी तन्त्र है जो प्रबन्ध के निर्देशन में प्रशासन द्वारा निर्धारित नीतियों को क्रियान्वित रूप देता है |
2, क्षेत्र इसका क्षेत्र नीतियों के क्रियान्वयन तक सीमित है |इसका क्षेत्र व्यापक है, क्योकि व्यवसाय के समग्र नियंत्रण का दायित्त्व इसी पर होता है |इसका क्षेत्र संकुचित है | यह नीतियों को व्यावहारिक रूप प्रदान करता है |
3, दायित्त्वव्यवसाय के सम्पूर्ण प्रबन्ध संचालन का दायित्व इस पर होता है |इसका दायित्त्व व्यवसाय के लिए पूँजी प्रदान करना एवं नितिन निर्माण करना है |इसका दायित्त्व प्रबन्ध व प्रशासन के मध्य समन्वय स्थापित करना होता है |
4, क्रम व्यवस्था प्रबन्ध व्यव्स्य्हा के क्रम में इसका स्थान मध्य का है |प्रबन्ध व्यवस्था के क्रम में इसका स्थान उच्च स्तर का है |प्रबन्धकीय स्तर के अन्तर्गत इसका स्थान निम्न है |
5, नीतियों के सम्बन्ध मेंप्रशासन द्वारा निर्धारित नीतियों को क्रियान्वित कराता है |यहाँ नीतियों का निर्माण करता है |यह नीतियों को क्रियान्वित रूप देता है |
6, शारीरिक रूप मेंइसे संस्था की आत्मा माना जाता है |यहाँ संस्था का मस्तिष्क होता है |यहाँ संस्था रूपी शरीर की रक्त नाड़ियाँ है |

 

प्रश्न 5, क्या प्रबन्ध एक पेशा है?

उत्तर- पेशा विशिष्ट ज्ञान पर आधारित वह धन्धा है जिसे विकसित और नियमित करने के लिए एक प्रतिनिधि संस्था की आवश्यकता होती है। यह प्रतिनिधि संस्था लोगों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करती है और अपने से सम्बद्ध संस्थाओं के लिए एक आचार संहिता बनाती है। हॉज एवं जान्सन के शब्दों में, “पेशा एक व्यवसाय है जिसके लिए कुछ विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है जिसे समरूपता की उच्च डिग्री द्वारा समाज के एक सम्बन्धित वर्ग की सेवा के लिए प्रयोग किया जाता है। प्राचीन काल में यह मान्यता थी कि प्रबन्धक बनाए नहीं जा सकते व ता पदा होते हैं, परन्तु आज प्रबन्ध एक प्रोफेशन या पेशा है और प्रबन्धक वे पेशेवर व्यक्ति है

जो प्रबन्ध-कार्य को करते हैं। प्रबन्ध एक अपूर्ण, किन्तु विकासोन्मुख पेशा है। प्रबन्ध को पूर्ण पेशा मानने में कुछ कठिनाइयाँ हैं। जैसे प्रबन्ध के क्षेत्र में कुछ खास डिग्री धारकों के प्रवेश की बाध्यता नहीं है, बहुत से प्रबन्धकों की स्वायत्तता और ईमानदारी पर संदेह किया जाता है, प्रबन्धकों पर औपचारिक रूप से कोई नैतिक आचार-संहिता लागू नहीं होती है। प्रबन्ध आंशिक रूप से पेशा माना जाता है और अनवरत पेशा बनता जा रहा है। जैसे-जैसे तीव्र आर्थिक प्रगति, कम्पनी का चलन, स्वामित्व व प्रबन्ध में अलगाव होगा, प्रबन्ध को एक प्रतिष्ठित पेशे के रूप में स्वीकृति मिलेगी। हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रबन्ध विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष लोवेल (Lovell) के अनुसार, “प्रबन्ध सबसे बूढ़ी कला और सबसे जवान पेशा है।”

प्रश्न 6, प्रबन्ध कला है अथवा विज्ञान अथवा दोनों। स्पष्ट कीजिये।

उत्तर प्रबन्ध कला भी है और विज्ञान भी। प्रबन्ध जहाँ विज्ञान के रूप में सिद्धान्तों एवं नियमों का प्रतिपादन करता है वहाँ कला हमें इन सिद्धान्तों एवं नियमों को व्यावहारिक रूप में प्रयोग करना बताती है। एक कुशल प्रबन्धक के लिए दोनों ही पक्ष (विज्ञान एवं कला) उसी प्रकार आवश्यक हैं जिस प्रकार एक चिकित्सक के लिए सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों का ज्ञान आवश्यक होता है। कला और विज्ञान दोनों ही प्रबन्ध को पूर्णता देने का कार्य करते हैं और एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। स्टेनले टेली के अनुसार, “वर्तमान में प्रबन्ध 10 प्रतिशत विज्ञान तथा 90 प्रतिशत कला है। आधुनिक युग में विज्ञान दिन-प्रतिदिन विकास पर है। प्रबन्ध में अगली पीढ़ी तक विज्ञान 20 प्रतिशत और कला 80 प्रतिशत ही रह जायेगी।” राबर्ट एन० हिलकर्ट के अनुसार, “प्रबन्ध क्षेत्र में कला एवं विज्ञान दोनों एक ही सिक्के के पहलू है।” इस तरह व्यवहार रूप में प्रबन्ध एक कला है और इस व्यवहार को समुन्नत बनाने के लिए संगठित व तर्कसंगत ज्ञान को आधार बनाना विज्ञान का परिचायक है। प्रबन्ध एक प्राचीनतम कला और नवीनतम विज्ञान है।

प्रश्न 7, प्रबन्ध के स्वामियों, कर्मचारियों तथा ग्राहकों के प्रति क्या उत्तरदायित्व हैं ?

उत्तर- 1, स्वामियों के प्रति उत्तरदायित्व (Towards Owner)- स्वामियों के प्रति प्रबन्ध के निम्नलिखित उत्तरदायित्व हैं

(i) विनियोजित पूँजी की सुरक्षा करना;

(ii) विनियोजित पूँजी का सही कार्यों में प्रयोग करना;

(iii) विनियोजित पूँजी पर उचित लाभांश देना;

(iv), स्वामियों को व्यवसाय के सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी देना।

2, कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व (Towards Employees)- कर्मचारियों के प्रति प्रबन्ध के निम्नलिखित उत्तरदायित्व हैं

(i) कर्मचारियों की न्यायपूर्ण नियुक्ति एवं उनकी रुचि व योग्यता के अनुसार उन्हें कार्य सौंपना,

(ii) कर्मचारियों के लिए आवश्यकतानुसार प्रशिक्षण की व्यवस्था करना;

(iii) कर्मचारियों को कार्य के अनुकूल वातावरण प्रदान करना;

(iv) कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर प्रदान करना;

(v) कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक प्रदान करना एवं उसके अतिरिक्त अन्य लाभ एवं सुविधाएँ प्रदान करना, आदि।

3, ग्राहकों या उपभोक्ताओं के प्रति उत्तरदायित्व (Towards Customers or Consumers)- ग्राहकों या उपभोक्ताओं के प्रति प्रबन्ध के निम्नलिखित उत्तरदायित्व है-

(i) उपभोक्ताओं को वस्तु की किस्म एवं गुण के सम्बन्ध में सम्पूर्ण जानकारी देना,

(ii) ग्राहकों को कम मूल्य पर श्रेष्ठ एवं प्रमाणित वस्तुएँ प्रदान करना,

(iii) समाज के सभी वर्गों की रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन करना,

(iv) उपभोक्ताओं की शिकायतों एवं परामर्श को ध्यान में रखकर उत्पादन कार्य में सुधार करना,

(v) अच्छी किस्म की वस्तुएँ ग्राहकों को कम मूल्य पर उपलब्ध कराना,

(vi) ग्राहकों को माल वापसी की सुविधाएँ प्रदान करना।

प्रश्न 8, आधुनिक औद्योगिक युग में प्रबन्ध का क्या महत्व है?

उत्तर- व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रबन्ध अपने कुशल नियोजन, संगठन, नियन्त्रण, समन्वय, अभिप्रेरण तथा गतिशील नेतृत्व के द्वारा संस्था के साधनों का अधिकतम व मितव्ययी उपयोग करने में समर्थ होता है। इसमें संस्था और प्रबन्ध दोनों की ही सफलता निहित है। व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रबन्ध का महत्त्व वास्तव में इसकी रचनात्मक शक्ति (Creative Force) के कारण है। रचनात्मक शक्ति से आशय कम प्रयत्नों के द्वारा अधिकतम परिणाम प्राप्त करने से है। प्रबन्ध के द्वारा कार्य करने वाले समूह में कार्य करने के लिए प्रेरणाएँ दी जाती हैं एवं उनके प्रयासों को इस प्रकार समन्वित किया जाता है जिससे कि ज्यादा अच्छे परिणामों की प्राप्ति हो सके। इसके द्वारा शक्तिशाली केन्द्रों पर अधिक ध्यान दिया जाता है, कमजोर कड़ियों को मजबूत किया जाता है एवं समस्याओं और कठिनाइयों को दूर करके सामूहिक भावना जागृत की जाती है। इस प्रकार प्रबन्ध उपलब्ध साधनों के अधिकतम एवं मितव्ययी प्रयोग से अधिकतम परिणाम प्राप्त करने के लिए भरसक प्रयत्न करता है। इसी सन्दर्भ में उर्विक एवं बीच ने कहा है कि “कोई भी दर्शनवाद या राजनैतिक सिद्धान्त मानवीय एवं भौतिक साधनों के सम्मिश्रण से न्यूनतम प्रयास के द्वारा अधिकतम उत्पादन सम्भव नहीं बना सकता, यह केवल योग्य प्रबन्ध के द्वारा ही सम्भव है और इस अधिकतम उत्पादन के आधार पर ही सभी के लिए उच्च जीवन स्तर, अधिक आराम एवं अधिक सुख-सुविधाओं की व्यवस्था की जा सकती है।

प्रश्न 9, प्रबन्धकीय कार्यों/प्रक्रिया की प्रकृति तथा विशेषताओं को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर-

प्रबन्धकीय कार्यों/प्रक्रिया की प्रकृति अथवा लक्षण

1, सार्वभौमिकता (Universality)- प्रबन्धकीय कार्य (नियोजन, संगठन, निर्देशन, नियंत्रण व समन्वय) समस्त संगठनों की सामान्य आवश्यकता है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, सार्वजनिक, निजी सभी क्षेत्रों में प्रबन्धकीय कार्य आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य हैं। इसी सार्वभौमिकता के कारण प्रबन्धकीय कार्य को किसी विभाग,  उपक्रम, उद्योग अथवा भौगोलिक सीमाओं में बांधकर नहीं रखा जा सकता है। प्रबन्धकीय कार्य और ज्ञान हस्तान्तरणीय होते हैं।

2, परस्पर-निर्भरता (Inter-dependence)– यद्यपि प्रबन्धकीय कार्यों को कुछ वर्गों में विभक्त किया जाता है, परन्तु वे एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। उन्हें एक-दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है और न ही एक दूसरे के बिना उनका कोई अर्थ होता है। उदाहरण के लिए, नियोजन बिना नियंत्रण के एक थोथा अभ्यास है और नियंत्रण भावी नियोजन का आधार होता है। फिर सभी कार्यों में समन्वय की आवश्यकता होती है।

3, सतत् एवं गतिशील (Continuous and Dynamic)- प्रबन्धकीय कार्य एक अन्तहीन व निरन्तर चलने वाली क्रिया है। प्रबन्धक को गतिशील घटकों के मध्य काम करना होता है, अत: स्थिर दृष्टिकोण के स्थान पर प्रावैगिक दृष्टिकोण अपना करके अनुकूल समायोजन करना पड़ता है।

प्रश्न 10, प्रतिष्ठित प्रबन्ध पद्धति की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर- इस प्रबन्ध पद्धति में औपचारिक अधिकार, संगठनात्मक उद्देश्यों, कार्य विभाजन एवं समन्वय पर बल दिया गया है। व्यवस्था एवं तर्कसंगत ढांचा इस पद्धति के आधार स्तम्भ हैं। फ्रेडरिक विन्सलो टेलर एवं हेनरी फेयोल मुख्य रूप से प्रतिष्ठित प्रबन्धशास्त्रियों में अग्रणी माने जाते हैं। प्रतिष्ठित प्रबन्ध पद्धति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1, प्रबन्ध व्यावहारिक अनुभवों का अध्ययन है।

2, व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर प्रबन्ध के सिद्धान्त विकसित किए जा सकते हैं।

3, इन सिद्धान्तों का उपयोग प्रबन्धकों के प्रशिक्षण तथा विकास में किया जा सकता है।

4, प्रबन्ध के सिद्धान्त सार्वभौमिक हैं। 5, औपचारिक संगठन एवं सम्प्रेषण प्रबन्ध के मुख्य साधन हैं।

6, कर्मचारियों को आर्थिक प्रलोभन द्वारा अभिप्रेरित किया जा सकता है तथा उन्हें अधिक परिश्रम के लिए उत्साहित किया जा सकता है।

प्रश्न 11, वैज्ञानिक प्रबन्ध से क्या तात्पर्य है?

उत्तर- सरल शब्दों में, वैज्ञानिक प्रबन्ध का अर्थ है-प्रबन्ध कार्य में । रूढ़िवादी पद्धति (Rule of Thumb Method) और भूल सुधार प्रणाली (Trial and Error Method) के स्थान पर तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करना। टेलर के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप व्यक्तियों से क्या कार्य कराना चाहते हैं और फिर यह देखना है कि वे इसको सर्वोत्तम एवं सबसे किफायती तरीके के साथ पूरा करते हैं। वैज्ञानिक प्रबन्ध वह सुव्यवस्थित प्रबन्ध है जिसमें निरीक्षण, विश्लेषण, प्रयोग तथा तर्कों का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 12, दफ्तरशाही मॉडल क्या है?

उत्तर- जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920) ने दफ्तरशाही संगठन को प्रबन्धकीय समस्याओं के निराकरण एवं व्यक्तियों के नियन्त्रण का सर्वाधिक विवेकपूर्ण साधन माना है। इस विचारधारा में औपचारिक संगठन, प्राधिकार, विशिष्टीकरण, नियमों, अव्यक्तिगत सम्बन्धों तथा प्रबन्धकों के प्रशिक्षण पर अत्यधिक बल दिया गया है। इनसे एक आदर्श संगठन के निर्माण की कल्पना की गई है, परन्तु इनसे सम्प्रेषण, पहल करने की शक्ति तथा अभिप्रेरणा में कठिनाई होती है। दफ्तरशाही विचारधारा से निर्णय में देरी, दृढ़ता (Regidity), उत्कंठा (Anxiety), आदि विकार उत्पन्न होते हैं। अतः दफ्तरशाही विचारधारा आदर्शात्मक या शैक्षणिक (Academic) अधिक और व्यावहारिक कम है।

प्रश्न 13, प्रबन्ध के व्यवहारवादी दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर- व्यवहारवादी दृष्टिकोण के क्षेत्र में योगदान करने वाले उपयुक्त विद्वानों के सिद्धान्तों ने निम्न तीन बातों पर मुख्य रूप से जोर दिया है –

1, व्यक्तिगत भिन्नताएँ (Individual Differences)- ये सिद्धान्त यह मानते हैं कि एक संगठन में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी में भावनाओं, आकांक्षाओं तथा दृष्टिकोणों के आधार पर भिन्नता पाई जाती है तथा उन्हें सही प्रकार से अभिप्रेरित करने के लिए इन भिन्नताओं की जानकारी होना आवश्यक है।

2, अनौपचारिक कार्य-समूह (Informal Work-groups)- कर्मचारियों के अनौपचारिक कार्य समूह होते हैं जिनमें कार्य करने से उन्हें सन्तुष्टि मिलती है, अत: प्रबन्ध को चाहिए कि वह औपचारिक संगठन संरचना करते समय अनौपचारिक कार्यसमूहों को ध्यान में रखें।

3, प्रबन्ध में भागीदारी (Participation in Management)- व्यवहारवादी दृष्टिकोण वाले लगभग सभी विद्वान यह मानते थे कि प्रबन्ध में श्रमिकों तथा अन्य कर्मचारियों की भागीदारी उनके अन्दर उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न करती है और इससे उनकी उत्पादकता में वृद्धि होती है। स्वयं कार्य तथा कार्य की दशाएँ भी अच्छे अभिप्रेरक माने जाते हैं।

प्रश्न 14, प्रबन्ध की सम्भाव्यता/आकस्मिकता/प्रासंगिक विचारधारा को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- यह विचारधारा प्रबन्ध सिद्धान्त का नवीनतम दृष्टिकोण है। यह विचारधारा प्रबन्ध सिद्धान्त की सार्वभौमिक प्रकृति को अस्वीकार करती है अर्थात् इस विचारधारा के अनुसार कोई भी प्रबन्धकीय सिद्धान्त या कार्य (action) ऐसा नहीं हो सकता जो कि सभी परिस्थितियों में उचित या अनकल सिद्ध हो। अनेक बार प्रबन्धकों ने अनुभव किया है कि जो सिद्धान्त अथवा तकनीक विशेष परिस्थिति में सफल हुई है वही अन्य परिस्थितियों में असफल रही है। इस प्रकार के अनुभवों ने प्रासंगिक विचारधारा (Contingency Approach) को जन्म दिया। इस विचारधारा का विकास मुख्य रूप से टॉम बर्न्स, डब्ल्यू० स्टाकर, जोन वुड़वार्ड, पाल लारेस, जे० लास्च एवं जेम्स थॉम्पसन, आदि विद्वानों ने किया है। इस विचारधारा के अनुसार प्रबन्ध पूर्व-निर्धारित अथवा ‘रेडीमेड़’ नहीं है, वरन् एक प्रबन्धक को क्या करना चाहिए यह सम्बन्धित परिस्थिति पर निर्भर करता है। अतः प्रबन्धक को वही विधि या मार्ग अपनाना चाहिए जो विद्यमान परिस्थिति में प्रासंगिक होता है अर्थात जो समय की माँग होती है। इस प्रकार इस विचारधारा के अनुसार प्रबन्धक के कार्य एवं निर्णय तत्कालीन परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 15, नियोजन एक चयनात्मक प्रक्रिया है, स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- विविध प्रबन्धविद् जैसे कुण्ट्ज एवं ओ’डोनेल, बिली ई० गोइट्ज, मेरी कुशिंग नाइल्स, एम० ई० हर्ले आदि नियोजन को मूलतः चयन प्रक्रिया के रूप में व्याख्यायित करते हैं। नियोजन के अन्तर्गत उद्देश्यों, नीतियों, कार्यविधियों, नियमों, कार्यक्रमों, रणनीतियों एवं विधियों के विविध विकल्पों में सर्वोत्तम (The Best) का चुनाव किया जाता है। व्य साय की स्थापना के उपरान्त व विपणन के सम्बन्ध में विविध किस्म के निर्णय करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त, व्यवसाय के विकास व विस्तार हेतु नवउत्पादन, विवेकीकरण, वैज्ञानिक प्रबन्ध, सरलीकरण, संविलयन, पुनर्गठन आदि के चयनात्मक निर्णय लेने होते हैं। यदि विविध विकल्प न होकर इकलौता विकल्प हो तो चुनाव अर्थात् नियोजन की जरूरत ही न रहे। साथ ही, प्रबन्धक की सफलता तो इस सर्वोत्तम के चुनाव पर ही अवलम्बित होती है। नियोजन वैकल्पिक कार्य-पथों की जानकारी के साथ ही प्रारम्भ होता है और सर्वोत्तम विकल्प के चयन और अनुगमन के साथ समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 16, पूर्वानुमान नियोजन की आधारशिला है, स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- उद्देश्य निर्धारण के उपरान्त नियोजन के आधार का निर्धारण करने के लिए पूर्वानुमान लगाए जाते हैं। पूर्वानुमान नियोजन की आधारशिला होते हैं। नियोजन एवं पूर्वानुमान का चोली-दामन का साथ होता है। पूर्वानुमान अर्थात् पूर्वदृष्टि ज्ञात तथ्यों के आधार पर भविष्य के पता लगाने का एक व्यवस्थित प्रयास होता है। हेनरी फेयोल इस पूर्वदृष्टि (Prevoyance) को नियोजन का सार तत्त्व मानते हैं। नियोजन की सफलता में पूर्वानुमान का प्रमुख योगदान होता है। भविष्य में किस प्रकार का बाजार होगा, विक्रय की मात्रा कितनी होगी, विक्रय का मूल्य क्या होगा, क्या उत्पादन किया जायेगा, उसकी लागत कितनी आयेगी, विस्तार कार्यक्रमों का वित्तीय प्रबन्ध किस प्रकार से होगा, लाभांश नीति क्या होगी इत्यादि का पूर्वानुमान करना आवश्यक हाता है। उपक्रम को तमाम बाह्य एवं आन्तरिक, भौतिक एवं अभौतिक, सामाजिक एवं आर्थिक, नियंत्रणीय एवं अनियंत्रीय घटक प्रभावित करते हैं। अत: भविष्य का पूर्वानुमान करके इन घटकों का सही अनुमान एक प्रभावपूर्ण नियोजन के लिए आवश्यक चरण होता है। पूर्वानुमान की मजबूत आधारशिला पर ही नियोजन का शक्तिशाली महल तैयार हो सकता है। हेनरी फेयोल ने ठीक ही कहा है कि, “नियोजन बहुत से पूर्वानुमानों का सम्मिश्रण है।”

प्रश्न 17, नियोजन एवं पूर्वानुमान में अन्तर कीजिये।

उत्तर- अधिकाशत: व्यक्ति नियोजन और पूर्वानुमान को समानार्थी मानकर दोनों शब्दों को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। यद्यपि दोनों ही क्रियाएँ भविष्य से सम्बन्धित हैं और भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए प्रयुक्त होती हैं, परन्तु दोनों में अन्तर है। नियोजन एक व्यापक प्रक्रिया है जिसे प्रबन्ध भविष्य की अनिश्चितताओं से लड़ने के लिए बनाता है। पूर्वानुमान नियोजन का एक औजार है जिससे प्रबन्धक यह अनुमान लगाता है कि भविष्य में क्या होगा? पूर्वानुमान नियोजन प्रक्रिया को सरल बनाता है। यदि भविष्य के बारे में पूर्वानुमान ठीक से लगा लिये जाए, तो व्यावसायिक नियोजन सुगम और सरल हो जाता है। प्रबन्ध विज्ञान के जनक हेनरी फेयोल का मत है कि ‘भविष्य को देखना’ (Preyovance) प्रबन्ध का सार है। उनके अनुसार ‘भविष्य को देखने’ में ‘भविष्य का अनुमान’ (पूर्वानुमान) और ‘भविष्य के लिए व्यवस्था करना’ (नियोजन) सम्मिलित है। यही तो पूर्वानुमान और नियोजन का अन्तर है। पूर्वानुमान भविष्य का अनुमान होती है, जबकि नियोजन भविष्य की व्यवस्था होती है। यह बात पूर्णतया सत्य है कि पूर्वानुमान ही भावी नियोजन का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। पूर्वानुमान जितने सत्य और वास्तविकता के निकट होंगे, नियोजन उतना ही अधिक प्रभावी और सफल होगा।

प्रश्न 18, प्रबन्ध में नियोजन का क्या महत्व है?

उत्तर- जिस प्रकार बिना पतवार के नाविक, बिना अध्ययन-अध्यापन के शिक्षक, बिना कलम के लेखक व बिना हथियार के सैनिक अपना कार्य सम्पन्न नहीं कर सकते, ठीक उसी प्रकार बिना नियोजन के व्यावसायिक सफलता की कामना नहीं की जा सकती। उपक्रम, चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा, चाहे उसकी क्रियाओं का क्षेत्र स्थानीय हो, प्रादेशिक हो अथवा अन्तर्राष्ट्रीय, चाहे वह निजी क्षेत्र की हो, सार्वजनिक क्षेत्र की हो अथवा मिश्रित क्षेत्र की हो, सभी के लिए नियोजन एक अपरिहार्य आवश्यकता है। नियोजन पग-पग पर व्यवसायी का मार्गदर्शन करता है, भावी कठिनाइयों एवं खतरों के प्रति सचेत करता है और उन पर विजय का मार्ग सुझाता है। कार्य सम्पादन के पूर्व नियोजन का अभाव क्रियाओं में जल्दबाजी, बेवकूफी तथा अनिश्चितता (Rashness, Imprudence, Uncertainity) का द्योतक है। न्यूमैन और समर (Newman and Summer) के शब्दों में, “एक प्रतिष्ठान बिना नियोजन के शीघ्र बिखर जायेगा, उसके कार्य उतने ही अव्यवस्थित होंगे जितने की बसन्त बयार में उड़ने वाले दिशाहीन पत्ते, और उसके कर्मचारी उसी प्रकार भ्रमित होंगे जिस प्रकार चिटियाँ अपनी उल्टी हुई वामी में होती हैं। इसी प्रकार अर्नेस्ट सी० मिलर ने लिखा है, “बिना नियोजन के कोई भी कार्य केवल निष्प्रयोजन क्रिया होगी जिससे अव्यवस्था के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त न होगा।”

प्रश्न 19, नियोजन को किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है ?

उत्तर- नियोजन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

1, नियोजन सरल एवं व्यापक होना चाहिए। सरलता होने से कर्मचारी वर्ग के लिए यह बोधगम्य होगा और व्यापक क्रियान्वयन हो सकेगा।

2, नियोजन उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए अन्यथा यह नियोजन को ही निष्फल कर

देगा। योजनाओं में उपक्रम के आधारभूत लक्ष्यों एवं आवश्यकताओं से हटकर किसी अन्य बात का समावेश नहीं किया जाना चाहिए।

3, एक प्रभावी नियोजन वह है जो मितव्ययी हो अर्थात् समय व धन कम खर्च होता रहे।

4, प्रभावी नियोजन में लोचशीलता होनी चाहिए जिससे कि परिवर्तित परिलक्षित एवं आवश्यकताओं के अनुरूप आवश्यक समायोजन किया जा सके।

5, एक प्रभावी नियोजन में सन्तुलन के लक्षण होने चाहिएँ। योजना से लाभ स्पष्ट परिवर्तित होने चाहिएँ।

6, एक प्रभावी नियोजन में स्वामी, प्रबन्धक और अधीनस्थों की सहभागिता होनी चाहिए, तभी वे क्रियान्वयन में पूर्ण सहयोग करेंगे।

7, नियोजन में भविष्यता का ध्यान रखना अति आवश्यक है। भविष्य की आवश्यकताओं, साधनों, लक्ष्यों, प्रतिस्पर्धा, बाह्य तत्त्व आदि पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 20, सामूहिक निर्णयन की डेल्फी तकनीक को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- डेल्फी तकनीक में सम्बन्धित समस्या पर सभी सम्बद्ध प्रबन्धकर्मियों से अपना विचार, सुझाव एवं मंतव्य देने के लिए कहा जाता है। तदुपरान्त दूसरों के विचार, सुझाव एवं मंतव्य, बिना उनके नाम प्रकट किए हुए, से प्रत्येक को अवगत कराया जाता है। समूह निर्णय में संलग्न प्रत्येक कर्मी से दूसरों के विचारों पर अपनी प्रतिक्रिया आमंत्रित की जाती है। डेल्फी तकनीक में समूह के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने नहीं होते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से विचारों का आदान-प्रदान करके सर्वसम्मत निर्णय लिया जाता है। इस प्रकार बिना आमने-सामने के सन्देशवाहन और पक्षपातपूर्ण रवैये के सभी निर्णायक सदस्यों के विशिष्ट ज्ञान, कौशल, योग्यता और सूचना के रूप में उनका योगदान प्राप्त किया जाता है। इस तकनीक का मुख्य दोष निर्णयन में अत्यधिक विलम्ब और सर्वसम्मति का अभाव होना है।

प्रश्न 21, निर्णयन के मानवोचित व्यवहार सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- प्रबन्धक को निर्णय लेते समय ‘मानवोचित व्यवहार का सिद्धान्त’ सदैव ध्यान में रखना चाहिए तभी वह समस्याओं का सही ढंग से विश्लेषण करके उचित समाधान खोज सकेगा। इस सिद्धान्त का स्पष्ट आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति पहले मानव है और उसके बाद कर्मचारी। मानव होने के नाते वह सामान्यतः उचित प्रकार से व्यवहार करता है तथा यह आशा करता है कि अन्य व्यक्ति भी उसके साथ मानवता का व्यवहार करेंगे। यह सही है कि मनुष्य कब कैसा व्यवहार करेगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि मनुष्यों के व्यवहार के सम्बन्ध में कोई भी व्यक्ति सही रूप से भविष्यवाणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद भी मानवोचित व्यवहार का सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि सामान्य दशाओं और यहाँ तक कि असामान्य दशाओं में भी एक व्यक्ति के व्यवहार के बारे में कुछ सीमा तक कुछ परिशुद्धता के साथ अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी योग्य व्यक्ति की उपेक्षा करके किसी अयोग्य व्यक्ति की पदोन्नति कर दी जाये अथवा कर्मचारियों के वेतन में कटौती करने एवं उनकी छंटनी करने के निर्णय लेते हैं, तो कर्मचारियों तथा श्रम संघ पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 22, निर्णयन के सीमित घटक सिद्धान्त को समझाइये।

उत्तर- यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि एक प्रबन्धक को निर्णय लेते समय सर्वप्रथम उन घटकों को जो इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति में सीमाकारी (Limiting) हैं, पहचान लेना चाहिए और तत्पश्चात् उनके समाधान हेतु आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए। साधनों की अपर्याप्तता, कर्मचारियों की सीमित कार्यकुशलता, सरकारी नीतियों का प्रबन्धन, श्रमिक संगठनों के साथ किये गये समझौते, आदि को सीमाकारी घटकों में सम्मिलित किया जा सकता है। अतः निर्णय लेते समय प्रबन्धक को इन सीमित घटकों को ध्यान में रखना चाहिए।

Principles of Business Management

प्रश्न 23, सीमित/परिबद्ध विवेकशीलता से क्या आशय है ?

उत्तर- सीमित/परिबद्ध विवेकशीलता से आशय है कि

(i) निर्णय सदैव समस्या स्थिति की प्रकृति की अपूर्ण एवं अपर्याप्त समझ पर आधारित होंगे।

(ii) समस्त सम्भावित वैकल्पिक समाधानों की खोज सम्भव नहीं हो सकेगी।

(iii) विकल्पों का मूल्यांकन सदैव अपूर्ण होगा, क्योंकि प्रत्येक विकल्प के सभी सम्भावित परिणामों का पूर्वानुमान कर सकना सम्भव नहीं होता है।

(iv) अन्तिम निर्णय किसी ‘मापदण्ड पर आधारित होगा, लाभ के अधिकाधिकरण पर नहीं, क्योंकि यह निर्धारण करना असम्भव होता है कि कौन-सा विकल्प ‘श्रेष्ठ’ है। हरबर्ट साइमन के अनुसार, हमारा वास्तविक निर्णयन व्यवहार उतना विवेकपूर्ण नहीं होता है जितना हम मान लेते हैं।

Principles of Business Management

प्रश्न 24, उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध से क्या आशय है ?

उत्तर- समस्त प्रबन्धकीय क्रियाओं को उद्देश्योन्मुख बनाना ही ‘उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध’ कहलाता है। प्रबन्धन की यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें कार्यों व क्रियाओं के बजाय सुपरिभाषित उद्देश्यों की पूर्ति पर प्रकाश डाला जाता है। यह तकनीक उपक्रमों में प्रत्येक प्रबन्धक का ध्यान और प्रयास समग्र संगठनात्मक उद्देश्यों की ओर निर्देशित करती है। प्रत्येक प्रबन्धक यह जानता है कि उसका संगठन में क्या अस्तित्व है, वह संगठन में किस लिए है, संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति में वह कैसे योगदान देगा, और उससे किन परिणामों की अपेक्षा की जाती है। उच्चाधिकारी भी यह भली-भाँति जानते हैं कि वह अधीनस्थों से क्या अपेक्षा रखते हैं तथा किन मापदण्डों पर उनका मूल्यांकन किया जायेगा। पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों से विचलनों की पहचान की जाती है और सुधारात्मक कदम उठाये जाते हैं।

Principles of Business Management

प्रश्न 25, ‘उद्देश्यों द्वारा प्रबन्धके प्रमुख उद्देश्य बताइये।

उत्तर- (1) अधीनस्थों की कार्यक्षमता को उद्देश्योन्मुखी बनाकर उसमें वृद्धि करना,

(2) प्रत्येक व्यक्ति के उद्देश्यों को संस्था के आधारभूत उद्देश्यों से मन्वित करना,

(3) संदेशवाहन की विधियों को उद्देश्यों के अनुसार व्यवस्थित करना,

(4) उद्देश्यों के निर्धारण द्वारा अन्तिम परिणाम प्राप्त करना,

(5) कार्य-निष्पादन का माप करना, (6) वेतन एवं पदोन्नति योग्यता के आधार पर प्रदान करना,

(7) नियन्त्रण को अधिक प्रभावशाली बनाना, एवं

(8) उद्देश्यों एवं उपलब्धियों द्वारा सभी को अभिप्रेरित करना।

Principles of Business Management

प्रश्न 26, उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव दीजिये।

उत्तर- उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध को प्रभावी बनाने हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

1, उपक्रम के उद्देश्य निश्चित, स्पष्ट व भ्रम रहित होने चाहिएँ।

2, उद्देश्य वास्तविक होने चाहिएँ अर्थात् ऐसे नहीं होने चाहिएँ जो कि आदर्श | तो हों, परन्तु प्राप्त करने योग्य न हों।

3, उद्देश्यों का निर्धारण उच्च अधिकारियों एवं अधीनस्थों को मिलकर करना चाहिएँ।

4, सदेशवाहन की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। 5, टीम भावना का विकास हर स्तर पर होना चाहिए।

6, अभिप्रेरण के लिये उपयुक्त व्यवस्था होनी चाहिए।

7, उद्देश्य तथा उसके मापदण्ड परिमाणात्मक रूप से स्पष्टतया व्यक्त किये जाने चाहिएँ।

8, कार्य निष्पादन का मूल्यांकन समय पर एवं सही ढंग से करना चाहिए।

9, समीक्षा के बाद आवश्यक संशोधन भी करना चाहिए।

10, कठिन परिश्रम एवं अनुशासन ही योजना की सफलता की कुंजी है।

Principles of Business Management

प्रश्न 27, व्यवसाय के आन्तरिक वातावरण से क्या आशय है?

उत्तर- आन्तरिक वातावरण, व्यवसाय (संस्था) की ताकत (Strength) व कमजोरियों (Weaknesses) को प्रकट करते हैं। उदाहरण के लिए यदि संस्था के कर्मचारी कुशल व योग्य हैं तो ये कर्मचारी संस्था को नई ऊँचाइयों पर ले जा सकते हैं। इसके विपरीत यदि वे सन्तुष्ट नहीं हैं तो उनका मनोबल कम होता है जिसका संगठन के निष्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यद्यपि व्यवसाय का आन्तरिक वातावरण नियन्त्रण योग्य होता है, परन्तु इसमें भी निरन्तर जटिलताएँ एवं बाधाएँ उत्पन्न होती रहती हैं। इसलिए नियोजन करते समय व्यवसाय के आन्तरिक वातावरण की पहचान करना एवं इसे पूर्ण रूप से समझना आवश्यक है।

Principles of Business Management

प्रश्न 28, व्यवसाय के बाह्य वातावरण से क्या आशय है?

उत्तर- बाह्य वातावरण से आशय बाहरी तत्त्वों के ऐसे समह से है जो व्यवसाय की कार्यप्रणाली को सशक्त रूप से प्रभावित करता है। यह तत्व व्यवसाय के चारों ओर आस-पास पाये जाते हैं एवं व्यवसाय की क्रियाओं को प्रभावित करते है। बाह्य वातावरण व्यवसाय के अवसरों (Opportunities) एवं चुनौतियों (Threats) को प्रकट करता है, जिनका विश्लेषण करके प्रबन्धक विभिन्न रणनीतियों में से सर्वोत्तम रणनीति का चयन करता है। बाह्य वातावरण पर संगठन/उपक्रम का कोई नियन्त्रण नहीं होता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 29, वातावरणीय विश्लेषण की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर- वातावरणीय छानबीन एवं विश्लेषण प्रक्रिया की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है

1, वातावरणीय विश्लेषण एक व्यापक प्रक्रिया (Holistic exercise) है जिसमें समग्र रूप में वातावरण का अध्ययन एवं विश्लेषण सम्मिलित है, न कि कुछ वातावरणीय घटकों या उनकी प्रवृत्तियों का विश्लेषण।

2, यह एक सतत् जारी रहने वाली प्रक्रिया है, न कि यदा-कदा सूक्ष्म परीक्षण व्यवस्था (Intermittent scanning system) है। रडॉर की तरह वातावरण में हो रहे परिवर्तनों पर सतत् नजर रखती है। आवधिक विश्लेषण (periodic analysis) वातावरणीय घटकों की पूर्ण एवं सही जानकारी प्रदान नहीं कर सकते हैं।

3, वातावरणीय विश्लेषण एक अन्तर्ज्ञानयुक्त एवं विदोहक प्रक्रिया (heuristic and exploratory process) है। जहाँ इसके द्वारा वर्तमान वातावरणीय दशाओं का ज्ञान होता है, वहीं इसके द्वारा भावी सम्भावनाओं एवं छुपे हुए अवसरों का ज्ञान होता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 30, वातावरणीय विश्लेषण का क्या महत्व है ?

उत्तर- वातावरणीय विश्लेषण के महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(i) वातावरणीय विश्लेषण के द्वारा उद्योग के विकास के लिए विस्तृत योजना के तथा दीर्घकालीन नीतियाँ बनाने में सहायता मिलती है।

(ii) वातावरणीय विश्लेषण के द्वारा तकनीकी आधुनिकीकरण के सम्बन्ध में कार्य-योजना विकसित करने में सहायता मिलती है।

(iii) वातावरणीय विश्लेषण के द्वारा प्रबन्धन को उद्योग की स्थिरता को । प्रभावित करने वाले राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक आर्थिक कारणों की जानकारी उ प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

(iv) वातावरणीय विश्लेषण के द्वारा प्रबन्धन को प्रतिद्वन्द्वियों की योजनाओं का म विश्लेषण करने तथा उनका सामना करने के लिए प्रभावशाली योजना बनाने में व सहायता मिलती है।

(v) वातावरणीय विश्लेषण के माध्यम से उद्योगपति गतिशील तथा विकासशील व बने रहते हैं।

Principles of Business Management

प्रश्न 31, SWOT से क्या आशय है?

उत्तर- स्वोट-विश्लेषण का प्रयोग किसी व्यवसाय के आन्तरिक एवं बाह्य

वातावरण को समझने के लिए किया जाता है। इससे संस्था को अपनी संगठनात्मक रणनीति तैयार करने में सहायता मिलती है। SWOT अंग्रेजी भाषा के चार शब्दों से मिलकर बना है जिनका अर्थ है-S (Strength) शक्ति तथा क्षमता, W (Weaknesses) दुर्बलता, कमजोरी, O (Opportunities) अवसर, T (Threats)  समस्याएँ, चुनौतियाँ।।

इससे संस्था को ऐसी रणनीति तैयार करने में मदद मिलती है जिससे वह अपनी शक्तियों का प्रयोग करके व्यावसायिक अवसरों का अधिकतम लाभ उठा सकती है तथा व्यवसाय की दुर्बलताओं को न्यूनतम करके चुनौतियों का सामना कर सकती है। वस्तुत: आधुनिक युग में व्यवसायी को प्रतिस्पर्धा के वातावरण में कार्य करना पड़ता है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने तथा अपनी संस्था को प्रगति की तरफ ले जाने के लिये प्रबन्धकों को व्यावसायिक वातावरण की जानकारी होना अत्यन्त आवश्यक है। SWOT विश्लेषण की सहायता से संस्था ऐसी सूचनाएँ प्राप्त करती है जो उसे संस्था के संसाधन एवं क्षमताओं की जानकारी प्रदान करती है।

Principles of Business Management

प्रश्न 32, कार्यनीति/मोर्चाबन्दी/व्यूहरचना से क्या आशय है?

उत्तर- कार्यनीति/मोर्चाबन्दी/व्यूह रचना अथवा दाँवपेंच (Strategy) शब्द प्रारम्भ में युद्ध के क्षेत्र में शत्रु की सेना को पराजित करने के लिए अपनी रणनीति निर्धारित करने के लिए प्रयोग किया जाता था। समय के बदलाव तथा व्यावसायिक जटिलताओं में वृद्धि के साथ व्यावसायिक जगत में भी प्रतिद्वन्द्वी व्यावसायियों की कार्यनीतियों व क्रियाओं का अध्ययन करके उन्हें बाजार में हराकर अपने उत्पाद बेचने तथा बाजार में जमने के लिए ‘व्यूहरचना’ (strategy) शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। आधुनिक व्यवसाय में ‘व्यूहरचना’ एक लोकप्रिय शब्द बन चुका है जो नियोजन का एक महत्वपूर्ण भाग है। सरल शब्दों में, व्यूह-रचना का आशय यह है कि अपनी योजना बनाते समय प्रतियोगियों की योजनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए वस्तुओं का मूल्य-निर्धारण करते समय व्यवसायी को देखना चाहिए कि उसके प्रतिद्वन्द्वी व्यवसायी उसी प्रकार के समान गुण की वस्तु का कितना मूल्य ले रहे हैं।

Principles of Business Management

प्रश्न 33, औपचारिक अधिकार के सिद्धान्त को समझाइये।

उत्तर- इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार का उद्गम प्रत्यक्षत: उससे ऊँचे अधिकारी से तथा अप्रत्यक्षत: देश के संविधान द्वारा होता है। उदाहरणार्थ, एक निम्नस्तरीय प्रबन्धक को मध्यस्तरीय प्रबन्धक से, मध्यस्तरीय प्रबन्धक को शीर्ष प्रबन्धक से, शीर्ष प्रबन्धक को संचालक मण्डल से, संचालक मण्डल को अंशधारियों से और अंशधारियों को अपने अधिकार ‘निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार’ से प्राप्त होती है। निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार भी देश के संविधान द्वारा प्राप्त होता है। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि औपचारिकताओं के साथ अधिकारों का मूल स्रोत राष्ट्र का संविधान ही है।

Principles of Business Management

प्रश्न 34, अधिकार के स्वीकृति के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- अधिकार की स्वीकृति के सिद्धान्त को विकसित करने का श्रेय चेस्टर आई० बर्नार्ड (Chester I, Bernard) और हरबर्ट साइमन को है। इस विचारधारा के अनुसार औपचारिक अधिकार नाम मात्र का होता है, यह अधिकार उस समय प्रभावशाली बन पाता है, जबकि अधीनस्थ इसे स्वीकारें। ऐसी दशा में अधिकार का प्रवाह नीचे से ऊपर होता है, यानि कि “शासित’ होने वाले से “शासनकर्ता” की तरफ। एक प्रबन्धक का अधिकार वहीं तक है जहाँ तक कि उसके अधीनस्थों द्वारा उसे स्वीकारा जाता है और उसका पालन किया जाता है। यदि अधीनस्थों द्वारा प्रबन्धकों के आदेश का पालन किये जाने से मना कर दिया जाता है तो इसका अर्थ हुआ कि प्रबन्धक के पास आदेश को जारी करने का प्रभावी अधिकार ही नहीं है। अतः स्पष्ट है कि उच्चाधिकारी को प्रभावी अधिकार उनके अधीनस्थों से प्राप्त होता है, जो उनको स्वीकारते हैं।

Principles of Business Management

प्रश्न 35, अधिकार एवं उत्तरदायित्व में अन्तर बताइये।

उत्तर- अधिकार एवं उत्तरदायित्व वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। उत्तरदायित्व के सफल निष्पादन हेत समचित अधिकारों का होना नितान्त आवश्यक होता है। अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों ही व्यक्तिनिष्ठ तत्त्व हैं। मात्र व्यक्ति के ही अधिकार और उत्तरदायित्व हो सकते हैं किसी निर्जीव उपकरण के नहीं। फिर भी, दोनों में निम्न अन्तर होते हैं।

1, अधिकारों का प्रतिनिधायन किया जा सकता है, उत्तरदायित्व का नहीं।

2, अधिकारों का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है, जबकि उत्तरदायित्व का नीचे से ऊपर की ओर।

3, अधिकार अन्य लोगों से काम कराने की शक्ति है, जबकि उत्तरदायित्व किसी कार्य को करने का बन्धन होता है।

4, अधिकार सदैव उच्च अधिकारी से सम्बन्धित होता है, जबकि उत्तरदायित्व अधीनस्थ व्यक्तियों से।

Principles of Business Management

प्रश्न 36, जवाबदेही को समझाइये।

उत्तर- सैनिक संगठनों और लोक उद्यमों में उत्तरदायित्व के स्थान पर , जवाबदेही शब्द ही अधिक लोकप्रिय है। जवाबदेही का अर्थ है कर्मचारी किसे उत्तर देने, स्पष्टीकरण देने, अपनी प्रगति समीक्षा प्रस्तुत करने तथा किससे निर्देश लेने के लिए उत्तरदायी है? लुइस ए० ऐलन के शब्दों में, “जवाबदेही उत्तरदायित्व को पूर्ण करने का बन्धन है तथा स्थापित मानक के सन्दर्भ में अधिकार के प्रयोग का एक दायित्व है।”

जवाबदेही की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-(1) जवाबदेही में उत्तरदायित्व भी निहित है, क्योंकि बिना उत्तरदायित्व के जवाबदेही नहीं हो सकती। (2) जवाबदेही का भारार्पण नहीं हो सकता है। (3) यह हमेशा नीचे से ऊपर जाती है। (4) इसका क्षेत्र अधिकार एवं उत्तरदायित्व की सीमा से परे नहीं हो सकता। (5) एक अधीनस्थ एक से ज्यादा उच्चाधिकारी के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकता। इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही में कुछ प्रमुख अन्तर भी हैं; जैसे—(1) , उत्तरदायित्व एक दायित्व है, जबकि जवाबदेही एक बन्धन सदृश्य है। (2)उत्तरदायित्व का सम्बन्ध कार्य निष्पादन से होता है, जबकि जवाबदेही का निष्पाद के परिणाम से। (3) उत्तरदायित्व की उत्पत्ति कार्य से होती है, किन्तु जवाबदेही की न अधिकार से।

Principles of Business Management

प्रश्न 37, रेखा अधिकार को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- इसमें अधिकार सदैव लम्बवत् अर्थात् ऊपर से नीचे प्रवाहित होता है। | अधिकारों का प्रतिनिधायन वरिष्ठ अधिकारी से कनिष्ठ अधिकारी तक शनैः शनैः कम मात्रा में होता जाता है। इसके निम्न लक्षण होते हैं 4 (1) ऊपर से नीचे तक सभी आदेश, निर्देश और सूचनायें रेखाधिकारियों से होती हुई पहुँचती हैं। (2) नीचे से ऊपर होते हुए सभी शिकायतें, परिवेदनायें, सुझाव उच्चाधिकारियों तक पहुंचते हैं। (3) प्रत्येक अधिकारी अपने ठीक नीचे के कनिष्ठ को ही आदेश-निर्देश देता है। इस प्रकार आदेश रेखा श्रृंखला में होते हुए नीचे तक न पहुँचते हैं। (4) संगठन में विविध स्तरों का निर्माण हो जाता है। (5) यह सैन्य संगठनों, न लघु प्रतिष्ठानों व गैर-तकनीकी संस्थाओं में अधिक लोकप्रिय है।

Principles of Business Management

प्रश्न 38, स्टाफ अधिकार के, स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- इसमें स्टाफ अधिकारियों की नियुक्ति, रेखा अधिकारियों की सहायता, सेवा और उचित परामर्श हेतु की जाती है जिससे कि निर्णयन और कार्य-निष्पादन अधिक कुशलता से हो सके। स्टाफ अधिकारी को रेखा अधिकारियों की भाँति आदेश और निर्देश देने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। वह तो मात्र परामर्श के रूप में अपनी बात प्रस्तुत करता है। स्टाफ अधिकार के प्रमुख लक्षण निम्न होते हैं-

(1) स्टाफ अधिकारी विशेषज्ञ के रूप में रेखा अधिकारियों को परामर्श देते हैं। (2) स्टाफ अधिकारी को आदेश व निर्देश देने का अधिकार नहीं होता है। (3) इनके ऊपर कोई उत्तरदायित्व और जवाबदेही नहीं होती है। (4) स्टाफ अधिकारी का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता है, वह तो मात्र रेखा अधिकारी का सहायक होता है। (5) रेखा अधिकारी स्टाफ अधिकारी के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं होते हैं।

Principles of Business Management

प्रश्न 39, अधिकार के भारार्पण से क्या आशय है?

उत्तर- अधिकार के भारार्पण को विविध नामों; जैसे—प्रतिनिधायन, प्रत्यायोजन, अन्तरण, हस्तान्तरण, प्रत्यायुक्ति, समर्पण आदि से भी सम्बोधित किया जाता है। अधिकार के भारार्पण से आशय कार्य-भार के सौंपे जाने से है। आज के जटिल औद्योगिक युग में किसी एक व्यक्ति के लिए उपक्रम की सम्पूर्ण व्यवस्था को सम्भालना सम्भव नहीं है। इसीलिए प्रशासनिक अधिकारी अपना कार्य-भार दूसरे अधीनस्थों को सौंपते है। प्रत्येक अधीनस्थ जिसे कुछ कार्य सौंपे जायें तो आवश्यक है कि उसे कुछ अधिकार भी प्रदान किए जायें, क्योंकि अधिकारों के बिना कोई भी व्यक्ति अपने कर्त्तव्य को पूर्णतया पालन करने में असमर्थ रहेगा। यह अधिकार और कर्तव्य का सौंपना ही अधिकार का भारार्पण कहलाता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 40, अधिकार के भारार्पण की प्रमुख विशेषताएँ प्रकृति बताइये।

उत्तर- अधिकार के भारार्पण की प्रकृति निम्नांकित विशेषताओं से स्पष्ट की जा सकती है

। भारार्पण संगठनात्मक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कल अधिकारों का एक अंश । व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह को सौंपा जाता है।

2, प्रबन्धक उस अधिकार का भारार्पण नहीं कर सकता जो उसके पास नहीं, होता है।

3, भारार्पण ऊपर से नीचे की ओर होता है।

4, भारार्पण का उद्देश्य प्रबन्धकीय एवं क्रियात्मक दक्षता को बढ़ा करके । विशिष्टीकरण का लाभ लेना होता है।

5, यह अधिकारों का वितरण है विकेन्द्रीकरण नहीं। 6, भारार्पण के द्वारा भारार्पणकर्ता अपने दायित्व से मुक्त नहीं होता है। 7, यह अधीनस्थों की अधिकार सीमा को स्पष्ट करता है। 8, भारार्पण दूसरों का सहयोग प्राप्त करने का एक प्रयत्न है।।

9, अधीनस्थ को कार्य के सम्बन्ध में अधिकार का भारार्पण किया जाता है न कि पदों का।

10, भारार्पण राष्ट्र के कानून, कम्पनी की नीतियों व नियमों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

11, एक बार अधिकार का भारार्पण होने के बाद बढ़ाया, कम या वापिस लिया जा सकता है।

प्रश्न 41, अधिकार और उत्तरदायित्व की समता के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- यह सिद्धान्त यह स्पष्ट करता है कि अधीनस्थ को उतना ही अधिकार दिया जाना चाहिए जितना कि सौंपे गये उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए जरूरी हो। अधिकार उत्तरदायित्व से सम्बद्ध हो करके बराबर होना चाहिए कम या अधिक नहीं। यद्यपि व्यवहार में पूर्ण समानता बरतना सम्भव नहीं हो तो दोनों के बीच पर्याप्त सन्तुलन व सामंजस्य होना चाहिए। प्रबन्धक को देखना चाहिए कि सौंपे गये कार्यों को पूरा करने के लिए अधीनस्थों के पास पर्याप्त अधिकार हों अन्यथा इससे अधीनस्थों की प्रभावशीलता व मनोबल पर प्रतिकूल असर होगा। बिना पर्याप्त अधिकार भारार्पण किये हुए अधीनस्थों को परिणाम के लिए जवाबदेह ठहराना सम्भव नहीं होता है। उत्तरदायित्व की तुलना में अधिकार का कम भारार्पण यदि अधिशासी करता है तो अधीनस्थ कार्य सम्पादन सही रूप में कर ही नहीं सकता है। इसी प्रकार, अधीनस्थों को सौंपे गये कार्यभार या दायित्व से अधिक अधिकार का भारार्पण करने से उसका दुरुपयोग या कार्य में लापरवाही सम्भव होती है। उत्तरदायित्व विहीन अधिकार, व्यक्ति को भ्रष्ट और अक्खड़ बनाते है।

Principles of Business Management

प्रश्न 42, क्या उत्तरदायित्वों का भारोपण हो सकता है ?

उत्तर- इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि अधिकार का भारार्पण हो सकता है, उत्तरदायित्व का नहीं। कोई अधिकारी अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने में अधीनस्थों का सहयोग ले सकता है और इस हेतु अधिकार का भारार्पण कर सकता है। उत्तरदायित्व तो उसी अधिकारी का होगा जिसे उपक्रम का कार्य-भार सौंपा गया है। यदि उपक्रम में हानि होती है तो इसके लिए उच्च अधिकारी जवाबदेह और उत्तरदायी होंगे न कि अधीनस्थ। उत्तरदायित्व अविभाज्य है और इसे भारोपित नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि सौंपे गये कार्य के लिए अधीनस्थों का कोई उत्तरदायित्व नहीं है। वास्तव में, इसके लिए अधीनस्थ उस अधिकारी के प्रति उत्तरदायी होते हैं जिसने उन्हें कार्य भार सौंपा है और पूरा करने के लिए अधिकार सत्ता सौंपी है। कोई भी प्रबन्धक परिणामों की विफलता के लिए यह कहकर उच्चाधिकारी के प्रति अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता है कि अधीनस्थ जिम्मेदार है |

प्रश्न 43, भारार्पण को किस प्रकार प्रभावी बनाया जा सकता है?

उत्तर- अधिकार का भारार्पण प्रबन्धन का अनिवार्य, परन्तु अभ्यास में एक कठिन कार्य है, अत: भारार्पण को सफल बनाने हेतु इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना नितान्त आवश्यक है। इस दिशा में प्रभावी भारार्पण हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं –

1, भारार्पणकर्ता अधिकारी को अपनी भूमिका और कुल अधिकारों को भली प्रकार समझ लेना चाहिए।

2, अधिकारी को तय कर लेना चाहिए कि किन अधिकारों का भारार्पण करना | है और किन का नहीं।

3, कुशल अधिशासियों का चयन किया जाना चाहिए।

4, अधीनस्थों की योग्यता व सीमा की स्पष्ट पहचान करके कार्य आबंटित करना चाहिए।

5, भारार्पण करते समय अधीनस्थों को स्पष्टया अधिकार बता देना चाहिए। ‘अगर और मगर’ के प्रश्नों का साफ जवाब दे देना चाहिए।

6, भारार्पण विश्वास पर आधारित होना चाहिए।

7, प्रबन्ध का अनुकूल वातावरण निर्मित करके भय और नैराश्य को दूर करना चाहिए।

8, जो निर्णय अधीनस्थों के सीमा-क्षेत्र में हो उसमें अनावश्यक अधिकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

9, जो कार्य अधीनस्थ कर सकते हैं, उन्हें सौंप देना चाहिए।

10, ध्यान रहे, उत्तरदायित्व का भारार्पण नहीं होता है, मात्र अधिकार का भारार्पण होता है।

11, प्रभावी सन्देशवाहन व्यवस्था होनी चाहिए।

12, अधिकारी को भारार्पण अपने अधिकार सीमा के परे नहीं करना चाहिए

Principles of Business Management

प्रश्न 44, विकेन्द्रीकरण तथा प्रतिनिधायन/भारार्पण में अन्तर स्पष्ट है कीजिये।

उत्तर- विकेन्द्रीकरण और भारार्पण के बीच अन्तर को हम सूचीबद्ध रूप में निम्न प्रकार से प्रस्तुत कर सकते हैं

1, विकेन्द्रीकरण, भारार्पण का ही परिणाम होता है, कारण नहीं। भारार्पण से विकेन्द्रीकरण को जन्म मिलता है, विकेन्द्रीकरण से भारार्पण को नहीं।।

2, भारार्पण दो स्तरों के मध्य अधिकार सुपुर्दगी का नाम है, जबकि सम्पूर्ण संगठन में अधिकार सुपुर्दगी की क्रिया को विकेन्द्रीकरण कहते हैं।

3, भारार्पण की प्रक्रिया द्वारा विकेन्द्रीकरण को पूरा किया जाता है। प्रभावी भारार्पण के लिए विकेन्द्रीकरण की कोई आवश्यकता नहीं है। विकेन्द्रीकरण में भारार्पण स्वत: निहित है, अत: विकेन्द्रीकरण भारार्पण की तुलना में अधिक व्यापक

4, भारार्पण प्रक्रिया अधिशासी द्वारा निकटतम अधीनस्थ को अधिकार सौंपने के साथ पूरी हो जाती है, परन्तु विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया तब पूरी होती है, जबकि सत्ता का भारार्पण संगठन स्तर पर ऊपर से नीचे तक व्यापक रूप में होता है।

5, भारार्पण में केवल अधीनस्थों को निर्दिष्ट सीमाओं के अन्तर्गत कार्य करने का अधिकार प्रदान किया जाता है, जबकि विकेन्द्रीकरण में प्रबन्धकीय निर्णय लेने की विकेन्द्रित, नियमित व व्यवस्थित व्यवस्था होती है। विकेन्द्रीकरण की वास्तविक कसौटी यह है कि निम्नस्तरीय प्रबन्धकों को शीर्ष प्रबन्ध के हस्तक्षेप अथवा उनके संघर्ष के बिना निर्णय लेने, लोगों से काम करवाने, संसाधनों का आबंटन करने तथा क्रियाओं व घटनाओं पर नियन्त्रण रखने के मामले में पर्याप्त स्वायत्तता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 45, विभागीकरण की आवश्यकता व महत्व को स्पष्ट कीजिये।

उत्तरविभागीकरण की आवश्यकता निम्नांकित कारणों से होती है

1, किसी एक अधिशासी की शारीरिक एवं मानसिक कार्यक्षमता प्रतिष्ठान के कार्य की तुलना में सीमित होने के कारण विभागीकरण करना जरूरी होता है।

2, श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण के प्रयोग विभागीकरण द्वारा ही सम्भव होते हैं।

3, प्रबन्धकों के विकास हेतु भी विभागीकरण आवश्यक होता है।

4, विभागीकरण कुशल निष्पादन, समन्वय, सन्देशवाहन, निर्देशन एवं नियन्त्रण की सुविधा हेतु आवश्यक होता है।

5, अधिकार भारार्पण एवं विकेन्द्रीकरण हेतु विभागीकरण आवश्यक होता है।

6, स्वायत्तता की भावना के कारण निर्णयों की गुणवत्ता विभागीकरण से बढ़ती है |

7, विभागीकरण से प्रबन्धकों के कार्यों का मूल्यांकन करना सरल हो जाता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 46, विभागीकरण के गुण एवं दोष बताइये।

उत्तर- गुण-1, विभागीकरण करने से उपक्रम की क्रियाओं पर प्रभावी नियन्त्रण सम्भव होता है।

2, विभागीकरण में कर्मचारियों के अधिकार व दायित्वों का स्पष्ट विभाजन तथा व्याख्या की जाती है जिससे उत्तरदायित्व निर्धारण सुनिश्चित होता है।

3, प्रत्येक विभाग तथा उसके कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन करना सरल हो जाता है।

4, विभागीय बजट सरलतापूर्वक तैयार और क्रियान्वित किये जा सकते हैं।

5, विभागीय प्रबन्धकों के द्वारा स्वतन्त्र रूप से निर्णयन के कारण योग्यता में वृद्धि होती है।

6, प्रत्येक विभाग के लिए आवश्यक कर्मचारियों, पदों तथा अन्य बातें सरलतापूर्वक ज्ञात की जा सकती हैं।

7, विभागीकरण से विकेन्द्रीकरण के सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

8, अधिकारों के उचित भारार्पण से अधिकारों का दुरुपयोग और दायित्वों के खिसकाने की प्रवृत्ति पर रोक लगती है।

दोष- 1, विभिन्न विभागों के लिए योग्य कर्मचारियों एवं अधिकारियों का चयन करना एक जटिल समस्या बन जाती है।

2, पृथक्-पृथक् विभाग होने के कारण प्रबन्धकीय प्रशिक्षण की व्यवस्था मुश्किल होती है।

3, विभागीय प्रबन्धक केवल अपने विभागीय मामलों में दक्ष होते हैं, अतः अन्य विभागों में आकस्मिक स्थानान्तरण जोखिमपूर्ण होता है।

4, प्रत्येक विभाग अपने कार्य में इतना अधिक व्यस्त एवं केन्द्रित हो जाता है कि अन्य विभागों से समन्वय स्थापित करने में बड़ी कठिनाई होती है।

5, यह एक खर्चीली व्यवस्था है।

6, यह छोटे उपक्रमों के लिए अनुपयोगी होती है, क्योंकि वे संगठन संरचना पर अधिक व्यय करने की स्थिति में नहीं होते हैं।

7, विभागीकरण से विभिन्न क्रियाओं में इतना विकेन्द्रीकरण हो जाता है कि नीतियों में विभिन्नता आ जाती है।

8, विभागीय कर्मचारियों का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 47, ‘रेखा संगठनतथा रेखा एवं कर्मचारी संगठनमें अन्तर स्पष्ट कीजिये।

अन्तर का आधाररेखा संगठन रेखा एवं कर्मचारी संगठन
1, विशेषज्ञ सेवाएँइसमें विशेषज्ञों की सेवा की कोई व्यवस्था नहीं होती है|इसमें विशेषज्ञ सुझाव हेतु कर्मचारी नियुक्त होते है |
2, विशिष्टीकरणइसमें विशिष्टीकरण और श्रम विभाजन का सही अर्थो में प्रयोग नहो हो पाता है |यह तो विशिष्टीकरण और श्रम विभाजन के स्वर्णिम सिध्दान्त पर आधारित है |
3, लोचशीलतायहाँ पर संगठन में कठोरता पायी जाती है |इस पारूप में लोचशीलता का तत्त्व पाया जाता है |
4, पूछताछ और अनुसन्धानयहाँ पर ‘अधिकारी हमेशा सही है’ (Boss is always right) माने जाने के कारण पूछताछ और अनुसन्धान की सम्भावना नही होती है |यहाँ पर रेखा एवं कर्मचारी संघर्ष के कारण पूछताछ और अनुसन्धान हो सकता है |
5, अनुशासनअनुशासन की उच्च कोटि पायी जाती है, क्योकि कनिष्ठ अपने निकटतम अधिकारी से डरता है |यहाँ पर कार्य करने और सोचने वालों में मतभेद के कारण अनुशासन कम पाया जाता है |
6, दायित्त्व निर्धारणइसमें उत्तरदायित्त्व का निर्धारण आसानी से किया जा सकता है |चूँकि स्टाफ को उत्तरदायी नही ठहराया जा सकता अत: हिसाबदेयता का निर्धारण मुश्किल होता है |
7, निर्णयनयहाँ निर्णयन बहुत सुविधाजनक होता है |यहाँ विशेषज्ञों से परामर्श लेने के कारण निर्णयन में विलम्ब होता है |
8, उपयुक्तता/क्षेत्रयह छोटी संस्थाओं के लिए उपयुक्त होता है |यह जटिल क्रियाओं वाली संस्थाओं के लिए उपयुक्त है जहाँ विशेषज्ञों का परामर्श अनिवार्य हो |

 

प्रश्न 48, रेखा और क्रियात्मक संगठन में अन्तर स्पष्ट कीजिये।

अन्तर का आधार रेखा संगठन क्रियात्मक संगठन
1, अधिकार की प्रकृतिअधिकार शीर्ष प्रबन्ध के पास केन्द्रित होता है जो सीधी रेखा में प्रवाहित होता है |अधिकार विभिन्न अधिकारीयों के बीच विक्रेन्द्रित होता हिया |
2, अधिकारीयों की संख्याइसमें हर कर्मचारी का एक अधिकारी होता है |इसमें हर कर्मचारी के आठ अधिकारी होते है |
3, आदेश की एकताइसमें आदेश की सम्पूर्ण एकता होती है |इसमें आदेश की पूर्ण एकता नही होती है |`
4, उत्तरदायित्त्व निर्धारणइसमें उत्तरदायित्त्व का निर्धारण आसानी से किया जा सकता है |सूक्ष्मतम एस आर एम विभाजन के कारण दायित्त्व-निर्धारण बहुत कठिन हो जाता है
5, अनुशासनइसमें सैन्य सरंचना की भाँति पूर्ण अनुशासन होता है |इसमें तिला अनुशासन होता है |
6, लोचशीलतायहाँ ज्यादा लचीला होता है |यह तुलनात्मक रूप में काम लचीला होता है |
7, व्ययइसमें कम व्यय आता है |यः बहित खर्चीला है |
8, उपयुक्तता का क्षेत्रयहाँ छोटे संस्थाओं के लिए उपयुक्त है |यह बड़े उघमों के लिए उपयुक्त है |

 

प्रश्न 49, समिति संगठन को समझाइये।

उत्तर- समिति व्यक्तियों का वह समूह होती है जिसे संगठन में कुछ निर्धारित कार्यों को सामूहिक रूप से निष्पादित करने का भार सौंपा जाता है। समिति में आम और पर तीन या इससे अधिक सदस्य होते हैं, परन्तु, कभी-कभी एक अनुभवी व योग्य व्यक्ति को ही समिति के रूप में नियुक्त कर दिया जाता है तो इसे क-सदस्यीय समिति (One-man Committee) कहेंगे फिर भी, अधिक सदस्य होने र निर्णय बहुमत द्वारा किया जाता है और उनमें से कोई एक समिति का सभापति Chairman) होता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 50, औपचारिक संगठन की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर- औपचारिक संगठन की प्रमुख विशेषतायें निम्न हैं- (1) यह संगठन व नियोजित होता है। (2) यह पूर्णत: अव्यक्तिगत होता है। (3) यह सामान्य उद्देश्य । पूर्ति हेतु स्वैच्छिक जागरूकता के साथ स्थापित किये जाते हैं। (4) इसमें प्रबन्ध के

प्रत्येक स्तर के अधिकारों, कर्त्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की स्पष्ट रूप से व्याख्या की जाती है। (5) इसमें अधिकारों का प्रत्यायोजन ऊपर से नीचे की ओर होता है। (6) इसमें संगठन चार्टो व पुस्तिकाओं का प्रयोग किया जाता है। (7) इसमें श्रम विभाजन, विशिष्टीकरण और आदेश की एकता पायी जाती है। (8) ऐसे संगठन में निश्चित प्रणालियों, आदेशों, नीतियों, नियमों, पद्धतियों और संचार व्यवस्था के अधीन कार्य होता है। (9) इसमें सत्ता की निश्चित क्रमबद्धता होती है जिसका पालन कठोरता से किया जाता है।

प्रश्न 51, अनौपचारिक संगठन की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तर- अनौपचारिक संगठन की प्रमुख विशेषतायें निम्न हैं-(1) अनौपचारिक संगठनों का निर्माण स्वतः अर्थात् अपने-आप होता है। (2) ये प्राकृतिक व सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित होते हैं। (3) ये औपचारिक संगठन के पूरक होते हैं और हर स्थान और हर स्तर पर पाए जाते हैं। (4) ऐसे संगठनों का संगठन चार्ट में कोई स्थान नहीं होता है। (5) इनके अपने नियम, परम्पराएँ, प्रणालियाँ और पद्धतियाँ होती हैं जिनका ये पालन करते हैं, परन्तु ये नियम, पद्धतियाँ व परम्पराएँ लिखित नहीं होती हैं। (6) अनौपचारिक संगठनों का निर्माण सामाजिक समूहों के रीति-रिवाजों, धर्मों, जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों, स्वभावों, विचारों, पारस्परिक सम्बन्धों, आदतों व लम्बे समय तक मिलते-जुलते रहने के कारण होता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 52, औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन में अन्तर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर-

औपचारिक एवं अनौपचारिक

अन्तर का आधारऔपचारिक संगठनअनौपचारिक संगटन
1,  अन्तर का आधारइनकी उत्पत्ति अधिकारों के प्रतिनिधायन से होती है |इनकी उत्पत्ति स्वत: पारस्पारिक सामाजिक सम्बन्धों के कारण होती है |
2, सम्बन्धइसके सदस्यों में अव्यक्तिगत सम्बन्ध होता है |इसके सदस्यों में व्यक्तिगत सम्बन्ध होता है |
3, आकरइनका आकर लघु एवं बृहद् दोनों हो सकता है |ये प्राय: लघु आकारीय होते है |
4, स्थायित्वये संगठन अधिक स्थायी एवं दीर्घकालीन होते है |ये संगठन अपेक्षाकृत कम स्थायी एवं अल्प आयु वाले होते है |
5, नियोजनइनकी स्थापना नियोजित ढंग से होती है |इनकी स्थापना हेतु कोई विशेष नियोजन नहीं किया जाता है |
6, लिखित नियमइनकें नियम, नीतियाँ, अधिकार, कर्त्तव्य एवं दायित्त्व सभी लिखित रूप में होते है |इनमें लिखित रूप से कुछ भी नही होता है |
7, संघठन चार्ट मैन्युअलइनमें संगठन चार्ट व मैन्युअल का प्रयोग किया जाता है |इनमें संगठन-चार्ट व मैन्युअल की विशेष आवश्यकता नही पड़ती है |
8, सत्ता का प्रवाहइसमें सत्ता क प्रवाह ऊपर से नीचे की और होता है |इनमें सत्ता का प्रवाह निचे से उप्पेर, ऊपर सर निचे अथवा समतल रूप से चलता है |
9, उदेश्यइनका उदेश्य संगठन के उदेश्य प्राप्त करना होता है |ये प्राय: सामाजिक संतुष्टि के लिए बनाये जाते है |
10, निर्माणइसका निर्माण शीर्ष आधिकारियों द्वारा होता ही |इनका निर्माण उन लोगो के द्वारा होता ही जो नियंत्रण करते है |
11, क्षेत्रइसका क्षेत्र व्यापक होता है |इनका क्षेत्र संकुचित होता है |

 

प्रश्न 53, अभिप्रेरण के प्रमुख उद्देश्य बताइये।

उत्तर-सामान्यतः अभिप्रेरण के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं-

1, संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करना।

2, संस्था में कर्मचारियों का स्वैच्छिक सहयोग करना।

3, कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि करना।

4, उच्च मानवीय सम्बन्धों की स्थापना करना।

5, कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि करना।

6, कर्मचारियों का आत्म-विकास करना।

7, बाहा नियन्त्रण के स्थान पर आत्म नियन्त्रण को प्रोत्साहित करना।

8, कर्मचारियों के मध्य पारस्परिक सहयोग की भावना का विकास करना।

9, कर्मचारियों की आर्थिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना।

प्रश्न 54, धनात्मक अभिप्रेरण की प्रमुख विधियाँ बताइये।

उत्तर-फिलिप्पो के अनुसार धनात्मक अभिप्रेरणाएँ देने की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-

(i) कार्य के लिए सुझाव देना तथा प्रशंसा करना।

(ii) सूचनाएँ देना।

(iii) अधीनस्थों में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेना।

(iv) प्रतिस्पर्धाएँ आयोजित करना।

(v) हिस्सा प्रदान करना।

(vi) गौरव प्रदान करना।

(vii) उत्तरदायित्वों का प्रत्यायोजन करना।

(viii) अधिक वेतन देना।

कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने की धनात्मक अभिप्रेरणाएँ सबसे प्रमुख विधि हैं। सामान्यतः इसी विधि का प्रयोग किया जाता हैं। इससे कर्मचारियों की कार्य क्षमता को सरलतापूर्वक बढ़ाया जा सकता है तथा संस्था के प्रति अपनत्व की भावना का विकास किया जा सकता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 55, ऋणात्मक अभिप्रेरण की प्रमुख विधियाँ बताइये।

उत्तर- ऋणात्मक अभिप्रेरण का सम्बन्ध भय, कठोरता, धमकी तथा आलोचनाओं से है। ये प्रेरणाएँ किसी विशिष्ट को निरुत्साहित करने के लिए अधिक काम में ली जाती हैं। इन प्रेरणाओं में निम्नलिखित को शामिल किया जा सकता है

(1) सेवामुक्ति का भय। (ii) धमकी देना या उपेक्षा करना। (iii) वेतन में कटौती या वेतन वृद्धि रोकना। (iv) निम्न-स्तरीय व्यवहार। (v) कुछ उपलब्ध सुविधाओं की कटौती या समाप्ति। (vi) पदावनति (Demotion) (vii) डॉट-फटकार देना। (viii) जबरी-छुट्टी (Lay-off) करना।

प्रश्न 56, धनात्मक एवं ऋणात्मक अभिप्रेरण में अन्तर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर-

धनात्मक एवं ऋणात्मक अभिप्रेरण में अन्तर

 अन्तर का आधारधनात्मक अभिप्रेरणाऋणात्मक अभिप्रेरणा
1,अभिप्रेरणा का आधारइसमें अभिप्रेणा की दृष्टि से कर्मचारी के कार्य की प्रंशसा की जाती है |इसमें कर्मचारी किए कार्य की बुराई की जाती है, उसे भय दिखाया जाता है |
2,प्रतिफलधनात्मक अभिप्रेरणा के फलस्वरूप अधिक धन, अधिक सम्मान, पदोन्नति आदि प्राप्त होती है |इसमें कर्मचारी को भय एवं दण्ड मिलता है उसको पदावनत किया जा सकता है |
3,प्रभावधानात्मक अभिप्रेरणा कर्मचारियों में मनोबल को सुदृढ़ करती है तथा उनकी कार्यक्षमता में वृध्दि करती है |इसके प्र्व्हाव प्राय : आशा के विपरीत ही होते है |

 

 

प्रश्न 57, अभिप्रेरण X तथा Y विचारधारा में अन्तर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर-

X तथा Y विचारधारा में अन्तर

क्र० सं०अन्तर का आधार (Basic of Difference)‘X’ विचारधारा (‘X’ Theory)‘Y’ विचारधारा (‘Y’ Theory)
1,मानव व्यवहार के सम्बन्ध में सिचारयह विचारधारा मानक व्यवहार के सम्बन्ध में निराशवादी एवं नकारात्मक विचार प्रस्तुत करती है |यहाँ विचारधारा मानव व्यवहार के सम्बन्ध में आशावादी एवं सकारात्मक विचार प्रस्तुत करती है |
2,कार्य के प्रति मानवीय दृष्टिकोण यहाँ विचारधा मानती है की एक सामान्य व्यक्ति कामचोर है | वहा काम से बचना चाहता है |यहाँ विचारधारा यहाँ मानती है की एक सामने व्यक्ति काम को उतना ही सहज रूप  करना चाहता है; जैसे की वह खेलना, मनोरंजन एवं आराम करना चाहता है |
3,निर्देशन यहाँ विचारधारा मानती है की सामानयत: लोग दुसरे से आदेश-निर्देश प्राप्त करना चाहते है |यह विचारधारा मानती है की यदि लोग अ[में कार्य के लिए प्रतिबध्द है तप वे सामान्यत: आत्म-निर्देशन एवं आत्म-निरिक्षण पसन्द करते है |
4,कार्य-करने का तरीकाइस विचारधारा की यह मान्यता है की भय  दिखाकर या भौतिक पुरस्कार प्रदान कर व्यक्ति से काम लिया जा सकता है |इस विचारधारा की मान्यता है की व्यक्ति को स्वयं विकास का अवसर प्रदान क्र उससे काम कराया जा सकेगा |
5,दायित्त्वयहाँ विचारधारा मानती है ककी लोफ सामान्यत: उत्तरदायित्त्व से बचना चाहते है |यह विचारधारा मानती है की लोग दायित्त्व स्वीकार ही नही करते, बल्कि अधिक दायित्त्वों की माँग भी करते हैं |

 

 

प्रश्न 58, निरंकुश जनतन्त्रात्मक और निर्बाध नेतृत्व शैली में अन्तर बताइये।

उत्तर- निरंकुश, जनतन्त्रात्मक और निर्बाध नेतृत्व शैली में अन्तर

(Difference between Autocratic, Democratic and Free-Rein Leadership Styles)

अन्तर का आधार निरंकुश शैली जनतन्त्रात्मक शैलीनिर्बाध शैली
1,नीति-निर्धारणनेता द्वारा ही समस्त नीतियों का निर्धारण किया जाता है |अनुयायियों से विचार विमर्श करके नीतियों का निर्धारण किया जाता है  |नीतियों के निर्धारण में नेता का न्यूनतम हस्तक्षेप होता है |
2,कार्य-निर्धारणनेता स्वयम अपने अनुयायियों के कार्य का निर्धारिण करता है |कार्य-निर्धारण में अनुयायियों से परामर्श लिया जाता है |नेता कार्य निर्धारण से पूर्णतया अलग रहता है |
3,अधिकार प्रतिनिधायननेता साते अधिकारअपने पास ही केन्द्रित रखता है |नेता अपने अनुयायियों को आवश्यक अधिकारों का प्रतिनिधायन करता है |नेता पाने अधिकांश अधिकारों का प्रतिनिधायन अनुयायियों में करता है |
4,स्वरूपयहाँ नेतृत्व का ‘में’ स्वरूप हैं |यह नेतृत्व का ‘हम’ स्वरूप है |यहाँ नेतृत्व का ‘आप’ स्वरूप है |
5,मानवीय सम्बन्धइसमें मानवीय सम्बन्धों पर ध्यान नही दिया जाता है |इसमें मानवीय सम्बन्धों को मान्यता प्रदान की जाती है |इस्मने मानवीय सम्बन्धों पर विशेष ध्यान दिया जाता है |
6,पर्यवेक्षण एवं नियन्त्रणइसमें नेता का कठोरनियन्त्रण एवं पर्यवेक्षण रहता है |इसमें नेता का सामन्य नियन्त्रण एकम पर्यवेक्षण रहता है |इसमें न तो कार्य का मूल्याँकन किया जाता है और न ही पर्यवेक्षण किया जाता है |
7,सन्देशवाहनइसमें एकल मार्गीय सन्देशवाहन होता है |इसमें द्रिमार्गीय संदेश वाहन होता है |इसमें अति सक्रिय द्रिमार्गीय संदेशवाहन होता है |
8,लोकप्रियतायहाँ शैली परम्परागत प्रबन्ध में आधिक लोकप्रिय थी |यह वर्तमान में सर्वाधिक लोकप्रिय है |यहाँ बहुत ही कम लोकप्रिय है |

 

 

प्रश्न 59, नेतृत्व की परिस्थितिमूलक विचारधारा को समझाइये।

उत्तर- इस विचारधारा के अनुसार नेता या नेतृत्त्व की प्रभावशीलता उन परिस्थितियों पर निर्भर करती है जिनमें नेता कार्य करता है। परिस्थितियाँ भी नेता के व्यवहार एवं शैली को प्रभावित करती हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं तो उसका नेतृत्त्व प्रभावी हो जाता है, परन्तु प्रतिकूल परिस्थितियों में नेता का मार्गदर्शन व्यर्थ हो जाता है। इस विचारधारा के अनुसार नेता में परिस्थिति के साथ समायोजन करने का गुण होना अत्यन्त आवश्यक है। अतः प्रत्येक नेता को अपने वातावरण की परिस्थितियों के अनुरूप ही नेतृत्त्व शैली या प्रणाली चुननी एवं अपनानी चाहिए तभी वह सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं।

Principles of Business Management

प्रश्न 60, अंगूरीलता/अनौपचारिक सन्देशवाहन से क्या आशय है ?

उत्तर- जब दो या अधिक व्यक्ति आपस में सन्देशों का आदान-प्रदान अपनी औपचारिक स्थिति के कारण न करके अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर करते हैं तो वह अनौपचारिक सन्देशवाहन कहलाता है। अनौपचारिक सम्प्रेषण का कोई पर्व-निर्धारित मार्ग नहीं होता है। इसकी श्रृंखलाएँ (Channels) संगठन द्वारा निर्धारित नहीं होती वरन् स्वत: ही बनती एवं परिवर्तित होती हैं। ऐसे सन्देशों का आदान-प्रदान सामाजिक समारोहों, दोपहर के भोजन के समय, क्लब, गोष्ठी, अनौपचारिक भेंट, सभा या सैर के दौरान अथवा सामूहिक कार्यक्रमों के अवसर पर विशेष रूप से होता हैं। ऐसे अवसरों पर उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थों से ऐसी सूचनाएँ प्राप्त करते हैं जो औपचारिक सम्प्रेषण के द्वारा प्राप्त करनी कठिन हो सकती हैं। अनौपचारिक सन्देशवाहन को अंगूरीलता (Grapevine) या जनप्रवाद के नाम से भी जाना जाता है।

Principles of Business Management

प्रश्न 61, सम्प्रेषण तन्त्र से क्या आशय है ?

उत्तर- सम्प्रेषण का उद्गम सन्देश प्रेषक से होता है एवं अन्त सन्देश प्रापक पर होता है। इन दोनों सिरों के मध्य कुछ कड़ियाँ या मार्ग हैं जिनके माध्यम से सन्देशवाहन का प्रवाह सन्देश प्रेषक से सन्देश प्रापक तक चलता है। इन सभी कड़ियों अथवा मार्ग के जोड़ने की क्रिया को सन्देशवाहन के जाल अथवा ताना-बाना अथवा सम्प्रेषण तन्त्र कहते हैं। सरल शब्दों में, सम्प्रेषण विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित सूचना को जिन कड़ियों अथवा मार्गों द्वारा प्रवाहित किया जाता है, उसे हम नेटवर्क (Network) के नाम से पुकारते हैं।

प्रश्न 62, प्रबन्ध में प्रभावी सन्देशवाहन के महत्व की विवेचना कीजिये।

उत्तर- आधुनिक युग में, व्यावसायिक प्रबन्ध में सम्प्रेषण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कीथ डेविस के अनुसार, एक व्यवसाय के लिए सन्देशवाहन का उतना ही महत्त्व है जितना एक व्यक्ति के लिए रक्त-संचार का।” यह संस्था रूपी शरीर में धमनियों का कार्य करता है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण संस्था में जीवन रक्त का संचार होता रहता है। संक्षेप में, प्रबन्ध एवं व्यवसाय में प्रभावी सम्प्रेषण के महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है-

1, प्रबन्धकीय कार्यों का क्रियान्वयन

2, व्यवसाय का सफल संचालन

3, शीघ्र निर्णय एवं क्रियान्वयन

4, प्रभावशाली समन्वय

5, मानवीय सम्बन्धों के निर्माण में सहायक

6, जनतान्त्रिक भावना को बल

7, सफल/प्रभावी नेतृत्त्व का आधार

8, सन्देहों, भ्रमों एवं अज्ञानताओं के निवारण के लिए

9, बाह्य पक्षकारों से ठोस सम्बन्धों के निर्माण में सहायक

Principles of Business Management

प्रश्न 63, परिवर्तन के प्रतिरोध की प्रमुख विशेषताएँ बताइये।

उत्तरपरिवर्तन/परिवर्तनों के प्रतिरोध में निम्नलिखित विशेषताएँ (Characteristics) देखी जा सकती हैं

1, परिवर्तन का प्रतिरोध एक प्रतिक्रियास्वरूप होता है।

2, परिवर्तन एवं प्रतिरोध का चोली-दामन का साथ है। अतः प्रबन्धकों को उन्हें प्राकृतिक मानना चाहिये एवं सामान्य रूप से भी लेना चाहिये।

3, परिवर्तन प्रभावित व्यक्तियों के लिये लाभदायक या हानिकारक है, से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।

4, प्रतिरोध का आभास किसी व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले कार्यों या क्रियाओं से न कर उसके व्यवहार में निहित संरक्षी (Protective) क्रियाओं से किया जाता है।

5, प्रतिरोध का क्षेत्र काफी व्यापक है, क्योंकि

(i) प्रतिरोध कर्मचारियों के अतिरिक्त प्रबन्धकों, ग्राहकों, माल के स्मरणकर्ताओं, सरकार अथवा जन-सामान्य किसी की ओर से भी हो सकता है, एवं

(ii) प्रतिरोध सभी देशों की व्यवस्थाओं में हो सकता है।

6, परिवर्तनों का प्रतिरोध वैयक्तिक, भावनात्मक, विवेकपूर्ण एवं सामूहिक आधार पर हो सकता है।

7, प्रतिरोध की प्रतिक्रिया सभी व्यक्तिों की समान अथवा एक जैसी नहीं होती है, क्योंकि अलग-अलग व्यक्ति परिवर्तन को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।

Principles of Business Management


Bcom 2nd Year Business Public Finance Public Expenditure

Bcom 2nd Year Business Public Finance Public Revenue

 

Principles of Business Management


Follow me at social plate Form

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Home
B/M.com
B.sc
Help
Profile
Scroll to Top