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Bcom 2nd Year Public Finance Deficit Finance

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Bcom 2nd Year Public Finance Deficit Finance

 

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Bcom 2nd Year Public Finance Deficit Finance
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घाटे की वित्त व्यवस्था या हीनार्थ प्रबन्धन (Deficit Financing) 

प्रश्न 8, हीनार्थ प्रबन्धन से क्या आशय है? क्या इसका प्रभाव सदैव मुद्रा प्रसार का होता है ? इसके दुष्परिणामों को कम करने के लिए आप किन उपायों को उपयुक्त समझते हैं?

अथवा

हीनार्थ प्रबन्धन क्या हैं? यह किस प्रकार तीव्र आर्थिक विकास में सहायता करता है? उसके क्या बुरे प्रभाव हैं?

(Avadh, 2008)

अथवा

घाटे की वित्त व्यवस्था क्या है? यह आर्थिक विकास को बढ़ाने में किस प्रकार सहायता करती है? इसकी क्या सीमांए हैं? (Avadh, 2011) 

अथवा

‘हीनार्थ प्रबन्धन’ से आप क्या समझते हैं ? एक विकासशील अर्थव्यवस्था में हीनार्थ प्रबन्धन के महत्व की विवेचना कीजिए।

(Meerut, 2012, 2008 BP)

उत्तर

हीनार्थ प्रबन्धन (घाटे की वित्त-व्यवस्था) का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Deficit Financing)

हीनार्थ प्रबन्धन से अभिप्राय सरकार द्वारा प्रबन्धित उस धनराशि से है, जिसमें सरकार अपनी सामान्य आय से अधिक व्यय करती है। दूसरे शब्दों में, सरकार के सम्भावित व्यय उसकी सम्भावित आय से अधिक होने पर उनको पूरा करने के लिए सरकार जो उपाय करती है, उसे हीनार्थ प्रबन्धन कहते हैं। इस सम्बन्ध में पश्चिमी एवं भारतीय अर्थशास्त्रियों में मतभेद है। पश्चिमी देशों में प्रचलित विचारधारा के अनुसार जब सरकार अपने व्ययों को पूरा करने के लिए ऋण लेती है तो उसे ही हीनार्थ प्रबन्धन कहते हैं, परन्तु भारत में हीनार्थ प्रबन्धन का अर्थ अलग प्रकार से लगाया जाता है। भारत में घाटे की वित्त व्यवस्था से अभिप्राय सरकार द्वारा बजट के घाटे को अधिक नोट छापकर अथवा केन्द्रीय बैंक (रिजर्व बैंक) से ऋण लेकर पूरा करने से है। दोनों ही दशाओं के अन्तर्गत देश में मुद्रा की मात्रा में वृद्धि होती है।

हीनार्थ प्रबन्ध की मुख्य परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

(1) डॉ० वी० के० आर० वी० राव० के अनुसार, “जब सरकार जानबूझकर किसी उद्देश्य से अपनी आय से अधिक व्यय करे और अपने घाटे की पूर्ति किसी भी ऐसी विधि से करे, जिससे देश में मुद्रा (धातु, पत्र या साख) की मात्रा बढ़े  Public Finance Deficit Financingतो उसे हीनार्थ प्रबन्धन कहना चाहिए।”

(2) भारतीय योजना आयोग के अनुसार, “हीनार्थ प्रबन्धन शब्द का प्रयोग बजट के घाटे द्वारा कुल राष्ट्रीय व्यय में प्रत्यक्ष वृद्धि को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। ये घाटे चाहे आगम खाते से सम्बन्धित हों या पूँजी खाते से।’

घाटे के बजट एवं घाटे की वित्त व्यवस्था में अन्तर (Difference Between Deficit Budget and Deficit Financing)

जब किसी देश के बजट में चालू आय की अपेक्षा व्यय अधिक दिखाया जाता है तो उसे घाटे का बजट कहते हैं। इसके विपरीत जब सरकार इस घाटे को पूरा करने के लिए किसी भी विधि को अपनाती है (ऋण लेकर, संचित कोषों का प्रयोग करके, नोट छापकर) उसे घाटे की वित्त व्यवस्था कहा जाता है।

हीनार्थ प्रबन्धन के उद्देश्य (Objectives of Deficit Financing)

हीनार्थ प्रबन्धन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-

(i) मन्दीकाल के प्रभावों को रोकने के लिए,

(ii) निजी विनियोगों की कमी को पूरा करना,

(iii) युद्धकालीन व्यय की पूर्ति करना,

(iv) आर्थिक विकास के लिए वित्त व्यवस्था करना।

हीनार्थ प्रबन्धन के प्रभाव (Effects of Deficit Financing)

हीनार्थ प्रबन्धन के प्रभावों का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(1) मूल्यों में तीव्र वृद्धिहीनार्थ प्रबन्धन मूल्यों में तीव्र वृद्धि करता है। हीनार्थ प्रबन्धन के परिणामस्वरूप अतिरिक्त मुद्रा चलन में आ जाती है तथा मौद्रिक आय बढ़ जाती, है और वस्तुओं एवं सेवाओं की कुल माँग में वृद्धि हो जाती है। परन्तु मौद्रिक आय की वृद्धि के अनुपात में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन नहीं बढ़ता जिससे उनकी माँग व पूर्ति में असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार कुल माँग में वृद्धि हो जाने के कारण कीमत स्तर में वृद्धि होने लगती है।

(2) रोजगार पर प्रभावमन्दी काल में घाटे की वित्त-व्यवस्था का रोजगार पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। घाटे की वित्त-व्यवस्था से एक ओर सार्वजनिक निर्माण कार्यों द्वारा जनता के हाथों में अतिरिक्त क्रय-शक्ति पहुँचती है तथा दूसरी ओर मूल्यों में वृद्धि के कारण उद्योगपति एवं व्यवसायी वर्ग प्रोत्साहित होता है। इन दोनों बातों का ही रोजगार की दशाओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

(3) बचतों पर दुष्प्रभावहीनार्थ प्रबन्धन के कारण मूल्यों में वृद्धि होती है। फलस्वरूप लोगों की आय का अधिकांश भाग उपभोग पर व्यय हो जाता है जिससे बचतें हतोत्साहित हो जाती हैं।

(4) साख निर्माण में वृद्धिहीनार्थ प्रबन्धन द्वारा जनता के हाथ में अधिक क्रय-शक्ति पहुँच जाती है जिससे बैंकों की जमाओं में वृद्धि हो जाती है और बैंक अधिक मात्रा में साख सृजन करने में सफल हो जाते हैं।

(5) आय आर्थिक विषमतायेंहीनार्थ प्रबन्धन समाज में आय और धन की विषमताओं को बढ़ा देता है। अमीर अधिक अमीर एवं गरीब और गरीब बन जाते हैं। इसका कारण यह है कि धनिकों की आय मूल्य वृद्धि की अपेक्षा अधिक बढ़ती है जबकि निर्धनों की आय मूल्य वृद्धि की अपेक्षा कम बढ़ती है।

(6) अन्य प्रभावहीनार्थ प्रबन्धन में व्यवसायी वर्ग का नैतिक स्तर गिर जाता है। जमाखोरी, चोरबाजारी, मुनाफाखोरी आदि दोष समाज में उत्पन्न हो जाते हैं। वस्तुओं का कृत्रिम अभाव हो जाता है, श्रमिक वर्ग में सर्वत्र असन्तोष की ज्वाला भड़क उठती है जिसके भयंकर दुष्परिणाम होते हैं।

क्या हीनार्थ प्रबन्धन आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य है ? (Is Deficit Financing Necessary for Economic Development?)

आधुनिक समय में अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करना है। इसके लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं एवं परियोजनाओं का निर्माण करना पड़ता है। इन देशों में आय, बचत एवं पूँजी निर्माण का स्तर निम्न होता है। Public Finance Deficit Financing अत: आर्थिक नियोजन की आवश्यकता को देखते हुये देश में उपलब्ध वित्तीय साधन पर्याप्त नहीं होते। इसकी पूर्ति वह हीनार्थ प्रबन्धन की नीति अपनाकर करता है। अत: हीनार्थ प्रबन्धन आर्थिक विकास के लिए न केवल उपयोगी है अपितु आवश्यक भी है। यह विकास वित्त की एक शक्तिशाली तकनीक है Public Finance Deficit Financing और अल्प विकसित देशों में विकास वित्त के साधन के रूप में इस तकनीक का एक महत्वपूर्ण स्थान है। डॉ० राव का मत है, “यद्यपि हीनार्थ प्रबन्धन का विकास युद्ध सम्बन्धी वित्त की कमी को पूरा करने के लिए किया गया था, परन्तु आधुनिक समय में इसका प्रयोग मुख्य रूप से आर्थिक विकास हेतु वांछित धन की प्राप्ति के लिए अधिक किया जाने लगा है।”

क्या हीनार्थ प्रबन्धन आवश्यक रूप से मुद्रा-प्रसार को जन्म देता है? (Is Deficit Financing Inflationary?)

यह सोचना गलत है कि हीनार्थ प्रबन्धन आवश्यक रूप से मुद्रा प्रसार को जन्म देता है। इसमें सन्देह नहीं कि चलन में मुद्रा की मात्रा बढ़ने से मूल्य स्तर भी बढ़ जाता है। परन्तु, प्रत्येक मूल्य-वृद्धि मुद्रा-प्रसार को जन्म नहीं देती है। डॉ० राव० के अनुसार, “हीनार्थ प्रबन्धन से मूल्यों में थोड़ी-बहुत मूल्य वृद्धि अवश्यम्भावी है, परन्तु इससे हीनार्थ प्रबन्धन को मुद्रा-प्रसार का एक कारण मान लेना भ्रमपूर्ण होगा। मूल्यों में होने वाली वृद्धि मुद्रा-प्रसार का रूप उस समय धारण करती है Public Finance Deficit Financing जब मूल्य वृद्धि का दूषित चक्र आरम्भ हो जाता है अर्थात् जब प्रारम्भिक मूल्य वृद्धि संचयी आधार पर पुनः मूल्य वृद्धि को जन्म देने लगती है।”

मुद्रा प्रसार कब माना जायेगाकिसी देश में हीनार्थ प्रबन्धन के कारण मुद्रा-स्फीति की स्थिति निम्नांकित तत्वों पर निर्भर करती है–

(1) जब उत्पादन का ढाँचा पूर्णतया लोचहीन हो जाये अर्थात् मुद्रा की मात्रा में वृद्धि होने पर उत्पादन उस अनुपात में न बढ़े जिस अनुपात में मुद्रा बढ़ती है।

(2) जब हीनार्थ प्रबन्धन के फलस्वरूप मुद्रा की मात्रा बढ़ने पर बैंक साख का निर्माण तीव्र गति से करने लगे।

(3) जब मौद्रिक आय में होने वाली वृद्धि उपभोग प्रवृत्ति को बढ़ा दे।

(4) जब विनियोग तथा उत्पादन में, वस्तुओं की अतिरिक्त माँग तथा पूर्ति में, प्राप्त मजदूरी तथा किये जाने वाले व्यय में, मुद्रा-प्रसार तथा रोजगार में समय-अन्तराल (Time-interval) हो।

(5) जब हीनार्थ प्रबन्धन बड़ी मात्रा में किया जाये।

(6) जब विदेशी विनिमय का अभाव हो और बढ़ती हुई माँग को आयातों द्वारा पूरा न किया जा सके।

हीनार्थ प्रबन्धन से उत्पन्न मुद्राप्रसार को रोकने के उपाय (Measures to Minimise the Inflationary Effects of Deficit Financing)

हीनार्थ प्रबन्धन से उत्पन्न मुद्रा प्रसार को रोकने के लिए निम्न उपाय अपनाये जा सकते हैं-

(1) राजकोषीय उपाय (Fiscal Measures)-

(i) जनता की अतिरिक्त क्रय- शक्ति को कम करने के लिए पुराने करों में वृद्धि की जाये तथा नये कर लगाये जायें।

(ii) अनिवार्य बचत योजना को लागू किया जाये।

(iii) अधिकाधिक मात्रा में जनता से ऋण प्राप्त किया जाये।

(iv) अनुत्पादक सार्वजनिक व्ययों में कमी की जाये।

(2) मौद्रिक उपाय (Monetary Measures)- उचित मौद्रिक नीति द्वारा साख के विस्तार पर रोक लगाते हुए विनियोगों को उपयोगी क्षेत्र में ही प्रोत्साहित किया जाये।

(3) अन्य उपाय (Other Measures)

(i) धन का विनियोग शीघ्र फल देने वाली परियोजनाओं में किया जाना चाहिए।

(ii) उपभोग्य वस्तुओं एवं आवश्यक कच्चे माल की पूर्ति बढ़ाने के प्रयास किये जायें।

(iii) उपभोक्ता वस्तुओं की पूर्ति के वितरण को मूल्य-नीति तथा राशनिंग आदि द्वारा नियन्त्रित करके, मुद्रा प्रसार के प्रभावों को कम करने के प्रयास किये जाने चाहिये।

(iv) नकद मजदूरी एवं वेतन में वृद्धि पर रोक लगायी जाये।

(v) अनावश्यक उपभोग को हतोत्साहित किया जाये।

(vi) खाद्य वस्तुओं का पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाये ताकि कीमतें नीची रहें।

हीनार्थ प्रबन्धन की सीमाएँ (Limitations of Deficit Financing)

यद्यपि विकासशील देशों के आर्थिक विकास में हीनार्थ प्रबन्धन का विशेष महत्व है, तथापि हीनार्थ प्रबन्धन एक सीमा के अन्तर्गत होना चाहिए। हीनार्थ प्रबन्धन अपनाने में निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए |

1, हीनार्थ प्रबन्धन का प्रयोग अनुत्पादक कार्यों की अपेक्षा उत्पादक कार्यों में अधिक किया जाए जिससे वस्तुओं की माँग बढ़ने के साथ-साथ उत्पादन भी बढ़ जाए और मूल्यों में वृद्धि न हो।

2, हीनार्थ प्रबन्धन की सुरक्षित सीमा से कम मात्रा में हीनार्थ प्रबन्धन करना चाहिए ताकि मुद्रा-स्फीतिक दशाएँ उत्पन्न न होने पाएँ।

3, हीनार्थ प्रबन्धन सरकार द्वारा अतिरिक्त क्रय-शक्ति को निष्क्रिय करने के लिए ही किया जाना चाहिए। सरकार नई मुद्रा को करारोपण, अनिवार्य बचत, सार्वजनिक-ऋण आदि की सहायता से यदि शीघ्रता से अपने पास वापस ले सकती है तो अधिक हीनार्थ प्रबन्धन किया जा सकता है।

4, यदि देश में अधिकाँश क्षेत्र अमौद्रिक हैं तो हीनार्थ प्रबन्धन अधिक मात्रा में किया जा सकता है, क्योंकि आर्थिक विकास के साथ-साथ मौद्रिक क्षेत्र बढ़ेगा, मुद्रा की माँग बढ़ेगी और नई मुद्रा-स्फीतिक दशा उत्पन्न नहीं कर सकेगी।

5, यदि जनता प्रारम्भिक कष्टों को सहन करने के लिए तैयार है तो हीनार्थ प्रबन्धन अधिक मात्रा में किया जा सकता है।

हीनार्थ प्रबन्धन स्वयं में कोई खतरनाक पद्धति नहीं है, यदि इसे उचित सीमाओं और नियन्त्रण में रखा जाए। यह विकासशील देशों के आर्थिक विकास के लिए एक अनिवार्य तथा सुलभ साधन है, किन्तु इसका प्रयोग एक आकस्मिक या संकटकालीन प्रक्रिया के रूप में होना चाहिए, एक नियमित नीति के रूप में नहीं। “हीनार्थ प्रबन्धन अपने आप में न अच्छा है और न बुरा इसमें मुद्रा-स्फीति स्वभावतः निहित है।” यह एक अत्यन्त कोमल हथियार है जिसका प्रयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।

 

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