Bcom 1st Year Business Low Contracts of Indemnity and Guarantee

Bcom 1st Year Business Low Contracts of Indemnity and Guarantee

 

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Bcom 1st Year Business Low Contracts of Indemnity and Guarantee
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हानि रक्षा तथा प्रत्याभूति अनुबन्ध (Contracts of Indemnity and Guarantee)

प्रश्न 16, क्षतिपूर्ति अनुबन्ध तथा प्रतिभूति अनुबन्ध की परिभाषा देते हुये अन्तर समझाइये। 

(2000, 1998, 1991)

अथवा

क्षतिपूर्ति अनुबन्ध तथा प्रतिभूति अनुबन्धों में अन्तर स्पष्ट कीजिये। उन परिस्थितियों की विवेचना कीजिये जिनमें एक प्रत्याभूति अवैध हो जाती है।

(1999)

अथवा

प्रत्याभूति अनुबन्ध की परिभाषा दीजिये। किन दशाओं में एक प्रत्याभूति अवैध हो जाती है?

(1998 Pvt,)

अथवा

प्रत्याभूति अनुबन्ध की परिभाषा दीजिये। हानि रक्षा अनुबन्ध एवं प्रत्याभूति अनुबन्ध में अन्तर बताइये। हानि रक्षाधारी के अधिकारों की व्याख्या कीजिये।

अथवा

क्षतिपूर्ति के अनुबन्ध का अर्थ समझाइये। क्षतिपूर्ति के अनुबन्ध एवं गारण्टी के अनुबन्ध में अन्तर बताइये ।

(2005 Back)

उत्तर

हानिरक्षा (क्षतिपूर्ति ) अनुबन्ध की परिभाषा (Definition of Contract of Indemnity)

 

भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 124 के अनुसार, “हानि रक्षा अनुबन्ध से आशय एक ऐसे अनुबन्ध से है जिसके अन्तर्गत एक पक्षकार किसी दूसरे पक्षकार को किसी ऐसी हानि से बचाने का वचन देता है जो उसे (दूसरे पक्षकार को) स्वयं वचनदाता अथवा किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से पहुँचे।” (“A contract by which one party promises to save the other from loss caused to him by the conduct of the promissory himself, or by the conduct of any other person, is called a Contract of Indemnity,’

 

उदाहरणार्थ, रजत, भरत से अनुबन्ध करता है कि वह भरत को ऐसी हानि से बचायेगा जो , अमित द्वारा भरत पर मुकदमा करने के कारण होगी। यह अनुबन्ध हानि रक्षा का अनबन्ध है। जो व्यक्ति हानि से बचाने के लिये वचन देता है, वह हानि रक्षक (Indemnifies) और जिस व्यक्ति का हानि की रक्षा का वचन दिया जाता है, हानि रक्षाधारी’ (Indemnity holder) कहलाता है।

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार केवल वे ही अनुबन्ध क्षतिपूर्ति के अनुबन्ध कहे जायेंगे जिनमें किसी ऐसी हानि की पूर्ति किये जाने का वचन हो, जो हानिरक्षक अथवा किसी अन्य व्यक्ति के आचरण के कारण उत्पन्न होती है। वह अनुबन्ध जो किसी दुर्घटना के कारण हुई हानि की पूर्ति के लिये किया जाता है (जैसे अग्नि बीमा अनुबन्ध) क्षतिपूर्ति का अनुबन्ध नहीं कहलायेगा। लेकिन यह बात सही प्रतीत नहीं होती क्योंकि बीमा अनुबन्ध (जीवन बीमा को छोडकर) मूलतः क्षतिपूर्ति के अनुबन्ध कहे जाते हैं। अतएव, भारतीय न्यायालय इस परिभाषा का पूर्ण न मानते हुये इस सम्बन्ध में अंग्रेजी कानून का सहारा लेते हैं जिसके अनुसार क्षतिपूर्ति अनुबन्ध एक ऐसा अनुबन्ध है जिसके अन्तर्गत, “किसी निर्दोष व्यक्ति को एक ऐसे लेन-देन के कारण हुई हानि से बचाने का वचन दिया जाता है जो वचनदाता के अनुरोध पर किया गया हो।” क्षतिपूर्ति अनुबन्ध की यह एक व्यापक परिभाषा है जिसके अनुसार किसी व्यक्ति के आचरण द्वारा हुई हानि ही नहीं वरन् किसी घटना के फलस्वरूप हुई हानि की पूर्ति के वचन को भी क्षतिपूर्ति अनुबन्ध माना जाता है। हानि रक्षा का अनुबन्ध स्पष्ट अथवा गर्भित दोनों प्रकार का हो सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य सामान्य अनुबन्धों की भाँति हानि रक्षा अनुवन्ध में भी । एक वैध अनुबन्ध के सभी लक्षणों का होना आवश्यक है।

 

गारण्टी अथवा प्रत्याभूति का अनुबन्ध (Contract of Guarantee)

 

भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 126 के अनुसार, “प्रत्याभूति अनुबन्ध से तात्पर्य एक ऐसे अनुबन्ध से है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से किसी अन्य व्यक्ति की त्रुटि की दशा में उसके (तीसरे व्यक्ति के) वचन का निष्पादन करने या उत्तरदायित्व को पूरा करने का वचन देता है।” (“A Contract of guarantee is a contract to perform the promise or discharge the liability, of a third party in case of his default,”)

 

इस प्रकार के अनुबन्ध में जो व्यक्ति गारन्टी देता है उसे प्रतिभू (Surety), जिसके सम्बन्ध में गारन्टी दी जाती है उसे मूल ऋणी (Principal Debtor) एवं जिसको गारन्टी दी जाती है उसे ऋणदाता (Creditor) कहते हैं। अतः एक प्रत्याभूति के अनुबन्ध में तीन पक्षकार होते हैं-प्रतिभू, ऋणदाता एवं मूल ऋणी। प्रत्याभूति अनुबन्ध के अन्तर्गत दी जाने वाली गारन्टी लिखित अथवा मौखिक रूप में हो सकती है, परन्तु अंग्रेजी राजेनियम के अन्तर्गत यह सदैव लिखित रूप में ही होनी चाहिये। ऐसी प्रतिभूति (गारण्टी) किसी पक्षकार के अच्छे आचरण के सम्बन्ध में, किसी ऋण के सम्बन्ध में अथवा किसी पक्षकार द्वारा उधार माल खरीदने की दशा में दी जाती है।

 

उदाहरणार्थ, अतुल, विपुल से कहता है कि वहं राहुल को एक माह के लिये 1,000 ,,, रुपये उधार दे दे और यह वचन देता है कि अगर राहुल समय पर ऋण का भुगतान नहीं करेगा तो वह स्वयं उसका भुगतान कर देगा। अतुल तथा विपुल के बीच यह एक गारण्टी का अनुबन्ध है। इसमें अतुल गारण्टीकर्ता (प्रतिभू) है, राहुल मूल ऋणी तथा विपुल ऋणदाता है।

 

हानिरक्षा (क्षतिपूर्ति) तथा प्रत्याभूति अनुबन्ध में अन्तर (Difference Between Contract of Indemnity and Guarantee)

 

अन्तर का आधारक्षतिपूर्ति अनुबन्धप्रत्याभूति अनुबन्ध
1, पक्षकारों की संख्याइसमें केवल दो पक्षकार होते है-

(i) हानिरक्षक तथा

(ii) हानि रक्षाधारी |

इसमें तीन पक्षकार होते है–

(i) मूल ऋणी,

(ii) ऋणदाता,

(iii) परिभू |

2, अनुबन्धों की संख्याइसमें हानिरक्षक तथा हानि रक्षाधारी के बीच केवल एक ही अनुबंध होता है |इसमें तिन अनुबंध होते है –

(i) मूल ऋणी और ऋणदाता के बीच,

(ii) ऋणदाता तथा प्रतिभू के बीच तथा (iii) प्रतिभू एवं मूल ऋणी के बीच |

3, उदेश्यइसका उदेश्य हानि रक्षा धारी को भावी अथवा किसी अनिश्चित घटना से होने वाली हानि से बचाना होता है |इसमें उदेश्य मूल ऋणी के वेचन के निष्पादन (पूरा करने) की जमानत देना होता है |
4, उत्तरदायित्त्वहानि रक्षक का उत्तरदायित्त्व प्राथमिक एवं स्वतन्त्र होता है |इसमें प्रतिभू का दायित्त्व गौण होता है जो मूल ऋणी द्वारा अपने दायित्त्व सम्मिलित हो सकता है |
5, क्षेत्रक्षतिपूर्ति के अनुबंध में प्रत्याभूति अनुबंध को सम्मिलित नही किया जा सकता |प्रत्याभूति के अनुबन्ध में क्षतिपूर्ति स्नुबंध सम्मिलित हो सकता है |
6, अनुबन्ध करने की क्षमताइसमें दोनों पक्षकारों में अनुबन्ध करने की क्षमता का होना अनुवार्य है |इसमें मूल ऋणी में अनुबंध करने की क्षमता का होना अनुवार्य नही है |
7, प्रतिफल या व्यक्तिगत हितइसमें हानि रक्षक का प्राय: कोई व्यक्तिगत हित (जैसे प्रीमियम) मिलना) होता है |इसमें प्रतिभू अपने बचन के बदले स्वयम कुछ भी प्रतिफल प्राप्त नही करता |
8, वाद प्रस्तुत करनाहानि रक्षक, तीसरे पक्षकारों के विरुध्द जन्होने हानि पहुँचाई हो, अपने स्वयम के नाम से वाद केवल हानी रक्षा धारी के नाम से ही वाद प्रस्तुत कर सकता हैमूल ऋणी के त्रुटी की दशा में प्रतिभू द्वारा अपने दायित्त्व को प्र करने के पश्चात् प्रतिभू अपने स्वयम के नाम मूल ऋणी के विरुध्द वाफ प्रस्तुत कर सकता है |

 

 

अवैध प्रतिभूति (Invalid Guarantee Contract)

 

निम्नलिखित दशाओं में प्रतिभूति (Guarantee obtained by Misrepresentation)- यदि ऋणदाता द्वारा अथवा उसकी जानकारी और सहमती से अनुबंध के किसी महत्वपूर्ण तथ्य के सम्बन्ध में मिथ्यावर्णन द्वारा गारण्टी प्राप्त की गई है तो ऐसी प्रतिभूति (गारण्टी) अवैध होती है |

उदाहरणार्थ, ‘अ’, ‘ब’ को अपने लिए रूपये इकट्ठा करने के लिए क्लर्क के रूप में नौकर रखता है | ‘ब’ कुछ रूपये का हिसाब नही दे पाता | फलस्वरूप ‘अ’, ‘ब’ से ठीक-ठीक हिसाब देने के लिए प्रतिभूति माँगता है | ‘स’, ‘ब’ द्वारा ठीक हिसाब देने के लिये प्रतिभू हो जाता है। ‘अ’, ‘स’ से ‘ब’ के पहले आचरण के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं बताता। बाद में “ब’ त्रुटि करता है। यह प्रतिभूति अवैध और व्यर्थ है।

2, छुपाव द्वारा प्राप्त की गई प्रतिभूति (Guarantee Obtained by Concealment)- यदि ऋणदाता अनुबन्ध से सम्बन्धित किसी महत्वपूर्ण तथ्य के विषय में (जिसको गारण्टी देते समय उसे प्रतिभू को बता देना चाहिये था) मौन रहता है अथवा, उसे छुपा लेता है तो ऐसी दशा में प्राप्त प्रतिभूति अमान्य और अवैध होगी। उदाहरणार्थ, मोहन द्वारा सोहन को दिये जाने वाले 500 टन लोहे के मूल्य के भुगतान के लिये अजय प्रतिभूति देता है। मोहन एवं सोहन में एक गुप्त समझौता होता है कि सोहन बाजार भाव से 3 रुपये प्रति टन मूल्य अधिक देगा और प्राप्त राशि का उपभोग मोहन द्वारा एक पुराने ऋण के भुगतान में किया जायेगा। अजय को इस गुप्त समझौते की कोई जानकारी नहीं है, अत: वह उत्तरदायित्व से मुक्त , , माना जायेगा।

3, सहप्रतिभू के शामिल होने की शर्त पर दी गई प्रतिभूति (Guarantee Given on the condition of Joining Cosurety)- यदि प्रतिभूति इस शर्त पर दी गई है कि प्रतिभू का तब तक कोई दायित्व नहीं होगा जब तक कि कोई दूसरा व्यक्ति सह-प्रतिभू न बन जाये, तो किसी दूसरे व्यक्ति के सह-प्रतिभू न बनने की दशा में प्रतिभूति अनुबन्ध मान्य नहीं होगा अर्थात् दी गई प्रतिभूति अवैध होगी। उदाहरणार्थ, प्रभाकर इस शर्त पर ‘ब’ द्वारा उधार रुपयों का भुगतान करने की प्रतिभूति ‘स’ को देने के लिये तैयार है कि मधुकर भी सह-प्रतिभू बनने को तैयार हो। मधुकर अपनी सहमति नहीं देता। यहाँ पर प्रभाकर द्वारा दी गई प्रतिभूति अवैध मानी जायेगी।

प्रश्न 17, चालू प्रतिभूति क्या है? क्या ऐसी प्रतिभूति का खण्डन किया जा , सकता है? यदि हाँ, तो किस सीमा तक तथा किस विधि से?

(1997 R,)

अथवा चालू प्रत्याभूति से आपका क्या अभिप्राय है? इसका खण्डन किस प्रकार किया , जा सकता है? संक्षेप में बताइये।

(1990 R,, 1985 R,)

उत्तर

प्रतिभूति के भेद अथवा प्रकार (Kinds or Types of Guarantee)

प्रतिभूति मुख्यतः निम्नलिखित दो प्रकार की होती है विशिष्ट प्रतिभूति (Specific Guarantee)-जब किसी विशेप ऋण या वचन के लिये गारण्टी दी जाती है तो उसे ‘विशिष्ट गारण्टी’ कहते हैं। इसमें गारण्टी देने वाले का अर्थात् प्रतिभू का दायित्व केवल एक लेन-देन तक ही सीमित रहता है और जब वह लेन-देन पूरा हो जाता है तो गारण्टी अनुबन्ध भी समाप्त हो जाता है। उदाहरणार्थ, अमित ने सुमित, से 5 बोरी चीनी उधार खरीदी जिसके मूल्य के भुगतान के लिये विजय ने गारण्टी दी। यह एक विशिष्ट गारण्टी है। अमित ने 15 दिन बाद मूल्य चुका दिया। अब गारण्टी अनुबन्ध समाप्त हुआ माना जायेगा। यदि इसके बाद सुमित पुनः आमेत को 2 बोरी चीनी उधार दे देता है तो इसके भुगतान के लिये विजय की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। ,

2 चालू, सतत् या निरन्तर गारण्टी (धारा 129) (Continuing Guarantee)- जब कोई गारण्टी लेन-देनों की एक श्रृंखला के सम्बन्ध में दी जाती है तो उसे चालू, सतत् या निरन्तर गारण्टी कहते हैं।, यह किसी एक विशिष्ट व्यवहार तक ही सीमित नहीं रहती है। चालू – प्रतिभूति की दशा में प्रतिभू, प्रतिभूति की राशि अथवा अवधि के अनुसार अपने उत्तरदायित्व * को सीमित कर सकता है। उदाहरणार्थ, अमित ने अपनी जायदाद का किराया वसूल करने के

लिये सुमित को नियुक्त किया। विजय ने सुमित द्वारा उचित रूप से किराया वसूल करने और प्राप्त राशि का अमित को भुगतान करने के लिये 2,000 रुपये तक की प्रतिभूति दी। यह चालू प्रतिभूति का अनुबन्ध है।

 

चालू प्रतिभूति की समाप्ति या खण्डन (Revocation of Continuing Guarantee)- चालू प्रतिभूति को निम्नलिखित दो प्रकार से समाप्त किया जा सकता है-

(i) सूचना द्वारा (By Notice)- (धारा 130) प्रतिभू किसी भी समय लेनदार (ऋणदाता) को सूचना भेजकर भविष्य के (आगे के) व्यवहारों के लिये अपनी चालू प्रतिभूति को समाप्त कर सकता है, लेकिन सूचना से पहले के लेन-देनों के लिये उसकी जिम्मेदारी बनी रहती है। उदाहरणार्थ, दिनेश द्वारा रमेश पर लिखे जाने वाले विभिन्न बिलों के भुगतान के सम्बन्ध में मोहन 10,000 रुपये तक की गारण्टी देता है। दिनेश ने रमेश पर 2,000 रुपये का एक बिल लिखा जो रमेश ने स्वीकृत कर लिया। बाद में मोहन ने दिनेश को गारण्टी के खण्डन की सूचना भेज दी। ऐसी स्थिति में, सूचना के बाद लिखे जाने वाले बिलों के लिये मोहन किसी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है। लेकिन, अगर रमेश देय तिथि पर 2,000 रुपये के पुराने बिल का भुगतान नहीं करता तो मोहन इसके लिये पूर्णतया दायी होगा, क्योंकि यह बिल खण्डन की सूचना से पहले लिखा गया था।

(ii) प्रतिभू की मृत्यु हो जाने पर (By Surety’s Death)- (धारा 131) यदि कोई विपरीते अनुबन्ध न हो तो प्रतिभू की मृत्यु हो जाने पर भावी लेन-देनों के सम्बन्ध में चालू गारण्टी समाप्त हो जाती है और प्रतिभू की सम्पत्ति अथवा उसके उत्तराधिकारी मृत्यु के पश्चात् के व्यवहारों के लिये उत्तरदायी नहीं होते हैं। इसके लिये ऋणदाता को प्रतिभू की मृत्यु की सूचना का होना आवश्यक नहीं है। हाँ, मृत्यु से पहले के लेन-देनों के सम्बन्ध में उनका दायित्व बना रहता है।

 

उपर्युक्त दो परिस्थितियों के अलावा चालू गारण्टी उन सब दशाओं में भी समाप्त हो जाती है जिनमें प्रतिभू (गारण्टी देने वाला) दायित्व-मुक्त हो जाता है, जैसे मूल अनुबन्ध की शर्तों में परिवर्तन किये जाने पर, मूल ऋणी के मुक्त होने पर, मूल ऋणी एवं ऋणदाता के बीच कोई समझौता होने पर, ऋणदाता के किसी कार्य या भूल से प्रतिभू के अधिकारों में कमी आने पर, अथवा ऋणदाता द्वारा जमानत खो देने पर आदि।

पश्न18:- एक प्रतिभू किनकिन दशाओं में अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाता है-

(1997 Back, 1994 Pvt, 1993, 1991, 1983, 1981) 

अथवा

प्रतिभूति अनुबन्ध किसे कहते है? किन-किन परिस्थितियों में एक प्रतिभू अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाता है?

(2004)

उत्तर

प्रतिभू का अपने दायित्व से मुक्त होना (Discharge of Surety from his Liability)

 

निम्नलिखित दशाओं में प्रतिभू अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है एवं उसके द्वारा दी गई गारण्टी का अन्त हो जाता है-

1, संचना द्वारा खण्डन किये जाने पर (By Notice of Revocation) चाल गारी की दशा में प्रतिभू भावी व्यवहारों के सम्बन्ध में किसी भी समय ऋणदाता को गारण्टी के खण्डन की सचना देकर अपने भावी दायित्व से मुक्त हो जाता है। परन्तु एक विशिष्ट गारण्टी याति) की दशा में यदि उत्तरदायित्व उत्पन्न हो गया है तो उसका खण्डन नहीं किया जा सकता। यदि उत्तरदायित्व उत्पन्न नहीं हुआ हो तो विशिष्ट प्रत्याभूति की दशा में भी प्रतिभू ऋणदाता को खण्डन की सूचना दकर अपने दायित्व से मुक्त हो सकता है। (धारा 130)

 

2, प्रतिभू की मृत्यु होने पर (By Death of Surety)- किसी विपरीत अनुबन्ध के अभाव में प्रतिभू की मृत्यु हो जाने पर मृत्यु के पश्चात् होने वाले तेन-देनों के लिये प्रतिभू का दायित्व समाप्त हो जाता है। मृत्यु के पश्चात् उत्पन्न होने वाले दायित्वों के लिये प्रतिभू की सम्पत्ति या उसके उत्तराधिकारी भी उत्तरदायी नहीं होते हैं। ऋणदाता को प्रतिभू की मृत्यु की सूचना दिया जाना भी आवश्यक नहीं है। मृत्यु से पूर्व हुये व्यवहारों के लिये प्रतिभू के उत्तराधिकारियों का दायित्व बना रहता है। (धारा 131)

3, अनुबन्ध की शर्तों में परिवर्तन होने पर (By Variance in the Terms of the Contract)- यदि प्रतिभू की सहमति के बिना ऋणदाता एवं मूल ऋणी द्वारा मूल अनुबन्ध की शर्तों में कोई परिवर्तन कर दिया जाता है, भले ही परिवर्तन प्रतिभू के लाभ के लिये क्यों न हो ‘तो भी परिवर्तन के बाद उत्पन्न होने वाले दायित्वों के सम्बन्ध में प्रतिभू अपने उत्तरदायित्व से –

मुक्त हो जाता है। परन्तु यदि परिवर्तन के लिये प्रतिभू ने अपनी सहमति दे दी है तो वह अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, अतुल, विपुल को 1 मार्च को 2,000 रुपये का ऋण देने का वचन देता है एवं ऋण वापसी की गारण्टी राहुल द्वारा दी जाती है। परन्तु अतुल यह ऋण विपुल को । जनवरी को ही दे देता है। चूंकि ऋण प्रदान करने की तिथि में प्रतिभू की सहमति के बिना ही परिवर्तन कर लिया गया है, अत: राहुल अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जायेगा। (धारा 133)

4, मूले ऋणी को मुक्त कर देने पर (By Release or Discharge of Principal Debtor)- यदि मुल ऋणी एवं ऋणदाता आपस में कोई ऐसा अनुबन्ध कर लेते हैं अथवा ‘ऋणदाता कोई ऐसा कार्य या भूल करता है जिसके फलस्वरूप मूल ऋणी अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है तो ऐसी दशा में प्रतिभू भी अपने दायित्व से मुक्त हो जायेगा। परन्तु यदि ऋणदाता निश्चित समय (Period of Limitation) के अन्दर मूल ऋणी पर ऋण की वसूली के लिये वाद प्रस्तुत करने में भूल करता है तो इससे प्रतिभू अपने दायित्व से मुक्त नहीं होता है। यदि मल ऋणी दिवालिया हो जाता है तो भी यह नियम लागू नहीं होगा। उदाहरणार्थ, अजय द्वारा विजय को बेचे जाने वाले माल के भुगतान के लिये संजय गारण्टी देता है। बाद में विजय की वित्तीय स्थिति खराब हो जाती है, अतः वह अजय सहित अपने सभी लेनदारों में विभिन्न अनुबन्धों के अधीन अपनी सम्पत्ति बाँटकर दायित्व मुक्त हो जाता है। अजय के साथ किये गये इस अनुबन्ध से विजय ऋणमुक्त हो गया, अत: संजय भी प्रतिभू के रूप में अपने दायित्व से मुक्त माना जायेगा। (धारा 134) 

5, ऋणदाता तथा मूल ऋणी में समझौता होने पर (By Composition Between Creditor and Principal Debtor)- धारा 135 के अनुसार यदि ऋणदाता, मूल ऋणी के साथ बिना प्रतिभू की सहमति के कोई ऐसा अनुबन्ध कर लेता है जो मूल ऋणी के दायित्व को कम कर देता है अथवा ऋण की अवधि बढ़ा देता है या मूल ऋणी पर मुकदमा न चलाने का वचन देता है तो प्रतिभू अपने दायित्व से मुक्त हो जायेगा। इस नियम के निम्नलिखित तीन अपवाद हैं अर्थात् निम्नांकित स्थितियों में प्रतिभू अपने उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं होगा-(i) जब मूल ऋणी को अतिरिक्त समय देने का अनुबन्ध ऋणदाता ने मुल ऋणी के साथ न करके किसी तीसरे पक्षकार के साथ किया हो। (धारा 136), (ii) धारा 137 के अनुसार यदि ऋणदाता, मूल ऋणी पर कोई वाद प्रस्तुत न करे और न ही कोई दूसरा उपाय उसके विरुद्ध – प्रयोग करे तो ऋणदाता का इस प्रकार रुका रहना प्रतिभू को अपने दायित्व से मुक्त नहीं करेगा जब तक कि इसके विपरीत कोई ठहराव न हो, (iii) धारा 138 के अनुसार यदि किसी अनुबन्ध में कईं सह-प्रतिभू हैं और ऋणदाता उनमें से किसी एक को दायित्व से मुक्त कर दता हैं तो ऐसी दशा में न तो शेष प्रतिभ अपने दायित्व से मुक्त होगें और न ही ऋणदाता द्वारा मुक्ति प्राप्त प्रतिभू अन्य सह-प्रतिभूओं के प्रति अपने दायित्व से मुक्त होगा।

 

उदाहरण (i) अजय, विजय का 500 रुपये से ऋणी है जिसके भुगतान की गारण्टी संजय द्वारा दी गई है एवं ऋण का भुगतान एक वर्ष बाद किया जाना है। अजय की प्रार्थना पर परन्तु संजय की सहमति के बिना विजय ऋण की अवधि को एक वर्ष से बढ़ाकर दो वर्ष कर देता है। ऐसी दशा में संजय अपने दायित्व से मुक्त हो जायेगा।

(ii) रजत, भरत का 500 रुपये से ऋणी है जिसके भुगतान की गारण्टी प्रशान्त द्वारा दी गई है। ऋण देय हो जाने पर भी भरत, रजत पर । वर्ष तक वाद प्रस्तुत नहीं करता है। यहां पर प्रशान्त अपने दायित्व से मुक्त नहीं होगा।

 

6, ऋणदाता के किसी कार्य अथवा भूल से प्रतिभू के अधिकार में कमी आने पर (By Creditor’s Act or Omission Impairing Surety’s Remedy)- यदि ऋणदाता कोई ऐसा कार्य करता है जो प्रतिभू के अधिकारों के विरुद्ध है या कोई ऐसा कार्य करना भूल जाता है , जिस पूरा करना उसका उत्तरदायित्व था और जिसके कारण मल ऋणी के विरुद्ध प्रतिभू के अधिकारों में कमी आ जाती है, तो ऐसी दशा में प्रतिभू अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाता है। (धारा 139)

 

उदाहरण (i) रजत, भरत के लिये एक जहाज बनाने का अनुबन्ध करता है। यह तय हुआ कि जैसे-जैसे काम पूरा होता जायेगा, मूल्य का भुगतान किश्तों में होता रहेगा। रोहित ने रजत द्वारा जहाज बनाने की गारण्टी दी। भरत बिना रोहित की अनुमति के, जहाज पूरा होने से पहले ही दो अन्तिम किश्तों का भुगतान कर देता है। इससे रोहित का दायित्व समाप्त हो जाता है, क्योंकि काम पूरा होने से पहले अन्तिम किश्तों का भुगतान करना उसके हित के विपरीत है।

(ii) अजय, अरुण को अतुल की दुकान पर नौकर रखवाता है तथा उसकी ईमानदारी की गारण्टी देता है। अतुल भी यह वचन देता है कि वह हर महीने कम से कम एक बार अरुण के हिसाब की जाँच करेगा। अतुल’, अरुण के हिसाब की बिल्कुल जाँच नहीं करता और अरुण कुछ रुपये गबन कर लेता है। अतुल, अजय को गबन के लिये उत्तरदायी नहीं ठहरा सकता क्योंकि उसने अजय के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं किया।

 

7, ऋणदाता द्वारा प्रतिभूति खो देने पर (By Loss of Security- यदि प्रतिभति अनुबन्ध के अन्तर्गत ऋणदाता को कोई वस्तु या सम्पत्ति जमानत के रूप में प्रदान की गई है और ऋणदाता उसे खो देता है अथवा प्रतिभू की सहमति के बिना मूल ऋणी को वापिस कर देता है तो प्रतिभू अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है। (धारा 141) – उदाहरणार्थ, ‘अ’, ‘ब’ को ‘स’ की गारण्टी पर 500 रुपये उधार देता है। ‘अ’ के पास ‘ब’ का 400 रुपये मूल्य का फर्नीचर बन्धक रखा हुआ है। बाद में ‘अ’ बन्धक रखे हये फर्नीचर को ‘स’ की सहमति के बिना ‘ब’ को लौटा देता है। यहाँ पर फर्नीचर के मल्य की राशि तक ‘स’ का दायित्व समाप्त हुआ माना जायेगा।

8, दायित्व का निष्पादन होने पर, (By Performance)- मूल ऋणी द्वारा समय पर अपने वचन को पूरा करने पर अथवा मूल ऋणी की त्रुटि की दशा में प्रतिभू द्वारा वचन का निष्पादन किये जाने पर प्रतिभू अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है।

9, प्रतिभूति अनुबन्ध के अवैध हो जाने पर (By Invalidation of the Contract of Guarantee)- जब कोई गारण्टी कपट, मिथ्यावर्णन या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर प्राप्त की गई हो तो गारण्टी अनुबन्ध अवैध होता है और ऐसी दशा में प्रतिभू अपने दायित्व से,मुक्त समझा जाता है।

 

प्रश्न19, प्रतिभू के () ऋणदाता, () मूल ऋणी, तथा () सहप्रतिभूओं केवरुद्ध अधिकारों की व्याख्या कीजिये।

(1990)

अथवा

प्रतिभू के ऋणदाता, मूल ऋणी और सहप्रतिभू के प्रति क्या अधिकार है?

(1991 Pvt,, 1986, 1983 Pvt,)

 

उत्तर

प्रतिभू के अंधिकार (Rights of the Surety)

प्रतिभू के अधिकारों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है

1, मूल ऋणी के विरुद्ध अधिकार (Rights Against the Principal Debtor) धारा 140 के अनुसार जब मूल ऋणी अपने वचन के निष्पादन अथवा ऋण के भुगतान में त्रुटि करता है तथा इस कारण से प्रतिभू को उसकी ओर से भुगतान करना पड़ता है या वचन का निष्पादन करना पड़ता है तो उसे वे सब, अधिकार प्राप्त हो जाते हैं जो कि ऋणदाता को मूल ऋणी के विरुद्ध प्राप्त थे। प्रतिभू मूल ऋणी से व सब रकमें प्राप्त करने का भी अधिकारी होता है जो उसने प्रतिभूति के अधीन वैधानिक रूप से चुकायी हैं, परन्तु यदि वह किसी गलत रकम का भुगतान कर देता है तो उसके लिये मूल ऋणी उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ।

 

उदाहरणार्थ(i) ‘अ’, ‘स’ द्वारा ‘ब’ से लिये गये कुछ ऋण के लिये प्रतिभ है। ‘ब’ ‘अ’ से इस धन की माँग करता है तथा मना करने पर उसके विरुद्ध वाद प्रस्तुत करता है जिसका कुछ उचित आधार होने के कारण ‘अ’ द्वारा प्रतिवाद किया जाता है। परन्तु ‘अ’ को वाद की लागत सहित ऋण की रकम का भुगतान करना पड़ता है। ‘अ’ ‘स’ से दोनों धनराशि प्राप्त कर सकता है। इस वाद में यदि ‘अ’ के पास प्रतिवाद के लिये उचित आधार न होता तो वह वाद की ,, लागत को ‘स’ से प्राप्त नहीं कर पाता।

(ii) ‘अ’ ‘ब’ द्वारा ‘स’ को दिये गये चावल पर 2,000 रुपये की सीमा तक प्रत्याभूति देता है। ‘ब’ ‘स’ को 2,000 रुपये से कम मूल्य का चावल देता है किन्तु वह दिये गये चावल के बदले ‘अ’ से 2,000 रुपये का भुगतान प्राप्त कर लेता है। ‘अ’ ‘स’ से वास्तव में दिये गये चावल के मूल्य से अधिक धन वसूल नहीं कर सकता है।

 

2, ऋणदाता के विरुद्ध अधिकार (Rights Against the Creditor)- धारा 141 के अनुसार, जब प्रतिभू (गारन्टीकर्ता) ऋणदाता के प्रति अपने दायित्व को पूरा कर देता है तो वह ऋणदाता से ऐसी प्रत्येक वस्तु या सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है जो गारण्टी का अनुबन्ध करते समय उस ऋण की जमानत के रूप में ऋणदाता के पास थी, भले ही प्रतिभू , (गारण्टीकर्ता) को इसकी जानकारी हो या न हो। यदि ‘ऋणदाता जमानत की वस्तु खो देता है ।

 

अथवा, गारण्टीकर्ता की अनुमति के बिना उसे किसी दूसरे को दे देता है तो प्रतिभू उस वस्तु या सम्पत्ति के मूल्य की सीमा तक अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है। उदाहरणार्थ, अतुल संदीप की गारण्टी पर विशाल को 1,000 रुपये उधार दे देता है एवं प्रतिभूति के रूप में विशाल की घड़ी भी रख लेता है। विशाल द्वारा भुगतान न करने पर संदीप 1,000 रुपये अतुल को दे देता है। ऐसी दशा में संदीप को अधिकार है कि वह जमानत के रूप में विशाल द्वारा दी गई घड़ी को अतुल से प्राप्त कर ले।

 

3, सहप्रतिभूओं के विरुद्ध प्राप्त अधिकार (Rights Against Co-sureties)- जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक ही ऋण अथवा दायित्व के प्रतिभू बने हुये हों तो उन्हें सह-प्रतिभू कहते हैं। दूसरे शब्दों में जब एक ही ऋण या वचन के लिये दो या दो से अधिक व्यक्ति गारण्टी देते हैं तो उन्हें सह-प्रतिभू कहते हैं। सह-प्रतिभूओं की निम्नलिखित दो प्रकार की स्थिति हो सकती है-

(i) सहप्रतिभू समान रूप से अंशदान के लिये उत्तरदायी हैधारा 146 के अनुसार जहाँ दो या अधिक व्यक्ति, संयुक्त अथवा पृथक रूप से किसी एक ही ऋण अथवा कर्तव्य निष्पादन के लिये सह-प्रतिभू हैं तो वे किसी विपरीत अनुबन्ध के अभाव में उस ऋण अथवा उसके उस भाग के लिये जो मूल ऋणी द्वारा चुकाया नहीं गया है, आपस में बराबर रकम के लिये जिम्मेदार होते हैं, अर्थात् प्रतिभू को अपने सह-प्रतिभू से समान अंश प्राप्त करने का अधिकार होता है। यह महत्वहीन है कि अनुबन्ध करते समय उसे दूसरे प्रतिभू के बारे में ज्ञान था या नहीं अथवा वे अपने को एक या विभिन्न अनुबन्धों के अन्तर्गत बाध्य करते हैं। उदाहरणार्थ, ‘अ’, ‘ब’ तथा ‘स’, ‘द’ को ‘र’ द्वारा उधार दिये गये 3,000 रुपये के लिये प्रतिभू हैं। ‘द’ भुगतान में त्रुटि करता है। ‘अ’, ‘ब’ तथा ‘स’ में से प्रत्येक बराबर की रकम 1,000 रुपये के लिये अलग-अलग उत्तरदायी हैं। ,

(ii) विभिन्न राशियों के लिये गारण्टी देने वाले सहप्रतिभूओं का दायित्वधारा 147 के अनुसार, जब सह-प्रतिभूओं ने भिन्न-भिन्न राशियों के भुगतान का दायित्व उठाने के – लिये गारन्टी दी हों, तो वह अपनी-अपनी गारण्टी की सीमा तक बराबर-बराबर धनराशि चुकाने

के लिये उत्तरदायी होंगे अर्थात् प्रतिभू अपने सह-प्रतिभू से ऐसी धनराशि प्राप्त करने का अधिकारी है।

उदाहरणार्थ, अरुण, अतुल व राहुल एक खजांची की क्रमशः 10,000 रुपये, 20,000 रुपये व 30,000 रुपये तक की गारण्टी देते हैं। खजांची 30,000 रुपये का गबन करता है। इस दशा में तीनों को दस-दस हजार रुपये देने होंगे। लेकिन अगर वह 40,000 रुपये का गबन करता है तो अरुण 10,000 रुपये, अतुल 15,000 रुपये, व राहुल 15,000 रुपये देगा। यदि गबन की रकम 55,000 रुपये है तो अरुण 10,000 रुपये, अतुल 20,000 रुपये व राहुल 25,000 रुपये के लिये दायी होगा।

संक्षेप में, यदि किसी सह-प्रतिभू को पूरे ऋण का भुगतान करना पड़ता है, तो वह दूसरे प्रतिभूओं से उनके हिस्से की रकम वसूल करने का अधिकारी होता है।


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