Bcom 1st Year Business Low Consumer Protection Act 1986

Bcom 1st Year Business Low Consumer Protection Act 1986

 

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Bcom 1st Year Business Low Consumer Protection Act 1986
Bcom 1st Year Business Low Consumer Protection Act 1986

 

उपभोक्ता सरंक्षण अधिनियम,1986 (Consumer Protection Act, 1986)

प्रश्न 43, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 क्या है? उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के मुख्य प्रावधानों को समझाइये।

 (2004)

उत्तरउपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिये भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनिम, 1986 लागू किया गया। यह अधिनियम जम्मू एवं कश्मीर राज्य को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में 1 जुलाई, 1987 से लागू हुआ है। इस अधिनियम के लागू होने के पश्चात् इसमें अनेक कमियाँ दृष्टिगोचर होने लगी और अधिनियम के प्रावधानों में व्यापक संशोधन किये जाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। परिणामस्वरूप उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993 द्वारा अधिनियम में व्याप्त कुछ कमियों को दूर किया गया तथा अधिनियम के क्षेत्र को विस्तृत कर दिया गया। एक बार पुनः यह अनुभव किया गया कि वर्तमान अधिनियम के प्रावधान अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं हैं, अतः इन प्रावधानों में व्यापक संशोधन की आवश्यकता है। फलस्वरूप भारत सरकार द्वारा उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 पारित किया गया जो कि 15 मार्च, 2003 से प्रभावी बनाया गया।

 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उद्देश्यइस अधिनियम के विधेयक को संसद में प्रस्तुत करते समय निम्नलिखित उद्देश्य बताये गये थे-

(i) उपभोक्ता के अधिकारों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करना।

(ii) उपभोक्ताओं के हितों एवं अधिकारों के संरक्षण के लिये उपभोक्ता परिषदों की स्थापना के लिये व्यवस्था करना।

(iii) उपभोक्ताओं के विवादों तथा उनसे सम्बन्धित मामलों के निपटारे के लिये व्यवस्था करना।

(iv) उपभोक्ता विवादों का शीघ्रता एवं सरलता से निपटारा करना।

(v) उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिये अर्धन्यायिक मशीनरी (Quasi-judicial machinery) की व्यवस्था करना।

 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के प्रमुख प्रावधान

1, संक्षिप्त शीर्षकइस अधिनियम को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 कहा जाता है।

2, भौगोलिक क्षेत्रयह अधिनियम जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में समान रूप से लागू होता है। यह अधिनियम सभी केन्द्र शासित प्रदेशों पर भी समान रूप से लागू होता है।

3, माल तथा सेवाओं का क्षेत्रयह अधिनियम सभी माल (वस्तुओं) तथा सेवाओं पर लाग होता है, जब तक कि केन्द्रीय सरकार ने अधिसूचना जारी करके किसी वस्तु या सेवा को इसके प्रावधानों से मुक्त न कर दिया हो।

4, अतिरिक्त प्रावधानइस अधिनियम के प्रावधान देश में प्रचलित किसी भी अन्य अधिनियम के प्रावधानों के अतिरिक्त हैं। अत: यह अधिनियम किसी भी अन्य अधिनियम के क्षेत्र को सीमित या कम नहीं करता है।

5, अधिनियम का प्रभावयह अधिनियम केन्द्रीय सरकार की अधिसूचना की तिथि ” से लागू होगा। केन्द्रीय सरकार देश के विभिन्न राज्यों में तथा इस अधिनियम के विभिन्न ‘अध्यायों के प्रावधानों को अलग-अलग तिथियों से लागू कर सकती है।

6, उपभोक्ता संरक्षण परिषदों का गठनउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत केन्द्र एवं राज्य स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदों का गठन किया गया था, परन्तु उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के अन्तर्गत अब जिला स्तर भी उपभोक्ता संरक्षण परिपद के गठन का प्रावधान किया गया है। इन परिपदों के गठन का उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करना है।

7, उपभोक्ता विवाद समाधान व्यवस्था उपभोक्ता की शिकायतों के समाधान के लिये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में निम्नलिखित त्रिस्तरीय अर्द्ध-न्यायिक व्यवस्था (Three-tier quasi-judicial machinery) की गई है

(i) जिला मंच (District Forum)- राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले में एक ‘उपभोक्ता विवाद निवारण मंच’ स्थापित करेगी जिसे ‘जिला मंच’ के नाम से जाना जायेगा। राज्य सरकार यदि उपयुक्त समझे तो एक जिले में एक से अधिक जिला मंच भी स्थापित कर सकती है।

जिला मंच को उन शिकायतों की सुनवाई करने का अधिकार है जबकि वस्तुओं एवं सेवाओं की लागत तथा क्षतिपूर्ति की राशि बीस लाख रुपये से अधिक नहीं है।

(ii) राज्य आयोग (State Commission)- प्रत्येक राज्य सरकार अपने राज्य में केन्द्रीय सरकार की पूर्वानुमति से उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की स्थापना कर सकती है। इसे ही राज्य आयोग के नाम से जाना जाता है। इसके लिये राज्य सरकार अधिसूचना निर्गमित करती है। 20 लाख रूपये या अधिक परन्तु एक करोड़ रुपये से अधिक नहीं होने वाली राशि के उपभोक्ता विवाद ही राज्य आयोग के समस्त प्रस्तुत किये जा सकते हैं। जिला मंचों के विरुद्ध अपील की सुनवाई करने का अधिकार भी राज्य आयोग को दिया गया है।

(iii) राष्ट्रीय आयोग (National Commission)- यह उपभोक्ता विवादों का निपटारा करने वाली राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च संस्था है। यह एक स्वतन्त्र वैधानिक संस्था है। इसका पूरा नाम ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग’ (National Consumer Disputes Redressal Commission) है। राष्ट्रीय आयोग उन सभी शिकायतों की सुनवाई करेगा जिनमें वस्तुओं अथवा सेवाओं का मूल्य तथा क्षतिपूर्ति की राशि का दावा एक करोड़ रुपये से अधिक का है।

8,अपील हेतु प्रावधानधारा 15 के अनुसार जिला मंच के आदेश से पीड़ित पक्ष उस आदेश के विरुद्ध आदेश की तिथि से 30 दिन के भीतर निर्धारित तरीके से राज्य आयोग को अपील कर सकता है। धारा 19 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राज्य आयोग के आदेश से । सन्तुष्ट नहीं है तो वह उस आदेश के विरुद्ध आदेश की तिथि से 30 दिन के भीतर राष्ट्रीय आयोग के समक्ष अपील कर सकता है। धारा 23 के अनुसार राष्ट्रीय आयोग के आदेश से असन्तुष्ट या पीडित पक्ष आदेश की तिथि से 30 दिन के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है। इन सभी दशाओं में आदेश की तिथि से 30 दिन के पश्चात् भी अपील को स्वीकार किया जा सकता है यदि राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग अथवा उच्चतम न्यायालय (जैसी भी स्थिति हों) इस बात से सन्तुष्ट है कि देरी का कारण उचित एवं न्यायसंगत है।

9, आदेशों की अन्तिमता (धारा 24)- जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग में से किसी के भी आदेश के विरुद्ध इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन अपील न करने की दशा में सम्बन्धित आदेश अन्तिम माना जाता है।

10, परिसीमा अवधि (Limitation Period)- जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग ऐसी शिकायतों को स्वीकार नहीं कर सकेगा जो कार्यवाही के कारण उत्पन्न होने की तिथि से 2 वर्ष के भीतर प्रस्तुत न की गई हों। [धारा 24 (A)(i)]

उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग शिकायतों को स्वीकार कर सकेगा बशर्ते शिकायतकर्ता उन्हें सन्तुष्ट कर दे कि निर्धारित अवधि में अपील न करने के पर्याप्त कारण थे। ऐसी किसी भी शिकायत को स्वीकार करते समय देरी के निरस्त करने के कारणों को रिकॉर्ड करना होगा। [धारा 24 (A) (ii)]

11, आदेश का क्रियान्वयन (Enforcement of Order)- जिला मंच, राज्य आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग के आदेशों के क्रियान्वयन सम्बन्धी निम्न प्रावधान महत्वपूर्ण हैं

(i) अन्तरिम आदेश का प्रवर्तनयदि अधिनियम के अधीन जारी किये गये किसी अन्तरिम आदेश का पालन नहीं किया जाता है तो जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग (जैसी भी स्थिति हो) आदेश का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति की सम्पत्ति की कुड़की का आदेश दे सकता है। [धारा 25(1)]

उपर्युक्त प्रकार से कुड़की की गयी सम्पत्ति, तीन माह तक कुड़क रखी जा सकती है। तत्पश्चात् सम्बन्धित मंच या आयोग उस सम्पत्ति को बेच सकता है। उससे प्राप्त राशि में से शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति के रूप में राशि का भुगतान करने के बाद शेष राशि को उस पक्षकार को दे देगा जो उस राशि की हकदार होगी। [धारा 25 (2)]

(ii) अन्तिम आदेश का प्रवर्तनसम्बन्धित मंच या आयोग के आदेश (अन्तिम आदेश) के अनुसार किसी व्यक्ति से कोई राशि वसूली जानी है तो उस राशि का हकदार व्यक्ति सम्बन्धित मंच या आयोग को एक आवेदन करेगा। तत्पश्चात् सम्बन्धित मंच या आयोग उस राशि को एक प्रमाणपत्र जिलाधीश के नाम जारी करेगा और वह जिलाधीश तब उस राशि की वसूली हेतु उसी प्रकार कार्यवाही करेगा जिस प्रकार भू-राजस्व की बकाया राशि वसलने हेतु करता है। [धारा 25 (3)]

12, परिवार (शिकायत) का खरिज होनायदि सम्बन्धित शिकायत तच्छ या तंग करने वाली पाई गई हो तो सम्बन्धित जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग उक्त शिकायत को निरस्त कर सकता है परन्तु उसके कारणों को अभिलिखित भी किया जायेगा। साथ ही शिकायतकर्ता द्वारा विरोधी पक्षकार (प्रतिवादी) को दस हजार रुपये तक का हर्जाना दिये जाने का आदेश दिया जा सकता है। (धारा 26)

13, दण्ड सम्बन्धी प्रावधानयदि कोई व्यापारी या व्यक्ति जिसके विरुद्ध शिकायत दर्ज की गई है, जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा दिये गये किसी आदेश का पालन नहीं करता है या उल्लंघन करता है तो ऐसा व्यापारी या व्यक्ति कम से कम एक महीना तथा अधिक से अधिक तीन वर्ष तक के कारावास अथवा कम से कम 2000 रुपये तथा अधिकतम दस हजार रुपये तक के आर्थिक दण्ड अथवा दोनों प्रकार के दण्डों का भागी हो सकता है। परन्तु यदि जिला मंच, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग, जिसने भी दण्ड का आदश दिया है वह मामले की परिस्थितियों को देखते हुये सन्तुष्ट हो जाता है तो वह उपर्युक्त वर्णित न्यूनतम सीमाओं से भी कम दण्ड प्रदान कर सकता है। (धारा 27)

अधिनियम के अन्य प्रावधान (Other Provisions of the Act)

1, सद्भाव से किये गये कार्यों से सुरक्षायदि जिला मंच, राज्य आयोग अथवा राष्ट्रीय आयोग के सदस्यों तथा इनके निर्देशों के अनुसार कार्य करने वाले किसी भी अधिकारी, के द्वारा आदेश के क्रियान्वयन के लिये सद्भाव से दिये गये आदेशों तथा किये गये कार्यों के विरुद्ध कोई भी वाद, अभियोग नहीं चलाया जा सकेगा या वैधानिक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी। इस हेतु यह आवश्यक है कि उनके द्वारा दिया गया आदेश या उनके क्रियान्वयन के लिये की गयी कार्यवाही इस अधिनियम के प्रावधानों तथा इसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों के अनुसार होनी चाहिये। [धारा 28 ] 

2: क्रियान्वयन की कठिनाइयों को दूर करनायदि इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में कोई कठिनाई उपस्थित होती है तो केन्द्रीय सरकार राजकीय गजट में अधिसूचना जारी करके उस कठिनाई को दूर करने के लिये आवश्यक अथवा समुचित आदेश प्रसारित कर सकती है। किन्तु, ऐसा आदेश इस अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत नहीं होना चाहिये। परन्तु अधिनियम के प्रभावी होने से 2 वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने पर ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकेगा। इस प्रकार अब इस धारा की व्यावहारिकता समाप्त हो गई है। (धारा 29)

3, कार्यवाही की वैधता अप्रभावितजिला मंच, राज्य आयोग अथवा राष्ट्रीय आयोग ‘ की कार्यवाही केवल इस आधार पर अवैध नहीं हो जायेगी कि उसमें किसी सदस्य का पद रिक्त है या उसके गठन में कोई त्रुटि रह गई है। (धारा 28A) ,, 4, नियम बनाने का अधिकार-केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकार को इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू कराने के लिये नियम बनाने का अधिकार है। (धारा 30)

5, संसद अथवा विधानसभा में नियमों को रखनाकेन्द्रीय सरकार द्वारा बनाये गये नियमों को संसद के दोनों सदनों में तथा राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमों को राज्य विधानसभा में प्रस्तुत किया जायेगा। (धारा 31)

 

प्रश्न 44, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 क्या है? उपभोक्ता के अधिकारों को समझाइये।

(Meerut, 2006)

उत्तर

उपभोक्ता के अधिकार (Rights of a Consumer)

एक सामान्य उपभोक्ता को विशिष्ट अधिनियमों, भारतीय संविधान तथा, विभिन्न न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णयों के अनुरूप, निम्न प्रमुख अधिकार प्राप्त हैं:

सुरक्षा का अधिकार (The Rights to Safety)- सुरक्षा के अधिकार से आशय ऐसे अधिकार से है जो उपभोक्ता को ऐसी सभी वस्तुओं के विपणन के लिये सुरक्षा प्रदान करने में । सहायक है जो कि उसके स्वास्थ्य एवं जीवन के लिये खतरनाक अथवा हानिकारक सिद्ध हो सकती हैं; जैसे-वस्तुओं में मिलावट एवं खतरनाक रसायन आदि।

उपभोक्ता इस अधिकार के द्वारा खराब एवं दुष्प्रभावी खाद्य वस्तुओं (खराब ब्रेड, बटर, ‘ जैम आदि), नकली दवाओं, घटिया यंत्रों एवं उपकरणों (स्टोव, प्रेस, मिक्सर आदि) सभी वस्तुओं से होने वाली धन, स्वास्थ्य एवं शरीर की हानि से सुरक्षा प्राप्त कर सकता है।

2, चुनाव या पसन्द का अधिकार (The Right to a choice)- एक उपभोक्ता अपनी आवश्यकता एवं इच्छानुसार वस्तुओं और सेवाओं का चयन करने के लिये स्वतन्त्र होता है। उसे किसी वस्तु या सेवा को क्रय करने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। कोई भी व्यक्ति उसकी पसन्द को अनावश्यक एवं अनचित ढंग से प्रभावित करता है तो यह उसके अधिकार में हस्तक्षेप (विन) माना जाता है।

संक्षेप में, उपभोक्ता अपने इस अधिकार के अन्तर्गत विभिन्न निर्माताओं द्वारा निर्मित विविध ब्राण्ड, किस्म, गुण, रूप, रंग, आकार तथा मूल्य की वस्तुओं में से किसी भी वस्तु का चुनाव करने के लिये स्वतन्त्र है।

3, सूचना पाने का अधिकार (The right to be informed)- उपभोक्ता को वे सभी आवश्यक सूचनायें भी प्राप्त करने का अधिकार होता है जिनके आधार पर वह वस्तु या सेवा खरीदने का निर्णय कर सके। ये सूचनायें वस्तु की किस्म, मात्रा, प्रभावोत्पादकता (Potency), शुद्धता, प्रमाप, मूल्य आदि के सम्बन्ध में हो सकती हैं।

सूचना प्राप्त करने का उपभोक्ता का अधिकार उसे कपट, मिथ्याकथन एवं भ्रामक सूचनाओं, झूठे एवं मिथ्या विज्ञापनों एवं अन्य अनुचित व्यवहारों के प्रति सुरक्षा प्रदान करने से सम्बन्धित है।

4, सुनवाई या कहने का अधिकार (The right to be heard)- उपभोक्ता का यह अधिकार उस अपनी बात या शिकायत उचित मंचों पर कहने या प्रस्तुत करने का अधिकार देता है। दूसरे शब्दों में, उपभोक्ता को अपने हितों को प्रभावित करने वाली सभी बातों को उपयुक्त मंचों के समक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है। वे अपने इस अधिकार का उपयोग करके व्यवसायी एवं सरकार को अपने हितों के अनुरूप निर्णय लेने तथा नीतियाँ बनाने लिये बाध्य कर सकते हैं। उपभोक्ता के इस अधिकारं की रक्षा के लिये सरकार कानूनी रूप से सुनवाई की व्यवस्था करती है।

5, उपचार का अधिकार (The Right to be Redressed)- उपभोक्ता का यह अधिकार उसे अपनी परिवेदनाओं एवं शिकायतों का उचित एवं न्यायपूर्ण उपचार अथवा समाधान प्रदान करता है। इस अधिकार के अन्तर्गत वह न्यायालय की शरण ले सकता हैं इस अधिकार से उपभोक्ताओं को व्यवसायी के अनुचित एवं अनैतिक व्यवहार अथवा अनचित एवं अनैतिक शोषण से मुक्ति मिल सकती है।

संक्षेप में, यह अधिकार उसे यह आश्वासन प्रदान करता है कि क्रय की गई वस्तु या सेवा उचित, न्यायोचित एवं संतोषजनक ढंग से उपयोग में नहीं लाई जा सकेगी तो उसकी उसे उचित क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार होगा।

6, उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (The Right to Consumer Education- इस अधिकार के अन्तर्गत उपभोक्ता को उन सब बातों की शिक्षा या जानकारी प्राप्त करने का अधिकार होता है जो एक उपभोक्ता के लिये आवश्यक होती हैं। वस्ततः यह अधिकार उपभोक्ता को शोषण से मुक्ति दिलाने तथा हितों की रक्षा हेतु शिक्षा प्राप्त करने से सम्बन्धित है। उदाहरण के लिये, जीरा, धनिया, मिर्च आदि मसालों में मिलावट की जाँच कैसे करें? कम नाप-तौल की पकड़ कैसे करें? इत्यादि के सम्बन्ध में यह शिक्षा उपभोक्ताओं को सरकारी तथा गैर-सरकारी प्रचार माध्यमों द्वारा दी जा सकती है।

7, मूल्य या प्रतिफल का अधिकार (The right to value)- उपभोक्ता यह अपेक्षा करने का अधिकार भी रखता है कि उसे उसके द्वारा चुकाये गये, धन का पूरा मूल्य मिल सकेगा। वस्तुत: उपभोक्ता का यह अधिकार उसे व्यवसायो द्वारा विक्रय के दौरान या विज्ञापन में किये गये वायदों तथा जगाई गई आशाओं को पूरा करवाने का अधिकार प्रदान करता है।

8, स्वस्थ वातावरण का अधिकार (The right to a healthy environment)- इस अधिकार के अन्तर्गत उपभोक्ता व्यवसायी से ऐसे स्वस्थ भौतिक वातावरण की अपेक्षा करता है। जिससे उसके जीवन किस्म में सुधार हो सके। ___ इस अधिकार के अन्तर्गत उपभोक्ता व्यवसायी से अपेक्षा करता है कि वह ऐसी निर्माण प्रक्रिया या तकनीक को अपनायेगा, ऐसी सामग्री एवं साधनों का उपयोग करेगा, ऐसे पैकाजग को अपनायेगा, जिससे देश के भौतिक वातावरण (जल, वाय, ध्वनि) को किसी भी प्रकार हानि नहीं होगी। इसके अतिरिक्त वह यह भी अपेक्षा करता है कि इन वस्तुओं एवं सेवाओं के उपयोग से उसे अधिक उच्च किस्म का जीवन जीने में मदद मिलेगी। । भारत के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 6 के अन्तर्गत उपभोक्ता के उपर्युक्त प्रथम सात अधिकारों का उल्लेख किया गया है, किन्तु अन्तिम तथा आठवें अधिकार स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को अभी तक अधिनियम में शामिल नहीं किया गया है। आशा है कि भविष्य में इसे भी सम्मिलित कर लिया जायेगा। वस्तुतः वर्तमान में उपभोक्ताओं के इस अधिकार की सुरक्षा के लिये राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कदमों के उठाये जाने पर विशेष बल दिया जा रहा है।

प्रश्न 45, उपभोक्ता संरक्षण से आप क्या समझते हैं? भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता को समझाइये?

(Meerut, 2005 Back)

उत्तर

उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Consumer Protection)

उपभोक्ता संरक्षण का आशय ऐसे सभी उपायों से है जो उपभोक्ताओं की विक्रेताओं द्वारा किये जाने वाले विभिन्न प्रकार के शोषण से रक्षा करते हैं। दूसरे शब्दों में, उपभोक्ता के आधारभूत अधिकारों एवं हितों को समुचित सुरक्षा प्रदान करना ही उपभोक्ता संरक्षण है। वस्तुतः उपभोक्ता संरक्षण एक व्यापक शब्द है जिसमें उन सभी उपायों को सम्मिलित किया जाता है , जोकि उपभोक्ताओं के अधिकारों एवं हितों की रक्षा करने में सहायक हैं; जैसे-उपभोक्ता चेतना, उपभोक्ता शिक्षा, वैधानिक अधिनियम एवं नियमन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थापना, प्रदूषण की रोकथाम के उपाय आदि।

श्रीमती रंगनाथन के अनुसार, “उपभोक्ता संरक्षण व्यावसायिक अन्यायों के विरुद्ध एक विरोध है और उन अन्यायों को ठीक करने का प्रयत्न है।” | स्पष्ट है कि उपभोक्ता संरक्षण उपभोक्ताओं को निर्माताओं, मध्यस्थों एवं व्यावसायियों – द्वारा किये जाने वाले शोषण के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है। यह उपभोक्ता के आधारभूत अधिकारों एवं हितों की रक्षा करता है।

भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता अथवा महत्व (Need or Importance of Consumers Protection Act in India)

भारत में अधिकांश वस्तुओं में ‘विक्रेता का बाजार’ है। यहाँ के अधिकांश विक्रेता भ्रष्ट बेईमान, धोखेबाज एवं मुनाफाखोरी करने वाले हैं। हमारे यहाँ दैनिक जीवन तक में प्रयोग में आने वाली वस्तुओं में मिलावट, घटिया किस्म की दवायें एवं बिजली के उपकरण और खतरनाक रसायन से उपभोक्ताओं के जीवन को खतरा दिनो-दिन बढ़ता जा रहा है।

वस्तुतः अनुचित लाभ कमाने के लिये व्यवसायियों के अनुचित व्यवहारों ने उपभोक्ताओं के शोषण में वृद्धि की है। भारत का उपभोक्ता अशिक्षित, असंगठित, असहाय एवं अनुभवहीन है। अतएव उपभोक्ता शोषण से बचने के लिये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को लागू किया जाना परमावश्यक है। भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

1, उपभोक्ताओं की व्यवसायियों की शोषण करने की प्रवृत्ति से रक्षा करने के लियेआज व्यवसायियों ने उपभोक्ताओं का शोषण करने के लिये भिन्न-भिन्न तरीके निकाले हुये हैं; जैसे-कम तोलना, उपभोग की वस्तुओं में मिलावट करना, कृत्रिम कमी उत्पन्न कर देना, काला बाजारी करना आदि। भारत जैसे देश में जहाँ का उपभोक्ता अपेक्षाकृत अधिक असंगठित, अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा एवं अपने अधिकारों के प्रति कम जागरूक है, आसानी से व्यवसायियों की शोषण की प्रवृत्ति का शिकार बन जाता है। उसे व्यवसायियों की इस दूषित शोषण करने की मनोवृत्ति से बचाने के लिये भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की नितान्त आवश्यकता है।

2, उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लियेआज सामान्य उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति उदासीन है। या तो उसे अपने अधिकारों के प्रति जानकारी नहीं है अथवा यदि उसे थोड़ी-सी जानकारी है भी तो वह विभिन्न कारणों से अपने आपको पूर्णतः अकेला, असहाय एवं निष्क्रिय अनुभव करता है। इस दृष्टि से भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता है।

3, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति चेतना जगाने के लियेव्यवसायियों में अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति चेतना जागृत कराने के दृष्टिकोण से भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता अनुभव की गई है।

4, आवश्यक सूचनायें उपलब्ध कराने के लियेउपभोक्ताओं को आवश्यक सूचनायें उपलब्ध कराने की दृष्टि से भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता है।

5, परिवेदनाओं एवं शिकायतों का यथाशीघ्र निपटारा करने के लियेउपभोक्ताओं को शिकायतें करने का न केवल मूलभूत अधिकार प्राप्त है वरन् उनकी शिकायतों का निपटारा यथाशीघ्र करने की भी व्यवस्था होनी चाहिये। इस दृष्टि से भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता है।

6, व्यवसाय की एकाधिकारी मनोवृत्ति से मुक्ति प्रदान करने के लियेअसंगठित उपभोक्ताओं को एकाधिकारी व्यावसायिक संगठनों की शोषण रूपी मनोवृति का शिकार होना पड़ता है। व्यवसायियों की इस अनुचित एकाधिकारी मनोवृति का शिकार होने से उपभोक्ताओं को बचाने के लिये भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की आवश्यकता है।

7, मानव कल्याण के लियेहम सभी किसी न किसी रूप में उपभोक्ता ही तो हैं। मानवीय कल्याण की दृष्टि से भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम आवश्यक है।

8, अन्य कारण(i) निर्माताओं एवं उत्पादकों को उत्पाद की गुणवत्ता के प्रति जागरूक करने के लिये; (ii) उपभोक्ता के उपभोग के स्तर को ऊँचा उठाने के लिये; (iii) शुद्ध एवं गुणवत्ता वाली वस्तुओं के निर्माण एवं उत्पादन को प्रोत्साहित करने के जिये; (iv) उपभोक्ता चंतनां में वृद्धि करने के लिये (v) वितरण प्रणाली के दोषों को दूर करने एवं उसे अधिक सुदृढ़ बनाने के लिये; (vi) उपभोक्ताओं के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिये; (vii) उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को समझने के लिये; (viii) सरकार को उपभोक्ताओं के प्रति जागरूक बनाये रखने के लिये।

नोटउपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिये भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 लागू किया गया। यह अधिनियम जम्मू एवं कश्मीर राज्य को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में । जुलाई, 1987 से लागू हुआ है।

प्रश्न 46, जिला उपभोक्ता मंच क्या है? इसके द्वारा उपभोक्ता शिकायतों के निवारण के लिये अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का वर्णन कीजिये।

(2005)

अथवा

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत जिला मंच का गठन किस प्रकार किया जाता है? जिला मंच द्वारा उपभोक्ता विवादों को निपटाने के लिये अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन कीजिये।

अथवा

जिला फोरम के गठन, कार्यक्षेत्र एवं शिकायत निपटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाइये।

 

उत्तरज़िला मंच की स्थापना-राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले में एक ‘उपभोक्ता विवाद निवारण मंच’ स्थापित करेगी जिसे ‘जिला मंच’ (District Forum) के नाम से जाना जायेगा। [धारा 9(a)] राज्य सरकार उचित समझे तो एक जिले में एक से अधिक जिला मंच भी स्थापित कर सकती है।

जिला मंच का गठनजिला मंच का गठन तीन सदस्यों से मिलकर होगा जिनमें से एक अध्यक्ष (सभापति) तथा दो सदस्य होंगे। अध्यक्ष के अतिरिक्त अन्य दो व्यक्ति जो सदस्य होंगे, इन दो सदस्यों में से एक का महिला होना आवश्यक है। [धारा 10(1)]

योग्यतायेंजिला मंच का अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होगा जो वर्तमान में जिला न्यायाधीश हो या इस पद पर रह चुका हो अथवा जिला न्यायाधीश बनने की योग्यतायें रखता हो। अन्य सदस्यों की योग्यतायें निम्नानुसार होंगी-

(i) कम-से-कम 35 वर्ष की आयु होनी चाहिये। (ii) किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि धारक होना चाहिये। (iii) योग्य, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति होने चाहिये और जिनको अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, जनसम्पर्क या प्रशासन का पर्याप्त ज्ञान और उससे सम्बन्धित कार्य करने का । कम-से-कम दस वर्ष का अनुभव हो।

अयोग्यतायेंकोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्त किये जाने के योग्य नहीं होगा-(i) यदि उसे किसी अपराध के लिये सजा मिली हो तथा जेल भेजा गया हो तथा वह अपराध राज्य सरकार की राय में नैतिक दुराचरण से सम्बन्धित हो। (ii) यदि वह अंमुक्त दिवालिया हो। (iii) यदि वह सक्षम न्यायालय द्वारा घोषित अस्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति हो। (iv) यदि वह सरकारी सेवा या सरकारी स्वामित्व या नियंत्रण वाली समामेलित संस्था की सेवा से हटाया या पदच्युत किया गया हो। (v) यदि राज्य सरकार की राय में, उसका ऐसा वित्तीय या अन्य हित हो जो सदस्य के रूप में उसके कर्तव्यों के निष्पक्ष निर्वाह को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता हो। (vi) यदि उसमें राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाने वाली अन्य कोई अयोग्यतायें हों।

जिला मंच के सदस्यों की नियुक्तिजिला मंच के अध्यक्ष तथा संदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जायेगी। इस चयन समिति का गठन निम्न प्रकार से किया जायेगा-(j) राज्य आयोग का सभापति इसका अध्यक्ष होगा; (ii) राज्य के विधि विभाग का सचिव इसका सदस्य होगा; (iii) उपभोक्ता मामलों के प्रभारी विभाग का सचिव इसका सदस्य होगा।

जब राज्य आयोग का अध्यक्ष अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से चयन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने में असमर्थ हो तो राज्य सरकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिये नामित करने के लिये कह सकती हैं।

जिला मंच के सदस्यों का कार्यकाल [धारा10(2)] – जिला मंच के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल पाँच वर्ष या 65 वर्ष की उम्र पूरी करने तक जो भी पहले हो, वह होगा।

ऐसा सदस्य पाँच साल या 65 वर्ष की उम्र पूरी करने तक जो भी पहले हो के लिये पुनः नियुक्ति के योग्य होगा बशर्ते कि वह नियुक्ति सम्बन्धी सभी योग्यताओं एवं शर्तों को पूरी करता है परन्तु ऐसी पुनर्नियुक्ति चयन समिति की सिफारिश पर ही होगी।

यदि जिला मंच का कोई सदस्य अपने पद से इस्तीफा दे देता है तो राज्य सरकार द्वारा इस्तीफे के स्वीकार करने पर यह पद रिक्त माना जायेगा और इस पद को उसी वर्ग से भरा जायेगा जिस वर्ग के व्यक्ति ने इस्तीफा दिया है। इस व्यक्ति में निर्धारित योग्यताओं का होना आवश्यक होगा।

उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रभावी होने के पूर्व नियुक्त अध्यक्ष या सदस्य तब तक कार्य करते रहेंगे जब तक कि उनका कार्यकाल पूरा हो।

वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्तेजिला फोरम के सदस्यों को देय वेतन, समेकित मानदेय (Honorarium), अन्य भत्ते व सेवा की शर्ते वही होंगी जो राज्य सरकार द्वारा नियत की जायेगी। [धारा 10(3)]

जिला मंच का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction of District Forum)[धारा 11]- जिला मंच को निम्नलिखित शर्तों के पूरा करने वाली अपने क्षेत्र की शिकायतों को स्वीकार करने का अधिकार होगा:

1, जब दावे के माल या सेवा या मुआवजे का मूल्य बीस लाख रुपये से अधिक न हो। अर्थात् बीस लाख रुपये से अधिक की राशि के दावे जिला मंच में नहीं किये जा सकेंगे।

2, जिला मंच में उसके क्षेत्राधिकार की स्थानीय सीमाओं के अन्तर्गत शिकायत प्रस्तुत (दर्ज) की जा सकती है अर्थात् जिला मंच में कोई शिकायत तभी प्रस्तुत की जा सकेगी। जबकि-(i) विरोधी पक्षकार अथवा एक से अधिक विरोधी पक्षकारों की दशा में प्रत्येक विरोधी पक्षकार शिकायत करते समय उस जिले के क्षेत्र में वास्तव में एवं स्वेच्छा से रहता हो अथवा व्यवसाय का संचालन करता हो या उसका शाखा कार्यालय हो अथवा व्यक्तिगत रूप से लाभ के लिये कार्य करता हो; अथवा (ii) विरोधी पक्षकारों में से कोई भी (जब शिकायत के समय एक से अधिक पक्षकार हों) पक्षकार वास्तव में तथा स्वेच्छापूर्वक उस जिले की सीमा में रहता हो अथवा किसी व्यवसाय का संचालन करता हो या उसका शाखा कार्यालय हो अथवा व्यक्तिगत लाभ के लिये कोई कार्य करता हो तथा ऐसी दशा में या तो जिला मंच ने इसकी अनमति दे दी हो अथवा वे विरोधी पक्षकार जो इस जिले की सीमा में नहीं रहते हैं या किसी व्यवसाय का संचालन नहीं करते हैं अथवा अपने निजी लाभ के लिये कार्य नहीं करते हैं: ने ऐसी शिकायत प्रस्तुत करने की अपनी मौन रूप से स्वीकृति दे दी हो, अथवा (in आशिक या पूर्ण रूप से वाद प्रस्तुत करने का कारण उत्पन्न हुआ हो।

जिला मंच को शिकायत प्रस्तुत करने का ढंग अथवा प्रक्रिया (Procedure of Making a Complaint with District Forum)-विक्रय किये गये माल अथवा प्रदान की गई सेवा या इनके ठहराव के सम्बन्ध में कोई भी शिकायत निम्नलिखित में से किसी के भी द्वारा जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है-(i) ऐसे उपभोक्ता द्वारा जिसे

कोई माल बेचा तथा सुपुर्द किया गया है अथवा कोई माल बेचने या सुपुर्द करने का ठहराव किया गया है अथवा जिसे कोई सेवा प्रदान की गई है अथवा सेवा प्रदान करने का ठहराव किया गया है। (ii) किसी भी मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संघ द्वारा चाहे वह उपभोक्ता उसका सदस्य हो अथवा नहीं। (iii) जिला मंच की अनुमति से एक या अधिक उपभोक्ताओं द्वारा उन सब उपभोक्ताओं की ओर से जिनका समान प्रकार का हित हो। (iv) केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से अथवा सामान्य उपभोक्ताओं के हितों के प्रतिनिधि का हैसियत से शिकायत प्रस्तुत की जा सकती है।

 

जिला मंच को प्रस्तुत की जाने वाली प्रत्येक शिकायत लिखित में होगी। शिकायत प्रस्तुत करने के लिये कोई निर्धारित प्रारूप नहीं है। यह सादे कागज पर भी की जा सकती है। शिकायत डाक द्वारा या जिला मंच के कार्यालय में स्वयं जाकर भी प्रस्तुत की जा सकती है, परन्तु शिकायत में-(i) शिकायतकर्ता का नाम तथा पता, (ii) विरोधी पक्षकार या पक्षकारों के नाम तथा पते, (iii) शिकायत के तथ्यों का वर्णन, (iv) शिकायत को पुष्ट करने वाले प्रमाण-पत्र या नमूने (v) शिकायत के निवारण के लिये अपेक्षित राहत, (vi) शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर का उल्लेख होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक शिकायत निर्धारित शुल्क के साथ प्रस्तुत करनी चाहिये। शुल्क की राशि तथा शुल्क जमा कराने की विधि राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जायेगी।

शिकायत की प्राप्ति पर जिला मंच उसकी स्वीकृति या अस्वीकृति के आदेश दे सकेगा, – परन्तु शिकायतकर्ता को सुनने का अवसर दिये बिना इसे अस्वीकार नहीं किया जायेगा। शिकायत प्राप्त होने के 21 दिन के भीतर सामान्यतया शिकायत की ग्राह्यता (Admissibility) का निपटारा कर दिया जायेगा। शिकायत को स्वीकार करने पर अधिनियम में निर्धारित विधि से इसका निपटारा किया जायेगा लेकिन एक बार जिला मंच द्वारा स्वीकार की गई शिकायत को अन्यत्र स्थानान्तरण नहीं होगा।

जिला मंच द्वारा उपभोक्ता शिकायतों के निवारण हेतु अपनायी जाने वाली प्रक्रियाउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 13 के अनुसार शिकायत प्राप्ति पर जिला मंच द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को निम्नांकित दो वर्गों में विभाजित कर अध्ययन किया जा सकता है

A, माल सम्बन्धी शिकायतों की निपटान प्रक्रिया [धारा 13(1)]- जिला मंच द्वारा माल के सम्बन्ध में शिकायत ग्राह्य (स्वीकार) करने के पश्चात् वह शिकायत की एक प्रति 21 दिन के भीतर उल्लिखित प्रतिपक्ष को प्रदान करेगा एवं उसे 30 दिन के भीतर या बढ़ाई गयी अवधि, जो 15 दिन से अधिक नहीं हो सकेगी, के भीतर अपना जवाब देने का निर्देश देगा। इस प्रकार प्रतिपक्ष को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिये अधिक से अधिक 45 दिन का समय दिया जा सकता है। यदि प्रतिपक्ष शिकायत की प्रति प्राप्त होने पर उल्लिखित आरोपों को अस्वीकार करता है या विरोध करता है अथवा जिला मंच द्वारा दिये गये समय में अपना पक्ष प्रस्तुत करने में त्रुटि करता है या असमर्थ रहता है तो ऐसी स्थिति में जिला मंच उपभोक्ता विवाद का निम्न प्रकार निपटारा करेंगा-

(i) वस्तु (माल) का नमूना प्राप्त करनायदि शिकायत में किसी माल में खराबी होने का आरोप लगाया गया है तथा उस माल के विश्लेषण या जाँच के बिना किसी खराबी का पता नहीं लगाया जा सकता है तो जिला मंच शिकायतकर्ता से उस माल का एक नमना प्राप्त करेगा। तत्पश्चात् उसे सील करके उसे प्रमाणित कर देगा।

(ii) जाँच हेतु शुल्क जमा करवाना मॉल की जाँच हेतु उचित प्रयोगशाला के पास माल का नमूना भेजने से पहले शिकायतकर्ता को जिला मंच द्वारा निर्देशित शुल्क जिला मंच के पास जमा कराना होगा, ताकि माल का विश्लेषण या जाँच करने के लिये प्रयोगशाला को भुगतान किया जा सके।

(iii) नमूने को जाँच के लिये प्रयोगशाला में भेजना शुल्क प्राप्त हो जाने के बाद मंच अब उस सील एवं प्रमाणित किये नमूने को उपयुक्त प्रयोगशाला के पास निम्नलिखित निर्देशों के साथ भेजेगा- (a) माल पर आरोपित दोषों को ज्ञात करने के लिये आवश्यक जाँच या विश्लेपण करे; (b) माल में अन्य कोई दोष हों उनको ज्ञात करने के लिये आवश्यक जाँच या विश्लेषण करे; तथा (c) इसे प्राप्त होने के 45 दिन या बढ़ाई हुई अवधि के भीतर अपनी रिपाट मच के पास भेज दें। जिला मंच शिकायतकर्ता से प्राप्त शुल्क भी प्रयोगशाला के पास भेज देता है।

(iv) प्रयोगशाला से प्राप्त जाँच रिपोर्ट की प्रति प्रतिपक्ष को भेजना रिपोर्ट मिलने के पश्चात् जिला मंच उसकी एक प्रति अपने नोट सहित (यदि आवश्यक हो तो) प्रतिपक्ष को भेज देता है।

(v) रिपोर्ट पर लिखित विरोध प्रकट करना यदि विवाद का कोई भी पक्षकार प्रयोगशाला के निष्कर्षों की सत्यता पर अथवा जाँच या विश्लेषण के लिये सम्बन्धित प्रयोगशाला द्वारा अपनाई गई विधि का विरोध करता है तो ऐसी स्थिति में जिला मंच प्रतिपक्ष या शिकायतकर्ता को अपनी आपत्तियों को लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिये कहेगा।

(vi) प्रतिपक्ष तथा शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर देना तत्पश्चात् जिला ,,, मंच प्रतिपक्ष तथा शिकायतकर्ता को सम्बन्धित प्रयोगशाला द्वारा दी गई रिपोर्ट के सम्बन्ध में प्रस्तुत की गई आपत्तियों की सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा। इससे वे प्रयोगशाला के निष्कर्षों एवं उठाई गई आपत्तियों के सम्बन्ध में अपना तर्क प्रस्तुत कर सकेंगे।

(vii) आदेश निर्गमित करना अन्त में धारा 14 के अधीन जिला मंच उपयुक्त आदेश निर्गमित कर देता है।

 

(B) सेवा सम्बन्धी शिकायतों की निपटान प्रक्रिया धारा 13(2)1- जब जिला मंच को किसी सेवा के सम्बन्ध में लिखित शिकायते प्राप्त होती है या किसी ऐसे माल के सम्बन्ध में शिकायत प्राप्त होती है जिसमें उपयुक्त वर्णित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा सकता है, तो उस शिकायत के निवारण के लिये निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन किया जाता है-(i) प्रतिपक्ष के पास शिकायत की प्रति भेजना-शिकायत के प्राप्त होने पर जिला पंच उसकी एक प्रति प्रतिपक्ष के पास इस बात का उल्लेख करते हुये भेजेगा कि वह इस मामले में अपना पक्ष 30 दिन के अन्दर या जिला मंच द्वारा बढ़ाई गई अवधि, जो 15 दिन से अधिक की नहीं हो सकती, के अन्दर प्रस्तुत करे। इस प्रकार प्रतिपक्ष को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिये अधिक से अधिक 45 दिन का समय दिया जा सकता है। (ii) आरोपों को अस्वीकार करने या पक्ष प्रस्तुत नहीं करने पर जिला मंच द्वारा निपटारा करना-शिकायत की प्रति प्राप्त करने के बाद यदि प्रतिपक्ष शिकायत में लगाये गये आरोपों को अस्वीकार करता है अथवा वह मंच द्वारा दिये गये समय में अपना पक्ष प्रस्तत करने की कार्यवाही करने में असमर्थ रहता है तो मंच उस शिकायत का निम्नलिखित में से किसी भी आधार पर निपटारा कर सकता है-(अ) शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत करने तथा विरोधी पक्षकार द्वारा शिकायत में वर्णित आरोपों को अस्वीकार करने के समय दिये गये प्रमाणों के आधार पर निपटारा कर सकता है। (ब) यदि विरोधी पक्षकार अपना पक्ष प्रस्तुत करने की कार्यवाही नहीं करता है तो शिकायतकर्ता द्वारा मंच की जानकारी में लाये गये प्रमाणों के आधार पर मंच एक पक्षीयाnitel फैसला कर देता है।

 

शिकायतकर्ता के उपस्थित नहीं होने पर जिला मंच द्वारा निपटारा करना याद शिकायतकर्ता सुनवाई की तिथि को जिला मंच के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो जिला मच उस शिकायत को निरस्त कर सकता है अथवा उसके गणों के आधार पर निर्णय कर सकता है।

जिला मंच के आदेश के विरुद्ध अपील (Appeal against the Order of the District Forum)- कोई भी व्यक्ति जो जिला मंच के आदेश से पीडित है, वह राज्य आयोग के समक्ष जिला मंच के आदेश के विरुद्ध आदेश की तिथि से 30 दिन के अन्दर निधारित प्रारूप एवं विधि से अपील कर सकता है।

किन्तु राज्य आयोग उपर्युक्त अवधि (30 दिन) के समाप्त हो जाने के पश्चात् भा अपील विचारार्थ स्वीकार कर सकता है, बशर्ते कि वह इस बात से सन्तुष्ट हा जाय कि निर्धारित अवधि में अपील न करने के पर्याप्त कारण थे। [धारा 15] 

 

प्रश्न 47, राज्य आयोग के गठन, क्षेत्र तथा विवाद के निपटारे के सम्बन्ध में अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन करो।

उत्तर

राज्य आयोग (State Commission)

स्थापना राज्य सरकार ‘अधिसूचना द्वारा उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग’ की , स्थापना कर सकेगी जिसे राज्य आयोग के नाम से जाना जायेगा। [धारा 9(b)]

राज्य आयोग का गठन राज्य आयोग का गठन निम्नांकित प्रकार से किया जायेगा- (i) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो और जिसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाये, वह इस आयोग का अध्यक्ष होगा। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह के बिना राज्य सरकार ऐसी नियुक्ति नहीं कर सकती है। (ii) कम से कम दो सदस्य होंगे किन्तु राज्य सरकार द्वारा निर्धारित संख्या से अधिक सदस्य नहीं होंगे। इन सदस्यों में से एक महिला सदस्य भी होगी। इन सदस्यों की योग्यतायें निम्नलिखित हैं-(अ) आयु 35 वर्ष से कम न हो, (ब) मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि रखता हो, (स) योग्य, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति हों जिनको अर्थशास्त्र, कानून, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोककार्य या प्रशासन से सम्बन्धित समस्याओं का पर्याप्त ज्ञान और कम-से-कम दस वर्ष का अनुभव हो।

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि राज्य आयोग के कुल सदस्यों में से न्यायिक पृष्ठभूमि वाले सदस्यों की संख्या आधे से अधिक नहीं होगी।

यहाँ न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों का आशय ऐसे व्यक्तियों से है जिन्हें जिला स्तर या ट्रिब्यूनल के समान स्तर पर पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य करने का कम से कम 10 वर्ष का ज्ञान एवं अनुभव हो।

अयोग्यतायें (Disqualifications)-निम्नांकित में से किसी भी अयोग्यता वाले व्यक्ति को राज्य आयोग का सदस्य नियुक्त नहीं किया जा सकता-(i) यदि उसे किसी अपराध के लिये सजा मिली हो तथा जेल भेजा गया हो तथा वह अपराध राज्य सरकार की राय में नैतिक दुराचरण से सम्बन्धित हो। (ii) यदि वह अमुक्त दिवालिया हो। (iii) यदि वह सक्षम न्यायालय द्वारा घोपित अस्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति हो। (iv) यदि वह सरकारी सेवा या सरकारी स्वामित्व या नियंत्रण वाली समामेलित संस्था की सेवा से हटाया या पदच्युत किया गया हो। (v) यदि राज्य सरकार की राय में, उसका ऐसा वित्तीय या अन्य हित हो जो सदस्य के रूप में , उसके कर्तव्यों के निष्पक्ष निर्वाह को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता हो। (vi) यदि उसमें राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाने वाली अन्य कोई अयोग्यतायें हों।

सदस्यों की नियुक्ति राज्य आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जाती है। ऐसी चयन समिति का गठन निम्नानुसार होगा-(i) राज्य आयोग का सभापति इसका अध्यक्ष होगा; (ii) राज्य के विधि विभाग का सचिव इसका सदस्य होगा; (iii) उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव भी सदस्य होगा।

 

जब राज्य आयोग का अध्यक्ष अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से चयन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य न कर पाये तो राज्य सरकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश को नामित करने के लिये मामले को भेजेगी।

वेतन या मानदेय, अन्य भत्ते तथा सेवा की शर्ते-राज्य आयोग के सदस्यों का वेतन या मानदेय (Honorarium) तथा अन्य भत्ते एवं उनकी सेवा की शर्ते वही होंगी जो राज्य सरकार द्वारा निर्धारित कर दी जायेगी। [धारा 16(2)]

राज्य आयोग के सदस्यों का कार्यकाल-राज्य आयोग के सदस्य का कार्यकाल, 5 वर्ष तक अथवा सदस्य की 67 वर्ष की आयु तक जो भी पहले हो, माना जाता है। परन्तु उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के लागू होने के पूर्व नियुक्त अध्यक्ष या सदस्य अपने कार्यकाल पूरा होने तक इन पदों पर बने रह सकेंगे।

पुनर्नियुक्तिआयोग का प्रत्येक सदस्य पाँच वर्ष की एक और अवधि के लिये या 67 वर्ष की आयु तक जो भी पहले हो, पुनः नियुक्ति के योग्य होगा बशर्ते कि वह नियुक्ति की योग्यताओं एवं अन्य शर्तों को पूरी करता हो।

राज्य, आयोग का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction of State Commission)

राज्य आयोग का अधिकार क्षेत्र निम्नलिखित हैं-

1, जहाँ माल या सेवा का मूल्य और मुआवजा जिसका दावा किया गया है उसका मूल्य बीस लाख रुपये से अधिक लेकिन एक करोड़ रुपये से अधिक न हो।

2, जिला मंचों के आदेशों के विरुद्ध अपील की सुनवाई करना।

3, जब राज्य आयोग को लगे कि जिला मंच ने अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया है या कोई अनियमितता की है तो जिला मंच से सम्बन्धित पत्रावली मंगवाकर उस पर उपयुक्त आदेश निर्गमित करना।

4,किसी शिकायत पर विचार करना यदि विरोधी पक्षकार शिकायत के समय राज्य आयोग के क्षेत्राधिकार में वास्तव में स्वेच्छा से रहता है या अपना कारोबार करता है या उस कारोबार की शाखा है या अपने निजी लाभ के लिये कोई कार्य करता है।

5, किसी ऐसी शिकायत पर विचार करना जिस पर कार्यवाही का कारण आयोग के क्षेत्राधिकार में उत्पन्न हुआ है। [2002 में संशोधित धारा 17]

राज्य आयोग द्वारा उपभोक्ता शिकायतों के निवारण हेतु अपनायी जाने वाली प्रक्रियां राज्य आयोग द्वारा शिकायतों की प्राप्ति एवं निवारण के लिये वही प्रक्रिया अपनायी जायेगी जोकि जिला मंच द्वारा अपनायी जाती है। यदि जिला मंच की कार्यविधि में कोई संशोधन किया जाता है तो वे संशोधन ज्यों के त्यों राज्य आयोग की कार्यविधि पर भी लागू होंगे। (धारा 18)

राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील राज्य आयोग के आदेश से पीड़ित कोई भी व्यक्ति उक्त आदेश के विरुद्ध आदेश की तिथि से 30 दिन के अन्दर राष्ट्रीय आयोग के समक्ष अपील कर सकता है। किन्तु राष्ट्रीय आयोग उपर्युक्त 30 दिन की अवधि समाप्त हो जाने के पश्चात् भी अपील विचारार्थ स्वीकार कर सकता है बशर्ते कि वह इस बात से सन्तुष्ट हा जाय कि निर्धारित अवधि में अपील न करने के पर्याप्त कारण थे। (धारा 19)

प्रश्न 48, राष्ट्रीय आयोग के गठन, कार्यक्षेत्र एवं शिकायतों के निवारण की कार्यविधि का वर्णन कीजिये।

उत्तर-

राष्ट्रीय आयोग (National Commission)

केन्द्रीय सरकार एक अधिसूचना जारी करके ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग’ (National Consumer Disputes Redressal Commission) की स्थापना कर सकती है जिसे राष्ट्रीय आयोग के नाम से जाना जायेगा। यह उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने देश में राष्ट्रीय आयोग की स्थापना कर दी है एवं इस आयोग का कार्यालय दिल्ली में स्थित है।’ राष्ट्रीय आयोग हमारे देश में उपभोक्ता विवादों को हल करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च संस्था है। यह एक स्वतन्त्र वैधानिक संस्था है।

राष्ट्रीय आयोग का गठन राष्ट्रीय आयोग का गठन निम्नानुसार किया जायेगा

(अ) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हो या रह चुका हो और जिसकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की गई हो, वह व्यक्ति इस आयोग का अध्यक्ष होगा। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि ऐसी नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करने के उपरान्त ही की जा सकती है।

(ब) कम से कम चार सदस्य होंगे परन्तु इस सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित संख्या से अधिक सदस्य नहीं हो सकते। इनमें एक आवश्यक रूप से महिला सदस्य होंगी। केवल निम्नलिखित योग्तायें पूरी करने वाले व्यक्ति ही सदस्य बन सकते हैं-(j) आयु 35 वर्ष से कम न हो, (ii) किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय द्वारा स्नातक की उपाधि रखता हो, (iii) योग्य, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति हों जिनको अर्थशास्त्र, कानूनं, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोककार्य या प्रशासन से सम्बन्धित समस्याओं का पर्याप्त ज्ञान और कम-से-कम दस वर्ष का अनुभव हो।

यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय आयोग के कुल सदस्यों में से न्यायिक पृष्ठभमि वाले सदस्यों की संख्या 50% से अधिक नहीं होगी। न्यायिक पृष्ठभूमि रखने वाले व्यक्तियों से तात्पर्य ऐसे व्यक्तियों से है जिनके पास जिला स्तर के न्यायालय या इसके समकक्ष किसी अधिकरण (Tribunal) में पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य करने का कम-से-कम दस वर्ष की अवधि का ज्ञान और अनुभव हो।

अयोग्यतायें निम्नांकित में से किसी भी अयोग्यता वाले व्यक्ति को राष्ट्रीय आयोग का सदस्य नियुक्त नहीं किया जा सकेगा-

(i) यदि उसे किसी अपराध के लिये सजा मिली हो तथा जेल भेजा गया हो तथा वह अपराध केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक दुराचरण से सम्बन्धित हो।

(ii) यदि वह अमुक्त दिवालिया हो।

(iii) यदि वह सक्षम न्यायालय द्वारा घोषित अस्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति हो

(iv) यदि वह सरकारी सेवा या सरकारी स्वामित्व या नियंत्रण वाली समामेलित संस्था की सेवा से हटाया या पदच्युत किया गया हो।

(v) यदि केन्द्रीय सरकार की राय में, उसका ऐसा वित्तीय या अन्य हित हो जो सदस्य के रूप में उसके कर्तव्यों के निष्पक्ष निर्वाह को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता हो।

(vi) यदि उसमें केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित की जाने वाली अन्य कोई अयोग्यताएँ हों।

 

सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रीय आयोग के सदस्यों की नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा एक , चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जाती है। ऐसी चयन समिति का गठन निम्नानुसार होगा-

(i) अध्यक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है।

(ii) सदस्य भारत सरकार के विधि विभाग का प्रभारी सचिव।

(iii) सदस्य भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी सचिव।

राष्ट्रीय आयोग के सदस्यों का कार्यकाल राष्ट्रीय आयोग के प्रत्येक सदस्य का – कार्यकाल पाँच वर्ष तक अथवा 70 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, तक बना रहेगा। [धारा 20(3)]

परन्तु उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के लागू होने से पूर्व नियुक्त अध्यक्ष या सदस्य अपना कार्यकाल पूरा होने तक अपने पदों पर बने रह सकेंगे।

पुनर्नियुक्तिकिसी भी सदस्य को पाँच वर्ष अथवा उसकी सत्तर वर्ष की आयु पूरी होने तक, जो भी पहले हो, के लिये पुनः नियुक्त किया जा सकता है। किन्तु, उस सदस्य को योग्यताओं तथा नियुक्ति की अन्य शर्तों को पूरा करना पड़ेगा। ऐसी पुनर्नियुक्ति भी चयन समिति की सिफारिश से की जायेगी। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष की भी पुनर्नियुक्ति इसी प्रकार की जा सकेगी। [धारा 20(3)]

पद त्याग एवं रिक्त स्थान की पूर्ति कोई भी सदस्य केन्द्रीय सरकार को लिखित में अपना त्यागपत्र दे सकता है। त्यागपत्र स्वीकार होने पर उसका पद रिक्त हो जायेगा। उस रिक्त पद पर निर्धारित योग्यता वाले व्यक्ति की चयन समिति की सिफारिश पर नियुक्ति की जा सकेगी।

वेतन अथवा मानदेय सेवा शर्ते आदि -राष्ट्रीय आयोग के सदस्यों को देय वेतन अथवा मानदेय एवं अन्य भत्ते तथा सेवा शर्ते आदि वही होंगी जोंकि केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्धारित की गई हों। [धारा 20(2)]

राष्ट्रीय आयोग का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of the National Commission)

राष्ट्रीय का आयोग का क्षेत्राधिकार निम्न प्रकार होगा-(i) उन शिकायतों पर विचार करना जिनमें माल या सेवा का मूल्य तथा क्षतिपूर्ति 1 करोड़ रुपये से अधिक हो। (ii) किसी राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध की गई अपील की सुनवाई करना। (iii) राज्य आयोग के अधीन कोई उपभोक्ता विवाद जो विचाराधीन हो जिसका निर्णय दे दिया गया हो और उसके सम्बन्ध में राष्ट्रीय आयोग को यह लगता हो कि सम्बन्धित राज्य आयोग ने अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया है या दिये गये क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में असमर्थ रहा है या अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में अवैधानिक या मौलिक अनियमितता की है तो सम्बन्धित अभिलेखों को मंगवाना तथा उपयुक्त आदेश निर्गमित करना। (धारा 21) 

राष्ट्रीय आयोग की शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया (Procedure of Disposal of Complaints by National Commission)

1, शिकायत प्रस्तुत करनाराष्ट्रीय आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करने सम्बन्धी नियम निम्नानुसार हैं-(i) शिकायत शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं या उसके एजेण्डा नागपत की जानी चाहिये। (ii) शिकायत व्यक्तिगत रूप से या पंजीकृत डाक से प्रस्तत की जा सकती है। (iii) शिकायत में शिकायतकर्ता का नाम, पता तथा विवरण होना चाहिये। (iv) शिकायत में विरोधी पक्षकार का नाम, पता तथा विवरण होना चाहिये। (v) शिकायत में शिकायत से सम्बन्धित तथ्य, शिकायत उत्पन्न होने का स्थान, समय, दिन आदि का उल्लेख हो। (vi) शिकायत के साथ आरोपों को पुष्ट करने वाले प्रलेख हों। (vii) शिकायत में शिकायत के लिये अपेक्षित राहत का दावा किया गया हो।

2, शिकायत निवारण की प्रक्रियाराष्ट्रीय आयोग शिकायत निवारण हेतु वही प्रक्रिया अपनायेगा जो जिला मंच द्वारा अपनाई जाती है। राष्ट्रीय आयोग द्वारा इसके अतिरिक्त वह प्रक्रिया भी अपनाई जायेगी जो केन्द्र सरकार द्वारा नियत की जाये।

3, सुनवाई की तिथि पर उपस्थित होनाशिकायत की सुनवाई के दिन पक्षकारों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से उपस्थित होना होगा। यदि शिकायतकर्ता या उसका प्रतिनिधि उपस्थित नहीं होता है तो, राष्ट्रीय आयोग शिकायत को रद्द कर सकता है। , विरोधी पक्ष या उसके प्रतिनिधि के उपस्थित न होने पर एक्स-पार्टी (Ex-Parte) निर्णय किया जा सकेगा।

4, निर्णय का स्थगन तथा निर्णय की समय अवधिआवश्यकता होने पर राष्ट्रीय आयोग शिकायत की सुनवाई को स्थगित कर सकता है। राष्ट्रीय आयोग सुनवाई की तिथि से , तीन महीने के अन्दर अपना निर्णय दे देगा। किन्तु यदि शिकायत की वस्तु के विश्लेषण या जाँच की आवश्यकता है तो वह पाँच महीने के अन्दर अपना निर्णय देगा।

5, आदेश देनाराष्ट्रीय आयोग, सुनवाई की कार्यवाही पूरी हो जाने पर एवं शिकायत में लगाये गये आरोपों से सन्तुष्ट होने पर सम्बन्धित माल में प्रयोगशाला द्वारा इंगित दोष को दूर करने के लिये, उस माल के स्थान पर उसी प्रकार का नया दोषमुक्त माल देने के लिये, कीमत वापिस करने अथवा मुआवजा भुगतान करने का आदेश दे सकता है।

6, राष्ट्रीय आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील (Appeal)- राष्ट्रीय आयोग के, आदेश से पीड़ित कोई भी व्यक्ति उक्त आदेश के विरुद्ध आदेश की तिथि से 30 दिन के अन्दर उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत कर सकता है।


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