Unit 3 Valuation of Intangible Assets Mcom Notes

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Unit 3 Valuation of Intangible Assets Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit-III Valuation of Intangible Assets: Valuation of Goodwill and other intangible Assets, Technique and Methods.

अमूर्त सम्पत्ति का मूल्यांकन [Valuation of Intangible Assets]

 

ख्याति का अर्थ (Meaning of Goodwill)

किसी व्यवसाय की प्रसिद्धि उसके अपने ग्राहकों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाए रखने मे सहायक होती है। एक स्थापित व्यापार में ग्राहकों की संख्या अधिक होती है, जबकि नए व्यापार में कम नए व्यापार में ग्राहक कम आने के कारण बिक्री कम होती है, परिणामस्वरूप लाभ की मात्रा भी कम होती है। पुराने व्यापार में ग्राहक अधिक आने के कारण बिक्री अधिक होती है, परिणामस्वरूप लाभ को मात्रा भी अधिक होती है। पुराने व्यापार में अधिक बिक्री और अधिक लाभ कमाने की क्षमता के पीछे उसकी ख्याति का हाथ होता है। ख्याति क्या है, ‘ख्याति’ एक अमूर्त सम्पत्ति है जिसे देखा एवं छुआ नहीं जा सकता, परन्तु इसे महसूस किया जा सकता है। इस सम्पत्ति का न तो कोई भौतिक आकार है, न कोई रूप, फिर भी इसका अस्तित्व व्यवसाय की सुदृढ़ स्थिति का परिचायक है। अन्य सम्पत्तियों की तरह इसका भी एक मूल्य होता है तथा इसका क्रय-विक्रय हो सकता है अर्थात् ख्याति एक कृत्रिम सम्पत्ति नहीं है। अतः ख्याति एक ऐसी प्रसिद्धि होती है जो फर्म के स्वामियों द्वारा भूतकाल में की गई मेहनत, ग्राहकों को प्रदान की गई सेवाओं, उनके साथ व्यवहार में ईमानदारी आदि के कारण प्राप्त होती है।

ख्याति की परिभाषाएँ (Definitions of Goodwill)

‘ख्याति’ एक व्यापारिक शब्द है जिसकी व्याख्या करना तो सरल है, परन्तु एक निश्चित परिभाषा देना कठिन है। विभिन्न विद्वानों ने ख्याति को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

मॉरिस के शब्दों में “ख्याति एक संस्था के आशातीत अधिलाभों का वर्तमान मूल्य है।”

स्पाइसर एवं पेगलर के शब्दों में—“ख्याति वह शब्द है जो किसी व्यवसाय की प्रतिष्ठा, सम्बन्ध और उस व्यवसाय को प्राप्त लाभों के कारण उत्पन्न होती है जिस कारण वह व्यवसाय, उस व्यवसाय में लगी हुई मूर्त सम्पत्तियों में विनियोजित पूँजी पर सामान्य अपेक्षित लाभ मे अधिक लाभ कमाता है।’

लॉर्ड एल्टन के शब्दों में—“ख्याति इस सम्भावना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है कि पुराने ग्राहक पुराने स्थान को ही चुनते हैं।”

लॉर्ड लिण्डले के शब्दों में “ख्याति सम्बन्धों तथा प्रसिद्धि से होने वाला लाभ है।”

Valuation of Intangible Assets

ख्याति के मूल्यांकन की विधियाँ (Methods of Valuation of Goodwill)

ख्याति के मूल्यांकन की प्रमुख विधियों निम्नलिखित है–

(1) औसत लाभ विधि (Average profit method),

(2) अधिलाभ विधि (Super profit method),

(3) पूँजीकरण विधि (Capitalization method),

(4) वार्षिक वृत्ति विधि (Annuity method),

(5) क्रय प्रतिफल विधि (Purchase consideration method) ।

1, औसत लाभ विधि (Average Profit Method)

इस विधि के अनुसार गत कुछ वर्षों के लाभों का औसत ज्ञात किया जाता है। इसके लिए, निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

(i) Average Profit = Total Profits / No. of Years

उपर्युक्त सूत्र द्वारा निकाले गए औसत लाभ को एक निश्चित संख्या प्रश्नानुसार) से गुणा करके ख्याति का मूल्य निर्धारित किया जाता है।

(ii) Value of Goodwill Average Profit x No. of Years Purchased

2, अधिलाभ विधि (Super Profit Method)

इस विधि के अनुसार निश्चित पूँजी विनियोग करने पर समान व्यवसायों में समान लाभ कमाया जा सकता है। इस प्रकार समान व्यापार करने वाली फर्मे जितना लाभ कमाती है उसे सामान्य लाभ कहते हैं, किन्तु यदि कोई फर्म सामान्य लाभ से अधिक लाभ कमाती है तो यह आधिक्य अधिलाभ (Surplus) कहलाता है। इस अधिलाभ को वर्षों से (प्रश्नानुसार) गुणा करके ख्याति का मूल्य निकाला जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्रों का प्रयोग किया जाता है –

(i) Average Profit = Total Profit+ No. of Years

(ii) Normal Profit Capital employed × Normal Rate of Return /100

(iii) Super Profit = Actual Average – Profit Normal Profit

(iv) Value of Goodwill Super Profit × No. of Years Purchased.

3, पूँजीकरण विधि (Capitalization Method)

इस विधि में व्यवसाय के लाभों का पूँजीकृत मूल्य ज्ञात किया जाता है। इसी पूंजीकृत मूल्य के आधार पर ख्याति का मूल्यांकन किया जाता है, अतः इसे पूँजीकरण विधि कहते हैं। इसके लिए अग्रलिखित कार्यविधि प्रयोग में लायी जाती है

(i) Average Profit= Total Profit/No. of Years

(ii) Capitalized Value of Average Profit = 100/Normal Rate of Return × Actual Average Profit

(iii) Goodwill = Capitalized Value of Average Profit-Actual Capital Employed.

4, वार्षिक वृत्ति विधि (Annuity Method)

भविष्य में प्राप्त होने वाले लाभों के लिए क्रेता कम्पनी द्वारा ख्याति का मूल्य चुकाया जाता है। इसके लिए क्रेता द्वारा एकमुश्त राशि भी चुकाई जाती है। लेकिन ऐसी राशि का भुगतान इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य में अधिलाभ कितने वर्षों तक मिलने की सम्भावना है। माना किसी क्रेता को अगले तीन वर्षों तक ₹50,000 प्रतिवर्ष के हिसाब से लाभ मिलने की आशा है तो वह विक्रेता को एक साथ ख्याति की एकमुश्त राशि अदा कर देगा। इस प्रकार क्रेता को 3 वर्षों में ₹1,50,000 अधिलाभ के रूप में प्राप्त होंगे, परन्तु उसे उसके बदले ख्याति की एकमुश्त राशि अभी चुकानी है, अतः वह राशि निश्चित रूप से ₹1,50,000 से कम होगी। इसलिए तीन वर्षों की वार्षिक किस्त का एक निश्चित ब्याज की दर पर वर्तमान मूल्य की ख्याति का मूल्य होगा। इस मूल्य को वार्षिकी तालिका द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।

5, क्रय प्रतिफल विधि (Purchase Consideration Method)

किसी व्यापार को क्रय करने के बदले में एक व्यवसायी द्वारा जो मूल्य दिया जाता है, उसको क्रय प्रतिफल कहते हैं। इस विधि के अन्तर्गत क्रय प्रतिफल में से विनियोजित पूँजी की राशि घटा देने पर जो शेष बचता है, वही ख्याति मानी जाती है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है

 

Purchased consideration                                                ………………………..

 

Less: Capital employed                                                   ………………………..

 

Goodwill     ………………………..

 

 

अधिलाभ पद्धति (Super Profit Method)

सामान्य भाषा में अधिलाभ से आशय उस लाभ से है, जो एक व्यवसायी अपने जैसे दूसरे व्यवसायी द्वारा अर्जित लाभ की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त करता है। अन्य शब्दों में यह कह सकते हैं कि यदि व्यवसाय के वास्तविक औसत लाभ फर्म के सामान्य लाभ से अधिक होते हैं तो इस आधिक्य को अधिलाभ कहा जाता है। इसे निम्न प्रकार प्रकट किया जा सकता है –

अधिलाभ = औसत लाभ – सामान्य साम

Super Profit = Average Profit Normal Profit

 

अधिलाभ द्वारा ख्याति की गणना (Calculation of Goodwill by Super Profit)

अधिलाभ के द्वारा ख्याति की गणना करने में निम्न चरणों से गुजरना पड़ता है –

(1) औसत लाभों की गणना कीजिए।

(2) विनियोजित पूँजी में सामान्य प्रत्याय की दर से गुणा करके विनियोजित पूँजी पर सामान्य लाभ की गणना।

(3) औसत लाभ में से सामान्य लाभ को घटाकर अधिलाभ की गणना।

(4) अधिलाभ में दिए गए वर्षों की क्रय संख्या से गुणा करके ख्याति की राशि निकाल लीजिए

 

Normal Profit = Capital Employed × Normal Rate of Return / 100

Super Profit = Actual Profit Normal Profit

Goodwill = Super Profit x No. of Years’ Purchase

 

अधिलाभ विधि से ख्याति की गणना करने के लिए निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं |

I, व्यवसाय में विनियोजित पूँजी का निर्धारण (Determination of Capital Employed in Business)

‘अधिलाभ’ या ‘पूंजीकरण विधि से ख्याति की गणना में विनियोजित पूँजी की गणना एक महत्त्वपूर्ण गणना है। इसकी गणना के लिए निम्न प्रक्रिया अपनायी जाती है –

  1. दृश्यमान स्थायी सम्पत्तियाँ (Tangible Fixed Assets) – इन सम्पत्तियों को चालू या बाजार मूल्य पर लिया जाना चाहिए। यदि इन्हें बाजार मूल्य पर लिया जाता है तो इनके सम्बन्ध में विट्टे में दिखाए हास पर ध्यान नहीं दिया जाता।
  2. अदृश्य सम्पत्तियाँ (Intangible Assets) – इनमें ख्याति को छोड़कर पेटेन्ट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट इत्यादि को उनके वसूली मूल्य पर शामिल किया जाता है। यदि यह मूल्य न दिया हो तो पुस्तक मूल्य को लिया जाता है।
  3. ख्याति (Goodwill) – यदि चिट्टे के सम्पत्ति पक्ष में ख्याति की राशि दी गयी है तो इसे शामिल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि ख्याति का मूल्यांकन तो किया ही जा रहा है।
  4. चालू सम्पत्तियाँ (Current Assets) – इन्हें शुद्ध मूल्य पर दिखाया जाना चाहिए जैसे पुस्तकीय देनदारों में से अशोध्य ऋण का संचय घटाकर |
  5. विनियोग (Investments) – गैर-व्यापारिक विनियोग या बाह्य विनियोग को शामिल नहीं किया जाता, लेकिन आन्तरिक या व्यापारिक विनियोगों को उनके पुनर्मूल्यांकन मूल्य या चिट्ठा मूल्य पर शामिल किया जाता है।
  6. कृत्रिम सम्पत्तियाँ (Fictitious Assets) – जैसे प्रारम्भिक व्यय, अंशो या ऋणपत्रों के निर्गमन पर छूट, अभिगोपन कमीशन, आस्थगित व्यय इत्यादि। इन्हें पूरी तरह छोड़ दिया जाता है।
  7. बाहरी दायित्व (External Liabilities) – सम्पत्तियों के मूल्य की उपर्युक्त प्रकार से गणना करने के पश्चात् बाहरी दायित्वों से घटा दिया जाता इनमें गैर-चालू दायित्व और चालू दायित्व दोनों शामिल होते हैं।
  8. पूर्वाधिकार अंश पूँजी (Preference Share Capital) – विनियोजित पूँजी की गणना की दृष्टि से पूर्वाधिकार अंश दो प्रकार के होते हैं- (अ) भागयुक्त (Participating), एवं (ब) गैर-भागयुक्त (Non-participating)। यदि पूर्वाधिकारी अंश भागयुक्त हैं तो इन्हें विनियोजित पूँजी की गणना करते समय घटाया नहीं जाएगा। इसके विपरीत, गैर-भागयुक्त होने पर बाहरी दायित्व मानकर घटाया जाएगा।

 

II, औसत विनियोजित पूँजी (Average Capital Employed)

अधिकतर विद्वानों का मत है कि ख्याति निकालने के लिए “औसत नियोजित पूँजी” का प्रयोग किया जाना चाहिए; इसलिए उपर्युक्त विधि से व्यवसाय में लगी हुई पूँजी निकालने के बाद इसमें से सम्बन्धित वर्ष के आयगत लाभ का आधा घटाकर व्यवसाय में लगी औसत विनियोजित पूँजी को प्राप्त कर लिया जाना चाहिए।

वर्ष के आयगत लाभ के आधे से तात्पर्य उस लाभ से है जो बाह्य विनियोग की आय दीर्घकालीन ऋणों पर ब्याज ऋणपत्रों पर ब्याज, संचालकों या स्वामियों का पारिश्रमिक तथा कर आदि घटाने के बाद प्राप्त होता है, के आधे से है।

अन्य विधियाँ – व्यवसाय में लगी पूँजी की गणना की उपर्युक्त विधि के अलावा अन्य विधियाँ भी है जो इस प्रकार हैं

(1) एक व्यवसाय में वर्ष के प्रारम्भ की पूँजी और वर्ष के अन्त की पूँजी को जोड़कर दो का भाग देने से जो राशि आती है, वह ही व्यवसाय में लगी हुई औसत पूँजी कही जाती है।

(2) इसी तरह यदि वर्ष के प्रारम्भ की पूँजी में वर्ष के लाभ का आधा जोड़ दिया जाए तो भी व्यापार में लगी हुई औसत पूँजी की राशि निकाली जा सकती है।

(3) इसी तरह यदि वर्ष के अन्त की पूँजी में वर्ष के लाभ का आधा घटा दिया जाए तो भी व्यवसाय में लगी हुई औसत पूँजी की राशि ज्ञात की जा सकती है।

प्रारम्भिक पूँजी में जोड़े जाने वाले लाभ का आधा एवं अन्त की पूँजी में से घटाए जाने वाले लाभ के आधे भाग का निर्धारण करते समय यह देख लेना चाहिए कि कम्पनी के चिट्ठे में दायित्व की ओर प्रस्तावित लाभांश की राशि तो नहीं दी हुई है। यदि है तो शुद्ध लाभ में प्रस्तावित लाभांश की राशि को जोड़ देना चाहिए। अब जो राशि आएगी उसका आधा भाग जोड़ा या घटाया जाता है।

Valuation of Intangible Assets

III, औसत लाभ एवं वास्तविक औसत लाभ (Average Profit and Actual Average Profit)

औसत लाभ का तात्पर्य उस लाभ से है जो गत कुछ वर्षों के लाभ को जोड़कर उन वर्षों की संख्या से भाग देने से प्राप्त होता है। औसत लाभ का निर्धारण हो जाने के उपरान्त वास्तविक औसत लाभ का निर्धारण किया जाता है।

IV, साधारण लाभ (Normal Profit)

साधारण लाभ का आशय उस लाभ से हैं जो कि औसत विनियोजित पूँजी में आय की उस दर का गुणा करने से आता है जिसे प्राप्त करने की आशा उस प्रकार के उद्योगों में विनियोग करने वाले व्यक्ति रखते हैं।

V, अधिलाभ (Super Profit)

अधिलाभ का आशय उस लाभ से है जो कि वास्तविक औसत लाभ में से साधारण लाभ को घटाने के बाद प्राप्त होता है।

VI, ख्याति (Goodwill)

ऊपर निर्धारित की गई विधि द्वारा अधिलाभ की राशि ज्ञात हो जाने के बाद उसमें कुछ वर्षों की संख्या का गुणा करने के बाद ख्याति की राशि ज्ञात की जाती है। इस विधि में गुणा किए जाने वाले वर्षों की संख्या का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है कि कितने वर्षों की संख्या से अधिलाभ में गुणा किया जाए। यह विषय विवादग्रस्त है फिर भी निम्नलिखित विवरण इस समस्या को समझने में सहायक होगा –

(1) अधिलाभ की राशि जितनी अधिक होगी, वर्षों की संख्या भी उतनी ही अधिक होनी चाहिए और अधिलाभ की राशि जितनी कम होगी, वर्षों की संख्या उतनी ही कम होनी चाहिए।

(2) वर्षों की संख्या का सही निर्धारण व्यापार की दशा, प्रतिभूतियों की स्थिति, सरकारी दृष्टिकोण एवं अन्य तथ्यों को ध्यान में रखकर किया जाता है। एक व्यापार के लिए यदि तीन वर्ष आदर्श माने गए हैं तो उसी प्रकार के व्यापार के लिए दूसरी कम्पनी की दशा में दो वर्ष भी आदर्श हो सकते हैं।

(3) यदि ऐसा व्यवसाय क्रय किया जा रहा है जिससे अधिक लाभ होने का श्रेय प्रबन्धकों को है और उस प्रबन्ध में क्रय के बाद परिवर्तन कर दिया ज. रगा तो एक या दो वर्षों का ही गुणा करना उचित माना जाता है।

(4) विद्यमान व्यवसाय का जितना लाभ इस समय है उतना लाभ एक नया स्थापित किया हुआ व्यापार जितने वर्षों में प्राप्त करने के योग्य हो जाएगा, उतने ही वर्षों का गुणा अधिलाभ में किया जाना चाहिए।

(5) साधारणतया तीन से पाँच वर्षों की संख्या को आदर्श संख्या माना जाता है। अत: क्रियात्मक प्रश्नों में यदि वर्षों की संख्या स्पष्ट न हो तो तीन या पाँच वर्षों की संख्या से अधिलाभ में गुणा कर ख्याति की राशि ज्ञात करनी चाहिए।

Valuation of Intangible Assets

अधिलाभ प्रणाली के लाभ (Advantages of Super Profit Method)

यह प्रणाली ख्याति निकालने की उत्तम प्रणाली मानी जाती है और इसका प्रयोग अधिकतर कम्पनियों के एकीकरण एवं संविलयन तथा उन परिस्थितियों में किया जाता है जबकि एक कम्पनी दूसरी कम्पनी को क्रय करती है। क्रय करने की दशा में ख्याति का सही मूल्यांकन विशेष प्रभाव रखता है। एक नए व्यापार में पूँजी लगाते समय प्रत्येक क्रेता उस व्यापार की वित्तीय स्थिति एवं उपार्जन शक्ति दोनों पर गहन दृष्टिपात करता है। यह विधि इस उद्देश्य की प्राप्ति में एक निश्चित सीमा तक सहायता पहुंचाती है।

 

अधिलाभ प्रणाली के दोष (Disadvantages of Super Profit Method)

अधिलाभ पद्धति से ख्याति निकालने वाला व्यक्ति यह अनुमान लगाता है कि अधिलाभ में जितने वर्षों का गुणा किया गया है उतने ही वर्षों में उसे ख्याति की राशि उस व्यापार से वसूल हो जाएगी जिसको कि उसने क्रय किया है। माना कि अधिलाभ की राशि ₹50,000 है और इसमें तीन वर्ष का गुणा करके 1,50,000 ख्याति की राशि निकाली गयी है तो क्रेता यह अनुमान लगाता है कि यह ₹1,50,000 तीन वर्षों में 50,000 प्रति वर्ष की दर से वसूल हो जाएँगे, परन्तु वह इस बात का ध्यान रखना भूल जाता है कि ख्याति की जो राशि ₹1,50,000 व्यापार को क्रय करते समय दी गयी है उसको यदि अन्य कहीं विनियोजित किया जाता तो कुछ ब्याज अवश्य प्राप्त होता इस ब्याज की क्षति क्रेता को इस पद्धति में होती हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ख्याति के मूल्यांकन की यह विधि भी दोषमुक्त नहीं है।

Valuation of Intangible Assets

अधिलाभ पर आधारित ख्याति मूल्यांकन की अन्य पद्धतियाँ (Other Methods of Goodwill Valuation Based on Super Profit)

अधिलाभों का पूँजीकरण विधि (Capitalisation of Super Profits: Method) – ख्याति का निर्धारण अधिलाभों का पूँजीकरण करके सीधे ज्ञात किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत औसत लाभों का पूँजीकरण करने की आवश्यकता नहीं है। इसके अन्तर्गत निम्न चरण आते हैं –

(1) फर्म की विनियोजित पूँजी (शुद्ध सम्पत्ति) ज्ञात करें। इसे कुल परिसम्पत्तियों (ख्याति) को छोड़कर) में से बाह्य दायित्वों को घटाकर प्राप्त किया जाता है।

Capital Employed = Total sets (excluding Goodwill) – Outside Liabilities

(2) विनियोजित पूँजी पर सामान्य लाभ की गणना करें।

Normal Profits = Capital Employed – Normal Rate of Return / 100

(3) दिए गए गत वर्षों के औसत लाभ की गणना करें।

(4) औसत लाभ में से सामान्य लाभ की राशि को घटाकर अधिलाभ की राशि की गणना

Super Profits = Actual/Average Profits – Normal Profits

(5) अधिलाभ की राशि को प्रतिफल की सामान्य दर गुणांक से गुणा करें अर्थात्

Goodwill = Super Profit x 100 / Normal Rate of Return

दूसरे शब्दों में, ख्याति के मूल्य को अधिलाभ पर पूँजीकृत किया जाता है। इस विधि से ख्याति की राशि की गणना उसी प्रकार से की जाती है जैसा कि औसत लाभों को पूँजीकृत करके किया जाता है।

Valuation of Intangible Assets

ख्याति का मूल्यांकन (Valuation of Goodwill)

लेखाकर्म में ख्याति का महत्त्व तभी है जबकि ख्याति का कोई मूल्य हो। जब तक ख्याति के लिए कोई राशि न दी जाती है और न ली जाती है तब तक इसका लेखा हो ही नहीं सकता है क्योंकि लेखाकर्म में लेखे तभी होंगे जबकि कोई सौदा हो। ख्याति का मूल्य निर्धारित होने पर ही इसके सम्बन्ध में लेखे किए जा सकते हैं।

जब किसी व्यवसाय को क्रय करते समय सम्पत्तियों के मूल्य के अतिरिक्त कुछ और राशि देनी पड़ती है तो इस अधिक राशि को ख्याति का मूल्य माना जाता है। जिस राशि के उपलक्ष्य में कुछ भी प्राप्त न हो फिर भी क्रेता सहर्ष उसे देने के लिए तैयार हो तो इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह इस राशि को इसलिए देना चाहता है कि भविष्य में उसे साधारण लाभों से अधिक लाभ प्राप्त होने की आशा है। इसी लाभ के सहारे वह ख्याति का मूल्यांकन करता है। विक्रेता यह अनुमान लगाता है कि व्यवसाय को बेचने से भविष्य में न प्राप्त होने वाले लाभ से उसे कितनी क्षति होगी तथा व्यवसाय को बेचने से मिलने वाली राशि का प्रयोग अन्य लाभ से करने में उसे क्या लाभ होगा। इन तथ्यों को ध्यान में रखकर वह ख्याति का मूल्य निर्धारित करता है। क्रेता व्यवसाय की शुद्ध सम्पत्तियों का मूल्य ज्ञात करने के बाद यह अनुमान लगाता है कि भविष्य में से उसे कितना अतिरिक्त लाभ प्राप्त होगा और इसके लिए जो अतिरिक्त मूल्य उससे माँगा जा रहा है वह कहाँ तक उचित है। यदि वह समझता है कि जो मूल्य ख्याति के लिए वह इस समय दे रहा है उसकी उपयोगिता उस समय उसके लिए उस लाभ से कम है जो उसे व्यापार के क्रय करने से प्राप्त होगा तो वह ख्याति की राशि को देने के लिए तैयार हो जाता है।

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ख्याति को प्रभावित करने वाले तत्त्व (Factors Affecting the Goodwill)

किसी व्यवसाय की ख्याति को निम्नलिखित तत्त्व मुख्य रूप से प्रभावित करते हैं –

1, व्यवसाय की लाभदायकता (Profitability of the business) – एक फर्म की ख्याति के मूल्यांकन का प्रमुख आधार उसकी भावी लाभदायकता है। किसी व्यवसाय की भावी लाभदायकता का आकलन उसके गत वर्षों के लाभ, उनके घटने-बढ़ने की प्रवृत्ति तथा भावी सम्भावनाओं के आधार पर किया जाता है।

भावी लाभदायकता का आशय भविष्य में बने रहने योग्य लाभों (future) maintainable profits) की मात्रा का आकलन है ये लाभ जितने अधिक होंगे, फर्म की ख्याति भी उतनी ही अधिक होगी। भावी बने रहने योग्य लाभों का आकलन निम्न कारकों पर आधारित होता है –

(i) गत वर्षों के लाभ (Profits of past years) – व्यवसाय के भावी सम्भावित लाभ की गणना के लिए उस व्यवसाय के गत वर्षों के परिणामों को आधार बनाया जाता है। गत

लाभों की गणना करते समय निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक होगा—

(अ) ऋणपत्रों पर ब्याज व सम्पत्तियों पर हास सहित सभी सामान्य कार्यकारी व्ययों को घटाया जाए।

(ब) कर आयोजन सहित सभी दायित्वों के लिए आवश्यक आयोजन किए जाएँ किन्तु सामान्य संचय, लाभांश समानीकरण कोष, दायित्वों के भुगतान के लिए सिंकिंग फण्ड आदि लाभ के नियोजन न किए जाएँ।

(स) यदि गैर-व्यापारिक सम्पत्तियों को विनियोजित पूँजी की गणना से अलग रखा गया। है तो ऐसी सम्पत्तियों से प्राप्त आय को लाभों से अलग रखा जाए।

(द) एक वर्ष के स्थान पर चार-पाँच वर्षों के लाभ के औसत को वार्षिक लाभ माना। जाए। यदि गत वर्षों में किसी वर्ष के परिणाम किन्हीं असामान्य घटनाओं से प्रभावित हो तो औसत लाभ की गणना के लिए ऐसे असामान्य वर्ष के परिणाम को छोड़ देना चाहिए।

(य) असाधारण व अनावर्तक आय या व्यय की मदों को छोड़कर ही प्रत्येक वर्ष के लाभ ज्ञात किए जाने चाहिए।

(र) यदि सम्पत्तियों को उनकी प्रतिस्थापन लागत पर दिखलाया जाता है तो हास की गणना भी इसी लागत पर होनी चाहिए।

(ii) स्पष्ट रूप से बढ़ते या घटते लाभ (Markedly rising or falling profits) – यदि गत वर्षों के लाभ निरन्तर वृद्धि दर्शा रहे हो तो सामान्य औसत के स्थान पर भारित औसत के आधार पर वार्षिक औसत लाभ ज्ञात करना चाहिए। भारित औसत लाभ की गणना करने के लिए प्रत्येक वर्ष के लाभ को एक भार दिया जाता है- वर्तमान के वर्ष के लाभ को अधिकतम भार दिया जाता है तथा सबसे पुराने वर्ष के लाभ को सबसे कम भार दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि 2014, 2015, 2016 2017 वर्षों के लाभ दिए हों तो उन्हें क्रमश: 1, 2, 3 व 4 का भार दिया जा सकता है।

(iii) प्रत्याशित विकास (Expected Developments) – यदि संस्था के विकास पर महत्वपूर्ण व्यय किया गया है तो विकास के सम्भावित फलों (results) के आधार पर गत वर्षों के वार्षिक औसत लाभों में आवश्यक समायोजन करके ही भावी बने रहने योग्य लाभों की गणना करनी चाहिए।

2, विनियोक्ताओं द्वारा प्रत्याशित आय (Yield Expected by Investors) – ख्याति के मूल्यांकन में दूसरा प्रमुख तत्त्व विनियोक्ताओं की अपने विनियोग से प्रत्याशित आय है। वस्तुतः विनियोक्ताओं की प्रत्याशा ही लाभों का सामान्य स्तर या सामान्य प्रत्याय दर (normal rate of return) निर्धारित करती है। इस दर का निर्धारण उसी प्रकार के व्यवसाय में लगी अन्य कम्पनियों के अंशों के स्कन्ध बाजार में प्रचलित मूल्य-उपार्जन अनुपात (Price Earnings Ratio) के आधार पर किया जा सकता है। विनियोक्ताओं की आय-प्रत्याशा दर बढ़ने पर ख्याति घटती है तथा प्रत्याशा घटने पर ख्याति बढ़ जाती है। यह प्रत्याशा निम्न तत्वों से प्रभावित होती है –

(i) विनियोग में व्यावसायिक व वित्तीय जोखिम की मात्रा (Quantity of Financial Risk and Business in Investment) – जोखिम अधिक होने पर विनियोक्ताओं की आय-प्रत्याशा दर बढ़ जाती है।

(ii) विनियोग की अवधि (Period of Investment) – विनियोग की अवधि बढ़ने के साथ-साथ विनियोक्ताओं की आय-प्रत्याशा दर बढ़ती जाती है क्योंकि अवधि बढ़ने के साथ-साथ जोखिम बढ़ जाती है।

(iii) बैंक दर (Bank Rate) – बैंक दर बढ़ने पर आय-प्रत्याशा दर बढ़ती है तथा घटने पर घट जाती है।

(iv) व्यवसाय चक्र (Business Cycle) – व्यावसायिक तेजी के समय विनियोक्ताओं की आय प्रत्याशा दर बढ़ जाती है तथा मन्दी के समय इस दर में गिरावट आ जाती है।

(v) सामान्य आर्थिक व राजनीतिक स्थिति (Simple Economic and Political Position) – विनियोक्ताओं का देश की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति में विश्वास हिल जाने पर उनकी आय प्रत्याशा दर तेजी से बढ़ जाती है।

3, विनियोजित पूँजी (Capital Employed) – ख्याति के मूल्यांकन में यह तीसरा महत्वपूर्ण तत्त्व है क्योंकि लाभों की मात्रा का महत्त्व इन्हें अर्जित करने के लिए प्रयोग की गयी पूँजी से सम्बन्ध स्थापित करके ही जाना जा सकता है। सामान्यतया विनियोजित पूँजी का आशय शुद्ध स्थायी सम्पत्तियों और शुद्ध कार्यशील पूँजी के योग से होता है तथा इसमें गैर-व्यापारिक सम्पत्तियों (जैसे–सरकारी प्रतिभूतियों में विनियोग) को सम्मिलित नहीं किया जाता है। इसे अंश पूंजी, संचयों व आधिक्य तथा दीर्घकालीन ऋणों का योग करके भी ज्ञात किया जा सकता है।

एक कम्पनी की ख्याति के मूल्यांकन के लिए विनियोजित पूंजी का उपर्युक्त विचार उपयुक्त नहीं क्योंकि यहाँ पर ख्याति का लाभ केवल अंशधारियों को ही मिलता है। अतः विनियोजित पूँजी की गणना में ऋणपत्रों व अन्य ऋणों की राशि को इसके अन्तर्गत सम्मिलित नहीं करना चाहिए। इस सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चूंकि लाभ चालू मूल्यों पर अभिव्यक्त किए जाते हैं, अतः स्थायी सम्पत्तियों को भी उनके चालू मूल्य पर ही दिखाया जाना चाहिए।

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4, अन्य तत्त्व (Other Factors) –

(i) प्रबन्धन में व्यक्तिगत चातुर्य (Personal Skill in Management) – यदि फर्म के अधिक लाभ व्यवसाय स्वामी व प्रबन्धकों के व्यक्तिगत चातुर्य के कारण हैं तो उसकी ख्याति कम आँकी जाती है क्योंकि फर्म के विक्रय पर इन गुणों को क्रेता को हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता। जिस व्यवसाय में व्यक्तिगत कारकों का जितना अधिक महत्त्व होगा, उस व्यवसाय की ख्याति उतनी ही कम आँकी जाएगी।

(ii) व्यवसाय की प्रकृति (Nature of Business) – यदि नई फर्मों के उस व्यवसाय में प्रवेश पर प्रभावपूर्ण बाधाएँ हैं तो विद्यमान फर्म की ख्याति अधिक होगी। इसी तरह यदि फर्म सतत् माँग की वस्तु या सेवा का विक्रय करती है तो इसकी ख्याति फैशन व अनिश्चित माँग की वस्तु या सेवा का विक्रय करने वाली फर्म से अधिक होगी।

(iii) अनुकूल स्थिति (Favourable Location) – यदि व्यापार का स्थान ग्राहकोके लिए और / अथवा उस व्यवसाय विशेष के लिए अनुकूल हैं तो उस फर्म की ख्याति अधिक होगी।

(iv) कच्चे माल व कुशल श्रम की सुलभ आपूर्ति (Easy Availability of Raw Materials and Trained Labour) – यदि कच्चे माल और कुशल श्रम की नियमित आपूर्ति के लिए किए गए अनुबन्धों का लाभ क्रेता को भी पूर्ववत् मिलता रहेगा तो फर्म की ख्याति अधिक आँकी जाएगी।

(v) पेटेन्ट व ट्रेडमार्क का उपयोगी जीवनकाल (Useful Life of Patents and Trade Mark) – यदि विक्रेता फर्म का पेटेन्ट व ट्रेडमार्क लम्बे समय तक उपयोगी बने रहने की सम्भावना है तो फर्म की ख्याति अधिक आँकी जाएगी।

(vi) राजनीतिक व सरकारी संरक्षण (Political and Government (Protection) – जिन व्यवसायों को राजनीतिक और/अथवा सरकारी संरक्षण प्राप्त है, उनकी ख्याति अधिक आँकी जाएगी।

(vii) पूँजी आवश्यकताएँ (Capital Requirements) – यदि अधिक लाभ अर्जित करने वौली फर्म कम पूँजी से ही संचालित है तो उसकी ख्याति अधिक आँकी जाएगी।

(viii) विशिष्ट अनुबन्ध (Specific Contracts) – ग्राहकों को माल या सेवा को आपूर्ति के बहुत अधिक अनुकूल अनुबन्ध फर्म की ख्याति बढ़ाते हैं किन्तु यदि इन अनुबन्धों का लाभ नए स्वामी को नहीं मिल सके तो इन अनुबन्धों का ख्याति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Valuation of Intangible Assets Numerical Question.

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Valuation of Intangible Assets

Unit 3 Valuation of Intangible Assets Mcom Notes
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