Unit 1 Corporate Restructuring Mcom Notes

Unit 1 Corporate Restructuring Mcom Notes

Contents

Unit 1 Corporate Restructuring Mcom Notes

Unit 1 Corporate Restructuring Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit-1 Corporate Restructuring: Accounting Issues relating to Amalgamation and Reconstruction as per Accounting Standards; Merger and Demerger, Accounting in the books of Transferor and Transferee Companies. Internal Reconstructions. Corporate Restructuring Mcom Notes

कॉर्पोरेट पुनर्निर्माण [Corporate Reconstructing]

एकीकरण (Amalgamation)

लेखांकन प्रमाप-14 के अनुसार एकीकरण के निम्नलिखित दो प्रकार निश्चित किए गए हैं –

(1) विलय के स्वभाव का एकीकरण (Amalgamation in the nature of merger)

(2) क्रय के स्वभाव का एकीकरण (Amalgamation in the nature of purchase) |

1, विलय के स्वभाव का एकीकरण (Amalgamtion in the Nature of Merger) – निम्नलिखित पाँच शर्तों के पूरा होने पर किसी भी कम्पनी के एकीकरण को विलय के स्वभाव का एकीकरण माना जाएगा –

(i) एकीकरण के बाद हस्तान्तरक कम्पनी की सभी सम्पत्तियाँ एवं दायित्व हस्तान्तरी कम्पनी के हो जाएँगे।

(ii) हस्तान्तरी कम्पनी एवं उसकी सहायक कम्पनियों द्वारा एकीकरण के पूर्व तक ग्रहण किए गए हस्तान्तरक कम्पनी के साधारण अंशों के अतिरिक्त अन्य साधारण अंशों के अंकित मूल्य के कम-से-कम 90% अंशधारी हस्तान्तरी कम्पनी के साधारण अंशधारी एकीकरण के बाद बन जाएँगे।

(iii) हस्तान्तरक कम्पनी के वे सभी साधारण अंशधारी जो हस्तान्तरी कम्पनी के साधारण अंशधारी बनने के लिए स्वीकृति देते हैं, उन्हें हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा अपने साधारण अंशों का निर्गमन करते हुए एकीकरण के प्रतिफल का पूर्णतः भुगतान किया जाएगा, किन्तु आंशिक या खण्डित अंशों का भुगतान नकदी में किया जाएगा।

(iv) हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा एकीकरण के बाद हस्तान्तरक कम्पनी के व्यवसाय को चालू रखा जाएगा।

(v) हस्तान्तरी कम्पनी के वित्तीय विवरणों में हस्तान्तरक कम्पनी की सम्पत्तियों एवं दायित्वों को उनके पुस्तकीय मूल्य पर प्रदर्शित किया जाएगा। यदि दोनों कम्पनियों की लेखांकन नीति में कोई अन्तर हो तो एकरूपता लाने के उद्देश्य से आवश्यक समायोजन किए जा सकते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि विलय के स्वभाव के एकीकरण में हस्तान्तरक कम्पनी एवं हस्तान्तरी कम्पनी दोनों का अस्तित्व बना रहता है और दोनों कम्पनियों का व्यवसाय भी बना रहता है। इसके अतिरिक्त दोनों कम्पनियों के अंशधारियों का स्वामित्व भी बहुत हद तक बना रहता है। वार्षिक वित्तीय विवरण बनाते समय दोनों कम्पनियों की सम्पत्तियों, संचयों एवं दायित्वों का विवरण भी एक साथ दिया जाता है।

2, क्रय के स्वभाव का एकीकरण (Amalgamation in the nature of Purchase) – विलय के स्वभाव के एकीकरण में जिन पाँच शर्तों का उल्लेख किया गया है, जब उनमें से कोई एक या अधिक शर्तों की पूर्ति नहीं हो पाती तब ऐसे एकीकरण को क्रय के स्वभाव का एकीकरण माना जाता है। इस प्रकार के एकीकरण में किसी एक कम्पनी द्वारा दूसरी कम्पनी को पूर्ण रूप से क्रय कर लिया जाता है तथा आपसी समझौते के अनुसार अथवा किसी उचित तरीके से निर्धारित किए गए क्रय प्रतिफल का भुगतान अंशों में या ऋणपत्रों में या नकदी में या इनमें से किसी एक या सभी रूप में किया जा सकता है। इस दशा में हस्तान्तरक कम्पनी की सम्पत्तियों एवं दायित्वों को हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा ले लिया जाता है जिसके फलस्वरूप हस्तान्तरक कम्पनी का व्यवसाय बन्द हो जाता है और हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारी हस्तान्तरी कम्पनी की पूँजी में कोई हित नहीं रखते हैं। उदाहरण के लिए ‘अ’ लिमिटेड ने ‘ब’ लिमिटेड के व्यवसाय का अधिग्रहण किया। लेकिन ‘ब’ लिमिटेड के व्यवसाय को चालू रखने की इच्छा नहीं है तो यह क्रय के स्वभाव का एकीकरण है, न कि विलय का अथवा जब ‘ब’ लिमिटेड के अंशधारी ‘अ’ लिमिटेड के अंशधारी नहीं हो पाते हैं तो यह क्रय के स्वभाव का एकीकरण होता है पुनः यदि ली गई सम्पत्तियों एवं दायित्वों का हस्तान्तरी कम्पनी की पुस्तकों में संशोधित मूल्य पर अभिलेखन होता है तो यह भी क्रय के स्वभाव का एकीकरण होता है।

सामान्यतः क्रय मूल्य का निर्धारण हस्तान्तरक कम्पनी और हस्तान्तरी कम्पनी के आपसी अनुबन्ध द्वारा होता है। क्रय प्रतिफल का निर्धारण करते समय इसके विभिन्न तत्त्वों का उचित मूल्य का निर्धारण किया जाता है। उचित मूल्य निर्धारित करने हेतु अनेक तकनीकियों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए जब प्रतिफल प्रतिभूतियों के रूप में है तो संवैधानिक प्राधिकारी द्वारा निश्चित मूल्य को ही उचित मूल्य माना जा सकता है। जब यह अन्य सम्पत्तियों के रूप में हो तो त्याग किए गए सम्पत्तियों के बाजार मूल्य को सन्दर्भित करते हुए उचित मूल्य निर्धारित कर सकते हैं, परन्तु जब त्याग किए गए सम्पत्ति का बाजार मूल्य विश्वसनीयता के साथ निर्धारित न हो सके तो इसका निर्धारण शुद्ध पुस्तक मूल्य पर होता है।

क्रय प्रतिफल के निर्धारण की तीन रीतियाँ निम्नलिखित हैं –

(i) शुद्ध भुगतान रीति (Net Payment Method)

(ii) शुद्ध सम्पत्ति रीति (Net Assets Method)

(iii) अंशों की अनुपात रीति या अंश-विनियम रीति (Share Proportion Method or Share Exchange Method)

Corporate Restructuring Mcom Notes

एकीकरण के समय होने वाली जर्नल प्रविष्टियाँ (Journal Entries at the time of Amalgamation)

एकीकरण के समय जर्नल प्रविष्टियाँ करने से पूर्व यह ध्यान रखना होगा कि एकीकरण क्रय की प्रकृति में हो रहा है या विलय की प्रकृति में हस्तान्तरक कम्पनी की पुस्तकों में दोनों स्थितियों में एक सी ही जर्नल प्रविष्टियों की जाएँगी लेकिन हस्तान्तरी कम्पनी की पुस्तकों में दोनों स्थितियों में अलग-अलग जर्नल प्रविष्टियाँ की जाएँगी। इसको इस चित्र से भी समझ सकते हैं

जर्नल प्रविष्टियाँ (Journal Entries)

Corporate Restructuring Mcom Notes

 

(I) हस्तान्तरक कम्पनी की पुस्तकों में जर्नल प्रविष्टियाँ (Journal Entries in the Books of Transferor Company)

विलय के स्वभाव का एकीकरण हो या क्रय के स्वभाव का, दोनों दशाओं में हस्तान्तरक कम्पनी की पुस्तकों में निम्नलिखित प्रविष्टियों की जाती हैं –

(1) समस्त मूर्त एवं अमूर्त सम्पत्तियों के पुस्तकीय मूल्य वसूली लेखे में अन्तरित करने पर –

Realisation Ale                                  Dr.

To Various Assets A/c

(Being various assets transferred to Realisation Account)

 

(2) विविध व्ययों या कृत्रिम सम्पत्तियों; जैसे, अंशों एवं ऋणपत्रों पर कटौती, प्रारम्भिक व्यय, अभिगोपन कमीशन, अंशों एवं ऋणपत्रों के निर्गमन व्यय, लाभ-हानि खाते की डेबिट बाकी आदि को समता अंशधारियों के लेखे में अन्तरित करने पर –

Equity Shareholder’s A/c                   Dr.

To Discount on Shares and Debentures Ale To Preliminary Expenses Ale

To Underwriting Commission A/c

To Expenses of Issue of Shares and Debentures A/c

To Statement of Profit and Loss

(Being balance of above accounts transferred to Equity Shareholders Accounts)

 

(3) हस्तान्तरक कम्पनी द्वारा जिन सम्पत्तियों को स्वयं बेचा जाता है, उसके लिए –

Bank A/c                                              Dr.

To Realisation A/c

(Being sale of assets)

 

(4) हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा जिन दायित्वों को लिया जाता है, उसके लिए Various Liabilities A/c

To Realisation A/c                               Dr.

(Being balance of various liabilities transferred to Realisation A/c

 

(5) हस्तान्तरक कम्पनी द्वारा जिन दायित्वों का स्वयं भुगतान किया जाता है, उसके लिए –

Various Liabilities A/c                           Dr.

To Bank A/e

(Being payment of liability made)

 

(6) जब उपर्युक्त दायित्वों का भुगतान प्रीमियम पर किया जाता है, तो प्रीमियम के लिए –

Realisation A/c                                      Dr.

To Liability Concerned A/c

(Being record of premium on liability)

 

(7) जब उपर्युक्त दायित्वों का भुगतान कटौती पर किया जाता है, तो इस कटौती के लिए –

Liability Concerned A/c                         Dr.

To Realisation A/e

(Being record of discount on……….. liability)

 

(8) प्राप्य क्रय प्रतिफल के लिए –

Transferee Company A/c                      Dr.

To Realisation A/c

(Being purchase consideration receivable)

 

(9) क्रय प्रतिफल प्राप्त होने पर –

Shares in Transferee Company A/c           Dr.

Debentures in Transferee Company Ale Bank A/c            Dr.

To Transferee Company A/c                      Dr.

(Being purchase consideration received)

 

(10) क्रय प्रतिफल का हस्तान्तरण करने पर –

Equity Shareholders’ A/c                           Dr.

To Shares in Transferee Company A/c

To Debentures in Transferee Company A/c

To Bank A/c

(Being distribution of purchase consideration)

 

(11) पूर्वाधिकार अंश पूंजी खाते की बाकी को पूर्वाधिकार अंशधारियों के खाते अन्तरित करने पर-

Preferential Share Capital A/c                    Dr.

To Preference Shareholders’ A/c

(Being balance transferred to Pref. Shareholders’ A/c)

 

(12) यदि पूर्वाधिकार अंशधारियों को प्रीमियम पर भुगतान किया जाता है, तो प्रीमियम के लिए –

Realisation A/c                                 Dr.

To Preference Shareholders’ A/c

(Being record of premium on pref. shares).

 

(13) यदि पूर्वाधिकार अंशधारियों को कटौती पर भुगतान किया जाता है, तो कटौती के लिए –

Preference Shareholders’ A/c           Dr.

To Realisation A/c

(Being record of discount on pref. shares)

 

(14) उपर्युक्त लेखा करने के बाद (यदि हों तो) पूर्वाधिकार अंशधारियों को भुगतान करने पर –

Preference Shareholders’ A/c            Dr.

To Bank A/c

(Being payment made to pref. shareholders)

 

(15) वसूली लेखे पर लाभ होने पर –

Realisation A/c                                    Dr.

To Equity Shareholders’ A/c

(Being profit on realisation transferred to Equity Shareholders’ A/c)

 

(16) वसूली लेखे पर हानि होने पर –

Equity Shareholders’ A/c                      Dr.

To Realisation Alc

(Being loss on realisation transferred to Equity Shareholders’ A/c)

 

(17) हस्तान्तरक कम्पनी द्वारा स्वयं समापन व्ययों का भुगतान करने पर –

Realisation A/c                                           Dr.

To Bank A/c

(Being expenses of liquidation paid)

 

(18) हस्तान्तरक कम्पनी की अंश पूँजी, संचितियों एवं कोषों तथा लाभ-हानि खाते की क्रेडिट बाकी के लिए –

Equity Share Capital A/c                              Dr.

Various Reserves and Funds A/e                Dr.

Securities Premium Reserve A/c                 Dr.

Statement of Profit & Loss (Surplus)           Dr.

To Equity Shareholders’ A/c

(Being balance of above accounts transferred to Equity Shareholders’ A/c)

 

(19) अन्त में बैंक खाते के शेष को अन्तरित करने पर Equity Shareholders’ A/c

To Bank A/c                                               Dr.

To Shares in Transferee Co. A/c

(Being final payment made to equity Shareholders and account closed)

 

 

II, हस्तान्तरी कम्पनी की पुस्तकों में जर्नल प्रविष्टियाँ (Journal Entries in the Books of Transferee Company)

1, जब विलय के स्वभाव का एकीकरण होता है तब हस्तान्तरी कम्पनी की पुस्तकों में समूहीकरण विधि द्वारा निम्न प्रविष्टियाँ की जाती हैं –

(i) देय क्रय प्रतिफल का लेखा करने पर

Business Merger A/c                                   Dr.

To Liquidator of Transferor

Company A/c

(Being consideration payable to liquidators of Transferor Co.) /

 

(ii) हस्तान्तरक कम्पनी से प्राप्त समस्त सम्पत्तियों, दायित्वों एवं संचितियों का लेखा करने पर –

Various Assets A/c                                        Dr.

To Various Liabilities A/c

To Various Reserves and Funds A/c

To Business Merger A/c

To General Reserve A/c

(Balancing figure)

(Being various assets, liabilities and reserves taken over from transferor company and balancing figure credited to General Reserve)

 

अथवा / Or

 

Various Assets A/c                                        Dr.

General Reserve A/c                                     Dr.

(Balancing figure)

To Various Liabilities A/c

To Various Reserves and Funds Ale

To Business Merger A/c

(Being various assets, liabilities and reserves taken over from the transferor company and balancing figure credited to General Reserve)

 

(iii) क्रय प्रतिफल का भुगतान करने पर –

Liquidator of Transferor Company A/c            Dr.

To Equity Share Capital A/c

To Bank A/c

(Being the discharge of purchase consideration)

 

(iv) हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा हस्तान्तरक कम्पनी के समापन व्ययों का भुगतान करने पर –

Expenses of Liquidation A/c                           Dr.

To Bank A/c

(Being expenses of liquidation paid)

 

(v) समापन व्ययों को सामान्य संचय से अपलिखित करने पर –

General Reserve A/c                                      Dr.

To Expenses of Liquidation A/c

(Being expenses of liquidation written off with General Reserve)

 

(vi) हस्तान्तरी कम्पनी के प्रारम्भिक व्ययों के लिए –

Preliminary Expenses A/c                               Dr.

To Bank A/c

(Being preliminary expenses paid)

 

(vii) हस्तान्तरक कम्पनी के ऋणपत्रों को हस्तान्तरी कम्पनी के ऋणपत्रों से परिवर्तन करने पर –

Debentures of Transferor Co. A/c                    Dr.

To Debentures (of Transferee Co.) A/c

(Being debentures of transferor company. converted into debentures of transferee company)

 

2, जब क्रय के स्वभाव का एकीकरण होता है तब हस्तान्तरी कम्पनी की पुस्तकों में क्रय विधि द्वारा निम्नलिखित प्रविष्टियाँ की जाती हैं –

(i) देय क्रय प्रतिफल का लेखा करने पर –

Business Purchase A/c                                     Dr.

To Liquidators of Transferor Co. A/c

(Being consideration payable to liquidators of Transferor Co.)

 

(ii) हस्तान्तरी कम्पनी से ली गई वास्तविक सम्पत्तियों एवं दायित्वों के लिए –

Various Real Assets A/c                                   Dr.

Goodwill A/c (Balancing figure)                        Dr.

To Various Liabilities A/c

To Business Purchase A/c

(Being various assets and liabilities taken over from the transferor company and balancing figure debited to Goodwill A/c)

अथवा / Or

 

Various Real Assets A/c                                   Dr.

To Various Liabilities A/c

To Business Purchase A/c

To Capital Reserve A/c

(Balancing figure)

(Being various assets and liabilities taken over from the transferor company and balancing figure credited to Capital Reserve)

 

(iii) क्रय प्रतिफल का भुगतान करने पर –

Liquidator of Transferor Co. A/c                        Dr.

To Equity Share Capital A/c

To Preferential Share Capital A/c

To Debentures A/c

To Bank A/c

(Being the discharge of purchase consideration)

 

(iv) हस्तान्तरक कम्पनी के केवल वैधानिक संचयों का लेखा करने के लिए –

Amalgamation Adjustment A/c                           Dr.

To Various Statutory Reserves A/c

(Being incorporation of statutory reserves of Transferor Co.) )

 

(v) हस्तान्तरक कम्पनी के ऋणपत्रों का भुगतान हस्तान्तरी कम्पनी के ऋणपत्रों में परिवर्तन द्वारा करने पर –

Debentures of Transferor Co. A/c                       Dr.

To Debentures (of Transferee Co.) A/c

(Being allotment of debentures to discharge debentures of Transferor Co.)

 

(vi) हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा हस्तान्तरक कम्पनी के समापन व्ययों का भुगतान करने पर-

Expenses of Liquidation A/c                               Dr.

To Bank A/c

(Being payment of liquidation expenses)

 

(vii) समापन व्ययों को ख्याति या पूँजी संचय से अपलिखित करने पर –

Goodwill/Capital Reserve A/c                              Dr.

To Expenses of Liquidation A/c

(Being written off expenses of liquidation)

 

(viii) हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा प्रारम्भिक व्ययों का भुगतान करने पर –

Preliminary Expenses A/c                                    Dr.

To Bank A/e

(Being preliminary expenses paid)

Corporate Restructuring Mcom Notes

क्रय प्रतिफल एवं उसकी गणना (Purchase Consideration and its Calculation)

क्रय प्रतिफल का अर्थ उस मूल्य से होता है, जिसे एकीकरण के समय हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारी अपनी सम्पत्तियों एवं दायित्वों के लिए हस्तान्तरी कम्पनी से प्राप्त करेंगे। लेखा मानक-14 का कथन है, “एकीकरण के प्रतिफल का आशय हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा हस्तान्तरक कम्पनी को निर्गमित अंशों एवं अन्य प्रतिभूतियों का एकल राशि एवं रोकड या अन्य सम्पत्तियों के रूप में किए गए भुगतान से होता है।” इस प्रकार क्रय प्रतिफल हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारियों द्वारा अंशों, ऋणपत्रों, नकद या अन्य सम्पत्तियों के रूप में प्राप्त किया जा सकता है। यह भी स्पष्ट है कि ऋणपत्रधारियों को किया गया भुगतान या अन्य दायित्वों के भुगतान को क्रय प्रतिफल में शामिल नहीं करते हैं। यह मान लिया जाएगा कि इन्हें हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा ले लिया गया है और इनका भुगतान कर दिया गया है। यदि हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा कोई दायित्व स्पष्ट रूप से नहीं लिया गया है, तो इसका भुगतान हस्तान्तरक कम्पनी द्वारा किया जाएगा।

सामान्यतः क्रय प्रतिफल का निर्धारण हस्तान्तरक कम्पनी और हस्तान्तरी कम्पनी के आपसी अनुबन्ध द्वारा होता है। क्रय प्रतिफल का निर्धारण करते समय इसके विभिन्न तत्त्वों के उचित मूल्य का निर्धारण किया जाता है। उचित मूल्य निर्धारित करने हेतु अनेक तकनीकियों का प्रयोग किया जाता है। जब यह ‘अन्य सम्पत्तियों’ के रूप में हो तो त्याग किए गए सम्पत्तियों के बाजार मूल्य को सन्दर्भित करते हुए उचित मूल्य निर्धारित कर सकते हैं, परन्तु जब त्याग किए गए सम्पत्ति का बाजार मूल्य विश्वसनीयता के साथ निर्धारित न हो सके तो इसका निर्धारण शुद्ध पुस्तक मूल्य पर होता है। क्रय प्रतिफल के निर्धारण की तीन रीतियाँ निम्नवत् हैं–

 

I, शुद्ध भुगतान रीति (Net Payment Method)

II, शुद्ध सम्पत्ति रीति (Net Assets Method)

III, अंशों की अनुपात रीति या अंश-विनिमय रीति (Share Proportion Method or Share Exchange Method)

Corporate Restructuring Mcom Notes

I, शुद्ध भुगतान रीति (Net Payment Method)

लेखा मानक-14 अनुबन्ध करता है कि क्रय प्रतिफल मुख्य रूप से शुद्ध भुगतान पर आधारित होता है। लेखा मानक-14 का कथन है कि एकीकरण के लिए प्रतिफल का आशय हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा हस्तान्तरक कम्पनी को निर्गमित अंशों एवं अन्य प्रतिभूतियों का सकल राशि एवं रोकड़ या अन्य सम्पत्तियों के रूप में किए गए भुगतान से होता है। इस प्रकार शुद्ध भुगतान रोति के अन्तर्गत क्रय प्रतिफल हस्तान्तरक कम्पनी समता व पूर्वाधिकार अंशधारियों के दावों के हेतु चुकता किए गए अंशों, ऋणपत्रों एवं नकद का कुल योग होता है। यह ध्यान में रखना अच्छा है कि हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा किया गया प्रत्येक भुगतान क्रय प्रतिफल का भाग नहीं होता है। अतः ऋणपत्रधारियों एवं अन्य दायित्वों को किए गए भुगतान क्रय प्रतिफल के अंग नहीं माने जाते हैं। इसी प्रकार का व्यवहार समापन का लागत (विघटन के खर्चे) का होता है यदि उसका भुगतान हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा किया गया हो। हस्तान्तरी कम्पनी हस्तान्तरक कम्पनी को अंशों या ऋणपत्रों का निर्गमन सममूल्य पर प्रीमियम पर या बट्टे पर कर सकती हैं। यदि प्रश्न में इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा गया है, तो विलय की दशा में अंशों का मूल्य चुकता मूल्य पर और क्रय की दशा में अंशों को बाजार मूल्य पर मूल्यांकित किया जाता है।

 

II, शुद्ध सम्पत्ति रीति (Net Assets Method)

शुद्ध सम्पत्ति रीति के अनुसार क्रय प्रतिफल की राशि का निर्धारण हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा लिए गए सभी सम्पत्तियों के उचित मूल्य या शुद्ध पुस्तक मूल्य के योग में से हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा लिए गए बाह्य दायित्वों के पुस्तक-मूल्य या निर्धारित मूल्य को घटाकर किया जाता है। इस रीति से क्रय प्रतिफल की गणना करते समय निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है –

(1) यदि हस्तान्तरी कम्पनी हस्तान्तरक कम्पनी की सभी सम्पत्तियों को लेने के लिए तैयार होती है, तो इन सम्पत्तियों में रोकड़ व बैंक शेष भी शामिल होंगे, परन्तु सभी सम्पत्तियों” शब्द में ‘Unamortised Expenses’ को शामिल नहीं किया जाता।

(2) यदि कोई ख्याति, पूर्वदत्त व्यय हो तो ली गई सम्पत्तियों में इन्हें शामिल करेंगे, जब तक कि इसके विपरीत कुछ न कहा गया हो।

(3) यदि हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा कुछ सम्पत्तियाँ नहीं ली जाती हैं, तो उन्हें शामिल न करके छोड़ दिया जाएगा।

(4) ‘दायित्व’ शब्द हमेशा तीसरे पक्ष से सम्बन्धित सभी दायित्वों का बोध कराता है। व्यापारिक दायित्व वे होते हैं जो माल/सेवा के क्रय से उदित होते हैं; जैसे व्यापारिक लेनदार या देय विपत्र।

(5) दायित्वों में संचित या अवितरित लाभ; जैसे सामान्य संचव सिक्योरिटी प्रीमियम, कर्मचारी दुर्घटना फण्ड, बीमा फण्ड, पूँजीगत संचय, लाभांश समानीकरण कोष आदि को शामिल नहीं करते हैं।

 

III, अंशों की अनुपात रीति या अंश-विनिमय रीति (Share Proportion Method or Share Exchange Method)

इस रीति से क्रय प्रतिफल का निर्धारण करने के लिए सर्वप्रथम शुद्ध सम्पत्ति विधि से कम्पनी की शुद्ध सम्पत्तियों का मूल्य ज्ञात किया जाता है, तदुपरान्त इस मूल्य में हस्तान्तरी कम्पनी के एक अंश की कीमत का भाग दिया जाता है जिससे उन अंशों की संख्या ज्ञात हो जाती है जो हस्तान्तरक कम्पनी के अंशधारियों को हस्तान्तरी कम्पनी से प्राप्त होंगे। जब यह मालूम हो जाता है कि हस्तान्तरी कम्पनी से हस्तान्तरक कम्पनी को कितने अंश मिलेंगे तो उसे हस्तान्तरक कम्पनी के वर्तमान अंशों से भाग देने पर अंशों का अनुपात ज्ञात हो जाता है। उदाहरण के लिए, माना कि हस्तान्तरक कम्पनी को अपने वर्तमान 1000 अंशों के बदले में हस्तान्तरी कम्पनी में 1500 अंश मिलेंगे तो पुराने और नए अंशों का अनुपात 2:3 होगा।

 

खण्डित अंशों की समस्या (Problem of Fraction of Shares)

यदि अनुपात [1: 1 x 1/1] आता है तब आधे अंश के भुगतान की समस्या उत्पन्न होती है, जिसे खण्डित अंशों की समस्या कहते हैं। इस समस्या का समाधान निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है –

(1) जिन अंशधारियों को खण्डित अंश प्राप्त होते हैं उन सभी अंशधारियों के लिए हस्तान्तरी कम्पनी द्वारा खण्डित अंश प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। इन अंशधारियों द्वारा अन्य अंशधारियों से खण्डित अंश प्रमाण-पत्र खरीदकर अपने अंश को पूर्ण किया जा सकता है।

(ii) जिन अंशधारियों को खण्डित अंश प्राप्त होते हैं वे खण्डित अंशों के लिए कम्पनी से रोकड़ की माँग कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में खण्डित अंशों के लिए रोकड़ का निर्धारण अंश के बाजार मूल्य के आधार पर किया जाता है।

Corporate Restructuring Mcom Notes

कम्पनियों का आन्तरिक पुनर्निर्माण (Internal Reconstruction of Companies)

पुनर्निर्माण शब्द का प्रयोग किसी व्यावसायिक इकाई की वित्तीय संरचना में पुनसुधार या पुनर्संगठन के लिए किया जाता है। वस्तुतः पुनर्निर्माण एक बहुत ही व्यापक शब्द है और इसकी कोई ठीक व सुतथ्य परिभाषा नहीं दी जा सकती है। व्यापक रूप में, कम्पनी के विधान में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन, अंशधारियों के हितों एवं अधिकारों में परिवर्तन या ऋणपत्रधारियों एवं लेनदारों के हितों एवं अधिकारों में परिवर्तन को व्यक्त करने के लिए ही पुनर्निर्माण शब्द का प्रयोग किया जाता है।

 

आन्तरिक पुनर्निर्माण (Internal Reconstruction)

जब वित्तीय अनुविन्यसन (financial arrangement) को निर्धारित स्कीम मौजूदा कम्पनी के अस्तित्व को बनाए रखती है अर्थात् न तो किसी नई कम्पनी का निर्माण होता है और न विद्यमान कम्पनी का विघटन ही होता है तो उसे आन्तरिक पुनर्निर्माण कहते हैं। चूँकि इस प्रकार के अनुविन्यसन स्कीम का उद्देश्य विद्यमान वित्तीय संरचना को पुनर्संगठित करना होता है. अतः इसे पुनर्संगठन भी कहते हैं।

Corporate Restructuring Mcom Notes

आन्तरिक पुनर्निर्माण की विशेषताएँ (Features of Internal Reconstruction)

आन्तरिक पुनर्निर्माण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) आन्तरिक पुनर्निर्माण के द्वारा एक विद्यमान कम्पनी अपने व्यवसाय को जारी रखते हुए अपने वित्तीय स्वरूप को बदलने का प्रयास करती है।

(2) आन्तरिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता तब होती है जब कम्पनी को लगातार असफलता के कारण समापन से बचाना है।

(3) आन्तरिक पुनर्निर्माण एक वैधानिक प्रक्रिया है।

(4) आन्तरिक पुनर्निर्माण के अन्तर्गत कम्पनी की अंश पूँजी में परिवर्तन किया जाता है। इस परिवर्तन के अन्तर्गत कम्पनी अपनी अंश पूँजी की मात्रा को बढ़ा सकती है, अंश पूँजी को स्टॉक में परिवर्तित कर सकती है या अंश का समेकन (consolidation) कर सकती है।

(5) पूँजी में कमी लाकर आन्तरिक पुनर्निर्माण सम्भव है अर्थात् गत वर्षों में हुई हानियों के अपलेखन द्वारा।

(6) आन्तरिक पुनर्निर्माण अंशधारियों, ऋणपत्रधारियों एवं लेनदारों के साथ मिलकर पुनर्गठन की योजना बनाकर किया जा सकता है।

Corporate Restructuring Mcom Notes

आन्तरिक पुनर्निर्माण की वांछनीयता (Desirability of Internal Reconstruction)

आन्तरिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता तब होती है जब कोई कम्पनी अथक प्रयासों के पश्चात् लगातार असफल रहती है। इस असफलता से कम्पनी को समापन से बचाने का एक उत्तम विकल्प आन्तरिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को अपनाने से है। आन्तरिक पुनर्निर्माण के द्वारा कम्पनियों को अवसर प्राप्त होता है कि वे अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकें और कम्पनी को पुनः सफलता के मार्ग पर ला सकें। प्रायः निम्नलिखित दशाओं में आन्तरिक पुनर्निर्माण वांछनीय या आवश्यक हो जाता है—

(1) जब किसी कम्पनी में गत वर्षों में एकत्रित हानियाँ बहुत अधिक हो गयी हैं जिन्हें अपलिखित किया जाना आवश्यक हो गया है।

(2) जब किसी कम्पनी की पूँजी संरचना अत्यधिक क्लिष्ट हो गयी है और उसे अब सरल और सुविधाजनक बनाना हो।

(3) जब कम्पनी के पूँजी मिलान अनुपात (capital gearing ratio) में परिवर्तन करना आवश्यक हो गया हो अर्थात् जब किसी कम्पनी की साधारण अंश पूँजी एवं स्थिर लागत पूँजी का अनुपात उचित प्रतीत नहीं होता।

(4) जब कम्पनी के अंशों के अंकित मूल्य (face value) में परिवर्तन की आवश्यकता हो जिससे कि भावी निवेशकों को कम्पनी के प्रति विनियोग करने हेतु आकर्षित किया जा सके।

(5) जब कम्पनी के चिट्ठे में विद्यमान सम्पत्तियों का मूल्य उसकी पूँजी का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करता है अर्थात् चिट्ठे में दर्शायी गयी सम्पत्तियों को उनके उचित मूल्य से अधिक मूल्य पर दर्शाया गया है।

(6) जब कम्पनी की उत्पादक क्षमता में कमी हो गयी है।

Corporate Restructuring Mcom Notes

आन्तरिक पुनर्निर्माण की विधियाँ (Methods of Internal Reconstruction)

कम्पनी के आन्तरिक पुनर्निर्माण की निम्नलिखित तीन विधियाँ होती हैं –

(1) अंश पूँजी में परिवर्तन,

(2) अंश पूँजी में कमी तथा

(3) कम्पनी के सदस्यों एवं लेनदारों के साथ अनुविन्यसन की योजना (स्कीम) |

(1) अंश पूँजी में परिवर्तन (Alteration in Share Capital) – कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 61 के अनुसार, अंशों द्वारा सीमित एक कम्पनी अपनी अंश पूँजी में परिवर्तन कर सकती है, बशतें पार्षद अन्तर्नियमों द्वारा उसे अधिकार प्राप्त हो इस प्रकार के पूँजी परिवर्तन का प्रारूप निम्न में से कोई भी हो सकता है –

(i) अधिकृत अंश पूँजी को बढ़ाना (Increase in Authorised Share Capital) – जब किसी कम्पनी को अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता पड़ती है और उसके वर्तमान सभी अंश निर्गमित हो चुके होते हैं, तो वह नए अंशों का निर्माण करके अधिकृत पूँजी बढ़ा सकती है। इन नए अंशों के निर्गमन द्वारा अंश पूँजी को बढ़ाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में केवल यही प्रतिबन्ध लगाया गया है कि इस प्रकार के निर्गमन का प्रस्ताव पहले कम्पनी के विद्यमान सम अंशधारियों को उनके अंशों के अनुपात में मिलना चाहिए, बशर्ते कम्पनी ने विशेष प्रस्ताव द्वारा या केन्द्र सरकार के अनुमोदन पर साधारण प्रस्ताव द्वारा इसके विपरीत निर्णय न लिया हो । प्रत्येक अंशधारी को कम-से-कम 15 दिन की अवधि मिलनी चाहिए ताकि वह निर्णय कर सके कि उसे नए अंश खरीदने हैं या नहीं। यदि अंशधारी इस अवधि के भीतर अपनी इच्छा व्यक्त नहीं करता है, तो संचालकगण उन अंशों के निर्गमन के लिए स्वतन्त्र होते हैं। अधिकृत अंश पूँजी को बढ़ाने के लिए पारित प्रस्ताव के 30 दिन के भीतर कम्पनी रजिस्ट्रार को सूचित करना पड़ता है।

(ii) अंशों को स्टॉक में बदलना (Conversion of Shares into Stock) – केवल पूर्ण दत्त अंशों को ही स्टॉक में परिवर्तित किया जा सकता है। स्टॉक समान तथा क्रमबद्ध भागों में नहीं बँटा होता है, अतः अंशों को स्टॉक में बदलने पर अंशधारियों के पास अंश पूँजियों का इतना (एक निश्चित मात्रा) भाग होता है, न कि अंशों की निश्चित संख्या उदाहरण के लिए, एक अंशधारी के पास 50 अंश ₹ 10 प्रति अंश हैं। इन अंशों को स्टॉक में बदलने पर उस अंशधारी के पास ₹ 500 का स्टॉक होगा। अंशों के इस प्रकार स्टॉक में परिवर्तन को एक माह के भीतर ही रजिस्ट्रार को सूचित कर देना चाहिए। इस प्रकार के स्टॉक में परिवर्तित अश पूँजी के भाग पर कम्पनी अधिनियम के वे प्रावधान लागू नहीं होते हैं, जो अंशों से सम्बन्धित होते हैं। कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर में भी परिवर्तन कर दिया जाता है और अब सदस्यों के नाम स्टॉक की रकम होती है न कि अंशो की संख्या |

(iii) अनिर्गमित अंशों का विलोपन (Cancellation of Unissued Share) – एक कम्पनी को अधिकार होता है कि वह उन समस्त अंशों को समाप्त कर दें, जो निश्चित तिथि को निर्गमित न किए गए हो। ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य इन अंशों द्वारा प्राप्त असुविधाजनक अधिकारों या दायित्वों से छुटकारा पाना ही होता है। कानून की निगाह में अंशों का इस प्रकार का विलोपन पूँजी में कमी नहीं कहलाती है, परन्तु इस क्रिया से कम्पनी की पूँजी हासित हो जाती है। अतः प्रदत्त पूँजी कर का फायदा उठाने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि ऐसे अंशों के विलोपन के सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित करते समय मौलिक रकम से अधिकृत पूँजी को भी बढ़ा दिया जाए।

(iv) कम मूल्य वाले अंशों का अधिक मूल्य वाले अंशों में समेकन (Consolidation of Shares into Shares of a Large Amount) – एक कम्पनी को अधिकार है कि वह अपनी अंश पूँजी को कम मूल्य वाले अंशों से अधिक मूल्य वाले अंशों में समेकन करके बाँट दे। इस प्रकार की क्रिया से चुकता पूँजी की रकम में कोई परिवर्तन नहीं होता है, परन्तु अंशों की संख्या पहले से कम हो जाती है। यदि अंश पूर्ण दत्त न हो अर्थात् अंश का पूरा मूल्य न माँगा गया हो, तो यह ध्यान में रखना चाहिए कि समेकन के बाद चुकता मूल्य और अधिकृत मूल्य (nominal value) का वही अनुपात रहे, जो गठन से पहले था। उदाहरण के लिए, यदि र 10 वाले अंश हैं और उन पर केवल ₹ 8 चुकता किया गया है। (80%) और इन अंशों का गठन ₹100 वाले अंशों में करना है, तो उन पर ₹ 80 से चुकता होगा।

(v) विद्यमान अंशों को मूल्य वाले अंशों में उप-विभक्त करना (Sub-division of Shares into Shares of Smaller Amount) – उपर्युक्त के आधार पर ही एक कम्पनी कभी-कभी अंशों को कम मूल्य वाले अंशों में विभक्त भी कर सकती है। ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य छोटे विनियोक्ताओं को प्रलोभन देना होता है।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Corporate Restructuring Numerical Question.

Note:- Click here to View.

Corporate Restructuring Mcom Notes

Unit 1 Corporate Restructuring Mcom Notes
Unit 1 Corporate Restructuring Mcom Notes

Related Post:-
Unit 2 Consolidation of Accounts Mcom Notes
Unit 3 Valuation of Intangible Assets Mcom Notes
Unit 4 Corporate Financial Reporting Mcom Notes
Unit 5 Inflation Accounting Mcom Notes


Follow me at social plate Form
Facebook Instagram YouTube Twitter

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Home
B.com
M.com
B.sc
Help