Unit 2 Consolidation of Accounts Mcom Notes

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Unit 2 Consolidation of Accounts Mcom Notes

Unit 2 Consolidation of Accounts Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year Unit-II Consolidation of Accounts: Accounting Treatment and Consolidated Financial Statements of Holding Companies having more than one Subsidiary Company. Chain Holdings. [ Consolidation of Accounts Notes ]

खातों का समेकन [Consolidation of Accounts]

 

सूत्रधारी कम्पनी का आशय (Meaning of Holding Company)

(कम्पनी अधिनियम की धारा 2 (46) के अनुसार, “एक कम्पनी को दूसरी कम्पनी की सूत्रधारी कम्पनी तभी माना जाता है, जबकि दूसरी कम्पनी उसकी सहायक हो।” अतः स्पष्ट है कि सूत्रधारी कम्पनी वह है, जिसकी एक या एक से अधिक सहायक कम्पनियाँ हो और वह उन पर नियन्त्रण रखती हो वैधानिक रूप से सूत्रधारी कम्पनी और सहायक कम्पनियों का पृथक् अस्तित्व होता है, लेकिन व्यवहार में वह समूह के रूप में कार्य करती है और उन्हें सामूहिक रूप से ‘कम्पनियों का समूह’ (Group of Companies) भी कहा जाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सूत्रधारी कम्पनी सहायक कम्पनियों को विकसित करती है या उनको स्थापना करती है तो सूत्रधारी कम्पनी को ‘जनक कम्पनी (Parent Company) भी कहा जाता है।

सहायक कम्पनी का आशय (Meaning of Subsidiary Company)

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (87) के अनुसार, एक कम्पनी किसी अन्य कम्पनी की ‘सहायक’ निम्न दशा में हो सकती है 1. संचालक मण्डल के गठन पर नियन्त्रण-जबकि अन्य कम्पनी इसके संचालक मण्डल के गठन पर नियन्त्रण करती है, या 2. आधे से अधिक मताधिकार पर नियन्त्रण-

(i) यदि प्रथम वर्णित कम्पनी ऐसी विद्यमान कम्पनी है जिसके पूर्वाधिकार अंशों (जिन्हें कम्पनी अधिनियम, 1956 के लागू होने के पूर्व निर्गमित किया गया हो) के धारकों को सभी दशाओं में समता अंशधारियों के समान अधिकार है और वह अन्य कम्पनी इसके कुल मताधिकार के आधे से अधिक पर नियन्त्रण रखती है।

(ii) समता अंश पूंजी के आधे से अधिक की स्वामी-जब प्रथम वर्णित कम्पनी अन्य प्रकार की हो और वह अन्य कम्पनी इसकी समता अंश-पूंजी के अंकित मूल्य के आधे से अधिक की स्वामी हो, या 3. जबकि वह किसी ऐसी कम्पनी की सहायक है जो स्वयं उस कम्पनी की सहायक है।

यदि ‘स’ कम्पनी ‘ब’ कम्पनी की सहायक कम्पनी है और ‘ब’कम्पनी ‘अ’ कम्पनी की सहायक कम्पनी है तो ‘अ’ कम्पनी ‘ब’ और ‘स’ दोनों कम्पनियों की सूत्रधारी कम्पनी है और ये दोनों कम्पनियाँ ‘अ’ कम्पनी की सहायक कम्पनियाँ हैं।

 

सूत्रधारी कम्पनी का बनना (Formation of Holding Company)

1, विद्यमान कम्पनी द्वारा विद्यमान कम्पनियों के अंश क्रय करना – एक विद्यमान कम्पनी अन्य विद्यमान कम्पनी या कम्पनियों के आधे से अधिक अंश क्रय करके सूत्रधारी कम्पनी बन जाती है।

2, विद्यमान कम्पनी द्वारा नई कम्पनियों के अंश क्रय करना – एक विद्यमान कम्पनी नई कम्पनियों के आधे से अधिक अंश क्रय करके सूत्रधारी कम्पनी बन जाती है।

3, नई कम्पनी द्वारा विद्यमान कम्पनियों के अंश क्रय करना – एक नई कम्पनी विद्यमान कम्पनियों के आधे से अधिक अंश क्रय सूत्रधारी कम्पनी बन जाती है।

4, नई कम्पनी द्वारा नई कम्पनियों के अंश क्रय करना – एक नई कम्पनी नई कम्पनियों के आधे से अधिक अंश क्रय करके सूत्रधारी कम्पनी बन जाती है। उपर्युक्त चारों दशाओं में प्रथम वर्णित कम्पनी दूसरी कम्पनी या कम्पनियों के संचालक मण्डल पर नियन्त्रण करके भी सूत्रधारी कम्पनी बन सकती है।

5, प्राइवेट कम्पनियों की वैधानिक छूटे एवं विशेषाधिकार पाने के लिए बननाकम्पनीज अधिनियम में प्राइवेट कम्पनियों को अनेक प्रकार के विशेष अधिकार एवं वैधानिक छूटें दी गई हैं। इन छूटों का लाभ उठाने के लिए यदि कोई कम्पनी नई-नई जगहों पर कार्य करना चाहती है, और अपनी शाखाएँ भी खोलना चाहती है तो वे कम्पनियाँ भिन्न-भिन्न स्थानों पर प्राइवेट कम्पनियाँ स्थापित करती हैं। इन कम्पनियों के आधे से अधिक अंश वह अपने अधिकार में ले लेती है। इस प्रकार उसका व्यापार बढ़ता है और प्राइवेट कम्पनियों को मिलने वाली छूटों एवं विशेष अधिकारों का लाभ भी प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त सूत्रधारी कम्पनी को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं

 

सूत्रधारी कम्पनियों के लाभ (Advantages of Holding Companies)

(1) सूत्रधारी कम्पनियाँ स्थापित होने पर विभिन्न सहायक कम्पनियों में एक प्रकार का संयोजन स्थापित हो जाता है। अतः सूत्रधारी कम्पनी एकाधिकार के या इससे मिलते-जुलते लाभ प्राप्त करती रहती है।

(2) प्रत्येक सूत्रधारी कम्पनी का चिट्ठा अलग बनाया जाता है, इसलिए इनकी आर्थिक स्थिति का ज्ञान सरलता से किया जा सकता है।

(3) चूँकि प्रत्येक सहायक कम्पनी के खाते अलग-अलग रखे जाते हैं इसलिए उनकी ख्याति बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता है। (4) माना एक सूत्रधारी कम्पनी की तीन सहायक कम्पनियाँ हैं और इन तीन सहायक कम्पनियों में प्रत्येक की चार-चार सहायक कम्पनियाँ हैं तो प्रथम कम्पनी का अधिकार और नियन्त्रण पन्द्रह कम्पनियों पर होगा, जबकि उसने केवल तीन कम्पनियों में ही अपना रुपया लगाया है।

(5) सूत्रधारी कम्पनी किसी भी समय अंश बेचकर अपने को सहायक कम्पनी के दायित्व से मुक्त कर सकती है।

(6) सहायक कम्पनी की हानियों को आयकर के उद्देश्य से अगले वर्षों में ले जाया जा सकता है।

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सूत्रधारी कम्पनियों की हानियाँ (Disadvantages of Holding Companies)

(1) यदि भिन्न-भिन्न कम्पनियों के खाते विभिन्न तिथियों पर बनाए जाते हैं तो कपट द्वारा गड़बड़ी किए जाने की सम्भावना हो सकती है।

(2) अल्पमत अंशधारियों के साथ अति होने की सम्भावना रहती है।

(3) सूत्रधारी कम्पनी की इच्छानुसार सहायक कम्पनियों में अत्यधिक पारिश्रमिक पर संचालकों व अन्य अफसरों की नियुक्ति किए जाने की सम्भावना। होती है।

(4) सहायक कम्पनी की आर्थिक दशा से बाहरी अंशधारी व लेनदार अपरिचित हो सकते हैं।

(5) सूत्रधारी और सहायक कम्पनी के बीच बहुत अधिक या बहुत कम मूल्य पर होने वाले सौदों के कारण कम्पनियों की सही आर्थिक स्थिति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए लेखा सम्बन्धी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

 

पूर्णतः स्वामित्व और आंशिक स्वामित्व वाली सहायक कम्पनियाँ (Wholly Owned and Partly Owned Subsidiary Companies)

एक पूर्णतः स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी वह होती है, जिसके सभी अंश 100% मताधिकार के साथ सूत्रधारी कम्पनी के स्वामित्व में होते हैं। ऐसी कम्पनी में अल्पपक्ष का हित (minority interest) कोई नहीं होता।

आंशिक स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी वह है, जिसके बहुमत अंश ( 50% से) अधिक) सूत्रधारी कम्पनी के स्वामित्व में होते हैं, लेकिन पूरे अंश सूत्रधारी कम्पनी के स्वामित्व में नहीं होते। इस कारण इन कम्पनियों में अल्पपक्ष का हित भी निहित होता है।

 

मिश्रित या समेकित चिट्ठा (Consolidated Balance Sheet)

मिश्रित चिट्ठा से आशय ऐसे चिट्ठे से है, जिसमें एक समूह (सूत्रधारी एवं उसकी सहायक कम्पनियों) की कम्पनियों का चिट्ठा इस प्रकार तैयार किया जाता है, जैसे कि वह एक उपक्रम ही हो। इसका उद्देश्य सूत्रधारी कम्पनी के अंशधारियों को सहायक कम्पनियों व सूत्रधारी कम्पनी की वितीय स्थिति के बारे में सूचना देना है ताकि उन्हें यह ज्ञात हो सके कि उनके धन का उपयोग किस प्रकार हो रहा है। AS-21 के अनुसार, मिश्रित या समेकित वित्तीय विवरणों में निम्न को शामिल किया जाता है—

(1) मिश्रित या समेकित चिट्ठा,

(2) मिश्रित या समेकित लाभ-हानि विवरण,

(3) खातों के नोट्स, अन्य विवरण एवं व्याख्यात्मक सामग्री,

(4) समेकित रोकड़ प्रवाह विवरण, यदि सूत्रधारी कम्पनी अपना कोष प्रवाह विवरण प्रस्तुत करती है। समेकित वित्तीय विवरण यथासम्भव उसी प्रारूप में प्रस्तुत किए जाते हैं, जिन्हें सूत्रधारी कम्पनी द्वारा अपने पृथक् वित्तीय विवरण के लिए अपनाया गया हो। संक्षेप में समेकित चिट्ठे के प्रारूप को निम्न प्रकार रखा जा सकता है –

Consolidate Baclnce Sheet of Holding Company and its Subscidaiay or Subscidiaries

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नोट – 1, उपर्युक्त प्रारूप से स्पष्ट है कि समेकित चिट्ठा बनाते समय सूत्रधारी और सहायक कम्पनी के चिट्ठों में दी गयी मदों को जोड़ दिया जाता है।

2, सूत्रधारी कम्पनी द्वारा सहायक कम्पनी के अंशों के क्रय मूल्य और सहायक कम्पनी की अंश पूँजी को समेकित चिट्ठे में नहीं दिखाया जाता।

3, सूत्रधारी एवं सहायक कम्पनियों के मध्य व्यवहारों को सम्बन्धित शीर्षकों में से घटा दिया जाता है।

 

(अ) अल्पमतधारियों का हित (Minority Interest)

जब एक कम्पनी दूसरी कम्पनी के आधे से अधिक अंश क्रय करती है, पर सभी अंश क्रय नहीं करती है तो इस कम्पनी के जिन अंशों को क्रय नहीं किया जाता है, उनके धारक अल्पपक्ष या अल्पमत वाले अंशधारी कहे जाते हैं। इन अल्पमत वाले अंशधारियों का जो हित सहायक कम्पनी में होता है, उसे अल्पमत वाले या अल्पपक्ष अंशधारियों का हित (Minority Shareholders’ Interest) कहा जाता है। संक्षेप में, इसे अल्पपक्ष हित भी कहा जाता है। अतः अल्पपक्ष हित का आशय सहायक कम्पनी में उन अंशधारियों के हित से हैं जिनके अंशों का क्रय सूत्रधारी कम्पनी द्वारा नहीं किया गया है।

 

अल्पपक्ष हित की गणना (Computation of Minority Interest)

(i) माना कि सूत्रधारी कम्पनी ने सहायक कम्पनी के कुल अंशों का 3/4 भाग क्रय कर लिया है, तो अल्पमत वाले अंशधारियों के पास सहायक कम्पनी के कुल अंशों का 1/4 भाग रह जाता है। सहायक कम्पनी की सम्पत्तियों में इनका 1/4 भाग है तथा सहायक कम्पनी के दायित्वों में इनका 1/4 भाग है। अतः सम्पत्तियों के 1/4 भाग में से दायित्वों का 1/4 भाग घटाकर, जो शेष आता है वही अल्पमत वाले अंशधारियों का हित है; या

(ii) अल्पमत वाले अंशधारियों का हित निम्न प्रकार सरलता से ज्ञात किया जा सकता है उपर्युक्त वर्णित दशा में अल्पमत अंशधारियों का सहायक कम्पनी में हित 1/4 है। इसकी गणना की निम्नांकित विधि है—

 

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(2) नियन्त्रण की लागत (ख्याति या पूँजी संचय) [Cost of Control (Goodwill or Capital Reserve)]

यदि सूत्रधारी कम्पनी सहायक कम्पनी के अंश सममूल्य से कम या अधिक पर क्रय करती है अथवा सममूल्य पर क्रय करती है, लेकिन सहायक कम्पनी में लाभ, संचय या हानि के शेष होते हैं, तो उस स्थिति में ख्याति या पूँजी संचय की राशि हो सकती है। इनकी विस्तृत व्याख्या निम्न प्रकार है –

(i) पूँजी संचय का आशय (Meaning of Capital Reserve) – एक सूत्रधारी कम्पनी अपनी सहायक कम्पनी के अंश क्रय करने के लिए जो मूल्य देती है उसकी तुलना उन अंशों के पुस्तकीय मूल्य एवं सहायक कम्पनी के उन लाभों एवं संचयों, आदि से की जाती है जो सूत्रधारी कम्पनी को इस क्रय के बाद प्राप्त होते हैं। यदि ये पुस्तकीय मूल्य एवं लाभ तथा संचय आदि इस क्रय मूल्य से अधिक होते हैं तो इस आधिक्य को पूँजी संचय कहा जाता है। इस दशा में क्रय करते ही सूत्रधारी कम्पनी को पूँजी लाभ हुआ है तथा इस पूँजी लाभ को पूँजी संचय में हस्तान्तरित किया जाता है।

(ii) पूँजी संचय की गणना (Computation of Capital Reserve) – यदि निम्नांकित का जोड़ सूत्रधारी कम्पनी द्वारा किए हुए क्रय मूल्य से अधिक होता है तो इस आधिक्य की गणना ही पूँजी संचय (Capital Reserve) की गणना कही जाती है –

(अ) क्रय किए हुए अंशों का पुस्तकीय मूल्य;

(ब) क्रय की तिथि के पहले के सहायक कम्पनी के संचय में सूत्रधारी कम्पनी का भाग;

(स) क्रय की तिथि के पूर्व सहायक कम्पनी के सामान्य संचय में सूत्रधारी कम्पनी को

(द) क्रय की तिथि के बाद सहायक कम्पनी के लाभ में सूत्रधारी कम्पनी का भाग,

(य) पुनर्मूल्यांकन के भाग में सूत्रधारी कम्पनी का भाग। उपर्युक्त वर्णित पाँचों का जोड़ यदि सूत्रधारी कम्पनी द्वारा किए हुए क्रय मूल्य से अधिक होता है तो इस आधिक्य को पूँजी संचय (Capital Reserve) कहा जाता है।

(i) ख्याति से आशय (Meaning of Goodwill) – जब एक सूत्रधारी कम्पनी किसी दूसरी कम्पनी के 50 प्रतिशत से अधिक अंश क्रय करती है तो इनके लिए जो मूल्य देती हैं। उसकी तुलना क्रय किए गए अंशों के पुस्तकीय मूल्य तथा सहायक कम्पनी के उन लाभों एवं संचयों, आदि से की जाती है जो सूत्रधारी कम्पनी को इस दूसरी कम्पनी के अंश क्रय करने पर मिलते हैं। यदि इन क्रय किए गए अंशों के पुस्तकीय मूल्य तथा लाभ एवं संचय के भाग का जोड़, अंशों के क्रय मूल्य से कम होता है तो सूत्रधारी कम्पनी को वास्तव में सामान्य मूल्य से अधिक देना पड़ा है। इसी आधिक्य को ख्याति कहा जाता है।

(ii) ख्याति की गणना (Computation of Goodwill) – ख्याति की गणना इस सन्दर्भ में निम्न प्रकार से की जा सकती है—

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(3) अन्तर कम्पनी व्यवहार (Inter Company Transaction)

सूत्रधारी कम्पनी और उसकी सहायक कम्पनी का संयुक्त चिट्ठा बनाते समय एक-दूसरे के साथ लेन-देन से उत्पन्न दायित्वों को समाप्त कर देना चाहिए। इन मदों के कुछ प्रमुख उदाहरण अग्रलिखित हैं –

(1) आपसी कर्जदारी (Mutual Indebtedness) – माल के विक्रय अथवा कोष उधार देने से समूह की एक कम्पनी की दूसरी कम्पनी पर बकाया ऋण की राशि विक्रेता (या उधार देने वाली) कम्पनी के चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में देनदार के रूप में दिखायी गई होगी तथा क्रेता (या उधार लेने वाली) कम्पनी के चिट्ठे के दायित्व पक्ष में लेनदार के रूप में दिखायी गई. होगी। संयुक्त चिट्ठे में ऐसी आपसी कर्जदारी को समाप्त कर दिया जाता है किन्तु कभी-कभी मार्ग में रोकड़ (Cash-in-transit) के फलस्वरूप दोनों कम्पनियों की पुस्तकों में एक-दूसरे पर बकाया शेष में अन्तर आ जाता है। ऐसी स्थिति में मार्ग में रोकड़ की राशि को संयुक्त विद्वे में सम्पत्ति पक्ष में दिखाया जाएगा।

(ii) आपसी स्वीकृतियाँ (Mutual Acceptances) – समूह की एक कम्पनी द्वारा लिखे व दूसरी कम्पनी द्वारा स्वीकार किए गए विनिमय विपत्र लेखक कम्पनी के चिट्ठे में प्राप्य बिल (Bills Receivable) तथा स्वीकारकर्त्ता कम्पनी के चिट्ठे में देय बिल (Bills Payable) के नाम से दिखाए जाते हैं और संयुक्त चिट्ठे में ये एक-दूसरे से रद्द हो जाते हैं किन्तु यदि लेखक ने कम्पनी के इन बिलों में से किसी बिल को बैंक से कटौती पर भुना लिया है अथवा इसे किसी अन्य पक्ष को बेचान कर दिया है तो उपर्युक्त प्रकार से रद्द करना सम्भव नहीं होगा क्योंकि इस कम्पनी के चिट्ठे में प्राप्य बिल की जगह रोकड़ या बैंक शेष होगा तथा सम्भाव्य दायित्व के रूप में इसके लिए टिप्पणी दी गई होगी किन्तु स्वीकारकर्त्ता कम्पनी के चिट्ठे में तो यह देय बिल के रूप में ही होगा। संयुक्त चिट्ठे में ऐसे देय बिल दिखाए जाएँगे क्योंकि अब यह दायित्व तृतीय पक्ष के प्रति हो गया है। परन्तु सम्भावित दायित्व के रूप में टिप्पणी नहीं दी जाएगी क्योंकि अब सम्भावित दायित्व को वास्तविक दायित्व मान लिया गया है।

(iii) समूह की एक कम्पनी के ऋणपत्रों का एक दूसरी कम्पनी द्वारा धारण (Debentures of one company held by another in the group) – ऋणपत्र निर्गमकर्त्ता कम्पनी के चिट्ठे में दायित्व पक्ष में उनके चुकता मूल्य पर दिखाए जाते हैं तथा क्रेता कम्पनी के चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष में क्रय की लागत पर दिखाए जाते हैं। संयुक्त चिट्ठे में समूह की एक कम्पनी द्वारा धारित ऐसे ऋणपत्र निर्गमित ऋणपत्रों से रद्द हो जाते हैं किन्तु यदि क्रय मूल्य ऋणपत्रों के चुकता मूल्य से भिन्न है तो अन्तर को ख्याति अथवा पूँजीगत संचिति (जैसी भी स्थिति हो) से समायोजित किया जाएगा। समूह के बाहर धारित ऋणपत्रों को संयुक्त चिट्ठे में अलग से दायित्व के रूप में दिखाना चाहिए।

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(4) अन्तर कम्पनी व्यवहार पर न वसूल हुआ लाभ (Unrealised Profit on Inter-Company Transactions)

यदि समूह की एक कम्पनी ने दूसरी कम्पनी को लाभ पर माल बेचा है और वर्ष के अन्त में क्रेता कम्पनी के पास इसका कोई भाग अविक्रीत रह जाता है तो क्रेता कम्पनी द्वारा धारित इस स्टॉक पर विक्रेता कम्पनी द्वारा चार्ज किया गया लाभ पूरे समूह की दृष्टि में अनर्जित रह जाता है। अत: संयुक्त चिट्ठे में इसे समाप्त कर देना चाहिए। इसके लिए क्रेता कम्पनी के स्टॉक के मूल्य को तथा विक्रेता कम्पनी के चालू वर्ष के लाभ को अनर्जित लाभ से कम कर देना चाहिए।

एक अंशत: स्वामित्व युक्त सहायक कम्पनी की दशा में अनर्जित लाभ की राशि के समाप्त करने के सम्बन्ध में मत विभिन्नता रही है। परम्परागत मत यह रहा है कि अल्पमत अंशधारी अनर्जित लाभ से प्रभावित नहीं होते, अतः अनर्जित लाभ का केवल वह भाग जो समूह की सदस्य कम्पनियों से सम्बन्धित है, ही समाप्त किया जाना चाहिए। A.I.C.P.A., A.A. A. की राय और I.C.A.I. के लेखांकन मानदण्ड 21 पर आधारित आधुनिक मत यह है कि सहायक कम्पनी में नियन्त्रण की मात्रा को ध्यान दिए बिना अन्तर कम्पनी लाभ की पूरी राशि समाप्त की जानी चाहिए।

इसी प्रकार, यदि समूह की एक कम्पनी दूसरी कम्पनी को स्थिर सम्पत्तियाँ हस्तान्तरित करती है या बेचती है तो स्कन्ध की तरह ही अनर्जित लाभ सम्बन्धित सम्पत्ति खाते और लाभ शेष से घटा दिया जाएगा।

 

आकिंक प्रश्नोत्तर Numerical Questions

Consolidation of Accounts Numerical Question.

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