Product Life Cycle Bcom Notes

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After Sale Service Bcom Notes:- In this post, we will give you notes of Principal of Marketing of BCom 3rd year English and Hindi, After Sale Service Bcom Notes Hindi and English. Product Life Cycle Notes

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उत्पाद जीवन चक्र (Product Life Cycle)

विश्व का कटु एवं शाश्वत सत्य है कि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। मानव, वनस्पति, पशु-पक्षी आदि सभी जन्म लेते हैं एवं विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार किसी भी वस्तु को जन्म से लेकर अन्त तक अर्थात् अपने जीवनकाल में कई अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है, ये विभिन्न अवस्थायें ही उत्पाद का जीवन चक्र कहलाती हैं। सरल शब्दों में, उत्पाद प्रस्तुतीकरण से लेकर बाजार-पतनावस्था तक उत्पाद विक्रय का क्रम ‘उत्पाद जीवन-चक्र’ कहा जाता है।
उत्पाद एक उत्पाद या वस्तु का विपणन की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना ही / वस्तु जीवन चक्र कहलाता है।
फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “उत्पाद जीवन-चक्र किसी उत्पाद के विक्रय इतिहास की विभिन्न स्थितियों को जानने का प्रयास है।”

कोटलर तथा आर्मस्ट्रांग (Kotler and Armstrong) के अनुसार, “उत्पाद जीवन चक्र किसी उत्पाद के जीवन के दौरान उसके विक्रय एवं लाभों का प्रगति पथ है।”
निष्कर्ष – उत्पाद जीवन चक्र किसी उत्पाद के जीवन की उन अवस्थाओं का क्रमागत अनुक्रम है जिन्हें कोई उत्पाद अपने जीवन काल के दौरान पूरा करता है।

उत्पाद जीवन चक्र की अवस्थाएँ (Stages of Product Life Cycle)

मानव जीवन की भाँति ही एक उत्पाद या वस्तु को भी विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। मानव जीवन को जिस प्रकार छ: प्रमुख अवस्थाओं मेंcविभाजित किया जाता है- जन्म, बाल्यावस्था, किशोर अवस्था, युवा अवस्था, प्रौढ़ अवस्था एवं मृत्यु, ठीक उसी प्रकार उत्पाद जीवन चक्र की सामान्यतः छः अवस्थाएँ मानी जाती हैं जो निम्न प्रकार है –
(1) प्रस्तुतीकरण / उपस्थापन (Introduction) – यह वस्तु के जीवन चक्र की प्रथम अवस्था है। इस अवस्था में प्रतियोगिता करने वाली अन्य संस्थाएँ नहीं होती है लेकिन साथ ही वस्तु की माँग भी नहीं होती है। अतः वस्तु के निर्माता को माँग उत्पन्न करने के लिये विज्ञापन, विक्रय संवर्द्धन व अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है तथा उपभोक्ताओं को वस्तु की उपस्थिति, वस्तु के प्रयोग एवं वस्तु के लाभों को बताने की आवश्यकता होती है। साधारणतया इस अवस्था में निर्माता को लाभ या तो होते ही नहीं है या फिर होते भी हैं तो इनकी मात्रा बहुत कम होती है।

Product Life Cycle Notes

उपस्थापन सोपान पर अपनाई गई विपणन विधियाँ (Marketing Strategies opted in the Introduction Stage)

एक वस्तु को बाजार में प्रस्तुत करते समय एक विपणनकर्त्ता अपने लिए उच्च अथवा निम्न स्तर का विपणन मिश्रण (Marketing mix) तैयार कर सकता है। यथा उत्पाद मूल्य संवर्धन और वितरण केवल मूल्य और संवर्धन के दो तत्त्वों को लेकर एक विपणनकर्त्ता चार प्रकार की योजनाएँ तैयार कर सकता है –
(i) तीव्र सतही लाभ योजना (Rapid Skimming Strategy) – विपणनकर्त्ता अपने उत्पाद को बाजार में प्रस्तुत करने के लिए इस योजना को अपना सकता है। जिसमें ऊंचे दाम और ऊँची संवर्धन राशि लगती है। उत्पाद को बाजार में प्रस्तुत करते समय विपणनकर्त्ता यह मानकर चलता है कि ग्राहकों को उत्पाद के विषय में जानकारी नहीं है और जिन्हें जानकारी हो जाएगी वे ऊंची कीमत देने के लिए तैयार हो जाएँगे। इसलिए व्यापारिक संस्थान ऊँची संवर्धन राशि खर्च करता है ताकि ऊँचे दामों पर उत्पाद बेच सके।
(ii) धीमी सतही लाभ योजना (Slow Skimming Strategy) – यह योजना ऐसी वस्तु के विपणन के लिए प्रयुक्त होती है जिसका दाम ऊँचा होता है परन्तु जिसके संवर्धन प्रचार पर खर्चा कम किया जाता है। विपणनकर्ता इस योजना को यह मानकर अपनाता है कि बाजार का आकार सीमित है। अधिकांश लोग उत्पाद के विषय में जानते और इसकी ऊंची कीमत देने को तैयार है।
(iii) तीव्र भेदनात्मक योजना (Rapid Peneterating Strategy) – उत्पाद को कम कीमत पर बाजार में उपस्थित करते समय यह लिया जाता है कि बाजार विस्तृत है, प्रतिस्पर्द्धा कड़ी है। लोग उत्पाद से अपरिचित और मूल्यों से प्रभावित होने वाले हैं। इसलिए संवर्धन पर अधिक खर्च करना आवश्यक है। इस योजना को अपनाने के फलस्वरूप विपणनकर्त्ता यह आशा करता है कि बाजार के बड़े हिस्से पर अधिकार कर सकेगा।
(iv) धीमी भेदनात्मक योजना (A Slow Peneteration Strategy) – कम दाम और कम संवर्धन लागत पर उत्पाद को बाजार में उपस्थित करते समय यह मानकर चलना कि ग्राहकों को उत्पाद की पूरी जानकारी है, अधिकांश ग्राहक मूल्य से प्रभावित होने वाले हैं और कुछ-कुछ सम्भावित प्रतिस्पर्द्धा भी विद्यमान है।
(2) विकास (Growth) – इस अवस्था में वस्तु की माँग में वृद्धि होती है लेकिन साथ में प्रतियोगिता भी प्रारम्भ हो जाती है और नयी-नयी डिजाइन की वस्तुएँ बाजार में आ जाती है, लेकिन फिर भी पुराने निर्माता की बिक्री में तेज गति से वृद्धि होने लगती है और उसी के अनुसार लाभों की मात्रा में काफी वृद्धि होने लगती है।
(3) बाजार परिपक्वता (Market Maturity) – यह वस्तु के जीवन चक्र की तीसरी अवस्था है। इस अवस्था में प्रतियोगिता चरम सीमा पर पहुँच जाती है और इस कारण विभिन्न निर्माताओं को विज्ञापन व बिक्री संवर्द्धन पर अधिक व्यय करना पड़ता है जिससे कि उनकी ब्राण्ड की माँग बनी रहे। लेकिन अत्यधिक प्रतियोगिता के कारण उनको ब्राण्ड की माँग गिर ही जाती है। इन दोनों का परिणाम यह होता है कि लाभ गिरने लगते हैं। इस अवस्था में प्रतियोगिता के कारण मूल्य भी गिर जाते हैं।
(4) संतृप्ति (Saturation) – इस अवस्था में वस्तु की बिक्री उच्चतम स्थान पर पहुँच कर स्थिर हो जाती है। यह स्थिरता उस समय तक बनी रहती है जब तक कि स्थानापन्न वस्तुएँ बाजार में नहीं आ जाती। इस अवस्था में अधिक प्रतियोगिता होती है। संवर्द्धन पर अधिक व्यय होते हैं। वस्तु की लागतें बढ़ने लगती हैं, मूल्य गिर जाते हैं और लाभ की मात्रा कम हो जाती है।
(5) अवनति (Decline) – इस अवस्था में वस्तु की बिक्री कम होने लगती है क्योंकि अनेक स्थानापन्न वस्तुयें बाजार में अपना स्थान ग्रहण कर लेती हैं। ग्राहक अपेक्षाकृत इन स्थानापन्नों को ही अधिक पसन्द करते हैं। वस्तु की बिक्री लगातार कम होती चली जाती है और लाभों की मात्रा लगभग समाप्त हो जाती है।
(6) अप्रचलन (Obsolescence) – इस अवस्था में उत्पाद की बिक्री लगभग समाप्त हो जाती है और लाभ की वस्तुएँ नहीं के बराबर रहती है। बाजार में वस्तु का कोई स्थान नहीं रहता ऐसी स्थिति में निर्माता को उस वस्तु का उत्पादन बन्द करना पड़ता है।


English Version

 Product Life Cycle

MEANING OF PRODUCT LIFE CYCLE

The product life cycle concept indicates that a particular product is born or introduced, grows, attains maturity and reaches the point of saturation in the market and then sooner or later it is bound to enter its declining stage and finally enters the stage of obsolescence: the stage when the product loses its distinctiveness and dies out in terms of both sales and profit margin.

DEFINITIONS OF PRODUCT LIFE CYCLE CONCEPT

According to William J. Stanton, “The Product Life Cycle concept is the explanation of the product from its birth to death as a product exists in different stages and in different competitive environment.”
According to Arch Palton, “Life Cycle of a product is a kin to human life cycle from several angles. Like a man, the product also takes birth, rapid growth, attains the maturity and then enters the declining stage.”

STAGES OF PRODUCT LIFE CYCLE

The life cycle of a product passes through following stages:

(1) Introduction Stage: The first stage of the product life tycle is the introduction stage when the product is first introduced in the market. In this stage the product is absolutely new and distinctive. This stage is characterised by following features : (i) high product price (ii) low sales (iii) low profits (iv) heavy promotional expenditure (v) narrow product line (vi) low demand keeping production below Break Even Point (vii) difficulties and delays in adjusting production schedules (viii) high cost of production, promotion and distribution and above all, purchases by customers are made cautiously on a trial basis.

Under this stage, weaknesses of the product may be revealed and must be promptly removed. Product development and design are considered critical in this stage.

(2) Growth Stage: After the product is introduced in the market, the product enters its second stage growth stage. It is the period during which the product is accepted by consumers and traders. This stage is characterised by:

(1) Increase in sales at an increasing rate due to promotional efforts
(ii) High advertising expenditures as it moves towards brand identification
(iii) Rise in profits due to high sales
(iv) Awareness among the consumers about the product
(v) Prices may remain static or fall slightly for meeting competition
(vi) Product modifications, improvements are made
(vii)Company may enter into new market segment and try new distribution channels.

(3) Maturity Stage: This is the third stage wherein the maturity of a product is reflected in terms of its capacity to face competition. During this stage, keen competition brings pressure on prices. Its characteristics are:

(i) Sales continue to increase but at a decreasing rate,
(ii) Increasing marketing expenditure and falling prices (in the battle for market share) will reduce profits,
(iii) Additional expenditure on product modification and broadening of product line,
(iv) Additional advertising and sales promotion to stimulate demand and face competition.
Thus, low prices, increasing competition, rising marketing costs and declining profits are features of this stage.

(4) Saturation: During this stage, each of the characteristics mentioned under different stages is intensified. The saturation point occurs in the market when all the potential buyers are using the product and we have only replacement sales. Its characteristics are:

(1) Replacement sales dominate the market,
(ii) Competition is at its peak,
(iii) Prices may fall rapidly and profit margins may become small unless the firm makes substantial improvements and realises cost economies,
(iv) Consumption achieves a constant rate,
(v) Marketers have to concentrate exclusively on a fight for market share with higher marketing expenditure.

(5) Decline Stage (Obsolescence Stage): In this final stage of product life cycle, (sales will drop down heavily and product or brand will go out of market. Once the peak or saturation point is reached, product inevitably enters the decline stage and becomes obsolete.

Decline of a product may occur due to technological changes, shifts in consumers tastes, severe competition, introduction of new sophisticated products etc. Its characteristics are:

(i) Rapid fall in sales because of availability of new product in the market.
(ii) Fall in prices because of reduced sales. Manufacturer wants to clear the stock at earliest.
(iii) No promotional expenses are made because consumers are interested in buying other products.
(iv) Distribution network is reduced to the minimum.

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