Management Accounting Funds Flow Analysis Notes

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Management Accounting Funds Flow Analysis Notes

 

Management Accounting Funds Flow Analysis Notes:-

कोष प्रवाह विवरण का अर्थ समझने से पहले कोष (Fund) तथा कोष प्रवाह (Fund Flow) को समझना आवश्यक हैं।

कोष का अर्थ (Meaning of Fund) – कोष प्रवाह विवरण के सन्दर्भ में कोष का अर्थ ‘शुद्ध कार्यशील पूँजी (Net Working Capital) से है और शुद्ध कार्यशील पूँजी का आशय चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों के अन्तर से है।

कोष प्रवाह का अर्थ (Meaning of Funds Flow)- प्रवाह का सामान्य अर्थ आवागमन से होता है जिसमें ‘अन्तर्वाह’ (Inflow) तथा ‘बहिर्वाह’ (Outflow) दोनों शामिल होते हैं। इस आधार पर कोष प्रवाह का अर्थ कोष में परिवर्तन (कमी, वृद्धि) अर्थात् कार्यशील पूँजी में परिवर्तन (कमी, वृद्धि) से है। अत: किसी लेन-देन से कोष प्रवाह तभी माना जायेगा जब उस लेन-देन से शुद्ध कार्यशील में वृद्धि या कमी होती है। यदि किसी व्यवहार (लेन-देन) से कार्यशील पूँजी में वृद्धि होती है तो इसे कोष का स्रोत (Source of Fund) कहा जाता है और यदि कार्यशील पूँजी में कमी हो तो उसे कोष का प्रयोग (Application of Fund) कहा जाता है। किसी लेन-देन से कार्यशील पूँजी में वृद्धि या कमी तभी होगी जब लेन-देन का एक पक्ष कार्यशील पूँजी (चालू सम्पत्ति/चालू दायित्व) से सम्बन्धित हो एवं दूसरा पक्ष गैर-कार्यशील पूँजी (अर्थात् गैर चालू सम्पत्ति और गैर-चालू दायित्व) से सम्बन्धित है। इस प्रकार कोष का प्रवाह निम्नलिखित दशाओं में ही हो सकता है

(i) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और स्थायी सम्पत्ति पर पड़े; जैसे-स्थायी सम्पत्तियों का क्रय अथवा विक्रय करना।

(ii) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और स्थायी दायित्व पर पड़े; जैसे-रोकड़ के बदले ऋणपत्रों को निर्गमित करना।

(iii) लेन-देन का प्रभाव चालू सम्पत्ति और पूँजी पर पड़े; जैसे—अंश पूँजी को रोकड़ के बदले निर्गमित करना।

(iv) लेन-देन का प्रभाव चालू दायित्व और स्थायी सम्पत्ति पर पड़े, जैसे- मशीन का उधार क्रय

(v) लेन-देन का प्रभाव चालू दायित्व और स्थायी दायित्व पर पड़े, जैसे-लेनदारों के भुगतान हेतु ऋणपत्र निर्गमित करना।

(vi) लेन-देन का प्रभाव चालू दायित्व और पूँजी पर पड़े जैसे-लेनदारों को भुगतान में अंश निर्गमित करना, पूर्वाधिकार अंशों के शोधन हेतु देय बिल स्वीकार करना।

(vii) व्यावसायिक क्रियाओं के फलस्वरूप होने वाले शुद्ध लाभ या शुद्ध हानि से भी कोष-प्रवाह होता है जिसे ‘संचालन से कोष’ (Funds from Operations) या संचालन में लुप्त कोष (Funds lost. in Operations) कहा जाता है।

कोष प्रवाह न होना (Where there is no Flow of Funds)-जिन लेन-देनों से शुद्ध कार्यशील पूँजी में कोई कमी या वृद्धि नहीं होती, उन लेन-देनों से कोष प्रवाह नहीं होता है। मुख्यतः निम्नलिखित लेन-देन ऐसे हैं जिनसे कोष प्रवाह नहीं होता है—

1. यदि किसी लेन-देन से केवल चालू सम्पत्तियाँ ही प्रभावित हो, जैसे-देनदारों से भुगतान प्राप्त करना, माल का उधार विक्रय, माल का नकद क्रय, नकद विक्रय, प्राप्य बिलों का भुगतान प्राप्त करना आदि। ऐसे लेन-देनों से चालू सम्पत्तियों का कुल योग एवं शुद्ध कार्यशील पूँजी यथावत् रहती है।

2. यदि किसी लेन-देन से चालू सम्पत्तियों और चालू दायित्वों पर एक साथ समान रूप से प्रभाव पड़ता है, जैसे लेनदारों को भुगतान करना, माल का उधार क्रय, आदि। ऐसे लेन-देन से चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों के योगों में अवश्य परिवर्तन हो जाएगा। परन्तु शुद्ध कार्यशील पूँजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

3. यदि किसी लेन-देन से केवल गैर-चालू मदें अर्थात् स्थायी सम्पत्तियाँ एवं स्थायी दायित्व ही प्रभावित हों जैसे— अंशों/ऋणपत्रों के निर्गमन द्वारा भवन, मशीन किसी भी स्थायी सम्पत्ति का क्रय, बोनस अंशों का निर्गमन, ऋण पत्रों का समता अंशों में परिवर्तन।

 

Illustration 1. एक व्यापार 1,00,000 ₹ के अंश और 1,00,000₹ के ऋण पत्र निर्गमित करके क्रय किया गया। क्रय किए गए व्यापार में निम्न सम्पत्तियाँ और दायित्व थे-भवन 1,00,000 ₹, स्कन्ध 20,000 ₹ प्राप्य विपत्र 60,000 ₹, लेनदार एवं देय विपत्र 20,000 ₹। इस व्यवहार से कोष प्रवाह पर प्रभाव की गणना कीजिए।

 

Solution :

इस व्यवहार में 80,000 ₹ की चालू सम्पत्तियाँ (स्कन्ध 20,000 ₹ तथा प्राप्य विपत्र 60,000 ₹) प्राप्त हुई है और 20,000 ₹के चालू दायित्व (लेनदार एवं देय विपत्र) लिए गए हैं। अतः 80,000 – 20,000 = 60,000 ₹ के कोष का अन्तर्वाह (Inflow) हुआ है।

 

कोष-प्रवाह विवरण का अर्थ एवं परिभाषा

किसी संस्था के दो तिथियों पर तैयार किये गये स्थिति विवरणों (आर्थिक चिट्ठों) के बीच संस्था के कोषों के परिवर्तनों के अध्ययन के लिए बनाया गया विवरण ‘कोष-प्रवाह विवरण’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, इस विवरण में यह दर्शाया जाता है कि दो लेखा अवधियों के मध्य कोष का प्रवाह किस प्रकार हुआ है अर्थात् किन-किन साधनों से कोष प्राप्त हुए हैं और इनका उपयोग किन-किन मदों में किया गया है है।

 

आर० एन० एन्थोनी के अनुसार, “कोष प्रवाह विवरण इस बात का वर्णन करता है कि अतिरिक्त कोष किन स्रोतों से प्राप्त किए गए थे और इन कोषों को किन उपयोगों में लाया गया।”

 

कोष प्रवाह विवरण की विशेषताएँ

 

  1. यह विवरण एक निश्चित लेखावधि के लिए बनाया जाता है।
  2. कोष प्रवाह विवरण गतिशील (Dynamic) प्रकृति का होता है।
  3. कोष प्रवाह विवरण लाभ-हानि विवरण एवं दो लगातार चिट्ठों की सूचनाओं के आधार पर बनाया जाता है।
  4. यह विवरण संस्था की तरलता और शोधन क्षमता की जानकारी प्रदान करता है।
  5. इस विवरण के दो प्रमुख भाग-कोष के साधन और कोष के उपयोग होते हैं।

कोष प्रवाह विवरण के उद्देश्य-1. दो तिथियों के चिट्ठों में कार्यशील पूँजी ज्ञात करना। 2. इन दो अतिथियों की कार्यशील पूँजी में अन्तर का पता लगाना। 3. कार्यशील पूँजी में अन्तर के कारणों की जानकारी करना। 4. इस अवधि में कोष के अन्तर्वाह की स्रोतों के अनुसार जानकारी प्राप्त करना। 5. इस अवधि में कोष के प्रयोगों की मदवार जानकारी प्राप्त करना। 6. इस अवधि में संचालन काषी की। जानकारी प्राप्त करके कार्य संचालन को वास्तविक स्थिति प्राप्त करना ।

 

कोष प्रवाह विवरण की सीमाएँ-1. गैर-कोष मदों की उपेक्षा, 2. भूतकालीन विश्लेषण, 3 मौलिक सूचनाओं का अभाव, 4. रोकड़ में परिवर्तन सम्बन्धी सूचना की जानकारी न मिलना, 5. कार्यशील पूँजी के विभिन्न मदों का अलग-अलग विश्लेषण करने में असमर्थ

कोष प्रवाह विवरण तैयार करने की विधि

कोष-प्रवाह विश्लेषण सामान्यतः एक वर्ष की अवधि के लिए तैयार किया जाता है, यद्यपि यह अवधि दो या अधिक वर्ष की भी हो सकती है। इस विश्लेषण के लिए आवश्यक समंक दोनों चिट्टों (प्रारम्भिक एवं अन्तिम) से प्राप्त किये जाते हैं। कुछ अतिरिक्त सूचनाएँ अन्य खातों से प्राप्त कर लेते हैं।

 

कोष-प्रवाह विश्लेषण के लिए निम्नलिखित दो विवरण तैयार किये जाते हैं

1. कार्यशील पूँजी में परिवर्तनों की अनुसूची अथवा विवरण (Schedule or Statement of Changes in Working Capital)

2.  कोष प्रवाह विवरण (Funds Flow Statement )

 

कार्यशील पूँजी में परिवर्तनों की अनुसूची (Schedule of Changes in Working Capital)— यह अनुसूची दो तिथियों के चिट्ठों के बीच कार्यशील पूँजी में हुए परिवर्तनों को प्रदर्शित करती है। इसे चालू सम्पत्तियों व चालू दायित्वों की सहायता से तैयार किया जाता है। चालू सम्पत्तियों क चालू दायित्वों का अन्तर ‘कार्यशील पूँजी’ कहलाता है। कार्यशील पूँजी में होने वाले परिवर्तनों की गणना हेतु ध्यान रखने योग्य प्रमुख नियम निम्नलिखित है—

  1. यदि गत वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में चालू सम्पत्तियों में वृद्धि होती है, तो शुद्ध कार्यशील पूँजी में भी वृद्धि होती है (If current assets increases, working capital increases ) ।
  2. यदि गत वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में चालू सम्पत्तियों की धनराशि में कमी होती है, तो शुद्ध कार्यशील पूँजी भी घट जाती है (If current assets decreases, working capital decreases) l
  3. यदि किसी चालू दायित्व में वृद्धि होती है तो कार्यशील पूँजी में कमी होती है (If current liabilities increases, working capital decreases)
  4. यदि किसी चालू दायित्व में कमी होती है तो कार्यशील पूँजी में वृद्धि होती है (If current liabilities decreases, working capital increases)! उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चालू सम्पत्तियों के साथ कार्यशील पूँजी का सीधा सम्बन्ध पाया जाता है तथा चालू दायित्वों के साथ कार्यशील पूँजी का विपरीत सम्बन्ध होता है।

lllustration 2. यदि चालू वर्ष में शुद्ध कार्यशील पूँजी 25,000 ₹ है, जबकि गतवर्ष में यह (-) 40,000 ₹ थी, तो शुद्ध कार्यशील पूँजी में परिवर्तन की राशि कितनी होगी ?

 

शुद्ध कार्यशील पूँजी में परिवर्तन की राशि = 25,000 – [ (-) 40,000] = 25,000 + 40,000=65,000

स्पष्ट है कि गतवर्ष की तुलना में चालू वर्ष में कार्यशील पूँजी में 65,000 ₹ की वृद्धि हुई है।

कोष प्रवाह विवरण (Funds Flow Statement)-इस विवरण में यह दर्शाया जाता है कि दो लेखा अवधियों के मध्य कोष का प्रवाह किस प्रकार हुआ है अर्थात् किन-किन साधनों से कोष प्राप्त हुए हैं और इनका उपयोग किन-किन मदों में किया गया है। अतः इस विवरण के दो भाग होते हैं-कोषों के स्त्रोत (Sources of Funds) तथा कोषों के प्रयोग or Uses of Funds)। इन दोनों पक्षों के अन्तर की राशि शुद्ध कार्यशील पूँजी में परिवर्तन को प्रदर्शित करती है। जब कोषों के स्रोत पक्ष का योग कोष के प्रयोग पक्ष से अधिक होता है, तो शुद्ध कार्यशील पूँजी में वृद्धि होती है। जब कोषों के स्रोत पक्ष का योग, कोषों के प्रयोग पक्ष की तुलना में कम होता है तो शुद्ध कार्यशील पूँजी में कमी होती है। यह सदैव ध्यान रखें कि कोष-प्रवाह विवरण के स्रोतों तथा प्रयोगों के बीच उतना ही अन्तर होता है जितना कार्यशील पूँजी में परिवर्तन आ रहा हो।

 

यह भी नियम ध्यान रखने योग्य है कि जो मदें कार्यशील पूँजी की अनुसूची में सम्मिलित कर ली जाती हैं (चालू सम्पत्तियाँ एवं चालू दायित्व) उन्हें कोष-प्रवाह विवरण में नहीं दिखलाया जाता है।

कोषों के स्त्रोत (Sources of Funds) – जिन लेन-देनों से कोषों का आगमन होता है, उन्हें कोषों के स्रोत’ कहा जाता है। इनका विस्तृत विवरण निम्नांकित है—

(i) व्यवसाय संचालन से प्राप्त कोष (Funds received from business operations),

(ii) अंश (Increase in share capital),

(iii) दीर्घकालीन ऋणों की प्राप्ति या वृद्धि (Receipts or increases of long-term loans),

(iv) स्थायी सम्पत्तियों का विक्रय (Sale of fixed assets),

(v) गैर-व्यापारिक प्राप्तियाँ (Non-trading receipts),

(vi) कार्यशील पूँजी में कमी (Decrease in working capital)

कोषों के प्रयोग (Applications of funds)- कोष प्रवाह विवरण बनाते समय कोषों के प्रयोग में निम्नलिखित मदों को दर्शाते हैं

 

(i) व्यवसाय संचालन से प्राप्त हानि (Funds lost from business operations),

(ii) स्थायी सम्पत्तियों का क्रय (Purchases of fixed assets),

(iii) पूर्वाधिकार अंशों/ऋणपत्रों/ऋणों का शोधन (Redemption of preferential shares/debentures/loans).

(iv) लाभांश का भुगतान (Payment of dividend),

(v) गैर-व्यापारिक व्ययो का भुगतान (Payment of non-trading expenses),

(vi) कार्यशील पूँजी में वृद्धि (Increase in working capital)

(vii) चालू वर्ष में करों के लिए भुगतान (Payment for tax in current year)

कोष प्रवाह विवरण को तैयार करने का कोई निर्धारित प्रारूप नहीं है, लेकिन इसे खाता प्रारूप (Account Form) अथवा विवरण प्रारूप (Statement Form) में बनाया जा सकता है। कोष प्रवाह विवरण के खाता प्रारूप का नमूना निम्नलिखित है

 

कोष प्रवाह विवरण से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण मदों की विवेचना

  1. संचालन से कोष की गणना (Calculation of Funds from Operations)- संस्था के लाभ-हानि खाते/लाभ-हानि विवरण से संस्था के शुद्ध लाभ/शुद्ध हानि की जानकारी होती है। लाभ-हानि खाते द्वारा प्रदर्शित लाभ-हानि को कोष प्रवाह विवरण के लिए व्यवसाय संचालन का लाभ अथवा हानि नहीं माना जा सकता क्योंकि लाभ-हानि खाते में कुछ ऐसी मदें सम्मिलित होती हैं जिनका व्यवसाय संचालन से कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी मदें भी सम्मिलित होती हैं जिनका कार्यशील पूँजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अत: लाभ-हानि विवरण/लाभ-हानि खाते द्वारा प्रकट किए गए शुद्ध लाभ या हानि में इन मदों को जोड़कर या घटाकर ‘संचालन से कोष की गणना की जाती है।

शुद्ध लाभ में जोड़ी जाने वाली मदें (Items to be added back to net profit) –

(अ) गैर-नकद मदें (Non Cash Items)- ऐसी मदें, जिनका नकदी में भुगतान नहीं किया गया। है परन्तु लाभ-हानि खाते में डेबिट की हुई हैं, का कार्यशील पूँजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, अतः ऐसी मदों की राशि शुद्ध लाभ में जोड़ देते हैं। जैसे-ह्रास, ख्याति प्रारम्भिक व्यय, स्थगित व्यय (Deffered Expenses), पेटेन्ट अधिकार, व्यापारिक चिन्ह एवं अन्य स्थायी सम्पत्तियों की अपलिखित की गई राशि, अंशों व ऋण पत्रों के निर्गमन पर छूट आदि।

(ब) लाभों का नियोजन (Appropriation of Profits)—जैसे सामान्य संचय, सिंकिंग फण्ड लाभांश समानीकरण कोष, ऋणपत्र शोधन कोष आदि में हस्तान्तरित राशि, प्रस्तावित लाभांश(Proposed Dividend), आयकर आयोजन (Provision for Tax) आदि ।

(स) स्थायी सम्पत्तियों एवं दीर्घकालीन विनियोगों के विक्रय से हानि

शुद्ध लाभ में से घटायी जाने वाली मदें (Items to be deducted from net profits)- स्थायी सम्पत्तियों/दीर्घकालीन प्रतिभूतियों विनियोगों के विक्रय से हुआ लाभ प्राप्त लाभांश एवं प्राप्त ब्याज को आय, गैर-चालू सम्पत्तियों के मूल्य में पुनर्मूल्यांकन के कारण हुई वृद्धि, कोष या संचयों से आधिक्य आयोजनों का पुनः लाभ-हानि खाते में हस्तान्तरण, आय कर वापसी की रकम आदि।

 

lllustration 3. (i) यदि शुद्ध लाभ 40,000 ₹ है और गैर-रोकड़ व्यय 5,000 ₹ है तो संचालन से कोष की राशि ज्ञात कीजिए।

 

संचालन से कोष = शुद्ध लाभ + गैर-रोकड़ व्यय = 40,000+5,000 = 45,000 €

 

(ii) यदि एक फर्म ने 18,000 ₹ का लाभ निम्नलिखित समायोजनाओं के पश्चात् अर्जित किया- प्रस्तावित लाभांश 7,000 ₹, कर के लिए प्रावधान 6,000 ₹, आयकर वापसी 3,000 ₹। संचालन से कोष की राशि ज्ञात कीजिए। संचालन से कोष = शुद्ध लाभ + प्रस्तावित लाभांश + कर के लिए प्रावधान आयकर वापसी

 

= 18,000 +7,000 +6.000-3,000=28,000 *

 

(iii) एक कम्पनी ने निम्नलिखित समायोजनाओं के पश्चात् वर्ष 2019-20 में 3,00,000 ₹ का लाभ अर्जित किया-स्थिर सम्पत्तियों पर ह्रास 65,000 ₹, प्रारम्भिक व्यय अपलिखित 7,000₹, अशाध्य ऋण 1,000 ₹, फर्नीचर के विक्रय पर हानि 1,500 ₹, दीर्घकालीन विनियोगों के विक्रय पर लाभ 5,000/ ₹। संचालन से कोषों की गणना कीजिए।

 

संचालन से कोष = शुद्ध लाभ + ह्रास + प्रारम्भिक व्यय + फर्नीचर के विक्रय पर हानि – विनियोगों के विक्रय पर लाभ

 

= 3,00,000+65,000+ 7,000+ 1,500 -5,000 = 3,68,500 €

 

(iv) एक मशीन जिसका पुस्तक मूल्य 1,20,000 ₹था, 1,66,000 ₹ में बेची गई। मशीन के विक्रय पर हुए लाभ को लाभ-हानि खाते में अन्तरित किया गया जिसके अनुसार वर्ष में शुद्ध लाभ राशि 1,50,000 ₹ हो गई थी। परिचालन कोषों (Funds from Operations) की राशि ज्ञात कीजिए।

परिचालन कोषों की राशि = शुद्ध लाभ मशीन के विक्रय पर =1,50,000-46,000=1,04,000  लाभ

 

(v) वर्ष का शुद्ध लाभ 80,000 ₹, सामान्य संचय में हस्तान्तरण 5,000 ₹, ख्याति अपलिखित की गई 5,000 ₹, प्रारम्भिक व्यय अपलिखित किए गए 2,000 ₹, वर्ष का हास 10,000 ₹, सम्पत्ति के विक्रय पर लाभ 4,000 ₹। संचालन से कोष की राशि ज्ञात कीजिए। संचालन से कोष शुद्ध लाभ +संचय में हस्तान्तरण + अपलिखित

ख्याति + अपलिखित प्रारम्भिक व्यय + ह्रास – विक्रय पर लाभ

= 80,000+5,000+5,000+ 2,000+10,000-4,000

 

(vi) निम्नलिखित समायोजनाओं के बाद अभिषेक लि० ने 2,50,000 ₹ का लाभ वर्ष 2020 अर्जित किया- 2020 का ह्रास 1.12.500 ₹ ऋणपत्रों के निर्गमन पर कटौती 25,000 ₹, दीर्घकालीन विनियोग के विक्रय पर हानि 5,125 ₹, प्राप्त लाभांश 1.250 ₹ एवं स्थायी सम्पत्तियों की बिक्री पर लाभ 1,550 ₹। संचालन से कोष की गणना कीजिए।

संचालन से कोष

= 2,50,000+ 1,12,500 +25,000+5,125 – 1,250 1,550

= 3,89,825

 

(vii) शुद्ध हानि 1,00,000 ₹, प्लाण्ट पर ह्रास 2,50,000₹ भूमि की बिक्री पर लाभ 45,000₹, ख्याति का अपलेखन 25,000 ₹, उपस्कर की बिक्री पर हानि 20,000 ₹, अप्राप्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान 12,500 ₹ एवं कर की वापसी 2,000 ₹। संचालन से कोष की गणना कीजिए। संचालन से कोष

= (2,50,000+ 25,000 + 20,000) – (45,000+ 2,000 + 1,00,000) = 2,95,000 1,47,000 1,48,000 *

 

  1. अंश पूँजी में वृद्धि या कमी (Increase or Decrease in Share Capital)- यदि अंश पूँजी (पूर्वाधिकार अंश पूँजी सहित) की राशि में वृद्धि हुई है तो वृद्धि की राशि को कोष का स्रोत माना जाता है। यदि अंश प्रीमियम पर निर्गमित किए गए हैं तो अंश पूँजी में हुई वृद्धि रकम को प्रीमियम की रकम से बढ़ा देंगे और यदि अंशों का निर्गमन छूट पर हुआ हो तो अंश पूँजी में हुई वृद्धि की रकम को छूट की रकम से कम कर देंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि यदि अंश पूंजी में वृद्धि बोनस अंशों के निर्गमन/स्थायी सम्पत्तियों के क्रय के बदले में अंशों के निर्गमन अथवा ऋणपत्रों के अंश पूंजी में परिवर्तन के कारण हुई है तो ऐसी दशाओं में अंश पूँजी में हुई वृद्धि/अंश पूँजी का निर्गमन कोष का स्रोत नहीं बनती है क्योंकि ऐसे निर्गमन के परिणामस्वरूप गैर चालू-मदें ही प्रभावित हो रही हैं। कभी-कभी व्यापार क्रय करने के बदले में भी अंश निर्गमित किए जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में अंशों के बदले में ली गई चालू सम्पत्तियाँ- चालू दायित्व की राशि कोष का स्त्रोत होगी। पूर्वाधिकार अंश पूँजी में हुई कमी का अर्थ है कि पूर्वाधिकार अंशों का शोधन किया गया है जिसे कोषों का उपयोग माना जायेगा। यदि पूर्वाधिकार अंशों का शोधन/भुगतान प्रीमियम पर किया गया है तो प्रीमियम सहित भुगतान की राशि को ही कोषों का प्रयोग माना जाएगा। यदि पूर्वाधिकार अंशों का शोधन नए अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन के रूप में हुआ है तो उसे कोषों का प्रयोग नहीं माना जाएगा।

 

  1. दीर्घकालीन दायित्वों में वृद्धि या कमी- इसके अन्तर्गत ऋणपत्रों, दीर्घकालीन ऋणों, बन्धक ऋणों व दायित्वों में दो तिथियों के बीच हुए परिवर्तन को ज्ञात किया जाता है। यदि यह परिवर्तन वृद्धि के रूप में है, तो उसे कोषों का स्रोत मानते हैं और यदि परिवर्तन की के रूप में है, तो उसे कोषों का प्रयोग मानते हैं। वृद्धि की दशा में यह मान लिया जाता है कि नये ऋणपत्रों का निर्गमन हुआ है या वित्तीय संस्थाओं से नये ऋण प्राप्त किये गये हैं। इसी प्रकार कमी की दशा में यह मान लिया जाता है कि या तो ऋणपत्रों का शोधन किया गया है अथवा ऋणों का भुगतान किया गया है। परन्तु वृद्धि या कमी को साधन या प्रयोग के रूप में दर्शाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि इस प्रकार की वृद्धि या कमी गैर-चालू मदों के बीच हुए लेन-देनों के कारण तो नहीं हुई है। यदि ऋणपत्रों का निर्गमन स्थायी सम्पत्ति के क्रय के बदले में किया गया है या ऋणपत्रों का शोधन अंशों में परिवर्तन के रूप में किया गया है, तो इसके कारण होने वाली वृद्धि व कमी को कोष विवरण में बिल्कुल नहीं दर्शाया जायेगा। हाँ, यदि ऋणपत्रों का निर्गमन प्रीमियम पर हुआ है, तो वृद्धि की रकम में प्रीमियम को जोड़ देंगे और यदि निर्गमन छूट पर हुआ है, तो वृद्धि की रकम में से छूट को घटा देंगे। दूसरी ओर, यदि ऋणपत्रों का शोधन प्रीमियम पर किया गया है, तो कमी की रकम को प्रीमियम की रकम से बढ़ा देंगे और यदि शोधन पर लाभ हुआ है अर्थात् छूट पर शोधन किया गया है, तो कमी की रकम को लाभ की रकम से बढ़ा देंगे।

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण-एक्स लिमिटेड के सन् 2019 व सन् 2020 के आर्थिक चिट्ठों में ऋणपत्र क्रमश: 1.50,000 ₹ तथा 2,50,000 थे। यह ज्ञात हुआ कि 2020 में 100 ₹ वाले 1,000 ऋणपत्र निर्गमित किये गये थे, जिनमें से 400 ऋणपत्र एक मशीन खरीदने के सम्बन्ध में मशीन विक्रेता को निर्गमित किये गये थे। कोष-प्रवाह विवरण के उद्देश्य हेतु ऋणपत्रों के निर्गमन की धनराशि ज्ञात कीजिए।

  1. स्थायी सम्पत्तियों एवं दीर्घकालीन विनियोगों में वृद्धि या कमी (Increase or Decrease in Fixed Assets and Long-term Investments) स्थायी सम्पत्तियों जैसे- भूमि, भवन, संयन्त्र फर्नीचर एवं दीर्घकालीन विनियोगों की राशि में हुई वृद्धि को स्थायी सम्पत्तियों एवं विनियोगों का क्रय मानते हुए कोषों का उपयोग माना जाता है। इसके विपरीत इनकी राशि में हुई कमी इनके विक्रय को दर्शाती है जिसे कोषों का स्त्रोत माना जाता है। यदि स्थायी सम्पत्तियों का क्रय अंशों अथवा ऋणपत्रों के निर्गमन के बदले किया गया है, तो उसे कोषों का प्रयोग नहीं माना जाता क्योंकि ऐसे क्रय से केवल गैर चालू-मदे ही प्रभावित हो रही हैं। स्थायी सम्पत्तियों/विनियोगों का क्रय-विक्रय स्थायी सम्पत्ति खाता / विनियोग खाता बनाकर ज्ञात किया जा सकता है। स्थायी सम्पत्तियों एवं विनियोगों के क्रय की राशि को कोषों के प्रयोग में प्रदर्शित करेंगे जबकि विक्रय से प्राप्त राशि को कोषों के स्रोतों में दर्शाया जाता है।

Illustration 4. (i) एक कम्पनी की स्थायी सम्पत्तियों का लागत पर शेष 2019 एवं 2020 के अन्त में क्रमश: 6,00,000 और 8,20,000 ₹ था। वर्ष में हास की राशि 60,000 ₹ है। स्थायी सम्पत्ति के क्रय की राशि ज्ञात कीजिए।

 

स्थायी सम्पत्ति का क्रय = 8,20,000 + 60,000 – 6,00,000 = 2,80,000₹

(i) एक कम्पनी की स्थायी सम्पत्तियों का लागत पर शेष 2019 एवं 2020 के अन्त में क्रमशः 5,70,800 ₹ व 6,15,300 ₹ था। वर्ष 2020 के दौरान 60,000 ₹ की लागत की मशीन को बेच दिया गया। स्थायी सम्पत्ति के क्रय की राशि ज्ञात कीजिए।

स्थायी सम्पत्ति का क्रय = 6,15,300 + 60,000 – 5,70,800 = 1,04,500₹ (iii) 31 दिसम्बर, 2019 व 2020 को एक्स लि० के चिट्ठों द्वारा अंशों में विनियोग क्रमश: 2,000/ ₹ तथा 3,000 ₹ दर्शाया गया है। अधिग्रहण से पूर्व का लाभांश 100 ₹ विनियोग खाते में क्रेडिट किया गया है। विनियोग की क्रय राशि ज्ञात कीजिए। विनियोग की क्रय राशि = 3,000 + 100 – 2,000 = 1,100 ₹

  1. करों के लिए आयोजन (Provision for Taxation) (अ) चालू दायित्व मानकर- ऐसी दशा में चिट्ठे में दी गई करों के आयोजन की राशि को Statement of Changes in Working Capital में दिखा देते हैं तथा अन्य किसी स्थान पर इस मद के सम्बन्ध में कोई समायोजन नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में यदि अतिरिक्त सूचनाओं में कर के आयोजन या भुगतान के सम्बन्ध में कोई जानकारी दी हुई होती है तो उस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। वैसे अब करो के लिए आयोजन को चालू दायित्व नहीं माना जाता। (ब) लाभों का नियोजन मानकर-ऐसी दशा में चालू वर्ष में किए गए कर के आयोजन की राशि को संचालन से कोष की गणना करते समय शुद्ध लाभ में जोड़ दिया जाता है एवं चालू वर्ष में किए गए कर के भुगतान की राशि को कोष प्रवाह विवरण में कोषों के प्रयोग में दिखाते हैं।

यदि प्रश्न में कोई अतिरिक्त सूचना न दी गई हो तो गत वर्ष में करों के आयोजन की राशि को चालू वर्ष में भुगतान मानते हैं एवं चालू वर्ष के चिट्ठे में दी गई करों के आयोजन की राशि को संचालन से कोष की गणना हेतु शुद्ध लाभ में जोड़ दिया जाता है। लेखांकन मानक-3 (AS3) के अनुसार करों के आयोजन को एक गैर-चालू मद मानकर लाभों का नियोजन ही मानना चाहिए।

उदाहरण- प्रारम्भ में कर के लिए प्रावधान 10,000 ₹, अन्त में कर के लिए प्रावधान 15,000 ₹ वर्ष में कर का भुगतान 12,000 ₹ लाभ-हानि खाते में दिखाई जाने वाली करों की राशि क्या होगी ? चालू वर्ष में किए गए कर के आयोजन की राशि = 15,000+12,000-10,000=17,000

 

  1. ख्याति (Goodwill)— यदि चालू वर्ष में ख्याति की राशि में वृद्धि होती है, तो अन्तर की राशि को ख्याति का क्रय माना जाता है। यदि क्रय नकदी के आधार पर हुआ हो तो उसे कोष प्रवाह विवरण में प्रयोग पक्ष की ओर दिखाएंगे और यदि अंशों या ऋणपत्रों के बदले हुआ है तो कहीं नहीं दिखाया जाएगा। यदि चालू वर्ष में ख्याति की राशि में कमी होती है तो इसे ख्याति की अपलिखित राशि माना जाता है तथा संचालन से कोष की गणना हेतु शुद्ध लाभ में जोड़ देते हैं अर्थात् समायोजित लाभ-हानि खाते के डेबिट पक्ष में दिखाते हैं।

lllustration 5. मिस्टर विभव के चिट्ठे से स्पष्ट है कि व्यापार में प्रारम्भिक पूँजी शेष 80,000 ₹ तथा अन्तिम पूँजी शेष 1,20,000 ₹ है। वर्ष में उन्होंने व्यक्तिगत प्रयोग के लिए 8,000₹ का आहरण किया है। वर्ष का शुद्ध लाभ ज्ञात कीजिए।

 

वर्ष का शुद्ध लाभ = 1,20,000 + 8,000- 80,000 = 48,000 ₹

 


 

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