Easy Notes

Formation of a Company Corporate Law notes Hindi

Formation of a Company Corporate Law notes Hindi

Formation of a Company Corporate Law notes Hindi :- 

 

FOMATION OF A COMPANY : INCORORATION AND COMMENCEMENT OF BUSINESS

किसी कंपनी की स्थापना से व्यवसाय प्रारंभ करने तक पूर्ण की जाने वली प्रक्रिया को निम्नं दो भागो में बंटा जा सकता है –

कंपनी का पंजीयन एंव सममेलन,

कंपनी द्वारा व्यवसाय प्रारंभ करना





कंपनी का पंजीयन एंव सममेलन REGISTRATION AND INCORPORATION OF A COMPANY

कंपनी के निर्माण से आशय प्रवर्तकों अथवा संस्थापको द्वारा कुछ ऐसी वैधानिक आवश्यकताओ की पूर्ति करने से हैजिनेक फलस्वरूप कंपनी अस्तित्व में आती है कंपनी का निर्माण उसके सममेलन से होता है अर्थात सममेलन के बाद ही कमानी अस्तित्व में आती है कंपनी का समामेलन करने के लिए निम्न क्रिया विधि अपने जाती है –

प्रारंभिक कार्यवाहियां

रजिस्ट्रार के समक्ष आवश्यक प्रलेख प्रस्तुत करना

समामेलन का प्रमाण- पत्र प्राप्त करना |

प्रारम्भिक कार्यवाहियां :- एक कंपनी का समामेलन करने के लिए कंपनी के प्रवर्तक ही समामेलन के लिए आवश्यक कार्यवाहिय करते है प्रारंभिक कार्यवाहिय में निम्नलिखि समिमिलित है –

यह निश्चित करना की कंपनी निजी होगी या सार्वजानिक

रजिस्ट्रार कार्यलय का निश्चित करना

कंपनी के नाम के लिए कंपनी रजिस्ट्रार की अनुमति मांगना

आवश्यक पपत्रो को तैयार करवाना व् उनको छपवाना |

यदि आवश्यक है तो औधोगिक (विकास एंव नियमन ) अधिनियम 1951 के अंतगर्त लाइसेंसे प्राप्त करना

प्रारंभिक अनुबंधों का प्रारूप तैयार करना तथा प्रविवरण या प्रविवरण के स्थान पर विवरण तैयार करना |
रजिस्ट्रार के समक्ष आवश्यक प्रलेख प्रस्तुत करना :- प्रवर्तक, समामेलन के लिए उस राज्य के रजिस्ट्रार के यहाँ आवेदन प्रस्तुत करता है, जिस राज्य में कंपनी का पंजीक्रत कार्यलय स्थिति है आवेदकं के साथ निम्न्लिहित आवश्यक प्रपत्र भी रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत किया जाते है –


  • पार्षद सिमानियम :- यह कंपनी का आधारभूत प्रलेख है जो कंपनी तथा अन्य व्यक्तियों के हीच के संबंधो को प्रकट करता है कंपनी कोई भी कार्य इसके उल्लेखित उदेश्य के अतिरिक्त नही कर सकती |इसमें कंपनी का नाम, पता , उदेश्य, दायित्व, पूंजी आदि का वर्णन होता है | किसी भी कंपनी का समामेलन इसके बिना नही हो सकता |

एक पब्लिक कंपनी की दशा में इस प्रलेख पर सात व्यक्तियों के और प्राइवेट कंपनी ख़ी९ दशा में दो व्यक्ति के हस्ताक्षर होने चाहिए | इन हस्ताक्षरों को कम से कम एक गवाह अपना नाक पता एंव पेशा लिखकर अपने हस्ताक्षर करेगा यदि अंश पूंजी वाली कम्पाई है तो प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता के नाम के आगे उन अंशो की संख्या भी लिखा दी जाती है जिन्हें वह लेने के लिए तैयार है

  • पार्षद अंतर्नियम :- पार्षद अंतर्नियम कंपनी का दूसरा महत्वपूर्ण वैधानिक प्रलेख है जिसकी कंपनी समामेलन के लिए आवश्यकता पड़ती है इसमें पार्षद सिमनियम में वर्णित उदेश्यों की पूर्ति तथा कंपनी के सुचारू संचालन के लिए बनाये गये नियम एंव उपनियमो का उल्लेख होता हयाई यह प्रलेख अंशो द्वारा सिमित सार्वजानिक कंपनी को छोड़कर शेष सभी कंपनियों को अपनी रजिस्ट्रार के पास फाइल करना अनिवार्य होता है अंशो द्वारा सिमित सार्वजानिक कंपनी यदि इस अंतर्नियम को फाइल नही करती तो उस पर TABLE ‘A’ के नियम लागु होते है यदि कंपनी द्वारा पार्षद अंतर्नियम फाइल नही किया जाता तो उसे अपने पार्षद सिमानियम पर बिना अन्त्र्नियामो के पंजीक्रत शब्द लिख देना चाहिए | इस प्रपत्र पर उन सभी व्यक्तियों के हस्ताक्षर होने आवश्यक है जिन्होने पार्षद सिमानियम पर हस्ताक्षर किये है
  • प्रबंधकीय क्रमचारियो की नियिक्ति सम्बन्धी अनुबंध :- कंपनी (संशोधन)अधिनियम , 1988 के अनुसार यदि कंपनी किसी व्यक्ति को प्रबंध , संचालक , पूर्णकालिक संचालक अथवा प्रबंधक के रूप में नियुक्त करने का प्रस्ताव करती अहि तो उक्त नियिक्ति सम्बन्धी अनुबंध को रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत करना होगा
  • संचालको की सूचि :– उन व्यक्तिओ के नमो की एक सूचि भी प्रस्तुत करनी होती है, जो कंपनी के प्रथम संचालक के रूप में कार्य करने की सहमती प्रदान कर चुके है निजी कंपनी की दशा में इसको भेजने की आवश्यकता नही होती |
  • संचालको की लिखित सहमती :- एक अंशो द्वारा सिमित सार्वजानिक कंपनी को उन सभी व्यक्तियोके हस्ताक्षरों से युख एक लिखी सहमती भी प्रस्तुत करनी होती है जो कंपनी के संचालन के रूप में कार्य करने को सहमत हुए है इसके साथ यह घोषणा की र्त्येक संचालक ने अपने योग्यता अंश, यदि कोई है अपने नाम में रजिस्ट्रार कर लिए है तथा वः उनको लेने व् भुगतान करने के लिए तैय्रार है |
  • वैधानिक घोषणा :- समामेलन हेतु रजिस्ट्रार के पास भेजे जाने वाले प्रपत्रों में इस आशय की घ्योश्ना भी भेजी जाती है की कंपनी ने सममेलन के लिए आवश्यक सभी औचारिक्ताओ को पूरा कर लिया है ऐसी वैधानिक घोषण निम्नलिखित में से किसी एक व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षिरत होनी चाइये (क) उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायलय के एडवोकेट ,(ख) अटर्नी अथवा वकील जो उच्च न्यायालय में उपस्थिति होने के लिए अधिक्रत है (ग) कंपनी के निर्माण से सम्बंधित कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट जो भारत में कारोबार करता है (घ) कंपनी के अंतर्नियम की 10वी अनुसूची में दी हुई है |




सममेलन का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना :- जब रजिस्ट्रार के पास कंपनी के समामेलन के लिए आवश्यक प्रपत्र निर्धारित शुल्क सहित दाखिल हो जाते है तो रजिस्ट्रार समस्त प्रपत्रों की जाँच करता है ततः समस्त वैधानिक औपचारिकताओ की पूर्ति से संतुष्ट हो जाने के उपरांत कंपनी के समामेलन का प्रमाण पत्र जरी करता है समामेलन के प्रमाण पत्र में सिमित दायित्व की दशा में वह यह भी उल्लेख करेगा की कंपनी के सदस्यों का दायित्व सिमित है जिस दिन रजिस्ट्रार कंपनी को सममेलन का प्रमाण पत्र निर्गमित करता है उसी दिन से कंपनी अस्तित्व में आती है |

सममेलन के प्रभाव EFFECTS OF INCORORATION

कंपनी एक समामेलित संस्था बन जाती है – कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 34(2) के अनुसार, “समामेलन प्रमाण पत्र में लिखती तिथिसे कंपनी पार्षद सिमिनियम में उल्लेखित की एक समामेलित संस्था हो जाती है और यह संश्ता समामेलित संश्ता का स्थयी समामेलित कंपनी के रूप में कार्य कर सकती अहि इतना हिन्ही ऐसी समामेलित संस्था का स्थायी अस्तित्व एंव इसकी सार्वमुद्रा होती है ”

कंपनी के अस्तित्व की थिति सममेलन के प्रमाण-पत्र की तिथि से शुरू होना :- कंपनी उसी तारीख से अस्तित्व में आई हुई मानी जाती है जिस दिन से सममेलन का प्रमाण पत्र दिया जाता है और सममेलन की तिथि के पुरे दिन से उसका अस्तित्व मन जाता है चाहे कितने ही बजे सममेलन का पत्र निर्गमित किया गया हो उदाहरन केलिए यदि कंपनी के समामेलन के प्रमाण पत्र को 2 बजे दोपहर में निर्गमित किया गया है तो कंपनी उस दिन प्रात: कल से ही समामेलित मानी जाएगी उस दिन 2 बजे से पुव किये गये अनुबंधों को इस आधार पर निरस्त नही किया जा सकता की उस समय कंपनी का अस्तित्व नही था |

कंपनी का स्थायी अस्तित्व होना – समामेलन के बाद कंपनी का अस्तित्व स्थायी हो जाता है किसी भी सदस्य की म्रत्यु होने से या दिवालिया होने से कंपनी का समापन नही होता है |

कंपनी का प्रथक अस्तित्व :- कंपनी का अस्तित्व अपने सदस्यों से प्रथक होता है अर्थात कंपनी अपने सदस्यों पर वाद प्रस्तुत कर सकती है और कंपनी के सदस्य कंपनी पर वाद प्रस्तुत कर सकते है |

कंपनी और सदस्यों के मध्य अनुबंध का होना :– समामेलन होते ही कंपनी पार्षद सिमानियम तथा पार्षद अंतर्नियम कंपनी तथा इसके स्द्स्योको इस प्रकार से बाध्य करते है जैसे की इन प्रपत्रों को कंपनी तथा प्रत्येक सदस्य ने हस्ताक्षरित किया हो अर्थात वे प्रपत्र कंपनी तथा सदस्य दोनों पर ही लागु होते है |

समामेलन के बाद कंपनी को एक वैधानिक व्यक्ति माना जाना :- रजिस्ट्रेशन के बाद एक कंपनी वैधानिक व्यक्ति बन जाती है और कंपनी अपनी सार्व्मुद्र के अधीन एक व्यक्ति की भांति कार्य करती है |

पार्षद सिमनियम तथा पार्षद अन्त्र्नियामो के अंतर्ग्रत सदस्यों द्वारा डे धन कंपनी के ऋण की भांति माना जाना :- सदस्यों द्वारा पार्षद सिमिनियम तथा पार्षद अंतर्नियामो के अंतर्ग्रत कंपनी कोडे धनराशी इस तरह समझी जाती अहि जैसे की कंपनी का सदस्यों पर ऋण हो |

वाद प्रस्तुत करने का अधिकार :– समामेलन के बाद कंपनी दुसरे पक्षों पर वाद प्रस्तुत क्र सकती है और दुसरे पक्ष कंपनी पर वाद प्रस्तुत कर सकते है |

समामेलन से पूर्व के अनुबंध :- सममेलन से पहले किये गये अनुबंधों के लिए कंपनी तब तक बाध्य नही होती जब तक की सममेलन के पश्चात कंपनी द्वारा इस सम्बन्ध में नये अनुबंध न्हीकर लिए जाते |

लेनदारो पर प्रभाव :– कंपनी का सममेलन हो जाने के पश्चात लेनदार अपनी धनराशी प्राप्त करने केलिए कंपनी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत कर सकते है

यह उल्लेखनीय है की एक बार समामेलन प्रमाण पत्र निर्गमित करने के पश्चात सममेलन के प्रमाण पत्र को रद्द नही किया जा सकता | हा कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कंपनी का                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     समापन अवश्य संभव है |

 

समामेलन प्रमाण पत्र एक निश्चयात्मक प्रमाण (CERTIFICATE OF INCORPORATION- A CONCLUSIVE EVIDENCE)




धारा 35 के अनुसार समामेलन का प्रमाण पत्र इस बात का निश्चयात्मक प्रमाण है की _ (i) कंपनी का रजिस्ट्रेशन विधिवत हुआ है और रजिस्ट्रेशन से सम्बंधित विषयों के सम्बन्ध में अधिनियम की सभी आवश्यकताए पूरी कर दी गई है और (ii) वह संस्था कंपनी के रूप में registerd होने की अधिकारी है और (iii) संस्था की इस प्रकार रेगिस्त्री कर दी गई है |

समामेलन का प्रमाण पत्र निम्नलिखित बातो के सम्बन्ध में भी निश्चयात्मक प्रमाण होता है –

(iv) पार्षद सिमानियम व अंतर्नियम कंपनी अधिनियम की व्यवस्थाओ के अन्तर्गत बनाये गया है |

(v) पार्षद सिमानियम के प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता ने अपने नाम के आगे अंकित अंश से लिये है |

(vi) कंपनी एक निजी अथवा सार्वजनिक कंपनी है और इसके सदस्यों का दायित्व सिमित है |

इस प्रकार स्पष्ट है की समामेलन का प्रमाण पत्र इस बात का निश्चयात्मक प्रमाण है की कंपनी का समामेलन उचित प्रकार से हुआ है और कंपनी ने सभी वैधानिक औपचारिकताओ को पूरा कर लिया है समामेलन के पश्चात किसी अनियमितता का ज्ञान होने पोअर भी समामेलन के विरुद्ध कोई अप्पति नही उठाई जा सकती है निम्नलिखित त्रुटिया या अनियमितताए पाए जाने के पश्चात भी समामेलन को व्यर्थ नही किया जा सकता –

(क) पार्षद सिमानियम में सदस्यों के हस्ताक्षर होने के बाद तथा रजिस्ट्रेशन के पहले परिवर्तन कर दिए गये हो (ख)  सभी हस्ताक्षरकर्ता अवयस्क हो | (ग) सार्वजनिक कंपनी में सतो व्यक्तियों के हस्ताक्षरों को एक ही व्यक्ति ने किया हो (घ) पार्षद सिमानियम पर किये हुए सबन्हि हस्ताक्षर कपटपूर्ण हो (ड) कंपनी का उदेश्य अवैध हो |







One thought on “Formation of a Company Corporate Law notes Hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!