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Classification or Kinds of Company Corporate law Bcom part 2

Classification or Kinds of Company Corporate law Bcom part 2

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Classification or Kinds of Company Corporate law Bcom part 2
Classification or Kinds of Company Corporate law Bcom part 2

 

कंपनियों का वर्गीकरण या प्रकार (CLASSIFICATION OR KINDS OF COMPANIES)

कंपनी का वर्गीकरण मुख्य रूप से निम्न छ: आधारों पर किया जा सकता है –




  • सममेलन का आधार
  • दायित्व का आधार
  • सदस्यों की संख्या का आधार
  • स्विमित्व का आधार
  • इकाई की स्वतन्त्रता का आधार
  • राष्ट्रीयता का आधार

इनका वर्णन निम्नलिखित है –

  1. सममेलन के आधार पर वर्गीकरण CLASSIFICATION ON THE BASIS ON INCORPORATION :– सममेलन के आधार पर कम्पनियों दो प्रकार की होती है |  1. समामेलित कंपनिया, 2 अस्मामेलित कंपनिया
    1. समामेलित कंपनिया (Incorporated companies) :- समामेलित कंपनिया निम्नलिखित तीन प्रकार की होती है
      1. राज्य आज्ञा पत्र द्वारा- इस प्रकार की कंपनी का निर्माण शाही आदेश अथवा राज्य आज्ञा पत्र द्वारा होता है इस प्रकार की कंपनिया प्राचीन काल में स्थापित होती थी जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी | वर्तमान समय में इस प्रकार की कंपनियों स्थापित नही की जाती है |
      2. संसद के विशेष अधिनियम द्वारा समामेलित कंपनी – कुछ कंपनिया संसद के द्वारा पारित किसी विशेष अधिनियम के अंतर्गत समामेलित की जाती है इन कंपनियों के अधिकार, कर्य्छेत्र एंव सीमाए उन विशेष अधिनियमों द्वारा निर्धारित होती है जिनके अधीन इनका निर्माण या सममेलन हुआ है ऐसी कंपनिया को वैधानिक कंपनिया या निगम कहते है भारत में इस प्रकार की कंपनिया के बहुत से उदहार है जैसे भारत का स्टेट बैंक एंव रिजर्व बैंक , जीवन भीमा निगम, औधोगिक वित् निगम एंव भारत का यूनिट ट्रस्ट आदि इन कंपनियों के नाम के अंत में लिमिटेड शब्द नही लिखा जाता है |
      3. कंपनी अहिनियम द्वारा समामेलित कंपनी – कंपनी अधिनियम , 1956 या इससे पूर्व पारित कंपनी अधिनियमों के अंतर्गत निर्मित एंव registerd या समामेलित कंपनियों, कंपनी अधिनियम के अंतर्गत न्स्मामेलित कंपनिया कही जटिया है
        • वैधानिक कंपनियों को छोड़कर शेष सभी कंपनियों का निर्माण कंपनी अधिनियम के द्वारा होता है यधपि कुछ विशेष प्रकार की कंपनियों के लिये अलग से अधिनियम है परन्तु फिर भी उनका पंजीयन अधिनियम के अंतर्गत ही होता है, जैसे बैंकिंग कंपनिया के लिये बैंकिंग कम्निज अधिनियम, बिमा कंपनी के लिये बिमा अधिनियम आदि
    2. असमामेलित कंपनिया – बड़ी बड़ी साझेदारी संस्थाओ को असमामेलित कंपनिया कहते है इन कंपनियों के सदस्यों का दायित्व असीमित होता है तथा इनको एनी कंपनियों की भांति प्रथक अस्तित्व आदि प्राप्त नही होता है अब इस प्रकार की कंपनिया स्थापित नही की जा सकती है क्योंकि भारतीय कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 11 में इस प्रकार की कंपनियों पर पर्तिबंध लगा दिया गया है इस धरा के अनुसार बन्कि९न्ग व्यवसाय करने वाली कोई भी कंपनी संस्था या फर्म जिसमे 10 से अधिक साझेदार या अंशधारी है बिना कंपनी के रूप में समामेलित हुए कार्य नही कर सकती है इसी प्रकार एनी व्यवसाय में सलग्न कोई कंपनी संस्था या साझेदारी जिसकी संख्या 20 से अधिक है बिना कंपनी के रूप में समामेलित हुए कार्य नही कर सकती  |
  2. दायित्व के आधार पर वर्गीकरण CLASSIFICATION ON THE BASIS OF LIABILITY) :- दायित्व के आधार पर कंपनियों दो प्रकार की होती है – 1. सिमित दायित्व वाली कम्पनिया एंव 2. असीमित दायित्व वाली कंपनिया | इनका वर्णन निम्नलिखित है
    1. सिमित दायित्व वाली कंपनिया – इस प्रकार की कंपनिया में अंश्धारिया का दायित्व सिमित होत्का है इन कम्पनिये के नाम के आगे लिमिटेड शब्द का अनिवार्य रूप से लगाया जाता है ये कम्पनिये निम्न  दो प्रकार की होती है
      1. अंशो द्वारा सिमित कंपनी – इन कम्पनिये में सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा करी किये गये अंशो के अंकित मुल्त तक ही सिमित रहता है अत: यदि अंशो पर अंकित मूल्य का एक भाग कंपनी को चूका दिया गया है तो अंशधारी का दायित्व अंशो पर डे आदत राशी तक ही सिमित होगा और यदि अंशधारी कंपनी को समस्त अंकित मूल्य का भुगतान कर चूका है तो उसका कंपनी के प्रति कोई उतरदायित्व नही रहता है भारत में ऐसी कंपनिया ही सर्वाधिक लोकप्रिय है
      2. गारंटी द्वारा सिमित वाली कंपनिया :- प्रत्याभूति या गारंटी द्वारा सिमित दायित्व वाली कंपनी वह है जिसमे कंपनी के सदस्य कंपनी को इस बात की गारंटी देते है की यदि कंपनी का उनकी सदस्यता के समय अथवा सदस्यता के समाप्त होने से एक वर्ष के भीतर समापन हो जाये तो वे कंपनी के कोष में एक निश्चित रस्शी जमा कर देगे इस प्रकार सदस्यों का दायित्व उस निश्चित राशी तक सिमित रहता है जिसके लिये वे गारंटी देते है यह उल्लेखनीय है की सदस्यों का दायित्व कंपनी के समापन के समय ही उत्पन्न होतव है कंपनी के जीवन काल में नही |
    2. असीमित दायित्व वाली कंपनी :- ऐसी कम्पनिय्तो में कंपनी के रीनो का भुगतान करने के लिये साझेदारी फर्मे की भांति कंपनी के सदस्यों का दायित्व असीमित होता है परन्तु इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखें योग्य है की ऐसा दायित्व साझेदारी फर्म के सजेदारो के समान सामूहिक एंव व्यक्तिगत रूप से असीमित ण होकर केवल सामूहिक रूप से असीमित होता है कंपनी के सदस्यों पर व्यक्तिगत रूप से वाद प्रस्तुत नही किया जा सकता हयाई दुसरे कंपनी के सदस्यों का दायित्व कंपनी में उनके हिट के अनुपात में असीमित और सयुंक्त होता है वर्तमान में ऐसी कंपनियों का प्रचालन नही है |
  3. सदस्यों की संख्या के आधार पर वर्गीकरण – CLASSIFICATION ON THE BASIC OF NUMBER OF MEMBERS) :- सदस्यों की संख्या के आधार पर कम्पनियां दो प्रकार की होती है 1. निजी कंपनी, एंव 2. सार्वजनिक कंपनी | इसका वर्णन निम्नलिखित है –
    1. निजी कंपनी :- इसका आलोक या व्यक्तिगत कंपनी भी कहते है कंपनी अधिनियम 1956 संशोधित अधिनियम 2000 की धारा 3(I) के अनुसार , निजी कंपनी का आशय एक ऐसी कंपनी से है जिसकी प्रदत पूंजी कम से कम एक लाख रुपए या इससे अधिक निर्धारिक की गई राशि की है तथा जो अपने अन्त्र्नियामो द्वारा अपने अंशो यदि कोई हो के हस्तान्त्र्ण पर प्रतिबंध लगाती है , या निम्नलिखित को छोड़कर अपने सदस्यों की अधिकतम संख्या 50 तक सिमित करती है ऐसे व्यक्ति जो की कंपनी के कर्मचारी है तथा ऐसे व्यक्ति जो की पहले कंपनी के कर्मचारी रहते हुए कंपनी की सदस्य थे और अब कर्मचारी नही है लेकिन सदस्य बने हुए है तथा अपने अंशो तथा ऋण पत्रों को खरीदने के लिये सार्वजनिक निमंत्रण नही देती है त्तथा अपने सदस्यों संचालको तथा उनके रिश्तेदारों के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति से जमाये आमंत्रित करने या स्वीकार करने पर निषेध लगती है |
      • यहाँ पर यह उल्लेखनीय है की कंपनी संशोधन अधिनियम ,2000 लागु होने के समय यदि किसी निजी कंपनी का प्रदत पूंजी 1 लाख रूपये से कम है तो ऐसी कंपनी को इस संशोधन अधिनियम लागू होने के 2 वर्ष के भीतर अपनी प्रदत पूंजी को बढाकर 1 लाख रूपये करना अनिवार्य होगा यदि ऐसी कंपनी निर्धारित अव्देही में अपनी प्रदत पूंजी नही बढाती है जो उसे कंपनी अधिनियम की धारा 560 के अधीन निष्क्रिय कंपनिया माना जायेगा एंव रजिस्ट्रार द्वारा उसका नाम कंपनिया के रजिस्टर में से काट दिया जायेगा इस प्रकार की कंपनी में सदस्यों की न्यूनतम संख्या तथा अधिकतम संख्या 50 तक सिमित रहती है
    2. सार्वजनिक कंपनी ­:- इसको लोक कंपनी भी कहते है भारतीय कंपनी अधिनियम , 1956 (संशोधित अधिनियम 2000) की धारा 3(1) (iv) के अनुसार, “सार्वजनिक कंपनी का आशय एक ऐसी कंपनी से है जो किसी निजी कंपनी नही है तथा जिसकी प्रदत पूंजी कम से कम पांच लाख रूपये अथवा इससे अधिक निर्धारित की गई राशि की है ” | इस परीभाषा से सार्वजनिक कंपनी का आर्थ पूर्णतया स्पष्ट नही होता है अधिनियम की विभिन्न व्यवस्थाओ के अंतर्गत एक सार्वजनिक कंपनी यूज़ माना जाता है जिसमे निम्न विशेषताए विधमान हो –
      • (i) जिसकी प्रदत पूंजी कम से कम पांच लाख रूपये अथवा इससे अधिक निर्धारित की गई रस्शी की है,
      • (ii) सदस्य संख्या न्यूनतम 7 हो अधिकतम की कोई सीमा नही ,.
      • (iii) कंपनी अपने अंशो के हस्तांतरण पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध ण लगाये
      • (iv) कंपनी अपने अंशो व ऋण पत्रों के क्रय के लिये जनसाधारण को आमंत्रित करे |
      • यहाँ पर यह उल्लेखनीय है की जिस सार्वजनिक कंपनी की प्रदत पूंजी पांच लाख रूपये से कम होगी यूज़ कंपनी संशोधन अधिनियम 2000 लागू होने के दो वर्षो के भीतर अपनी प्रदत पूंजी को बढाकर पांच लाख रूपये करना अनिवार्य होगा जो कंपनी निर्धारित अवधि में अपनी प्रदत पूंजी नही बढ़ाएगी यूज़ कंपनी अधिनियम की धरा 560 के अधीन निष्क्रय का कंपनी माना जायेगा और रजिस्टर द्वारा उसका नाम कंपनी में से काट दिया जायेगा



  1. स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण CLASSIFICATION ON THE BASIS OF OWNERSHIP)
    • सरकारी कंपनी :- कंपनी अधिनियम की धारा 617 के अनुसार सरकारी कंपनिया से तात्पर्य उन कंपनियों से है जिनमे कम से कम 51% अंश पूंजी केन्द्रीय साकार या राज्य सरकार या राज्य सरकार अथवा सरकारे या दोनों मिलकर (केंद्रीय या राज्य सरकार) ले लेती है सन 1960 में हुए संशोधन के अनुसार उन कंपनिया को भी सरकारी कंपनिया माना जायेगा जो की उपयुक्त सरकारी कंपनिया की सहायक कंपनिया है |
    • गैर सरकारी कंपनी :- गैर सरकारी कंपनी से आशय उस कंपनी से है जो सरकारी न हो भारत में गैर सरकारी कंपनिया ही अधिक पाई जाती है |
  2. इकाई की स्वतन्त्रता के आधार पर वर्गीकरण  CLASSIFICATION ON THE BASIS OF INDEPENDENCE OF AN UNIT) :- इकाई की स्वतन्त्रता के आधार पर कंपनिया का वर्गीकरण निम्नलिखित तीन भागो में किया जा सकता है |
    1. स्वतंत्र कंपनी :- स्वतंत्र कंपनी से आशय उस कंपनी से है जो अपना कार्य स्वतन्त्रतापूर्वक अकेले ही करती है और किसी अन्य कंपनी के द्वारा नियंत्रित नही होती है |
    2. सहायक कंपनी :-  कंपनी अधिनियम के अंतर्ग्रत एक कंपनी किसी एनी कंपनी की शतक कंपनी निम्नलिखित दशाओ में हो सकती है –
      • (अ) जबकि अन्य कंपनी उसके संचालक मंडल के गठन पर नियंत्रण रखती है ,
      • (ब) जबकि अन्य कंपनी उसकी साधारण अंश पूंजी के अंकित मूल्य में से आधे से अधिक भाग को अपने पास रखती है |
      • (स) जबकि वह किसी ऐसी कंपनी की सहायक है जो की स्वय उस अन्य कंपनी की सहायक है
    3. सूत्रधारी कंपनी – सूत्रधारी कंपनी की परीभाषा :- “कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 4(4) के अनुसार , एक कंपनी को दूसरी कंपनी की सूत्रधारी  कंपनी तभी मन जायेगा जबकि यह दूसरी कंपनी उसकी सहायक है |”
  3. राष्ट्रीयता के आधार पर वर्गीकरण CLASSIFICATION ON THE BASIS OF NATIONALITY ) :- राष्ट्रीयता के आधार पर कंपनिया निम्न दो प्रकार की होती है –
    1.  देशी अथवा राष्ट्रिय कम्पनी :- जो कंपनी केवल उसी देश में व्यवसाय करती है जिसमे इसकी स्थपाना , अथवा पजीकरण हुआ है यूज़ राष्ट्री अथवा देशी कंपनी कहा जाता है उदहारण के लिय भारत कंपनी अधिनियम 1956 नके अंतर्गत रजिस्टर कम्पोअनी देशी कम्पनी कही जाएगी |]
    2. बहुराष्ट्री अथवा विदेशी कंपनी :- इस प्रकार की कंपनी उस देश के अतिरिक्त जिसमे इसका निर्माण हुआ है अन्य देशो में भी व्यवसाय करती है कंपनी अधिनियम , 1956 की धारा 591 के अनुसार जिस कंपनी का सममेलन विदेश में हुआ हो परन्तु जो भारत में व्यवसाय करती है यूज़ विदेशी कंपनी कहा जाता है | कंपनी अधिनियम की धारा 592 से 602 तक इन कंपनियों से सम्बंधित प्रावधान दिए हुए है |








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