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Company An Introduction Corporate law Bcom part 2

Company An Introduction Corporate law Bcom part 2

Company An Introduction Corporate law Bcom part 2

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Company An Introduction Corporate law Bcom part 2
Company An Introduction Corporate law Bcom part 2

कंपनी – एक परिचय

प्राय हम कुछ मित्रो या रिश्तेदारों को आपस में कहते हुए सुनते है की अकेले तो जा नही पायेगे यदि तुम साथ में तैयार हो तो अनेक  स्थान पर (मंसूरी , नैनीताल, कुल्लू मनाली आदि ) घुमने चले चलेगे, अच्छी कंपनी रहेगी | इस प्रकार सामान्य व्यक्ति की द्रष्टि में कंपनी का आशय साथ या सहयोग से है | वस्तुत अंग्रेजी भाषा के कंपनी शब्द की उत्पति लेटिन शब्द कॉम या पेंस के योग से हुई है लेटिन भाषा में कम शब्द का अर्थ साथ साथ से है और पेंस का आशय रोटी से है इस प्रकार प्रारम्भ में कंपनी ऐसे व्यक्ति के संघ को कहा जाता है जो अपना खाना साथ साथ खाते थे इस खाने पर व्यवसाय की बाते भी होती है बाद में कंपनी शब्द का प्र्योग ऐसे व्यक्ति के समूह या संगठन के लिये किया जाने लगा जो किसी सामान्य उदेश्य की पूर्ति के लिये एकत्र होते थे धीरे धीरे कंपनी शब्द का प्रयोग व्यापारिक तथा गैर व्यापारिक दोनों प्रकार के संघठनो के लिये किया जाने लगा |

कंपनी का अर्थ

कंपनी से आशय व्यापारिक संगठन के ऐसे प्रारूप से है जिसकी स्थापना कुछ व्यक्ति द्वारा लाभ कमाने के उद्देश्य से विधान (कानून) के प्रावधानों के अंतर्गत की जाती है सरल शब्दों में कंपनी से आशय व्यक्ति के एक ऐसे समूह से है जिसका एक सामान्य उद्देश्य होता है एंव जिसकी पूंजी हस्तांतरणशील सिमित दायित्व वाले अंशो में विभाजित होती है कंपनी का कारोबार एक सार्वमुद्रा के अधीन संचालित होता है और पंजी कारन के बाद इसका अपना प्रथक स्थायी अस्तित्व हो जाता है कोई भी व्यक्ति कंपनी के ऊपर तथा कंपनी किसी भी व्यक्ति पर अभियोग मुकदमा चला सकती है |

” कम्पनी की परीभाषा “

कंपनी की विभिन्न परिभाशाओ को सुविधा के द्र्श्तिकों से निम्नलिखित दो भागो में विभाजित किया जा सकता है –1 प्रमुख विद्वानों एंव न्यायधिशो द्वारा दी गई परीभाषा तथा 2 कंपनी अधिनियम, 1956 में परध परीभाषा

न्यायाधीश जेम्स के अनुसार, “कंपनी का आशय व्यक्तियों के ऐसे संघ से है जो एक सामान्य उदेश्य के लिये संगठित हुए हो |” (यह परीभाषा शब्द की सही व्याख्य नही करती है )

लार्ड लिंडले के अनुसार : कंपनी व्यक्तियों का समूह है जो की द्रव्य या द्रव्य के बराबर का अंशदान एक स्युन्ख कोष में जमा करते है और इसका प्रयोग एक निश्चित उदेश्य के लिये करते है (यह परिभाषा अपूर्ण है )

अमेरिकन प्रमुख न्यायाधीश मार्शल के अनुसार : स्युन्ख पूंजी कंपनी एक करत्रिम, अद्रश्य तथा अमूर्त संस्था है जिसका अस्त्रत्व वैधानिक होता है और जो विधान द्वारा निर्मित होती है (यह परीभाषा कंपनी की मुख्य विशेषताओ को स्पष्ट करती है अत: इसे सही परीभाषा कहा जा सकता है )

कंपनी अधिनियम , 1956 की धरा में 3(I) के अनुसार :– कंपनी का आशय इस अधिनियम के अन्तर्गत निर्मित एंव पंजीकरत कंपनी अथवा एक विधमान कंपनी से है |

Essentials Characteristics of a Company कंपनी की विशेषताएं या लक्षण –

कंपनी की उपयुक्त परिभाषाओ के अध्ययन एंव विश्लेषण से कंपनी की निम्नलिखित विशेषताए स्पस्ट होती है –

  1.  विधान द्वारा निर्मित क्रत्रिम व्यक्ति (An artificial person Created by Law) : कंपनी राजनियम (कानून) द्वारा निर्मित एक करत्रिम वैधानिक व्यक्ति है प्राकरतिक व्यक्ति की भ्यंती एक कंपनी सभी करी कर सकती है इसलिए इसे व्यक्ति कहा गया है इसे वैधानिक व्यक्ति इसलिए कहा जाता है क्योकि इसकी स्थापना क़ानूनी प्रक्रियाओ द्वारा होती है करत्रिम व्यक्ति इसलिए कहा गया है क्योंकि एक प्रकरतिक व्यक्ति की भांति इसलिए भौतिक उपस्थिति संभव नही है |
  2.  प्रथक वैधानिक अस्तित्व (Separate legal entity) :- कंपनी का अपने अंशधारियो (सदस्यों) से प्रथक वैधानिक अस्तित्व होता है | परिणामस्वरूप कंपनी अपने किसी भी सदस्य के साथ कोई भी अनुबंध कर सकती है एंव सदस्य कंपनी के साथ अनुबंध कर सकते है कंपनी अपने सदस्यों पर मुकदमा चला सकती है और सदस्य भी उस पर मुकदमा चला सकते है इसके अतिरिक्त कंपनी द्वारा किये गये कार्यो  के लिये अंशधारी या सदस्य उतरदायी नही होते है |
  3. स्थाई अस्तित्व (Perpetual Existence) :- कंपनी का अस्तित्व स्थाई होता है अर्थात कंपनी का जीवन इसके सदस्यों के जीवन पर निर्भर नही करता कंपनी के किसी सदस्य की मूल्य, दिवालिये या पागल हो जाने या किसी सदस्य द्वारा कंपनी से अलग अलग होने का कंपनी के अस्तित्व पर  कोई प्रभाव नही पड़ता अर्थात कंपनी निरंतर चलती रहती है वस्तुत कंपनी के सदस्यों में किसी भी प्रकार का कोई भी परिग्वर्तन हो कंपनी का जीवन समाप्त नही होता और वह स्थायी रूप से कार्य करती रहती है |
  4. सार्वमुद्रा (Common seal) :- सार्वमुद्रा का आशय कंपनी के नीआम की मुहर से होता है क्रत्रिम व्यक्तित्व होने के कारन कंपनी स्वय कोई कार्य नही कर सकती क्योंकि इसका कोई भी भौतिक अस्तित्व नही होता कंपनी का कार्य कंपनी के संचालक सचिव व् प्रबंध संचालको आदि के द्वारा किया जाता है और ये व्यक्ति कार्य करते समय कंपनी की मुहर लगा देते है तभी उनके द्वारा किये गये कार्य कंपनी द्वारा किये गये कार्य माने जायेगे और कंपनी ऊनसे बाध्य होगी इस पारकर कंपनी की मुहर कंपनी के हस्ताक्षर है जिन पक्षों प्प्त्रो व प्र्स्विन्दो पर कंपनी की मुहर नही लगी होती है वे कंपनी के नही मान जाते है |
  5. सिमित दायित्व (Limited Liability) :- कंपनी के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा करी किये गये अंशो की राशी तक सिमित होता है कंपनी अंशो द्वारा सिमित या गारंटी द्वारा सिमित हो सकती हाकी अंशो द्वारा सिमित कंपनी की दशा में कंपनी के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा लिये गये अंशो की आदत राशि का भुगतान कर दिया है तो उसका कंपनी के प्रति कोई दायित्व नही रहता गारंटी द्वारा सिमित कम्पनी की दशा में सदस्यों का दयिओत्व उस राशी तक सिमित होता है जो वे (अंशधारी) कंपनी के समापन की दशा में, कंपनी की सम्पतियो में अंशदान करने को सहमत होते है इस प्रकार स्पष्ट है की सदस्यों का दायित्व सिमित होता है , असीमित नही |
  6. प्रतिनिधि प्रबंध व्यवस्था (Representative Management) :- प्राय: कंपनी के अंशधारियो की संख्या बहुत अधिक होती है व दूर-दूर  भी रहते है जिसके कारन प्रत्येक अंशधारी का कंपनी के प्रबंध एंव सञ्चालन में भाग लेना असम्बन्ध होता हा अत: कंपनी का प्रबंध अंशधारियो द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है जिन्हें संचालक कहते है संचालको के अधिकार एंव दायित्व कंपनी के पार्षद अंतनिर्मित के द्वारा निश्चित किये जाते है |
  7. अंशो की हस्तान्त्र्णशीलता (Transfer ability of shares ) :-  सामान्यत: कम्पनी के अंशधारी अपने अंशो का हस्तान्त्र्ण स्वेच्छा से किसी भी व्यक्ति, फर्म या संस्था के पक्ष में कर सकते है जब तक की कम्पनी के पार्षद अंतर्नियम में इसके विपरीत कोई एनी बात ण हो |
  8. कार्यछेत्र की सीमाएं (Limitations of action) :- एक कंपनी अपने पार्षद सिमानियम तथा पार्षद अन्त्र्नियामो के बधार कार्य नही कर सकती है इसका कार्य छेत्र कंपनी अधिनियम तथा इसके सिमानियम व अंतर्नियम द्वारा सिमित होता है |
  9. अंशधारी एजेंट नही (Shareholders are not agent) :- कंपनी की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है की इसके अंशधारी कंपनी के एजेंट के रूप में कार्य नही कर सकते अर्थात अंशधारी अपने कार्यो से कम्पनी को बाध्य नही कर सकते है |
  10. सदस्यों की संख्या (Number of members) :- एक सार्वजनिक कम्पनी में सदस्यों की न्यूनतम संख्या सात होती है तथा अधिकतम संख्या पर कोई प्रतिबंध नही होता अर्थात यह निर्गमित अंशो की संख्या के बराबर तक हो सकती है इसके विपरीत एक व्यक्तिगत यह निर्गमित अंशो की संख्या के बराबर तक हो सकती है इसके विप्रिक, एक व्यक्तिगत या निजी कंपनी में सदस्यों की न्यूनतम संख्या दो या अधिकतम संख्या पचास तक हो सकती है |
  11. कंपनी का समापन (Winding up of a company) :- जिस प्रकार एक कंपनी का निर्माण अधिनियम के द्वारा होता है उसी पारकर इसकी समाप्ति भी कंपनी अधिनियम में वर्णित समापन की विधियों के द्वारा ही हो सकती है |
  12. लाभ के लिये अछिक संध(Voluntary Association for profit) :- सामान्यत: प्रत्येक कंपनी की स्थापना का लाभ कमाने के उदेश्य से की जाती है परन्तु यह एक ऐच्छिक संघ है अर्थात किसी को जबरदस्ती इसका अंश्दाहरी नही बनाया जा सकता | कंपनी को जो भी प्राप्त होता है , वह निश्चित नियमो के अनुसार अंशधारियो में बात दिया जाता है |
  13. अभियोग चलने का अधिकार(Right to sue) :- कंपनी एक वैधानिक व्यक्ति है अर्थात, कंपनी की साडी कार्यवाही उसके नाम में ही होती है किसी अनुचित दायित्व से बचने के लिये तथा अपने अधिकार या सम्पति की रक्षा करने के लिये कंपनी को अपने नाम से दुसरो पर वाद प्रस्तुत करने का अधिकार है |

क्या परीक्षा केंद्र पर एकत्रित हुआ विधार्थियों का समूह एक कंपनी है ?

परीक्षा केंद्र पर एकत्रित हुए विधार्तियो के समूह को कंपनी नही कहा जा सकता है क्योकि लाभ के लिये विधान द्वारा व्यक्तिओ के समूह को ही कंपनी कहा जा सकता है जिसमे उपयुक्त वर्णित कंपनी की विशेषताए विधमान हो परीक्षा केंद्र पर एकत्रित विद्यार्थियो के समूह में कंपनी हेतु वर्णित वांछित विशेस्ताये पूरी नही हो रही है इसलिए उस विद्यार्थियो के समूह को कंपनी नही कहा जायेगा |

PRINCIPLE OF COMPANY.CORPORATE VEIL कंपनी/निगम आवरण सिधांत –

कंपनी विधान द्वारा निर्मित व्यक्तिओ का एक संघ है लेकिन सममेलन के पश्चात कंपनी और उसके सदस्यों के बगिच एक आवरण अथवा पर्दा खड़ा हो जाता है जो कंपनी  को उसके सदस्यों से अलग अलग करता है एंव उसके पर्थक अस्तित्व को वैधानिक रूप प्रदान करता है कंपनी का अपना नाम होता है और उसके नाम की प्रथक सार्वमुद्रा होती है जो उसके अस्तित्व का प्रतीक होती है कंपनी अपने सदस्यों के विरुद्ध वाद प्रस्तुत कर सकती है और सदस्य कंपनी के विरुद्ध वाद प्रस्तुत क्र सकते है कंपनी के प्रथक अस्तित्व का लक्षण सालोमन बनम सालोमन एंड कंपनी (1897) के विवाद से पूर्णत: स्पस्ट हो जाता है सालोमन जूतों का व्यापारी ठ उसने अपना कारोबार सालोमन एंड कंपनी को 30,      000 पोंड में बेच दिया | इस कंपनी का निर्माण भी स्वयं सालोमन द्वारा ही किया गया ठ प्रस्तुत कंपनी की अधिक्रत पूंजी 40,000 पोंड थी इस कंपनी में 7 सदस्य निम्न प्रकार थे स्वय सालोमन उसकी पत्नी चार लड़के और एक लड़की इस पारकर ये सभी स्वय सालोमन परिवार के ही सदस्य थे सालोमन ने इस कंपनी के बीस हजार पोंड के अंश स्वय खरीदे तथा एक एक अंश परिवार के प्रत्येक सदस्य को दे दिया इसके अतिरिक्त सालोमन ने दस हजार पोइंद के ऋण पत्र भी लिये जिन पर कंपनी की सम्पति गिरवी राखी गई थी बाद में कंपनी में हड़ताल प्रारंभ होने के कारन हानि होने लगी जिसका परिणामस्वरूप कंपनी का समापन कंपनी की सम्पति के वीर्य से 6,000 पोंड मिले कंपनी के 7,000 पो९इन्त के एनी रिन्दता भी थे जिनके ऋण पूर्णत: असुरक्षित थे समापन के समय कुल देनदारियो 17000 पॉइंट (10000 पॉइंट के ऋण पत्र स्वय सालोमन के पास थे जिसके पीछे कंपनी की सम्पति जमानत के रूप में राखी हुई थी तथा 7000 पोंड के असुरक्षित बहार के रिन्दता थे की थी समापन के समय असुरक्षित लेनदारो से पूर्व होना चाहिए इस विवाद में न्यानाली द्वारा यह निर्णय दिया गया की सालोमन तथा सालोमन एंड कम्पनी दोनों अलग अलग है इसलिए सालोमन एनी असुरक्षित लेनदारो के अपेक्षा अपने ऋण पत्रों की रकम पहले प्राप्त करेगा |

EXCEPTIONS OF THE PRINCIPLE OF COMPANY/CORPORATE VEIL (कंपनी/निगम आवरण सिधांत के अपवाद )

कभी कभी कंपनी के सदस्य तथा संचालक कंपनी के नाम से पर्दे में रहकर कपटपूर्ण कार्य करते है रिन्दताओ के साथ अन्याय करते हियो राष्ट्री हितो की आव्हेलना करते है अथवा लोक निति एंव न्याय के विरुद्ध कोई ऐसा कार्य करते है जिसे क्प्त्मी अनुचित्र दमनकारी एंव अवैधानिक कहा जा सकता है ऐसी स्थिति में न्यायालय कंपनी के कार्यकलाप की जाँच पड़ताल क्र सकता है एंव दोषी व्यक्ति को उतरदायी थराने के लिये कंपनी और उसके अंशधारियो को प्रथक नही मन जाता है बल्कि दोनों को एक ही मन जाता है इस परिस्थिति को ही सममेलन का आवरण या पर्दा उठाना अथवा ब्न्काब करना कहते है यही परिशितियो कंपनी निगम आवरण सिधांत के अपवाद कही जाती है |

मुख्यत: निम्नलिखित प्रिशितियो में कंपनी या निगम के आवरण का बेधन हो सकता है –-

  1. कपट एंव अनुचित व्यवहार की दशा में – यदि कोई कंपनी किसी कपटपूर्ण अथवा अनुचित व्यवहार के लिये स्थापित की जाती हसी तो न्यायालय कंपनी के प्रथक अस्तित्व की उपेक्षा क्र सकता है अर्थात कंपनी एंव उसके सदस्य एक ही मान जायेगे |
  2. कर दी चोरी के लिये कंपनी की स्थापना करना – यदि किसी कंपनी को स्थपना करो (taxes) से बचने के लिये की गई है तो न्यायालय सममेलन के आवरण को हटाकर कंपनी के कर-दायित्वों को सदस्यों का दायित्व घोषित क्र देगा अर्थात कंपनी का अलग अस्तित्व नही माना जाता |
  3. कंपनी का सदस्यों के लिये प्रन्यासी या एजेंट की तरह कार्य करना –  यदि कोई कंपनी अपने अंशधारियो के लिये अभिकर्ता (Agent) या प्रन्यासी (Trustee) के रूप में कार्य कर रही है तो जिस प्रकार एजेंट के कार्य के लिये उसका नियोक्ता उतरदायी होता है उसी प्रकार अंशधारी भी कंपनी के कार्य के ल इए उतरदायी होगे|
  4. विनिम्य्सध्य विलेखो पर व्यक्त्गत हस्ताक्षरों की दशा में –  यदि किसी विनिम्य्सध्य विलेख चैक , प्रतिज्ञा-पत्र , विनिमय पत्र ) आदि पर कंपनी के किसी व्यक्ति ने केवल अपने हस्ताक्षर किये हो किन्तु कंपनी की सार्वमुद्रा न लगाई हो तो ऐसी दशा में हस्ताक्षरकरता व्यक्तिगत रूप में उतरदायी तेहराया जा सकता है न्यायालय को कंपनी के प्रथक अस्तित्व के सिधांत को स्वीकार करने के लिय बाध्य नही किया जा सकता है
  5. अधिकारों के बहार कार्य करने की दशा में – यदि कंपनी के संचालक अपनी अधिकार सीमा से बहार कार्य करते है तो उन कार्यो के लिये वे व्यक्तिगत रूप से एंव सामूहिक रूप में उतरदायी ठहराय जा सकते है |
  6. प्रविवरण में मिथ्या कथन की दशा में – यदि कंपनी प्रविवरण में मिथ्या कथन है और किसी व्यक्ति ने अंशो का करी इस मिथ्या कथन पर विश्वास करके किया है तो हानि होने पर ऐसा व्यक्ति कंपनी के संचालको , पर्वतर्को  अथवा अन्य दोषी  व्यक्तियों को व्यक्तिगत रूप से उतरदायी ठहरा सकता है जो की ऐसे प्रविवरण के निर्गमन के लिये उतरदायी है |
  7. कंपनी का नाम ठीक से या पूरा नाम प्रकटण किये जाने पर –  यदि किसी अनुबंध में कंपनी का नाम पूरी तरह प्रकट नही किया गया है तो अनुबंध कंपनी के नाम में होने पर बी व्ही व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से उतरदायी माने जाते है जिन व्यक्तियों ने वह अनुबंध किया है |

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