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Bcom Business Management Decision Making Concepts and Process Notes

Bcom Business Management Decision Making Concepts and Process Notes

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Decision Making Concepts Process
Decision Making Concepts Process

निर्णयन : अवधारणा एवं प्रक्रिया [Decision-Making : Concepts and Process]

 

प्रश्न 12, निर्णयन से क्या आशय है ? निर्णयन का महत्त्व एवं तकनीकें बताइये।

(Agra, 2011)

अथवा

निर्णयन से आप क्या समझते हैं ? निर्णयन का महत्त्व बताइये।

उत्तर

निर्णयन का अर्थ एवं परिभाषाएँ (MEANING AND DEFINITIONS OF DECISION-MAKING)

निर्णयन का शाब्दिक अर्थ अन्तिम परिणाम पर पहँचने से लगाया जाता है, जक कहारिक दृष्टि से निर्णयन का अर्थ एक ऐसी प्रक्रिया से लिया जाता है दिल द्वारा किसी वांछित परिणाम की प्राप्ति हेतु सजगतापूर्वक सर्वोत्तम विकल्प का किया जाता है। इस प्रकार निर्णयन से आशय विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प को चुनने की बौद्धिक क्रिया से है। इसकी कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार है |

वेबस्टर शब्द कोष के अनुसार, “निर्णय लेने से आशय अपने मस्तिष्क में स- या कारवाही के तरीके के निर्धारण से है।”

टैरी के अनुसार, “निर्णयन किसी कसौटी पर आधारित दो या दो से अधिक सम्भावित विकल्पों में से एक का चयन है।”

मेक्फारलैण्ड के अनुसार, “निर्णयन एक चयन क्रिया है जिसके अन्तर्गत एक अधिशासी दी हुई परिस्थिति में इस निर्णय पर पहुँचता है कि क्या किया जाना चाहिए। निर्णय चयनित व्यवहार का प्रतिनिधित्व करता है जिसका चयन अनेक सम्भावित विकल्पों में से किया जाता है।”

ऐलन के अनुसार, “निर्णयन वह कार्य है जिसे एक प्रबन्धक किसी निष्कर्ष और निर्णय पर पहुँचने के लिए करता है।”

निर्णयन की उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि निर्णयन या निर्णय लेना एक ऐसी क्रिया है जिसके द्वारा किसी कार्य को करने के सम्भावित विकल्पों में से किसी एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन किया जाता है, एवं यह चयन कुछ मापदण्डों (Criteria) पर आधारित होता है।

निर्णयन का महत्त्व (IMPORTANCE OF DECISION MAKING)

निर्णयन प्रबन्ध का प्राथमिक कार्य है। निर्णयन प्रबन्ध की आत्मा, सार व मूल है। निर्णयन को ए० एच० साइमन ने प्रबन्ध का पर्यायवाची बताया है। यदि प्रबन्धकीय प्रक्रिया से निर्णयन को पृथक् कर दिया जागे तो निश्चय ही प्रबन्ध निर्जीव हो जायेगा। एक प्रबन्ध जो कुछ भी करता है वह निर्णयन के द्वारा ही करता है और उसका सम्पूर्ण जीवन निर्णयन में ही गुजरता है। जॉन मैकडोनाल्ड (John McDonald) ने तो इस सम्बन्ध में एक बहुत ही सरल, संक्षिप्त परन्तु उपयुक्त वाक्य का प्रयोग किया है कि, “व्यावसायिक प्रबन्धक एक पेशेवर निर्णय लेने वाला व्यक्ति होता है।’ निर्णयन की महत्ता को निम्नलिखित बिन्दुओं से और स्पष्ट किया जा सकता है

(1) निर्णयन समस्त प्रबन्धकीय कार्यों का मर्म (Core) हैनिर्णयन के बिना तो प्रबन्ध का कोई भी कार्य, जैसे—नियोजन, संगठन, स्टाफिंग, निर्देशन, नियन्त्रण, समन्वय सम्पन्न ही नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिये, संगठन के सम्बन्ध में उसके ढाँचे, अधिकार सम्बन्ध, कार्य-विभाजन, अधिकार का प्रतिनिधायन व विकेन्द्रीकरण आदि बिना निर्णयन के सम्भव ही नहीं हो सकता। अर्नेस्ट डेल ने उचित ही कहा है कि, “प्रबन्धकीय निर्णयों से आशय उन निर्णयों से है जो कि सदैव सभी प्रबन्धकीय क्रियाओं जैसे—नियोजन, संगठन, नियन्त्रण, निर्देशन, कर्मचारियों की भर्ती, नव-प्रवर्तन तथा प्रतिनिधित्व के दौरान किये जाते हैं।”

(2) निर्णयन का सम्बन्ध साधन (Means) अथवा साध्य (End) अथवा दोनों से हो सकता हैकुछ दशाओं में विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये प्रबन्धक यह निर्णय लेता है कि साधन कौन सा सर्वोत्तम होगा। कभी-कभी तो प्रबन्धक साध्य अर्थात् लक्ष्य ही निर्धारित करते हैं। अन्य दशाओं में प्रबन्धक विचार-विनिमय तथा विश्लेपण करके साधन और साध्य दोनों को निर्धारित करने हेतु निर्णय लेता है।

(3) नीति-निर्माण में निर्णयन की भूमिका- एक प्रबन्धक का लक्ष्य पूल हेतु नीति निर्माण एवं क्रियान्वयन करना पड़ता है। विभिन्न विभागों एवं उप-विभागों के नीति निर्माण और कार्य निष्पादन करने के लिये भी प्रबन्धकों को आनवायतः निर्णय लेने पड़ते हैं।

(4) कार्यकुशलता मूल्याँकन का आधार- प्रबन्धकों द्वारा लिये गये निणय से ही यह मालूम किया जाता है कि उन्हें स्थिति का वास्तविक ज्ञान है कि नही, ह तो कितना, वे समस्या की तह तक पहुँच पाते हैं कि नहीं। वर्तमान प्रतिस्पद्धों के युग म अगर प्रबन्धक निर्णय में त्रुटि करे या विलम्ब करे तो संस्था की कुशलता कुप्रभावित होती है। निर्णयन तो कुशल प्रबन्ध की कसौटी होती है। अच्छे निर्णय के लिय प्रबन्धक को पुरस्कार और खराब निर्णय के लिये दण्डित किया जाता है।

(5) परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के लिये तीव्र परिवर्तन तो इस 21वा शताब्दी का मोलिक लक्षण हो गया है। प्रबन्धक को परिवर्तन से घबराना नहीं चाहिये बल्कि उससे लाभ लेने के लिये विवेकपूर्ण निर्णयन करना चाहिये। परिवर्तनों की चुनौती का सामना करने हेतु नीतियों, कार्यपद्धतियों, कार्यक्रमों, रणनीतियों में परिवर्तन के निर्णय प्रबन्धक को लेने पड़ते हैं।

(6) सार्वभौमिकता एवं व्यापकतानिर्णयन तो सभी प्रकार के संगठनों और क्रियात्मक क्षेत्रों जैसे उत्पादन, विपणन, वित्त, सेविवर्गीय, लेखांकन आदि के सम्बन्ध में समान रूप से उपयोगी है। इसकी सार्वभौमिकता और व्यापकता के कारण इसका महत्त्व बढ़ता जा रहा है।

(7) जोखिम को सीमित करने के लिये- सुदृढ़ निर्णय तथ्यों एवं सूचनाओं के आधार पर पूर्ण विवेक से लिये जाते हैं। इससे प्रबन्धकों के निर्णय अधिक विश्वसनीय हो जाते हैं तथा व्यवसाय की जोखिम को सीमित किया जा सकता है।

(8) संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक- संस्था के संसाधनों का कुशल उपयोग करके ही संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है। प्रबन्धक यथासमय निर्णय लेकर व्यावसायिक अवसरों का समुचित लाभ उठा पाते हैं और संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति कर लेते हैं।

अतः स्पष्ट है कि निर्णयन प्रबन्ध की सफलता के लिये परमावश्यक है। यह सम्पूर्ण संस्था की सफलता एवं अस्तित्व के लिये अनिवार्य कार्य है।

प्रश्न 13, निर्णयन से आप क्या समझते हैं ? निर्णयन प्रक्रिया क्रम का वर्णन कीजिये।

(Garhwal, 2008 BP)

अथवा

निर्णय लेने की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं। निर्णय प्रक्रिया में शामिल मुख्य चरणों अथवा अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।

(Avaan, 2007)

अथवा

निर्णयन से आपका क्या तात्पर्य है? निर्णयन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिये।

(Bundelkhand, 2011)

अथवा

निर्णयन प्रबन्धक का प्राथमिक कार्य है।” समीक्षा कीजिए और वैज्ञानिक निर्णयकरण विधि को स्पष्ट कीजिए।

(Rointliani Barielly, 2009)

अथवा

निर्णयन का क्या महत्त्व है? इसकी विधि को विस्तार से समझाइए।

Garhwal, 2011

उत्तर-

निर्णयन की प्रक्रिया (PROCESS OF DECISION-MAKING)

निर्णयन की प्रक्रिया को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया जा सकता है –

(I) एम्परागत प्रक्रिया (Traditional Process)- निर्णयन की यह प्रक्रिया लक्षाणात्मक निदान के ढंग (Method of Symptomatic Diagnosis) पर आधारित है। जिस प्रकार प्राचीन समय में चिकित्सक अपने अनुभव और सहजद्धि (Experience and Intuit1(17) के आधार पर रोगों के कुछ निश्चित लक्षण ज्ञात करके उनके आधार पर इलाज किया करते थे, ठीक उसी प्रकार व्यावसायिक प्रबन्धक अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर ही सम्बन्धित प्रबन्धकीय समस्या को हल करने का निर्णय ले लेते है। परम्परागत विधि के अनुसार जो भी निर्णय लिये जाते है वे प्रबन्धकों के सीमित ज्ञान, अनुभव एवं अनुमान पर ही आधारित होते है।

(I) वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण प्रक्रिया (Scientific and Rational Process)- निर्णय को वैज्ञानिक प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रबन्धक निर्णय लेने में जल्दबाजी नहीं करते, वरन् एक निश्चित क्रम से निर्णय तक पहुंचते हैं।

यद्यपि विभिन्न विद्वानों ने निर्णयन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का वर्णन किया है, परन्तु सार रूप में निर्णयन प्रक्रिया के प्रमुख कदम निम्नलिखित हैं

1, समस्या की व्याख्या करना (Defining the Problem)— निर्णय लेने की वैज्ञानिक प्रक्रिया में सबसे पहला कदम समस्या के स्वरूप को समझना होता है। समस्या के स्वरूप तथा उसकी प्रकृति को समझे बिना उसके बारे में निर्णय कर लेना उसी भाँति हानिकारक सिद्ध हो सकता है जिस प्रकार किसी डॉक्टर द्वारा बिना रोग पहचाने दवा दे देना। जिस प्रकार एक बीमारी का भली प्रकार परीक्षण उसका आधा निदान माना जाता है, ठीक उसी प्रकार समस्या को भली प्रकार समझना भी उसके सही समाधान की ओर अग्रसर होना है। अतः यह कहा जा सकता है कि निर्णयन-प्रक्रिया के इस कदम पर समस्या को सही-सही रूप में समझना चाहिए!

उदाहरण के लिए, यदि किसी कम्पनी में कुल विक्रय की मात्रा गिरने लगे तो स्पष्टतः इसका बाहरी कारण उच्च विक्रय मूल्य ही समझा जायेगा, क्योंकि माँग क नियम के अनुसार मूल्य ऊँचे होने पर ही माँग गिरती है, परन्तु विक्रय में कमी का कारण वस्तु की किस्म में गिरावट या विक्रय प्रयासों में शिथिलता भी हो सकती है। समस्या के वास्तविक स्वरूप को समझे बिना यदि प्रबन्धकगण विक्रय-वृद्धि हेतु वस्तु-मूल्य घटाने का निर्णय ले लेते हैं तो लाभ के स्थान पर हानि की आशंका हो सकता है। अतः निर्णय लेने की बजानिक पद्धति के अनसार पहले पबन्धका का समस्या के सही स्वरूप को समान का प्रयास करना चाहिए।

2, समस्या का विश्लेषण करना (Analysing the Problem)- समस्या के स्वरूप को निर्धारित करने के बाद दूसरा कदम समस्या का गहन विश्लेषण करना होता है। समस्या का विश्लेषण निम्न तथ्यों की जानकारी के लिए किया जाता हैं- (i) निणय किसे लेना है? (ii) निर्णय लेने हेतु किन-किन व्यक्तियों से परामर्श लेना है? (iii) निर्णय किसे तरह लेना है? (iv) निर्णय लेने के लिए किन सचनाओं की आवश्यकता होगी? (v) निर्णय लेने के उपरान्त उसकी सचना किन किन को देनी है? आदि।

निणय- प्रक्रिया के इस स्तर पर उपर्यक्त उद्देश्यो की पर्ति हेत समस्या को अनेक छोट-छाट हिस्सो विभाजित किया जाता है और प्रत्येक भाग का व्यापक अध्ययन किया जाता है। किसी समस्या के विश्लेषण में समस्त सम्बन्धित तथ्यों की प्राप्ति पर अधिक बल नहीं देना चाहिए, जो तथ्य उपलब्ध न हों, उनके सम्बन्ध में अनुमान से काम लेना चाहिए।

3, सम्भावित विकल्पों का निर्धारण एवं विकास करना (Determining and Developing Possible Alternatives) – निर्णय प्रक्रिया के तीसरे चरण पर सम्भावित विकल्पों का निर्धारण एवं विकास का कार्य किया जाता है। किसी समस्या का एक समाधान न होकर अनेक समाधान हो सकते है। उदाहरण के लिए, यदि किसी उपक्रम में घिसी हुई तथा अप्रचलित मशीनरी के प्रयोग के कारण विक्रय की मात्रा निरन्तर घटती जा रही है, तो ऐसी परिस्थिति का सामना करने के लिए अनेक वैकल्पिक हल हो सकते है: जैसे—(1) पुराने संयन्त्रों को प्रतिस्थापित करके नवीन व आधुनिक संयन्त्रों को उपयोग में लाना, (ii) किसी अन्य निर्माता को (जहाँ आधुनिकतम मशीनें लगी हों) निज के लिए उत्पादन का ठेका देना, (iii) उत्पादन-कार्य को पूर्णतः स्थगित कर देना, आदि। अतएव सर्वोत्तम समाधान की प्राप्ति के लिए जितने भी विकल्प सम्भव हो सकते हैं, उन्हें मालूम किया जाना चाहिए, परन्तु किसी भी समस्या के समस्त वैकल्पिक हलों पर विचार करना न तो सम्भव ही है और न व्यावहारिक ही। अत: इस सम्बन्ध में ‘सीमितता के घटक सिद्धान्त’ का पालन करना चाहिए।

4, वैकल्पिक समाधानों का मूल्यांकन करना (Evaluation of Alternative Solutions)— निर्णय-प्रक्रिया के इस चरण में किसी समस्या के वैकल्पिक समाधानों का विभिन्न दृष्टिकोणों से मूलांकन किया जाता है। इस स्तर पर वास्तव में प्रबन्ध यह देखता है और पूर्वानुमान करता है कि यदि किसी विकल्प विशेष को काम में लिया जाये तो उसके ये परिणाम होंगे। स पर इतना खर्च होगा। उसके लिए इतने अमिनो की आवश्यकता होगी। उसके लिए इतनी पूंजी की जरूरत होगी। उस पर क्या सरकारी प्रतिबन्ध है। उसके लिए किन साधनों व सूचनाओं की आवश्यकता होगी और प्रतिस्पर्धी अमुक कदम उठायेंगे। संक्षेप में, निर्णय प्रक्रिया के इस चरण पर प्रत्येक वैकल्पिक समाधान को लागू करने से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। वैकल्पिक समाधानों के मूल्यांकन का कार्य एक जटिल कार्य है। अतः यह कार्य समस्या की व्याख्या और विश्लेषण करने वाले योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों को ही सौंपा जाना चाहिए।

5, सर्वश्रेष्ठ हल या विकल्प का चयन करना (Selection of the Best Solution)– निर्णयन-प्रक्रिया के इस चरण पर विभिन्न विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव किया जाता है। सामान्यतया सर्वश्रेष्ठ विकल्प उसे माना जाता है जो सभी दृष्टि से व्यावहारिक, स्वीकार्य एवं संस्था के लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक होता है।

6, निर्णय को क्रियान्वित करना (Implementing the Decision) – आधुनिक समय में निर्णय को कार्यान्वित करना और उसका अनुसरण करना भी निर्णय प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग माना जाने लगा है। कोई भी निर्णय उसी दशा में सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया जा सकता है, जबकि सभी सम्बन्धित व्यक्ति उसे अपना निर्णय समझें। इसके लिए यह आवश्यक है कि निर्णय से प्रभावित होने वाले व्यक्तियों को भी निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाये। ऐसा करने से लिया गया निर्णय सम्बन्धित व्यक्तियों की आलोचना का विषय नहीं बन पाता, अपितु उनमें उत्तरदायित्व की भावना का विकास करता है।

निर्णयन प्रक्रिया किसी समस्या पर निर्णय लेने और उसे लागू कर देने से ही समाप्त नहीं हो जाती, अपितु निर्णय के प्रभावों की जानकारी तक विस्तृत होती है। यदि निर्णय को लागू करने पर यह महसूस किया जाता है कि लिया गया निर्णय गलत एवं अव्यावहारिक है, तो प्रबन्धकों को समस्या पर पुनः विचार करना चाहिए और निर्णय में आवश्यक संशोधन करना चाहिए। गलत निर्णय पर पुनः विचार करके उसमें आवश्यक संशोधन करना प्रबन्धकों की प्रतिष्ठा में कोई कमी नहीं करता, अपितु उनकी बुद्धिमता का परिचायक होता है। संक्षेप में, निर्णय को क्रियान्वित करने हेतु निम्न प्रक्रिया अपनानी होती है –

(i) निर्णय की सूचना उन कर्मचारियों को दी जानी चाहिए जिनको कि इसे क्रियान्वित करना है।

(ii) क्रियान्वयन हेतु आवश्यक साधन उपलब्ध कराये जाने चाहिएँ।

(iii) निर्णय के क्रियान्वयन पर निरन्तर दृष्टि रखनी चाहिए तथा समय-समय पर प्रगति का मूल्यांकन करते रहना चाहिए।

(iv) निर्णय गलत एवं अव्यावहारिक होने की दशा में प्रबन्धकों को समस्या पर पनः विचार करना चाहिए और निर्णय में आवश्यक संशोधन करना चाहिए।

प्रश्न 14, निर्णयन कभी भी तर्कपरक नहीं हो सकता।समीक्षा कीजिय।

अथवा

परिबध्द, विवेकशीलना अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।

उतर- विवेकपूर्ण निर्णय का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Detonation of Rational Decision)-व्यवस्थित, तर्कपूर्ण, समन ज्ञान एवं जानकार के चार पर लगाये निर्णय विवेकपूर्ण निर्णय कहलाते है। दसरे शब्दो में पनिट ढग से लिया गया निर्णय जा सीमित संसाधनों से इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक होता है, विवेकपूर्ण निर्णय कहलाता है।

स्टीनर (Steiner) के अनुसार, “विवेक पूर्ण व्यावसायिक निर्णय वह है जो उन ल-सा का प्रभावणं एवं दक्षतापूर्ण प्राप्ति को सनिश्चित करते है जिनके लिए संसानों का चयन किया गया है।”

हर्बर्ट साइमन के अनुसार, “किसी भी प्रशासनिक निर्णय का सही होना एक सालिक बात है,–यह तभी औचित्यपूर्ण होता है, जबकि यह अपने निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उपयुक्त साधनों का चुनाव करता है।”

निष्कर्ष- विवेकपूर्ण निर्णय से आशय उपलब्ध संसाधनों एवं सीमाओं के अन्तर्गत व्यवस्थित, तर्कपूर्ण ढंग से तथा पूर्ण जानकारी के आधार पर सम्यक् निर्णय प्रक्रिया के द्वारा लिये गये निर्णय से है।

पूर्ण विवेकशील निर्णयन की मान्यताएँ/शर्ते (Assumptions/Conditions of Perfect Rational Decision)

कोई भी निर्णय तभी पूर्ण विवेकशील माना जायेगा, जबकि वह निम्नलिखित मान्यताओं शतों को पूरा करता हो –

1, जब निर्णयकर्ता की सोच पूरी तरह से तर्कपूर्ण हो।

2, सम्बन्धित निर्णय पूर्ण तथ्यों पर आधारित एवं सत्यता की जाँच करने के बाद लिया गया हो।

3, जब निर्णयकर्त्ता पूर्णतः निष्पक्ष हो तथा वह भावनाओं एवं किसी व्यक्ति के प्रभाव से प्रेरित न हो।

4, जब निर्णयकर्ता के पास निर्णय से सम्बन्धित सभी सूचनाएँ पूर्ण रूप से उपलब्ध हों।

5, निर्णयकर्ता को निर्णयन से सम्बन्धित समस्या की पूर्ण एवं स्पष्ट जानकारी

6, निर्णयकर्ता को लक्ष्यों की पूर्ण एवं स्पष्ट जानकारी हो।

7, निर्णयकर्ता को समस्या के सभी सम्भव विकल्पों की पूर्ण जानकारी होने के साथ-साथ उक्त विकल्पों के सम्भावित परिणामों एवं प्रभावों की भी जानकारी होनी चाहिए।

8, निर्णयकर्ता को विभिन्न विकल्पों के वरीयता क्रम की जानकारी हो।

9 पर्याप्त समय एवं वांछित संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों।

10, उक्त निर्णय अधिकतम लाभ या मितव्ययी परिणाम प्राप्त होना चाहिए।

सीमित/परिबध्द विवेकशीलता Bounded Rationality

अथवा

पूर्ण विवेकशील निर्णयन की सीमाएँ (Limitations of Perfect Rational Decision-making)

परम्परागत प्रबन्धशास्त्रियों के अनुसार प्रबन्धकीय निर्णय सर्वथा/पूर्ण विवेकपूर्ण हाने चाहिएँ, पन्तु वास्तविक जगत मे पूर्ण विवेकशीलता से निर्णय करना कदिन ही नहीं असम्भव भी है। पूर्ण विवेकशील निर्णयन को निम्नलिखित सीमाएं है –

1, ज्ञान का अभाव (Lack of Knowledge)- निर्णय लेने वाले को प्राय: समस्या से सम्बन्धित सभी तथ्यों को सम्पूर्ण जानकारी नहीं होती। इसलिए निर्णय लेने में विज प्रयोग करन सदैव सम्भव नहीं होता।

2, अनिश्चितता (Uncertainty) – निर्णय भविष्य के लिए किये जाते हैं एवं भविष्ट अनिश्चित है तथा इसकी सही जानकारी नहीं होती। अत: निर्णय लेते समय अनमान लाना पड़ता है तथा मान्यताओ ( Assumptions) का प्रयोग किया जाता है जो शत-प्रतिशत सही नहीं होते।

, समय की कमी (Shortage of Time)- प्रबन्धकों को अनेक बार तुरन्त निर्णय लेने पड़ते है। आंकड़े इकट्टे करना तथा जाँच पड़ताल करने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता। समय के अभाव में विवेक के अतिरिक्त व्यक्तिगत सोच का सहारा लेना पडत है

4, लागत की सीमा (Cost Constraint)- कुछ निर्णय ऐसे होते हैं कि उनके लिए तथ्य एकत्रित करने आदि में काफी व्यय होता है। व्यय को कम करने के लिए विस्तृत जांच-पड़ताल नहीं की जाती तथा निर्णय पूरी तरह तर्कसंगत नहीं होते।

5, मानवीय कमजोरी (Human Limitations)— निर्णय लेने वाला व्यक्ति प्रायः अपने दृष्टिकोण तथा स्वार्थ को महत्व देता है। वह पूरी तरह भेदभाव रहित नहीं होता। उसक स्वाधं व दृष्टिकोण उसके विवेक को प्रभावित करते हैं।

उपरोक्त सीमाओं के विवेचन से स्पष्ट होता है कि पूर्ण विवेकशील निर्णय का अदर्श अनेक लोमाओं से घिरा हुआ है। अत: वास्तविक जीवन में सीमित/परिबध्द विवेकशीलता (Bounded Rationality) के आधार पर ही निर्णय किये जा सकते हैं। हरबर्ट साइमन के अनुसार पूर्ण विवेकशील निर्णयन सदा सम्भव नहीं है, वास्तव में प्रबन्धक संतोषप्रद (Satisficing) निर्णय लेते हैं न कि अधिकात्मक (Maximising) निर्णय साइमन के अनुसार, कोई भी व्यक्ति केवल सीमित/परिबद्ध विवेकशीलता के आधार्क पर ही कार्य कर सकता है |

सीमित/परिबद्ध विवेकशीलता से आशय है कि

(i) निर्णय सदैव समस्या की प्रकृति की अपूर्ण एवं अपर्याप्त समझ पर आधारित होंगे।

(ii) समस्त सम्भावित वैकल्पिक समाधानों की खोज सम्भव नहीं हो सकेगी।

(iii) विकल्पों का मूल्यांकन सदैव अपूर्ण होगा, क्योंकि प्रत्येक विकल्प क सभी सम्भावित परिणामों का पूर्वानुमान कर सकना सम्भव नहीं होता है।

(iv) अन्तिम निर्णय किसी “मापदण्ड पर आधारित होगा, लाभ के अधिकाधिकरण पर नहीं, क्योंकि यह निर्धारण करना असम्भव होता है कि कौन-सा विकल्प ‘श्रेष्ठ’ है।

हरबर्ट साइमन के अनुसार, हमारा वास्तविक निर्णयन व्यवहार उतना विवेकपूर्ण नहीं होता है जितना हम मान लेते हैं।

कुण्ट्ज एवं डोनेल (Koontz and O’Donnell) के अनुसार, “प्रबन्धक को सीमित विवेक से कार्य करना चाहिए। इसको ‘चारदीवारी वाला विवेक’ भी कहते हैं अर्थात् अपनी सीमा में सीमित रहने वाला विवेक। व्यवहार में पूर्ण विवेक के लिए अत्यधिक सीमाएँ लगाई हुई हैं इस कारण यह आश्चर्य की बात नहीं होगी, यदि प्रबन्धक कभी-कभी जोखिम की नापसन्दगी बिना जोखिम के कार्य करने के सिद्धान्त का श्रेष्ठ हल निकालने के लिए अनदेखा कर दे। हरबर्ट-ए-साइमन ने इसे “सैटिस-फिसिंग” (satisficing) शब्द से सम्बोधित किया है। इसका अर्थ दी हई परिस्थितियों में ऐसा मार्ग बनाना जो संतोषजनक अर्थात् पर्याप्त रूप में उचित हो। यद्यपि यह सच है कि बहुत से प्रबन्धकीय निर्णय जहाँ तक हो सके जोखिम से बचकर चलाने की नीति से प्रेरित होते हैं फिर भी यह विश्वास किया जाता है कि बहत-से प्रबन्धक विवेक की सीमाओं में रहकर तथा अनिश्चितता से सम्बन्धित जोखिम की प्रकृति एवं आकार को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठ निर्णय लेने का प्रयास करते हैं।’

प्रो० साइमन के अनुसार, “प्रशासनिक व्यक्ति का मुख्य सम्बन्ध मानवीय सामाजिक व्यवहार के विवेकपूर्ण एवं गैर-विवेकपूर्ण पहलुओं के मध्य सीमा रेखा से है।” उनके अनुसार निर्णयन में मानवीय व्यवहार न तो पूर्ण रूप से विवेकशील होता है और न ही पूर्ण रूप से गैर-विवेकशील, वरन् यह सदैव ‘मर्यादित विवेकशील’ होता है। मानव मस्तिष्क की क्षमता सीमित होती है।


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