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BCom 1st Year Market Price & Normal Price in Hindi

BCom 1st Year Market Price & Normal Price in Hindi

 

 

 

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BCom 1st Year Market Price & Normal Price in Hindi
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बाजार, बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य

Market, Market Price & Normal Price

प्रश्न 4-‘बाजारशब्द की परिभाषा दीजिए। किसी वस्तु के बाजार के विस्तार को निर्धारित करने वाले तत्त्व कौनकौन से हैं

(2006)

उत्तर-सामान्य बोल-चाल की भाषा में बाजार का अर्थ उस स्थान से लगाया जाता है जहाँ वस्तुओं के क्रेता और विक्रेता एक साथ एकत्रित होकर वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय करते हैं। दूसरे शब्दों में, एक ऐसा स्थान, जहाँ वस्तु के क्रेता एवं विक्रेता भौतिक रूप में उपस्थित होकर वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं, बाजार कहलाता है। किन्तु अर्थशास्त्र में । बाजार से आशय किसी स्थान विशेष से नहीं बल्कि उस सम्पूर्ण क्षेत्र से होता है जहाँ वस्तु . विशेष के क्रेताओं तथा विक्रेताओं में प्रतिस्पर्धात्मक सम्बन्ध हों तथा सम्पूर्ण क्षेत्र में सामान्यतः वस्तु की एक ही कीमत पाए जाने की प्रवृत्ति रहती है । आधुनिक युग में वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय टेलीफोन अथवा अन्य संचार माध्यमों से भी सम्पन्न किया जाता है। इस प्रकार बाजार का सम्बन्ध किसी स्थान विशेष से होना अनिवार्य नहीं।

– सामान्यतः वस्तु के क्रय-विक्रय में क्रेता और विक्रेता के मध्य सौदेबाजी का एक संघर्ष जारी रहता है और वस्तुओं का आदान-प्रदान तब तक सम्भव नहीं हो पाता जब तक क्रेता और विक्रेता दोनों एक कीमत स्वीकार करने को तैयार नहीं हो जाते।

बाजार की परिभाषाएँ

(Definitions of Market)

विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने बाजार को भिन्न-भिन्न रूप में परिभाषित किया है

1). प्रो० जेवन्स के अनुसार, “बाजार शब्द का इस प्रकार सामान्यीकरण किया गया है कि इसका आशय व्यक्तियों के उस समूह से लिया जाता है जिनका परस्पर व्यापारिक घनिष्ठ ।

सम्बन्ध हो और जो वस्तु के बहुत से सौदे करें।”. .. .

2). प्रो० कूनों के अनुसार, “बाजार शब्द से, अर्थशास्त्रियों का तात्पर्य किसी विशेष स्थान से नहीं होता जहाँ वस्तुएँ खरीदी व बेची जाती हैं बल्कि वह सम्पूर्ण क्षेत्र जिसमें क्रेताओं और विक्रेताओं के बीच स्वतन्त्र प्रतियोगिता इस प्रकार हो कि समान वस्तुओं की कीमतें सम्पूर्ण क्षेत्र में समान होने की प्रवृत्ति रखती हों।”

3).प्रो० जे० के० मेहता के अनुसार, “बाजार शब्द का अर्थ उस स्थिति से लिया जाता है जिसमें एक वस्तु की माँग उस स्थान पर हो जहाँ उसे बेचने के लिए प्रस्तुत किया जाये।”

 

बाजार की प्रमुख विशेषताएँ

(Main Characteristics of Market)

 

बाजार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

 

(1) एक क्षेत्र (An Area)- बाजार का अर्थ किसी स्थान विशेष से नहीं होता बल्कि * उस सम्पूर्ण क्षेत्र से होता है जहाँ वस्तु के नेता तथा विक्रेता फैले रहते हैं।

 

(2) क्रेताओं तथा विक्रेताओं की उपस्थिति (Presence of Buyers and Sellers)- बाजार के लिये क्रेताओं तथा विक्रेताओं का होना आवश्यक होता है। किसी एक के अभाव में बाजार की कल्पना नहीं की जा सकती।

 

(3) एक वस्तु (Particular Commodity)- अर्थशास्त्र में बाजार का सम्बन्ध सदैव किसी एक वस्तु विशेष से ही होता है। अत: प्रत्येक वस्तु के लिये एक पृथक् बाजार होता है।

 

(4) प्रतियोगिता (Competition)– बाजार में क्रेताओं तथा विक्रेताओं के बीच स्वतन्त्र प्रतियोगिता पाई जाती है।

 

(5) समान मूल्य (Same Price)- बाजार में सामान्य रूप से वस्तु के मूल्य में समान होने की प्रवृत्ति पायी जाती है।

 

बाजार के विस्तार को प्रभावित करने वाले घटक

(Factors Affecting the Expansion of Market)

 

कुछ वस्तुओं का बाजार एक निश्चित स्थान अथवा क्षेत्र तक सीमित रह जाता है,जबकि . कुछ वस्तुओं का बाजार पूरे देश एवं विश्व में फैला रहता है। अतः प्रश्न यह उठता है कि ऐसे कौन-से तत्व हैं जो बाजार के विस्तार को निश्चित करते हैं । बाजार के विस्तार को प्रभावित करने वाले प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं

(A) वस्तु की प्रकृति (Nature of Commodity)

 

(1) वस्तु की माँग (Demand of Commodity)- वस्तु की माँग का उसके बाजार के विस्तार से सीधा सम्बन्ध होता है । वस्तु की माँग जितनी अधिक होगी,उसका बाजार उतना ही अधिक विस्तृत होगा। उदाहरण के लिये अनाज, सोने, चाँदी की माँग पूरे विश्व में की जाती है, अतः इनका बाजार विस्तृत होता है जबकि धोती, पग़ड़ी आदि की माँग एक सीमित क्षेत्र में की जाती है, अतः इनका बाजार भी सीमित होता है।

 

(2) वहनीयता (Portability) -जिन वस्तुओं को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है, उन वस्तुओं का बाजार विस्तृत होता है। ऐसी वस्तुओं का वजन • कम तथा मूल्य अधिक होता है। इसके विपरीत भारी वस्तुओं को एक स्थान.से दूसरे स्थान पर ले जाने में कठिनाई होती है, अतः इनका बाजार सीमित होता है। ‘.

 

(3) टिकाऊपन (Durability)- टिकाऊ वस्तुओं जैसे कपड़ा, मशीनें आदि का बाजार विस्तृत होता है जबकि शीघ्र नष्ट होने वाली.वस्तुओं जैसे दूध, सब्जी, दही आदि का बाजार । सीमित होता है।

 

(4) पर्याप्त एवं नियमित पूर्ति (Sufficient and Consistent Supply)- जिन वस्तओं की पूर्ति, उनकी मांग के अनुसार बढ़ायी जा सकती है, उनका बाजार विस्तृत होता है ।

इसके विपरीत यदि माँग बढ़ने पर भी पूर्ति को बढ़ाया नहीं जा सकता, तो वस्तु का बाजार सीमित हो जाता है।

 

(5) श्रेणीकरण तथा प्रमापीकरण (Grading and Standardisation)- जिन वस्तुओं का श्रेणीकरण एवं प्रमापीकरण किया जा सकता है, उनका बाजार विस्तृत होता है, लेकिन जिन वस्तुओं का श्रेणीकरण तथा प्रमापीकरण सम्भव नहीं होता, उन वस्तुओं का बाजार सीमित होता हैं |

 

(6) स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धता (Availability of Substitutes)- जिन वस्तुओं की स्थानापन्न वस्तुएँ उपलब्ध रहती हैं,उनका बाजार सीमित हो जाता है तथा जिनकी स्थानापन्न वस्तुएँ उपलब्ध नहीं होती, उनका बाजार विस्तृत रहता है।

 

(B) देश की आन्तरिक दशाएँ (Internal Conditions of the Country)

 

(1) यातायात एवं संचार के साधन (Means of Transport and Communication)- देश में यातायात एवं संचार के साधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने पर वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्रता से भेजा जा सकता है। इस स्थिति में बाजार का आकार विस्तृत होता है । लेकिन यदि यातायात के पर्याप्त साधन उपलब्ध न हों तो बाजार का आकार सीमित ही बना रहेगा।

 

(2) शान्ति और सुरक्षा (Peace and Safety)- यदि देश में सामान्य रूप से शान्ति एवं सुरक्षा की स्थिति है तो बाजार का आकार विस्तृत होगा। इसके विपरीत यदि देश में असुरक्षा तथा अशान्ति है, तो बाजार का आकार सीमित हो जाता है।

 

(3) विक्रय रीतियाँ (Selling Methods)- यदि वस्तुओं के विक्रय के लिये वैज्ञानिक , तथा आधुनिक रीतियों जैसे विज्ञापन, प्रदर्शनी आदि का प्रयोग किया जाता है, तो वस्तु का बाजार विस्तृत हो जाता है।

 

(4) मुद्रा एवं साख पद्धति (Money and Credit System)- जिस देश में बैंकिंग सुविधाएँ पर्याप्त होती हैं तथा मुद्रा एवं साख प्रणाली विकसित होती है, वहाँ वस्तु का बाजार विस्तृत हो जाता है।

 

(5) सरकारी नीतियाँ (Government Policies)- सरकार की कर,व्यापार तथा अन्य नीतियाँ भी बाजार के आकार को प्रभावित करती हैं। यदि सरकार स्वतन्त्र व्यापार नीति को । अपनाती है तथा आयातों और निर्यातों पर कर नहीं लगाती, तो बाजार का आकार विस्तृत हो जाता है।

 

(6) श्रम विभाजन (Division of Labour)- यदि देश में श्रम विभाजन अधिक है, तो कम लांगत पर अधिक उत्पादन सम्भव हो पाता है। ऐसी स्थिति में वस्तु का मूल्य कम रहने से वस्तु का बाजार विस्तृत हो जाता है।

 

प्रश्न 4-सामान्य मूल्य एवं बाजार मूल्य के अन्तर को स्पष्ट कीजिए। क्या यह कहना सत्य है कि सामान्य मूल्य वह मूल्य है जिसके चारों तरफ बाजार मूल्य चक्कर लगाता है?

 

बाजार मूल्य

(Market Price)

 

पूर्ण प्रतियोगिता में अल्पकाल में जो मूल्य निर्धारित होता है उसे बाजार मूल्य या बाजार कीमत (Market price) भी कहा जाता है । हम यह अध्ययन कर चुके हैं कि अति अल्पकाल में वस्तु की पूर्ति पूर्ण रूप से स्थिर रहती है। अति अल्पकाल में उत्पादन लागत भी नहीं बदलती, क्योंकि इस समयावधि में उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में, अति अल्पकाल में वस्तु का मूल्य माँग की दशाओं से प्रभावित .. होता है । माँग बढ़ने पर मूल्य बढ़ जाता है तथा माँग कम हो जाने पर मूल्य भी कम हो जाता हैं |

 

अति अल्पकाल में पूर्ति वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करती है। वस्तुएँ दो प्रकार की हो सकती हैं

 

1) नाशवान वस्तुएँ (Perishable goods)- जैसे, हरी सब्जी, मछली;गोश्त, आदि।

(2) टिकाऊ वस्तुएँ (Durable goods)-  जैसे, गेहूँ, चाय, आलू, प्याज, आदि ।

 

नाशवान वस्तुओं का बाजार मूल्य निर्धारण नाशवान वस्तुओं के लिए अति अल्पकालीन पूर्ति वक्र पूर्णतया मूल्य-निरक्षेप (Perfectly inelastic) होता है अर्थात् Y-अक्ष के समानान्तर एक खड़ी रेखा होती है क्योंकि ऐसी वस्तुओं के पूरे स्टॉक को उसी दिन बेचना पड़ता है, चाहे उनका बाजार मूल्य कुछ भी क्यों न हो। अतः इन वस्तुओं की पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है।

BCom 1st Year Market Price & Normal Price in Hindi
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संलग्न चित्र में नाशवान वस्तु के लिए बाजार मूल्य-निर्धारण स्पष्ट किया गया है। SS पूर्ति रेखा है जो पूर्णतया बेलोच है अर्थात् पूर्ति . A को OQ से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। मांग DD होने पर सन्तुलन बिन्दु E पर होगा जहाँ वस्तु का मूल्य OP होगा। मांग में वृद्धि होने पर मांग वक्र D1Dहो जाता है किन्तु पूर्ति न बढ़ायी जा सकने के कारण सन्तुलन बिन्दु E तथा वस्तु मूल्य OP1 हो जाता है। इसके विपरीत, मांग की कमी होने पर मांग वक्र DDA के रूप में परिवर्तित होता है तथा वस्तु मूल्य घटकर OP2 रह जाता है। किन्तु बाजार मूल्य OR से कम नहीं होता अर्थात् OR मूल्य से नीचे पूर्ति शून्य होने के कारण पूर्ति वक्र को टूटी रेखा SO द्वारा दिखाया गया है । मूल्य OR से कम होने पर विक्रेता अपना सामान बेचने को तैयार नहीं होता । प्रत्येक विक्रेता अपनी वस्तु का एक न्यूनतम मूल्य (Minimum price) तय करता है तथा इस मूल्य से कम पर वह पूर्ति रोक देता है। यही न्यूनतम मूल्य सुरक्षित मूल्य (Reserve price) कहलाता है। सुरक्षित मूल्य साधारणतः वस्तु की उत्पादन लागत के समान होता है जिसके कारण विक्रेता अपनी लागत से कम मूल्य पर वस्तु की पूर्ति नहीं करता।

 

सुरक्षित मूल्य निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है –

 

  1. भविष्य में वस्तु का मूल्य बढ़ने की आशा । मूल्य बढ़ने की आशा मूल्य को निश्चित रूप से बढ़ाती है।

 

  1. वस्तु की उत्पादन लागत।

 

  1. वस्तु प्रकृति-नाशवान अथवा टिकाऊ वस्तुएँ । नाशवान वस्तुओं के लिए सुरक्षितमूल्य कम होगा तथा टिकाऊ वस्तुओं के लिए मूल्य अपेक्षाकृत अधिक होगा।

 

टिकाऊ वस्तुओं का बाजार मूल्य निर्धारणटिकाऊ वस्तुओं के लिए अति अल्पकालीन पूर्ति वक्र कुछ समय तक तो बायें से दायें ऊपर चढ़ता हुआ होता है क्योंकि विक्रेता वस्तु को कुछ समय तक स्टॉक में रखकर एक उचित मूल्य की प्रतीक्षा कर सकता है। किन्तु स्टॉक में वस्तु अनिश्चित काल के लिए नहीं रखी जा सकती। इस विशेषता के कारण टिकाऊ वस्तु का पूर्ति वक्र एक मूल्य तक तो मूल्य-सापेक्ष रहता है किन्तु बाद में पूर्णतया मूल्य-निरपेक्ष हो जाता है।

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संलग्न चित्र में टिकाऊ वस्तुओं का पूर्ति वक्र SRS’ के रूप में दिखाया गया है | OS वह सुरक्षित मूल्य है जिससे कम पर विक्रेता वस्तु की पूर्ति नहीं करेगा। बिन्दु ऽ से बिन्दु R तक पूर्ति वक्र लोचदार है किन्तु बिन्दु R से बिन्दु S’ तक पूर्णतया बेलोचदार हो जाता है। वस्तु का मूल्य OS से कम होने.पर विक्रेता उसे विक्रय न करके अपने स्टॉक में रखना पसन्द करेगा। सुरक्षित मूल्य से अधिक वस्तु मूल्य होने पर विक्रेता वस्तु का विक्रय आरम्भ करेगा किन्तु विक्रेता किसी भी दशा में वस्तु की पूर्ति OQ2 से अधिक नहीं बढ़ा सकेगा क्योंकि अति अल्पकाल में एक निश्चित पूर्ति ही की जा सकती है। जब वस्तु की माँग DD’ है तब वस्तु का मूल्य OP होता है। मांग के बढ़कर D2D2‘ हो जाने पर वस्तु मूल्य OP2 हो जाता है तथा मांग के घटकर DIDI’ हो जाने पर वस्तु मूल्य OP1 रह जाता है। OP1 मूल्य पर विक्रेता समस्त स्टॉक को बचने को तैयार नहीं है, वह केवल 001 पूर्ति विक्रय हेतु बाजार में प्रस्तुत करता है । बिन्दु R पर सन्तुलन के समय वह OP2 मूल्य पर बाजार में वह समस्त पूर्ति OQ2 बेचने को तैयार है । इसके बाद मांग की प्रत्येक वृद्धि वस्तु मूल्य को बढ़ायेगी क्योंकि पूर्ति की मात्रा स्थिर हो चुकी है।

 

सामान्य मूल्य

(Normal Price)

 

दीर्घकाल में मांग एवं पूर्ति के दीर्घकालीन सन्तुलन द्वारा जो साम्य मूल्य प्राप्त होता है उसे सामान्य मूल्य या सामान्य कीमत (Normal Price) कहा जाता है। एक उद्योग तथा उसमें कार्य कर रही फर्मों के मध्य एक फर्म-उद्योग सम्बन्ध होता है । दीर्घकाल इतना पर्याप्त समय है जिसमें उद्योग की फर्मों को लाभ होने की दशा में बाहर की फर्में उद्योग में प्रवेश के लिए आकर्षित होंगी तथा हानि की दशा में फर्मे उद्योग को छोड़कर बाहर चली जायेंगी। एक उद्योग सन्तुलन में तब होगा जब फर्मों में उस उद्योग विशेष में प्रवेश तथा उससे बाहर जाने की कोई प्रवृत्ति न हो। इसका अभिप्राय है कि उद्योग में कार्य कर रही फर्मों को इतना लाभ अवश्य मिलना चाहिए जो उन फर्मों को उद्योग विशेष में कार्यशील रख सके । साथ-ही-साथ उस उद्योग विशेष में इतना लाभ नहीं होना चाहिए जिससे बाहर की फर्मे उस उद्योग विशेष की ओर आकर्षित हों । जब उपर्युक्त दोनों शर्ते पूरी होंगी तभी उद्योग ऐसे सन्तुलन में पहुँच पायेगा जहाँ उद्योग में फर्मों के आगमन तथा बहिर्गमन की कोई प्रवृत्ति न हो। इस प्रकार उद्योग . की फर्मों के उत्पादकों को एक न्यूनतम धनराशि लाभ के रूप में (minimum amount in the form of profit) अवश्य मिलनी चाहिए ताकि वह उद्योग को छोड़कर न जायें तथा उसी में कार्य करती रहें। यही न्यूनतम धनराशि ‘सामान्य लाभ’ (Normal Profit) कहलाती है |

 

रेखाचित्र के द्वारा सामान्य मूल्य निर्धारण को स्पष्ट किया जा सकता है । चित्र में दीर्घकालीन माँग वक्र को DD तथा दीर्घकालीन पूर्ति वक्र को SS द्वारा दर्शाया गया है ।ये दोनों वक्र एक दूसरे को P बिन्दु पर काटते हैं जिंस पर PQ दीर्घकालीन साम्य मूल्य का निर्धारण होता है।

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दीर्घकाल में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में वस्तु के मूल्य की प्रवृति स्थिर तथा सामान्य मूल्य के बराबर रहने की होती है। यदि किसी कारणवश मूल्य, सामान्य मूल्य से कम या ‘ अधिक हो जाता है तो शीघ्र ही ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जो उसे पुनः सामान्य मूल्य के बराबर कर देती हैं । दीर्घकालीन साम्य की स्थिति में सामान्य मूल्य सीमान्त उपयोगिता तथा सीमान्त लागत दोनों के बराबर होता है । रेखाचित्र से स्पष्ट है कि यदि मूल्य PO से बढ़कर PO, हो जाता है तो यह सीमान्त लागत MQA से अधिक हो जाएगा तथा उत्पादक लाभों को अधिकतम करने के लिए उत्पादन बढ़ाएगें। वस्तु की पूर्ति बढ़ने से मूल्य गिरकर दोबारा PO के बराबर हो जाएगा। इसी प्रकार यदि मूल्य सामान्य मूल्य से कम है तो विक्रेता हानि को कम करने के लिये वस्तु की पूर्ति घटायेंगे जिससे मूल्य धीरे-धीरे बढ़कर पुनः सामान्य मूल्य के बराबर हो जाएगा।

 

सामान्य मूल्य की दूसरी शर्त यह होती है कि यह सदैव औसत लागत के बराबर होता के जिससे परानी फमें उद्योग को छोड़कर बाहर नहीं जाती तथा नई फमें उद्योग की तरफ आकर्षित नहीं हो पाती। इस स्थिति में फर्म केवल सामान्य लाभ ही प्राप्त कर पाती है।

 

बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में अन्तर

(Difference between Market Price and Normal Price)

 

बाजार मूल्य या बाजार कीमतसामान्य मूल्य या सामान्य कीमत
1.बाजार मूल्य पूर्ण प्रतियोगी बाजार दशा में अति अल्पकाल अथवा बाजार अवधि (Market period) में निर्धारित होता हैसामान्य मूल्य पूर्ण प्रतियोगी बाजार में दीर्घकाल

में निर्धारित होता हिया | यह दीर्घकालीन मांग तथा पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है|

2. बाजार मूल्य-निर्धारण में वस्तु की मांफ वस्तु की पूर्ति की तुलना में आधिक प्रभावी रहती है क्योकि अति अल्पकाल में पूर्ति स्थिर रहती है |इस मूल्य-निर्धारण में पूर्ति वस्तु मूल्य को आधिक प्रभावित करती है क्योकि दीर्घकाल में पर्याप्त समय होने के कारण वस्तु की पूर्ति मांग की दशाओं के अनुसार पूर्ण समायोजित की जा सकती है |
3. यहाँ मूल्य मांग तथा पूर्ति के अस्थायी (unstable) संतुलन द्वारा निर्धारित होता है जिसके कारण अल्पकालीन बाजार मूल्य में उच्चावचन (fluctuation) दृष्टिगोचर होते है |दीर्घकाल में सामान्य मूल्य मांग ताता पूर्ति के स्थायी (stable) संतुलन द्वारा निर्धारित होता है|
4. इस मूल्य में उत्पादक को आसामान्य लाभ, सामान्य लाभ या हानि भी हो सकते है |इस मूल्य पर उत्पादक को केवल सामान्यत लाभ प्राप्त होता है |
5. यहाँ मूल्य वास्तव में बाजार में प्रचालित होता है |यहाँ मूल्य काल्पनिक होता है |
6. बाजार मूल्य उत्पादन लागत के समान इससे आधिक तथा इससे काम भो हो सकता है |सामान्य मूल्य सदैव उत्पादन लागत के बराबर होता है | इसी कारण जब प्रतिफल के नियम लागू होते है तो सामान्य मूल्य में भी लागत के अनुसार परिवर्तन होता है +
7. बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव आते रहते है तथा वह सामान्य मूल्य के सापेक्ष इर्द-गिर्द घूमता रहता है |सामान्य मूल्य स्थिर होता है | जब प्रतिफल नियम लागू होता है तो उत्पादन लागत के अनुसार मूल्य बदल जाता है |

 

 

 

बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में सम्बन्ध

(Relationship between Market Price and Normal Price)

 

बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में भिन्नता होते हुए भी दोनों मूल्यों में एक घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। बाजार मूल्य में परिवर्तन की प्रवृत्ति पायी जाती है तथा सामान्य मूल्य एक स्थायी प्रवृत्ति को बताता है, फिर भी दोनों में यह निकटता पायी जाती है कि बाजार मूल्य अपने प्रत्येक परिवर्तन में पुनः सामान्य मूल्य के बराबर आने का प्रयत्न करता है। दूसरे शब्दों में, बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के  चारों ओर घूमता रहता है अर्थात् बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदैव सामान्य मूल्य की ओर आने की होती है (स्पष्टीकरण हेतु संलग्न चित्र देखें)।

 

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