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BCom 1st Year Business Economics Wages Notes In Hindi

BCom 1st Year Business Economics Wages Notes In Hindi

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BCom 1st Year Business Economics Wages Notes In Hindi
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मजदूरी

Wages

प्रश्न 23-द्राव्यिक मजदूरी तथा वास्तविक मजदूरी में अन्तर कीजिए । वास्तविक मजदूरी को प्रभावित करने वाले तत्त्वों की विवेचना कीजिए।

Differentiate between Nominal and Real wages and also discuss tae factors which affect Real wages.

उत्तरमजदूरी से आशय राष्ट्रीय आय के उस भाग से है जो श्रम के स्वामी अर्थात् श्रमिक को उसकी सेवाओं के बदले प्रतिफल के रूप में दिया जाता है। मौद्रिक (द्राव्यिक) या नकद मजदूरी (Money or Nominal Wages)-नकद मजदूरी से आशय उस मजदूरी से है जो श्रमिक को उसकी सेवाओं के बदले निश्चित समय (प्रति घन्टा, प्रति सप्ताह या प्रतिमाह) में मुद्रा के रूप में दी जाती है। प्रो० बेन्हम के अनुसार, “नकद मजदूरी मुद्रा की वह राशि है जो सेवायोजक (नियोक्ता) द्वारा किसी समझौते के अन्तर्गत श्रमिकों को उनकी सेवाओं के बदले दी जाती है। उदाहरण के लिये, मोहन किसी कारखाने में कार्य करता है तथा उसे अपने श्रम के बदले 3,000 रुपये मासिक पारिश्रमिक के रूप में मिलता है, तो हम कहेंगे कि उसकी नकद मजदूरी 3,000 रुपये प्रति मास है। सामान्यतया मजदूरी शब्द का इसी अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

वास्तविक या असल मजदूरी (Real Wages)- वास्तविक मजदूरी में एक श्रमिक को अपने श्रम के बदले में मिलने वाली नकद मजदूरी से प्राप्त होने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं तथा नकद मजदूरी के अतिरिक्त नियोक्ता से प्राप्त होने वाली अन्य सुविधायें भी शामिल होती हैं । स्पष्ट है कि वास्तविक मजदूरी में नकद मजदूरी के अलावा, प्राप्त होने वाली अन्य सुविधाएँ भी सम्मिलित होती हैं। संक्षेप में,

वास्तविक मजदूरी = नकद मजदूरी + अन्य सुविधाएँ

उदाहरण के लिए, यदि श्रमिक को नकद मजदूरी के अतिरिक्त बोनस, मुफ्त मकान, मुफ्त चिकित्सा, बच्चों की निःशुल्क शिक्षा आदि सुविधाएँ भी मिल रही हों तो ये सभी सुविधाएँ भी उसकी वास्तविक मजदूरी में सम्मिलित की जायेंगी।

टॉमस (Thomas) के अनुसार, “किसी मजदूर को उसके श्रम के बदले में मिलने वाली रकम से जो वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं तथा इस रकम के अतिरिक्त जो आवश्यकता, आराम व विलास के अन्य पदार्थ या सेवाएँ उसे प्राप्त होती हैं, इन सबके योग को अर्थशास्त्र में असल . मजदूरी कहा जाता है।”

वास्तविक मजदूरी को निर्धारित करने वाले तत्त्व

(1) मुद्रा की क्रयशक्ति अथवा कीमत स्तर–श्रमिक की वास्तविक मजदूरी मुद्रा की क्रय-शक्ति पर निर्भर करती है । मुद्रा की क्रयशक्ति का अभिप्राय मुद्रा की प्रति इकाई वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा खरीदने की शक्ति से है। मौद्रिक मजदूरी के स्थिर रहने पर भी जब मद्रा की क्रय-शक्ति में परिवर्तन हो जाता है तो उसके अनुरूप ही श्रमिक की वास्तविक मजदूरी में भी परिवर्तन हो जाता है । मुद्रा की क्रय-शक्ति एवं कीमत-स्तर में विपरीत सम्बन्ध होता है जबकि मद्रा की क्रय शक्ति एवं वास्तविक मजदूरी में सीधा सम्बन्ध होता है। यदि वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य कम है तो मुद्रा की क्रय शक्ति अधिक होगी क्योंकि कम मुद्रा से भी अधिक वस्तुएँ एवं सेवाएँ क्रय की जा सकती हैं। अतः कीमत-स्तर के नीचा होने पर मुद्रा की क्रय-शक्ति बढ़ जाती है तथा श्रमिक की वास्तविक मजदूरी में वृद्धि हो जाती है इसके विपरीत कीमत-स्तर ऊँचा होने पर मुद्रा की क्रय-शक्ति कम हो जाती है तथा श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी कम हो जाती है।

(2) अतिरिक्त आययदि श्रमिकों को अपना नियमित कार्य करने के बाद भी अतिरिक्त आय प्राप्त करने के साधन उपलब्ध होते हैं, तो निश्चिय ही ऐसे श्रमिक की वास्तविक मजदूरी अधिक होगी।

उदाहरण के लिए, डॉक्टर प्राइवेट प्रेक्टिस से, अध्यापक ट्यूशन, पुस्तक-लेखन तथा परीक्षा की कापियाँ जाँच कर अतिरिक्त आय प्राप्त करते हैं। अतः इनकी वास्तविक मजदूरी अधिक होती है।

(3) अतिरिक्त सुविधाएँयदि किसी श्रमिक को वेतन के अतिरिक्त निःशुल्क चिकित्सा, मुफ्त मकान, बच्चों की निःशुल्क शिक्षा आदि सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं, तो उस श्रमिक की वास्तविक मजदूरी अधिक होती है।

(4) आश्रितों को काम जिन व्यवसायों में श्रमिकों के आश्रितों को काम मिलता है, वहाँ वास्तविक मजदूरी उन व्यवसायों से अधिक होती है, जहाँ आश्रितों को काम की सुविधा नहीं होती है।

(5) कार्य का स्वभाव कुछ कार्य स्वभाव से ही रुचिकर एवं स्वास्थ्य के लिए अनुकूल होते हैं। इसके विपरीत, कुछ कार्य बहुत कठिन, अरुचिकर, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। पहले प्रकार के कार्यों में नकद मजदूरी कम होने पर भी वास्तविक मजदूरी अधिक मानी. जाती है, परन्तु दूसरे प्रकार के कार्यों में नकद मजदूरी अधिक होने पर भी वास्तविक मजदूरी कम मानी जाती है।

(6) कार्यदशाएँ (Working conditions)-जिस स्थान पर श्रमिक को कार्य करना होता है, उस स्थान की कार्य-दशाएँ भी श्रमिक की वास्तविक मजदूरी को प्रभावित करती हैं। उन श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी कम होती है, जिन्हें अपेक्षाकृत अन्धेरे, गन्दे व अस्वास्थ्यकर वातावरण में कार्य करना पड़ता है।

(7) कार्य के घण्टे एवं अवकाशजिन व्यवसायों में अन्य बातें समान रहते हुए कार्य के घण्टे अधिक तथा अवकाश की सुविधाएँ कम होती हैं उनमें श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी उन व्यवसायों से कम होती है, जिनमें कार्य के घण्टे कम तथा अवकाश सुविधाएँ अधिक होती हैं। इसके आधार पर शिक्षा विभाग के अध्यापकों व प्राध्यापकों की वास्तविक मजदूरी प्रशासनिक कर्मचारियों व अधिकारियों से अधिक होती है।

(8) भविष्य में उन्नति की आशाजिन व्यवसायों में भावी उन्नति के अवसर अधिक -होते हैं उनमें प्रारम्भ में नकद मजदूरी के कम होने पर भी वास्तविक मजदूरी अधिक होती है। इसका कारण यह है कि प्रारम्भ में मिलने वाली कम मजदूरी की भविष्य में होने वाली पदोन्नति से क्षतिपूर्ति हो जाती है।

(9) कार्य की नियमिततायदि रोजगार में अस्थिरता तथा नियमितता है. तो वास्तविक मजदूरी ऊँची होगी। यदि वर्ष में कुछ समय के लिए ही रोजगार रहता है तो वास्तविक मजदूरी कम होगी।

(10) व्यावसायिक व्यय कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनमें काम करने वाले व्यक्तियों को अपनी योग्यता व कुशलता बढ़ाने के लिए कुछ-न-कुछ व्यय अवश्य करने होते हैं। उदाहरण के लिए, अध्यापक; वकील तथा डॉक्टरी के पेशे ऐसे हैं, जिनमें उन्हें नई-नई पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाओं तथा उच्च प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए व्यय करने पड़ते हैं। अतः इस प्रकार के कार्यों में लगे हुए श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी उन उद्योगों या व्यवसायों में लगे श्रमिकों से कम होती है, जिन्हें इस प्रकार का व्यावसायिक व्यय नहीं करना पड़ता है।

नकद मजदूरी तथा वास्तविक मजदूरी में सम्बन्ध (अन्तर)

एडम स्मिथ के अनुसार, श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी में आवश्यकताओं तथा जीवन उपयोगी सुविधाओं की वह मात्रा सम्मिलित होती है,जो उसे उसके श्रम के बदले में दी जाती है। इसके विपरीत, नकद मजदूरी में केवल मुद्रा की मात्रा ही सम्मिलित होती है।”

नकद मजदूरी एवं वास्तविक मजदूरी में महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि नकद मजदूरी से किसी श्रमिक की वास्तविक स्थिति का पता नहीं लगाया जा सकता, जबकि वास्तविक मजदूरी के आधार पर किसी श्रमिक की सही आर्थिक स्थिति की जानकारी हो जाती है। यहाँ पर यह स्पष्ट करना. परमावश्यक है कि श्रमिक की नकद मजदूरी एवं वास्तविक मजदूरी में एक ही दिशा में परिवर्तन होना आवश्यक नहीं है। नकद मजदूरी के बढ़ने पर वास्तविक मजदूरी बढ़ेगी या घटेगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि कीमत स्तर में किस दिशा में कितना परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिए, यदि नकद मजदूरी के बढ़ने के साथ-साथ वस्तुओं की कीमतों में भी उतनी ही आनुपातिक वृद्धि हो जाती है तो वास्तविक मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं होगी। इसके विपरीत यदि नकद मजदूरी में हुई वृद्धि की तुलना में वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में अधिक वृद्धि होती है तो ऐसी स्थिति में नकद मजदूरी के बढ़ने पर भी वास्तविक मजदूरी घट जायेगी। संक्षेप में, नकद मजदूरी एवं वास्तविक मजदूरी के सम्बन्ध को निम्नलिखित सूत्र द्वारा व्यक्त किया जा सकता है

वास्तविक मजदूरी = मौद्रिक मजदूरी / सामान्य मल्य स्तर

प्रश्न 24-मजदूरी निर्धारण के आधुनिक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। मजदूरी निर्धारण में श्रम संघों की भूमिका का परीक्षण कीजिए।

(1999 P & R,1996 Back)

अथवा

 पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत मजदूरी कैसे निर्धारित होती है? रेखाचित्रों द्वारा समझाइये।

(2005 Back)

उत्तर-

मजदूरी निर्धारण का आधुनिक सिद्धान्त

(Modern Theory of Wage Determination)

मजदूरी निर्धारण का आधुनिक सिद्धान्त माँग और पूर्ति के सामान्य सिद्धान्त का एक विशिष्ट रूप है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, श्रम की कीमत अन्य वस्तुओं की तरह श्रम की माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है । यद्यपि मजदूरी एक वस्तु के मूल्य की भाँति माँग और पर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है, लेकिन फिर भी मजदूरी के अलग सिद्धान्त की आवश्यकता इसलिये है क्योंकि श्रम की अपनी कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं। आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार, “किसी एक उद्योग में मजदूरी की दर उस बिन्दु पर निर्धारित होती है, जहाँ पर श्रम का कुल माँग वक्र उसके पूर्ति वक्र को काटता है।”

श्रम की माँग

(Demand of Labour)

श्रम की माँग उत्पादकों द्वारा की जाती है और यह श्रमिक की सीमान्त उत्पादकता पर निर्भर करती है। एक उत्पादक,श्रमिक को उससे अधिक मजदूरी नहीं देना चाहेगा जितना कि वह (श्रमिक) उसके लिये उत्पादन करता है अन्यथा उत्पादक को हानि होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि श्रम की माँग करते समय उत्पादक श्रम की सीमान्त उत्पादकता को पूरी तरह से ध्यान में रखता है । इस प्रकार सीमान्त उपज़ के मूल्य को श्रम की माँग अर्थात् मजदूरी की दर की अधिकतम सीमा (maximum limit) कहा जा

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सकता है। श्रम की माँग निम्न तथ्यों द्वारा प्रभावित होती है

(1) श्रम की माँग अप्रत्यक्ष होती है जो श्रमिकों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की माँग पर निर्भर होती है। यदि वस्तु की माँग अधिक है तो श्रम की माँग भी अधिक होगी और यदि वस्तु की माँग कम है तो श्रम की माँग भी कम होगी।

(2) श्रम की मॉग अन्य सहयोगी पर साधनों की कीमतों पर भी निर्भर करती है। यदि उत्पत्ति के अन्य साधनों की कीमतें बहुत ऊँची हैं तो ऐसी स्थिति में उन साधनों की माँग कम हो जायेगी। और परिणामतः श्रम की माँग अधिक । हो जायेगी और यदि अन्य साधन अपेक्षाकृत सस्ते हैं तो श्रम की माँग कम हो जायेगी।

(3) श्रम की माँग तकनीकी दशाओं पर भी निर्भर करती है। श्रम की माँग तथा मजदूरी की दर में विपरीत सम्बन्ध होता है, जिसके कारण श्रम का माँग-वक्र नीचे गिरता हुआ अर्थात् “ऋणात्मक ढाल” वाला होता है। मजदूरी की दर अधिक होने पर श्रम की माँग कम होगी और मजदूरी के नीची होने पर श्रम की माँग अधिक होगी; . जैसाकि रेखाचित्र में दिखाया गया है।

श्रम की पूर्ति

(Supply of Labour)

श्रम की पूर्ति से तात्पर्य श्रमिकों की उस संख्या से है जो प्रचलित मजदूरी की दर पर अपना श्रम बेचने के लिए तैयार रहता है । श्रम अपनी सेवाओं के बदले इतनी मजदूरी अवश्य चाहता है जिससे कि वह अपना और अपने परिवार का जीवन-निर्वाह आसानी से कर सके। इसे श्रमिकों का सीमान्त त्याग कहते हैं। यदि मजदूरी इस सीमान्त त्याग से कम है तो श्रमिक कार्य करने के लिए अपनी पूर्ति नहीं करेंगे। इस प्रकार जीवन-निर्वाह या सीमान्त त्याग मजदूरी की वह न्यूनतम सीमा है जो श्रम की पूर्ति को निर्धारित करती है । श्रम की पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं

(1) व्यावसायिक स्थानान्तरणकिसी उद्योग विशेष के लिए श्रम की पूर्ति, अन्य उद्योगों में मजदूरी की दरों और उनमें होने वाले परिवर्तनों पर निर्भर करती है। यदि दसरे उद्योगों में मजदूरी ऊँची है तो श्रमिक उन उद्योगों में जाने लगते हैं जिससे उस उद्योग विशेष में श्रम की पूर्ति कम हो जाती है मजदूरी दर के अलावा रोजगार की सुरक्षा, बोनस, पेंशन इत्यादि तत्त्व भी व्यावसायिक स्थानान्तरण को प्रभावित करते हैं ।

(2) कार्य अवकाश अनुपात जब मजदूरी में वृद्धि होती है तो शुरू में श्रमिक आराम के बजाय अधिक कार्य करना पसन्द करता है जिससे श्रम की पूर्ति में वृद्धि । होती है, लेकिन एक सीमा के बाद जब मजदूरी में वृद्धि होती जाती है तो श्रमिकों की आय अधिक हो जाने से वे अधिक काम करने के बजाय कम कार्य करना पसन्द करते हैं जिससे श्रम की पूर्ति कम होने लगती है।

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श्रम की पूर्ति तथा मजदूरी की दर में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है जिसके कारण श्रम का पूर्ति वक्र ऊपर की ओर उठता हुआ होता है, लेकिन एक सीमा के बाद वह पीछे की ओर मुड़ जाता है, जैसाकि रेखाचित्र में स्पष्ट किया गया है।

मजदूरी का निर्धारण

(Determination of Wages)

किसी उद्योग के लिए मजदूरी का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ श्रम की माँग उसकी पूर्ति के बराबर होती है अर्थात् जहाँ पर श्रम का कुल पूर्ति वक्र उसके कुल माँग वक्र को काटता है। इसे रेखाचित्र में दिखाया गया है।

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चित्र से स्पष्ट है कि OW मजदूरी की दर पर श्रम की माँग YA तथा पूर्ति दोनों एक-दूसरे के बराबर हैं। यदि मजदूरी घटकर OW1  हो जाती है तो श्रम की माँग W1A, श्रम की पूर्ति W1B से अधिक होगी जिससे श्रमिकों की न्यूनता की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। फलस्वरूप मजदूरी की दर बढ़ने लगेगी।

इसके विपरीत,यदि मजदूरी OW से बढ़कर OW2 हो जाती है तो इस स्थिति में श्रम की पूर्ति W2C, श्रम की माँग W2T से अधिक होगी, अतः श्रमिकों की अधिकता या बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। फलस्वरूप मजदूरी की दर गिरने लगेगी, अतः स्पष्ट है कि OW ही वह ‘मजदूरी सन्तुलन-दर’ है जो श्रम-बाजार में प्रचलित रहेगी।

मजदूरी निर्धारण में श्रमसंघ की भूमिका

(Role of Trade Unions in Wage Determination)

वी० वी० गिरी के अनुसार, “श्रम-संघ श्रमिकों द्वारा अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए बनाये गये ऐच्छिक संगठन हैं।” सामान्यतया यही समझा जाता है कि मजदूरी का निर्धारण उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के बीच स्वतन्त्र प्रतियोगिता के आधार पर होता है, परन्तु सत्यता यह है कि श्रमिक अनेक कारणों से मोल-भाव करने में स्वतन्त्र नहीं होते । उद्योगपतियों की तुलना में श्रमिकों में मोल-भाव करने की क्षमता कम होती है। परिणामत: मजदूरों को उद्योगपतियों द्वारा दी गई मजदूरी ही स्वीकार करनी पड़ती है। इस प्रकार मिल मालिक प्रायः श्रमिकों का शोषण करते हैं तथा इस शोषण से बचने के लिए श्रमिक अपना संगठन बनाते हैं। वस्तुतः मजदूरी निर्धारण में श्रम-संघों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। श्रम-संघ मजदूरी निर्धारण को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं

(1) श्रम- संघ मजदूरी की माँग एवं पूर्ति दोनों को प्रभावित कर सकते हैं और उसके द्वारा ये मजदूरी निर्धारण पर अपना प्रभाव डालते हैं। श्रम-संघ श्रमिकों की पूर्ति को नियन्त्रित करके तथा श्रमिकों की माँग में वृद्धि कराकर मजदूरी-दर में वृद्धि कराने का प्रयास कर सकते है |

(2) श्रम- संघ मजदूरों की सौदा करने की शक्ति में वृद्धि करके भी उनकी मजदूरी में वृद्धि कराते हैं। श्रमिक-संघ श्रमिकों को संगठित कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों की सौदा करने की शक्ति में निश्चिय ही वृद्धि हो जाती है। हड़ताल आदि के माध्यम से श्रम-संघ सेवायोजकों को श्रमिकों की अधिकतम सीमान्त उत्पादकता के बराबर मजदूरी देने हेतु बाध्य करते हैं।

(3) श्रमिक- संघ श्रमिकों की सीमान्त उत्पादकता में वृद्धि करने का प्रयास करते हैं। श्रम-संघ श्रमिकों की भलाई के बहुत-से ऐसे कार्य करते हैं जिनसे उनकी कार्य-कुशलता बढ़ जाती है, जिसके कारण वे अधिक उत्पादन करने में सक्षम हो जाते हैं। इस प्रकार उन्हें स्वतः ही ऊँची मजदूरी मिलने लगती है। . इस प्रकार श्रम-संघ मजदूरी निर्धारण में अपना योगदान देकर मजदूरों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास करते रहते हैं। वर्तमान में जो श्रमिकों की सुरक्षा तथा आर्थिक अवस्था एवं सुविधाओं में वृद्धि हुई है, उसका श्रेय श्रमिक संगठनों को ही है।

सीमायें श्रम संघ केवल एक सीमा तक ही श्रमिकों की सौदा करने की शक्ति को बढ़ा । सकते हैं अर्थात् श्रम-संघ असीमित मात्रा में मजदूरी में वृद्धि नहीं करवा सकते। इसके मुख्य कारण निम्न प्रकार हैं

(1) श्रमिकों का प्रतिस्थापन केवल मशीनों द्वारा ही नहीं किया जाता है, बल्कि इनका प्रतिस्थापन श्रमिकों द्वारा भी होता है। अतः असंगठित श्रमिकों की दशा में श्रम-संघों का प्रभाव शून्य रहता है।

(2) यदि श्रमिकों को प्रतिस्थापन करने वाले अन्य साधनों की पूर्ति लोचदार है, तो श्रम-संघ मजदूरी बढ़वाने में सफल नहीं हो सकेंगे।

(3) यदि श्रमिकों द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग अधिक लोचदार है, तो मजदूरी में वृद्धि होना सम्भव नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

(Short Answer Questions)

प्रश्न 1-सामूहिक सौदेबाजी क्या है? मजदूरी के निर्धारण में यह कहाँ तक प्रभावी रहती है?

(2004)

उत्तर उत्पादन की जटिल प्रणालियों एवं श्रम-संघों के विकास ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्त्व को बढ़ा दिया है । वर्तमान समय में मजदूर संगठित हो चुका है एवं उनका प्रतिनिधित्व श्रम-संघ करने लगे हैं । श्रम-संघों का प्रमुख कार्य अपने सदस्यों की मजदूरी की दर को बढ़वाना तथा उनकी सेवा-शर्तों में सुधार लाना होता है। इसके लिए श्रम-संघ सामूहिक सौदेबाजी का सहारा लेते हैं। आज मजदूरों की मजदूरी ही नहीं बल्कि उनकी अनेक समस्याओं का हल सामूहिक सौदेबाजी से किया जाने लगा है।

सामूहिक सौदेबाजी का अर्थ एवं परिभाषा

सामूहिक सौदेबाजी एक ऐसी पद्धति है जिसके अन्तर्गत बिना किसी तीसरे पक्षकार की सहायता लिये नियोक्ता एवं श्रम-संघ (Trade Unions) आपसी समझौते द्वारा कार्य करने की दशाओं एवं मजदूरी दरों का निर्धारण कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में, सामूहिक सौदेबाजी एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा प्रबधक और श्रमिकों को एक-दूसरे की समस्याओं को समझने का अवसर मिलता है और ये दोनों पक्ष मिलकर समस्या का हल करते हैं। फ्रेड विटनी के अनुसार, “सामूहिक सौदेबाजी रोजगार की शर्तों के संयुक्त निर्धारण का साधन है।”

मजदूरी निर्धारण में सामूहिक सौदेबाजी के प्रभाव का मूल्यांकन

सामान्यतया मजदूरी श्रम की माँग व पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है। श्रम की सीमान्त उत्पादकता मजदूरी की अधिकतम सीमा है तथा रहन-सहन का स्तर मजदूरी की न्यूनतम सीमा है। मजदूरी का निर्धारण इन अधिकतम और न्यूनतम सीमाओं के अन्तर्गत होता है। श्रमिकों में मालिकों की अपेक्षा सौदा करने की शक्ति कम पायी जाती है । अत: मालिक श्रम को न्यूनतम सीमा के आस-पास मजदूरी स्वीकार करने के लिये बाध्य कर देते हैं। श्रम संघ मजदूरों की सौदा करने की शक्ति को बढ़ाकर उनकी मजदूरी में वृद्धि कराने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः मजदूरी निर्धारित में श्रम-संघों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। श्रम-संघ मजदूरी निर्धारण को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं

(1) श्रम-संघ मजदूरी की माँग एवं पूर्ति दोनों को प्रभावित कर सकते हैं और उसके द्वारा ये मजदूरी निर्धारण पर अपना प्रभाव डालते हैं। श्रम-संघ श्रमिकों की पूर्ति को नियन्त्रित करके तथा श्रमिकों की मांग में वृद्धि कराकर मजदूरी-दर में वृद्धि कराने का प्रयास कर सकते हैं।

(2) श्रम-संघ मजदूरी की सौदा करने की शक्ति में वृद्धि करके भी उनकी मजदूरी में वृद्धि कराते हैं। श्रमिक-संघ श्रमिकों को संगठिन कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों की सौदा करने की शक्ति में निश्चय ही वृद्धि हो जाती है । हड़ताल आदि के माध्यम से श्रम-संघ सेवायोजकों को श्रमिकों की अधिकतम सीमान्त उतपादकता के बराबर मजदूरी देने हेतु बाध्य करते हैं।

(3) श्रम-संघ श्रमिकों के लिए अनेक प्रकार की कल्याणकारी योजनाओं को नियोक्ताओं से मनवा लेते हैं। इन कल्याणकारी योजनाओं के लागू होने से श्रमिकों की कार्यक्षमता बढ़ती है। कार्यक्षमता में वृद्धि के कारण श्रमिकों की सीमान्त उत्पादकता में वृद्धि होती है । परिणामस्वरूप उनकी मजदूरी दर में भी वृद्धि होगी।

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