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BCom 1st Year Business Economics Laws of Return or Law of Variable Proportions in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Laws of Return or Law of Variable Proportions in Hindi

 

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BCom 1st Year Business Economics Laws of Return or Law of Variable Proportions in Hindi
BCom 1st Year Business Economics Laws of Return or Law of Variable Proportions in Hindi

 

उत्त्पत्ति के नियम अथवा परिवर्तनशील अनुपातों का नियम

Laws of Returns or Law of variable Proportions

प्रश्न 6-“प्रकृति द्वारा निभायी गई भूमिका उत्पत्ति ह्रास नियम के अनुरूप है जबकि मनुष्य द्वारा निभायी गई भूमिका उत्पत्ति वृद्धि नियम के अनुरूप होती है।व्याख्या कीजिए। 

(2006; 2004 Back)

अथवा

घटते प्रतिफल का नियम परिवर्तनशील अनुपातों के नियम की ही एक अवस्था है। समझाइये क्या यह नियम सार्वभौमिक है

(2004)

अथवा

 ह्मसमान प्रतिफल नियम केवल तार्किक आवश्यकता का विषय है। परन्तु वर्धमार प्रतिफल नियम अनुभवजन्य तथ्य से सम्बन्धित होता है।व्याख्या कीजिए।

(2002 Back)

अथवा

उत्पत्ति हास नियम को रेखाचित्र द्वारा समझाइये। इसकी क्रियाशीलता को कैसे रोका जा सकता है

(2001)

अथवा

उत्पत्ति हास नियम की क्रियाशीलता को रेखाचित्र के द्वारा स्पष्ट कीजिए। क्या यह नियम केवल कृषि में ही लागू होता है ? इसकी क्रियाशीलता को कैसे रोका जा सकता है

(1999, 1997, Back, 1997 Pvt.)

अथवा

उत्पत्ति के नियम की विभिन्न अवस्थायें कौनकौन सी हैं ? एक रेखाचित्र की सहायता से समझाइए। इन अवस्थाओं के लागू होने के कारण बताइए।

(2009)

अथवा

उत्पत्ति ह्रास नियम ही उत्पादन का एक मात्र नियम है। उत्पत्ति वृद्धि तथा समता नियम तो उत्पादन की केवल अस्थायी अवस्थाएँ हैं।व्याख्या कीजिए।

(1994 R)

अथवा

 परिवर्तनशील अनुपातों के नियम को समझाइये तथा इसके लागू होने के कारणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर – ‘उत्पत्ति ह्रास नियम’ या परिवर्तनशील अनुपातों का नियम ‘उत्पत्ति ह्रास नियम’ अर्थशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण एवं प्राचीन नियम है। इस नियम का उल्लेख सर्वप्रथम ‘सर एडवर्ड वेस्ट’ 1815 में अपने एक लेख में किया था, परन्तु इसकी विधिवत् व्याख्या एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस तथा एल्फ्रेड मार्शल ने की। श्रीमती जॉन रॉबिन्सन, बेनहम, बोल्डिग तथा सेम्युल्सन आदि आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने इसे ‘परिवर्तनशील अनुपातों का नियम’ कहा है। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार उत्पत्ति ह्रास नियम केवल कृषि पर ही लागू होता है जबकि आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उत्पत्ति ह्रास नियम एक सर्वव्यापी नियम है जो केवल कृषि पर ही नहीं वरन् उत्पादन के सभी क्षेत्रों में लागू होता है। स्पष्ट है कि इस नियम की व्याख्या ‘परम्परागत’ एवं ‘आधुनिक’ दो दृष्टिकोणों से की जा सकती है जिनकी अलग-अलग विवेचना इस प्रकार है—

परम्परागत व्याख्या (Traditional Explanation) – एडम स्मिथ,रिकार्डी तथा माल्थस जैसे परम्परावादी अर्थशास्त्रियों ने उत्पत्ति ह्रास नियम को केवल कृषि से सम्बन्धित किया. क्योंकि उनका विचार था कि भूमि स्थिर है तथा उत्पत्ति के अन्य साधन परिवर्तनशील हैं। मार्शल ने भी इस नियम की क्रियाशीलता को कृषि क्षेत्र तक ही सीमित रखा। उन्होंने इस नियम को निम्न प्रकार परिभाषित किया है

यदि कृषि कला में कोई सुधार हो तो भूमि पर उपयोग की जाने वाली पूँजी एवं श्रम की मात्रा में वृद्धि करने से कल उपज में सामान्यतया अनुपात से कम वृद्धि होती है।‘ 

उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि मार्शल ने यह माना कि यदि खेती करने के इंग में कोई सुधार नहीं होता है और भूमि की मात्रा को स्थिर रखते हुए पूँजी और श्रम की मात्रा को बढ़ाया जाता है तो इससे कुल उत्पादन में तो वृद्धि होती है परन्तु उत्पादन, साधनों में होने वाली वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़ता।

नियम की आधुनिक व्यारव्या (Modern Interpretation)- आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उत्यति हाम नियम एक सर्वव्यापी नियम है। यह केवल कृषि पर ही नहीं लागू होता वरन उत्पादन के सभी क्षेत्रों में लागू होता है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि इस नियम के लिए यह आवश्यक नहीं कि केवल भूमि ही स्थिर साधन हो । किसी भी एक साधन को स्थिर रखकर अन्य साधनों को बढ़ाया जाता है, तो यह निया क्रियाशील हो जाता है। आधुनिक अर्थशास्त्री इस नियम को “परिवर्तनशील अनुपातों का नियम” कहते हैं। इसे अन्य नामों से भी पुकारा जाता है; जैसे—’अनुपात का नियम’ (Law of Proportionality), प्रातफल का नियम’ (Law of Returns), ‘सीमान्त उत्पादकता ह्रास नियम’ (Law of Diminishing Marginal Productivity) एवं ‘हासमान प्रतिफल नियम (Law of Diminishing Returns)।

इस नियम की आधुनिक अर्थशास्त्रियों द्वारा दी गई कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं |

श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार, “उत्पत्ति ह्रास नियम यह व्यक्त करता है कि उत्पत्ति के किसी एक साधन को स्थिर रखा जाये तथा अन्य साधनों की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि की जाये तो एक निश्चित बिन्दु के पश्चात् उत्पादन की मात्रा में घटती हुई दर में वृद्धि होगी।”

प्रो० स्टिग्लर के अनुसार, “यदि उत्पादन के अन्य साधनों की मात्रा को निश्चित रखकर किसी एक साधन की मात्रा समान परिमाण में बढ़ायी जाये तो इससे उत्पादन में जो वृद्धि होगी, वह एक सीमा के पश्चात् क्रमश: घटने लगेगी।”

प्रो० बेन्हम के अनुसार, “उत्पादन के साधनों के संयोग से किसी एक साधन के अनुपात . को जैसे-जैसे बढ़ाया जाता है वैसे-वैसे एक सीमा के पश्चात् उस साधन की सीमान्त व औसत उपज घटने लगती है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि इस नियम के अनुसार यदि किसी साधन (या साधनों) को स्थिर रखकर अन्य परिवर्तनशील साधनों (या साधन) को बढ़ाया जाता है तो एक सीमा के पश्चात् उत्पादन क्रमश: घटने लगता है।

वस्तुतः इस नियम को कुल उत्पादन (Total Production, TP), औसत उत्पादन (Average Production, AP) तथा सीमान्त उत्पादन (Marginal Production, MP) के संदर्भ में व्यक्त किया जाता है, अतः इस नियम की व्याख्या को समझने के लिए इन तीनों शब्दों का अर्थ जानना आवश्यक है

कल उत्पादन (T.P) – कुछ साधनों को स्थिर रखकर, किसी अन्य परिवर्तनशील साधन की निश्चित इकाइयों के प्रयोग से जो उत्पादन प्राप्त होता है, वह ‘कुल उत्पादन’ कहलाता है।

सीमान्त उत्पादन (M.P) – परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल उत्पादन में जो वृद्धि होती है उसे ‘सीमान्त उत्पादन’ कहते हैं।

औसत उत्पादन (A.P.) – कुल उत्पादन को परिवर्तनशील साधन की प्रयोग की जाने वाली कुल इकाइयों से भाग देने पर जो उत्पादन प्राप्त होता है, उसे ‘औसत उत्पादन’ कहते

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण श्रम को परिवर्तनशील तथा अन्य साधनों (भूमि और पूँजी) को स्थिर मानते हुये जब श्रम की उत्तरोत्तर इकाइयों को लगाया जाता है तो अमुक वस्तु का उत्पादन निम्नलिखित प्रकार होता है –

 

श्रम की इकाइयाँकुल उत्पादन

(कि्वंटल में)

औसत उत्पादन (कि्वंटल में)सीमान्त उत्पादन (कि्वंटल में)विशेष कथन
1555प्रथम अवसथा
21267
32179
4266.55दूसरी अवसथा
53064
6335.53
73552
8324-3तृतीय अवसथा

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि श्रम की तीन इकाइयाँ लगाने तक कुल उत्पादन बढ़ती हुई दर से बढ़ता है और इसके पश्चात् श्रम की 7 इकाई तक घटती हुई दर से बढ़ता है, किन्तु कवी इकाई पर कुल उत्पादन कम हो जाता है और सीमान्त उत्पादन (-3) हो जाता है । इसको निम्न चित्र द्वारा भी दिखाया जा सकता है

चित्र में OX रेखा श्रमिकों की संख्या तथा OY रेखा पर उत्पादन को दिखाया गया है। कुल उत्पादन वक्र TP पहले S बिन्दु तक तेजी से बढ़ता है और इस दौरान सीमान्त उत्पत्ति

और औसत उत्पत्ति भी बढ़ती है, किन्तु कुल उत्पादन वक्र S बिन्दु के पश्चात् R बिन्दु तक बढ़ता तो है किन्तु वह घटती हुई दर से बढ़ता है। ऐसी दशा में औसत उत्पादन और सीमान्त उत्पादन भी घटते हैं। इसके बाद कुल उत्पादन वक्र ऋणात्मक हो जाता है अर्थात् कुल उत्पादन घटता है। ऐसी दशा में सदैव सीमान्त उत्पादन भी ऋणात्मक होगा और औसत उत्पादन भी

घटती दर से प्राप्त होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जब अन्य साधनों की निश्चित मात्रा के साथ परिवर्तनशील साधन की अधिक इकाइयाँ लगाते हैं तो अन्य वातें समान रहने पर हम ऐसे बिन्दुओं पर पहुँच जाते है जहाँ सीमान्त, फिर औसत तथा अन्त में कुल उत्पादन घटने लगता है । यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य है कि ‘परिवर्तनशील अनुपातों के नियम’ को उपर्युक्त वर्णित  तीनो अवस्थाएँ प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित

(1) उत्पनि हास नियम,

(ii) उत्पत्ति समता नियम तथा

(iii) उत्पति वृद्धि नियम तीनों नियमों का एक ही नियम के अन्तर्गत स्पष्ट करती है। इसलिए यह कहा जाता है कि “उत्पत्ति का केवल एक ही आधारभूत नियम है और वह है उत्पत्ति ह्रास नियम । उत्पत्ति वृद्धि एवं उत्पत्ति प्रियाता (ममता) नियम केवल उत्पत्ति ह्रास नियम के ही अस्थायी रूप हैं।”

नियम की मान्यतायें

(Assumptions of the Law)

यह नियम निनलिखित मान्यताओं पर आधारित है

(i) उत्पादन साधनों के संयोगों के अनुपात में इच्छानुसार परिवर्तन किया जा सकता है ।

(ii) एक साधन परिवर्तनशील होता है, जबकि अन्य साधन स्थिर होते हैं अथवा एक साधन स्थिर होता है जबकि अन्य साधन परिवर्तनशील होते है।

(ii) परिवर्तनशील साधनों व स्थिर साधनों की सभी इकाइयाँ समरूप (एक जैसी) होती हैं।

(iv) उत्पादन की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होता।

(v) यह नियम केवल अल्पकाल में ही लागू होता है। ..

(vi) इस नियम का सम्बन्ध केवल उत्पादित वस्तु की भौतिक मात्रा से है न कि उसके बाजार मूल्य से।

(vii) उत्पादन साधन को छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त किया जा सकता है।

नियम की क्रियाशीलता के कारण

(Causes of the Operation of the Law)

मार्शल ने इस नियम के क्रियाशील होने पर प्रकृति की कंजूसी पर ध्यान दिया था, परन्तु यह दृष्ठिकोण उचित नहीं है। यह नियम केवल कृषि में नहीं वरन् उत्पादन के सभी क्षेत्र में . लागू होता है, जिसके निम्नलिखित कारण हैं

(1) एक या कुछ साधनों का स्थिर होना इसमें उत्पत्ति के एक या कुछ साधनों को स्थिर रखा जाता है, जिससे परिवर्तनशील साधनों की मात्रा बढ़ाने से स्थिर साधनों पर दबाव बढ़ जाता है और यह नियम क्रियाशील हो जाता है।

(2) साधनों की पूर्ति सीमित होना उत्पत्ति के कुछ साधनों; जैसे- भूमि की पूर्ति अत्यन्त .. सीमित होती है तथा उसे दीर्घकाल में भी आवश्यकतानुसार बढ़ाया नहीं जा सकता, अत: यह नियम क्रियाशील हो जाता है।

(3) साधनों का अपूर्ण स्थानापन्न होना- श्रीमती जॉन रॉबिन्सन के अनुसार, एक साधन को दूसरे साधन के स्थान पर केवल एक सीमा तक ही प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

(4) अनुकूलतम बिन्दु के बाद की स्थिति अल्पकाल में फर्म का औसत लागत वक्र U के आकार का होता है तथा इसका न्यूनतम बिन्दु न्यूनतम लागत का प्रतीक होता है। यदि कोई फर्म इस बिन्दु के दाहिनी और उत्पादन करती है तो प्रति इकाई उत्पादन लागत बढ़ने लगती है और यह नियम क्रियाशील हो जाता है।

क्या यह नियम मात्र कृषि में लागू होता है : उत्पत्ति ह्रास नियम का क्षेत्र

(Does the Law apply to Agriculture alone : The Scope of the Law) 

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री एडम स्मिथ, रिकार्डो और माल्थस ने इस नियम को पूर्णतया कषि तक ही सीमित रखा। प्रो. मार्शल ने भी इस नियम को अधिकांश रूप से कृषि क्षेत्र तक ही सीमित रखा, यद्यपि प्रो० मार्शल ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम कृषि, खनन, उद्योग, मछली पकड़ने तथा मकानों के निर्माण आदि में लागू होता है, परन्तु प्रो० मार्शल का मत था कि यह नियम विनिर्माण उद्योगों में लागू नहीं होता है।

मा आधनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उत्पत्ति ह्रास नियम एक आधारभूत प्रवृत्ति को बताता .. है इसलिए वह कृषि तथा विनिर्माण उद्योगों एवं अन्य सभी प्रकार की उत्पादन क्रियाओं के सम्बन्ध में लागू होता है। .. हाँ इतना अवश्य है कि यह नियम कृषि क्षेत्र में शीघ्रता से लाग होता है जबकि लोगों में कुछ देर से।

क्या नियम की क्रियाशीलता को स्थगित किया जा सकता है?

(Can the Operation of the Law be Postponed)

 

जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है कि उत्पत्ति ह्रास नियम एक तार्किक अनिवार्यता है, इसकी क्रियाशीलता को कुछ समय के लिए स्थगित तो किया जा सकता है, किन्तु इसे दीर्घकाल तक लागू होने से रोका नहीं जा सकता । उदाहरण के लिए, कृषि क्षेत्र में नये-नये वैज्ञानिक अनुसंधानों, आधुनिक मशीनों के प्रयोग,उन्नत तकनीकी,बीज व उर्वरकों के प्रयोग से इस नियम की क्रियाशीलता को कुछ समय के लिए स्थगित किया जा सकता है, किन्तु अन्ततः यह नियम अवश्य लागू होगा। इसी प्रकार विनिर्माणी उद्योगों (Manufacturing Industries) में उत्पादन की आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से इस नियम को अपेक्षाकृत अधिक समय के लिये टाला जा सकता है, किन्तु इसकी क्रियाशीलता को पूर्णतः स्थगित नहीं किया जा सकता।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि एक विकसित देश, विकासशील देशों की तुलना में इस . नियम की क्रियाशीलता को अधिक समय तक रोक सकता है। इसी प्रकार कृषि क्षेत्र की तुलना में औद्योगिक क्षेत्र में इस नियम की क्रियाशीलता को अधिक समय के लिए स्थगित किया जा सकता है।

 

उत्पत्ति ह्रास नियम का महत्त्व

(Importance of the Law of Diminishing Returns)

 

विक्स्टीड के शब्दों में, “घटते प्रतिफल का नियम उतना ही सार्वभौमिक है जितना कि जीवन का नियम।” इस नियम का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है

 

(1) अर्थशास्त्र के अनेक नियमों एवं सिद्धान्तों का आधार इसी नियम के आधार पर अर्थशास्त्र के अनेक नियमों एवं सिद्धान्तों का निर्माण हुआ है जैसे

(i) माल्थस का जनसंख्या का सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।

(ii). रिकार्डो का लगान सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है।

(iii) उपभोग क्षेत्र में ह्रासमान सीमान्त उपयोगिता का नियम इसी नियम पर आधारित हैं |

(iv) वितरण के क्षेत्र में सीमान्त उत्पादकता का नियम इसी नियम पर आधारित है।

 

(2) आविष्कारों की प्रेरणा अधिक उत्पादन करने के प्रयास में इस नियम की क्रियाशीलता बाधक होती है, अतः उत्पादन की नई-नई विधियों के द्वारा इस नियम की क्रियाशीलता को स्थगित करने का प्रयत्न किया जाता है। इससे उत्पादन के क्षेत्र में अनेक नये-नये अविष्कारों को करने की प्रेरणा प्राप्त होती है।

 

(3) जनप्रवास का कारण इस नियम की क्रियाशीलता जनसंख्या के एक स्थान से , दूसरे स्थान पर प्रवास के लिए भी उत्तरदायी होती है। यदि यह नियम लागू न होता तो एक ही खेत या कारखाने से विश्व की समस्त जनसंख्या की आवश्यकता की पूर्ति सम्भव हो जाती और व्यक्तियों को एक देश से दूसरे देश या एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की आवश्यकता न होती।

 

(4) जीवन स्तर पर प्रभाव-यदि किसी देश के उद्योगों में यह नियम शीघ्र क्रियाशील हो जाता है तो उस देश में उत्पादन तथा प्रति व्यक्ति आय में कमी हो जाती है। इससे वहाँ के व्यक्तियों का रहन-सहन का स्तर नीचा हो जाता है । इसके विपरीत यदि यह नियम उद्योगों में बहुत लम्बे समय तक लागू नहीं होता तो उत्पादन और प्रति व्यक्ति आय अधिक होने से वहाँ के लोगों का रहन-सहन का स्तर ऊँचा होगा।

उपर्युक्त वर्णन से इस नियम का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है। यह एक सर्वव्यापी नियम हैं। यद्यपि मनुष्य अपनी कार्यक्षमता एवं उत्पादन विधि में उन्नति करके इस नियम की क्रियाशीलता को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकता है, किन्तु इसे वह सदैव के लिए समाप्त नहीं कर सकता। यदि ऐसा हो पाता तो मानव समाज आज अनेक आर्थिक कठिनाइयों से मुक्त हो जाता।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

(Short Answer Questions)

 

प्रश्न 1-उत्पत्ति वृद्धि नियम की व्याख्या कीजिये। इसके लागू होने के क्या कारण

 

उत्तर जब उत्पादन के एक या एक से अधिक साधनों को स्थिर रखकर,अन्य परिवर्तनशील साधनों (अथवा साधन) की मात्राओं में वृद्धि करने के परिणामस्वरूप उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में की गई वृद्धि के अनुपात या प्रतिशत की तुलना में वस्तु के कुल उत्पादन में हुई वृद्धि . . का अनुपात या प्रतिशत अधिक होता है तो उसे उत्पत्ति वृद्धि नियम कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में की गई वृद्धि के अनुपात या प्रतिशत की तुलना में वस्तु के कुल उत्पादन की मात्रा में होने वाली वृद्धि का अनुपात या प्रतिशत अधिक होता है तो उसे उत्पत्ति वृद्धि नियम कहते हैं । उत्पति वृद्धि नियम उत्पादन की प्रारम्भिक अवस्था में लागू होता हैं |

 

नियम की व्याख्याउत्पत्ति वृद्धि नियम यह बताता है कि उत्पत्ति के साधनों की मात्रा में वृद्धि करने पर संगठन में सुधार हो जाता है और साधनों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है । बाह्य । एवं आन्तरिक बचतें प्राप्त होती हैं । परिणामस्वरूप सीमान्त उत्पादन बढ़ता है और कुल उत्पादन एवं औसत उत्पादन में भी तेजी से वृद्धि होने लगती है । उत्पादन वृद्धि का यह क्रम तब तक चलता रहता है जब साधनों का अनुपात अनुकूलतम नहीं हो जाता है । इस अनुकूलतम बिन्दु के बाद भी यदि साधनों के अनुपात में वृद्धि जारी रखी गई तो उसके बाद सीमान्त उत्पादन तथा औसत उत्पादन में कमी आने लगती है अर्थात् उत्पत्ति ह्रास नियम लागू हो जाता है।

इस नियम को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। मान लिया, उत्पत्ति के अन्य साधनों को स्थिर रखकर श्रम की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो उत्पादन निम्न तालिका के . अनुसार प्राप्त होता है

 

तालिका

 

परिवर्तन साधन (श्रम)

की इकाइयाँ

कुल उत्पादन (TP)सीमान्त उत्पादन

(MP)

औसत उत्पादन (AP)
1101010
2241412
3482416
4503220
51204024

 

 

उपर्यक्त तालिका से स्पष्ट है कि अन्य साधनों को स्थिर रखकर श्रम की मात्रा बढाने से सीमान्त उत्पादन (MP) तथा असित उत्पादन (AP) बढ़ता है तथा कुल उत्पादन में बढ़ती हुई दर से वृद्धि होती है।

 

चित्र की सहायता से उत्पत्ति वृद्धि नियम को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। उत्पत्ति वृद्धि नियम को लागत ह्रास नियम भी कहा जा सकता है, क्योंकि जिस अनुपात में उत्पादन के साधनों की वृद्धि की जाती है उससे अधिक मात्रा में उत्पादन में वृद्धि होती है ।, इसलिये सीमान्त लागत तथा औसत लागत घटती है। इन लागतों के घटने के कारण ही इस नियम को लागत ह्रास नियम भी कहते हैं।

 

उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होने के । निम्नलिखित कारण हैं –

(i) बड़े पैमाने की उत्पादन की बचतें,

(ii) साधनों की अविभाज्यता,

(iii) साधनों का अनुकूलतम संयोग,

(iv) श्रम विभाजन तथा विशिष्टकरण आदि।

 

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