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Proposal and Acceptance Communication and Revocation Business Law Notes

Proposal and Acceptance Communication and Revocation Business Law Notes

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Proposal and Acceptance Communication and Revocation Business Law Notes
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(Communication of proposal and acceptance) प्रस्ताव एवं स्वीकृति का संवहन

प्रस्ताव एवं स्वीकृति तभी वैध माने जाते है जब उनकी सुचना दुसरे पक्ष को दे दी जाती है | प्रस्तक की सुचना मिले बिना स्वीकृति महत्वहीन है तथा स्वीकृति की इच्छा दिल में रखना और प्रकट न करना भी महत्वहीन है | जब प्रस्तावक एवं स्वीकर्ता अपने-सामने हो तो संवहन की कोई समस्या उत्पन्न नही होती | परन्तु जब दोनों पक्ष एक दुसरे से दूर है तथा वे डाक के माध्यम से समझौते करते है जब यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है की प्रस्ताव एवं स्वीकृति का संवहन कब पूर्ण माना जाये? इस सम्बन्ध में निम्नलिखित नियम है –

प्रस्ताव का संवहन (Communication of Proposal) – भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, “प्रस्ताव का संवहन यह सुचना तब पूर्ण मानी जाती है जैसे राम, श्याम को एक पत्र द्वारा अपना मकान 80,000 रूपये मे बेचने का प्रस्ताव करता है | इस प्रस्ताव का संवहन उस समय पूर्ण माना जायेगा जब प्रस्ताव का पत्र श्याम को मिल जाये |




स्वीकृति का संवहन (Communication of Acceptance) – धारा 4 के अनुसार स्वीकृति के संवहन के सम्बन्ध निम्नलिखित नियम है  –

(अ) प्रस्ताव के विरुद्ध (An Against Proposer) – (अर्थात् प्रस्तावक को बाध्य करने के लिये) उस समय पूरा माना जायेगा जबकि स्वीकर्ता ने स्वीकृति को प्रेषित कर दिया है तथा इन स्वीकृति को वापस लेना उसकी शक्ति से बाहर हो गया | दुसरे शब्दों में, स्वीकृति पत्र डाक छोड़ दिया जाता है, जिससे की फिर स्वीकृति-पत्र को वापस ले उसकी (स्वीकर्ता) शक्ति से बाहर हो जाता है |

(ब) स्वीकारक के विरुद्ध (An Against Acceptor) – (स्वीकर्ता को बाध्य करने के लिये) उस समय पूरा जायेगा जब स्वीकृति-पत्र वास्तव में प्रस्तावक की जानकारी में आ जाता है | दुसरे शब्दों में, जब स्वीकृति-पत्र वास्तव में प्रस्तावक के पास पहुँच जाता है | उदहारणणार्थ, विजय डाक पत्र भेजकर, अजय के पत्र को स्वीकार करता है | अजय के विरुध्द स्वीकृति का संवहन तब पूर्ण हुआ जायेगा जबकि विजय ने स्वीकृति को डाकखाने में अजय के पास पहुचने के लिये डाल दिया हो | विही के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन तब पूर्ण होगा जबकि अजय को विजय का स्वीकृति-पत्र प्राप्त हो जायेगा |

स्वीकृति के संवहन के सम्बन्ध में अन्य महत्वपूर्ण बाते –

1 टेलीफोन पर स्वीकृति के सम्बन्ध में अनुबन्ध अधिनियम में कोई उल्लेख नही है | अत: इसमें वही नियम लागु होते है जो पक्षकारो द्वारा एक-दुसरे के सामने-दुसरे किये गये अनुबन्धो पर लागु होते है |

2) टेलेक्स पर किये गये प्रस्ताव की स्वीकृति का संवहन उस समय पूरा हुआ माना जाता है जबकि यह टेलेक्स पर आ जाती है |

3) यदि स्वीकृति पत्र डाक में खो जाता है या देर से पहुचता है तब भी प्रस्तावक स्वीकृति से बाध्य माना जाता है, परन्तु प्रस्तावक को बाध्य करने के लिये यह सिध्द करना आवश्यक है की स्वीकृति-पत्र डाक में डाला था |

4) स्वीकर्ता की गलती से स्वीक्रति अशुध्द पते द्वारा भेज दी जाये तो प्रस्तावक इस तरह की स्वीक्रति के लिय बाध्य नही होगा और इस तरह की स्वीकृति उचित ढंग से भेजी हुई नही समझी जायेगी | किन्तु जब प्रस्तावक स्वयम गलत पता दे और यह स्वीकर्ता द्वारा प्रयोग में लाया जाये, तब इस तरह की स्वीकृति नियमित समझी जायगी |

प्रस्ताव की स्वीकृति का खण्डन (Revocation of Proposals and Acceptances)

खण्डन का तात्पर्य किसी पक्षकार द्वारा दिये वचन को ‘वापस लेने’ या ‘रद करने’ से है | प्रस्तावक अपने प्रस्ताव को तथा स्वीकर्ता अपनी स्वीकृति को वापस लेकर प्रस्ताव या स्वीकृति का खण्डन करते सकते है | व्यवहार में ऐसी अनेक स्थितियाँ आती है जब प्रस्तावक अपने प्रस्ताव का या स्वीकृती को वापस लेना चहाता है | प्रश्न यह है की प्रस्ताव और स्वीक्रति का खण्डन कब तक किया जाता है | इस सम्बन्ध में भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 5 में निम्नलिखित व्यवस्था दी गई है –

“प्रस्ताव का खण्डन प्रस्ताविक के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन पूरा होने के पहले किसी भी समय किया जा सकता है परन्तु बाद में नही, जबकि स्वीकृति का खण्डन स्वीकर्ता के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन पूरा होने से पहले किसी भी समय भी किया जा सकता है परन्तु बाद में नही |”

उदाहारण द्वारा स्पष्टीकरण – ‘अ’ 1 जनवरी को एक पत्र द्वारा अपना मकान 80,000 रूपये में ‘ब’ को बेचने का प्रस्ताव करता है | ‘ब’ को यह पत्र 4 जनवरी को प्राप्त होता है  ‘ब’ 5 जनवरी को अपनी स्वीकृति, पत्र द्वारा भेज देता है | यह स्वीकृति पत्र ‘ऊ’ को 8 जनवरी को प्राप्त होता है | ऐसी दशा में ‘अ’ अपने प्रस्ताव को 5 जनवरी से पूर्व अर्थात् ‘ब’ द्वारा स्वीकृति पत्र को डाक में डालने से पूर्व किसी भी समय ‘ब’ अपनी स्वीकृत का खण्डन 8 जनवरी के पूर्व अर्थात् ‘अ’ को स्वीकृति पत्र मिलने के पूर्व किसी भी समय कर सकता है |

प्रस्ताव के खण्डन की रीतियाँ (Modes of Revocation of an Offer) – अनुबन्ध अधिनियम की धारा 6 के अनुसार निम्नलिखित रीतियों से प्रस्ताव का अंत अथवा खण्डन हो जाता है |



1) प्रस्तावक द्वारा दुसरे पक्षकार को खण्डन की सुचना देकर (By Notice of Revocation) धारा 5 की व्यवस्थाओं के अनुसार प्रस्ताव का खण्डन प्रस्तावक के विरुद्ध स्वीकृति का संवहन पूर्ण होने से किसी भी समय किया जा सकता है किन्तु बाद में नही ऐसा खण्डन स्पष्ट शब्दों द्वारा, पत्र या तार द्वारा अथवा आचरण द्वारा भी हो सकता है | भारतीय राजनियम के अनुसार यह आवश्यक है की खण्डन सुचना प्रस्तावक या उससे अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा दी जाये | इंग्लिश राजनियम के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति से भी वचनग्रहीता को प्रस्ताव के खण्डन की सूचना मिल जाती है तो भी खण्डन पूरा हो जाता है |

2) अवधि संपत हो जाने पर (By Lapse of Time) – यदि प्रस्ताव में स्वीकृति के लिये कोई समय निर्धारित किया जाता है तो उस निर्धारित समय के अन्दर ही प्रस्ताव की स्वीकृति वैध मानी जयेगी | उस निर्धारित समय के उपरांत प्रस्ताव खण्डित माना जाता है |

यदि प्रस्ताव पर स्वीकृति के लिये कोई सम्यत निर्धारित नही किया गया है तो उचित अवधि के बीत जाने पर प्रस्ताव का खण्डन हो जाता है | अब प्रश्न यह उठता है की उचित समय क्या है? यह प्रस्ताव की प्रकृति, उसकी शर्तो एवं एनी समस्त परिस्थितियों पर निर्भर करता है |

3) स्वीकर्ता द्वारा किसी पूर्व निर्धारित शर्त को पूरा न करने पर (By Non-fulfillment of any Pre-condition) – यदि प्रस्ताव के अनुसार स्वीकर्ता को स्वीकृति देने से पहले किसी शर्त को पूरा करना आवश्यक है तो ऐसी शर्त पूरी न करने की दशा में प्रस्ताव का खण्डन हो जाता है | उदाहरण के लिये यदि प्रस्ताविक ने स्वीकृति के साथ कुछ अग्रिम धनराशी भेजने के लिये कहा हो और स्वीकर्ता पेशगी रकम नही भेजता है तो स्वीकृति की वुध नही माना जा सकता और प्रस्ताव को खण्डित माना जायेगा |

4) प्रस्ताविक की मृत्यु या पागल हो जाने पर (By Death of Insanity of the Proposer) –जब प्रस्ताविक की मृत्यु हो जाती है या वह पागल हो जाता है और इस बात की जानकरी स्वीकर्ता देने को स्वीक्रति देने से पहले ही हो जाती है तो ऐसी दशा में प्रस्ताव का खण्डन हो जाता है | इसके विपरीत यदि स्वीकर्ता प्रस्तावक की मृत्यु या पागल होने की जानकारी मिलने से पूर्व ही स्वीक्रति प्रदान कर देता है तो ऐसी स्वीकृति वैध होगी अर्थात् प्रस्ताविक कानूनी प्रतिनिधि प्रस्ताव को पूरा करने के लिये बाध्य होगा |

5) प्रति प्रस्ताव करने पर (By Counter Offer) –जब मूल प्रस्ताव के प्रत्युतर में स्वीकर्ता अपनी ओर से अन्य प्रस्ताव रखता है तो ऐसी दशा में मूल प्रस्ताव का खण्डन हो जाता है | उदहारण के लिये, ‘अ’ अपनी कार 50,000 रूपये में बेचने का प्रस्ताव ‘ब’ के समक्ष रखता है | ‘ब’ पत्र द्वारा कार को 35,000 रूपये में खरीदने की सुचना देता है | यहाँ पर 50,000 रूपये में कार बेचने का मूल प्रस्ताव खंडित माना जायेगा |

6) निर्धारित ढंग से स्वीकृति न दिये जाने पर (Acceptance is not given in the given in the Prescribed Manner) – यदि प्रस्ताव में स्वीकृति का कोई तरीका निर्धारित किया गया है और स्वीकृति उस निर्धारित तरीके से नही दी गई है तो प्रस्ताव खण्डित माना जायेगा | लेकिन ऐसा तभी होगा जब प्रस्तावक द्वारा उचित समय के अंदर स्वीकर्ता को इस बात की सुचना दे दी गई हो | यदि प्रस्तावक स्वयं इस बात पर मौन रखता है तो यह माना जायेगा की प्रस्तावक द्वारा स्वीकृति को मान लिया गया है |





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