Indian Contract Act 1872 Bcom Business Law

Indian Contract Act 1872 Bcom Business Law

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Indian Contract Act 1872 Bcom Business Law
Indian Contract Act 1872 Bcom Business Law

 

(Indian Contract Act, 1872) भारतीय अनुबन्ध अधिनियम, 1872

अनुबन्ध: सामान्य अध्ययन (Contract: General Study)

हमारे दैनिक जीवन में अनुबन्धो का विशेष स्थान है | हम प्राय: प्रतिदिन जाने-अनजाने अनेक अनुबन्ध करते हिया जिसमे कोई वादा (प्रतिज्ञा) (Promise) किया जाता है | जैसे बस में सवार होना, पुस्तकालय से पुस्तक लेना, अपना समान रेल के अमानती घर में जमा करना या कोई वस्तु उधार खरीदना आदि | जब उम बस में सवार होते है तब हमारे एवं बस मालिक के बीच एक अनुबंध हो जाता है जिसके अंतर्गत बस कंपनी एक निश्चित किराये के बदले में हमे निश्चित स्थान तक पहुँचाने का वजन देते है | वास्तविकता यह है कि अनुबन्ध करने वाले व्यक्तियों को सामान्यत: इसके कानूनी पक्ष का भी आभास नही होता एवं प्राय: वे एक और ध्यान भी देते है | व्यापर जगत में अनुबन्ध अधिनियम का महत्व और भी आधिक है क्योंकि प्राय: समस्त व्यापर, अनुबन्ध पर ही आधारित होता है | अनुबन्ध अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार अनुबंध करने वाले व्यक्ति अपने-अपने वजनो का पूरा करने के लिये क़ानूनी रूप से बाध्य होते है | यदि कोई व्यक्ति अपने दिए हुये वजन को पूरा नही करता तो दूसरा व्यक्ति अपने विरुद्ध न्यायालय में वाद (मुकदमा) करके दिए हुए वजन को पूरा कर सकता है अत: न केवल व्यापारियों के लिए बल्कि प्रत्येक साधारण व्यक्ति के लिये भी अनुबंध अधिनियम की व्यवस्थाओ का ज्ञान प्राप्त करना लाभदायक एवं महत्वपूर्ण है |

भारत में जिस सन्नियम (Law) द्वारा अनुबन्ध से उत्पन्न हुये पक्षकारो के अधिकारों और दायित्वों का नियमन और निपटारा किया जाता है, उसे भारतीय अनुबन्ध अधिनियम, 1982 ( Indian Contrast Act, 1982) |

यह अधिनियम जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर समस्त भारत में लागु होता है | इस अधिनियम को 25 अप्रैल, 1872 को तत्कालीन गवर्नर जनरल ने स्वीक्रति प्रदान की थी और यह अधिनियम 1 सितम्बर, 1872 से प्रभावित हुआ |




अनुबन्ध का अथ एवं परिभाषा (Meaning of definition of contract) – ‘अनुबन्ध’ शब्द अंग्रेजी के ‘Contract’ शब्द का हिंदी अनुवाद है | अंग्रेजी भाषा के ‘Contract’ शब्द की उत्पति लेटिन भाषा के ‘Contractun’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ साथ मिलने से है | इस द्रष्टिकोण से दो या दो से अधिक व्यक्तियों को किसी ठराव के लिये मिलाना ही अनुबन्ध है | इसमें हिन्दी में ‘सविंदा’ या ‘करार’ भी कहते इया | कानूनों रूप में दो या दो से अधिक पक्षकारो के बिच किये गए बे ठहराव जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय हिया, अनुबन्ध कहलाती हिया |

अनुबन्ध के मुख्य परिभाषाएँ निम्न प्रकार है –

सालमण्ड (Salmond) के अनुसार, “अनुबन्ध एक ऐसा ठहराव है जो पक्षकारो के मध्य दायित्व उत्पन्न करता है और उन दायित्वों की व्याख्या करता है |” (Contract is an agreement creating and defining obligations between the parties,)

सर विलियन एन्सन – के अनुसार, “अनुबन्ध दो या दो से आधिक व्यक्तियो के बीच किया गया एक ऐसा ठहराव है जो की राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होता है तथा जिसको द्वारा एक या अधिक पक्षकार दुसरे पक्षकार अथवा पक्षकारो के विरुध किसी भी कार्य को करने या न करने के लिए कुछ आधिकार प्राप्त कर लेते है |” (A contract is an agreement enforceable at law made between two or more persons, by which rights are acquired by one or more acts or forbearance on the part of the other or others,)

सर फ्रेडरिक पोलाक (Sir Fredric Pollock) के अनुसार, “प्रत्येक ठहराव तथा वजन जो राजनियम द्वारा  प्रवर्तनीय हो, अनुबन्ध कहलाते है |” (Every agreement and promise enforceable by law is a Contract,)

भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 2 (एच) के अनुसार, “ऐसा ठहराव जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होता है, अनुबन्ध कहलाता है |” (An agreement enforceable at law is Contract,)

उपरोक्त सभी परिभाषाओ में सर फ्रेडरिक पोलाक की परिभाषा अधिक उपयुक्त एवं वैज्ञानिक है तथा अनुबन्ध अधिनियम में दी गई परिभाषा से मिलती-जुलती है | यह भी उल्लेखनीय है की उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर अनुबन्ध के लिये निम्नलिखित बातो का होना आवश्यक है-

1, पक्षकारो के मध्य ठहराव का होना – अनुबन्ध होने के लिये ठहराव का होना आवश्यक होता है | जब दो या दो से आधिक व्यक्ति किसी कार्य को करने या न करने के लिये वचनबद्ध हो तो उसे ठहराव कहते है | सरल शब्दों में ठहराव की उत्पति एक पक्षकार द्वारा प्रस्ताव करने और दुसरे पक्षकार द्वारा उसकी स्वीकृति करने पर होती है | अत: ठहराव के लिये कम से कम दो पक्षकारो का होना आवश्यक है | उदारणार्थ, आशीष विपुल के समक्ष अपना स्कूटर रूपये ने बेचने का प्रस्ताव रखता है और विपुल के के इस प्रस्ताव को को स्वीकार कर लेता है | विपुल द्वारा स्वीकृति देने पर आशीष एवं विपुल के बीच एक ठहराव हो जाता है |

2, ठहराव द्वारा वैधानिक उतरदयित्व का उतन्न होना – अनुबन्ध के लिये यह आवश्यक है की ठहराव वैधानिक सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा से किया गया हो जिसमे पक्षकारो के बीच वैधानिक उतरदयित्व उत्पन्न हो | ऐसे दयित्व जिनका पूरा करने के लिये सामाजिक, राजनैतिक या अन्य किसी प्रकार के ठहराव जिनमे पक्षकारो का इरादा किसी प्रकार का वैधानिक उतरदयित्व उत्पन्न करने का नही होता, उन्हें अनुबन्ध नही कह सकते | कही पर घुमने जाने, सिनेमा देखने जाने अथवा दावत में सम्मिलित होने के लिये दी गई सहमति से किसी प्रकार के वैधानिक दयित्व उत्पन्न नही होते और इसलिये ऐसे ठहराव कभी भी अनुबन्ध का रूप धारण नही कर सकते |

3, वैधानिक दयित्व का राजनियम (कानून) द्वारा प्रवर्तनीय होना – कोई ठहराव तभी अनुबन्ध का रूप लेता है जब कानून द्वारा प्रवर्तनीय होता है अर्थात आदि कोई पक्ष अपने वजन को पूरा नही करता है तो दुसर पक्ष उसे न्यायालय की सहायता से वजन को पूरा करने के लिये बाध्य कर सकता है सरल शब्दों में कोई ठहराव राजनियम द्वारा तभी प्रवर्तनीय मन जाता है जब पीड़ित पक्षकार दुसरे पक्ष के विरुध्द (उस पक्ष के विरुध्द जिसने अपने दिये हुये वचन को पूरा नही किया है) क़ानूनी कार्यवाही कर सकता है | पशन यह की कौन से लिये आवश्यक बातो का उल्लेख इस अधिनियम किओ धारा 10 में किया गया है जो इस प्रकार है –

“समस्त ठहराव अनुबन्ध है, यदि वे उन पक्षकारो की स्वतन्त्र सहमति से किये जाते है जो अनुबन्ध करने के की क्षमता रखता है, वैधानिक प्रतिफल के लिए तथा वैधानिक उदेश्य से किये जाते है और इस अधिनियम के द्वारा स्पष्ट रूपों से व्यर्थ घोषित नहीं कर दिये गये है | इसके अतिरिक्त ठहराव लिखित हो अथवा साक्षी द्वारा प्रमाणित हो अथवा रजिस्टर्ड हो यदि भारत में प्रचलित किसी विशेष राजनियम द्वारा ऐसा होना अनिवार्य हो |”




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वैध अनुबन्ध के आवश्यक लक्षण (Essentials of a Valid Contract) – भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 2 (एच) एवं धारा 10 में दिये गये स्पष्टीकरण के अनुसार एक वैध अनुबन्ध में निम्नलिखित लक्षणों का होना आवश्यक है –

1, ठहराव का होना (Agreement) – एक वैध अनुबन्ध के लिये ठहराव का होना आवश्यक है | ठहराव के लिये वैध प्रस्ताव और वैध स्वीक्रति का होना आवश्यक है अर्थात् प्रस्ताव एवं स्वीकृति भारतीय अनुबन्ध अधिनियम में प्रस्ताव एवं स्वीक्रति के सम्बन्ध में दिये गये नियमो के अनुसार होने चाहियें | इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है की ठहराव में दोनों पक्षकारो की इच्छा वैधानिक उतरदयित्व उत्पन्न करने की होनी चाहियें अर्थात् ठहराव वैधानिक (क़ानूनी) रूप से दोनों पक्षकारो पर लागु होंना चाहियें | यदि पक्षकारो की इच्छा ठहराव द्वारा कोई सामजिक या राजनैतिक सम्बन्ध स्थापित करने की है तो यह अनुबन्ध नही होगा | उदहारण के लिये राम, श्याम को अपमे घर पर भोजन के लिये आमन्त्रित करता है और श्याम इस पर अपनी स्वीकृति दे देता है | परन्तु किसी आवश्यक कार्य में व्यस्थ होने के कारण श्याम भोजन पर नही आता अथवा राम भोजन की अवस्था नहीं कर पाता हिया तो पीड़ित पक्षकार दुसरे के विरुध्द कोई कानून कार्यवाही नही कर सकता क्योकि उक्त ठहराव में पक्षकारो के मध्य कोई वैधानिक उतरदयित्व उत्पन्न नही होता |

2, पक्षकारो में अनुबन्ध करने की क्षमता (Contractual Capacity to Parties) – ‘अनुबन्ध’ होने के लिये आवश्यक ही की ठहराव ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाना चहिये जो वैधानिक द्रष्टि से अनुबन्ध करने की क्षमता रखते हो | भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 11 के अनुसार वही व्यक्ति अनुबन्ध रखने की क्षमता रखते है जो –

(i) देश में प्रचलित राजनियम के अनुसार व्यस्क (Major) है,

(ii) स्वस्थ मस्तिष्क (Sound Mind) के है तथा

(iii) किसी अन्य राजनियम द्वारा (जिसके अधीन वे है) अनुबन्ध करने के अयोग्य घोषित नही है | उदाहरणस्वरूप-विदेशी राजपूत, विदेशी शत्रु, दिवालिया, कैदी आदि व्यक्ति अनुबंध करने के लिये योग्य मने गए है |

3, पक्षकरो के स्वतन्त्र सहमति (Free Consent of the Parties) – वैध अनुबंध के निर्माण के लिये आवश्यक है की पक्षकारो के मध्य सहमति होनी चाहियें और वह सहमति स्वतन्त्र भी होनी चाहियें | दो या दो से अधिक व्यक्तियों की सहमति उसी समय मणि जाती है जबकि वे एक बात पर एक ही अर्थ में सहमत हो एवं ‘सहमति’ केवल दश में स्वतन्त्र कलही जा सकते है, जबकि वह अपनी मर्जी से तथा बिना किसी दबाव के दी गई हो | यदि सहमती बल प्रयोग (Coercion), अनुचित प्रभाव (Undue Influence), मिथ्यावर्णन (Misrepresentation) अथवा कपट द्वारा प्राप्त की गई है जो सहमति स्वतन्त्र नही मानी जाएगी | ऐसी दशा में पीड़ित पक्षकार की इच्छा पर अनुबंध रछ किया जाता है |

4, न्यायोचित प्रतिफल – ठहराव को कानून द्वारा प्रवर्तनीय करने के लिये प्रतिफल का हों अत्यंत अव्श्यक्ल है | साधारण शब्दों में प्रतिफल का अभिप्राय “बदले में कुछ करने से है |’ अत: यह आवश्यक है की ठहराव करने का दोनों पक्षकार ‘कुछ प्रदान करे’ तथा ‘कुछ प्राप्त करे’ | प्रतिफल के लिये यह आवश्यक नही की यह नकद या वस्तु के रूप में ही हो, बल्कि किसी कार्य को करने या न करने का वचन देना ही प्रतिफल है | प्रतिफल भूत, वर्तमान अथवा भविष्य से सम्बन्धित हो सकता है लेकिन इसके लिए आवश्यक है की वह सही एवं वैधानिक हो | प्रतिफल इसलिये जरुरी माना जाता है जिससे की पक्षकारो के मध्य वैज्ञानिक सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा का आभास हो | उदारहणार्थ, हरि अपना स्कूटर कृष्ण को 5,000 रूपये में बेचने का ठहराव करता है तो हरी के लिए 5,000 रूपये प्रतिफल है तथा कृष्ण के लिए स्कूटर प्रतिफल है |

5, वैधानिक उदेश्य (Lawful Object) – ठहराव का उदेश्य वैधानिक होना चाहिये | ऐसा न होने पर वैध अनुबन्ध नही बन सकेगा | सरल शब्दों में, ठहराव का उदेश्य आवैधानिक (Illegal), अनैतिक (Immoral) तथा लोकनीति के विरुध्द नही होना चाहिए | अनुबन्ध का उदेश्य किसी अन्य व्यक्ति अथवा उसकी स्म्पंती को हानि पहुँचाना भी नहीं होना चाहिए | उदारणार्थ, अजय विजय को संजय की हत्या के बदले एक लाख रूपये देने का ठहराव करता है तो यह वैध अनुबन्ध नही कहा जायेगा क्योकि उक्त ठहराव का उदेश्य अवैधानिक है |

6, ठहराव का स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित न होना (Agreement Expressly not declared Void) – वैध अनुबन्ध इके लिये यह भी आवश्यक है कि ठहराव ऐसा नही होना चाहियें जो एस अधिनियम के द्वारा स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित किया गया हो | जैसे – शर्ते या बाजी के ठहराव, व्यापार में रूकावट डालने वाले ठहराव, विवाह में रूकावट डालने वाला ठहराव आदि ठहरावो को कानून द्वारा प्रवर्तित नही कराया जा सकता क्योकि इन्हें अनुबन्ध अधिनियम के अंतर्गत स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित किया जाता है |

7, ठहराव का लिखित, प्रमाणित व रजिस्टर्ड होना (Agreement should be Written and Registered, if Necessary) – यह अनिवार्य नही है की प्रत्येक ठहराव लिखित या साक्षी (गवाह) द्वारा प्रमाणित या रजिस्टर्ड हो | ऐसा होना केवल उन्ही ठहरावो के सम्बन्ध में आवश्यक है झा भारत के किसी विशेष राजनियम द्वारा ऐसा केवल उन्ही ठहरावों के सम्बन्ध में आवश्यक है जहाँ भारत में प्रचलित किसी विशेष राजनियम द्वारा ऐसा करने का आदेश हो | उदहारण के लिये बीमे के अनुबन्ध, अवधि वर्जित ॠण के भुगतान का ठहराव, विनिय साथी विलेख, तीन वर्ष से अधिक के पट्टे के ठहराव एवं पेंच निर्णय समझौते आदि का लिखित होना आवश्यक है | अचल सम्पतियो की बिक्री एवं बन्धक के अनुबन्धो का सम्पति हस्तान्तरण अधिनियम के अनुसार लिखित एवं रजिस्टर्ड होना आवश्यक हिया | वैसे भी अनुरूप का लिखित होना ही अच्छा माना जाता है क्रोकी कुछ दशाओ में मौखिक अनुबन्ध की विधामानता को सिध्द करना कठिन हो जाता है |

“सभी अनुबन्ध ठहराव होते है, परन्तु सभी ठहराव अनुबन्ध नही होते”

(All Contracts are Agreements, but all Agreements are not Contracts)

उपयुक्त कथन को स्पष्ट करने के लिये इसका अध्ययन निम्नलिखित दो शीर्षकों के अंतर्गत किया जाता है –

(i) समस्त अनुबंध ठहराव होता है – ठहराव अनुबन्ध की आधारशिला है | यघपि एक ठहराव के राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होने के कारण उस्समे धारा 10 में वर्णित विशेष लक्षणों का होना आवश्यक है, परन्तु बिना ठहराव के अनुबन्ध नहीं बन सकता अर्थात् यदि ठहराव नहीं है तो अनुबन्ध होनें का प्रश्न ही उत्पन्न नही होता | इसलिये कहा जाता है की सभी अनुबन्ध ठहराव होते है |

(ii) समस्त ठहराव अनुबंध नही होते – ठहराव के लिये प्रस्ताव तहत स्वीकृति केवल दो बातो का होना आवश्यक है | अन्य, बातो जो एक अनुबन्ध में होनी चाहिये, ठहराव के लिये आवश्यक नही है | ठहराव के लिये वैधानिक उतरदायित्व (Legal Obligation) का होना भी आवश्यक नही है | गैर क़ानूनी कार्यो के लिये भी ठहराव हो सकते है | ठहराव का क्षेत्र विस्तृत होने के कारण धार्मिक (Religious), सांस्कृतिक (Cultural), सामाजिक (Social) तथा नैतिक (Moral) उतरदायित्व भी ठहराव के अंतर्गत आ जाते है | वैधानिक द्रष्टि से सामाजिक, परिवारिक, धार्मिक अथवा राजनैतिक उतरदायित्व से सम्बन्धित ठहराव अनुबन्ध का रूप धारण नही कर सकते क्योकि ऐसे ठहरावो से वैधानिक उतरदयित्व उत्पन्न नही होता और इन्हें राजनियम (कानून) द्वारा प्रवर्तनीय नही कराया जा सकता | ठहराव के लिए यह आवश्यक नही है की वह राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय हो | वस्तुतः ठहराव होने के लिये अनुबन्ध का होना अनिवार्य नही है | इसलिये यह कहा जाता है की समस्त ठहराव अनुबन्ध नही होते अर्थात् कोई ठहराव, अनुबन्ध हो भी सकता है और नहीं भी | यदि किसी ठहराव में वैध अनुबन्ध के सभी लक्षण विधमान है जो वह ठहराव अनुबन्ध कहलाता है अन्यथा नही |

इस सम्बन्ध में श्रीमति बालफोर बनाम श्री बालफोर (Mr, Balfour Vs, Mr, Balfour) का प्रकरण भी उल्लेखनीय है | श्री बालफोर (परिवादी) लंका में नौकरी करते थे | छुटि्टयो में वह अपनी पत्नी श्रीमती बालफोर (वादी) को लेने इंग्लैण्ड गये | पत्नी के अस्वस्थ होने के कर्ण वर प्रेम स्नेहवश उनको 30 पौण्ड प्रतिमाह भेजने के भेजने का वायदा करके लंका लौट आये | श्री बालफोर अपने वायदे के अनुसार राशि अपनी पत्नी को नही भेज सके, अत: श्रीमती बालफोर ने उक्त धनराशि प्राप्त करने के लिये अपने पति पर मुकदमा दायर कर दिया | न्यायालय में यह निर्णय देते हुये की इस ठहराव द्वारा वैधानिक उतरदायित्व उत्पन्न नही हुआ, मुकदमा रद क्र दिया |

विशेष – वादी उसे कहते है जो मुकदमा दायर करता है एवं जिस पर मुकदमा दायर किया जाता है, उसे प्रतिवादी कहते है |



शून्य तथा शून्यकाणीय अनुबंध को स्पष्ट कीजिये

(अ) शून्य अनुबन्ध – इसे व्यर्थ अनुबन्ध’ भी कहते है | धारा 2(जे) के अनुसार, “एक अनुबंध जब कानून द्वारा परिवर्तित नही रहता, उस समय शून्य (व्यर्थ) हो जाता है जब इसकी प्र्वर्त्नियता समाप्त होती है |” सरल शब्दों में, ऐसा अनुबन्ध जो अनुबन्ध करते समय तो वैध होता है परन्तु बाद में, किन्ही कारणों से, कानून द्वारा अप्रवर्तनीय हो जाता है, व्यर्थ अनुबन्ध कहलाता है | उदाहरणार्थ – ‘एक्स’, ‘वाई’ से एक गाय 5,000 रूपये में बेचने का अनुबंध भविष्य में किसी निश्चित तिथि पर सुपुर्दगी देने का करता है लेकिन गाय उस निश्चित तिथि के आने से पहले मर जाती है तो ऐसे अनुबंध का निष्पादन होना असम्भव हो जाने के कर्ण अनुबंध व्यर्थ हो जायेगा |

(ब) शून्यकाणीय अनुबंध – इसे ‘व्यर्थनीय अनुबन्ध’ भी कहते है | धारा 2 (आई) के अनुसार, “ऐसा समझौता जो उससे सम्बन्धित एक या अधिक पक्षों की इच्छा पर कानून द्वारा प्रवर्तनीय होता है, किन्तु दुसरे पक्ष या पक्षों की इच्छा पर नहीं, व्यर्थनीय अनुबन्ध कहलाता है |” सरल शब्दों में, “व्यर्थनीय अनुबन्ध’ से अभिप्राय ऐसे समझौते से है जिसके सम्बन्ध में पीड़ित पक्ष (Aggrieved Party) को यह अधिकतर प्राप्त होता है की यदि वह चाहे तो अनुबंध को रद करा सकते है और चाहे तो इसे बना रहने दे सकते है, अर्थात् अनुबन्ध कानून द्वारा प्रवर्तित माना जाये या नही यह पीड़ित पक्ष की इच्छा (Option) पर निर्भर करता है | जब तक अनुबंध को रद नही किया जाता तब तक पूर्णत: वैध तथा प्रवर्तनीय रहता है |

कोई अनुबन्ध केवल उसी दशा में व्यर्थनीय होता है जबकि किसी पक्ष की सहमति स्वतन्त्र न होकर बलप्रयोग (Coercion), अनुचित प्रभाव (Undue influence), मिथ्यावर्णन (Misrepresentation) या कपट (Fraud) द्वारा प्राप्त की गई हो | ऐसी स्थिति में जी पक्ष की सहमति स्वतन्त्र नही है उस पक्ष की इच्छा पर अनुबन्ध व्यर्थनीय या प्रवर्तनीय होता है |

उदारहणार्थ – यदि अजय, विजय को पिस्तौल दिखाकर उसका स्कूटर जिसका उचित मूल्य 6,000 रूपये है, केवल 1,000 रूपये देकर क्रय कर लेता है | यह पर विजय पीड़ित पक्षकार है एवं अजय दोषी पक्षकार है क्योकि विजय की सहमति बल प्रोयग द्वारा प्राप्त की गई है | अत: अनुबन्ध विजय की इच्छा पर व्यर्थनीय होगा |

निष्पादित तहत निष्पादनीय अनुबंध को स्पष्ट कीजिये

(अ) निष्पादित अनुबन्ध (Executed Contract )जब किसी अनुबन्ध के सभी पक्षकार अपने-अपने दयित्व को पूरा कर चुके होते है और उसके पश्चात् कुछ करना शेष न हो तो यह निष्पादित अनुबन्ध कहलाता है | उदारणार्थ – रमेश मोहन को एक रेडियो 300 रूपये में बेचता है | मोहन रेडियो के मूल्य का भुगतान रमेश कर देता है | रमेश मोहन को रेडियो की सुपुर्दगी दे देता है | चूँकि दोनों पक्षकारो ने अपने-अपने दायित्वों का पूर्ण रूपेण पालन कर दिया है इसलिए इसे निष्पादित अनुबन्ध कहेगे |

(ब) निष्पादनीय अनुबन्ध – (Executor Contract) – जब किसी अनुबन्ध के एक अथवा दोनों ही पक्षकारो ने अपना दयित्व पूरा नही किया है, एवं भविष्य में अपने दयित्व को पूरा करेगे, तो ऐसा निष्पादनीय अनुबन्ध कहलाता है | उदाहरण – रमेश मोहन के लिये एक चित्र बनाने का वचन देता है मोहन रमेश को चित्र प्रतिफलस्वरूप 500 रूपये देने का वचन देता है | परंन्तु अभी तक न तो रमेश ने चित्र बनाया है और न मोहन ने 500 रूपये का भुगतान किया है | इसे निष्पादनीय अनुबन्ध कहेंगे |

यदि अनुबन्ध के एक पक्षकार ने अपना दायित्व पूरा कर दिया है परन्तु दुसरे पक्ष को अभी दायित्व पूरा करना है तो ऐसे अनुबन्ध को अशंत: निष्पादित एवं अशंत निष्पादनीय माना जाता है |

उदाहारणार्थ – रमेश, मोहन के लिये एक चित्र चित्र बनाने के लिये अपनी सहमति देता है और प्रतिफल के रूप में मोहन, रमेश को 500 रूपये का भुगतान कर देता है | मोहन के लिये अनुबन्ध निष्पादित है, परन्तु रमेश के लिये निष्पादनीय है |





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