Production and cost Managerial Economics Mcom Notes

Production and cost Managerial Economics Mcom Notes

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Production and cost Managerial Economics Mcom Notes

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उत्पादन एवं लागत (Production and Cost)

उत्पादन के नियम से आशय ‘अल्पकाल’ की उस समयावधि से है जिसमें उत्पत्ति के समस्त साधनों को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। अल्पकाल में सूक्ष्म समय में जिन उत्पत्ति के साधनों को परिवर्तित नहीं किया जा सकता उन्हें स्थिर साधन (Fixed Factors) कहते हैं। अल्पकाल में कुछ उत्पत्ति के साधन परिवर्तनशील होते हैं जिनमें मुख्यतः पूँजी, पूँजीगत उपकरण, भूमि उत्पादन तकनीक आदि अल्पकाल में स्थिर होते हैं जबकि श्रम की इकाइयाँ परिवर्तनीय हो सकती हैं। अल्पकालीन उत्पादन फलन में कुछ उत्पत्ति के साधन स्थिर होते हैं और कुछ परिवर्तनशील परिवर्तनशील साधनों में परिवर्तन के उत्पादन स्तर में परिवर्तन किया जा सकता है। अल्पकालीन उत्पादन फलन को परिवर्तनशील अनुपात नियम भी कहते हैं।

क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम (Law of Diminishing Returns)

नव परम्परावादी दृष्टिकोण (Neo Classical Approach)

उत्पत्ति के प्रतिफल के नियमों में यह नियम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इस नियम के विकास के प्रारम्भिक चरण में प्रो० एडम स्मिथ (Adam Smith), रिकार्डो (Ricardo) तथा माल्थस (Malthus) आदि ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। तदुपरान्त प्रो० मार्शल ने इस नियम की विधिवत् वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। प्रो० मार्शल के शब्दों में- “यदि कृषि कला में उन्नति न हो तो सामान्यतः कृषि में लगाई गई पूँजी व श्रम की इकाई से कम अनुपात में उत्पादन बढ़ता है। ”

प्रो० मार्शल द्वारा प्रस्तुत इस व्याख्या में दो तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं –

(1) यह नियम सामान्यत: (विशेषकर) कृषि भूमि पर शीघ्र लागू होता है।

(2) इस नियम के क्रियाशील होने के लिए यह आवश्यक है कि कृषि कला में कोई सुधार न हो।

प्रो० मार्शल की धारणा है कि उत्पादन हेतु मानवीय श्रम तथा प्रकृति दोनों का सहयोग आवश्यक है। जिस क्षेत्र में प्रकृति का अधिक हाथ होता है वहाँ उत्पादन में ह्रास की प्रवृत्ति शीघ्र दृष्टिगत होने लगती है। स्वयं प्रो० मार्शल के शब्दों में—“उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति उत्पत्ति ह्रास नियम के अनुकूल कार्य करती है।” चूँकि प्राकृतिक वातावरण का कृषि पर तत्काल तथा व्यापक प्रभाव पड़ता है। अतः कृषि में उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है। परन्तु आधुनिक विचारक इस नियम की क्रियाशीलता के लिए प्रकृति की प्रधानता को उत्तरदायी न मानकर यह मानते हैं कि कृषि कार्य में एक साधन (भूमि) को स्थिर रखकर अन्य साधनों की वृद्धि से आदर्श संयोग भंग हो जाता है और उत्पादन में आनुपातिक रूप से कम वृद्धि होती है।

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आधुनिक दृष्टिकोण–परिवर्तनशील अनुपातों का नियम Modern Approach: Law of Variable Proportions)

आधुनिक विचारको (श्रीमती जोन रोबिन्सन, बोल्डिंग, सैमुअल्सन आदि) की धारणा है कि यदि उत्पादन के किसी भी एक साधन को अपरिवर्तित रखा जाए और अन्य साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाए तो उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील होने लगता है। इस नियम को कुछ अर्थशास्त्री ‘परिवर्तनशील अनुपातों का नियम’ (Law of Variable Proportions) कहकर पुकारते हैं, जबकि अन्य इसे कुछ अन्य नामों; जैसे- अनुपात का नियम, प्रतिफल का नियम, सीमान्त उत्पादकता ह्रास नियम आदि से पुकारते हैं। प्रो० सैमुअल्सन तथा श्रीमती जोन रोबिन्सन इसे उत्पत्ति ह्रास नियम कहना ही अधिक उपयुक्त समझते हैं।

श्रीमती जोन सोबिन्सन के शब्दों में “क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम यह बताता है कि किसी एक साधन की मात्राओं के निश्चित होने की दशा में एक निश्चित बिन्दु के पश्चात् अन्य साधनों की प्रत्येक अगली इकाई से उत्पत्ति की घटती हुई वृद्धि प्राप्त होगी।”

नियम की अधिक स्पष्ट व्याख्या करते हुए श्रीमती जोन रोबिन्सन ने आगे लिखा है कि — “उत्पादन व्यय के दृष्टिकोण से यदि एक साधन की मात्रा निश्चित है, इसके साथ अन्य साधनों की बढ़ती हुई मात्रा का उपयोग किया जाता है तथा न तो कार्यक्षमता में सुधार होता है और न साधनों के अधिक मात्रा में उपयोग होने से इनके मूल्य में ही परिवर्तन होता है, तो एक निश्चित बिन्दु के उपरान्त प्रति इकाई उत्पादन व्यय बढ़ जाता है।”

प्रो० बोल्डिंग के शब्दों में “यदि उपादानों के संयोग में हम किसी एक उपादान की मात्रा में वृद्धि करते हैं तो इस वृद्धि किए जाने वाले उत्पादन की सीमान्त उत्पादकता एक समय बाद अवश्य घटेगी।”

प्रो० बेन्हम के शब्दों में- “उत्पादन के साधनों के संयोग में एक साधन का अनुपात ज्यों-ज्यों बढ़ाया जाता है, उस साधन का सीमान्त तथा औसत उत्पादन घटता जाता है।”

नियम की व्याख्या (Explanation of the Law)

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कुछ अर्थशास्त्रियों ने नियम के प्रतिपादन में एक साधन को स्थिर माना है, जबकि अन्य ने एक साधन को परिवर्तनशील मानकर अन्य को स्थिर रखा है। वस्तुतः इन दोनों दृष्टिकोणों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है क्योंकि सार इस तथ्य निहित है कि कुछ साधन स्थिर होने चाहिए तथा कुछ परिवर्तनशील।

इस नियम की व्याख्या तीन अर्थशास्त्रीय धारणाओं पर आधारित है— कुल उत्पाद (Total Product), सीमान्त उत्पाद (Marginal Product) तथा औसत उत्पाद (Average Product)!

कुल उत्पाद (Total Product) – वह उत्पादन है जो परिवर्तनशील साधनों की निश्चित इकाइयों के प्रयोग से प्राप्त होता है। सीमान्त उत्पाद (Marginal Product) वह उत्पादन है जो साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से प्राप्त होता है।

औसत उत्पाद (Average Product) – उत्पादन की वह मात्रा है जो कुल उत्पादन को परिवर्तनशील साधन की कुल इकाइयों से भाग देने पर प्राप्त होती हैं|

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उत्पाद का अर्थ (Meaning of Product)

मानवीय आवश्यकता की सन्तुष्टि के लिए उपयोगिता का सृजन ही अर्थशास्त्र में उत्पादन कहलाता है। फ्रेजर के शब्दों में, “उत्पादन का अर्थ वस्तु में उपयोगिता का सृजन करना है।” प्रो० मेहता ‘उपयोगिता के सृजन’ के स्थान पर ‘उपयोगिता में वृद्धि’ करना अधिक पसन्द करते हैं। प्रो० टॉमस के अनुसार उत्पादन के लिए ‘उपयोगिता में वृद्धि’ के साथ-साथ उसका ‘विनिमय मूल्य’ भी होना आवश्यक है। उनके शब्दों में, “केवल ऐसी उपयोगिता वृद्धि को उत्पादन कहा जा सकता है जिसके फलस्वरूप किसी वस्तु के मूल्य में वृद्धि होती है।” इस प्रकार उत्पादन के लिए दो तत्त्वों का होना आवश्यक है –

(1) वस्तु में उपयोगिता (या तुष्टिकरण) का सृजन या वृद्धि होना।

(2) वस्तु में विनिमय मूल्य का पाया जाना।

आधुनिक दृष्टिकोण (Modern Approach)

आधुनिक विचारकों (श्रीमती जोन रोबिन्सन, बोल्डिंग, सैमुअल्सन आदि) के अनुसार, यदि उत्पादन के किसी भी एक साधन को अपरिवर्तित रखा जाए और अन्य साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाए तो उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील होने लगता है। कुछ अर्थशास्त्री इस नियम को ‘परिवर्तनशील अनुपातों का नियम’ (Law of Variable Proportions) कहकर पुकारते हैं, जबकि अन्य अर्थशास्त्री इसे कुछ अन्य नामों (जैसे- अनुपात का नियम प्रतिफल का नियम, सीमान्त उत्पादकता ह्रास नियम आदि) से पुकारते हैं। प्रो० सैमुअल्सन तथा श्रीमती जोन रोबिन्सन इस नियम को उत्पत्ति ह्रास नियम कहना ही अधिक उपयुक्त समझते हैं।

श्रीमती जोन रोबिन्सन के शब्दों में- “क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम…..यह बताता है कि किसी एक साधन की मात्राओं के निश्चित होने की दशा में एक निश्चित बिन्दु के पश्चात् अन्य साधनों की प्रत्येक अगली इकाई से उत्पत्ति की घटती हुई वृद्धि प्राप्त होगी।”

इस नियम की और अधिक स्पष्ट व्याख्या करते हुए श्रीमती जोन रोबिन्सन ने आगे लिखा है कि — “उत्पादन व्यय के दृष्टिकोण से यदि एक साधन की मात्रा निश्चित है और इसके साथ अन्य साधनों की बढ़ती हुई मात्रा का उपयोग किया जाता है तथा न तो इसकी कार्यक्षमता में सुधार होता है और न ही साधनों के अधिक मात्रा में उपयोग होने से इनके मूल्य में परिवर्तन होता है तो एक निश्चित बिन्दु के उपरान्त प्रति इकाई उत्पादन व्यय बढ़ जाता है।

प्रो० बोल्डिंग के शब्दों में “यदि उपादानों के संयोग में हम किसी एक उपादान की मात्रा में वृद्धि करते हैं तो इस वृद्धि किए जाने वाले उत्पादन की सीमान्त उत्पादकता एक समय बाद अवश्य घटेगी।”

प्रो० बेन्हम के शब्दों में उत्पादन के साधनों के संयोग में एक साधन का अनुपात ज्यों-ज्यों बढ़ाया जाता है, उस साधन का सीमान्त तथा औसत उत्पादन घटता जाता है।”

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नियम की व्याख्या (Explanation of the Law)

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कुछ अर्थशास्त्रियों ने नियम के प्रतिपादन में एक साधन को स्थिर माना है, जबकि अन्य अर्थशास्त्रियों ने एक साधन को परिवर्तनशील मानकर अन्य साधनों को स्थिर रखा है। वस्तुतः इन दोनों दृष्टिकोणों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है|

क्योंकि इस तथ्य का सार यह है कि कुछ साधन स्थिर होने चाहिए तथा कुछ परिवर्तनशील तीन अर्थशास्त्रीय धारणाओं पर इस नियम की व्याख्या आधारित है— कुल उत्पाद (Total Product), सीमान्त उत्पाद (Marginal Product) तथा औसत उत्पाद (Average Product) ।

कुल उत्पाद (Total Product) वह उत्पादन है जो परिवर्तनशील साधनों की निश्चित इकाइयों के प्रयोग से प्राप्त होता है।

सीमान्त उत्पाद (Marginal Product ) वह उत्पादन है जो साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से प्राप्त होता है।

औसत उत्पाद (Average Product) उत्पादन की वह मात्रा है जो कुल उत्पादन को परिवर्तनशील साधन की कुल इकाइयों से भाग देने पर प्राप्त होती है।

इस नियम की व्याख्या एक सरल उदाहरण द्वारा की जा सकती है।

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कुल, औसत तथा सीमान्त उत्पाद की तालिका (Table: Total, Average and Marginal Product)

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उदाहरण में श्रम को परिवर्तनशील तथा अन्य साधनों को स्थिर माना गया है। तालिका में स्वतः स्पष्ट है कि समस्त उत्पादन प्रक्रिया तीन अवस्थाओं में विभक्त है –

प्रथम अवस्था (Stage I) – प्रारम्भ में जब परिवर्तनशील साधन अर्थात् श्रम की इकाइयों में वृद्धि की जाती है तो अन्य स्थिर साधनों का अधिक अच्छा प्रयोग होने लगता है जिससे सीमान्त उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि होती हैं और कुल उत्पादन में तीव्र (अर्थात् निरन्तर बढ़ती हुई) गति से वृद्धि होती हैं। इस प्रकार प्रथम अवस्था में कुल उत्पादन, औसत उत्पादन तथा सीमान्त उत्पादन तीनों में वृद्धि होती है। इस अवस्था को ‘बढ़ते हुए उत्पादन की अवस्था’ कहा जाता है (देखिए निचे दिए हुए चित्र में)।

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द्वितीय अवस्था (Stage II) – द्वितीय अवस्था में सीमान्त उत्पादन गिरने लगता है, अतः कुल उत्पादन में वृद्धि घटती हुई दर से होती है। अन्य शब्दों में परिवर्तनशील साधन के बढ़ने से कुल उत्पादन में वृद्धि कम अनुपात में होती है। इस द्वितीय अवस्था को कुछ अर्थशास्त्री स्वतन्त्र अवस्था न मानकर प्रथम अवस्था का ही एक अंग मानते हैं।

तृतीय अवस्था (Stage III) – तृतीय अवस्था में सीमान्त उत्पादन ऋणात्मक हो जाता है, अतः कुल उत्पादन तथा औसत उत्पादन गिरने लगता है। इस प्रकार इस अवस्था में घटते हुए औसत उत्पादन का नियम (Law of Diminishing Average Returns) कार्यान्वित हो जाता है।

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रेखाचित्र द्वारा व्याख्या

रेखाचित्र-1 से स्पष्ट है कि इस नियम का कार्यान्वयन तीन अवस्थाओं के अन्तर्गत होता है जिनकी व्याख्या ऊपर की गई है।

रेखाचित्र में G झुकाव का बिन्दु है जो यह प्रदर्शित करता है कि O से G बिन्दु तक उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि होती है क्योंकि इस अवस्था में सीमान्त उत्पादन उत्तरोत्तर तीव्र गति से बढ़ता है। इसलिए O से G तक TP (कुल उत्पादन) रेखा OX के प्रति उन्नतोदर (Convex) हो जाती है, परन्तु G विन्दु के बाद TP रेखा OX के प्रति नतोदर (Concave) हो जाती है क्योंकि सीमान्त उत्पादन में क्रमश: हास होने लगता है। रेखाचित्र से यह भी स्पष्ट है कि G बिन्दुE बिन्दु (सीमान्त उत्पादन से अधिकतम होने के स्थान) के ठीक ऊपर है।

व्यवहार में उत्पादक किस अवस्था में होगा और वह परिवर्तनशील साधन (श्रम) की कितनी मात्रा नियोजित करेगा, इन दो महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी हमें इस रेखाचित्र की सहायता से प्राप्त हो जाते हैं। व्यवहार में उत्पादक प्रायः द्वितीय अवस्था में पाया जाता है क्योंकि प्रथम अवस्था में कुल उत्पादन और औसत उत्पादन निरन्तर वृद्धि पर होता है। तृतीय अवस्था में कोई भी उत्पादक नहीं रहेगा क्योंकि इस अवस्था में कुल उत्पादन गिरने लगता है। इस प्रकार उत्पादक केवल द्वितीय अवस्था में ही रहेगा। यद्यपि द्वितीय अवस्था में सीमान्त तथा औसत उत्पादन घटने लगते हैं, तथापि कुल उत्पादन घटती हुई दर से बढ़ता है और G बिन्दु पर अधिकतम होता है।

जहाँ तक परिवर्तनशील साधन (श्रम) की नियोजित इकाइयों का प्रश्न है— प्रथम अवस्था में चूंकि कुल उत्पादन तथा औसत उत्पादन वृद्धि पर होता है, इसलिए उत्पादन कम-से-कम OF श्रम को नियोजित करेगा, लेकिन किसी भी दशा में ON से अधिक परिवर्तनशील साधन (श्रम) की इकाइयों का प्रयोग नहीं करेगा क्योंकि G बिन्दु, जहाँ उत्पादन अधिकतम हो जाता है, पर सीमान्त उत्पादन शून्य हो जाता है। इस प्रकार और N बिन्दु दो सीमाएँ हैं जिनका कोई भी उत्पादक उल्लंघन नहीं करेगा।

उपर्युक्त व्याख्या के आधार पर इस नियम को हम निम्न शब्दों में परिभाषित कर सकते हैं— “यदि हम अन्य साधनों की स्थिर मात्राओं के साथ परिवर्तनशील साधनों की अधिक इकाइयों का प्रयोग करते हैं तो अन्य बातों के समान रहने पर, हम उन बिन्दुओं पर पहुँचेंगे जिनके बाद से सीमान्त उत्पादन (M.P.) तत्पश्चात् औसत उत्पादन (A.P.) और अन्त में कुल उत्पादन (T.P.) घटने लगता है।”

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तटस्थता वक्र विश्लेषण (Indifference Curve Analysis)

हमारा आर्थिक जीवन अत्यन्त प्रावैगिक है। अतः विभिन्न आर्थिक घटकों में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। उदासीनता वक्र विश्लेषण की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इस विश्लेषण में उपभोक्ता की आय वस्तुओं व सेवाओं की कीमतों तथा विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है। अन्य शब्दों में, साधारण माँग व पर वस्तु की कीमत और उसकी माँगी जाने वाली मात्रा उपभोक्ता की आय एवं वस्तुओं की कीमत में होने वाले परिवर्तनों का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव क्रमश: आय प्रभाव एवं कीमत प्रभाव के नाम से जाने जाते हैं।

  1. आय प्रभाव (Income Effect) – आय प्रभाव उस स्थिति की विवेचना करता है, जबकि वस्तुओं/ सेवाओं की कीमतें तो यथास्थिर रहें लेकिन उपभोक्ता की आय के स्तर में 1, परिवर्तन हो जाए। आय में होने वाले परिवर्तनों का उपभोक्ता की सन्तुष्टि पर जो प्रभाव पड़ता है, वही आय प्रभाव (Income Effect) कहलाता है। स्पष्ट है कि इस दशा में व्यक्ति की आय में होने वाली वृद्धि उसे सन्तुष्टि के उच्चतर उदासीनता वक्र पर ले जाती है, जबकि आय में होने वाली कमी से उपभोक्ता की सन्तुष्टि का स्तर गिरता जाता है। आय उपभोग रेखा (Income Consumption Curve ICC) यह प्रदर्शित करती है कि आय में परिवर्तन होने पर यदि वस्तुओं की कीमतें यथापूर्व रहे तो उपभोक्ता के उपभोग (सन्तुष्टि स्तर) में किस प्रकार परिवर्तन होगा। इस प्रकार आय उपभोग रेखा आय प्रभाव का अनुरेखण करती है। आय प्रभाव को एक रेखाकृति द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है (देखिए रेखाचित्र में)

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इस रेखाचित्र में दो वस्तुओं X और Y की कीमतें दी गई हैं तथा वे अपरिवर्तित है। AB, A, B, तथा Ag Bp कीमत रेखाएँ हैं, जो आय में होने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप AB के समान्तर ऊपर की ओर बनती चली जाती हैं। इन विभिन्न कीमतों पर IC, IC, तथा IC, क्रमश उदासीनता वक्र हैं। इन उदासीनता वक्रों पर E, E1 तथा E2 उपभोक्ता के सन्तुलन बिन्दु हैं। यदि E, E, तथा E2 बिन्दुओं को परस्पर मिला दिया जाए तो हमें एक रेखा प्राप्त होती है। यह आय उपभोग वक्र (Income Consumption Curve ICC) है। यह वक्ररेखा स्पष्ट करती है कि जैसे-जैसे किसी व्यक्ति की आय में वृद्धि होती है, यदि वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें यथापूर्व रहें तो उपभोक्ता को पहले की तुलना में अधिक उपयोगिता प्राप्त होती हैं।

  1. कीमत प्रभाव (Price Effect) – प्रावैगिक अर्थव्यवस्था में एक सम्भावना यह हो सकती है कि उपभोक्ता की आय एवं अन्य सम्बद्ध वस्तुओं की कीमत में कोई परिवर्तन न हो, केवल एक वस्तु की कीमत में ही परिवर्तन हो । यदि ऐसा होता है तो वस्तु की क्रय की जाने वाली मात्रा पर अवश्य ही प्रभाव पड़ेगा। उदाहरणार्थ- X और Y दो वस्तुएँ हैं जिसमें X वस्तु की कीमत में परिवर्तन होता है, लेकिन Y वस्तु की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता। इस प्रकार X वस्तु की कीमत पर जो प्रभाव पड़ता है वही कीमत प्रभाव (Price Effect) कहलाता है। कीमत प्रभाव को भी एक रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है (देखिए रेखाचित्र में)

माना कि X तथा y दो वस्तुएँ हैं जिसमें Y वस्तु की कीमतें अपरिवर्तित रहती हैं। साथ ही उपभोक्ता की आय भी अपरिवर्तित रहती है। अब यदि X वस्तु की कीमत में परिवर्तन होता है और वस्तु पहले की अपेक्षा सस्ती होती जाती है तो इस दशा में AB के स्थान पर AB1 तथा AB2 नई कीमत रेखाएँ अस्तित्व में आएँगी। माना कि इन कीमत रेखाओं पर IC, IC1 तथा IC2 क्रमशः तीन उदासीनता रेखाएँ हैं। इन तीनों तटस्थ रेखाओं पर E, E तथा E, उपभोक्ता के सन्तुलन बिन्दु हैं। अब यदि इन तीनों बिन्दुओं को परस्पर मिला दिया जाए तो एक रेखा प्राप्त होती है। यही कीमत उपभोग रेखा (Price Consumption Curve PCC) है।

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यह रेखा इस तथ्य को प्रकट करती है कि यदि अन्य बातें अपरिवर्तित रहें तो एक वस्तु की कीमत में होने वाले परिवर्तन का उपभोग की जाने वाली मात्रा पर प्रभाव पड़ेगा।

कीमत प्रभाव के सम्बन्ध में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कीमत प्रभाव (Price) Effect) दो भिन्न क्रियाओं का संयुक्त परिणाम (Joint Result) है –

(i) आय प्रभाव (Income Effect) – यह आय-उपभोग वक्र को गतिशील बना देता है और जिससे उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति में सुधार हो जाता है।

(ii) प्रतिस्थापन प्रभाव (Substitution Effect) – यह उदासीनता वक्र को गतिशील बना देता है और परिणामतः वस्तु की कीमत गिरने पर उपभोक्ता वस्तु की अधिक मात्रा क्रय करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।

  1. प्रतिस्थापन प्रभाव (Substitution Effect) – व्यावहारिक जीवन में एक ऐस स्थिति भी अस्तित्व में आ सकती है, जबकि X तथा Y दोनों वस्तुओं के सापेक्ष (Relative) मूल्यों में इस प्रकार का परिवर्तन हो कि उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति पूर्ववत् ही बनी रहे। शब्दों में, यह वह स्थिति है जिसमें वस्तु की कीमतों में परिवर्तन होने पर उपभोक्ता खरीदी जाने वाली वस्तुओं का इस प्रकार समायोजन करता है कि जिससे उसे पूर्ववत् सन्तुष्टि ही प्राप्त होत रहे। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि प्रतिस्थापन प्रभाव के अन्तर्गत उपभोक्ता उ उदासीनता वक्र पर रहता है, केवल सन्तुलन बिन्दुओं में परिवर्तन आ जाता है। अन्य आर्थिक विश्लेषणों की भाँति यहाँ भी हम कुछ मान्यताओं को लेकर चलते हैं। ये मान्यताएँ हैं –

(1) दो वस्तुओं की कीमतों में इस प्रकार परिवर्तन होता है कि एक वस्तु महँगी और दूसरी वस्तु सस्ती हो जाती है।

(2) एक वस्तु के महँगे (Dear) होने का जो आर्थिक प्रभाव पड़ता है वह दूसरी वस्तु के सस्ते (Cheap) होने के परिणामस्वरूप पूर्णत: नष्ट हो जाता है। अतः न तो उपभोक्ता के आ स्तर में ही कोई परिवर्तन होता है और न ही उपभोक्ता को प्राप्त होने वाली उपयोगिता में ही को अन्तर आ पाता है।

(3) सम्पूर्ण समयावधि में उपभोक्ता की मौद्रिक आय (Monetary Income) पूर्णत अपरिवर्तित रहती है।

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रेखाचित्र  में प्रतिस्थापन प्रभाव को प्रदर्शित किया गया है। AB मूल कीमत रेखा है और E सन्तुलन बिन्दु है। इस दशा में उपभोक्ता X वस्तु की OM मात्रा तथा Y वस्तु की OR मात्रा का उपभोग करता है। अब X वस्तु सस्ती और Y वस्तु महँगी हो जाती है लेकिन उपभोक्ता की आय यथापूर्व रहती है। Y वस्तु के महंगे होने का जो कुछ प्रभाव होता है, वह X वस्तु के सस्ते होने से पूर्णतः समाप्त हो जाता है। परिणामतः उपभोक्ता अपने पूर्व उदासीनता वक्र IC पर ही बना रहता है। X तथा y वस्तुओं की कीमतों परिवर्तन होने से नई कीमत रेखा A1 B2 का निर्माण होता है और उपभोक्ता इस नई कीमत रेख पर E1 बिन्दु पर सन्तुलन या साम्य की दशा में होता है। इस दशा में वह X वस्तु की OM1

मात्रा तथा Y वस्तु का OR मात्रा का उपभोग करके पूर्ववत् सन्तुष्टि प्राप्त कर रहा है। इस प्रकार E से E1 बिन्दु तक का चलन ही प्रतिस्थापन प्रभाव (Substitution Effect) के नाम से जाना जाता है।

कीमत प्रभाव के आय एवं स्थानापन्न प्रभाव (Income and Substitution Effects of the Price Effect) कीमत प्रभाव का दोहरा प्रभाव होता है

(1) यह उपभोक्ता की वास्तविक आय में परिवर्तन करता है। यह कीमत प्रभाव का आय भाव है।

(2) यह उपभोक्ता को एक वस्तु स्थान पर दूसरी वस्तु को स्थानापन्न करने का अवसर देता है। यह कीमत भाव का स्थानापन्न प्रभाव है। खाचित्र में कीमत प्रभाव के दोहरे भाव को दिखाया गया है।

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रेखाचित्र में मूल बजट रेखा B है। X वस्तु की कीमत में कमी ने पर नई बजट रेखा AB2 हो जाती है और उपभोक्ता P से चलकर सन्तुलन बिन्दु पर पहुंच जाता है। कीमत प्रभाव तथा इसमें SR आय प्रभाव है।

किन्तु X वस्तु के सस्ती हो जाने के कारण S सन्तुलन की स्थिति नहीं हो सकती। अतः सभोक्ता y के स्थान पर X को स्थानापन्न करेगा और उपभोक्ता IC2 पर S बिन्दु से R न्दु पर आ जाएगा। यह कीमत प्रभाव का स्थानापन्न प्रभाव है। संक्षेप में,

QQ2 = कीमत प्रभाव,

QQ1 = आय प्रभाव,

Q1Q2 = स्थानापन्न प्रभाव।

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‘फलन’ शब्द का अर्थ (Meaning of the word ‘Function’)

‘फलन’ शब्द गणित की एक शाखा चलन-कलन (Calculus) से लिया गया है, जो दो के पारस्परिक निर्भरता सम्बन्धों को प्रकट करता है। अर्थशास्त्र में हम दो प्रकार के चरों का योग करते हैं – (i) स्वतन्त्र चर जो स्वतन्त्र रूप से व्यवहार करते हैं, (ii) परतन्त्र चर जो अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखते तथा दूसरे चरों से प्रभावित होते हैं। फलन द्वारा परतन्त्र चर स्वतन्त्र चर पर निर्भरता की व्याख्या होती है।

उदाहरणार्थ

Y = f(X)

अर्थात् Y फलन है X का (Y is the function of X)

जहाँ X स्वतन्त्र चर है, y परतन्त्र चर है तथा / फलन है।

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उत्पादन फलन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Production Function)

किसी फर्म के उत्पाद (Output) और आदा (Input) के बीच के सम्बन्धों को उत्पादन फलन कहते हैं। एक उत्पादन फलन यह बताता है कि दिए हुए तकनीकी ज्ञान अस्व प्रबन्ध योग्यता की सहायता से उत्पादक, आदाओं के विभिन्न संयोगों से उत्पाद की अधिकतम मात्रा किस प्रकार प्राप्त कर सकता है। संक्षेप में, उत्पादन फलन उत्पादन सम्भावनाओं की सूची है। उत्पादन फलन को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –

प्रो० सिटोव्स्की के अनुसार, “किसी भी फर्म का उत्पादन, उत्पत्ति के साधन स्थ फलन है और यदि गणितीय रूप में रखा जाए तो उसे उत्पादन फलन कहते हैं।”

सैमुअल्सन के अनुसार, “उत्पादन फलन वह प्राविधिक सम्बन्ध है जो यह बताता है। आदाओं के प्रत्येक समूह द्वारा कितना उत्पादन किया जा सकता है। यह किसी दी हुई प्राविधि ज्ञान की स्थिति के लिए परिभाषित या सम्बन्धित होता है। ”

वाटसन के अनुसार, “किसी फर्म की भौतिक आदाओं एवं भौतिक प्रदा के सम्बन्ध को प्रायः उत्पादन फलन कहते हैं।”

प्रो० लैफ्टविच के अनुसार, “उत्पादन फलन शब्द उस भौतिक सम्बन्ध के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जो एक फर्म के साधनों की इकाइयों (आदाओं) और प्रति इकाई समयानुसार प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं (उत्पादों) के बीच पाया जाता है।” उत्पादन फलन को गणितीय समीकरण के रूप में इस प्रकार रख सकते हैं –

P = f (A, B, C,………, N)

यहाँ P किसी वस्तु X की कुल उत्पादित मात्रा है तथा A, B, C,…….., N प्रति समय इकाई में विभिन्न उत्पादन के साधन हैं।

इस समीकरण को इस प्रकार पढ़ा जाएगा – P’ की उत्पादन दर A, B, C,….., N उत्पादन सेवाओं की आदा का फलन है जो कि फर्म प्रति समय इकाई में प्रयुक्त करती है|

उत्पादन फलन की मान्यताएँ (Assumptions of Production Function)

उत्पादन फलन का विचार निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

(1) किसी समय-विशेष के अन्तर्गत प्राविधिक अथवा उत्पादन कला की स्थिति में स हुए समय में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

(2) फर्म उत्पादन की अधिकतम कुल तकनीक जो कि समय-विशेष में प्राप्य अपनाने का प्रयास करेगी, जबकि फर्म के लिए लागत व्यय दिया हुआ हो।

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उत्पादन फलन की विशेषताएँ (Characteristics of Production Function)

उत्पादन फलन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) उत्पादन फलन साधनों की भौतिक मात्रा तथा उत्पादन की भौतिक मात्रा के सम्बन्ध को बतलाता है।

(2) एक उत्पादन फलन दिए हुए तकनीकी ज्ञान के सन्दर्भ में परिभाषित किया जाता है।

(3) उत्पादन फलन उत्पादित वस्तु की कीमत और साधनों की कीमतों से पूर्णतया स्वतन्त्र होते हैं।

(4) एक उत्पादन फलन एक दिए हुए समय या प्रति इकाई समय के सन्दर्भ में होता है।

(5) साधनों की स्थिरता एवं परिवर्तनशीलता के आधार पर उत्पादन फलन को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है प्रथम, वे उत्पादन फलन जिनमें कुछ साधनों की मात्राएँ कन्थर रहती है और कुछ की परिवर्तनशील तथा द्वितीय, वे उत्पादन फलन जिनमें सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं।

(6) परिवर्तनशील अनुपातों के नियम, उत्पादन फलन की एक अवस्था होते हैं।

(7) ऐसे उत्पादन फलनों, जिनमें सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं, को दीर्घकालीन उत्पादन फलन कहते हैं।

जब साधनों को एक ही अनुपात में बढ़ाया जाता है तो प्राप्त होने वाली उत्पादन की मात्रा की तीन अवस्थाएँ होती हैं- (अ) पैमाने के बढ़ते उत्पादन की अवस्था, (ब) पैमाने के स्थिर सत्पादन की अवस्था, (स) पैमाने के घटते उत्पादन की अवस्था ।

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उत्पादन फलन के रूप (Types of Production Function)

उत्पादन फलन के निम्नलिखित दो रूप होते हैं –

  1. अल्पकालीन उत्पादन फलन (Short-period Production Function) – जब के कुछ साधनों की मात्रा को स्थिर रखते हुए अन्य परिवर्तनशील साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो उसे ‘स्थिर अनुपात वाला उत्पादन फलन’ कहते हैं। इसे ‘अल्पकालीन उत्पादन फलन’ भी कहते हैं क्योंकि अल्पकाल में उत्पादन के सभी साधनों को बढ़ाना या हटाना सम्भव नहीं होता, जबकि परिवर्तनशील साधनों की मात्रा को आवश्यकतानुसार टाया बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार का उत्पादन फलन, परिवर्तनशील अनुपातों के नियमों Laws of Variable Proportions) का विषय है।
  2. दीर्घकालीन उत्पादन फलन (Long-period Production Function) – जब उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं अर्थात् जब किसी साधन को स्थिर न रखकर सभी साधनों की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो उसे परिवर्तनशील साधनों वाला उत्पादन फलन कहते हैं। यह उत्पादन फलन दीर्घकालीन होता है क्योंकि दीर्घकाल में उत्पादन के साधनों को आवश्यकता के अनुसार ‘परिवर्तित किया जा सकता है। यह उत्पादन फलन, पैमाने के प्रतिफल (Returns to Scale) का विषय है।

रेखीय समरूप उत्पादन फलन (Linear Homogeneous Production Function)

यह उत्पादन फलन ‘रेखीय’ तथा ‘समरूप’ दो शब्दों से मिलकर बना है। रेखीय का अर्थ है कि फलन के सभी घटक पहली घात (First degree) के होने चाहिए। समरूय अर्थ है कि फलन के सभी घटक समान घात के हों। प्रथम घात के समरूप उत्पादन फलन। अर्थ है कि जब उत्पादन के समस्त साधनों को किसी अनुपात में बढ़ाया जाता है तो उत्पादन। उसी अनुपात में बढ़ जाता है। इस प्रकार रेखीय समरूप उत्पादन फलन, पैमाने के स्थिर प्रतिफल से सम्बन्धित है।

यदि समरूप फलन निम्नलिखित हों –

Q = f A, B, C, D)

जहाँ

Q = उत्पादन मात्रा,

A, B, C, D = उत्पत्ति साधन।

तब  λ Q = f( λ A, λ B,  λ C,  λ D)

अर्थात् यदि उत्पत्ति के साधनों को 2 गुना बढ़ा दिया जाए तो उत्पादन भी 2 गुना बढ़ जाता है।

रेखीय समरूप उत्पादन फलन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है –

(1) फलन स्थिर पैमाने के प्रतिफल की व्याख्या करता है।

(2) उत्पत्ति के साधन की औसत उत्पादकता पूँजी श्रम अनुपात (K/L) पर निर्भर करती है।

(3) उत्पत्ति के साधन की सीमान्त उत्पादकता केवल पूँजी श्रम अनुपात का फलन होती है

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कॉब डगलस का उत्पादन फलन (Cobb-Douglas Production Function)

अनेक अर्थशास्त्रियों ने सांख्यिकीय विधियों द्वारा आदाओं (उत्पादन साधनों) के प्रदान (उत्पादन) के सम्बन्धों के परिवर्तनों का व्यावहारिक रूप से अध्ययन करने का प्रयत्न किया है इन अध्ययनों में कॉब डगलस उत्पादन फलन उल्लेखनीय है। यह उत्पादन फलन प्रो० चा डब्ल्यू० कॉब तथा पॉल एच० डगलस के नाम से सम्बद्ध है।

कॉब डगलस उत्पादन इस प्रकार है –

Q = KLαCβ

जहाँ

β=1- α,b<a<1.

इस प्रकार,

Q = KLαC 1-α

जहाँ

Q = उत्पादन,

L = श्रम,

C = पूँजी,

K = पैमाना।

α तथा β दो धनात्मक स्थिर संख्याएँ हैं।

कॉब डगलस ने शेषफल हल किया, उसमें निर्माणकारी उद्योग की वृद्धि में श्रम का भाग 3/4 और शेष पूँजी का भाग 1/4 है, तब फलन यह है –

Q = KL3/4 C1/4

जो पैमाने के स्थिर प्रतिफल को प्रकट करता है क्योंकि L और C के मूल्यों का जोड़ 3/4 + 1/4, एक के बराबर हो जाता है। इसको सिद्ध करने के लिए श्रम तथा पूँजी को G से गुणा करने से प्रदा

Q = K(GL)α(GC)1-α

= K(GαLα) (G1- αC1-a)

= KG(Lα) (C1-α)             [G=GवG1- α]

= KGLαC1-a

= QG                             [∴Q=LαC1- α]

अतः उत्पादन की मात्रा (Q) अथवा प्रदा (Output) उत्पादन साधनों (Inputs) के G गुणा होने से GQ गुणा हो गई है। इससे सिद्ध होता है कि यदि आदाओं को दोगुना कर दिया जाए तो प्रदा भी दोगुनी हो जाएगी। इसका अर्थ है कि कॉंब-डगलस उत्पादन फलन रेखीय और समरूपी है।

कॉब डगलस उत्पादन फलन को रेखाचित्र-6 द्वारा दिखाया गया है।

इस रेखाचित्र में OS माप रेखा (Scale line) है जो A, B और C बिन्दुओं को मिलाने पर प्राप्त होती है। यह रेखा बताती है कि समोत्पाद वक्र IC1 IC2 और IC3 एक-दूसरे से समान अन्तर पर हैं, अतः विस्तार पथ OS पर OA = AB = BC, जो यह दर्शाती है कि जब पूँजी और श्रम आदाओं को कुछ मात्रा में बढ़ाया जाए तो उत्पादन या प्रदा भी उसी अनुपात में बढ़ती है।

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आलोचना (Criticism)

इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ इस प्रकार है –

(1) कॉब डगलस उत्पादन फलन की यह मान्यता अव्यावहारिक है कि कुल उत्पादन के पैमाने में केवल स्थिर प्रतिफल के अनुसार वृद्धि होती है। पैमाने के स्थिर प्रतिफल वास्तविक नहीं हैं, वास्तव में उत्पादन में पैमाने के बढ़ते प्रतिफल या घटते प्रतिफल लागू होते हैं।

(2) इसमें कुल उत्पादन को केवल पूँजी व श्रम का फलन माना गया है जो कि उचित नहीं है।

(3) यह फलन इस अवास्तविक मान्यता पर आधारित है कि सभी श्रम इकाइयाँ समरूप हैं।

(4) यह फलन उद्योगों के मध्य अन्तरों के अध्ययन पर आधारित है, परन्तु उद्योगों में स्थित फर्मों के मध्य अन्तरों को इसमें कोई स्थान नहीं दिया गया है।

(5) इस उत्पादन फलन का निर्माण केवल निर्माणकारी उद्योगों के लिए किया गया है, अतः एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए यह अव्यावहारिक है।

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लागत धारणाएँ (Cost Concepts)

एक व्यवसायी को व्यापार में अनेक प्रकार के निर्णय लेने पड़ते हैं तथा प्रत्येक समस्या की परिस्थितियों में पर्याप्त भिन्नता पायी जाती है। किसी भी विशेष समस्या पर निर्णय लेने के लिए कैसे लागत समंकों की आवश्यकता होगी यह उस समस्या विशेष की प्रकृति व व्यावसायिक परिस्थितियों पर भी निर्भर होता है। एक व्यवसायी द्वारा निम्नलिखित प्रमुख लागत धारणाएँ प्रयोग में लाई जाती हैं

  1. मौद्रिक लागत (Money Cost) – जिन उत्पादन लागतों को मुद्रा में व्यक्त किया जा सकता है उन्हें मौद्रिक लागत कहते हैं। मुद्रा लागत प्रायः सामग्री मजदूरी तथा आदानों को क्रय करने पर होते हैं। मुद्रा लागत दो प्रकार की होती हैं-स्पष्ट और अस्पष्ट ।

(i) स्पष्ट लागतें (Explicit Costs) – उत्पादक द्वारा उत्पादन के बाह्य साधनों (जैसे– कच्चा माल, मजदूरी, प्रत्यक्ष व्यय, ब्याज, कर व बीमा आदि) को अनुबन्ध की शर्तों के अनुसार जो भुगतान दिए जाते हैं, यह सभी लागत स्पष्ट लागते कहलाती हैं।

(ii) अस्पष्ट लागतें (Implicit Costs) – उत्पादक द्वारा लगाए गए स्वयं के साधनों का पारितोषिक ही अस्पष्ट लागतें कहलाती हैं। इन लागतों का भुगतान किसी बाहरी पक्ष को नहीं दिया जाता है। उदाहरणार्थ, स्वामी की सेवाओं का पारिश्रमिक, स्वयं की पूँजी पर ब्याज, स्वामी के भवन का किराया आदि।

  1. वास्तविक लागत (Actual Cost) – वास्तविक लागत से आशय किसी वस्तु, सेवा या सम्पत्ति के निर्माण या खरीदने में किए गए वास्तविक व्ययों से होता है। सामग्री का क्रय मूल्य, श्रमिकों की मजदूरी, भवन का किराया व कारखाने के व्यय तथा अन्य वास्तविक व्यय आदि सम्मिलित हैं। वास्तविक लागत का नकद भुगतान करना अनिवार्य नहीं होता है। ह्रास जैसे गैर-रोकड़ व्यय भी वास्तविक लागत में सम्मिलित किए जाते हैं।
  2. अवसर लागत (Opportunity Cost) – यदि किसी विशेष वस्तु का उत्पादन करने के कारण कई अवसरों का त्याग करना पड़ता है, तो यह त्यागे हुए अगले श्रेष्ठ अवसर की लागत है जिसका त्याग किया गया है। इसीलिए इसे अवसर लागत कहा जाता है। दूसरे शब्दों में इसे वैकल्पिक लागत भी कहते हैं।

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परिवर्तनशील, स्थिर तथा अर्द्ध-स्थिर लागतें (Variable, Fixed and Semi-fixed Costs)

परिवर्तनशील लागत (Variable Cost) उत्पादन के परिवर्तनशील साधनों के प्रयोग की लागत परिवर्तनशील लागत कहलाती है। मार्शल परिवर्तनशील लागत को मूल लागत (Prime Cost) कहते हैं। कुल परिवर्तनशील लागत उत्पादन की मात्रा से प्रत्यक्ष और आनुपातिक सम्बन्ध रखती है। उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन आने पर प्रति इकाई परिवर्तनशील लागत समान रहती है परन्तु परिवर्तनशील लागत की कुल राशि उत्पादन इकाई की मात्रा में परिवर्तन के अनुपात में परिवर्तित होती है।

प्रो० बैन के शब्दों में, “परिवर्तनशील लागत वह लागत है जिसकी कुल राशि उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर परिवर्तित होती है।”

स्थिर लागत (Fixed Cost) स्थिर लागतों से आशय स्थायी साधनों के प्रयोग में लाने के लिए किए जाते हैं। इनकी कुल राशि उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होती हैं।

प्रो० बैन के शब्दों में, “स्थिर लागत वह लागत है जिसकी कुल राशि अल्पकाल में, उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर भी पूर्णतया अपरिवर्तित रहती है।”

अर्द्ध-स्थिर लागत (Semi-fixed Cost) ऐसी लागतें जो आंशिक रूप से स्थिर तथा आंशिक रूप से परिवर्तनशील होती हैं उन्हें अर्द्ध-स्थिर या अर्द्ध-परिवर्तनशील लागत कहते हैं। ये लागते उत्पादन मात्रा में परिवर्तन की दिशा में परिवर्तित होती हैं किन्तु यह परिवर्तन उत्पादन मात्रा में परिवर्तन के अनुपात पर ही निर्भर करता है। इनका उत्पादन की लागत से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है।

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Production and cost Managerial Economics Mcom Notes
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