Demand and the Firm Managerial Economics Mcom Notes

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Demand and the Firm Managerial Economics Mcom Notes

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माँग एवं फर्म (Demand and the Firm)

उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behaviour)

उपयोगिता का अर्थ (Meaning of Utility)

अर्थशास्त्र में उपयोगिता शब्द का अभिप्राय किसी पदार्थ के उपभोग से मिलने वाली सन्तुष्टि से होता है अर्थात् उपयोगिता किसी वस्तु की वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करती है।

जब किसी वस्तु में आवश्यकता सन्तुष्ट करने की शक्ति होती है तो उसमें उपयोगिता होती है, भले ही उस वस्तु से उपभोक्ता को नुकसान ही क्यों न हो रहा हो। जैसे नशीले पदार्थों को सामान्य ढंग से अनुपयोगी माना जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र की भाषा में ये उपयोगिता रखते हैं, क्योंकि ये उपभोक्ता की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करते हैं अर्थात् उपयोगिता में किसी वस्तु या सेवा की आवश्यकता की सन्तुष्टि करने का गुण होता है। प्रो० बॉघ के अनुसार, “अर्थशास्त्री के लिए उपयोगिता आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की क्षमता है। ” एडवर्ड नोबिन के अनुसार, “अर्थशास्त्र में उपयोगिता का अर्थ उस सन्तुष्टि या आनन्द या लाभ से है, जो किसी व्यक्ति को धन या सम्पत्ति के उपभोग से प्राप्त होता है। ”

उपयोगिता की विशेषताएँ (Characteristics of Utility)

(1) उपयोगिता एक सापेक्षिक शब्द है।

(2) उपयोगिता का कोई भौतिक रूप नहीं होता है।

(3) उपयोगिता आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करता है।

(4) यह वास्तविक उपभोग पर निर्भर नहीं करता।

(5) उपयोगिता विषयगत तथा सापेक्षिक होती है। यह आवश्यकता की तीव्रता, उपभोक्ता की रुचि, फैशन, आदत आदि से प्रभावित होती है।

(6) उपयोगिता का सम्बन्ध वस्तु की लाभदायकता या नैतिकता से नहीं होता।

(7) उपयोगिता त्याग के बिना असम्भव है।

Demand and the Firm

उपयोगिता के मापन सम्बन्धी अवधारणाएँ (Approaches to Measurement of Utility)

उपयोगिता की माप के सम्बन्ध में दो विचारधाराएँ प्रचलित हैं-

(i) गणवाचक विचारधारा (Cardinal Approach)

(ii) क्रमवाचक विचारधारा (Ordinal Approach)

(iii) गणवाचक विचारधारा (Cardinal Approach)

मार्शल ने उपयोगिता को द्रव्य के माध्यम से मापने की बात कही है। उनके अनुसार उपयोगिता की गणना संख्याओं में अर्थात् 1, 2, 3, 4, 5, 6 आदि में की जा सकती है। ये संख्याएँ बताती है कि संख्या 5 संख्या 1 से पाँच गुना बड़ी है। इस प्रकार मार्शल का दृष्टिकोण गणवाचक है।

उपयोगिता के मापन के सम्बन्ध में मार्शल का कथन

उपयोगिता को द्रव्य के पैमाने से मापने के सन्दर्भ में मार्शल ने कहा है कि किसी वस्तु की इकाई के उपभोग से वंचित रहने की अपेक्षा उस वस्तु की इकाई के लिए जितना मूल्य देने की तत्परता रहती है, वही उस वस्तु से प्राप्त होने वाली उपयोगिता की मौद्रिक माप है। मार्शल के कथन से स्पष्ट है कि व्यक्ति जिस वस्तु के उपयोग के लिए जितना अधिक द्रव्य देने की तत्परता रखता है, उसे उस वस्तु से उतनी ही अधिक उपयोगिता मिलेगी।

गणवाचक मापन के दो दृष्टिकोण (Two Approaches of Cardinal)

गणवाचक दृष्टिकोण से उपयोगिता को निम्न दो प्रकार से मापा जा सकता है –

  1. मुद्रा के रूप में माप (Measurement in form of Money) – एक उपभोक्ता, एक अण्डे के लिए एक रुपया देता है तो उसके लिए अण्डे की उपयोगिता एक रुपये के बराबर होगी। इस प्रकार उपयोगिता का मापन गणवाचक है।
  2. इकाइयों के रूप में माप (Measurement in form of Units) – प्रो० फिशर ने उपयोगिता की माप के लिए यूटिल शब्द का उपयोग किया है। इसके अन्तर्गत उपयोगिता को यूटिल में स्पष्ट किया जाता है। उदाहरण के लिए ‘ए’ व्यक्ति को चाय के प्याले से 10 यूटिल उपयोगिता प्राप्त होती है, वहीं ‘बी’ व्यक्ति को उसी प्याले से 5 या 7 यूटिल उपयोगिता मिल सकती है। इस प्रकार उपयोगिता को संख्यात्मक रूप से गिना, जोड़ा या घटाया जा सकता है। तथा आपस में तुलना भी की जा सकती है।

क्रमवाचक विचारधारा (Ordinal Approach)

कुछ प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गणवाचक विचारधारा से सहमत नहीं थे जिनमें हिक्स, ऐलन, आदि प्रमुख थे। उनके अनुसार उपयोगिता एक मानसिक अहसास अथवा अनुभूति होती है। उसको मापा नहीं जा सकता, तथा मार्शल द्वारा उपयोगिता के मापने के लिए जिस द्रव्य के पैमाने का प्रयोग किया गया है उसका मूल्य भी स्थिर नहीं रहता है। इन्होंने उपयोगिता विश्लेषण की जगह ‘तटस्थता वक्र विश्लेषण’ की नई रीति का प्रतिपादन किया। इस रीति के अनुसार उपयोगिता को मापने की आवश्यकता नहीं है अपितु केवल तुलना ही की जाती है। इसकी तुलना के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि क्रमवाचक संख्याओं का उपयोग किया जाता है। उपयोगिता के लिए क्रमवाचक संख्याओं का प्रयोग करने के कारण ही इसे क्रमवाचक विचारधारा कहा जाता है।

उपयोगिता के प्रकार (Kind of Utilities)

उपयोगिता को दो प्रकार से अभिव्यक्त किया जाता है –

(1) सीमान्त उपयोगिता (Marginal Utility) (2) कुल उपयोगिता (Total Utility)

(1) सीमान्त उपयोगिता (Marginal Utility)

सीमान्त उपयोगिता का अर्थ (Meaning of Marginal Utility) – सीमान्त उपयोगिता उस अतिरिक्त सन्तुष्टि (उपयोगिता) को बताती है जोकि वस्तु का एक अतिरिक्त इकाई प्रयोग करने से उपभोक्ता को प्राप्त होती है। मान लिया जाता है कि विचाराधीन समय के अन्तर्गत उपभोक्ता की आदतों, पसन्दों व रुचियों में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

प्रो० के० के० बोलडिंग के अनुसार, “एक वस्तु की किसी मात्रा की सीमान्त उपयोगिता कुल उपयोगिता में उस वृद्धि को बताती है, जो कि उपभोग में वस्तु की एक इकाई की वृद्धि के परिणामस्वरूप प्राप्त होती है।”

“The marginal utility of any quantity of commodity is the increase in well utility which results from a unit increase in consumption.

-K.E. Boulding

सीमान्त उपयोगिता के प्रकार (Types of Marginal Utility)

सीमान्त उपयोगिता के निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं –

  1. धनात्मक सीमान्त उपयोगिता (Positive Marginal Utility) जब तक उपभोक्ता वस्तु के उपभोग से कुछ भी सन्तुष्टि प्राप्त करता है तो वह धनात्मक उपयोगिता कहलाती है जिसके कारण कुल उपयोगिता में भी वृद्धि होती है।
  2. शून्य सीमान्त उपयोगिता (Zero Marginal Utility) – जब वस्तु के उपभोग से कोई भी सन्तुष्टि प्राप्त नहीं होती है उपयोगकर्ता को भी सन्तुष्टि नहीं मिलती है तो ऐसी स्थिति को शून्य उपयोगिता कहते हैं। इस स्थिति में कुल उपयोगिता में कोई भी वृद्धि या कमी नहीं होती है। वह समान स्तर पर ही बनी रहती है।
  3. ऋणात्मक सीमान्त उपयोगिता (Negative Marginal Utility) जब वस्तु के उपभोग करने से अनुपयोगिता होने लगे तो उसे ऋणात्मक उपयोगिता कहते हैं। इस स्थिति में कुल उपयोगिता में कमी आने लगती है।

(2) कुल उपयोगिता (Total Utility)

कुल उपयोगिता का अर्थ (Meaning of Total Utility) किसी वस्तु का किसी समय पर किसी वस्तु की विभिन्न इकाइयों के उपभोग से प्राप्त होने वाली उपयोगिताओं के योग को कुल उपयोगिता कहते हैं ।।

प्रो० मेयर्स के अनुसार, “कुल उपयोगिता सन्तुष्टि की वह मात्रा है जो कि वस्तु की निश्चित मात्रा के उपयोग या उसके स्वामित्व से प्राप्त होती है। ”

नीचे दी गई कल्पित तालिका में सीमान्त उपयोगिता और कुल उपयोगिता को स्पष्ट किया गया है

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जैसा कि उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि सन्तरे की पहली तीन इकाइयों के उपभोग तक सीमान्त उपयोगिता धनात्मक है। जब तक सीमान्त उपयोगिता धनात्मक रही है तब तक कुल उपयोगिता में वृद्धि होती रहती है किन्तु यह वृद्धि घटती हुई दर से होती है। वस्तुतः कुल उपयोगिता में वृद्धि सीमान्त उपयोगिता पर निर्भर करती है और सीमान्त उपयोगिता स्वयं गिरती हुई होती हैं। यही कारण है कि उपभोग की इकाइयों में वृद्धि में कुल उपयोगिता में वृद्धि घटती हुई दर से होती है। सन्तरे की चौथी इकाई के उपभोग पर सीमान्त उपयोगिता शून्य हो जाती है। और कुल उपयोगिता की वृद्धि रुक जाती है। इस बिन्दु पर कुल उपयोगिता अधिकतम होती है। इसलिए इसे पूर्ण तृप्ति का बिन्दु कहते हैं। इस प्रकार जब सीमान्त उपयोगिता शून्य होती है तब कुल उपयोगिता अधिकतम होती है। यदि उपयोगिता इस बिन्दु के बाद भी उपभोग का क्रम चालू रखता है तो उसे अगली इकाइयों से उपयोगिता के स्थान पर अनुपयोगिता प्राप्त होगी। दी गई। तालिका में पाँचवीं इकाई के उपयोग के सम्बन्ध में दिखलाया गया है, इस बिन्दु पर सीमान्त उपयोगिता ऋणात्मक हो जाती है तथा कुल उपयोगिता गिरने लगती है।

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सम-सीमान्त उपयोगिता नियम (Law of Equi-Marginal Utility)

यह नियम उपभोग का आधारभूत नियम है। इसका प्रतिपादन सबसे पहले एच० एच० गौसेन द्वारा किया गया था जिस कारण इसको “गौसेन का नियम” भी कहते हैं। इस नियम को अनेक अन्य नामों से भी पुकारा जाता है जैसे सम-सीमान्त उपयोगिता नियम, प्रतिस्थापना का नियम, अनुपातिका का नियम, सीमान्त तुलनाओं का नियम, मितव्ययता का नियम भी कहा जाता है। अधिकतम सन्तुष्टि का नियम इस बात की व्याख्या करता है कि एक उपभोक्ता किस प्रकार अपने व्यय से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त कर सकता है।

प्रो० चैपमैन के अनुसार, “जिस प्रकार हवा में फेंका गया पत्थर पृथ्वी पर गिरने के लिए विवश होता है। उसी प्रकार हम अपनी आय को प्रतिस्थापना के नियम के अनुसार व्यय करने के लिए विवश तो नहीं होते, लेकिन फिर भी हम अपना व्यय लगभग इस नियम के अनुसार ही करते हैं, क्योंकि हम विवेकशील हैं।”

उपभोक्ता का साम्य (Consumer’s Equilibrium) – असीमित आवश्यकताओं तथा सीमित साधनों के होने पर एक उपभोक्ता का उद्देश्य अपने व्यय से अधिकतम सन्तुष्टि प्रदान करना है और जब वह अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त कर लेता है तब उपभोक्ता साम्य की अवस्था में होता है। सरल शब्दों में जब कोई उपभोक्ता अपनी व्यय करने के ढंग में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहता है, तब उसे साम्य की अवस्था में कहा जाएगा। इस प्रकार अधिकतम सन्तुष्टि का नियम इस बात को स्पष्ट करता है कि उपभोक्ता साम्य की अवस्था में कब होता है और इसे इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए अपनी आय को किस प्रकार व्यय करना चाहिए।

अधिकतम तुष्टि प्राप्त करने की विधि – अब प्रश्न यह उठता है कि एक उपभोक्ता अधिकतम सन्तुष्टि किस प्रकार प्राप्त कर सकता है? इसके लिए उपभोक्ता सबसे पहले अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं को उनकी उपयोगिता के क्रम में सजा लेता है और उन पर उसी क्रम से रुपया खर्च करता हैं जो वस्तु उसे द्रव्य के बदले जितनी अधिक उपयोगिता देती है उसे पहले खरीदता है और जो वस्तु जितनी कम उपयोगिता रखती है उसे उतना ही बाद में खरीदता है। यदि उपभोक्ता अपना व्यय इसी क्रम में करता रहे तो यह बात निश्चित है कि उसे सभी वस्तुओं से मिलने वाली उपयोगिता अधिकतम रहेगी। इसका कारण यह है कि इस ढंग से व्यय करने पर द्रव्य की अन्तिम इकाई की उपयोगिता सभी वस्तुओं के लिए समान या लगभग समान ही होने लगती है और फलस्वरूप उपभोक्ता को मिलने वाली कुल उपयोगिता बढ़कर अधिकतम हो जाती है। वास्तव में, उपभोक्ता द्वारा व्यय करने के इस ढंग को ही अर्थशास्त्र में “सम-सीमान्त उपयोगिता नियम” कहते हैं।

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सम-सीमान्त उपयोगिता नियम की परिभाषा (Definition of Law of Equi-marginal Utility)

प्रो० गौसेन के अनुसार, “सम-सीमान्त उपयोगिता नियम उपभोक्ता के उस व्यवहार को स्पष्ट करता है, जिसे दी हुई अनेक वस्तुओं और सेवाओं में अपनी सीमित आय को व्यय करने के लिए चुनाव करना होता है।”

प्रो० मार्शल के अनुसार, “यदि किसी व्यक्ति के पास कोई ऐसी वस्तु (द्रव्य) है जिसे वह अनेक प्रयोगों में लगा सकता है तो वह उस वस्तु को विभिन्न प्रयोगों में इस प्रकार बांटेगा कि उसकी सीमान्त उपयोगिता सभी प्रयोगों में समान बनी रहे, क्योंकि यदि वस्तु की सीमान्त उपयोगिता किसी एक प्रयोग में दूसरे प्रयोग की अपेक्षा अधिक है तो वह निश्चित रूप से दूसरे प्रयोग से वस्तु की कुछ मात्रा को हटाकर पहले प्रयोग में लगाने से अधिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

अधिकतम सन्तुष्टि की कसौटी क्या है – एक उपभोक्ता अपनी व्यय योजना से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त कर रहा है या नहीं इसका उत्तर सम-सीमान्त उपयोगिता से पता चलता है। यदि सम-सीमान्त इकाइयों की उपयोगिता लगभग समान बनी रहती है तो उपभोक्ता को अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त होती है और यदि सीमान्त इकाइयों की उपयोगिता बराबर नहीं रहती है। तो अधिकतम सन्तुष्टि की प्राप्ति होना उपभोक्ता के लिए सम्भव नहीं है।

प्रो० हिक्स के अनुसार, “जब प्रत्येक अवस्था में व्यय की सीमान्त इकाइयों से उपयोगिता में समान वृद्धि प्राप्त होती है तो ऐसी दशा में सन्तुष्टि अधिकतम हुआ करती है।”

तालिका द्वारा स्पष्टीकरण – माना एक उपभोक्ता के पास 8 रुपये हैं वह दो वस्तुएँ तथा B पर तालिका में दिए हुए क्रम के अनुसार व्यय करता है। यह भी मान लीजिए कि वस्तु की एक इकाई एक रुपये के बराबर है –

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प्रकट अधिमान सिद्धान्त (Revealed Preference Theory)

प्रकट अधिमान सिद्धान्त के प्रतिपादक प्रो० सैम्युलसन अपने सिद्धान्त को “माँग के तार्किक सिद्धान्त का तीसरा मूल” मानते हैं। प्रो० सैम्युलसन का सिद्धान्त माँग के नियम की व्यवहारात्मक दृष्टिकोण से व्याख्या करता है। इस सिद्धान्त के पूर्व मार्शल द्वारा विकसित उपयोगिता विश्लेषण तथा हिक्स-ऐलन का उदासीनता वक्र विश्लेषण उपभोक्ता के माँग वक्र की मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (Psychological Approach) से व्याख्या करते हैं। प्रो० सैम्युलसन ने उपभोक्ता व्यवहार की दो मान्यताओं (Two Axiomes) के आधार पर माँग के नियम के मूलभूत परिणाम निकालने का प्रयास किया है। ये मान्यताएँ इस प्रकार हैं –

(1) अनेक उपलब्ध विकल्पों (Alternatives) में से उपभोक्ता एक निश्चित चुनाव करता है। दूसरे शब्दों में वह अपने निश्चित अधिमान को प्रकट करता है (He reveals his definite preference), यह मान्यता इस सिद्धान्त को सबल क्रम (Strong ordering) की श्रेणी में रख देती है।

(2) यदि अनेक विकल्पों में से संयोग B की तुलना एक परिस्थिति में संयोग A का चुनाव कर लिया गया है तो किसी अन्य परिस्थिति में यदि संयोग A तथा संयोग B में पुनः चुनाव करना हो तो उपभोक्ता संयोग B को नहीं चुनेगा। यह मान्यता उपभोक्ता व्यवहार की सामंजस्य (Consistency) की दशा को स्पष्ट करती है। यह सिद्धान्त उपभोक्ता के व्यवहार में संक्रमकता (Transitivity) को भी स्पष्ट करता है जो सामंजस्यता की मान्यता का ही एक विस्तृत रूप है। संक्रमकता की धारणा यह बताती है कि यदि संयोग A को B की तुलना में A संयोग B को C की तुलना में सामंजस्यता के आधार पर चुना गया है तो उपभोक्ता संयोग A तथा C में से प्रत्येक दशा में संयोग A को ही चुनेगा। इस प्रकार सैम्युलसन का प्रकट अधिमान सिद्धान्त बाजार की विभिन्न कीमत-आय स्थितियों में उपभोक्ता के वास्तविक व्यवहार (Actual Behaviour) के आधार पर उपभोक्ता के माँग वक्र की व्याख्या करता है। इसी कारण प्रो० तपस मजूमदार ने प्रो० सैम्युलसन को व्यवहारवादी क्रमवाचक (Behaviourist Ordinalist) बताया है तथा प्रो० सैम्युलसन के सिद्धान्त के व्यवहारवादी क्रमवाचक उपयोगिता सिद्धान्त (Behaviourist Ordinal Utility Theory) के नाम से पुकारा जाता है।

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प्रकट अधिमान सिद्धान्त की श्रेष्ठता (Superiority of Revealed Preference Theory)

(1) प्रकट अधिमान सिद्धान्त व्यवहारवादी दृष्टिकोण पर आधारित है। जबकि इससे पूर्व के सिद्धान्त मार्शल का उपयोगिता सिद्धान्त तथा हिक्स का उदासीनता वक्र सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। इस प्रकार प्रकट अधिमान सिद्धान्त वास्तविकता के अधिक निकट है जिसकी सहायता से उपभोक्ता के वास्तविक सिद्धान्त को समझा जा सकता है।

(2) प्रकट अधिमान सिद्धान्त सबल क्रमबद्धता पर आधारित है। यह सिद्धान्त विभिन्न वैयक्तिक स्थितियों के प्रति उदासीनता के दृष्टिकोण को त्याग देता है। यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि एक दी हुई कीमत आय स्थिति के अन्तर्गत उपभोक्ता केवल एक ही संयोग को चुनता है।

(3) प्रकट अधिमान सिद्धान्त उपभोक्ता के विवेकपूर्ण व्यवहार का अर्थ हिक्स और मार्शल के विचारों से भिन्न स्पष्ट करता है। जहाँ हिक्स और मार्शल के अनुसार उपभोक्ता की विवेकशीलता का अर्थ है कि उपभोक्ता सीमित संसाधनों से अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करने का प्रयास करता है वहीं सैम्युलसन की विचारधारा में विवेकशीलता का अर्थ उपभोक्ता व्यवहार के सामंजस्य से है।

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प्रकट अधिमान सिद्धान्त की आलोचना (Criticism of Revealed Preference Theory)

(1) सैम्युलसन ने सबल क्रमबद्धता (Strong Ordering) – की मान्यता के आधार पर उपभोक्ता के व्यवहार में कुछ संयोगों के प्रति उदासीनता को अस्वीकार किया है। प्रो० आर्मस्ट्रांग की मान्यता के अनुसार उपभोक्ता के द्वारा चयन किए गए संयोग बिन्दु के निकट अनेक उदासीन बिन्दु होते हैं। प्रो० आर्मस्ट्रांग ने इसी बिन्दु पर हिक्स की उदासीनता वक्र विश्लेषण की भी आलोचना की थी।

(2) प्रो० सैम्युलसन का सिद्धान्त माँग की धनात्मक आय लोच की व्याख्या करता है। यह सिद्धान्त शून्य आय लोच तथा ऋणात्मक आय लोच की स्थितियों को स्पष्ट नहीं करता है। इस बिन्दु पर इस सिद्धान्त को प्रो० तपस मजूमदार ने आलोचना की है। प्रो० मजूमदार के अनुसार यह सिद्धान्त ऋणात्मक आय प्रभाव की व्याख्या नहीं करता है। अतः इस सिद्धान्त की सहायता से “गिफिन का विरोधाभास” स्पष्ट नहीं किया जा सकता है।

(3) प्रकट अधिमान सिद्धान्त अनिश्चितता में उपभोक्ता व्यवहार की व्याख्या करने में असफल है। यह खेल सिद्धान्त की विभिन्न अनिश्चितताओं को स्पष्ट करने में असमर्थ हैं।

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माँग पूर्वानुमान (Demand Forecasting)

माँग पूर्वानुमान से आशय (Meaning of Demand Forecasting) – माँग पूर्वानुमान का अर्थ समझने के लिए सर्वप्रथम पूर्वानुमान का अर्थ जानना आवश्यक होगा। सामान्य अर्थों में भविष्य के बारे में अनुमान लगाना ही पूर्वानुमान कहलाता है, यह एक मानवीय आचरण है।

लुइस ए० ऐलन के अनुसार, “ज्ञात तथ्यों द्वारा निष्कर्ष निकालकर भविष्य के सम्बन्ध मे अनुमान लगाने के लिए किए जाने वाले व्यवस्थित प्रयासों को पूर्वानुमान कहते हैं। यहाँ यह ध्यान रहे कि सभी पूर्वानुमान भावी अनुमान होते हैं किन्तु सभी भावी अनुमान पूर्वानुमान नहीं कहे जा सकते। पूर्वानुमान के लिए भूतकालीन समंकों व परिस्थितियों का विश्लेषण आवश्यक है। अतः एक विक्रेता द्वारा स्वयं-बोध के आधार पर अपने उत्पाद की माँग अनुमान लगान पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता है। हाँ, यदि वह विक्रेता भूतकालीन समंकों का विश्लेषण करके अपने उत्पाद की माँग का अनुमान लगाता है तो इसे ही पूर्वानुमान कहते हैं।

माँग पूर्वानुमान का आशय किसी वस्तु की माँग के भूतकालीन समकों का विश्लेषण करते हुए उसकी अवधि की सम्भावित मांग या बिक्री का अनुमान लगाने से होता है। यह माँगी जाने वाली वस्तु को मात्रा तथा उसके विक्रय मूल्य दोनों को प्रकट करता है। पूर्वानुमान एक कोरी कल्पना नहीं है वरन् सम्बन्धित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सामान्य बुद्धि के प्रयोग द्वारा या भूतकालीन समंकों के आधार पर सांख्यिकीय विधियों एवं सूत्रों का प्रयोग करके किसी निश्चित भावी अवधि के लिए मांग का अनुमान लगाना ही पूर्वानुमान है। यह मात्रा और मूल्य दोनों में ही लगाया जाता है। यह कार्य विक्रय प्रबन्धक या विक्रय संचालक द्वारा किया जाता है। इस कार्य में विपणन अधिकारी उनकी सहायता करते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं फिलिप कोटलर के अनुसार, “कम्पनी का विक्रय पूर्वानुमान एक चुनी गयी विपणन योजना और वातावरण सम्बन्धी कल्पित दशाओं पर आधारित कम्पनी की बिक्री का अनुमानित स्तर है।” रेमण्ड विल्स के अनुसार, “माँग पूर्वानुमान का आशय भावी बाजारों में अपनी फर्म के भाग का पूर्व निर्धारण से होता है।”

कण्डिफ और स्टिल के अनुसार, “एक प्रस्तावित विपणन योजना के अन्तर्गत भावी अनियन्त्रणीय और प्रतिस्पर्धी शक्तियों का अनुमान लगाते हुए किसी विशिष्ट भावी अवधि की बिक्री का एक अनुमान ही विक्रय पूर्वानुमान कहलाता है।”

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माँग पूर्वानुमान की विशेषताएँ (Characteristics of Demand Forecasting)

माँग पूर्वानुमान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

(1) माँग पूर्वानुमान नियोजन की आधारशिला है।

(2) यह भावी बिक्री का अनुमान है।

(3) यह भूतकालीन समकों एवं वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लगाया जाता है।

(4) माँग पूर्वानुमान निश्चित समय या अवधि के लिए लगाया जाता है।

(5) माँग पूर्वानुमान मुद्रा या इकाइयों या दोनों में हो सकता है।

(6) माँग पूर्वानुमान दो बातों पर आधारित है एक विपणन योजना पर तथा दूसरे आर्थिक तथा अन्य घटकों पर इन घटकों में प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ताओं की रुचि, स्थानापन्न वस्तुएँ और उनके मूल्य आदि बाते प्रमुख होती हैं। यदि विपणन योजना में परिवर्तन जाता है अथवा आर्थिक व अन्य घटक बदल जाते हैं तो विक्रय पूर्वानुमान भी बदल जाता है।

(7) माँग पूर्वानुमान किसी एक उत्पाद के लिए हो सकता है अथवा सम्पूर्ण उत्पाद मात्रा के लिए यह पूरे उद्योग के लिए हो सकता है, अथवा एक फर्म विशेष के लिए।

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माँग पूर्वानुमान के उद्देश्य (Objective of Demand Forecasting)

माँग पूर्वानुमान के उद्देश्यों को दो भागों में विभाजित किया गया है –

  1. अल्पकालीन उद्देश्य (Short-term Objective) – एक सप्ताह से लेकर एक वर्ष तक की अवधि के पूर्वानुमान अल्पकालीन कहलाते हैं। एक गतिशील प्रकृति के व्यवसायी द्वारा ही ऐसे पूर्वानुमान लगाए जाते हैं। इसके उद्देश्य निम्नलिखित हो सकते हैं—

(i) उपयुक्त उत्पादन नीति का निर्धारण (Formulation of Suitable Production Policy) – पूर्वानुमान का प्रथम उद्देश्य उसके आधार पर फर्म की उत्पादन नीति का निर्माण करना होता है ताकि माँग के अनुरूप उत्पादन किया जा सके और अति उत्पादन या अल्प उत्पादन की समस्याएँ उत्पन्न न हों।

(ii) कच्चे माल की नियमित उपलब्धि (Availability of Regular Supply of Materials) –पूर्वानुमान का द्वितीय उद्देश्य व्यवसाय के लिए आवश्यकतानुसार कच्चे Raw माल का उपलब्ध कराना होता है ताकि एक ओर तो यह उत्पादन के लिए निरन्तर मिल सके और इसकी और स्टॉक की लागत की न्यूनतम रहे।

(iii) मशीन की क्षमता का सर्वोत्तम उपयोग (Best Utilization of Machine Capacity) – माँग पूर्वानुमान द्वारा फर्म में मशीन क्षमता की माँग के अनुरूप समायोजित किया जाता है जिससे की माँग अधिक होने पर मशीन क्षमता की कमी के कारण उत्पादन में बाधा न पड़े, तथा माँग कम होने पर मशीनें बेकार न पड़ी रहें।

(iv) श्रम की नियमित उपलब्धि (Regular Availability of Labour) – पूर्वानुमान का उद्देश्य प्रशिक्षित एवं अप्रशिक्षित श्रमिकों की उचित व्यवस्था करना भी होता जिससे श्रम की कमी के कारण उत्पादन में किसी प्रकार की रुकावट न आने पाए और न हो कार्य की कमी के कारण श्रमिकों को खाली बैठना न पड़े।

  1. दीर्घकालीन उद्देश्य (Long Term Objectives) – एक वर्ष से अधिक समय की अवधि के लिए योजनाएँ बनाने के लिए भावी माँग का पूर्वानुमान कराना ही दीर्घकालीन पूर्वानुमान कहलाता है।

(i) प्लाण्ट क्षमता का नियोजन (Plant Capacity Planning) – माँग पूर्वानुमान का प्रथम दीर्घकालीन उद्देश्य पूर्वानुमानित दीर्घकालीन माँग के अनुरूप प्लाण्ट की क्षमता को बढ़ाना है। यदि क्षमता पर्याप्त नहीं है तो क्षमता बढ़ाने के लिए वर्तमान प्लाण्ट का विस्तार किया जा सकता है।

(ii) श्रम शक्ति का नियोजन (Man Power Planning) – माँग पूर्वानुमान क द्वितीय उद्देश्य उत्पादन कार्य की आवश्यकतानुसार स्थायी श्रमिकों की व्यवस्था करना है जिससे श्रम शक्ति की कमी से कार्य में रुकावट न आने पाए। वस्तुतः श्रमिकों के प्रशिक्षण तथ सेविवर्गीय विकास की योजनाएँ दीर्घकालीन हैं।

(iii) दीर्घकालीन उत्पादन नियोजन (Long Term Production Planning) – माँग पूर्वानुमान का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य दीर्घकालीन उत्पादन नियोजन भी होता है जिससे कि जनसंख्या, शहरीकरण, शिक्षा और रहन-सहन के स्तर में परिवर्तन के अनुसार उत्पादन किया जा सके।

(iv) वित्तीय नियोजन (Financial Planning) – माँग पूर्वानुमान से दीर्घकालीन उत्पादन का नियोजन सम्भव होता है और दीर्घकालीन उत्पादन नियोजन से फर्म की दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं का ज्ञान होता है। एक फर्म अपने इस ज्ञान से आवश्यकतानुसार दीर्घकालीन वित्त व्यवस्था कर सकते हैं।

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