Marketing Meaning Function & Importance Bcom Notes

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Marketing Meaning Function & Importance Bcom Notes

Marketing Meaning, Function & Importance Bcom Notes:- In this post, we will give you notes of Principal of Marketing of Bcom 3rd year English and Hindi, Marketing Meaning Function & Importance Bcom Notes Hindi and English. marketing and introduction notes.

Notes:- This Post Already Available in Hindi and English language.

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 विपणन- अर्थ, कार्य एवं महत्त्व (Marketing: Meaning, Functions & Importance)

 

विपणन का अर्थ (Meaning of Marketing)

वर्तमान वाणिज्यिक तथा औद्योगिक युग में विपणन कोई नया शब्द नहीं है। विभिन्न व्यक्ति विपणन शब्द को विभिन्न अर्थों में प्रयोग करते हैं। कुछ व्यक्तियों के लिये विपणन का अर्थ केवल वस्तुओं के क्रय एवं विक्रय से है जबकि कुछ अन्य व्यक्ति इसमें और भी अनेक क्रियाओं को सम्मिलित करते हैं, जैसे–विक्रय उपरान्त सेवा, वितरण तथा विज्ञापन आदि। वास्तव में विपणन क्रय विक्रय उत्पाद नियोजन, विज्ञापन आदि तक सीमित न रहकर एक विस्तृत अधय शब्द है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन से पूर्व की जाने वाली क्रियाओं से लेकर इनके वितरण एवं आवश्यक विक्रयोपरान्त सेवाओं तक को शामिल किया जाता है। इस प्रकार विपणन का कोई सर्वमान्य अर्थ या परिभाषा नहीं है। अध्ययन की सुविधा के लिए विपणन के अर्थ की व्याख्या करने वाली विचारधाराओं को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है –

1, पुरानी या संकीर्ण विचारधारा,

2, नयी या आधुनिक विचारधारा॥

1, पुरानी, संकीर्ण या उत्पाद अभिमुखी विचारधारा (Old, Narrow or Product-oriented Concept)

यह विपणन की अत्यन्त प्राचीन अथवा संकीर्ण विचारधारा है, जिसमें विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन करने के लिये क्रय एवं इन वस्तुओं को ग्राहकों तक पहुँचाने के लिये विक्रय आदि क्रियाओं को विपणन में सम्मिलित किया जाता है। इसके अनुसार किसी भी व्यवसाय का मूलभूत उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना है। विपणन का मूलभूत कार्य वस्तुओं को उत्पादक अथवा निर्माता से उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है। बीसवीं शताब्दी के पाँचवे दशक के आसपास तक व्यावसायियों/ प्रबन्धको/अर्थशास्त्रियों ने विपणन की इसी प्रकार की परिभाषाएँ दी हैं। विपणन की सूक्ष्म अथवा संकीर्ण अर्थ वाली प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित है –

(1) प्रो० पाइले के अनुसार, “विपणन में क्रय और विक्रय दोनों ही क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।”

(2) क्लार्क एवं क्लार्क के अनुसार, “विपणन में वे सभी प्रयत्न सम्मिलित हैं जो वस्तुओं एवं सेवाओं के स्वामित्व हस्तान्तरण एवं उनके (वस्तुओं एवं सेवाओं के) भौतिक वितरण में सहायता प्रदान करते हैं।”

(3) कन्वर्स, ह्यूजी एवं मिचेल के अनुसार, “विपणन में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन से उपभोग तक के प्रवाह की क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।”

(4) अमेरिकन मार्केटिंग एसोसियेशन के अनुसार, “विपणन से तात्पर्य व्यावसायिक क्रियाओं के निष्पादन से हैं जो उत्पादक से उपभोक्ता या प्रयोगकर्ता तक वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह को नियन्त्रित करती हैं।”

विपणन की परम्परागत विचारधारा की प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है –

1, परम्परागत विचारधारा के अनुसार संस्था का समस्त ध्यान उत्पादन पर होता है।

2, परम्परागत विचारधारा का लक्ष्य अधिकतम विक्रय द्वारा अधिकतम लाभ कमाना है।

3, इस विचारधारा में उपभोक्ता की संतुष्टि एवं कल्याण पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।

4, इसमें वस्तु के उत्पादन के पूर्व एवं वस्तु के विक्रय के बाद की क्रियाओं को शामिल नहीं किया जाता है।

5, यह विचारधारा इस दर्शन पर आधारित है कि उत्पादक या विक्रेता यह भली-भाँति जानता है कि उपभोक्ता के लिये क्या अच्छा है और उसे किस वस्तु की आवश्यकता है।

6, परम्परागत विचारधारा के अन्तर्गत कम्पनी के विभिन्न विभागों में पारस्परिक सम्बन्ध नहीं होते हैं।

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2, नयी विस्तृत आधुनिक या ग्राहक-अभिमुखी विचारधारा (New, Modern or Customer-oriented Concept)

आधुनिक विचारधारा वस्तु के स्थान पर ग्राहकों को अधिक महत्व देती है, इसलिये इसे ग्राहक-अभिमुखी विचारधारा कहते हैं। इस विचारधारा के अनुसार ऐसी वस्तुओं का ही निर्माण किया जाता है जो कि अधिकांश ग्राहकों की विभिन्न । आवश्यकताओं, अभिरुचियों आदि के अनुरूप हो। इसके पश्चात वस्तुओं का विक्रय भी ग्राहक की सुविधा को ध्यान में रखकर किया जाता है और यदि आवश्यकता हो तो विक्रयोपरान्त सेवा (After Sales Service) की व्यवस्था भी की जाती है। इस विचारधारा के अनुसार विपणन को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है –

(1) पॉल मजूर के अनुसार- “विपणन का अर्थ समाज को जीवन स्तर प्रदान करना है।”

(2) विलियम जे० स्टेण्टन के अनुसार, “विपणन का अर्थ उन पारस्परिक व्यावसायिक क्रियाओं की सम्पूर्ण प्रणाली से है जो कि वर्तमान व सम्भावित ग्राहकों को उनकी आवश्यकता संतुष्टि की वस्तुओं और सेवाओं के बारे में योजना बनाने, मूल्य निर्धारित करने, संवर्द्धन करने और वितरण के लिये की जाती है।”

(3) प्रो० एच० एल० हेन्सन के अनुसार, “विपणन उपभोक्ताओं की इच्छा को ज्ञात करने, उन्हें विशिष्ट वस्तुओं एवं उत्पादों में परिवर्तित करने और तदुपरान्त उन वस्तुओं एवं सेवाओं के जरिए अधिकाधिक उपभोक्ताओं के उपयोग को सम्भव बनाने की प्रक्रिया है।”

 

विपणन की आधुनिक विचारधारा की विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है –

1, इस विचारधारा में उपभोक्ता की सन्तुष्टि पर विशेष ध्यान दिया जाता है अर्थात् उपभोक्ता को सर्वेसर्वा माना जाता है।

2, इस विचारधारा के अन्तर्गत प्रबन्धकों को यह आभास होता है कि ग्राहक की आवश्यकताएँ महत्वपूर्ण है न कि उत्पादन।

3, आधुनिक विचारधारा के अनुसार समाज के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने का दायित्व विपणन का है।

4, इस विचारधारा के अन्तर्गत विपणन के द्वारा नये-नये उत्पादन आरम्भ करने का अवसर प्राप्त होता है।

5, इस विचारधारा के अनुसार उत्पत्ति के सभी साधनों का प्रभावी उपयोग सम्भव होता है।

विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था में विपणन का महत्व (Importance of Marketing in the Emerging Economy of India)

(1) प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग – आधुनिक सुदृढ़ विपणन व्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों का देश के हित में विदोहन तथा अधिकतम उपयोग करने में सक्रिय सहयोग प्रदान करती है जिसकी कि विकासशील देशों में अत्यन्त आवश्यकता होती है।

(2) अर्थव्यवस्था को मन्दी से बचाना – आधुनिक विपणन अवधारणा विकासशील देश की अर्थव्यवस्था को मन्दी से बचाने में सक्रिय योगदान प्रदान करती है। यदि विपणन न हो तो विक्रय कम मात्रा में होगा जिसके कारण सारा देश मन्दी के चंगुल में फँस जायेगा।

(3) रहन – सहन का स्तर ऊँचा उठाना-आधुनिक विपणन अवधारणा जन-साधारण को उपभोग के लिए बड़े पैमाने पर नई-नई वस्तुओं की जानकारी देकर एवं उपलब्ध कराकर रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने में सक्रिय सहयोग प्रदान करती है।

(4) राष्ट्रीय आय में वृद्धि – जब आधुनिक विपणन सुविधाओं के कारण विभिन्न प्रकार के ग्राहकों की आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्माण किया जाता है तो देश की कुल वस्तुओं और सेवाओं में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप देश की कुल राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय दोनों में वृद्धि होती है।

(5) रोजगार की सुविधा – आधुनिक विपणन अवधारणा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करके बेरोजगारी एवं अर्द्ध-बेरोजगारी के उन्मूलन में सक्रिय सहयोग प्रदान करती है। आज विपणन क्षेत्र भारत में रोजगार प्रदान करने का प्रमुख स्रोत माना जाता है।

(6) औद्योगीकरण को प्रोत्साहन – आज जिन देशों में आधुनिक विपणन व्यवस्था है, वे देश औद्योगिक क्षेत्र में शिखर पर हैं। इस प्रकार विपणन व्यवस्था अच्छी होने से औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिलता है जिसकी भारत जैसे विकासशील देशों को अत्यन्त आवश्यकता है।

(7) नियति में वृद्धि – आधुनिक सुदृढ़ विपणन व्यवस्था के कारण जो देश औद्योगीकरण के शिखर पर हैं, वे निर्यात अधिक करते हैं और आयात कम। भारत जैसे विकासशील देश को आज निर्यात में वृद्धि की सबसे अधिक आवश्यकता है और इसी कारण विकासशील देशों (भारत सहित) में आधुनिक विपणन का महत्व है।

(8) बाजार के विकास में सहायक – विपणन का स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय तीन स्तरों पर महत्व है। आधुनिक सुदृढ़ विपणन व्यवस्था स्थानीय बाजार को राष्ट्रीय बाजार तथा राष्ट्रीय बाजार को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार का रूप प्रदान करती है।

(9) वस्तुओं के मूल्यों में कमी – एक सुव्यवस्थित एवं प्रभावी आधुनिक विपणन व्यवस्था के होने से जहाँ एक और अधिक माँग होने पर उत्पादन की मात्रा बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन लागत कम हो जाती है और दूसरी ओर वितरण लागतों में और वस्तुओं के मूल्यों में पर्याप्त कमी आती है। फलतः उपभोक्ता अधिक मात्रा में वस्तुओं का उपभोग करना प्रारम्भ कर देते हैं।

कण्डिफ एवं स्टिल के अनुसार विपणन के अन्तर्गत निम्नलिखित क्रियाएँ सम्मिलित की जाती है-

 

1. Marketing An Introduction

 

 

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विपणन की भूमिका अथवा महत्त्व (Role or Importance of Marketing)

आधुनिक अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता व्यावसायिक जगत का केन्द्र बिन्दु बन गया है। सभी व्यावसायिक क्रियाएँ उपभोक्ता के चारों ओर चक्कर लगाती हैं। उपभोक्ता अवधारणा को अधिकाधिक मान्यता दिये जाने के कारण आर्थिक अवधारणा में परिवर्तन आ रहे हैं। फलस्वरूप विपणन का महत्व भी दिनोदिन बढ़ता जा रहा है।

पीटर एफ ड्रकर (Peter F, Drucker) के अनुसार, “एक व्यावसायिक उपक्रम के दो आधारभूत कार्य हैं- प्रथम, विपणन (Marketing) एवं द्वितीय, नवाचार (Innovation)।”

विपणन के महत्व का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है :

 

निर्माता के लिये विपणन का महत्त्व (Importance of Marketing for Manufacturer)

(1) उत्पादन सम्बन्धी निर्णयों में सहायक (Helpful in Production decision) – वर्तमान समय में व्यवसाय की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उपभोक्ताओं की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप वस्तुओं का उत्पादन किया जाये। अतः वस्तुओं की मात्रा, कीमत निर्धारण की व्यवस्था, विज्ञापन के साधन आदि के सम्बन्ध में सही निर्णय लेने के लिये विपणन बहुत उपयोगी होता

(2) आय वृद्धि में सहायक (Helpful in Increasing Income) – प्रत्येक फर्म का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना होता है। विपणन एक ओर तो विभिन्न विपणन लागतों में कमी करके वस्तुओं व सेवाओं की कीमतों में कमी करता है और दूसरी ओर विपणन के आधुनिक तरीकों जैसे विज्ञापन, विक्रय सम्वर्द्धन आदि के द्वारा वस्तुओं व सेवाओं की मांग में वृद्धि करता है परिणामतः वस्तुओं की लागतों में कमी और माँग में वृद्धि होने के कारण कुल बिक्री में वृद्धि होती है जिससे फर्म के लाभों में वृद्धि होती है।

(3) सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहायक (Helpful in exchanging information) – विपणन को सहायता से व्यवसाय और समाज के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। विपणन की सहायता से समय-समय पर समाज में होने वाले परिवर्तनों, जैसे आवश्यकताओं व रुचियों में परिवर्तन, फैशन में परिवर्तन आदि के सम्बन्ध में उच्च प्रबन्ध को जानकारी रहती है। आज की बढ़ती हुई पारस्परिक प्रतिस्पर्धा में इन सूचनाओं का और भी अधिक महत्व बढ़ गया है।

(4) वितरण में सहायक (Helpful in distribution) – विपणन का अध्ययन एक निर्माता को यह बताता है कि उसको वस्तु कम-से-कम लागत अधिक से अधिक सुविधाजनक केन्द्रों पर उपभोक्ता को किस प्रकार प्रदान करनी चाहिए। आज इस प्रतियोगी युग में वही निर्माता सफल हो सकता है जिसकी विपणन लागत न्यूनतम होती है।

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समाज के लिये विपणन का महत्त्व (Importance of Marketing to Society)

(1) रोजगार के अवसरों में वृद्धि – विपणन ने रोजगार के अवसरों की वृद्धि में पर्याप्त सहयोग दिया है। वास्तव में, उत्पादन की तुलना में विपणन में रोजगार अवसरों में थोड़ी ही अवधि में चार गुनी वृद्धि हुई है।

(2) रहन – सहन का स्तर प्रदान करना- समाज में विभिन्न वस्तुओं की माँग उत्पन्न करने, माँग में वृद्धि करने का श्रेय विपणन को ही है। पॉल मजूर के अनुसार, “विपणन समाज को जीवन स्तर प्रदान करता है।”

(3) व्यापारिक मन्दी से सुरक्षा – बाजार में वस्तुओं की माँग घटने पर विपणन उत्पादित वस्तु के लिये नये-नये बाजारों की खोज करके, वस्तु की किस्म में सुधार करके, वस्तु के विभिन्न वैकल्पिक प्रयोग उत्पन्न करके, वितरण लागत को कम करके, विक्रय की मात्रा में कमी आने से रोकता है। इस प्रकार विपणन व्यापारिक मन्दी से सुरक्षा प्रदान करता है।

(4) राष्ट्रीय आय में वृद्धि – जब विभिन्न प्रकार के ग्राहकों की आवश्यकताओं के अनुसार वस्तुओं का निर्माण किया जाता है तो देश की कुल वस्तुओं और सेवाओं में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।

(5) ग्राहकों के ज्ञान में वृद्धि – विपणन ग्राहकों को उनकी छिपी हुई आवश्यकताओं का ज्ञान कराता है और उन आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन व सेवाओं का निर्माण करके ग्राहकों की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करता है।

(6) वितरण लागतों में कमी – एक अच्छी वितरण व्यवस्था वस्तु की वितरण लागनों में कमी करती है जिसके परिणामस्वरूप वस्तु के मूल्यों में कमी कर दी जाती है जिससे समाज लाभान्वित होता है।

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आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से विपणन का महत्त्व (Importance of Marketing in View of Economic Development)

राष्ट्र के आर्थिक विकास एंव विपणन में प्रत्यक्ष एवं सीधा सम्बन्ध होता है। पीटर एफ० ड्रकर के अनुसार, “विपणन किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को चाहे वह विकासशील हो अथवा अर्द्धविकसित या विकसित, सुदृढ़ता प्रदान करता है और उसे गतिशील बनाने में अनुपम योगदान देता है।” इस विचारधारा ने इस भ्रामक विचारधारा को दूर करने में सहयोग दिया है कि विपणन एवं उसकी गतिविधियाँ केवल विकसित राष्ट्रों के लिये ही उपयोगी प्रमाणित हो सकती हैं, अविकसित एवं विकासशील राष्ट्रों के लिये नहीं।

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विक्रेता बाजार में विपणन का महत्त्व (Importance of Marketing in a Seller’s Market)

विक्रेता बाजार से आशय ऐसे बाजार से है, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं की माँग तो अधिक होती है किन्तु पूर्ति कम होती है। ऐसी स्थिति में उत्पादन क्षेत्र में एकाधिकारी की प्रवृत्ति पायी जाती है। अतः ऐसे बाजार में उत्पादक अपनी वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री आसानी से कर सकते हैं अतः प्रश्न यह उठता है कि ऐसी स्थिति में विपणन की क्या आवश्यकता है ? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि विक्रेता बाजार में भी विपणन की आवश्यकता होती है क्योकि बाजार परिवर्तनशील होता है। आज जिन वस्तुओं का विक्रेता बाजार है कल उन्हीं वस्तुओं का क्रेता बाजार हो सकता है।

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क्रेता बाजार में विपणन का महत्त्व (Importance of Marketing in a Purchaser’s Market)

क्रेता बाजार से आशय ऐसे बाजार से है जिसमें वस्तुओं की माँग की अपेक्षा पूर्ति अधिक होती है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक संस्था अपना अधिक-से-अधिक माल बेचना चाहती है। इसके लिए प्रत्येक संस्था को आधुनिक तरीके अपनाने चाहिये। क्रेता बाजार में वे संस्थायें ही अधिक सफल हो पाती हैं। जो अपनी वस्तुओं के प्रति ग्राहकों की इच्छाओं, आवश्यकताओं एवं अभिरुचियों के अनुसार आवश्यक परिवर्तन करती रहती हैं तथा विक्रय संवर्द्धन के विभिन्न तरीके प्रयोग करती हैं। अतः चाहे विक्रेता बाजार हो या क्रेता बाजार विपणन दोनों ही स्थिति में महत्त्वपूर्ण है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि वर्तमान भारतीय दशाओं में विपणन न केवल उत्पादन क्षमता के वितरण में सहायक है अपितु भारत में विपणन की आवश्यकता नयी-नयी वस्तुओं का आविष्कार और उनका विकास करके उपभोक्ताओं को प्रदान करने, रोजगार के विभिन्न अवसर उपलब्ध कराने, निर्यातों को प्रोत्साहित और राष्ट्रीय आय में वृद्धि करने के लिये भी है।


English Version

Marketing: An Introduction

 

MEANING OF MARKETING

The term ‘marketing’ has been derived from the word ‘market’. Market is generally understood as the place or geographical area where buyers and sellers meet and enter into transactions involving transfer of ownership of goods, services, securities etc.

Marketing on the other hand is a comprehensive term which includes all resources and a set of activities necessary to direct and facilitate the flow of goods and services from producer to consumer in the process of distribution. Businessman regards marketing as a management function to plan, promote and deliver products to the clients or customers. Human efforts, finance and management constitute the primary resources in marketing.

Marketing is the essence of a business. The success of every business depends on the sale of products. Not only the sale but how much customers are satisfied, is also important. Every successful business organization conducts the research before introducing any new product into the market so that new and original ideas can be taken. Marketing starts from this point. Therefore, marketing is the initial and starting point for any business.

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DEFINITIONS OF MARKETING

Different authors and experts have given different definitions of marketing. To give a fair view, definitions of marketing may be studied under the two major heads:

(1) Traditional/Narrow/Product Oriented Approach.

(2) Modern/Broader/Consumer Oriented Approach.

(1) Traditional/Narrow/Product Oriented Approach: This approach is based on the assumption that the product, whatever it be, will be acceptable to the consumer. Only the producer knows as to which product is good for the consumer and which is bad. In this way, the producer is concerned only with the production of goods. In this process, they ignore their customer’s choice. A few definitions supporting this view are:

“Marketing comprises both buying and selling activities.

– Pyle

“Marketing includes activities involved in the flow of goods and services from production to Consumption.”

-Converse, Huegy and Michell

“Marketing is the performance of business activities that direct the flow of goods and services from producer to consumer or user.”

-American Marketing Association

“Marketing consists of those efforts which affect transfers in the ownership of goods and services and which provide for their physical distribution.”

-Tousley, Clark and Clark

Marketing is the economic process by means of which goods and services are exchanged and their values determined in terms of money price.”

-Edward

Analysis: Thus, it can be concluded that:

(i) Marketing is transfer of ownership only.

(ii) It is an exchange process in terms of money price.

(iii) It is buying and selling activity.

(iv) It is a process of selling what ever has been produced.

(v) It performs activities related with physical distribution. Weaknesses: Above definitions of marketing are traditional, narrow and product-oriented because:

(a) They are product oriented not consumer oriented. They totally ignore consumer satisfaction.

(b) They ignore prior to production and after sale activities.

(c) They lay emphasis only on production, buying, selling activities.

(d) They ignore social responsibility side of marketing.

(e) These definitions focus on the need of producer.

(f) They ignore the market need and demand of the customers.

(g) These definitions believe in profit through more sale.

(2) Modern/Broader/Customer Oriented Approach: This approach lays emphasis on consumers needs and their satisfaction. Only those products are brought forward which can satisfy the want and taste of the consumers. Some important modern definitions are:

‘Marketing is the delivery of a standard of living.”

-Paul Mazur

“Marketing is the response of businessmen to the need to adjust production capabilities to the requirements of consumer demand.”

-E. J. Mc. Carthy

“Marketing is the process of discovering and translating consumer needs and wants into product and service specifications, creating demand for these products and services and in turn expanding this demand.”

-H. L. Hansen

“Marketing is the managerial process by which products are matched with markets and through which transfers of ownership are affected.”

-Cundiff, Still & Govoni

Conclusion: From above definitions, we can conclude that:

(a) These are consumer oriented. Consumer is the focal point of all business decisions.

(b) These definitions have social and human values.

(c) These definitions focus on consumers feedback.

(d) These definitions focus on profit through customer’s satisfaction.

(e) These definitions focus on long term objective of the firm.

(f) These definitions focus on proper marketing mix (4 P’s) for achieving goals.

(g) ‘Consumer satisfaction’ is the mantra of these definitions.

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OBJECTIVES OF MARKETING

The basic objective of marketing is to satisfy the needs and wants of the customers. However the overall objectives can be summarized as follows:

  1. To plan and develop the product on the basis of known customer demand.
  2. To increase profits and goodwill of the enterprise.
  3. To organize, direct and control all marketing activities.
  4. To inform the customers and society about the markets.
  5. To enable the successful distribution
  6. To supply necessary information for marketing decisions.
  7. To emphasise customer satisfaction at all levels.
  8. To maintain regular supply of products.
  9. To create new customers.
  10. To develop new markets.

Stanton stated, “Just as marketing does not begin at the end of the production line, it does not end with the final sale.”

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IMPORTANCE OF MARKETING IN DEVELOPING ECONOMY OR INDIAN ECONOMY

Adoption of a system of marketing, helps a country like India to achieve the following:

  1. Increase in employment opportunities.
  2. Increase in per capita income.
  3. Increase in profits.
  4. Increase in sale of goods.
  5. Development of new sources of finance.
  6. Development of means of transportation and communication.
  7. Increase in exports.
  8. Increase in national income of country.
  9. Development of banking industry.
  10. Industrial progress.
  11. Improvement in the standard of living.

In short, marketing is helpful in providing right type of product at right places, in the right hands and at the right place. It is the father of innovation and product development, promoter of entrepreneurial talent, developer of economy, stimulator of consumption and higher standard of living and guardian of price system.

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SCOPE AND FUNCTIONS OF MARKETING

The scope of marketing may be narrow or wide. In the narrow or traditional sense marketing is the performance of business activities that direct the flow of goods and services from the producer to the consumer or user are included in the scope of marketing. It also includes business activities relating to the distribution of goods and services. In the wide or modern sense, the scope of marketing includes all those activities which are conducted before the production commences upto the satisfaction of the consumers. It also includes the guarantee of goods or services and after sale services.

Here the wide scope of marketing is being discussed which may be analysed in terms of marketing functions. A marketing function is defined as “an act or operation or service by which original producer and the final consumers are linked together.”

The most widely accepted classification of marketing functions is given by Clark and Clark.

 

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