Introduction of Managerial Economics Mcom Notes

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Introduction of Managerial Economics Mcom Notes

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परिचय (Introduction)

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र आधुनिक व्यवसाय का एक अभिन्न अंग है। यह परम्परागत अर्थशास्त्र का ही संशोधित रूप है जिसके द्वारा प्रबन्ध को पूँजीगत व नीतिगत निर्णय लेने में सहायता मिलती है। इसमें सम्पूर्ण अर्थशास्त्र का अध्ययन किया जाता है। इसमें पूँजीगत निर्णयों, संयन्त्र, विस्थापन, उत्पादन वृद्धि में तकनीकी सम्बन्धी निर्णयों को सुगमता से लिया जा सकता है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में आर्थिक विश्लेषण का उपयोग तथा व्यावसायिक नीतियों का निर्धारण किया जाता है। अर्थशास्त्र में भी एक नई दृष्टि से व्यावसायिक इकाइयों का अध्ययन आवश्यक समझा जाने लगा। इसी के फलस्वरूप प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का प्रादुर्भाव और विकास हुआ।

Introduction of Managerial Economics

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Managerial Economics)

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र परम्परागत अर्थशास्त्र का एक सुनिश्चित स्वरूप है, जिसकी सहायता से एक प्रबन्धक अपनी फर्म से सम्बन्धित आर्थिक समस्याएँ सुलझाकर यह निर्णय लेने में सक्षम होता है कि उपलब्ध साधनों का सर्वोत्तम ढंग से उपयोग किस प्रकार किया जाए। वर्तमान समय में प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र ने प्रबन्धकीय क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है क्योंकि इसके अन्तर्गत फर्म से सम्बन्धित विभिन्न व्यावहारिक समस्याओं जैसे पूँजी बजटिंग, मूल्य नीतियाँ, लागत विश्लेषण, माँग पूर्वानुमान, लाभ नियोजन आदि का गहन विश्लेषण करके फर्म की व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार सर्वश्रेष्ठ समाधान की खोज की जाती है जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र में इस प्रकार की समस्याओं की ओर विशेष ध्यान न देकर, सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का अध्ययन करके आर्थिक सिद्धान्तों की रचना की जाती है। परन्तु इससे परम्परागत अर्थशास्त्र का महत्त्व कम नहीं हो जाता क्योंकि इसके द्वारा प्रतिपादित सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों के ज्ञान के अभाव में प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री एक ऐसे चिकित्सक के समान होगा जो कि चिकित्साशास्त्र के अधूरे ज्ञान के साथ मरीजों का इलाज करके उनके जीवन को जोखिम में डाल देता है। वास्तविकता तो यह है कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का जन्म ही परम्परागत अर्थशास्त्र के गर्भ से हुआ है तथा इसके द्वारा खोजे गए अनेक सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों का प्रयोग प्रबन्धकीय फर्म की समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्तिगत स्तर पर किया जाता है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने परिभाषाएँ दी हैं, जिनमें से मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं—

हेन्स, मोट एवं पॉल के शब्दों में- “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र निर्णय लेने में प्रयुक्त किया जाने वाला अर्थशास्त्र है। यह अर्थशास्त्र की वह विशिष्ट शाखा है, जो निरपेक्ष सिद्धान्त एवं प्रबन्धकीय व्यवहार के बीच खाई पाटने का कार्य करती है। ”

स्पेन्सर एवं सीगलमैन के शब्दों में- “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र प्रबन्धकीय व्यवहारों के साथ एकीकरण है, जिससे प्रबन्ध को निर्णय लेने तथा भावी नियोजन में सुविधा होती है।”

मैक्नायर एवं मेरियम के शब्दों में “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में प्रबन्धकीय स्थितियों के विश्लेषण के लिए आर्थिक सिद्धान्तों का प्रयोग सम्मिलित होता है।”

नॉरमन एफ० दफ्ती के शब्दों में – “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में अर्थशास्त्र के उस भाग का समावेश होता है, जिसे फर्म का सिद्धान्त कहते हैं तथा जो व्यवसायी को निर्णय लेने में पर्याप्त सहायक हो सकता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन एवं विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है— “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र का वह भाग है जिसका सम्बन्ध संस्था अथवा फर्मों की समस्याओं का विश्लेषण करके उनका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने से है, जिससे उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधनों का सर्वश्रेष्ठ ढंग से विदोहन किया जा सके।” अन्य शब्दों में कहा जा सकता है— “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र एक ऐसा शास्त्र है जो कि प्रबन्धकीय फर्म में आर्थिक सिद्धान्तों के प्रयोग से सम्बन्धित है।” अथवा “प्रबन्ध निर्णय लेने और भावी नियोजन में सुविधा प्रदान करने के लिए आर्थिक सिद्धान्तों का प्रबन्धकीय व्यवहार के साथ एकीकरण ही प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र है।”

Introduction of Managerial Economics

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र की प्रकृति (Nature of Managerial Economics)

किसी शास्त्र की प्रकृति इस बात का ज्ञान कराती है कि वह शास्त्र विज्ञान की श्रेणी में आता है अथवा कला की या वह विज्ञान एवं कला दोनों ही है। केवल यही नहीं, उसकी प्रकृति से उसके सम्बन्ध में यह भी पता चलता है कि यदि वह विज्ञान है तो उसे आदर्श विज्ञान की श्रेणी में रखा जाना उपयुक्त रहेगा या वास्तविक विज्ञान की अथवा वह दोनों ही प्रकार का विज्ञान है।

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र – विज्ञान के रूप में (Managerial Economics : As a Science) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में देखने के लिए विज्ञान का अर्थ समझना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है, जिससे प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के अन्दर उन विशेषताओं को खोजा जा सके जो कि एक विज्ञान में पायी जाती हैं।

विज्ञान ज्ञान की एक क्रमबद्ध शाखा है। इसके कुछ निश्चित सिद्धान्त होते हैं जो प्रत्येक स्थान एवं परिस्थिति में खरे उतरते हैं। विज्ञान को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है प्रथम, वास्तविक विज्ञान एवं द्वितीय, आदर्श विज्ञान वास्तविक विज्ञान (Real) Science) के अन्तर्गत कारण एवं परिणाम के बीच सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। अन्य शब्दों में, वास्तविक विज्ञान ‘क्या है’ का उत्तर आसानी के साथ देने में समर्थ होता है तथा इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि किसी समस्या के समाधान के लिए क्या किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, आदर्श विज्ञान (Normative Science) ‘क्या होना चाहिए’ का उत्तर देता है अर्थात् यह किसी समस्या के लिए एक आदर्श हल सुझाने की सामर्थ्य रखता है।

क्या प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र एक विज्ञान है? इस सन्दर्भ में फर्म की विभिन्न आर्थिक क्रियाओं की वर्तमान में क्या स्थिति है और भविष्य में वांछित परिणामों की प्राप्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए, इन दोनों प्रश्नों का सुस्पष्ट उत्तर प्राप्त होता है। अन्य शब्दों में, प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के अन्तर्गत फर्म की सम्पूर्ण आर्थिक क्रियाओं का सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है जैसे वर्तमान में फर्म कितनी मात्रा में उत्पादन कर रही है तथा भविष्य में उत्पादन क्षमता का स्तर क्या होना चाहिए, जिससे बढ़ती हुई माँग को पूरा किया जा सके। इसी प्रकार फर्म की वर्तमान लाभार्जन क्षमता क्या है तथा इसे बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए आदि। इस प्रकार प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र वास्तविक तथा आदर्श दोनों ही प्रकार का विज्ञान है, परन्तु इसे आदर्श विज्ञान की श्रेणी में रखना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इसके लिए प्रश्न ‘क्या हैं’ की अपेक्षा ‘क्या होना चाहिए’ अधिक महत्त्व रखता है।

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र कला के रूप में (Managerial Economics : As an Art) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र कला है अथवा नहीं, यह जानने से पूर्व कला का अर्थ सुस्पष्ट किया जाना आवश्यक है, जिससे कि यह निश्चित किया जा सके कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र कला की कसौटी पर किस सीमा तक खरा उतरता है तथा इसे कला की श्रेणी में रखना कहाँ तक उपयुक्त है। कला, कार्य करने की एक ऐसी सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित विधि है जिसके द्वारा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति प्रभावी रूप में की जानी सम्भव होती है। अन्य शब्दों में, पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए फर्म के पास उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधनों के सर्वश्रेष्ठ ढंग से प्रयोग करने की विधि ही कला कहलाती है। प्रो० ल्यूइगी के विचारानुसार,

“कला हमें निर्देशित करती है, काम करना बताती है तथा नियम प्रस्तावित करती है। प्रश्न ‘कैसे’ का उत्तर केवल कला ही दे सकती है क्योंकि यह बताती है कि किसी कार्य को प्रभावपूर्ण ढंग से किस प्रकार सम्पन्न किया जा सकता है।” अब “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र को कला के परिप्रेक्ष्य में देखने पर स्पष्ट होता है कि यह एक उच्च श्रेणी की कला है क्योंकि इसके अन्तर्गत फर्म की अनेक आर्थिक समस्याओं के समाधान की विधियों की निरन्तर खोज की जाती है तथा उपलब्ध साधनों के सर्वोत्तम प्रयोग की विधि का वर्णन किया जाता है, जिससे संस्था के उद्देश्य प्रभावी ढंग से प्राप्त किए जा सकें।

इस प्रकार, “प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र को विज्ञान एवं कला के रूप में देखने के पश्चात् स्पष्ट होता है कि यह न केवल विज्ञान अथवा कला है अपितु ‘विज्ञान एवं कला’ दोनों ही है। क्योंकि इसके अन्तर्गत न केवल ‘क्या है’ का अपितु ‘कैसे होना चाहिए’ का भी गहन विश्लेषण किया जाता है।

Introduction of Managerial Economics

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का क्षेत्र (Scope of Managerial Economics)

यद्यपि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के क्षेत्र के विषय में विभिन्न विद्वानों की विचारधारा में पर्याप्त मतभेद पाया जाता है, फिर भी अधिकतर विद्वान् इसके क्षेत्र के अन्तर्गत अग्रलिखित पहलुओं को सम्मिलित करने के पक्ष में हैं –

  1. फर्म का सिद्धान्त (Theory of Firm) – फर्म के सिद्धान्त के अन्तर्गत फर्म का मॉडल बनाया जाता है, उसके उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं तथा फर्म के सिद्धान्त एवं कार्य प्रणाली का गहन अध्ययन किया जाता है।
  2. माँग विश्लेषण एवं पूर्वानुमान (Demand Analysis and Forecasting) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मांग विश्लेषण एवं पूर्वानुमान को भी सम्मिलित किया जाता है। इसके अन्तर्गत माँग का नियम माँग सारणी, माँग वक्र, माँग की लोच, माँग के भेद, माँग के निर्धारक तत्त्व एवं माँग पूर्वानुमान के विभिन्न तरीकों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।
  3. लागत एवं उत्पादन विश्लेषण (Cost and Output Analysis) – उत्पादन का लागत पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण स्थापित करने, लाभों का नियोजन करने तथा कुशल प्रबन्ध व्यवहार के लिए लागत विश्लेषण का अपना विशेष महत्त्व है। इसके द्वारा उन तत्त्वों का ज्ञान होता है जिनके कारण उत्पादन की भी अनुमानित लागत में परिवर्तन आता है। उत्पादन विश्लेषण के अन्तर्गत लागत अवधारणाओं, लागत वक्रो, लागत वर्गीकरण, सीमान्त लागत विश्लेषण, लागत उत्पादन सम्बन्ध, उत्पत्ति का पैमाना, रेखीय कार्यक्रम आदि की विस्तृत विवेचना की जाती है।
  4. प्रतिस्पर्द्धा विश्लेषण (Competition Analysis) – बाजार में व्याप्त विभिन्न प्रतियोगी परिस्थितियों का विश्लेषण करना भी प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के क्षेत्र की विषय वस्तु है। इस अध्ययन से प्रतियोगी फर्मों द्वारा अपनायी जाने वाली नीतियों का पता चलता है तथा उसी के अनुसार प्रबन्धकों को अपनी फर्म की नीतियाँ बनाने में सहायता मिलती है।
  5. मूल्य प्रणालियाँ एवं नीतियाँ (Pricing Practices and Policies) – मूल्य प्रणालियाँ एवं नीतियाँ, प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रतियोगी परिस्थितियों में मूल्य निर्धारण, मूल्य निर्धारण की विभिन्न वैकल्पिक पद्धतियों, मूल्य विभेद नीतियों, उत्पाद श्रेणी का मूल्य निर्धारण आदि को सम्मिलित किया जाता है।
  6. लाभ प्रबन्ध (Profit Management) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के क्षेत्र में लाभ प्रबन्ध का भी समावेश होता है। इसके अन्तर्गत लाभों को प्रभावित करने वाले विभिन्न आन्तरिक एवं बाह्य घटकों का अध्ययन करके लाभों के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की जाती है। लाभों की प्रकृति, लाभ-मापन, लाभ विश्लेषण, लागत नियन्त्रण आदि लाभ प्रबन्ध के मुख्य कार्य क्षेत्र हैं।
  7. पूँजी बजटन (Capital Budgeting) – पूँजी बजटन प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू (Aspect) है। इसके अन्तर्गत पूँजी की आवश्यकता का अनुमान, पूँजी प्राप्ति के विभिन्न आन्तरिक एवं बाह्य स्रोतों का अध्ययन, पूँजी व्ययों के नियोजन एवं नियन्त्रण की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है तथा इसके अन्तर्गत सम्मिलित किए जाने वाले पहलुओं की मात्रा फर्म के आकार एवं कार्य क्षेत्र की परिधि पर निर्भर करती है।

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प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of Managerial Economics)

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के विषय में विभिन्न विद्वानों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों का अध्ययन एवं विश्लेषण करने पर इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं –

  1. सूक्ष्म अर्थशास्त्रीय स्वभाव (Micro-Economic Character) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र सूक्ष्म अर्थशास्त्रीय स्वभाव पर आधारित है क्योंकि इसके अन्तर्गत किसी फर्म की विशिष्ट समस्याओं का विश्लेषण करके उनके लिए प्रभावकारी समाधान प्रस्तुत किए जाते हैं।
  2. व्यापक अर्थशास्त्र का प्रयोग (Use of Macro Economics) – यद्यपि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का मुख्य आधार सूक्ष्म अर्थशास्त्र ही है तथापि इसके अध्ययन हेतु व्यापक अर्थशास्त्र भी विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि इसके सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों के अध्ययन के द्वारा प्रबन्धकों को उस सम्पूर्ण आर्थिक प्रणाली का ज्ञान हो जाता है, जिसके आधार पर उन्हें फर्म की समस्याओं का हल खोजना होता है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र और कुछ भी नहीं अपितु व्यापक अर्थशास्त्र का एक छोटा भाग ही है।
  3. निर्देशात्मक प्रकृति (Prescriptive Nature) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र की प्रकृति निर्देशात्मक होती है, न कि व्यापक अर्थशास्त्र की भाँति वर्णनात्मक (Descriptive) । वास्तविक रूप में यह सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों एवं प्रबन्धकीय व्यावहारिक समस्याओं में सम्बन्ध स्थापित करने वाला एक सशक्त माध्यम है, जो हमें बताता है कि फर्म की विभिन्न क्रियाओं के नियोजन, नीति निर्धारण एवं निर्णयन प्रक्रिया में आर्थिक सिद्धान्तों का प्रयोग किस प्रकार किया जा सकता है।
  4. फर्म के सिद्धान्तों का प्रयोग (Use of Theories of Firm) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में फर्म के सिद्धान्त की अवधारणाओं एवं सिद्धान्तों का व्यापक प्रयोग किया जाता है। फर्म के द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग एवं पूर्ति तथा लागत एवं आगम का विश्लेषण, साम्य उत्पादन मात्रा, लाभ अधिकतमीकरण, कीमत आदि का निर्धारण ‘फर्म के सिद्धान्त’ की ही विषय-वस्तुएँ हैं, जिनका प्रयोग प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के अन्तर्गत किया जाता है।
  5. प्रबन्धकीय स्तर पर निर्णयन (Decision Making at Managerial Level) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में निर्णयन का कार्य प्रबन्धकीय स्तर पर ही किया जाता है। यदि उच्च प्रबन्ध (Top Management) चाहे तो अधीनस्थों के अनुभव का लाभ उठाने के लिए उनकी राय माँग सकता है, परन्तु अन्तिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी उच्च प्रबन्ध की ही होती है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में फर्म के उद्देश्यों के निर्धारण एवं उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के सम्बन्ध में विभिन्न महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। यही कारण है कि इसे फर्म का आदर्शात्मक एवं व्यावहारिक सूक्ष्म अर्थशास्त्र भी कहा जाता है।

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प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के आधारभूत आर्थिक सिद्धान्त (Basic Economic Principles of Managerial Economics)

परम्परागत अर्थशास्त्र में अनेक आधारभूत सिद्धान्तों की खोज की गई है जो कि प्रबन्धको को निर्णय लेने में ठोस आधार प्रदान करते हैं, परन्तु ये सिद्धान्त भी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाते। व्यावहारिक क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए अनेक ऐसी तकनीकियों एवं यन्त्रों की आवश्यकता होती है, जिनकी खोज परम्परागत अर्थशास्त्र में नहीं की गई है, अतः आवश्यक हो जाता है कि इस बात का विश्लेषण किया जाए कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में परम्परागत अर्थशास्त्र के किन-किन सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है तथा फर्म के आर्थिक सिद्धान्त और फर्म के प्रबन्धकीय सिद्धान्त एक-दूसरे से किस सीमा तक भिन्न है।

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के आधारभूत आर्थिक सिद्धान्तों का वर्गीकरण निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है –

  1. अवसर लागत का सिद्धान्त (The Opportunity Cost Concept) – किसी वस्तु या सेवा की अवसर लागत से तात्पर्य उस वस्तु या सेवा के अन्य वैकल्पिक प्रयोगों से अर्जित किए जा सकने वाले आगम से होता है अर्थात् उस वस्तु या सेवा को किसी अन्य स्थान पर प्रयुक्त करने से जो आगम प्राप्त हो सकता था, वह उसकी ‘अवसर लागत’ होगी।

उदाहरणार्थ किसी व्यवसायी के द्वारा अपने व्यवसाय में किए गए परिश्रम की अवसर लागत वह राशि होगी जिसे वह किसी अन्य स्थान पर प्रयुक्त करके प्राप्त कर सकता था।

  1. वृद्धिशील लागत का सिद्धान्त (The Incremental Concept) – प्रबन्धकीय क्रिया अथवा उसके स्तर में होने वाले परिवर्तन के परिणामस्वरूप वर्तमान लागत में होने वाली वृद्धि ही ‘वृद्धिशील लागत’ कहलाती है। दूसरे शब्दों में वर्तमान प्रबन्धकीय क्रिया अथवा उसके स्तर में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन के कारण जो अतिरिक्त लागत आती है, उसे वृद्धिशील लागत कहा जाता है। उदाहरणार्थ- यदि किसी कपड़ा मिल में पुरानी तथा हाथ से चलने वाली मशीनों के स्थान पर आधुनिक तथा स्वचालित मशीनों की स्थापना की जाती है तो पुरानी व्यवस्था को नई व्यवस्था से प्रतिस्थापित करने में जो अतिरिक्त लागत आएगी, वह वृद्धिशील लागत होगी।
  2. समय आधार का सिद्धान्त (The Time Perspective Concept) – समय आधार का सिद्धान्त अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन लागत के अध्ययन पर बल देता है। ऐसी लागतें, जो कि संयन्त्र एवं मशीनरी की वर्तमान व्यवस्था पूर्ववत् रहने की स्थिति में उत्पादन की मात्रा बढ़ने के साथ बढ़ती हैं तथा कम होने के साथ घटती हैं, ‘अल्पकालीन लागते’ कहलाती हैं। इसके विपरीत, ऐसी लागतें, जो कि संयन्त्र एवं मशीनरी की वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन के साथ बदलती हैं, ‘दीर्घकालीन लागतें’ कहलाती हैं। उदाहरणार्थ- यदि वर्तमान उत्पादन क्षमता तक ही लागत में वृद्धि होती है तो आने वाली अतिरिक्त लागत ‘अल्पकालीन लागत’ कहलाएगी, परन्तु यदि उपक्रम को नया बाजार उपलब्ध हो जाने के कारण उसकी विक्रय क्षमता बढ़कर 10,000 इकाइयाँ हो जाती हैं, जिसके कारण एक नया संयन्त्र लगाने की आवश्यकता होती है तो इस प्रकार जो लागत आएगी वह ‘दीर्घकालीन लागत होगी।
  3. कटौती का सिद्धान्त (The Discounting Concept) – इस सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न समयों में मिलने वाली धनराशियाँ चाहे मौद्रिक रूप में बराबर हों, परन्तु वर्तमान में प्राप्त होने वाली राशि का वास्तविक मूल्य भविष्य में मिलने वाली समान धनराशि की अपेक्षा अधिक होगा। इसका कारण यह है कि वर्तमान में प्राप्त होने वाली राशि का विनियोग करके उस पर ब्याज भी कमाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, भविष्य की अनिश्चितता भी वर्तमान में प्राप्त होने वाली राशि को अधिक आकर्षक एवं मूल्यवान् बनाती है। दूसरे शब्दों में, प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का यह सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि प्राप्त होने वाले भुगतान से समय की कटौती इसके मूल्य को बढ़ाती है।
  4. सम सीमान्त सिद्धान्त (The Equi-Marginal Concept) – यह अर्थशास्त्र का एक बहुत ही प्रसिद्ध एवं प्रचलित सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार उत्पादन के किसी भी साधन की उपलब्ध इकाइयों का विभिन्न गतिविधियों में इस प्रकार आवंटन किया जाना चाहिए।

ताकि प्रत्येक गतिविधि से उत्पादित इकाई में समान लाभ पाया जाए। उदाहरणार्थ – एक कम्पनी में अ, ब, स तथा द चार प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है तथा उस कम्पनी में 2,000 श्रमिक कार्यरत हैं। सम-सीमान्त सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि इस उपलब्ध श्रम शक्ति का उपर्युक्त चारों उत्पादनों में इस प्रकार उपयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक वस्तु की अन्तिम इकाई के उत्पादन का मूल्य समान रहे। इसके लिए श्रम की इकाइयों को कम सीमान्त मूल्य वाले उपयोग से अधिक मूल्य वाले उपयोगों की ओर स्थानान्तरित किया जाना आवश्यक होता है। इस प्रकार प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के उपर्युक्त आधारभूत सिद्धान्त, प्रबन्धकीय क्षेत्र की विभिन्न लागत एवं लाभ सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में अपनी अहम् भूमिका का निर्वाह करते हैं।

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प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का महत्त्व (Importance of Managerial Economics)

अथवा

प्रबन्धकीय निर्णयों में आर्थिक विश्लेषण का महत्त्व (Importance of Economic Analysis in Managerial Decisions)

प्रबन्धकीय क्षेत्र में किसी भी फर्म के लिए निर्णयन सम्बन्धी कार्य इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि उसके पास उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधन सीमित मात्रा में होते हैं तथा इन्हीं साधनों का प्रयोग करते हुए उसे अपने पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति करनी होती है जो कि निःसन्देह उपयुक्त एवं प्रभावपूर्ण निर्णयों के द्वारा ही सम्भव है। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि उपयुक्त एवं प्रभावी निर्णय लेने में केवल आर्थिक विश्लेषण की रीतियाँ ही सहायक हो सकती हैं क्योंकि प्रबन्धकीय क्षेत्र में अधिकतर निर्णय अनिश्चितता की स्थिति में लिए जाते हैं और ऐसी स्थिति में सही निर्णय का आधार विभिन्न आर्थिक पहलुओं का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण ही हो सकता है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के अन्तर्गत प्रबन्धकीय क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन उत्पन्न होने वाली विभिन्न व्यावहारिक आर्थिक समस्याओं का अध्ययन एवं विश्लेषण करके उनके विभिन्न वैकल्पिक समाधानों की खोज की जाती है। इस कार्य के लिए विभिन्न गणितीय एवं सांख्यिकीय विधियों का भी सहयोग प्राप्त किया जाता है, तत्पश्चात् विभिन्न वैकल्पिक समाधानों का तुलनात्मक अध्ययन करके प्रबन्धकों के द्वारा सर्वश्रेष्ठ समाधान का चुनाव किया जाता है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के महत्त्व अथवा प्रबन्धकीय निर्णयों में आर्थिक विश्लेषण के महत्त्व का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत और भी अधिक स्पष्टता के साथ किया जा सकता है—

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  1. आर्थिक सिद्धान्त एवं व्यवहार के बीच समन्वय में सहायक (Helpful in) Coordination between Economic Principles and Behaviour) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में विभिन्न आर्थिक सिद्धान्तों का विश्लेषण करके उन्हें व्यावहारिकता की परिधि में लाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने में, अर्थशास्त्र के सिद्धान्त अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करते हैं। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र का वह व्यावहारिक पहलू है, जो आर्थिक सिद्धान्त एवं व्यवहारों के बीच महत्त्वपूर्ण सामंजस्य स्थापित करता है।
  2. अनिश्चित दशाओं में निर्णय लेने में सहायक (Helpful in Decision Making in Uncertain Conditions) – प्रबन्धकीय क्षेत्र में प्रबन्धक वर्ग को अधिकतर निर्णय अनिश्चितता की स्थिति में ही लेने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में आर्थिक क्रियाओं की सटीक भविष्यवाणी आर्थिक विश्लेषण के द्वारा ही सम्भव होती है। उदाहरणार्थ लागत, माँग, मूल्य, लाभ आदि के सम्बन्ध में सही पूर्वानुमान इनके पूर्व-समकों के विश्लेषण के आधार पर ही। प्राप्त किए जा सकते हैं।
  3. विशिष्ट अनुमानों के लिए उपयोगी (Helpful in Specific Estimates) – आर्थिक विश्लेषण की रीतियाँ; जैसे-मूल्य-माँग लोच, माँग की प्रतिमूल्य सापेक्षता, मांग की विज्ञापन लोच, आय लोच, लागत उत्पादन सम्बन्ध आदि, प्रबन्धकीय क्षेत्र में विशिष्ट अनुमानों के लिए उपयोगी रहती है। इस प्रकार के विशिष्ट अनुमान भावी नियोजन एवं निर्णयन के कार्य में पर्याप्त सहायक होते हैं।
  4. बाह्य शक्तियों को समझने में सहायक (Helpful in Understanding External Forces) – आर्थिक विश्लेषण की सहायता से प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री विभिन्न बाह्य प्रबन्धकीय शक्तियों जैसे व्यापारिक चक्र, सरकार की मूल्य नीति, कर नीति, तटकर नीति एवं राष्ट्रीय आय में परिवर्तन आदि को समझने में समर्थ हो पाते हैं। वास्तव में, प्रबन्धकों को अपनी फर्म की विभिन्न समस्याओं के सम्बन्ध में निर्णय इन्हीं बाह्य व्यावसायिक शक्तियों के परिप्रेक्ष्य में समायोजित करने होते हैं।
  5. नियन्त्रण में सहायक (Helpful in Controlling) – पूर्व निर्धारित योजनाओं के अनुरूप कार्यों का संचालन तथा विभिन्न विभागों एवं अधिकारियों के कार्यों का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से प्रभावी नियन्त्रण तकनीकों का प्रयोग किया जाना परमावश्यक होता है। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के अन्तर्गत इन तकनीकों की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है।
  6. सामाजिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति में सहायक (Helpful in Fulfilment of Social Responsibilities) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र न केवल आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित है अपितु सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने में भी पर्याप्त भूमिका निभाता है। इसके लिए फर्म की आर्थिक नीतियों का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है, जिससे उपलब्ध भौतिक एवं मानवीय संसाधनों का श्रेष्ठतम उपयोग श्रमिकों को अधिकतम सन्तुष्टि, उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति, राष्ट्रीय आय एवं रोजगार के साधनों में वृद्धि इत्यादि को सुनिश्चित किया जा सके। संक्षेप में कहा जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों में प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र एक ऐसा सशक्त आधारस्तम्भ है, जिसकी सहायता से प्रबन्धकीय जगत् में व्याप्त अनिश्चितता को पर्याप्त सीमा तक न्यूनतम किया जा सकता है।

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प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र एवं परम्परागत अर्थशास्त्र में अन्तर (Differences between Managerial Economics and Traditional Economics)

यद्यपि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र परम्परागत अर्थशास्त्र का ही एक भाग हैं, लेकिन इन दोनों के बीच कुछ मूलभूत अन्तर भी पाए जाते हैं, जिनका विवेचन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है –

  1. प्रकृति (Nature) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान एवं कला दोनों ही है। इसके अन्तर्गत न केवल समस्या के सैद्धान्तिक अपितु व्यावहारिक पहलू पर भी पूरा ध्यान केन्द्रित किया जाता है तथा किसी कार्य को करने के सर्वश्रेष्ठ ढंग की विवेचना की जाती है। इसके विपरीत, परम्परागत अर्थशास्त्र वर्णनात्मक प्रकृति का होता है तथा इसमें केवल सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों की ही विवेचना की जाती है।
  2. क्षेत्र (Scope) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का क्षेत्र फर्म की क्रियाओं तक ही सीमित रहता है अर्थात् इसके अन्तर्गत किसी फर्म-विशेष की विभिन्न समस्याओं के गहन अध्ययन एवं विश्लेषण के द्वारा उनके समाधान के वैकल्पिक तरीकों की खोज की जाती है, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र सम्पूर्ण आर्थिक तन्त्र को अपने में समेटे हुए है। इस प्रकार प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का क्षेत्र परम्परागत अर्थशास्त्र के क्षेत्र की अपेक्षा अत्यन्त सीमित रह जाता है।
  3. मान्यताओं का महत्त्व (Importance of Assumptions) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों की अधिकांश मान्यताएँ स्वयं ही समाप्त हो जाती है क्योंकि व्यावहारिक समस्याओं का समाधान मान्यताओं के आधार पर किया जाना सम्भव नहीं होता, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र के अधिकतर सिद्धान्त मान्यताओं पर ही आधारित होते हैं।
  4. आर्थिक एवं अनार्थिक पहलू (Economic and Non-economic Aspects) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में समस्या के न केवल आर्थिक पहलुओं पर अपितु विभिन्न अनार्थिक पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र शुद्ध रूप से आर्थिक क्रियाओं तक ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित रखता है।
  5. सिद्धान्तों की प्रमुखता (Priority to Principles) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में लाभ-सिद्धान्त को प्राथमिकता प्रदान की जाती है तथा इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अन्य सिद्धान्तों जैसे लागत सिद्धान्त, माँग एवं पूर्ति का सिद्धान्त, मूल्य निर्धारण का सिद्धान्त आदि का प्रयोग किया जाता है, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र के अन्तर्गत लाभ, लगान, मजदूरी, जनसंख्या, लागत, मूल्य निर्धारण आदि सिद्धान्तों की विवेचना समान महत्त्व के साथ की जाती है।
  6. निर्णयन कार्य (Decision Making) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में समस्या की न केवल वर्तमान स्थिति का ही अध्ययन किया जाता है अपितु उसके समाधान के सम्बन्ध में भी महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र केवल ‘क्या है’ प्रश्न के ही उत्तर तक अपने क्रियाकलापों को सीमित रखता है। इसका सम्बन्ध ‘क्या होना चाहिए’ तथा ‘किस प्रकार का होना चाहिए’ से नहीं है।
  7. प्रबन्धकीय कुशलता की आवश्यकता (Need of Managerial Proficiency) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र प्रत्यक्ष रूप से प्रबन्धकीय फर्म से सम्बन्धित होता है, अतः इसमें प्रबन्धकीय कुशलता की अत्यन्त आवश्यकता होती है, जिससे विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकें, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र में इस प्रकार की कुशलता का प्रत्यक्षतः कोई सम्बन्ध नहीं होता।

उपर्युक्त अन्तरों के विवेचन से स्पष्ट है कि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र का क्षेत्र संकुचित होता है, परन्तु इसके अन्तर्गत फर्म की व्यावहारिक समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। दूसरी ओर, यद्यपि परम्परागत अर्थशास्त्र का प्रत्यक्ष रूप से कोई व्यावहारिक प्रयोग नहीं है तथापि प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र की समस्त रूपरेखा की नींव में परम्परागत अर्थशास्त्र द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त ही समाए हुए हैं।

Introduction of Managerial Economics

आर्थिक सिद्धान्त एवं प्रबन्धकीय सिद्धान्त (Economic Theory and Managerial Theory)

अथवा

आर्थिक सिद्धान्त और प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र (Economic Theory and Managerial Economics)

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में आर्थिक सिद्धान्त विभिन्न प्रकार की अवधारणा एवं विश्लेषणात्मक तकनीक प्रदान करते हैं जिससे प्रबन्ध को पूँजीगत निर्णयों तथा समस्याओं के समाधान में सहायता प्राप्त होती है। किसी भी बड़ी समस्या के समाधान में प्राय: देखा गया है कि आर्थिक सिद्धान्त और वास्तविक व्यवहार में बहुत अधिक अन्तर होता है। वास्तविक व्यवहार में कोई भी बड़ी समस्या आने पर ही पता चलता है कि इसके समाधान के लिए विशेष चातुर्य तकनीक व उपकरणों की जरूरत होगी अतः प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में ही हम सिद्धान्तों व धारणाओं की विवेचना करते हैं।

Introduction of Managerial Economics

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र की मूलभूत धारणाएँ (Fundamental Concepts of Managerial Economics)

आर्थिक निर्णयों के विश्लेषण में परम्परागत अर्थशास्त्र की पाँच मूलभूत आर्थिक धारणाएँ इस प्रकार हैं –

  1. सम-सीमान्त अवधारणा ( The Equi-Marginal Concept) – किसी आदान (Input) का वितरण इस प्रकार से करना चाहिए कि सभी परिस्थितियों में अन्तिम इकाई का मूल्य भी समान हो। उसे सम-सीमान्त सिद्धान्त कहते हैं। प्रबन्धकीय अर्थशास्त्र में इस धारणा का प्रयोग स्वल्प साधनों के विभिन्न उपयोगों में बँटवारे के लिए किया जाता है। इस सिद्धान्त का प्रयोग करते हुए प्रबन्ध लागतों को न्यूनतम करते हुए अधिकतम शुद्ध लाभ की स्थिति प्राप्त कर सकता है। वर्तमान में रेखीय कार्यक्रम की अधिकतमीकरण’ पद्धति का प्रयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है।
  2. अवसर लागत सिद्धान्त (Opportunity Cost Principle) – किसी वस्तु या सेवा की अवसर लागत उस वस्तु या सेवा के किसी दूसरे श्रेष्ठ वैकल्पिक प्रयोग से मिलने वाले लाभ के त्याग से है। किसी निर्णय की लागत उसमें आवश्यक विकल्पों का त्याग होती है। और यदि ऐसा त्याग नहीं है तो अवसर लागत नहीं होती है। कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण इस प्रकार हैं

(i) किसी उद्यमी के समय की अवसर लागत वह वेतन की राशि होती है जो कि वह दूसरी जगह रोजगार में प्राप्त कर सकता है।

(ii) किसी उद्यमी द्वारा अपने व्यवसाय में विनियोजित पूँजी की अवसर लागत वह राशि होगी जिसे वह इस पूँजी को अन्य उपक्रमों में विनियोजित करने से प्राप्त कर सकता है।

(iii) किसी मशीनरी की एक वस्तु विशेष को पैदा करने की अवसर लागत वह आय होती है जो किसी दूसरी वस्तु के पैदा करने से प्राप्त होती है।

(iv) किसी खाली स्थान के प्रयोग की अवसर लागत से आशय किसी अन्य कार्य के लिए उस स्थान पर मिलने वाली आय से है।

  1. वृद्धिशील सिद्धान्त (Incremental Principle) – वृद्धिशील सिद्धान्त के अनुसार, कोई व्यावसायिक क्रिया तब तक चलती रहनी चाहिए जब तक कि इसकी सीमान्त आगम इसकी सीमान्त लागत से अधिक (MR> MC) रहे तथा अधिकतम उस बिन्दु पर होगा, जहाँ MR = MC हो किसी निर्णय से प्राप्त कुल आगम में परिवर्तन की राशि को ‘वृद्धिशील आगम’ कहते हैं। कोई भी निर्णय लाभदायक होता है यदि –

(i) यह आगम को लागत से अधिक बढ़ाता है।

(ii) यह आगम की तुलना लागत को अधिक घटाता है।

(iii) यह अन्य आगमों को घटाने की तुलना में कुछ आगमों को ज्यादा घटाता है।

(iv) यह अन्य लागतों की तुलना में कुछ लागतों को अधिक घटाता है।

कुछ व्यावसायियों की यह धारणा होती है कि कुल लाभ लेने के लिए प्रत्येक कार्य (Job) पर लाभ होना अनिवार्य है। इसी वजह से वह क्रेताओं के केवल वही आदेश स्वीकार करते हैं जोकि लाभ के प्रावधान सहित सामग्री, श्रम, उपरिव्ययों की पूर्ण लागत (Total Cost) की वसूली करती हो। ऐसा नहीं होने पर वह आदेश को अस्वीकार कर देता है। वृद्धिशीलता का तर्क यह बतलाता है कि अल्पकाल में लाभ सर्वाधिकरण (Profit Maximisation) का नियम लागू नहीं होता है।

  1. अवमूल्यन सिद्धान्त (Discounting Principle) – अर्थशास्त्र की एक मूलभूत धारणा या सिद्धान्त यह भी है कि आज का एक रुपया आने वाले कल से अधिक मूल्यवान है। उदाहरणार्थ : कोई आदमी 5,000 रुपये का उपहार आज या एक वर्ष बाद देना चाहता है। स्वाभाविक है कि वह आज ही देना चाहेगा जिसके दो प्रमुख कारण हैं- (1) भविष्य अनिश्चित है और यदि अवसर लागत को आज नहीं वसूला जाता है तो आगामी कल को 5,000 रुपये पाने में सन्देह रहता है। (2) अगर भविष्य में आज के 5,000 रुपये के उपहार की निश्चितता भी हो तो आज के 5,000 रुपये को 15 प्रतिशत ब्याज की दर पर विनियोजित किया जा सकता है। और यह रकम कुल 5,750 रुपये के बदले 5,000 रुपये ही मिलेंगे। इसीलिए वह इस उपहार को आज ही लेना चाहेगा। इससे उसे 750 रुपये का लाभ मिलेगा। दूसरे शब्दों में कल (आगामी) के एक रुपये का मूल्य आज के एक रुपये से कम होता है।

यदि भविष्यकालीन तिथियों पर कोई निर्णय लागतों एवं आगमों को प्रभावित करता है तो यह आवश्यक हो जाता है कि विकल्पों की सम्भव वैध तुलना के लिए उन लागतों एवं आगमों का वर्तमान मूल्यों से अवमूल्यन कर लें।

  1. सम सन्दर्भ का सिद्धान्त (Principle of Time Perspective) – दीर्घकाल एवं अल्पकाल की आर्थिक धारणाएँ अब एक सामान्य बात है। आगम एवं लागत के बारे में निर्णय लेते समय प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री भी अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन प्रभावों को ध्यान में रखता है। निर्णय लेने में अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन विचारों के बीच सामंजस्य बनाए रखने की समस्या महत्त्वपूर्ण होती है। कोई भी निर्णय अल्पकालीन आधार पर लिया जा सकता है लेकिन समय बीतने पर दीर्घकालीन प्रभाव होने लगते हैं और परिणामस्वरूप शुरू हानिकारक प्रतीत में होने वाले व्यावसायिक विचार लाभप्रद मालूम होने लगते हैं अर्थात् एक फर्म को अपने प्रत्येक निर्णय के अल्पकालीन और दीर्घकालीन परिणामों का विश्लेषण करना चाहिए और उनके बीच सही सन्तुलन स्थापित करना चाहिए।
  2. लोच का सिद्धान्त (Elasticity Principle) – माँग विश्लेषण में यह धारणा बहुत ही सहायक हैं। वर्तमान औद्योगिक युग में लोच का सिद्धान्त बहुत ही प्रचलित है लेकिन व्यावसायिक निर्णयों में लोच, विज्ञापन, आड़ी लोच, स्थानापन्न लोच आदि सिद्धान्तों को भी समान रूप से ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। व्यवसाय में निर्णय लेने, एकाधिकार और अपूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत मूल्य-विभेद में भी इस सिद्धान्त का अधिक प्रयोग किया जाता है। प्रस्तावित मूल्य परिवर्तनों अथवा आर्थिक दशाओं में प्रत्याशित परिवर्तनों के आधार पर माँग पूर्वानुमान लगाने में यह धारणा व्यवसाय के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

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