Implied Or Quasi Contracts Bcom Business Law Notes

Implied Or Quasi Contracts Bcom Business Law Notes

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Implied Or Quasi Contracts Bcom Business Law Notes
Implied Or Quasi Contracts Bcom Business Law Notes

अर्ध्द, गर्भित या आभास अनुबन्ध (Quasi, Implies or Constructive Contracts)

कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है की एक व्यक्ति किसी दुसरे व्यक्ति को कुछ प्रतिफल दुसरे व्यक्ति द्वारा किये गये कार्य या उठाई गई हानि के लिये देने हेतु बाध्य होता है | यघपि प्रथम व्यक्ति का यह दायित्व है किसी अनुबन्ध के कारण उत्पन्न नही होता है, बल्कि परिस्थियों के कारण उसका दायित्व अनुबन्ध द्वारा उत्पन्न दायित्व के समान ही हो जाता है | इस प्रकार उत्पन्न कानूनी दायित्व हो अर्ध्द अनुबन्ध कहलाते है | दुसरे शब्दों में, जब बिना किसी ठहराव के, केवल पारिस्थितवश अथवा पक्षकरो के व्यव्हार के फलस्वरूप एक पक्ष का दुसरे पक्ष के प्रति कोई क़ानूनी दायित्व उत्पन्न हो जाता है तो अर्ध्द (गर्भित) अनुबन्ध कहते है | स्पष्ट है कि इस प्रकार के अनुबन्ध में प्रत्यक्ष रूप से न तो कोई प्रस्ताव होता है और न उसकी स्वीकृति ही वरन् इन्हें बिना प्रस्ताव एवं स्वीक्रति के होते हिये कानून की द्रष्टि में अनुबन्ध माना जाता है |

अर्ध्द अनुबन्ध कानून द्वारा सृजित ऐसा अनुबन्ध है जो पक्षकारों द्वारा ठहराव किये बिना ही उत्पन्न हो जाता है | वस्तुत: अर्ध्द-अनुबन्ध पक्षकारों पर कानून द्वारा थोपा गया अनुबन्ध है | कानून ऐसा ‘समता के सिध्दांत’ (Principle of equity) के आधार पर करता है | इस सिध्दांत के अनुसार कोई भी व्यक्ति अनुचित तरीके से किसी दुसरे व्यक्ति की हानि पर कोई लाभ नही उठा सकता |

उदाहारण – रामपाल 100 टन कोयले का आदेश कोल सप्लाई लि० को भेजता है | कम्पनी गलती से रामप्रकाश को कोयले की सुपुर्दगी से सेती है | यघपि कम्पनी तथा रामप्रकाश के बीच प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुबन्ध नही हुआ तो भी रामप्रकाश को यह वैधानिक दायित्व होगा की कोयले का मूल्य चुकाये या माल वापस करे, अन्यथा यह कम्पनी के प्रति अन्याय होगा | रामप्रकाश का यह दायित्व अनुबन्ध के कारण उत्पन्न नही हुआ, अपितु परिस्थितिजन्य है |




अर्ध्द (गर्भित) अनुबन्धो के प्रकार (Different Kinds of Quasi (Implied) Contract)

अनुबन्ध आधिनियम की धारा 68 से 72 में अर्ध्द-अनुबन्ध के निम्नलिखित रूपों की चर्चा की गई है –

1, अनुबन्ध करने के अयोग्य व्यक्ति की आवश्यकताओ की पूर्ति करने से सम्बन्धित अर्ध्द-अनुबन्ध (धारा 68) (Quasi-contracts arising from the Supply of Necessities to those Persons who are Incomplete to Contract) यदि अनुबन्ध करने के योग्य अथवा असमर्थ व्यक्ति को, या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसका भरण-पोषण करने के लिये वह अयोग्य व्यक्ति वैधानिक रूप से बाध्य है, कोई अन्य व्यक्ति, अयोग्य व्यक्ति के जीवन-स्तर एवं सामाजिक स्तर के अनुकूल आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करते है, तो वह अन्य व्यक्ति अयोग्य व्यक्ति की सम्पति से भुगतान पाने का अधिकारी है |

अनुबन्ध करने में असमर्थ अथवा योग्य व्यक्तियों में पागल, अवयस्क, अथवा अस्वस्थ मास्तिष्क क्व व्यक्ति आते है तथा इन पर आश्रित व्यक्तियों में उसकी पत्नी, बच्चे तथा माता-पिता आते है | इसलिये आश्रित व्यक्ति को यदि जीवन की आवश्यकतायें प्रदान की गई तो उनका भी प्राप्त होगा जो अयोग्य व्यक्ति के साथ किये गये व्यवहार का होता है | जीवन की आवश्यकताओं में सामान्यत: आवश्यकताओं को शामिल किया जाता है लेकिन उसमे सामाजिक प्रतिष्ठा की आवश्यकताओ को भी शामिल करना पड़ेगा जैसे बच्चों की अनिवार्य शिक्षा, अयोग्य व्यक्ति के मुक़दमे का खर्चा तथा माता-पिता का धार्मिक संस्कारो के प्रति किया गया खर्च, उसकी आश्रित बहिन आदि की शादी का खर्चा | इन सब किये गये खर्चो के लिए अयोग्य व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से दायी नही होता है बल्कि उसकी सम्पति से वसूल किया जा सकता है | इस प्रकार धारा इस प्रकार धारा 68 के सम्बन्धित नियम इस प्रकार है –

(i) वस्तुएं अयोग्य व्यक्ति को स्वयं अथवा उस पर आश्रित व्यक्ति को दी गई हो,

(ii) दी गई वस्तुयें अयोग्य के रहन-सहन के स्तर को ध्यान में रखते हुये आवश्यकता की वस्तुयें (Necessssaries) होनी चाहिये,

(iii) जिस समय वस्तुयें दी गई उस समय अयोग्य व्यक्ति को उनकी वास्तव में जरूरत थी,

(iv) वस्तुओ के उचित मूल्य की ही माँग जी जा सकती है, अनुबन्धित मूल्य की नही,

(v) उचित मूल्य केवल अयोग्य व्यक्ति की सम्पति से ही वसूल किया जा सकता है, व्यक्तिगत रूप से वह लिए जिम्मेदार नही होता |

उदाहरण – अजय, एक पागल व्यक्ति महेश को उसके स्तर के अनुकूल आवश्यकता की कुछ वस्तुयें देता है | अजय, महेश की सम्पति में से मूल्य पाने का अधिकारी है | इसी प्रकार यदि अजय, महेश (पागल व्यक्ति) के बाल बच्चो को उनके स्तर के अनुकूल में से उनके स्टे अनुकूल आवश्यकता की वस्तुयें देता है तब भी अजय, महेश की सम्पति से वस्तुओ का भुगतान प्राप्त करने का अधिकारी देता है | दोनों ही परिस्थतियों में अयोग्य व्यक्ति के साथ कोई अनुबन्ध नही होता, परन्तु फिर फिर भी आवश्यक वस्तुयें देने वाला गर्भित अनुबन्ध के आधार पर अयोग्य व्यक्ति की सम्पति से भुगतान प्राप्त कर सकता है |

2, अपने हित के लिये किसी अन्य व्यक्ति द्वारा देय राशि का भुगतान कर देनें से सम्बन्धित गर्भित अनुबन्ध (धारा 69) (Reimbursement of Person Paying Money) – यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे दायित्व के लिये के लिये धन का भुगतान कर दिया गया हो, जो उसके हित में हो, परन्तु जिसके भुगतान करने का वैधानिक दायित्व किसी एनी व्यक्ति पर हो, तो वह भुगतान की राशि को उस व्यक्ति से प्राप्त कर सकता है जिसके उसके भूगतान करने का दायित्व था | इस प्रकार धारा 69 के अंतर्गत भुगतान की गई रकम प्राप्त करने के लिये निम्नलिखित शर्तो का पूरा करना आवश्यक है –

(i) भुगतान ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया है जिसका उस भुगतान में हित हो,

(ii) कोई अन्य व्यक्ति उस भुगतान के लिये कानून बाध्य हो तथा

(iii) वास्तव में भुगतान कर दिया गया है |

उदाहरणार्थ :- अतुल, विपुल के मकान में किराये पर रहता है किरायेनामे के अनुसार पानी का बिल अदा करने की जिम्मेदारी मकान मलिक की थी | परिस्थितिवश विपुल ने नगरपालिका को पानी के बिल भुगतान नही किया तथा नल काटने का नोटिस पाप्त हुआ | नल कट जाने के कारण राम को पानी उपलब्ध नही हो सकेगा, अत: अतुल नगरपालिका को पानी का भगतान कर देता है | यहाँ पर अतुल पानी के बिल की भगतान की गई राशि विपुल से वसूल कर सकता है क्योकि पानी के बिल के भुगतान में अतुल का हित स्वाभाविक है |

3  स्वेच्छा से परन्तु शुल्क लेने की भावना से किये पानी के बिल के भुगतान में अतुल का हित स्वाभाविक (धारा 70) (Obligation of Person Enjoying Benefit of a Non-gratuitous Act)जब कोई व्यक्ति नि:शुल्क या उपहार के अभिप्राय के बिना किसी दुसरे व्यक्ति के लिये कोई कार्य करता है अथवा उसे कोई वस्तु प्रदान करता है दूसरा कोई व्यक्ति उस कार्य या वस्तु का लाभ उठा लेता है तो वह उस कार्य या वस्तु के लिये पहले व्यक्ति को पारिश्रमिक या मूल्य का भुगतान करने के बाध्य है | उदाहरणार्थ, अतुल गलती से कुछ माल भरत के घर पर दे आता है | भरत उस माल को अपना मानकर उपयोग कर लेता है | यहाँ पर भरत, अतुल को इस माल का मूल्य चुकाने के लिये बाध्य है |




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4   खोई हुई वस्तु पाने वाले का दायित्व (Responsibility of the Finder of Goods) जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की खोई हुई वस्तु पाता है और उसे अपने आधिकार में लेता है तो उसके शरीर के स्वामी की बीच एक गर्भित अनुबन्ध स्थापित हो जाता है | धारा 71 के अनुसार ऐसे व्यक्ति के आधिकार एवं दायित्व बिल्कुल एक निक्षेप ग्रहीता (Bailee) के समान ही होते है | अत: उसका कर्तव्य है कि वह पाये हुये माल की उचित सुरक्षा करे, वास्तविक स्वामी को खोजने का उचित प्रयास करे, तथा स्वामी को उसकी वस्तु लौटा दे | साथ ही माल के पाने वाले व्यक्ति का यह अधिकार है कि माल की सुरक्षा, स्वामी की खोज तथा माल को वापस करने के सम्बन्ध में किये गये उचित व्यय तथा परिश्रमिक स्वामी से वसूल कर सकती है | उललेखनीय है की पाने वाले व्यक्ति का यह अधिकार नही है कि वह माल के स्वामी पर अपनी माँगो के लिये वास योजित कर सके | परन्तु वह माल पर विशिष्ट ग्रहणाधिकार लागू कर सकता है है अर्थात् वस्तु को उस समय तक रोके रह सकता है जब तक की स्वामी द्वारा उसके उचित व्ययों का मूल्य न मिल जाये | वह माल के स्वामी द्वारा घोयिल पुरस्कार को पाने के अधिकारी है | कुछ पारिस्थितियों में वह वस्तु को बेचने का अधिकार भी होता है |

5   गलती अथवा उत्पीड़न के अधीन प्राप्त धन अथवा वास्तु वापस लरमे ला दायित्व (धारा 72) (Liability to Return Money or Goods Received by Mistake or Under Coercion) भूल (गलती) अथवा उत्पीडन (बल-प्रयोग) के कारन यदि कोई धनराशि अथवा वस्तु एक व्यक्ति से दुसरे व्यक्ति ने प्राप्त कर ली हो, तो दूसरा व्यक्ति प्राप्त धनराशि अथवा वस्तु एक व्यक्ति स दुसरे व्यक्ति ने प्राप्त कर ली हो, तो दूसरा व्यक्ति प्राप्त धन या वस्तुओं को पहले व्यक्ति को लौटाने के लिये उतरदायी होता है | उदाहरनार्थ, ‘अ’ तथा ‘ब’ संयुक्त रूप से ‘स’ के प्रति 500 रुपयों के ऋणों से है | ‘अ’, ‘स’ को 500 रूपये चुका देता है परन्तु ‘ब’ को इस बात की जानकारी नही है और वह भी ‘स’ को 500 सुप्ये चुका देता है | ‘स’ 500 रूपये ‘ब’ को लौटाने के लिये बाध्य है |

अर्ध्द अनुबन्ध तथा साधारण अनुबन्ध में अन्तर

अन्तर का आधारअर्ध्द-अनुबन्धसाधारण अनुबन्ध
1, पक्षकारो की इच्छाअर्ध्द-अनुबन्ध पक्षकारो की इच्छा से उत्पन्न नही होते है अपितु कानून द्वारा थीपे जाते है |साधारण अनुबन्ध पक्षकारो की इच्छा से उत्पन्न होते है |
2, दायित्व की उत्पतिअर्ध्द-अनुबन्ध में पक्षकारों की दायित्व राजनियम की प्रभावशीलता में उत्पन्न होता है स्वत: नही |साधारण अनुबन्ध में पक्षकारों का दायित्व स्वत: अनुबन्ध के निर्माण के फलस्वरूप उत्पन्न होता है |
3, ठहराव का होनाअर्ध्द अनुबन्ध में पक्षकारो के मध्य कोई ठहराव नही होता है |साधारण अनुबन्ध में पक्षकारो के मध्य ठहराव का होना परम आवश्यक होता है |
4, अनुबन्ध की उत्पतिअर्ध्द-अनुबन्ध उस समय उत्पन्न होता है जबकि एक पक्षकारो धन, लाभ या वस्तु प्राप्त कर लेता है |साधारण अनुबन्ध की उत्पति प्रस्ताव एवं स्वीकृति से होती है |
5, वैध अनुबन्ध के लक्षणअर्ध्द-अनुबन्ध में वैध अनुबन्ध के सभी लक्षण नही पाये जाते है |साधारण अनुबन्ध में एक वैध अनुबन्ध के सभी लक्षणों का पाया जाना आवश्यक होता है |

 

भारतीय अनुबंध अधिनयम की धारा 51 के अनुसार, “जब किसी अनुबन्ध में ऐसे पारस्परिक वचन है जो एक साथ निष्पादन होने है तो वचनदाता अपने वचन का निष्पादन करने के लिये उस समय तक बाध्य नही किया जा सकता है | जब तक कि वचनग्रहीता अपने वचन का निष्पादन करने के लिये इच्छुक तथा तत्पर न हो अर्थात् दोनों पक्षकारो को अपने-अपने वचनों का निष्पादन एक साथ करना पड़ता है |

उपरोक्त उदाहरण में जब तक विपुल मुल्य के भुगतान के लिये तैयार न हो तो तब तक अतुल को 100 गाँठ रुई की सुपुर्दगी के लिये बाध्य नही किया जा सकता | इसके विरीत विपुल भी भुगतान करने के लिये तब तक बाध्य नहीं किया जा सकता | इसके विपरीत विपुल भी भुगतान करने के लिये तब तक बाध्य नही है जब तक की अतुल रुई की सुपुर्दगी देने के लिये तत्पर न हो |




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