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Business Environment Notes Concept Components And Importance

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Business Environment Notes Concept Components And Importance

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Business Environment Notes Concept Components And Importance
Business Environment Notes Concept Components And Importance

भारतीय व्यवसायिक वातावरण : अवधारणा, सघटक व महत्व (Indian Business  Environment: Concept, Components and Importance

व्यवसाय से आशय उन समस्त मानवीय आर्थिक किर्याओ से है जो वस्तुओ और सेवाओ की उत्पादन और वितरण के लिए की जाती है और जिनका उदेश्य पारस्परिक हित होता है इन घटकों में आर्थिक, सामाजिक, भोतिक, तकनीकी, आन्तरिक, बाह्य नियंत्रण तथा अनियंत्रित घटक शामिल होते है इन्ही घटकों के द्वारा कार्य-छेत्र का निधार्ण किया जाता है |



 

व्यवसायिक वातावरण की प्रक्रति अथवा विशेषताए (Business Environment Notes Concept Components And Importance)

 

  1. व्यवसायिक वातावरण गतिशील होता है – व्यावसायिक वातावरण के विभिन सघटक तत्वों में निरंतर परिवर्तन होता है जिससे व्यावसायिक वातावरण की प्रक्रति अत्यन्त गतिशील होती है इसी कारण व्यावसायिक फर्मो की नीतिया भी वातावरण में परिवर्तन के अनुसार परिवर्तन के अनुसार परिवर्तित होती रहती है |
  2. व्यावसायिक वातावरण जटिल होता है – व्यावसायिक वातावरण की प्रक्रति अत्यन्त जटिल होती है क्योकि इसमे विभिन्न आर्थिक, सामाजिक, भोतिक,तथा तकनीकी घटकों के प्रभाव तथा परिस्थितियो का अध्ययन किया जाता है |
  3. व्यावसायिक वातावरण अनियंत्रित होता है – प्रत्येक सस्था का वातावरण आन्तरिक एव बाह्य दो प्रकार का होता है व्यावसायिक सस्था अपने आन्तरिक वातावरण पर नियन्त्रण क्र लेती है अत: वह उसे बहुत अधिक प्रभावित नही करता है किन्तु बाह्य वातावरण पर सस्था को कोई नियन्त्रण नही होता है अत: उसे बाह्य वातावरण के अनुरूप अपने निणर्य लेने होते है
  4. व्यावसायिक वातावरण के सघटक तत्व परस्पर निभर्र होते है – व्यावसायिक वातावरण के विभिन्न तत्व एक-दुसरे को प्रभावित करते है विभिन आर्थिक घटक सामाजिक घटकों को सामाजिक घटक राजनितिक घटकों को तथा इसी प्रकार अन्य सभी घटक आपस में एक दुसरे को प्रभावित करते है |
  5. व्यावसायिक वातावरण अनिशचित होता है – व्यावसायिक वातावरण पर अनेक घटको का प्रभाव पड़ता है जिससे इसकी प्रक्रति अनिशिचत हो जाती है इसके विभिन्न घटकों में निरंतर परिवर्तन होते रहते है तथा उनका सही अनुमान लगाना बहुत कठिन होता है |




 

 Types of environments वातावरण के प्रकार

  1. Internal environment आन्तरिक वातावरण बाह्य वातावरण 

 

आन्तरिक वातावरण – आन्तरिक वातावरण से तात्पर्य सस्था के आन्तरिक सगठन से होता है जिसके माध्यम से वह अपना कार्य करती है आन्तरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तन सस्था से वह अपने कार्य करती है आन्तरिक वातावरण में होने वाले परिवर्तन सस्था के कार्य सचालन को प्रभावित तो करते  है लेकिन इन परिवर्तनों पर सस्था का नियन्त्र होता है इसीलिए इन्हे नियन्त्रणय चर कहा जाता है प्रबन्धक आन्तरिक अनुसार अपने पछ में कर सकते है आन्तरिक वातावरण में प्रमुख रूप से निम्नलिखित तत्वों को सम्मिलित किया जाता है –

  1. सस्था के प्रमुख लक्ष्य एव उदेश्य ;
  2. सस्था की विचारधारा, दर्शन एव द्रष्टिकोण;
  3. सस्था की व्यावसायिक एव प्रबन्धकीय नीतिया;
  4. ससाधनो की उपलब्धता, कार्यशीलता एव उपयोगिता;
  5. उत्पादन की कार्यविधिया एव तकनीक;
  6. छम की कुशलता एव कर्मचारी तथा अधिकारियो के बीच सम्बन्ध;
  7. व्यावसायिक प्रबन्ध सुचना प्रणाली एव सम्प्रेषण की व्यवस्था:
  8. सस्था की सगठन सरचना, विकेंद्रीकरण, दायित्व एव शक्तिया आदि |




बाह्य वातावरण – बाह्य वातावरण से आशय सभी बाह्य घटकों से होता है जो किसी सस्था के निर्णय क्रियाकलापों तथा सफलता को प्रभावित करते है इन पर उधोग का कोई नियन्त्र नही होता इसीलिए इन्हे अनियंत्रन्नीय चर भी कहा जाता है बाह्य वातावरण को दो उपवर्गों में बाटकर अध्ययन किया जा सकता है –

  1. सुषम या विशिष्ट वातावरण
  2. व्यापक या समिष्ट वातावरण

 

Sushm or Specific Environment सुषम या विशिष्ट वातावरण

  1. ग्राहक – विशिष्ट वातावरण में ग्राहको का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है उधमी का प्रमुख उदेश्य ग्राहक को संतुष्ट करके अधिकतम लाभ कमाना होता है अत: उसके लिये यह जानना आवश्यक होता है की ग्राहकों किस प्रकार की वस्तुए पसन्द करते है उधमी केवल सख्या बढ़ाने पर ही ध्यान नही देता है बल्कि इस बात की भी कोशिश करता है वे उधम के साथ स्थिर रूप से जुड़े रहे |
  2. आपूर्तिकर्ता – उत्पादन करने के लिए उधमी को कच्चे माल की आवश्यकता होती है अत: उत्पादन को सुव्यवस्थित करने के लिये यह आवश्यक होता है की सभी साधन नियमित रूप से तथा उचित कीमतों पर उपलब्द रहे आपूर्ति में अनिशिच्तता के कारण फर्म को आवश्यक से अधिक कच्चे माल का सग्रह करना पड़ता है जिस पर अधिक लागत व्यय होती है
  3. विपणन मध्यस्थ – प्रत्येक फर्म को ऐसे मध्यस्थो की आवश्यकता होती है जो उसके द्वारा उत्पादित वस्तुओ को बेचने में मदद करे विपणन मध्यस्थ फर्मो को उनकी वस्तुओ के वितरण विक्रय तथा प्रवर्तन में सहायता करते है इसके लिये रेडियो विज्ञापन टीo विo सलाहकार फर्मो की भी सहायता ली जा सकती है
  4. जनता – पब्लिक या जनता के अन्तगर्त स्थानीय जनता पब्लिक मिडिया ग्रहक सगठन उधम में कार्यरत कर्मचारी आदि को शामिल किया जाता है जनता किसी भी व्यवसाय को बहुत अधिक प्रभावित कर सकती है पब्लिक मिडिया व्यवसाय से सिद्ध हो सकता है वही कम्पनी की प्रतिष्टा के विरुद्ध सुचना देकर उसे नुक्सान भी पहुच सकता है

 

 Comprehensive Environment (Business Environment Notes Concept Components And Importance) व्यापक या समिष्ट वातावरण

 

  1. आर्थिक तत्व – व्यावसायिक वातावरण को प्रभावित करने बाले तत्वों में आर्थिक तत्वों का अपना विशेष स्थान है जैसे – प्रति व्यक्ति आय, राष्टीय आय, सहायक एव पूरक उधोग, परिवहन सचार व्यवस्था एव बिजली की सुलभ मात्रा आदि | अधोगीक सस्थाओ द्वारा निर्मित वस्तुओ पर व्यक्तिगत एव राष्टीय आय का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है यदि प्रति व्यक्ति आय अधिक होगी तो नागरिक समर्द्ध होगे और अधिक वस्तुओ का उपभोग क्र अपना जीवन-स्तर उचा बना सकते है |
  2. जननकीय वातावरण – व्यावसायिक किर्याओ में उत्पादन तथा सेवाओ मनुष्य के लिए तैयार किये जाते है जिस देश की जनसख्या जितनी अधिक होगी उस देश में वस्तु के लिए बाजार उतना ही अधिक विशाल होगा | आकर के साथ-साथ जनसख्या का शिछा स्तर, आय का वितरण पुरुष-महिला का प्रतिशत, जन्म दर, म्रत्यु दर, धनत्व, उम्र के आधार पर जनसख्या का वितरण आदि का भी प्रभाव पड़ता है इनके अतिरिक्त जनसख्या की व्रधि दर,रोजगार का स्तर, बेरोजगारी की सख्या, आदि भी किसी फर्म की माग पर प्रभाव डालते है |
  3. सामाजिक सास्क्रतिक तत्व – व्यवसाय की रणनीति बनाते समय सामाजिक-सास्क्रतिक पर्यावरण का अध्ययन करना आवश्यक होता है रीति-रिवाज, परम्पराओ, मान्यताओ, रुचियों तथा प्राथमिकताओ जैसे सामाजिक एव सास्क्रतिक कारको की उपेछा करने के भयकर दुष्परिणाम होते है और उसकी उची लागत सहना करनी पडती है लोगो की व्यय तथा उपभोग की आदते, भाषा, विश्वास शिछा तथा अन्य मान्यताए व्यवसाय पर व्यापक प्रभाव डालते है |
  4. प्राक्रतिक तत्व – देश के प्राक्रतिक साधन उनका वितरण भूमि की उपजाऊ शक्ति, जल, वायु, पहाड़, खनिज,वन सम्पदा आदि भी व्यावसायिक सचालन को प्रभावित करते है पर्वतीय छेत्री में पर्यटन पशुपालन एव वन उधोग अधिक पनप सकते है तो मैदानी भागो में क्रषि उधोग अधिक पनप सकता है विभिन्न बाजारों की भोगोलिक स्थिति में अंतर होते पर भी बाजार में परिवर्तन आ जाता है जैसे की पहाड़ी छेत्र में मारुती कार के स्थान पर जिप्सी की माग अधिक हो जाती है |
  5. अंतराष्टीय तत्व – अंतराष्टीय वातावरण में विदेशी व्यापार नीति अंतराष्टीय सन्धियों व्यापार समझोते संरक्षण नीति विदेशी विनिमय नीति आदि पहलुओ को सम्मिलित किया जाता है अन्तराष्टीय वातावरण उधोग के विकास को बहुत अधिक प्रभावित करता है विदेशी बाजार में मंदी तथा सरकारी व्यापार संरक्षण नीति निर्यात आधारित उधोग के सामने बहुत सी कठिनाई उत्पन्न कर देती है इसी प्रकार अन्तराष्टीय तेल मूल्यों की वर्धि ने सभी देशो की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है |

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