Bcom 1 Year Business Economics Notes In Hindi One Day Pattern

Bcom Business Economics Notes In Hindi One Day Pattern

Bcom Business Economics Notes In Hindi One Day Pattern

Bcom Business Economics Notes In Hindi One Day Pattern
Bcom Business Economics Notes In Hindi One Day Pattern

BUSINESS ECONOMICS AN INTRODUCTION

Bcom Business Economics Notes In Hindi One Day Pattern : व्यावसायिक अर्थशास्त्र का परिचिय  :  व्यावसायिक अर्थशास्त्र एक ऐसा ज्ञान है | जिसका सम्बन्ध किसी भी व्यावसाय की आर्थिक स्थिति से होता है | किसी भी व्यवसाय के व्यापार , वाणिज्य के बढ़ते हुए आकर एंव विपरीत आर्थिक परीस्थितियों के लिए व्यवसायिक अर्थशास्त्र बहुत जरुरी होता है | हम व्यवसायिक अर्थशास्त्र के अंतर्गत किसी भी व्यवसाय या किसी फर्म की आर्थिक समस्याओ का समाधान , निर्णय लेने व् भावी नियोजन के लिए करते है |

अर्थ व परिभाषा : व्यावसायिक अर्थशास्त्र सामान्य अर्थशास्त्र  की एक व्यावहारिक शाखा है | व्यावसायिक अर्थशास्त्र फर्मो के सिधांत एंव व्यावहारिक दोनों चरणों की विवेचना करते है |

जे. बी. से. के अनुसारअर्थशास्त्र वह विज्ञानं है जो धन की विवेचना करता है |

प्रो. वाकर – “ अर्थशास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जो धन से सम्बंधित है |



व्यावसायिक अर्थशास्त्र की विशेषताए :

1)  सूक्ष्म अर्थशास्त्रीय स्वभाव

2) निर्देशात्मक प्रक्रति

3) व्यापक अर्थशास्त्र का समुचित महत्त्व

4) फर्म के सिधांत के अध्ययन से सम्बंधित

5) प्रबंधकीय स्तर पर निर्णय

6) समन्वयात्मक प्रक्रति

7) फल- मूलक एंव व्यावहारिक द्रष्टिकोण

8) व्यावसायिक अर्थशास्त्र व्सयिक अर्थशास्त्र  भी है और कला भी |

व्यावसायिक अर्थशास्त्र का महत्त्व

किसी भी व्यवसाय की सफलता प्राय: उसके प्रबंध द्वारा सही समय पर लिए गये सही निर्णयों पर निर्भर करती है | आधुनिक युग में व्यावसायिक क्रियाये जोखिम और अनिश्चित्तता का पर्याय बनकर रह गई है | अत: कुशल प्रबंध के लिए यह आवश्यक है की संभावित जोखिम और अनिशित्ताओ को न्यूनतम करने के सही समय पर उचित निर्णय करे | व्यावसायिक से जुडी विभिन्न आर्थिक समस्याओ के निराकरण हेतु समुचित निर्णय लेने में व्यावसायिक अर्थशास्त्र का अपना एक विशिस्ट महत्त्व है जिसे निम्नलिखित बिन्दुओ की सहायता से सरलतापूर्वक स्पष्ट किया जा सकता है |

(1) नियोजन एंव निर्यण में सहायक (helpful in planning and decision making) – किसी भी व्यवसाय की सफलता के लिए सही नियोजन एंव निर्णयन अत्यंत आवश्यक है जिनका ज्ञान एंव बोध व्यावसायिक अर्थशास्त्र भली भांति करता है | व्यावसायिक अर्थशास्त्र फर्म की भूतकालीन घटनाये एंव परिणामो का विश्लेषण करके नियोजन के लिए आधार तैयार करता है तथा भविष्य के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगता है |




(2) अनिश्चतता को कम करने में सहायक – सामान्यतया प्रत्येक व्यावसायिक प्रबंधक को अनिश्चितता के वातावरण में काम करना पड़ता है | यधपि इन अनिश्चितता को समाप्त तो नही किया जा सकता परन्तु , व्यावसायिक अर्थशास्त्र इन अनिश्चताओ एंव जोखिम को न्यूनतम करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है |

(3) आर्थिक संबंधो अनुमान लगाना – वस्तु की मांग की कीमत – लोच , आय लोच , तिरछी लोच , लगत उत्पादन सम्बन्ध आदि आर्थिक संबंधो का अनुमान लगाने में व्यावसायिक अर्थशास्त्र बहुत महत्वपूर्ण होता है |

(4)  पर्बंधक के सामाजिक उतर्दयित्व को प्रेरित करना – व्यावसायिक अर्थशास्त्र किसी भी व्यवसाय के प्रबंधक को उसका सामाजिक उतरदायित्व का भी अहसास करता है |

UTILITY ANALYSIS उपयोगिता विश्लेषण

सामान्य बोलचाल की भाषा में उपयोगिता का अर्थ ‘लाभदायक’ से लगाया जाता है परन्तु अर्थशास्त्र में उपयोगिता का अर्थ किसी वस्तु के उपभोग से मिलने वाली संतुष्टि से है या किसी वस्तु की वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करती है |

उदहारण – जैसे हमारे घरो में बाइक , या कार का होना | इन सभी चीजो से हमे एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाने में आसानी होती है और हमारा समय भी बच जाता है लेकिन ये कोई वैसा लाभ नही है लेकिन लाभदायक है |

विशेषताएं

1) उपयोगिता एक सापेक्षित है जो समय, स्थान तथा व्यक्ति के साथ परिवर्तित होता है |

2) उपयोगिता को कोई भौतिक रूप नही होता इसे केवल अनुभव किया जा सकता है |

3) उपयोगिता का लाभदायकता से कोई सम्बन्ध नही है |

4) उपयोगिता आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करती है |

 

मांग एंव मांग का नियम  

आम बोलचाल में इच्छा , आवश्यकता एंव मांग का एक ही अर्थ लगाया जाता है परन्तु अर्थशास्त्र में इन तीनो का अर्थ एक-दुसरे से भिन्न है | अर्थशास्त्र में प्रत्येक इच्छा मांग नही होती | मांग का अर्थ एक दी हुई वस्तु की उन विभिन्न मात्राओ से होता है जो उपभोक्ता बाजार में , किसी निश्चित समय में विभिन्न मूल्यों पर क्रय करने के लिए तैयार रहते है | अन्य शब्दों में , किसी वस्तु की मांग उस वस्तु की मात्रा तथा उसकी कीमत से सम्बंधित होती है , जो समय विशेस पर खरीदी जा सकती है |




प्रो० बेन्ह्म के अनुसार “ किसी दी गई कीमत पर वस्तु की मांग वह मात्र है जो उस कीमत पर एक निश्चित समय में खरीदी जाती है| ”

मांग के प्रकार (KIND OF DEMAND)

किसी वस्तु की मांग तीन बातो से प्रभावित होती है – कीमत , आय , पूरक वस्तुएं | इस आधार पर मांग तीन प्रकार की होती है |

1) मूल्य मांग PRICE DEMAND

2) आय मांग INCOME DEMAND

3) आड़ी तिरछी CROSS DEMAND

1) मूल्य मांग –  मूल्य मांग से अभिप्राय: वस्तु की उन मात्राओ से है जो एक निश्चित समयवधि में निश्चित कीमत पर उपभोक्ता द्वारा मांगी जाती है ‘यदि अन्य बाते समान रहे तो वस्तु की कीमत बढ़ जाने से उनकी मांग कम हो जाएगी और वस्तु की कीमत घाट जाने से उसकी मांग बढ़ जाएगी | यहाँ अन्य बाते समान रहे शब्द का मतलब यह है की जिस समय विशेष का उपभोक्ता किसी वस्तु विशेस की मांग करता है , उस समय उपभोक्ता की आय , रूचि व्यवहार एंव उसके आय स्तर में किसी प्रकार का कोई भी परिवर्तन नही होना चाइये |

2) आय मांग —  आय- मांग किसी वस्तु की उन मात्राओ को व्यक्ति करती है जो अन्य बातें समान रहने पर , उपभोक्ता द्वारा आय के भिन्न स्तरों पर खरीदी जाती है | ऐसी मांग का सम्बन्ध ‘वस्तु के मूल्य से न होकर ‘उपभोक्ता की आय ‘ से होता है | आय – मांग का विश्लेषण करते समय हम वस्तुओ के मूल्य , उपभोक्ता की रूचि आदि तत्वों को स्थिर मान लेते है | आय-मांग की द्रष्टि से आय के बढ़ने पर मांग बढती है और आय के घटने पर मांग कम होती है अर्थात आय और मांग में सीधा सम्बन्ध होता है |

3) आड़ी तिरछी मांग –   जब किसी वस्तु की मांग पर अन्य वस्तुओ  कीमतों में होने वाले परिवर्तन का भी प्रभाव पड़ता है तो उसे उस वस्तु की तिरछी मांग कहते है |

मांग तालिका या मांग सूचि या मांग सारणी

मांग तालिका से अभिप्राय: एक ऐसी तालिका से है जिसमे किसी वस्तु को विभिन्न मूल्यों पर मांगी जाने वाली मात्रा को दर्शाया जाता है | अन्य शब्दों में किसी बाजार में एक निश्चित समय पर दिए हुए मूल्यों पर वस्तु की जितनी मात्रा बेचीं जाती है , यदि उस वस्तु की उस मात्र को एक तालिका के रूप में दिखाया जाते तो यह मांग तालिका कहलाती है | हैन्सन के अनुसार, “कीमतों के विभिन्न स्तरों पर मांगी गई वस्तु की मात्रा को बताने वाली सूचि मांग तालिका है”

मांग तालिका दो प्रकार की होती है |

1) व्यक्तिगत मांग तालिका – व्यक्तिगत मांग तालिका का आशय ऐसी तालिका से है जिसमे किसी वस्तु की उन विभिन्न मात्राओ को दर्शाया जाता है जो एक व्यक्तिगत उपभोक्ता द्वारा उसके विभिन्न मूल्यों पर क्रय की जाती है | अन्य शब्दों में एक , व्यक्तिगत उपभोक्ता एक वस्तु की किस मूल्य पर कितनी मात्रा खरीदेगा, यह व्यक्ति मांग तालिका द्वारा स्पष्ट किया जाता है |

 

व्यक्तिगत मांग तालिका
आम का मूल्य (रुपए प्रति किलो ) मांगी गई मात्रा प्रतिदिन
8 1
5 2
4 3
3 4

 

2) बाजार मांग तालिका – बाजार मांग तालिका का अर्थ ऐसी तालिका से है जिसमे किसी वस्तु की उन विभिन्न मात्राओ को दर्शाया जाती है जो सभी उपभोक्ताओ द्वारा कुल मिलकर उसके विभिन्न मूल्यों पर क्रय की जाती है | सामान्य शब्दों में व्यक्तिगत मांग का योग ही बाजार मांग कहलाती है |

आम का मूल्य (रूपए प्रति किलो )

व्यक्तिगत मांग तालिकाए (दैनिक )

मांगी गई मात्र व्यक्तिगत उपभोक्ता

बाजार मांग तालिका (दैनिक) उपभोक्ता A, B एंव C तीनो द्वारा कुल मांगी गई मत्राए

A B C
8 3 7 1 11
5 6 9 2 17
4 8 12 3 23
3 10 15 4 29

                     

मांग वक्र (DEMAND CURVE)

अर्थ व प्रकार – मांग वक्र मंग तालिका का रेखीय प्रदर्शन है जब मांग तालिका को रेखाचित्र द्वारा व्यक्त किया जाता है तो उसे मांग वक्र कहते है इस प्रकार किसी वस्तु विभिन्न कीमतों पर उसकी मांगी जाने वाली मात्राओ के बिच पाए जाने वाले ‘सम्बन्ध’ को स्पष्ट करता है | मांग-वक्र ऐसा चित्र है जो किसी वस्तु की विभिन्न मात्राओ को बताता है जिन्हें विभिन्न कीमतों पर ख़रीदा जाता है मांग तालिका की भांति मांग- वक्र भी दो प्रकार का होता है (i) व्यक्तिगत मांग वक्र (ii) बाजार मांग वक्र |

DIFFERENT BETWEEN LAW OF DEMAND AND ELASTICITY OF DEMAND  ( मांग के नियम एंव मांग की लोच में परिवर्तन )

मांग की नियम यह स्पष्ट करता है की मूल्य में वृधि होने पर मांग कम हो जाती है एंव मूल्य में कमी होने पर वृधि बढ़ जाती है लेकिन मांग के नियम से यह स्पष्ट नही किया जा सकता की मूल्य में एक निश्चित परिवर्तन से मांग में कितना परिवर्तन होगा अर्थात इस नियम से हम मांग में होने वाले परिवर्तन की मात्रा के सम्बन्ध में कोई जानकारी नही प्राप्त कर सकते है इस बात को ध्यान में रखते हुए ही कुछ अर्थशास्त्रियो ने मांग की लोच प्रस्तुत की है | अत: मांग की लोच एक प्रकार का मापक है जो हमे मूल्य में परिवर्तन से मांग में होने वाले सभी परिवर्तन का ज्ञान कराता है |

उदाहरण : यदि किसी व्यक्ति का शरीर गर्म है तो उसे प्राय: कहा जा सकता है की व्यक्ति को बुखार है परन्तु कितना बुखार है ये बताना मुस्किल है अर्थात यदि थर्मामीटर से मापे तो पता चल जायेगा की कितना बुखार है अत: मांग के नियम से केवल यह ज्ञात किया जा सकता है की मूल्य और मांग में परिवर्तन हुआ है लेकिन यह नही बताया जा सकता है की कितना परिवर्तन हुआ है अत: मांग की लोच से उसकी मात्रा भी ज्ञात की जा सकती है |

मांग की लोच की परिभाषा

प्रो० बोल्डिंग – किसी वस्तु के मूल्य में एक प्रतिशत परिवर्तन होने पर उस वस्तु की मांग में जो परिवर्तन होता है मांग की लोच कहलाता है |

मांग की लोच की विभिन्न अवधारणये (VARIOUS CONCEPTS OF ELASTICITY OF DEMAND)

मांग की लोच से सम्बंधित प्रमुख अवधारणये निम्न प्रकार है –

(1) मांग की कीमत लोच –  अर्थात वस्तु की कीमत में परिवर्तन फलस्वरूप मांग में परिवर्तन

(2) मांग की आय लोच – अर्थात आय के परिवर्तन के फलस्वरूप मांग में परिवर्तन |

(3) मांग की आड़ी लोच – अर्थात सम्बंधित पोअर्तिस्थापन वस्तु की कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप मांग में परिवर्तन |

माँग की लोच की श्रेणीया या मात्राये (DEGREES OF PRICE ELASTICITY OF DEMAND)

(1) पूर्णतया लोचदार मांग (Perfectly Elastic Demand) –  जब किसी वस्तु की मांग उसके मूल्य में बिना किसी परिवर्तन के ही अथवा मूल्य में बहुत कम परिवर्तन होने पर स्वयं ही घटती-बढती रहती है तो इसे पूर्णतया लोचदार मांग कहते है | व्यावहारिक जीवन में कोल्ड ड्रिंक्स तथा आइसक्रीम की मांग के सम्बन्ध में ऐसा देखने को मिलता है |

(2) पूर्णतया बेलोचदार मांग Perfectly Inelastic Demand जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर भी उसकी मांग में कोई परिवर्तन नही होता अर्थात सभी कीमतों पर वस्तु की एक ही मात्रा की मांग की जाती है तो वस्तु की मांग की लोच शून्य के बराबर होती है |

(3) लोचदार मांग  Elastic Demand जब किसी वस्तु की मांग में परिवर्तन ठीक उसी अनुपात में होता है जिस अनुपात में उसकी कीमत में परिवर्तन हुआ है , तब ऐसी वस्तु की मांग को लोचदार मांग कहते है | उदहारण के लिए , यदि किसी वस्तु की कीमत में 20% वृधि होती है और उसकी मांग भी 20% कम हो जाती है अथवा कीमत में 10% की कमी होने पर मांग में फिर 10% की वृधि हो जाती है तो इस प्रकार की मांग लोचदार मांग कहलाएगी |

मांग की लोच को प्रभावित करने वाले तत्व (Factors Effecting Elasticity of Demand)

विभिन्न वस्तुओ की मांग की लोच विभिन्न प्रकार की होती है | किसी वस्तु की मांग अधिक लोचदार होती है तो किसी वस्तु की कम | वस्तुत: किसी वस्तु की मांग की लोच अनेक घटकों से प्रभावित होती है , जिसमे से मुख्यत: निम्न प्रकार है –

 (1) वस्तु की प्रक्रति – किसी वस्तु की मांग की लोच उस वस्तु की प्रक्रति पर निर्भर करती है | इस द्रष्टि से वस्तुओ को तीन भागो में बाटा जा सकता है – अनिवार्य, आरामदायक या विलासिता सम्बन्धी वस्तुए| अनिर्वार्य आवश्यकता की वस्तुओ की मांग बेलोच्दर होती है ,क्योंकि अनिवार्य वस्तुओ के उपयोग के बिना मानव जीवन दुस्कर हो जाती है जैसे नमक , अनाज आदि | ऐसी वस्तुओ की कीमत चाहे कुछ भी हो , खरीदना ही पड़ता है | आरामदायक वस्तुओ की मांग लोचदार होती है क्योंकि ऐसी वस्तुओ की मांग में ओल्गब्न्हाग उसी पानीपत में परिवर्तन होती जिस अनुपात में कीमतों में परिवर्तन होता है | विलासिता सम्बन्धी वस्तुओ की मांग अधिक लोचदार होती है क्योंकि ये ऐसी वस्तुए होती है जिनके बिना भी मनुष्य अपना जीवन चला सकता है |

(2) वस्तु के प्रयोग –  यदि किसी वस्तु को विभिन्न कर्यो में प्रयोग किया जाता है तो एरसी वस्तु की मांग लोचदार होगी , परन्तु जिस वस्तु का प्रयोग केवल एक कार्य में ही किया जाता हो उसकी मांग कम लोचदार होती है | उदहारण के लिए , बिजली का उपयोग अनेक कार्यो में होता है यदि इसकी डॉ में वृधि हो जाये तो उपोभोक्ता इसका प्रयोग कुछ सिमित कार्यो के लिए ही करेगे और परिणामस्वरूप इसकी मांग कम हो जाएगी | इसके विपरीत यदि इसकी दर घाट जाये तो इसका प्रयोग विभिन्न कार्यो में किया जाने लगेगा और परिणामस्वरूप इसकी मांग बढ़ जाएगी |

(3) उपभोक्ता की आदत – यदि किसी व्यक्ति को किसी वस्तु के उपभोग करने की आदत पड़ गई है जो उस व्यक्ति के लिए उस वस्तु की मांग को बेलोचदार होगी | उदहारण के लिए शराब पीने वाले व्यक्ति के लिए शराब के मूल्य में वृधि का उसकी मांग पर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा | क्योंकि शराब के बिना वह अपना जीवन नीरस समझता है |

(4) उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति –  ऐसी वस्तुओ की मांग जिनका उपयोग केवल धनि वर्ग द्वारा किया जाता है , बेलोचदार होती है | इसके विपरीत ऐसी वस्तुओ की मांग जिनका उपयोग केवल निर्धन वर्ग द्वारा किया जाता है , लोचदार होती है क्योंकि वस्तु के मूल्य में थोडा-सा परिवर्तन भी उनके लिए महत्वपूर्ण होता है |

मांग की लोच का महत्व / उपयोगिता

मांग की लोच का विचार अर्थशास्त्र में सैधानिक व व्यावहारिक दोनों ही द्रष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है | संक्षेप में , मांग की लोच के महत्व को निम्न दो भागो में बांटा जा सकता है |

(1) वितरण सिधांत में महत्व – मांग की लोच के द्वारा उत्पति के साधनों को उनका पुरस्कार निर्धारित करने में सहायता मिलती है | उत्पादक, उत्पत्ति के उन साधनों को अधिक पुरस्कार देता है जिनकी मांग की लोच उसके लिए बेलोचदार है तथा उन साधनों को कम पुरस्कार देता है जिनकी लोच उसके लिए लोचदार होती है |

(2) सरकार के लिए महत्व – सरकार की द्रष्टिकोण से भी मांग की लोच की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है | सरकार के लिए इसके महत्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है –

(i) कर निति के निर्धारण में सहायक – सरकार को क्र लगाये समय यह देखना होता है की उस वस्तु की मांग की लोच कैसी है > लोचदार मांग वाली वस्तुओ पर कम क्र लगाया जाता है अन्यथा वस्तु के मूल्य में वृधि को जन्मे के कारन मांग कम हो जाएगी तथा सरकार को कम, आय प्राप्त होगी इसके विपरीत बेलोचदार मांग वाली वस्तुओ पर अधिक क्र लगाकर आय में वृधि की जा सकती है |

(ii) आर्थिक निति के निर्माण में सहायक –  मांग की लोच का विचार सरकार को आर्थिक व् वितीय नीतियों को निर्धारित करने में भी सहायता पहुचता है | व्यापर चक्रों का नियंत्रण , मुद्रा प्रसार एंव मुद्रा संकुचन के दुष्प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए तथा आर्थीक गतिविधियों में वांछित परिवर्तन लेने के लिए आर्थिक नीतियों का निर्माण मांग की लोच के स्मुच्बित अध्यन पर ही आधारित है |

(3)  अंतराष्ट्रीय व्यापार में महत्व – किन्ही दो देशो के बिच ‘व्यापर की शर्ते ‘ मांग की लोच पर निर्भर करती है | यदि हमारे निर्यातों की मांग बलोच है तो वे वस्तुए विदेशो में ऊँची कीमतों पर बिक सकेगी | इसके विपरीत यदि हमारे आयातों की मांग हमारे लिए बलोच है , तो हमे उन वस्तुओ को ऊँची कीमत पर भी खरीदना पड़ेगा |

(4) विनिमय दर के निर्धारण में सहायक – मांग की लोच का विचार सर्कार को विनिमय दर के निर्धारण में भी सहायता पहुचता है | जिन देशो के लिए हमारे देश की मुद्रा की मांग बेलोचदार होती है , उन देशो की मुद्रा के साथ अपने देश की मुद्रा की विनिमय दर ऊँची राखी जाती है | इसके विपरीत जिन देशो के लिक्ये हमारे देश की मुद्रा की मंतग अधिक लोचदार होती है , उन देशो की मुद्रा के साथ अपने देश की मुद्रा के साथ अपने देश की मुद्रा की विनिमय दर नीची रखी जाती है |




मांग की आड़ी लोच के प्रकार KINDS OF CROSS EOLASTICITY OF DEMAND

(1)  पूरक वस्तुओ की मांग की आड़ी लोच – पूरक वस्तुओ की मांग की आड़ी लोच सदैव र्नात्मक होती है क्योंकि इनकी मांग सयुंक्त रूप से की जाती है जैसी कर तथा पेट्रोल | अत: पेट्रोल की कोमल में वृधि के परिणामस्वरूप न केवल पेट्रोल की मांग कम होगी बल्कि कार की मांग में भी कमी आएगी |

(2) स्थ्न्पत्र वस्तुओ की मांग की आड़ी लोच –  स्थानापत्र वस्तुओ की मांग की आड़ी लोच सदैव धनात्मक होती है उदहारण के लिए जब चाय (Y-वस्तु) की किमय्त बढ़ जाये परन्तु कोफ़ी (X – वस्तु ) की कीमत पुरवत ही रहती है तो उपभोक्ता चाय के स्थान पर काफी कीमांग अधिक करेगे | कहने का अभिप्राय यह है की स्थानापत्र वस्तुओ की स्थिति में एक वस्तु की कीमत में जिस दिशा में परिवर्तन होगा दूसरी वस्तु की मांग में भी उसी दिशा में परिवर्तन होगा |

(3) असंबंधित वस्तुओ की मांग की आड़ी लोच – परस्पर असंबंधित वस्तुओ की दशा में मांग की आड़ी लोच शून्य होती है |

निष्कर्ष –  यदि मांग की आड़ी लोच धनात्मक है तो यह मानेगे की दोनों वस्तुए एक दुसरे की स्थानापत्र है | इसके विपरीत ऋणात्मक होने पर दोनों वस्तुओ को पूरक माना जाता है | यदि मांग की आड़ी लोच्य शून्य हो तो इसका अर्थ है किदोनो वस्तुए आपस में सम्बंधित नही है |

उत्पादन फलन (PRODUCTION FUNCTION)

उत्पादन फलन में फलन शब्द गणित से लिया गया है | यह दो विभिन्न चरो के सम्बन्ध को व्यक्त करता है | उदाहरण के लिए जब हम यह कहते है की ‘Y’-चर , X-चर पर निर्भर करता है अर्थात यदि X-चर में कोई परिवर्तन होता है तो उसका प्रभाव Y-चर पर भी पड़ेगा | गणितीय रूप में इस सम्बन्ध को निम्न प्रकार व्यक्त किया जाता है –

Y=F(X)

जिस वस्तु का उत्पादन किया जा रहा है उसे अर्थशास्त्र में निर्गत या पर्दा कहते है एंव जिन साधनों की सहयता से उत्पादन किया जाता है उन्हें आगत या आदा कहा जाता है | वस्तुत: आगम या आदा में उन सभी वस्तुओ को समिमिलित किया जाता है जिन्हें किसी फर्म द्वारा उत्पादन क्रिया में प्रयोग किया गया है | इसके विपरीत पर्दा शब्द उन सभी वस्तुओ की मात्राओ की और संदेत करता है जिन्हें विभिन्न आदो की सहायता से फर्म द्वारा उत्पादित किया जाता है |

उत्पादन फलन की मान्यताये (assumptions of production function)

(i) उत्पादन फलां एक निश्चित स्म्य्विधि से सम्बन्धी होता है |

(ii) जिस स्म्यव्धि में उत्पादन फलन का अध्ययन किया जाता है उसके उसके लिए यह मन लिया जाता है की तकनीकी ज्ञान की स्थिति में कोई परिवर्तन नही होगा |

(iii) फर्म सर्वश्रेष्ठ एंव आधुनिकतम उत्पादन तकनीकी का प्रयोग करती है |

(iv) उत्पादन के विभिन्न साधन छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजि होते है |

(v) उत्पादन के साधनों की कीमते यथास्थिर रहती है अर्थात उत्पादन के साधनों की कीमत में कोई परिवर्तन नही होता है |

उत्पादन फलन के प्रकार TYPER OF PRODUCTION FUNCTION

उत्पादन फलन में समय –तत्व एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है | उत्पादन फलन की प्रक्रति अल्पकाल एंव धिर्घ्कल में एक समान नही रहती है | अल्पकालीन उत्पादन अवधि का अभिप्राय उस स्म्य्वधि से है जिसमे उत्पत्ति के सभी साधनों को परिवर्तित नही किया जा सकता है इसके विपरीत दीर्घकालीन उत्पादन अवधि का अभिप्राय: ऐसी दीर्घ समयवधि से है जिसमे फर्म उत्पादन में प्रयोग होने वाले उत्पति के सभी साधनों को आवश्यकतानुसार परिवर्तित क्र सकती है इस प्रकार उत्पादन फलन को निम्नलिखित दो भागो में बांटा जा सकता है |

(i) अल्पकालीन उत्पादन फलन – जब उत्पादन के एनी साधन स्थिर रहते है और एक साधन में परिवर्तन किया जा सकता है तो इसे अल्पकालीन उत्पादन फलन खा जाता है इस स्थिति को उत्पति हास्य नियम अथवा परिवर्तनशील अनुपातो का नियम भी कहा जाता है |

(ii) दीर्घकालीन उत्पादन फलन – जब उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनशील हो तो उसे दीर्घकालीन उत्पादन फलन कहा जाता है | इस स्थिति को पैमाने के प्रतिफल के नियम के नाम से भी व्यक्त किया जाता है |

रिज रेखाए RIDGE LINES

स्मोत्पाद वक्र के बिन्दुओ के मार्ग जिन पर साधनों को सीमांत उत्पादकता शून्य होती है , रिज रेखाए बनाते है | उपयुक्त वर्णित स्मोत्पत मानचित्र में दो रिज रेखाए OR तथा OS है | रिज रेखा OR श्रम की उन मात्राओ को व्यक्त करती है जो उत्पादन की विभिन्न मात्राओ के लिल्ये न्यूनतम रूप से आवश्यक है तथा रिज रेखा OS पूंजी की न्यूनतम आवश्यक मात्राओ को व्यक्त करती है और रेखा को पूंजी रिज रेखा अथवा उपरी रिज रेखा भी कहा जाता है | रिज रेखा OR के विभिन्न बिन्दुओ जैसे A, B, C तथा D पर पूंजी की सीमांत उत्पादकता शून्य होती है इसी प्रकार OS रेखा को श्रम रिज रेखा अथवा निम्न रिज रेखा भी कहा जाता है | इस रेखा के विभिन्न विन्दुओ जैसे E, F, G तथा H पर श्रम को सीमांत उत्पादकता शून्य होती है इन दोनों रिज रेखाओ OR तथा OS के बिच के छेत्र को उत्पादन के आर्थिक छेत्र को संज्ञा दी जा सकती है | उत्पादन के इस छेत्र में स्मोत्पाद के इस छेत्र में स्मूत्पद वक्र सामान्य आकार वाले अर्थात ऋणात्मक ढाल वाले होते है | इन परिधि रेखाओ के छेत्र में उत्पादन करके ही उत्पादक अपने लाभों को अधिकतम कर सकते है

पैमाने के प्रतिफल का अर्थ एंव परिभाषा  MEANING AND DEFINITION OF RETURN TO SCALE

पैमाने के प्रतिफल से अभिप्राय उत्पादन में होने वाले उस परिवर्तन से है जो उत्पादन के सभी साधनों में सामान अनुपात में परिवर्तन करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है उत्पादन के सभी साधनों में परिवर्तन केवल दीर्घकाल में ही सम्भव होता है ,अत: पैमाने के प्रतिफल का सम्बन्ध दीर्घकालीन उत्पादन फलन से होता है

प्रो० लिभाफ्सकी के अनुसार , “ पैमाने के प्रतिफल का सम्बन्ध सभी साधनों में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप कुल उत्पादन में होने वाले परिवर्तन से है यह एक दीर्घकालीन धारणा है “




आंतरिक एंव बहाय मितव्ययीताएँ INTERNAL AND EXTERNAL ECONOMIES

ऐसी बचते जो की किसी फर्म को उसके उत्पादन के आकर मे वृधि के कारन अथवा उस उद्योग विशेष में फर्मो की संख्या बढ़ जाने के कारन प्राप्त होती है , उन्हें पैमाने की बचते कहते है |

बड़े पैमाने का उत्पादन LARGE SCALE PRODUCTION

जब किसी उद्योग में उत्पादन इकाईया बड़े आकर की होती है तथा वह उत्पादन के विभिन्न साधनों जैसे – पूंजी, श्रम , आदि का बड़ी मात्रा में प्रयोग करती है तो इसे बड़े पैमाने का उत्पादन कहते है | बड़े पैमाने के उत्पादन में निम्नलिखित चार बाते अनिवार्य रूप से पाई जाती है –

(i) कारखानों में कम करने वाले श्रमिको की संख्या का अधिक होना |

(ii) पूंजी का बड़ी मात्रा में लगाया जाना |

(iii) अधिकांश उत्पादन कार्य मशीनों की सहायता से करना |

(iv) उत्पादन को बड़े पैमाने में प्राप्त किया जाना |

आंतरिक बचतें INTERNAL ECONOMIES OF SCALE

जब एक फर्म को उत्पत्ति का पैमाना बढाने पर अपनी आंतरिक कुशलता तथा संगठन की श्रेष्ठता के कारण बचते प्राप्त होती है तो उन्हें आंतरिक बचते कहते है | इन बचतों का सम्बन्ध सम्पूर्ण उद्योग से नही होता है बल्कि किसी फर्म विशेष से होता है | फलत: ये बचते प्रत्येक तथा व्यवस्था आदि को श्रेष्ठता  के कारण होती है |

बाहय मितव्ययीताएँ (बाह्य बचते)

किसी फर्म की लागत केवल उसकी उत्पादन मात्रा पर ही निर्भर न होकर सम्पूर्ण उद्योग की उत्पादन मात्र के स्तर पर निर्भर करती है | बाह्य मितव्ययीताएँ वे है जो विभिन्न फर्मो को सम्पूर्ण उद्योग के विस्तार के कारन उपलब्ध होती है और ये किसी व्यक्तिगत फर्म के उत्पादन पैमाने के स्तर पर निर्भर नही होती है | दुसरे शब्दों में बाह्य मितव्ययीताएँ वे बचते है जो प्राय: समान रूप से किसी उद्योग की सभी फर्मो को उपलब्ध होती है | संक्षेप में बाह्य मितव्ययीताएँ की निम्न रूप से प्राप्त होती है |

बाह्य बचतों के प्रकार (TYPES OF EXTERNAL ECONOMIES)

  • केन्द्रीयकरण की बचते :- किसी स्थान विशेष पर जब बहुत – सी फर्मे केन्द्रित हो जाती है तो उन्हें इस केन्द्रीयकरण के परिणामस्वरूप अनेक लाभ प्राप्त होते है , जैसे कुशल श्रमिको की प्राप्ति का प्रशिक्षण आसान हो जाता है परिवहन व संचार सुविधाओ के विकास का लाभ मिलता है कच्चा माल व् विधुत शक्ति सुविधा से उपलब्ध हो जाती है वंहा अनेक वितीय संस्थाए खल जाती है जिससे चित दर पर वितीय सहायताए उपलब्ध हो जाती है इत्यादि |
  • सुचना एंव सन्देश सम्बन्धी लाभ (Economics of information) :- एक स्थान पर जब एक ही तरह की अनेक फर्मे कार्य करती है तो उनके लिए सयुंक्त रूप से व्यापारिक एंव तकनिकी पत्र पत्रिकाए प्रकाशित करना संभव होता है , जिनका लाभ प्रत्येक फर्म को प्राप्त होता है |
  • अनुसन्धान की बचते (Economics of research ) :- जब किसी छेत्र विशेष में अनेक फर्मे केन्द्रित हो जाती है तो यह संभव है की वे सयुंक्त रूप से एक केन्द्रीय अनुसन्धान संस्था की स्थापना क्र ले जो उद्योग में कार्य करने वाली फर्मो के लिए नवीं उत्पादन तकनीक की खोज करने में संग्लन रहती है इसकी खोजो का लाभ सभी फर्मो को मिलता है |
  • क्रियाओ के विखंडन (वियोजन) की बचते (Economies of Disintegration) :- जब किसी उद्योग का पर्याप्त विकास हो जाता है तब यह संभव होता है की उस उद्योग की कुछ प्रक्रियाओ को तोड़कर उनका सञ्चालन विशिष्ट फर्म अथवा फर्मो द्वारा किया जय तथा वे फर्मे जब उसमे विशिस्तीकरण प्राप्त क्र लेती है तो उसकी कुशलता बढती है तथा उनका लाभ उठ्योग की सभी फर्मो को प्राप्त होता है |

आंतरिक तथा बाह्य बचतों में सम्बन्ध (Relationship between internal and external Economies)

आंतरिक बचतों का सम्बन्ध एक फर्म विशेष के आकर तथा संगठन से होता है ये किसी फर्म विशेष को उसके आकर में वृधि तथा संगठन में सुधर के कारण प्राप्त होती है जबकि बाह्य बचते उद्योग के आकर तथा स्थानीयकरण पर निर्भर करती है तथा उद्योग में लगी सभी फर्मो को प्राप्त होती है बाह्य बचते आंतरिक बचतों से भिन्न होती है परन्तु व्यवहार में इन दोनों के मध्य एक स्पष्ट तथा निश्चित रेखा खीचना कठिन होता है क्योंकि एक फर्म के लिए जो आंतरिक बचत होती है व्ही दूसरी फर्म के लिए बाह्य बचत हो सकती है उदहारण के लिए एक पोलिस्टर का धागा बनाने वाली फर्म उत्पादन की मात्र में वर्धि करके आंतरिक बचते प्राप्त क्र सकती है इससे पोलिस्टर के धागे के मूल्य में स्वाभाविक कमी होती तथा जो फर्मे पोलिस्टर का सस्ता धागा खरीदेगी उनके लिए यह बाह्य बचत होगी |

बड़े पैमाने की अमितव्ययिताये (Diseconomies of large scale)

यदापि बड़े पैमाने पर उत्पादन करना लाभप्रद होता है परन्तु कोई भी फर्म असीमित रूप से अपने उत्पादन का पैमाना नही बाधा सकती क्योंकि उत्पति के पैमाने को बढ़ाते बढ़ते एक ऐसी सीमा भी आ जाती है की यदि पेमें को उससे अधिक बढाया जाये तो लाभ के बजाय हानि होने लगती है दुसरे शब्दों में यदि किसी फर्म का आकर अनुकूलतम सीमा के बाद भी बढाया जाता है तो उससे बचतों के स्थान पर अमितव्ययिताये होने लगती है |

अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन लगत वक्र (Short-run and long-run Cost Curves)

अल्पकाल का आशय – अल्पकाल से आशय उस समय अवधि से होता है जिसमे उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन केवल परिवर्तनशील साधनों की सहयता से ही किया जा सकता है तथा फर्म के स्थिर प्लांट की क्षमता या आकर में परिवर्तन संभव नही होता है | इसके अंतर्ग्रत उत्पादन के पास इतना समय होता है की वे उत्पादन की मात्र को अपनी उत्पादन क्षमता की सीमा तक कम या अधिक कर सकते है लेकिन उत्पादन क्षमता को परिवर्तन नही क्र सकते हयाई | अत: अल्पकाल में स्थिर प्लांट क्षमता के साथ परिवर्तनशील साधनों जैसे – कच्चा माल, श्रम, शक्ति आदि में परिवर्तन करके उत्पादन की मात्रा को बढाया जा सकता है |

दीर्घकाल में लागत उत्पादन मात्रा सम्बन्ध

दीर्घकाल में उत्पादन के सभी साधन परिवर्तान्शेल होते है इसमें फर्म अपने उत्पादन को किसी भी सीमा तक परिवर्तित कर सकती है उत्पादन को बढ़ने के लिए फर्म अपनी विधमान उत्पादन क्षमता का विस्तार क्र सकती है तथा न्य सयंत्र भी स्थापित क्र सकती है चूँकि इस कल में सभी लगते परिवर्तनशील होती है अत: दीर्घकाल में केवल औसत लगत तथा सीमांत लगत का ही महत्व रह जाता है दीर्घकालीन लगत वक्र भी अल्पकालीन लगत वक्रो की भांति U आकर वाले भी होते है , परन्तु इसकी आक्रति अपेक्षाक्रत चपटी होती है |

दीर्घकालीन औसत लागत वक्र

अल्पकाल में समय कम होने के कारण प्लांट में किसी प्रकार का परिवर्तन नही किया जा सकता जबकि दीर्घकाल में प्लांट में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है दीर्घकाल में एक फर्म अपनी आवश्यकतानुसार अनेक स्तरों पर उत्पादन क्र सकती है अत: एक फर्म द्वारा उत्पादन की मात्र में जितनी बार परिवर्तन किया जा सकता है उतनी ही बार उस फर्म एक फर्म के लिए नये अल्पकालीन लगत वक्र प्राप्त होगे |

बाजार, बाजार मूल्य एंव सामान्य मूल्य  (Market , market price and normal price)

सामान्य बोल-चाल की भाषा में बाजार का अर्थ उस स्थान से लगाया जाता है जहाँ वस्तुओ के क्रेता और विक्रेता एक साथ एकत्रित होकर वस्तुओ और सेवाओ का क्रय-विक्रय करते है दुसरे शब्दों में एक ऐसा स्थान, जहाँ वस्तु के क्रेता एंव विक्रेता भौतिक रूप में उपस्थित होकर वस्तुओ का आदान प्रदान करते है बाजार कहलाता है किन्तु अर्थशास्त्र में बाजार से आशय किसी स्थान विशेष से नही बल्कि उस सम्पूर्ण छेत्र से होता है जहाँ वस्तु विशेष के करतो तथा विक्रेताओ में प्रतिस्पर्धात्मक सम्बन्ध हो तथा सम्पूर्ण छेत्र में सामान्यत: वस्तु की एक ही कीमत पाए जाने की परवर्ती रहती है आधुनिक युग में वस्तुओ और सेवाओ का क्रय-विक्रय  टेलीफोन अथवा अन्य संचार माध्यमो से भी सम्पन्न किया जाता है इस पारकर बाजार का सम्बन्ध किसी स्थान विशेष से होना अनिवार्य नही |

सामान्यत: वस्तु के क्रय विक्रय में क्रेता और विक्रेता के मद्य सौदेबाजी का एक संघर्ष जारी रहता है और वस्तुओ का आदान प्रदान तब तक सम्भव नही हो पता जब तक क्रेता और विक्रेता दोनों एक कीमत स्वीकार करने को तैयार नही हो जाते है |

बाजार की परिभाषाये (Definitions of market)

विभिन्न अर्थशास्त्रियो ने बाजार को भिन्न भिन्न रूप में परिभाषित किया है |

  1. प्रो० जेवन्स के अनुसार ,”बाजार शब्द का इस प्रकार सामान्यीकरण किया गया है की इसका आशय व्यक्तियों के उस समूह से लिया जाता है जिनका परस्पर व्यापारिक घनिष्ठ सम्बन्ध हो और जो वस्तु के बहुत से सौदे करे|
  2. प्रो० कुर्नो के अनुसार ,“बाजार शब्द से अर्थशास्त्रियो का तात्पर्य किसी विशेष स्थान से नही होता जहाँ वस्तुओ की खरीदी और बेचीं जाती है बल्कि वह सम्पूर्ण छेत्र जिसमे क्रेताओ और विक्रेताओ के बिच स्वतंत्र प्रतियोगिता इस प्रकार हो की सामान वस्तुओ की कीमते सम्पूर्ण छेत्र में सामान होने की परवर्ती रखती हो | ”

बाजार की प्रमुख विसेश्तायें (Main Characteristics of market )

बाजार की प्रमुख विसेश्ताये निम्नलिखित है |

  1. एक छेत्र (An area)- बाजार का अर्थ किसी स्थान विशेष से नही होता बल्कि उस सम्पूर्ण छेत्र से होता है जहाँ वस्तु के क्रेता तथा विक्रेता फैले रहते है |
  2. क्रेता तथा विक्रेताओ की उपस्थिति (Presence of Buyers and Sellers) – बाजार के लिए करतो तथा विक्रेताओ का होना आवश्यक होता है किसी एक के आभाव में बाजार की कल्पना नही की जा सकती |
  3. एक वस्तु (Particular commodity) – अर्थशास्त्र में बाजार का सम्बन्ध सदैव किसी एक वस्तु विशेष से ही होता है अत: प्रत्येक वस्तु के लिए एक प्र्थ्हक बाजार होता है
  4. प्रतियोगिता (Competition) – बाजार में करतो तथा विक्रेताओ के बीच स्वतंत्र प्रतियोगिता पी जाती है

 

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