Bcom 2nd Year Public Finance Taxation Meaning Cannons And Classification

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Bcom 2nd Year Public Finance Taxation Meaning Cannons And Classification

 

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Bcom 2nd Year Public Finance Taxation Meaning Cannons And Classification
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करारोपण : अर्थ, सिद्धान्त एवं वर्गीकरण (Taxation: Meaning, Canons and Classification)

प्रश्न 13, कर को परिभाषित कीजिये। करारोपण के उद्देश्य तथा सिद्धान्तों को स्पष्ट कीजिये।

अथवा

एडम स्मिथ के करारोपण के सिद्धान्त बताइये। अन्य द्वारा इनमें और कौन-से सिद्धान्त जोड़े गये हैं?

(Avadh, 2007)

अथवा

करारोपण के विचार इसके विभिन्न सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

(Garhwal, 2007)

उत्तर- आधुनिक युग में कर सार्वजनिक आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। करमुद्रा के रूप में एक अनिवार्य अंशदान है जो नागरिकों के सामान्य हित और कल्याण के लिए व्यय करने के उद्देश्य से सरकार नागरिकों से वसूल करती है।”

कर की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

(i) प्रो० फिण्डले शिराज के अनुसार, “कर सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा वसूल किया जाने वाला वह अनिवार्य भुगतान है जो सार्वजनिक हित के लिए व्यय को पूरा

करने के लिए लिया जाता है।”

(ii) प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, कर जनता द्वारा सरकार को दिया जाने वाला एक अनिवार्य अंशदान है जो सामान्य जनता के हित पर व्यय करने हेतु लगाया जाता है और किसी को विशेष लाभ प्रदान नहीं किए जाते ॥”

(iii) प्रो० टॉजिग के अनुसार, “कर तथा भुगतानों के बीच मुख्य अन्तर यह है कि करदाता और सार्वजनिक अधिकारी के बीच में कोई प्रत्यक्ष ‘जैसे को तैसा’ का सम्बन्ध नहीं होता।”

(iv) डाल्टन के अनुसार, “कर सार्वजनिक सत्ता द्वारा लगाया गया एक अनिवार्य अंशदान है, चाहे उसके बदले में करदाता को उतनी सेवाएं प्रदान की जाएँ अथवा नहीं और इसे किसी कानूनी सजा के रूप में नहीं लगाया जाता है।”

(v) डी० मार्को के अनुसार, “कर नागरिकों की आय का वह भाग होता है जो सरकार सामान्य जनोपयोगी सेवाओं को चलाने के लिए अनिवार्य रूप से प्राप्त करती है।’

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कर की प्रमुख विशेषताएँ (Characteristic Features of a Tax)

कर की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कर एक अनिवार्य भुगतान हैकर एक अनिवार्य भुगतान है, चाहे इससे भुगतान करने वाले व्यक्ति को कोई लाभ प्राप्त हो या न हो। कोई भी नागरिक कर देने से इन्कार नहीं कर सकता और न ही कर की चोरी कर सकता है। कर की चोरी दण्डनीय अपराध है और ऐसा करने पर नागरिकों को दण्ड दिया जाता है।

(2) कर के बदले विशेष लाभ प्राप्त नहीं होता- कर का सरकारी व्यय से प्राप्त लाभ से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता। करदाता सरकार से कर के अनुपात में कोई लाभ प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है।

(3) कर-आय का सामान्य हित में उपयोग होता है- राज्य को कर के रूप में जो आय प्राप्त होती है, वह किसी एक वर्ग विशेष पर व्यय न की जाकर सार्वजनिक हित में व्यय की जाती है, किन्तु इसमें यह आवश्यक नहीं है कि जिस व्यक्ति या जिस वर्ग से आय प्राप्त की जाए उस व्यक्ति या उस वर्ग पर उसे व्यय कर दिया जाए। व्यय करते समय सरकार दारा निजी-हित की अपेक्षा सार्वजनिक-हित का ध्यान रखा जाता है।

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करारोपण के उद्देश्य (Objectives of Taxation)

प्राचीन काल में कर केवल सार्वजनिक व्ययों की पूर्ति करने के उद्देश्य से ही लगाये जाते थे परन्तु आजकल करारोपण का प्रमुख उद्देश्य आय प्राप्त करना ही नहीं वरन् अर्थव्यवस्था में समानता लाने तथा धन के वितरण को न्यायपूर्ण बनाने के उद्देश्य से भी कर लगाये जाते हैं। करारोपण के प्रमुख उद्देश्य निम्न प्रकार हैं –

(1) आय प्राप्त करनावर्तमान समय में करारोपण के अनेक उद्देश्य हैं, परन्तु करारोपण का मुख्य उद्देश्य आय प्राप्त करना ही है। कर अन्य स्रोतों की अपेक्षा काफी लोचपूर्ण होते हैं। जितनी आसानी से सरकार करों से आय प्राप्त कर लेती है, उतनी आसानी से अन्य स्रोतों से आय प्राप्त नहीं की जा सकती है।

(2) नियमन व नियन्त्रण करना- वर्तमान समय में करारोपण का प्रयोग आर्थिक स्थायित्व लाने व मादक पदार्थों के उपभोग को रोकने के लिये किया जाता है। जब देश में नशीली वस्तुओं का उपभोग व उत्पादन बढ़ने लगता है तब इन वस्तुओं पर ऊँची दर से कर लगा कर इनके उपभोग व उत्पादन में कमी की जाती है। आय की असमानता को दूर करने के लिये भी ऊँची आय वाले व्यक्तियों पर ऊँची दर से कर लगाये जाते हैं। यदि देश में आयात बढ़ें और निर्यात घटें तो भी करों की सहायता से विदेशी व्यापार को अपने पक्ष में कर लिया जाता है।

(3) आय के वितरण की असमानताओं को कम करना- न्यायोचित वितरण-व्यवस्था का अभिप्राय आय की असमानता को दूर करना है। युद्धकाल में उद्योगपतियों व व्यापारियों को मनमाना लाभ मिलने लगता है। इस प्रकार का लाभ आर्थिक असमानता को बढ़ा देता है। इसलिये ऐसी स्थिति में ऊँचे कर लगाकर आय में समानता लायी जा सकती है।

(4) राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना- करों से उत्पादन व राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के लिये, कर लगाने से पूर्व व्यक्ति जितना उत्पादन व आय प्राप्त कर रहा था, करों के लगने के बाद भी वह उतना ही उत्पादन व आय अपने पास रखना चाहता है, ताकि उसका आर्थिक स्तर पूर्ववत् बना रहे। परन्तु यह तभी सम्भव होगा, जब व्यक्तियों की कार्य करने व बचत करने की इच्छा तीव्र होती है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि के सन्दर्भ में दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि करों से सरकार आय प्राप्त करती है और इस आय को आर्थिक विकास के कार्यक्रमों में व्यय करके राष्ट्रीय आय बढ़ायी जा सकती है। विकासशील देशों में, जहाँ आर्थिक नियोजन को आर्थिक विकास का प्रमुख यन्त्र मान लिया गया है, वहीं आर्थिक विकास के लिये करों का महत्त्व कई गुना अधिक बढ़ गया है।

(5) मुद्रा-प्रसार पर नियन्त्रण-मुद्रा-प्रसार में मुद्रा का चलन- वेग बढ़ जाता है। लोगों की क्रय-शक्ति तो बढ़ती है परन्तु मुद्रा की क्रय-शक्ति घटती है। समाज का एक वर्ग लाभ कमाता है तो दूसरा वर्ग हानि सहन करता है। इस प्रकार की दुर्व्यवस्था की रोकथाम कुछ हद तक करों के द्वारा की जा सकती है। मुद्रा के अतिरिक्त चलन-वेग को प्रगतिशील कर-प्रणाली द्वारा रोका जा सकता है। ऐसी दशा में प्रत्यक्ष कर-प्रणाली उपयुक्त होती है।

करारोपण के सिद्धान्त (Canons of Taxation)

करारोपण के सिद्धान्तों से हमारा आशय उन विशेषताओं से है जो एक अच्छे कर में निहित होनी चाहिएँ, ये एक अच्छे कर के गुण हैं। इनका सम्बन्ध कर लगाने की नीति एवं संकलन से है। ये ही कर की दरों तथा राशियों का निर्देशन करते हैं।

एडम स्मिथ प्रथम अर्थशास्त्री थे जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘Wealth of Nations’ में करारोपण के चार सिद्धान्तों (परिनियमों) का प्रतिपादन किया। ये सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

(1) समानता का सिद्धान्त (Canon of Equity)- अपने इस सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए एडम स्मिथ ने कहा है, “प्रत्येक राज्य की जनता को सरकार के कार्य संचालन हेतु अपनी योग्यतानुसार अंशदान करना चाहिए, अर्थात् उस आय के अनुपात में जिसका उपभोगवे राज्य के संरक्षण में करते हैं।”

            वाकर का विचार है कि एडम स्मिथ का समानता से अभिप्राय आनुपातिक कर प्रणाली से था, किन्तु सैलिगमैन के अनुसार एडम स्मिथ का समानता से अभिप्राय प्रगतिशील कर-प्रणाली (Progressive Taxation System) से था। फिण्डले शिराज के अनुसार, “वित्तीय इतिहास में भिन्न-भिन्न समयों पर समता का अर्थ बदलता रहा है।” परन्तु अब इस बात को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि ‘कर देने की योग्यता का अर्थ प्रगतिशील-कर से है।’ एडम स्मिथ ने बाद में स्वयं स्वीकार किया है, “यह अत्यधिक उचित है कि धनिकों को सार्वजनिक व्यय के हेतु केवल अपनी आयों के अनुपात में ही अंशदान नहीं करना चाहिए, वरन् उस अनुपात से कुछ अधिक करना चाहिए।”

(2) निश्चितता का सिद्धान्त (Canon of Certainty)- इस सिद्धान्त के अनुसार, “प्रत्येक व्यक्ति को जो कर देना है वह निश्चित होना चाहिए-मनमाना नहीं। भुगतान का समय, भुगतान की विधि, भुगतान की राशि करदाता को तथा अन्य प्रत्येक व्यक्ति को स्पष्ट होनी चाहिए।” आगे स्मिथ के अनुसार, “कर के मामले में किसी व्यक्ति को जो रकम अदा करनी है उसकी निश्चितता इतने महत्त्व की बात है कि समस्त देशों के अनुभव के आधार पर मेरा विचार है कि काफी मात्रा की असमानता भी इतनी भयानक नहीं है जितनी कि बहुत थोड़ी मात्रा में अनिश्चितता।”

कर की निश्चितता करदाता और राज्य दोनों के लिए ही लाभप्रद होती है। इससे करदाता को यह ज्ञान होता है कि उसे कब और कितनी राशि कर के रूप में देनी है। अत: वह अपना व्यय उसी के अनुसार समायोजित कर सकता है। राज्य को यह पता होता है उसे कब और कितनी आय प्राप्त होगी। अतः राज्य अपने बजट का अनुमान निश्चिततापूर्वक कर सकता है।

(3) सुविधा का सिद्धान्त (Canon of Convenience)- एडम स्मिथ के अनुसार, “प्रत्येक कर ऐसे समय पर तथा इस प्रकार लगाया जाना चाहिए कि उसका भुगतान करना करदाता के लिए अधिक से अधिक सुविधाजनक हो।” दसरे शब्दों में, कर के भुगतान का समय तथा कर के भुगतान की विधि करदाताओं की सुविधा के अनुसार होना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसान से लगान की वसूली फसल काटने के समय, आयकर का वसली वेतन मिलने के समय अथवा बिक्री कर की वसूली वस्तुओं की बिक्री के समय का जानी चाहिए।

(4) मितव्ययिता का सिद्धान्त (Canon of Economy)- इस सिद्धान्त के अनुसार कर प्रणाली मितव्ययितापूर्ण होनी चाहिए अर्थात् कर वसूल करने में कम से कम व्यय होना चाहिए। एडम स्मिथ के अनुसार, “प्रत्येक कर इस प्रकार लगाया जाना चाहिए कि लोगों

की जेब से सरकारी खजाने में जानी वाली रकम के अतिरिक्त कम से कम राशि निकाली जाए।” प्रो० जे० के० मेहता के अनुसार, “करारोपण एक प्रकार से उत्पादन कार्य है। अतएव उत्पादन कार्य में यथासम्भव मितव्ययिता बरती जानी चाहिए।” डॉ० डाल्टन के अनुसार, “सर्वोत्तम कर प्रणाली वह है जिसके अन्तर्गत कर वसूल करने की लागत संग्रहीत आय के अनुपात में न्यूनतम हो।”

इस दृष्टि से कर लगाते व संग्रह करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए |

(i) कर संग्रह करने की प्रशासनिक लागत कम से कम आए। (ii) करारोपण का उद्योग व व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। (iii) कर इतने भारी न हों कि कर वंचन को प्रोत्साहन मिले। (iv) कर-पद्धति सरल होनी चाहिए।

करारोपण के अन्य सिद्धान्त-एडम स्मिथ द्वारा प्रतिपादित उपरोक्त चार सिद्धान्तों के अतिरिक्त कुछ अन्य सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन किया गया है। ये सिद्धान्त निम्नलिखित

(5) उत्पादकता का सिद्धान्त (Canon of Productivity)- इस सिद्धान्त का प्रतिपादन बेस्टेबेल ने किया। उनके अनुसार कराधान को उत्पादक होना चाहिए। कर की उत्पादकता दो प्रकार से प्राप्त की जा सकती है—प्रथम, कर ऐसा होना चाहिए कि जो सरकार को संचालन के लिए यथेष्ठ मात्रा में धन दे सके तथा दूसरे, कर ऐसा होना चाहिए जो उत्पादन को हतोत्साहित न करे।

(6) लोच का सिद्धान्त (Canon of Elasticity)- कर-प्रणाली के लोचदार होने से आशय यह है कि करों से प्राप्त होने वाली आय को आवश्यकतानुसार घटाया बढ़ाया या सके। सरकार को अकाल, बाढ़, युद्ध या अन्य किसी संकट का सामना करने के लिए अधिक धन की आवश्यकता हो सकती है। यदि कर-प्रणाली लोचदार है तो कर दरों में थोड़ा हेर-फेर करके पर्याप्त धनराशि इकट्ठा की जा सकती है। आय कर एक लोचपूर्ण कर है, जबकि वस्तु कर, सम्पत्ति कर तथा मालगुजारी में लोच नहीं है।

(7) विविधता का सिद्धान्त (Canon of Diversity)- कर प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिसमें हर प्रकार के कर हों, ताकि देश का प्रत्येक नागरिक योगदान कर सके। इस दृष्टि से प्रत्यक्ष तथा परोक्ष करों का ठीक ढंग से विभाजन होना चाहिए और उचित वस्तुओं पर कर लगाया जाना चाहिए। वस्तुतः कराधान के भार को सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर विस्तृत रूप से फैला दिया जाना चाहिए, परन्तु यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ऐसा करने से उत्पादकता तथा मितव्ययिता के प्रयासों को ठेस न पहुँचे। प्रो० आर्थर यंग के अनुसार, “यदि मुझसे एक अच्छी कर-पद्धति की व्याख्या करने को कहा जाए तो मै कहूँगा कि अच्छी कर पद्धत वह है जो लोगों की अपरिमित संख्या पर बहुत हल्का दबाव डाले और भारी दबाव किसी पर भी नहीं।”

(8) सरलता का सिद्धान्त (Canon of Simplicity)- कर ऐसा होना चाहिए कि करदाता उसे आसानी से समझ सके। दूसरे शब्दों में, कर की प्रकृति, उसका उद्देश्य, भुगतान

का समय, कर-निर्धारण का तरीका और आधार आदि सभी ऐसे होने चाहिएँ कि प्रत्येक करदाता उसको आसानी से समझ सके तथा पालन कर सके।

(9) उपयुक्तता का सिद्धान्त (Canon of Expediency)- कर लगाने की सम्भावना तथा समयोचितता पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया जाना चाहिए और यह देखा जाना चाहिए कि करदाता पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। केवल वही कर लगाए जाने चाहिएँ जो उचित तथा वांछनीय हों। लोकतन्त्रीय देशों में यह सिद्धान्त बड़ा महत्त्वपूर्ण है|

(10) समन्वय का सिद्धान्त (Canon of Co-ordination)- कर-प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि करदाता को एक ही वस्तु पर अनेक स्थानों पर तथा अनेक बार कर न चुकाना पड़े। इसके लिए देश के विभिन्न राज्यों, पंचायतों अथवा नगरपालिकाओं की कर-नीतियों में समन्वय स्थापित किया जाए और कर-वसूली अन्तिम उपभोक्ता-स्तर पर की जाए।

प्रश्न 14, करकी परिभाषा दीजिए तथा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के सापेक्षिक गुणों एवं दोषों की विवेचना कीजिए।

(Meerut, 2010 and 2006)

अथवा

एक न्यायपूर्ण एवं पर्याप्त कर प्रणाली के निर्माण हेतु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के करों की आवश्यकता है।” इस कथन की विवेचना करारोपण नीति के प्रमुख उद्देश्यों के सन्दर्भ में कीजिए।

अथवा

“प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर दोनों ही एक अच्छी कर प्रणाली के लिए आवश्यक हैं।व्याख्या करो।

(Avadh, 2008)

अथवा

कर की परिभाषा दीजिए। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में अन्तर बताइए।

(Meerut, 2009 BP)

 

कर का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Tax)

वर्तमान समय में ‘कर’ सार्वजनिक आय का एक प्रमुख साधन है। सरल शब्दों में, ‘कर’ मुद्रा के रूप में एक अनिवार्य अंशदन है जो नागरिकों के सामान्य हित एवं कल्याण के लिए सरकार द्वारा नागरिकों से वसूल किया जाता है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा कर को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया जाता है। इनमें से कुछ मुख्य परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं-

(1) प्लेहन (Plehn) के अनुसार, “कर सामान्यत: धन के रूप में दिया गया वह अनिवार्य अंशदान है जो राज्य के निवासियों को सामान्य लाभ पहुँचाने के लिए किये गये व्ययों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक अथवा समामेलित व्यक्तियों से लिया जाता है।”

(2) सैलिगमैन (Seligman) के अनुसार, “कर एक व्यक्ति से उन व्ययों को पूरा करने के लिए सरकार को एक अंशदान है, जो सामान्य हित में किये जाते हैं तथा जिनका सम्बन्ध कोई विशेष लाभ प्राप्त करने से नहीं होता।”

(3) डाल्टन (Dalton) के अनुसार, ‘कर एक अनिवार्य अंशदान है जो किसी सरकार द्वारा लगाया जाता है और जिसका करदाता को बदले में प्राप्त होने वाली सेवाओं की मात्रा से कोई सम्बन्ध नहीं होता।”

संक्षेप में, कर समाज के व्यक्तियों (प्राकृतिक एवं समामेलित दोनों) द्वारा राज्य को प्रदत्त एक अनिवार्य अंशदान है जिसकी आय जनसाधारण के हित में प्रयोग की जाती है तथा जिसके बदले में करदाता को किसी निश्चित सेवा या सुविधा का कोई प्रत्यक्ष आश्वासन नहीं दिया जाता।

कर की विशेषताएँ (Characteristics of Tax)

(1) कर एक अनिवार्य भुगतान है,

(2) कर एक व्यक्तिगत उत्तरदायित्व है,

(3) करों से प्राप्त आय सबके हित में व्यय की जाती है,

(4) कर और राज्य द्वारा प्रदान की गई सेवाओं में कोई सम्बन्ध नहीं होता।

प्रत्यक्ष कर (Direct Tax)

प्रत्यक्ष कर उन करों को कहा जाता है जिनका भुगतान एक ही बार में कर दिया जाता है तथा वही व्यक्ति उनका भुगतान करता है जिस पर वह कर लगाया जाता है अर्थात् ऐसे करों के भार को दूसरों पर नहीं टाला जा सकता। इस प्रकार प्रत्यक्ष करों में कर का दबाव एवं भार (कराघात और करापात) एक ही व्यक्ति पर पड़ता है। आयकर एवं धनकर इस प्रकार के कर के प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रत्यक्ष कर से सम्बन्धित मुख्य परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

डाल्टन के अनुसार, ‘प्रत्यक्ष कर वह कर है जिसका भुगतान वास्तव में उसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है जिसके ऊपर यह करारोपित किया जाता है।”

जे० एस० मिल के अनुसार, “प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जिनका भार उन्हीं व्यक्तियों पर पड़ता है जिन पर यह कर लगाया जाता है।”

फिण्डले शिराज के अनुसार, “प्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं जो सीधे अथवा प्रत्यक्षतः लोगों की सम्पत्ति अथवा आय पर लगाये जाते हैं एवं जिनका भुगतान उपभोक्ताओं द्वारा सीधा सरकार को किया जाता है।” जैसे आयकर, धनकर, मृत्युकर आदि।

संक्षेप में जिस कर के भुगतान में कर भार तथा कर दायित्व एक ही व्यक्ति पर पड़े, उसे प्रत्यक्ष कर कहा जाता है।

प्रत्यक्ष करों के गुण या लाभ (Merits of Direct Taxes)

प्रत्यक्ष करों के मुख्य गुण इस प्रकार हैं-

(1) न्यायपूर्ण- प्रत्यक्ष कर न्यायपूर्ण होते हैं क्योंकि ये कर प्रगतिशील होते हैं और जनता पर उनकी कर देय क्षमता के अनुसार लगाये जाते हैं।

(2) उत्पादकता- इन करों में उत्पादकता का गुण होता है, क्योंकि देश में आय और सम्पत्ति में वृद्धि होने के साथ ही इन करों से प्राप्त होने वाली आय में भी वृद्धि हो जाती है।

(3) निश्चितता- इन करों में करदाताओं के लिए पहले से ही निश्चित होता है कि उन्हें कब, किस प्रकार और किस दर से कर देना है ?

(4) लोचपूर्ण- इन करों में लोचता भी पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है और आवश्यकतानुसार करों की दरों में परिवर्तन करके कर आय में परिवर्तन किया जा सकता है।

(5) मितव्ययिता- इन करों में सरकार और करदाता के मध्य प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहने से कर संग्रहण में मितव्ययिता रहती है। वस्तुतः प्रत्यक्ष करों का भुगतान करदाता के द्वारा सीधे सरकार को किया जाता है, इसलिए करों की वसूली में बहुत कम खर्च होता है।

(6) सामाजिक जागरुकता एवं शैक्षिक मूल्य- ऐसे करों का भार उसी व्यक्ति पर पड़ता है जो उनका भुगतान करता है, अत: उसके मन में सामाजिक जागरुकता बढ़ती है और वह इस बात में रुचि लेता है कि सरकार कर प्राप्ति की राशि का प्रयोग किस प्रकार करती

(7) आर्थिक विषमताओं को कम करने में सहायक- प्रत्यक्ष करों से यह लाभ भी मिलता है कि आय और सम्पत्ति पर प्रगतिशील दरों से कर लगाकर देश में आय और सम्पत्ति के वितरण में असमानताओं को कम किया जा सकता है।

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प्रत्यक्ष करों के दोष (Demerits of Direct Taxes)

(1) असुविधाजनक- इन करों में करदाताओं को अधिक असुविधा होती है। उन्हें अपनी आय और सम्पत्ति का पूरा हिसाब रखना पड़ता है, कर अधिकारियों से निरीक्षण कराना होता है तथा कर निर्धारण के लिए कर अधिकारियों तक जाना पड़ता है।

(2) करों की चोरी- प्रत्यक्ष करों में करदाता आय और सम्पत्ति के झूठे विवरण दिखाकर करों की चोरी कर सकता है। यदि करों की दर प्रगतिशील होती है तो करों की चोरी को और अधिक प्रोत्साहन मिलता है।

(3) सभी वर्गों का योगदान न रहना- प्रत्यक्ष करों से सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं और सुविधाओं के लिए देश के सभी वर्गों का योग शन प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये कर एक निश्चित सीमा से अधिक आय या सम्पत्ति पर ही लगाये जाते हैं।

(4) बचत और विनियोग पर प्रतिकूल प्रभाव- प्रत्यक्ष कर बचत एवं विनियोग को हतोत्साहित करते हैं क्योंकि सामान्यत: प्रत्यक्ष करों का भार उसी वर्ग पर पड़ता है जो बचत और विनियोग कर सकते हैं।

(5) विरोध- प्राय: इन करों को चुकाने में कष्ट होता है क्योंकि इन करों के भार को दसरे व्यक्तियों पर नहीं टाला जा सकता। ऐसे करों में मामूली सी वृद्धि भी करदाताओं को तरन्त खलने लगती है, अतः ऐसे करों का विरोध होना स्वाभाविक है।

(6) करों की मनमानी दर- सरकार द्वारा प्रत्यक्ष करों की जो दरें निर्धारित की जाता मैं उनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। एक निश्चित मात्रा में सम्पत्ति और निश्चित आय के नीचे सब व्यक्तियों को कर में छूट दे दी जाती है तथा यह सीमा भी प्रत्येक वार्षिक बजट में परिवर्तित कर दी जाती है। इसके पीछे कोई डोस आधार नहीं होता है।

(7) केवल प्रत्यक्ष करों से पर्याप्त आय प्राप्त नहीं होती- सरकार अपनी आय के लिए केवल प्रत्यक्ष करों पर निर्भर नहीं रह सकती,क्योंकि इनसे पर्याप्त आय प्राप्त नहीं होती।

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अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax)

अप्रत्यक्ष कर उन करों को कहते हैं जिनका भुगतान करने वाला व्यक्ति उनके भार को दूसरे व्यक्तियों पर डाल देता है। व्यापार कर, बिक्री एवं उत्पादन कर आदि अप्रत्यक्ष करों के प्रमुख उदाहरण हैं। ऐसे करों के सम्बन्ध में हम देखते हैं कि करदाता कर की रकम को वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य में जोड़कर कर के भार को उपभोक्ताओं पर डाल देता है। अत: वस्तुओं और सेवाओं पर लगाये गये कर अप्रत्यक्ष कर होते हैं।

अप्रत्यक्ष करों के सम्बन्ध में मुख्य परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

डाल्टन के अनुसार, “अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो लगाया किसी और पर जाता है और भुगतान कोई और करता है।”

जे० एस० मिल के अनुसार, “अप्रत्यक्ष कर वह कर है जिसे भुगतान करने वाला व्यक्ति दूसरों पर पूर्णतया या आंशिक रूप से टाल देता है।”

संक्षेप में, अप्रत्यक्ष करों में कराघात और करापात भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर पड़ता है।

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अप्रत्यक्ष करों के गुण या लाभ (Merits of Indirect Taxes)

(1) सुविधाजनक- अप्रत्यक्ष करों का भुगतान करदाताओं के लिए अधिक सुविधाजनक होता है क्योंकि इनका भुगतान वस्तु या सेवाओं को क्रय करते समय या उपभोग करते समय ही कर दिया जाता है। इससे कर का भार उन्हें महसूस नहीं हो पाता।

(2) न्यायपूर्ण- अप्रत्यक्ष कर सभी वर्ग के व्यक्तियों को उपभोग के अनुपात में देना पड़ता है। जो व्यक्ति जितना अधिक उपभोग करता है उसे उतना ही अधिक कर देना पड़ता है। इस प्रकार यह कर न्यायपूर्ण होता है।

(3) कर से बचना कठिन- प्रत्यक्ष कर से बचने की कम सम्भावना रहती है क्योंकि इसका सम्बन्ध वस्तु या सेवा के उपयोग अथवा उपभोग से होता है। अतः जो भी व्यक्ति वस्तु या सेवा का क्रय या उपभोग करेगा उसे कर का भुगतान करना ही पड़ेगा।

(4) लोचपूर्ण- अप्रत्यक्ष करों को लोचपूर्ण भी बनाया जा सकता है। अप्रत्यक्ष कर की दर में थोड़ा सा परिवर्तन करके राजकीय आय में पर्याप्त वृद्धि या कमी की जा सकती है।

(5) सामाजिक कल्याण के अनुरूप- इन करों से सामाजिक कल्याण में वृद्धि होती, है क्योंकि ऐसी वस्तुओं पर जिनके उपयोग से सामाजिक कल्याण में कमी होती है, करों की मात्रा में वृद्धि कर उनके उपभोग को हतोत्साहित किया जा सकता है। यही कारण है कि शराब, सिगरेट, भांग, अफीम आदि हानिकारक एवं नशीली वस्तुओं पर ऊँचा कर लगाया जाता है।

(6) विकासशील देशों में विशिष्ट महत्व- विकासशील देशों में इन करों का विशिष्ट महत्व होता है क्योंकि आय का स्तर नीचा होने के कारण प्रत्यक्ष करों से पर्याप्त आय सम्भव नहीं हो पाती। दूसरे, उपभोग को नियन्त्रित करने तथा पूँजी निर्माण को प्रोत्साहित करने में अप्रत्यक्ष कर विशेष सहायक होता है।

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अप्रत्यक्ष करों के दोष (Demerits of Indirect Taxes)

(1) अनिश्चितता- अप्रत्यक्ष करों से होने वाली आय अनिश्चित होती है अर्थात् इनसे हो सकने वाली आय का सही अनुमान लगाना कठिन होता है, क्योंकि वस्तु की माँग का पहले से ही अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

(2) अमितव्ययी- अप्रत्यक्ष कर अमितव्ययी होते हैं क्योंकि इनका संग्रहण व्यय अपेक्षाकृत अधिक होता है।

(3) समानता तथा कर- दान योग्यता सिद्धान्त पर आधारित नहीं-अप्रत्यक्ष कर सामान्यतः जीवनोपयोगी तथा उपभोग एवं विलास की वस्तुओं पर ही लगाया जाता है। निर्धन व्यक्ति अपनी आय को आवश्यक जीवनोपयोगी वस्तुओं पर ही व्यय करता है। फलस्वरूप कर-भार भी निर्धन व्यक्ति पर ही अधिक पड़ता है। अत: यह कहा जा सकता है कि अप्रत्यक्ष कर समानता या न्याय का खंडन करता है।

(4) आर्थिक व सामाजिक दोष- अप्रत्यक्ष करों से वस्तुओं के मूल्य बढ़ जाते हैं। मूल्य बढ़ने से उन वस्तुओं की माँग कम हो जाती है जिससे उत्पादन गिर जाता है और बेरोजगारी बढ़ जाती है।

(5) नागरिक चेतना का अभाव- अप्रत्यक्ष करों में उपभोक्ता यह नहीं जान पाते कि करों का भुगतान कर रहे हैं और कितनी मात्रा में कर रहे हैं क्योंकि अप्रत्यक्ष करों को वस्तुओं एवं सेवाओं के बिक्री मूल्य में शामिल कर लिया जाता है। इसके अतिरिक्त ऐसे करों की राशि बहुत छोटी होती है, अतः करदाताओं में यह नागरिक चेतना पैदा नहीं हो पाती कि उनके द्वारा भुगतान की गई करों की राशि को सरकार द्वारा किस प्रकार व्यय किया जा रहा है।

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प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों के सापेक्षिक गुण-दोष

 (1) साधनों का आबंटन- साधनों के आबंटन सम्बन्धी प्रभावों की दृष्टि से प्रत्यक्ष करों को अप्रत्यक्ष करों की अपेक्षा अच्छा माना जाता है। यदि किसी निश्चित राशि का संग्रह अप्रत्यक्ष करों की सहायता से किया जाता है तो तुलनात्मक रूप से समाज पर उसका भार अधिक पड़ेगा क्योंकि अप्रत्यक्ष करों का भार प्राय: मध्यम एवं निम्न वर्ग पर अधिक पड़ता है जबकि प्रत्यक्ष कर आय तथा सम्पत्ति पर लगाये जाते हैं जिनका भार धनी वर्ग पर अधिक पड़ता है।

(2) धन के वितरण की असमानता की कमी- यद्यपि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दाना प्रकार के करों के द्वारा धन और सम्पत्ति के वितरण में असमानता को कम किया जा सकता है लेकिन इस दृष्टि से प्रत्यक्ष कर अधिक सक्षम और प्रभावशाली होते हैं।

(3) कर प्रशासन- कर प्रशासन की दृष्टि से प्रत्यक्ष करों की तुलना में अप्रत्यक्ष करा अच्छा माना जाता है, क्योंकि अप्रत्यक्ष करों को आसानी से और अधिक मात्रा में एकात्रत किया जा सकता है। कुछ विचारकों का यह मत भी है कि अप्रत्यक्ष करों में प्रत्यक्ष करों की तुलना में कर चोरी कम होती है।

(4) न्यायशीलता- प्रत्यक्ष कर प्रायः करदेय योग्यता के सिद्धान्त के आधार पर लगाये जाते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष करों मे इस सिद्धान्त का पूरी तरह से पालन नहीं हो पाता। इस प्रकार प्रत्यक्ष कर अधिक न्यायशील होते हैं।

(5) मूल्य वृद्धि पर प्रभाव- अप्रत्यक्ष करों से मूल्य में वृद्धि होती है, लेकिन प्रत्यक्ष करों से मूल्यों में वृद्धि नहीं होती है।

(6) निश्चितता- अप्रत्यक्ष करों की तुलना में प्रत्यक्ष करों में निश्चितता का गुण अधिक पाया जाता है।

(7) नागरिकता की भावना- प्रत्यक्ष कर जनता में नागरिकता की भावना उत्पन्न करते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष करों से नागरिकता की भावना का उतना विकास नहीं हो होता।

(8) मितव्ययिता- अप्रत्यक्ष करों की तुलना में प्रत्यक्ष करों में मितव्ययिता (economy) का गुण अधिक पाया जाता है।

(9) विस्तृत आधार- प्रत्यक्ष करों की तुलना में अप्रत्यक्ष कर अधिक विस्तृत होते हैं। प्रत्यक्ष कर केवल अधिक आय या सम्पत्ति वालों पर ही लगाये जाते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष करों द्वारा राजस्व में समाज के सभी वर्गों का योगदान प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर-दोनों एक-दूसरे के पूरक

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष करों का भार मुख्य रूप से धनी व्यक्तियों पर , पड़ता है और अप्रत्यक्ष करों का भार निर्धन व्यक्तियों पर पड़ता है। किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि सदैव ऐसा नहीं होता। यह भी सम्भव है कि प्रत्यक्ष करों का भार निर्धनों पर अधिक पड़े और अप्रत्यक्ष करों का भार धनी वर्ग पर पड़े।

प्रत्यक्ष और परोक्ष करों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए प्रो० डी मार्को ने यह विचार व्यक्त किया है कि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रो० डी मार्को के अनुसार धनी व्यक्तियों की सम्पूर्ण आय का सही माप नहीं किया जा सकता। यह तो स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष करों का भार उन्हीं व्यक्तियों पर अधिक पड़ता है जिनकी आय की गणना की जा सकती है, जैसे—वेतन पाने वाले कर्मचारी। इसके विपरीत, कुछ ऐसे अधिक आय वाले लोग होते हैं जिनकी आय तो अधिक होती है किन्तु उनकी आय की सही गणना नहीं की जा सकती, , जैसे-डॉक्टर, वकील इत्यादि। अत: ये लोग आयकर से बच जाते हैं। इस प्रकार इन करों का वितरण असमान हो जाता है। किन्तु अप्रत्यक्ष करों से इस असमानता को डीक किया जा सकता है। जिन लोगों की आय की गणना नहीं हो पाती और इस प्रकार करों से बच जाते हैं, उनके पास काफी आय बची रहती है जिसे वे वस्तुओं के क्रय करने पर खर्च करते हैं। ऐसी आय पर अप्रत्यक्ष कर लगाए जा सकते हैं। इस प्रकार करों के भार को विभिन्न वर्गों में समान रूप से वितरित किया जा सकता है। इस प्रकार अप्रत्यक्ष कर, प्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं क्योंकि वे ऐसी आय पर लगाए जा सकते हैं जो प्रत्यक्ष आय के अन्तर्गत नहीं आ पाते।

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एक अन्य दृष्टि से भी अप्रत्यक्ष कर, प्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं। एक व्यक्ति की आय में समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं। किन्तु प्रत्यक्ष करों में इनकी पूर्ण गणना नहीं हो पाती और लोग प्रत्यक्ष करों से बच जाते हैं। किन्तु व्यक्ति की आय बढ़ने से उसके उपभोग में वृद्धि हो जाती है और अप्रत्यक्ष करों के रूप में उसे अधिक राशि का भुगतान करना होता है।

प्रो० डी मार्को के अनुसार, प्रत्यक्ष कर कई रूपों में अप्रत्यक्ष करों के पूरक होते हैं-प्रथम ऐसी वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर नहीं लगाए जा सकते जिनका उपभोग स्वयं उत्पादकों द्वारा कर लिया जाता है, जैसे—कृषि पदार्थ। ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष करों की आवश्यकता होती है। दूसरे, अप्रत्यक्ष कर, सब प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं पर नहीं लगाए जा सकते अतः एक व्यक्ति की आय पर अप्रत्यक्ष कर लगाना ही पर्याप्त नहीं है, वरन उस आय पर प्रत्यक्ष कर भी लगाया जाना चाहिए। तीसरे, अप्रत्यक्ष करों के समान, प्रत्यक्ष करों का भी अपवंचन किय । सकता है। अतः इस दृष्टि से केवल प्रत्यक्ष करों के द्वारा ही व्यक्तियों की आय की सही गणना करों के लिए नहीं की जा सकती वरन् पूरक के रूप में अप्रत्यक्ष कर भी लगाए जाने चाहिए।

निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि किसी भी देश की कर-प्रणाली में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही करों को सम्मिलित किया जाना चाहिए। वस्तुत: यह कहना बड़ा ही कठिन है कि दोनों में से कौन सा कर उत्तम है?

प्रश्न 15, आनुपातिक कर प्रणाली तथा प्रगतिशील कर प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इनके गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।

उत्तर- आनुपातिक कर प्रणाली (Proportional tax system)- यह वह कर प्रणाली है जिसमें आय के प्रत्येक स्तर पर एक ही दर से कर लगाया जाता है अर्थात् प्रत्येक करदाता को अपनी आय पर समान अनुपात से कर देना पड़ता है। इस कर प्रणाली में आय के बढ़ने या घटने पर कर की दर नहीं बदलती बल्कि एक सी बनी रहती है। उदाहरण के लिये यदि कर की दर 10% है तो ₹ 10,000 कर योग्य आय पर ₹ 1,000 तथा ₹ 1,00,000 कर-योग्य आय पर ₹ 10,000 कर के रूप में चुकाने पड़ेंगे।

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आनुपातिक कर प्रणाली के गुण (Merits of Proportional Tax System)

(i) इस कर-प्रणाली का सबसे बड़ा गुण इसकी सरलता है क्योंकि इसे प्रत्येक व्यक्ति आसानी से समझ सकता है।

(ii) इसमें निश्चितता का भी गुण है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को निश्चित रूप से यह पता रहता है कि उसे कितना कर चुकाना है।

आनुपातिक कर प्रणाली के दोष (Demerits of Proportional Tax System)

(i) यह कर प्रणाली न्याय के सिद्धान्त के विरुद्ध है क्योंकि इसमें धनी लोगों को तुलना में निर्धनों पर अधिक कर भार पड़ता है।

(ii) यह प्रणाली आय व धन के वितरण की विषमताओं को कम करने में असमर्थ हो

(iii) एक प्रगतिशील समाज के लिये यह प्रणाली अनुपयुक्त ही नहीं बल्कि अव्यावहारिक भी है।

प्रगतिशील कर-प्रणाली (Progressive Tax System)- प्रगतिशील कर प्रणाला बह कर-प्रणाली है जिसके अन्तर्गत आय में होने वाली वृद्धि के साथ-साथ कर का बरती जाती है। दूसरे शब्दों में, करदाता की आय बढ़ने पर, कर की दर का बढ़ना प्रगतिशील करारोपण कहलाता है। इस पद्धति का आधार करदाता की कर-दान क्षमता है क्योंकि आय में वृद्धि होने से करदाता की कर देने की क्षमता बढ़ जाती है।

प्रगतिशील करों के गुण (Merits of Progressive Tax System)

(1) करदान योग्यता के अनुकूल- प्रगतिशील कर, करदान योग्यता के सिद्धान्त के अनुकूल है। हम जानते हैं कि एक धनी व्यक्ति के लिये द्रव्य की सीमान्त इकाई की उपयोगिता, एक निर्धन की अपेक्षा कम होती है। इसी कारण, एक धनी व्यक्ति को निर्धन की तुलना में कर देने से कम हानि होती है। अत: मार्शल के अनुसार, ‘यह सर्वथा उचित है कि धनी वर्ग से प्रगतिशील दर से कर लिया जाये।”

(2) न्यूनतम सामाजिक त्याग- प्रगतिशील कर लगाने पर पूरे समाज को होने वाली सन्तुष्टि की हानि न्यूनतम होगी क्योंकि धनी लोगों को ऊँचा कर देने पर भी इतनी असन्तुष्टि नहीं होती जितनी कि निर्धनों को। अत: निर्धन लोगों से कम कर लेकर अथवा उन्हें कर मुक्त करके और धनिकों पर ऊँचा कर लगाकर समाज के त्याग को न्यूनतम किया जा सकता है।

(3) धन का समान वितरणप्रगतिशील कर धन-वितरण की विषमताओं को कम करते हैं क्योंकि धनिकों से ज्यादा और निर्धनों से बहुत कम कर लिया जाता है।

(4) लोचपूर्ण व उत्पादक- इन करों में पर्याप्त लोच होती है और ये उत्पादक भी माने जाते हैं। धनी लोगों पर लगने वाले कर की दर में थोड़ी-सी वृद्धि करके पर्याप्त मात्रा में आय प्राप्त की जा सकती है।

(5) मितव्ययी- प्रगतिशील कर मितव्ययी होते हैं क्योंकि इनके संग्रह में खर्चा एक-सा ही होता है, भले ही कर की दरें कितनी ही ऊँची क्यों न हों।

प्रो० मार्शल, टेलर, हॉवसन तथा कीन्स ने प्रगतिशील करारोपण का भरपूर समर्थन किया है।

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प्रगतिशील करों के दोष (Demerits of Progressive Tax System)

(1) पूँजी संचय पर बुरा प्रभाव- इन करों का काम करने तथा बचत करने की इच्छा व क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। बचतों के कम होने से पूँजी निर्माण में कमी आती है और देश का आर्थिक विकास रुक जाता है।

(2) करों की मनमानी दरेंप्रगतिशील करों की दर का निर्धारण बिना किसी वैज्ञानिक आधार के मनमाने ढंग से किया जाता है जिससे सामाजिक असंतोष बढ़ता है। , (3) अन्यायपूर्ण व अनुचित-कुछ व्यक्तियों के अनुसार प्रगतिशील कर अन्यायपूर्ण हैं क्योंकि ये ईमानदार, बचत करने वाले तथा कड़ा परिश्रम करने वाले व्यक्तियों पर लगाये गये दण्ड के समान हैं, जबकि जाहिल व काहिल लोग इनसे मुक्त बने रहते हैं।

(4) करारोपण का त्रुटिपूर्ण आधार- प्रगतिशील करारोपण की यह मान्यता, कि द्रव्य की सीमान्त उपयोगिता एक धनी व्यक्ति के लिये निर्धन की अपेक्षा कम होती है, पूरी तरह सही नहीं है। यह सम्भव है कि एक व्यक्ति को अपनी बढ़ती हुई आय से गिरती हुई सन्तुष्टि मिले, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अधिक आय प्राप्त करने वाला व्यक्ति, कम आय वाले व्यक्ति की तुलना में कम सन्तुष्टि प्राप्त करेगा क्योंकि सन्तुष्टि तो एक मानसिक स्थिति है तथा एक व्यक्ति की सन्तुष्टि की तुलना दूसरे व्यक्ति की सन्तुष्टि से नहीं की जा सकती।

(5) कर चोरी में वृद्धि- प्रगतिशील कर प्रणाली करदाता को झूठे हिसाब-किताब – बनाकर करों से बचने के लिये प्रेरित करती हैं।

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आनुपातिक कर बनाम प्रगतिशील कर (Proportional Tax Vs, Progressive Tax)

यद्यपि आनुपातिक तथा प्रगतिशील कर दोनों के अपने- अपने गुण व दोष हैं किन्तु अब प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों में से किसे श्रेष्ठ माना जाये ? अधिकाँश लोगों का मत है कि आनुपातिक करों की अपेक्षा प्रगतिशील कर कहीं अधिक अच्छे होते हैं क्योंकि ये करदान योग्यता के आधार पर लगाये जाते हैं और इनमें लोच, उत्पादकता व मितव्ययिता का गुण भी पाया जाता है। फिर, ये कर न्यायपूर्ण भी हैं क्योंकि समाज में फैली धन-वितरण की विषमताओं और गरीब तथा अमीर के बीच की खाई को इनके द्वारा कम करने में सहायता मिलती है। कुछ लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि प्रगतिशील कर उत्पादन क्षमता व बचत-इच्छा पर बुरा प्रभाव डालते हैं। हमारी दृष्टि में यह उनका एक भ्रम है। व्यवसायी की आगे बढ़ने की महत्त्वाकांक्षा; दूसरे से अधिक धनवान होने की लालसा; अपने वर्तमान आर्थिक स्तर को गिरने न देने की दृढ़ता और धन की निरन्तर भूख, उसे लगातार कार्य करने व बचत करने के लिये प्रेरित करती रहती है। दूसरी तरफ आनुपातिक करों में सरलता के अलावा अन्य कोई गुण नहीं होता। अतः निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि सरकार को सदैव प्रगतिशील करारोपण प्रणाली को अपनाना चाहिए।

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प्रश्न 16, वैट को परिभाषित कीजिये। वैट के कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?

उत्तर-

वैट का अर्थ (Meaning of VAT)

मूल्य वर्धित कर (VAT), एक ऐसी कर प्रणाली है जिसके अनुसार कर (Tax) केवल उत्पादन प्रक्रिया में की गई मूल्य वृद्धि पर ही लगाया जाता है। यह मूल्य वृद्धि उत्पादक व विक्रेता द्वारा की जाती है।

श्री एल० के० झा समिति के अनुसार, मूल्य वर्धित कर व्यापक रूप से समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं पर एक कर है जिसमें निर्यात वस्तुओं एवं शासकीय सेवाओं को पृथक कर दिया जाता है। यह कर प्रत्येक स्तर पर व्यवसाय की मूल्य वृद्धि पर जोड़ा जाता है अतः इसे मूल्य वर्धित कर कहते हैं।” सूत्र रूप में इसे अग्र प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है-

वर्धित मूल्य = वस्तु का कुल मूल्य – क्रय की गयी कच्ची सामग्री एवं अन्य सामग्री का मूल्य

उपयुक्त में जो कर वर्धित मूल्य में लगाया जाता है, उसे ही मूल्य वर्धित कर कहा है। उदाहरण-बाजार में जो डबल रोटी बिकती है, वह गेहूँ के मैदे से तैयार की जाती है- इसके बनने की तीन अवस्थाएँ हैं-गेहूँ, गेहूँ से मैदा तैयार करना और फिर इसे गूंथकर सेककर डबल रोटी तैयार करना। अगर पहले गेहूँ पर कर लगेगा, उसके बाद मैदे पर और फिर डबल रोटी पर तो तीन बार कर के ऊपर कर लगेगा और डबल रोटी के दाम बहुत बढ़ जाएँगे। मूल्य वर्धित कर प्रणाली के अन्तर्गत मैदे पर इसकी कुल कीमत पर कर न लगाकर केवल उस भाग पर कर लगता है जिससे मैदे की कीमत में वृद्धि हुई है। मान लो गेहूँ 10 रुपए किलो है और मैदा 18 रुपए किलो तो पहले मैदे पर 18 रुपए पर कर लगता था पर वैट (VAT) के लागू होने के बाद केवल 8 रुपए पर कर लगने लगेगा।

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वैटके लाभ/गुण (Merits of VAT)

1, उत्पादन के विभिन्न रूपों के प्रति तटस्थ- मूल्य वर्धित कर, विक्रय कर से इस अर्थ में भिन्न है कि यदि विक्रय कर लगाया जाता है तो विभिन्न उत्पादन क्रियाओं के अनुसार कर भार अलग-अलग होता है, जिसके फलस्वरूप कर का भार बढ़ जाता है, किन्तु मूल्य वर्धित कर सभी स्थितियों में समान रहता है।

2, कर वंचन में कमी- मूल्य वर्धित कर में चोरी का भय कम रहता है, क्योंकि प्रत्येक फर्म को केवल मूल्य वृद्धि पर ही कर देना पड़ता है जो विक्रय कर की तुलना में काफी कम होता है।

3, निर्यात प्रोत्साहन- मूल्य वर्धित कर को उत्पादन लागत से सरलता से पृथक् किया जा सकता है तथा कर भार को पृथक् करके निर्यात व्यापार को प्रोत्साहित किया जा सकता है। यदि हम अन्य करों से तुलना करें तो पाते हैं कि मूल्य वर्धित कर निर्यात व्यापार बढ़ाने में अधिक सहायक है।

4, मूल्य नियन्त्रण में सहायक- विक्रय कर के फलस्वरूप कर की तुलना में मूल्यों में अधिक वृद्धि होती है, किन्तु मूल्य वर्धित कर का भार सभी उत्पादन की क्रियाओं में समान होने से मूल्य में अधिक वृद्धि नहीं होती।

5, व्यावहारिक- अन्य करों की तुलना में मूल्य वर्धित कर अधिक व्यावहारिक है।

6, फर्म की उत्पादन क्षमता में वृद्धि- मूल्य वर्धित कर लाभ के आधार पर न , लगाया जाकर उत्पादन की मात्रा के अनुसार लगाया जाता है। लाभ हो या हानि, फर्म को कर देना ही पड़ता है अत: प्रत्येक फर्म यह प्रयास करती है कि न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करे।

भारत में वैट की समस्याएँ (Problems of VAT in India)- भारत में वैट के कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

1, संवैधानिक समस्याएँ (Constitutional Problems)- भारत में वैट के प्रारम्भ से ही अनेक राजनैतिक एवं संवैधानिक समस्याएँ खड़ी होती रही हैं; जैसे- क्या वैट राष्ट्रीय स्तर पर लगाया जाए या प्रान्तीय स्तर पर ? इससे एक विस्फोटक राजनैतिक समस्या उत्पन्न होती है जो प्रान्तीय स्वायत्तता से सम्बन्धित है।

2, प्रशासनिक समस्याएँ (Administrative Problems)- (i) व्यवहार किए जाने ल करदाताओं की संख्या ज्यों ही हम वित्त व्यवहारों की श्रृंखला में नीचे उतरते हैं, बहत 1म्बा हो जाती है। (ii) छोटे व्यापारी केवल पुराने ढंग से हिसाब-किताब रखते हैं।

3, राजस्व सम्बन्धी विचार (Revenue Considerations)- वैट से प्राप्त आय क्ष करों की वर्तमान प्रणाली से प्राप्त आय से बहुत कम है। इस प्रकार यह कर सरकार पाट की वित्त व्यवस्था करने के लिए विवश करता है।

4, विकासशील देशों का अनुभव (Experience of Developina Countries)- संसार के बहुत से विकासशील देशों का अनुभव भारत में वैट के प्रारम्भ : समर्थन नहीं करता, क्योंकि इससे सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय एवं प्रशासनिक बोझ पडला

5, लागू करने में कठिनाइयाँ (Difficulties in Application)- मूल्य वर्धित कर को लागू करने के लिए एक सक्षम एवं कार्यकुशल प्रशासन तन्त्र की आवश्यकता होती है जो उत्पादन की विभिन्न प्रणाली में होने वाली मूल्य वृद्धि का सही लेखा-जोखा रख सके, परन्त इस प्रकार के कुशल कर्मचारी न होने से इसे लागू करने में कठिनाई होती है।

6, करदाताओं के सहयोग के बिना लागू करना असम्भव (Co-operation from the Taxpayers Necessary)यह कर प्रणाली उसी समय लागू की जा सकती है जब सरकार को करदाताओं का पूरा सहयोग मिले। इसके लिए फर्मों को उत्पादन व मूल्य की सही गणना करना जरुरी है। फर्मों को इसका हिसाब भी रखना पड़ता है कि उत्पादन में जिन अन्य फर्मों से सामग्री क्रय की गई है, उन्होंने कितने कर का भुगतान किया है।

7, गणना सम्बन्धी कठिनाइयाँ (Calculation Difficulties)- इस कर की गणना करना सरल नहीं है, क्योंकि इसमें काफी जटिलता रहती है।

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