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Bcom 2nd Year Public Finance Problem of justice in Taxation

Bcom 2nd Year Public Finance Problem of justice in Taxation

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Bcom 2nd Year Public Finance Problem of justice in Taxation
Bcom 2nd Year Public Finance Problem of justice in Taxation

करारोपण में न्याय की समस्या (Problem of Justice in Taxation)

प्रश्न 23. कराधान में न्याय की समस्या क्या है ? इस सन्दर्भ में करदेय योग्यता सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

उत्तर- करारोपण में न्याय के विचार से आशय कर-भार के वितरण में सामाजिक न्याय से है। करारोपण का भार मौद्रिक तथा वास्तविक होता है जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष हो सकता है। करारोपण के प्रत्यक्ष मौद्रिक भार से तात्पर्य मुद्रा की उस धनराशि से है जिसे व्यक्ति करों के रूप में सरकार को चुकाते हैं। इससे व्यक्तियों की व्यय योग्य मौद्रिक आय कम हो जाती है। प्रत्यक्ष वास्तविक भार का अर्थ त्याग अर्थात् अनुपयोगिता की उस मात्रा से है जो कर भुगतान करने पर क्रय-शक्ति के परित्याग में निहित है।

करों के अप्रत्यक्ष भार का अर्थ मूल्य स्तर, आयों, उत्पादन और रोजगार पर इनके प्रभावों से है। इस प्रकार एक कर-प्रणाली में कर भार के वितरण में समानता होनी चाहिए जिससे कि आर्थिक और नागरिक न्याय की प्राप्ति हो सके। न्यायसंगत करारोपण न होने पर आर्थिक एवं राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है। इस सम्बन्ध में श्रीमती हिक्स के विचार उल्लेखनीय हैं। उनका कहना है कि “रोमन साम्राज्य के पतन का कारण त्रुटिपूर्ण ढंग से संगठित और विस्तृत कर प्रणाली थी। इसी प्रकार फ्रांस की क्रान्ति का मुख्य कारण भी अन्यायपूर्ण कर प्रणाली ही थी जिसमें निर्धन वर्ग की अपेक्षा धनिकों पर कर भार कम था।” अत: करारोपण में न्याय के सिद्धान्त का पालन होना चाहिए। कर का निर्धारण इस ढंग से होना चाहिए कि विभिन्न करदाताओं पर कर का भार न्यायपूर्ण हो। कर देय योग्यता का सिद्धान्त (Ability to Pay Principle)  कर देने की सामर्थ्य का सीधा सम्बन्ध व्यक्तियों की आर्थिक परिस्थितियों से हैं। टेलर के अनुसार, “व्यक्तियों के बीच कर अदा करने की योग्यता के सिद्धान्त पर कर भार के बँटवारे का अर्थ है कर के भार का समानीकरण।” करदेय योग्यता का सिद्धान्त सामाजिक न्याय के सिद्धान्त से मिलता-जुलता है। यह सिद्धान्त बहुत पुराना है। 16वीं शताब्दी में जीन बोडिन और 18वीं शताब्दी में विलियम पेटी तथा एडम स्मिथ, ने इस सिद्धान्त की व्याख्या की थी। एडम स्मिथ के अनुसार, “प्रत्येक राज्य की जनता को राज्य की सहायता हेतु अपनी योग्यतानुसार अनुपात में अंशदान करना चाहिये अर्थात् कर उस आय के अनुपात में देना चाहिये जिसे वे राज्य के संरक्षण में प्राप्त करते हैं।”

अत: स्पष्ट है कि धनी वर्ग पर अधिक कर लगाया जाना चाहिये, क्योंकि उसकी कर देने की क्षमता अधिक होती है, जबकि निर्धन वर्ग की कर देने की क्षमता कम होती है अत: उसे कर-मुक्त कर देना चाहिये अथवा कम दर से कर लेना चाहिये। करदेय योग्यता को ज्ञात करने के लिये अर्थशास्त्रियों ने दो दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं-

(I) व्यक्तिगत या भावनात्मक दृष्टिकोण (Subjective Approach)

(II) वस्तुगत या बाह्य दृष्टिकोण (Objective Approach)

(I) व्यक्तिगत या भावात्मक दृष्टिकोण (Subjective Approach)- भावात्मक दृष्टिकोण व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक धाराणा पर आश्रित है। करदाता कर देते समय जिस कष्ट या त्याग का अनुभव करता है उसी कष्ट का अध्ययन इस दृष्टिकोण में किया जाता है, किन्तु इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि कर देने के फलस्वरूप करदाता जो त्याग करता है तथा उन्हें जो कष्ट होता है, उसका माप कैसे किया जाये ? इसका कारण यह है कि त्याग एक मानसिक स्थिति है जिसका माप करना बहुत कठिन है। इस सम्बन्ध में प्रो० पीगू (Pigou) के अनुसार, “प्रत्यक्ष कर के समान व्यक्तियों के समूह पर समान परिस्थितियों का समान मानसिक प्रभाव पड़ता है। फिर भी यह प्रश्न पैदा होता है कि न्याय को दृष्टि में रखते हुए कितना त्याग उचित माना जाये ?”

 

इस सम्बन्ध में विभिन्न अर्थशास्त्रियों द्वारा तीन सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं, जो इस प्रकार है

(1) समान त्याग का सिद्धान्त (Principle of Equal Sacrifice)- इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो० जे०एस० मिल (U.S. Mill) ने किया। इसके अनुसार प्रत्येक करदाता पर करारोपण का वास्तविक भार समान होना चाहिये। प्रो० मिल के अनुसार, “राजनीति के सिद्धान्त के रूप में करारोपण की समानता का अर्थ यह है कि सरकार के व्यय में प्रत्येक व्यक्ति का भाग इस प्रकार निश्चित किया जाना चाहिये कि उसे अपने अंशदान में दूसरे व्यक्ति के अंशदान की तुलना में न तो अधिक और न कम असुविधाओं का अनुभव हो।”

– इसका अर्थ यह है कि विभिन्न करदाता करों के रूप में उपयोगिता की समान राशि का त्याग करें। इसको दूसरे ढंग से यह कहा जा सकता है कि कर अदा करने के पूर्व आय की कुल उपयोगिता तथा कर देने के पश्चात् आय की उपयोगिता प्रत्येक करदाता की समान रहे। यदि इस सिद्धान्त को स्वीकार किया जाये तो सार्वजनिक आय के लिये प्रत्येक व्यक्ति को कर देना होगा तथा किसी को कर देने से छूट नहीं होगी। यदि हम यह मान लें कि आय की सीमान्त उपयोगिता अनुसूचियाँ सबके लिये समान हैं तथा आय की सीमान्त उपयोगिता भी एक सी रहती है तो इसका अर्थ यह होगा कि प्रत्येक करदाता कर के रूप में आय की समान निरपेक्ष राशि अदा करेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि आय में वृद्धि पर कर की दर नीची हो जायेगी अर्थात् कर प्रतिगामी होगा।

(ii) आनुपातिक त्याग का सिद्धान्त (Principle of Proportional Sacrifice)- इस सिद्धान्त के अनुसार करदाताओं पर कर का भार समान नहीं होना चाहिये, वरन् उनकी आय अथवा राज्य द्वारा प्राप्त किये गये आर्थिक कल्याण के अनुपात में होना चाहिये। इसका आशय यह है कि कम आय वाले व्यक्ति को ऊँची दर पर कर देना चाहिये। समान त्याग की तुलना में यह सिद्धान्त अधिक उपयुक्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार जो लोग अधिक त्याग कर सकते हैं, उन्हें अधिक कर का भुगतान करना चाहिये।

(iii) न्यूनतम त्याग का सिद्धान्त (Principle of Least Aggregate Sacrifice)-इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो० एजवर्थ तथा कार्बर (Carver) ने किया तथा डाल्टन, प्रो० मार्शल एवं पीगू ने इसका समर्थन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार कर की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिये कि कर का कुल भार न्यूनतम हो। प्रत्येक करदाता का कुल त्याग बराबर न होकर सीमान्त त्याग बराबर होना चाहिये। यह सिद्धान्त उपयोगिता हास नियम पर आधारित है। किसी व्यक्ति के पास मुद्रा की मात्रा जितनी अधिक बढ़ती है, उसकी सीमान्त उपयोगिता उतनी ही गिरती जाती है। इस दृष्टि से अमीर व्यक्ति द्वारा अधिक मात्रा में लगाये गये करों से उतना ही त्याग किया जाता है जितना कि निर्धन व्यक्ति द्वारा कम करों से। यदि प्रत्येक करदाता का सीमान्त त्याग बराबर है तो समाज का कुल त्याग न्यूनतम होगा। इसके लिये आवश्यक है कि कर प्रणाली प्रगतिशील (Progressive) हो अर्थात् अधिक आय वाले व्यक्तियों को कम आय वाले व्यक्तियों की तुलना में अनुपात से अधिक कर देना चाहिये। एजवर्थ के अनुसार, “न्यूनतम त्याग का सिद्धान्त करारोपण का श्रेष्ठ सिद्धान्त है। कल त्याग जितना कम होगा,समाज में कर के भार का वितरण उतना ही अच्छा होगा।

राज्य का उद्देश्य मानवीय कल्याण को अधिकतम करना है जो लोगों के न्यूनतम त्याग से ही सम्भव है। इस प्रकार यह सिद्धान्त अधिकतम सामाजिक कल्याण की धारणा पर आधारित है।”

उपर्युक्त सिद्धान्त का निष्कर्ष यह है कि उच्च आय वर्ग पर प्रगतिशील दर से कर लिया जाना चाहिये तथा कर प्रणाली का उद्देश्य सम्पत्ति के वितरण में जितना अधिक सम्भव हो सके, समानता लाना होना चाहिये। प्रो० पीग ने न्यूनतम त्याग सिद्धान्त को करारोपण का अन्तिम सिद्धान्त कहा है।

भावात्मक दृष्टिकोण की सीमाएँ (Limitations of Subjective Approach)- भावात्मक दृष्टिकोण की मुख्य सीमाओं को निम्न प्रकार से रखा जा सकता

(1) रुचि व प्रकृति में अन्तरविभिन्न व्यक्तियों की आयकर की मात्रा समान होने पर भी उन सभी के सीमान्त त्याग को बराबर करना कठिन होगा क्योंकि व्यक्ति की रुचि व प्रकृति में अन्तर पाया जाता है।

(2) आय अर्जित करने का ढंग- मेहनत से अर्जित की गयी आय की उपयोगिता उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति से अर्जित आय की उपयोगिता की तुलना में अधिक होती है, परन्तु इन बातों को भावात्मक दृष्टिकोण से भुगतान करने की योग्यता का माप करते समय ध्यान में नहीं रखा जाता है।

(3) सीमान्त उपयोगिता की गिरती दर को मापना कठिन- आय के बढ़ने के साथ-साथ उपयोगिता गिरती जाती है, परन्तु उसे मापना सम्भव नहीं हो पाता है। अत: करों में प्रगतिशीलता का सहारा लेना काल्पनिक है तथा इससे सीमान्त त्याग समान नहीं हो पाता है।

(4) सही माप सम्भव नहीं- त्याग एक भावात्मक दृष्टिकोण होने से उसे सही ढंग से मापना सम्भव नहीं हो पाता है। इसी प्रकार उस स्थिति को प्राप्त करना भी कठिन होता है जहाँ पर सभी व्यक्तियों का कुल त्याग न्यूनतम हो।

(II) वस्तुगत दृष्टिकोण (Objective. Approach)- भावात्मक दृष्टिकोण की कठिनाइयों को देखते हुए अमेरिकन अर्थशास्त्रियों ने करदेय क्षमता की माप हेतु वस्तुगत दृष्टिकोण को अपनाने का समर्थन किया। वस्तुगत दृष्टिकोण से कर-दान योग्यता निम्न बातों पर निर्भर करती है

(i) उपभोग का स्तर, (ii) करदाता को सम्पत्ति, (iii) करदाता की आय।

(i) उपभोग का स्तरकरदान योग्यता उपभोग पर निर्भर करती है जो व्यक्ति जितना अधिक उपभोग पर व्यय करेगा उसकी कर देने की शक्ति उतनी ही अधिक होगी तथा जो व्यक्ति उपभोग पर जितना कम व्यय करेगा उसकी कर देने की सामर्थ्य उतनी ही कम होगी। प्रायः धनी व्यक्ति निर्धनों की अपेक्षा उपभोग पर अधिक व्यय करते हैं। अत: धनों लोगों पर ऊँची दर से कर लगाकर उनकी फिजूलखर्ची को रोका जा सकता है, परन्तु उपभोग के आधार पर करारोपण करने से निम्नांकित दोष उत्पन्न हो सकते हैं

(1) अधिक उपभोग या व्यय करने का अर्थ यह नहीं होता कि व्यक्ति अधिक कर दे सकता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जिसके परिवार के सदस्यों की संख्या दूसरे व्यक्ति

की तुलना में अधिक है का व्यय स्वाभाविक रूप से अधिक होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि उस व्यक्ति की कर देय योग्यता भी अधिक हो।

(2) उपभोग के आधार पर करारोपण करने से उपभोग की मात्रा कम हो जायेगी। फलतः व्यक्तियों की कार्यकुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा जिसके कारण उत्पादन गिर जायेगा।

(3) ऐसे करदाता को जो कंजूस है और कम खर्च करता है, परन्तु उसकी आय अधिक है, कम कर चुकाना पड़ेगा यद्यपि उसकी करदेय योग्यता अधिक है।

(4) एक खर्चीले व्यक्ति को अपनी करदेय योग्यता से अधिक कर चुकाना पड़ सकता है।

(ii) करदाता की सम्पत्ति- अधिक सम्पत्ति वाले व्यक्तियों की करदान क्षमता अधिक व कम सम्पत्ति वाले की कम रहती है। अधिक सम्पत्ति का होना मनुष्य की आर्थिक शक्ति का द्योतक होता है। इसके अनुसार जिस मनुष्य के पास जितनी अधिक सम्पत्ति हो, उससे उतना ही अधिक कर वसूल करना चाहिए। यह कर प्रगतिशील कर की दर के आधार पर वसूल किया जाना चाहिए।

कठिनाइयाँ व त्रुटियाँसम्पत्ति के आधार पर करदान सामर्थ्य मानकर कर लगाने में निम्न कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं –

(1) समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अधिक आय को नकदी में ही रखना पसन्द करते हैं और उसे सम्पत्ति में लगाना नहीं चाहते तथा अपने जीवन-स्तर को ऊँचा उठा

लेते हैं। ऐसी स्थिति में, सम्पत्ति को कर देने की योग्यता का आधार मानना गलत साबित हो । जाता है।

(2) कुछ व्यक्तियों के पास सम्पत्ति नहीं होती, परन्तु उनकी आय अधिक होती है। ऐसे व्यक्ति अमितव्ययी हो सकते हैं। अत: यदि सम्पत्ति के आधार पर कर लगाया जाए तो वे व्यक्ति जिनकी आय अधिक है और अमितव्ययी हैं कर से मुक्ति पा जाएँगे। यह अनुचित होगा।

(3) सम्पत्ति के आधार पर करारोपण करने से व्यक्ति अमितव्ययी बन जाएंगे, क्योंकि सम्पत्ति एकत्रित करने पर उन्हें कर चुकाना पड़ेगा।

(4) यह आवश्यक नहीं है कि समान सम्पत्ति से समान आय प्राप्त हो। इस दृष्टि से ‘ सम्पत्ति का आधार अनुचित होगा।

(5) सम्पत्ति का मूल्यांकन करना सरल नहीं होता।

(iii) व्यक्ति की आय (Individual Income)- आय को कर का आधार मानते हुए करारोपण किया जा सकता है। कुछ विद्वानों का मत है कि जिस व्यक्ति की आय अधिक हो उससे अधिक कर तथा जिसकी आय कम हो उससे कम कर वसूल किया जाना चाहिए। आय का आधार निम्न कारणों से उपयुक्त नहीं माना जाता है

(1) यह हो सकता है कि दो व्यक्तियों की आय समान हो, परन्तु एक व्यक्ति के परिवार में सदस्यों की अधिक संख्या होने के कारण उसका पारिवारिक उत्तरदायित्व दूसरे छोटे परिवार वाले व्यक्ति की तुलना में अधिक हो।

(2) कुछ व्यक्तियों की आय अनार्जित होती है अर्थात् वे पैतृक सम्पत्ति से आय प्राप्त करते हैं और कुछ व्यक्तियों को आय उनके कठोर परिश्रम के कारण प्राप्त होती है। इन दोनों

प्रकार के व्यक्तियों के लिए कर की दर समान नहीं हो सकती है अत: आय का आधार उचित नहीं माना जाता है।

लॉर्ड स्टाम्प के अनुसार, अन्य आधारों की तुलना में आय का आधार कर देने की योग्यता का एक सर्वोत्तम प्रमाण माना जाना चाहिए, यदि करारोपण करते समय निम्न बातों पर ध्यान दिया जाये

(अ) अतिरिक्त आय- कुल आय में अतिरिक्त आय को भी सम्मिलित करना चाहिए तथा उस अतिरिक्त आय पर ऊँची दर से कर लगाया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति की करदेय क्षमता पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

(ब) आय के साधन- आय-कर निर्धारित करते समय इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि उसे वह आय निजी प्रयत्नों से प्राप्त हुई है या उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति से हुई है। निजी प्रयत्नों से प्राप्त आय पर कम दर से करारोपण किया जाना उचित माना जाता है |

(स) आय प्राप्त होने पर- करदाता से आय प्राप्त होने पर ही कर लगाया जाना चाहिए, अन्यथा उसे अपार कष्ट सहना पड़ेगा। इसके लिए यह आवश्यक होगा कि व्यक्ति से आय-प्राप्ति के साथ ही कर वसूल कर लिया जाये।

(द) ह्रास का प्रबन्ध- स्थायी सम्पत्ति से जो आय प्राप्त होती है, उसमें ह्रास का भी उचित प्रबन्ध किया जाना चाहिए और शेष आय पर ही कर लगाया जाना उचित होगा।

(इ) परिवार के सदस्यों की संख्या- करारोपण करते समय व्यक्ति के परिवार के सदस्यों की संख्या को भी ध्यान में रखना चाहिये। यदि किसी परिवार के सदस्यों की संख्या अधिक है तो इस पर कम कर लगाया जाना चाहिये।

(फ)न्यूनतम छूट- करारोपण करते समय जीवन-निर्वाह के लिये न्यूनतम छूट का प्रबन्ध अवश्य किया जाना चाहिये। इससे कम आय वाले वर्ग के व्यक्तियों को छोड़ दिया जाता है।

Bcom 2nd Year Business Public Finance Public Expenditure

Bcom 2nd Year Business Public Finance Public Revenue

 

Problem of justice in Taxation


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